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                <title>Prayagraj court news - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Prayagraj court news RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट के राडार पर 'इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से सवाल किया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत क्यों दी, जिस पर पहली नज़र में दहेज हत्या के आरोप हैं। कोर्ट ने आरोपी पति की ज़मानत रद्द कर दी और उसे एक हफ़्ते के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल एक साल के अंदर पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच, मृतक के पिता द्वारा दायर एक स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पति को दी गई ज़मानत को चुनौती</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177743/allahabad-high-court-on-the-radar-of-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(3)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से सवाल किया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत क्यों दी, जिस पर पहली नज़र में दहेज हत्या के आरोप हैं। कोर्ट ने आरोपी पति की ज़मानत रद्द कर दी और उसे एक हफ़्ते के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल एक साल के अंदर पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच, मृतक के पिता द्वारा दायर एक स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पति को दी गई ज़मानत को चुनौती दी गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में, कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी, जिसमें बताया गया था कि मृतक की गर्दन के आस-पास चोट के निशान थे। जब कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि वे एक काउंटर-एफ़िडेविट (जवाबी हलफ़नामा) दायर करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस पारदीवाला ने कहा: "इस तरह के आरोपों और शादी के सात साल के अंदर हुई मौत के मामले में, आपको ज़मानत क्यों दी जानी चाहिए? वकील साहब, मुद्दे पर बात करें, कमज़ोर दलीलें न दें, वरना हम यहीं और अभी आपकी ज़मानत रद्द कर देंगे। आप पर दहेज हत्या का आरोप है, और आपकी पत्नी आपके ही घर में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी। उसके शरीर पर बाहरी चोट के निशान थे। आप अपनी पत्नी की मौत के बारे में क्या सफ़ाई देंगे?"</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने हाई कोर्ट से सवाल किया: "इस हाई कोर्ट में क्या दिक्कत है, यह हमारी समझ से बाहर है। जिन मामलों में ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए, उनमें भी ज़मानत दे दी जाती है।"</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह इस बात पर भी विचार करे कि आरोपी 18 महीने से हिरासत में है। इस पर, जस्टिस पारदीवाला ने मौखिक रूप से टिप्पणी की: "आप कुछ कहना चाहते हैं, मिस्टर वकील साहब? यह हत्या का मामला है। 304B, हाँ। उसकी गला घोंटकर हत्या की गई है; क्या आप चाहते हैं कि हम इसे करके दिखाएँ? पेज 31 [पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का] पर आइए।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने ज़मानत रद्द करने का आदेश दिया। अपने आदेश में, कोर्ट ने कहा कि शादी फरवरी 2019 में हुई थी और पत्नी की अप्राकृतिक मौत जुलाई 2024 में हुई। कोर्ट ने आगे कहा कि यह बात निर्विवाद है कि मृतक की मौत शादी के सात साल के अंदर हुई थी और आरोप दहेज से जुड़ी मौत के हैं। ऐसे हालात में, हाई कोर्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B के तहत अनुमान को ध्यान में रखना चाहिए था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया, जिसमें मृतक के शरीर पर मौत से पहले लगी चोटों का ज़िक्र था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने साफ़ किया कि वह मामले के गुण-दोष पर आगे कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, क्योंकि अभी मुक़दमा चल रहा है और अब तक सिर्फ़ एक गवाह की ही गवाही हुई है। हालाँकि, कुल मिलाकर हालात को देखते हुए, कोर्ट इस बात से संतुष्ट था कि ज़मानत देने वाला विवादित आदेश क़ानून की नज़र में सही नहीं है। इसलिए, प्रतिवादी को दी गई ज़मानत रद्द कर दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी को निर्देश दिया गया कि वह एक हफ़्ते के अंदर जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करे। ट्रायल कोर्ट को भी निर्देश दिया गया है कि वह एक साल के अंदर मुक़दमा पूरा करने की कोशिश करे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी जज ने तब भी निराशा ज़ाहिर की थी, जब हाई कोर्ट ने दहेज से जुड़ी मौत के एक मामले में, पहली नज़र में लगे आरोपों पर विचार किए बिना, अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए ज़मानत दे दी थी। इसके बाद, हाई कोर्ट के उस जज ने हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से अनुरोध किया कि उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों की ज़िम्मेदारी न दी जाए, और सुप्रीम कोर्ट की आलोचना को "हतोत्साहित करने वाला" बताया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने पिछले साल एक अनोखा आदेश दिया था। उन्होंने हाई कोर्ट के एक दूसरे जज के आदेश पर आपत्ति जताई थी, जिसमें पैसे की वसूली के लिए सिविल उपाय के प्रभावी न होने के आधार पर एक आपराधिक शिकायत को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। बेंच ने कड़ी टिप्पणियाँ करते हुए कहा कि उक्त जज से उनके रिटायरमेंट तक आपराधिक क्षेत्राधिकार वापस ले लिया जाना चाहिए और उन्हें हाई कोर्ट के किसी अनुभवी वरिष्ठ जज के साथ एक डिवीज़न बेंच में बैठाया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:10:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिर्फ दो मुकदमों से किसी को गुंडा नहीं कहा जा सकता- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177155/no-one-can-be-called-a-goon-with-just-two"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों के आधार पर उसे आदतन अपराधी बताते हुए समाज के लिए खतरा माना था। यह भी कहा गया कि उसकी गतिविधियों से इलाके में भय का माहौल बन गया, जिससे लोग उसके खिलाफ गवाही देने से कतराते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदतन अपराधी साबित करने के लिए केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत कार्रवाई के लिए यह दिखाना जरूरी है कि व्यक्ति लगातार अपराधों में लिप्त रहा हो। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने अपने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक या दो मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति आदतन अपराधी है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि घटनाओं के बीच लंबा अंतर हो तो आदतन होने का तत्व और भी कमजोर हो जाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को केवल दो मामलों के आधार पर गुंडा घोषित करना उचित नहीं है। इसलिए उसके खिलाफ की गई पूरी कार्यवाही को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया गया।।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177155/no-one-can-be-called-a-goon-with-just-two</link>
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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:24:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जस्टिस शेखर यादव कल होंगे रिटायर, महाभियोग प्रस्ताव होगा खत्म</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल) को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से लंबित है। उनके रिटायर होने पर अब महाभियोग का प्रस्ताव निरर्थक (बेकार) हो जाएगा। जस्टिस यादव ने 12 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 26 मार्च 2021 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।<br /><br /><strong>आपत्तिजनक शब्दों की खूब आलोचना हुई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के विधिक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में "समान नागरिक संहिता की संवैधानिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176202/justice-shekhar-yadav-will-retire-tomorrow-impeachment-motion-will-end"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001715990.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल) को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से लंबित है। उनके रिटायर होने पर अब महाभियोग का प्रस्ताव निरर्थक (बेकार) हो जाएगा। जस्टिस यादव ने 12 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 26 मार्च 2021 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।<br /><br /><strong>आपत्तिजनक शब्दों की खूब आलोचना हुई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के विधिक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में "समान नागरिक संहिता की संवैधानिक आवश्यकता" विषय पर व्याख्यान देते हुए जस्टिस यादव ने कहा था कि देश बहुसंख्यक समाज की इच्छाओं के अनुसार चलेगा। इस दौरान उन्होंने एक आपत्तिजनक शब्द का भी प्रयोग किया, जिसकी व्यापक आलोचना हुई। इस भाषण पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यादव से स्पष्टीकरण मांगा था। यही नहीं उनसे कहा गया था कि आप खेद प्रकट कर दीजिए, परंतु उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया था और कहा था कि उन्होंने ऐसा कुछ भी गलत नहीं बोला है।<br /><br /><strong>13 दिसंबर को महाभियोग प्रस्ताव</strong><br />इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा के महासचिव को सौंपा गया, जिस पर 55 सांसदों के हस्ताक्षर थे, जो आवश्यक 50 सांसदों की संख्या से अधिक है। हालांकि यह महाभियोग प्रस्ताव अभी भी राज्यसभा में लंबित है, लेकिन इससे पहले ही जस्टिस यादव सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके रिटायरमेंट के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में फुल कोर्ट रेफरेंस आयोजित गया है। फुल कोर्ट रेफरेंस बुधवार को चीफ जस्टिस की कोर्ट में अपराह्न 3.45 पर रखा गया है।  इसमें हाईकोर्ट के सभी जजों के अलावा बार एसोसिएशन के अधिवक्ता सदस्य तथा हाईकोर्ट रजिस्ट्री के अधिकारी शामिल होंगे। हाईकोर्ट की तरफ से सभी को शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176202/justice-shekhar-yadav-will-retire-tomorrow-impeachment-motion-will-end</link>
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                <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 21:02:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175787/allahabad-high-court-reprimands-the-man-who-falsely-accused-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। बेंच ने कहा कि अपनी ही पत्नी और बेटी के खिलाफ उसके दावे "पूरी तरह से झूठे" हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता "खुद को दूसरों से ज़्यादा पवित्र समझने की मानसिकता" (Holier-Than-Thou Syndrome) से ग्रस्त है और खुद को "समाज की सभी अनैतिकताओं के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा" समझता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका असल में पारिवारिक विवाद से जुड़ी थी। अपने ही परिवार पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाना पारिवारिक मामले को कोर्ट के सामने रखने का "सबसे घिनौना" तरीका है। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता द्वारा डिजिटल फॉर्मेट में दी गई कई वीडियो फाइलों और स्क्रीनशॉट की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए पुलिस ने उन्हें IIT कानपुर के C3iHub को सौंप दिया। हालांकि, IIT कानपुर की रिपोर्ट से पता चला कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई तस्वीरों और बरामद वीडियो में दिख रहे चेहरों में कोई मेल नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">फोरेंसिक जांच से यह भी पता चला कि बरामद मीडिया फाइलें लगभग 10-12 साल पुरानी थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि "उपलब्ध डिजिटल सबूत इस निष्कर्ष का समर्थन करते हैं कि पहचान गलत या भ्रामक तरीके से जोड़ी गई।"इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए बेंच ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की: "IIT कानपुर की उपरोक्त रिपोर्ट से हमें यह मानने का आधार मिलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने परिवार पर सेक्स रैकेट आदि में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप लगाए हैं, जिन्हें वेबसाइटों पर दिखाया गया, वे पूरी तरह से झूठे हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता लगातार अपने ही अहंकार में डूबा हुआ है। उसके परिवार पर सेक्स रैकेट में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप उसने लगाए, वे बेहद आपत्तिजनक हैं—जिनमें से कुछ तो रिकॉर्ड से हटाए जाने योग्य हैं अतः, इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि इन खोखले आरोपों के आधार पर पुलिस को किसी भी प्रकार के सेक्स रैकेट की जाँच करने का निर्देश जारी करने का कोई आधार नहीं है, याचिका खारिज कर दी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:38:30 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बुजुर्ग महिला हत्याकांड में दो दोषियों को उम्रकैद</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> जनपद में वर्ष 2021 में हुए सनसनीखेज बुजुर्ग महिला हत्याकांड में अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश रजनीश कुमार मिश्रा की अदालत ने दोषी धीरज गुप्ता और रिंकू जायसवाल उर्फ कचौड़ी को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में उम्रकैद के साथ दंडित किया।यह मामला अगस्त 2021 का है, जब 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला को लालच का शिकार बनाया गया। आरोपियों ने पहले महिला का विश्वास जीता और फिर करीब 4.5 लाख रुपये व गहनों की ठगी की। इसके बाद अपने अपराध को छिपाने के लिए</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175532/life-imprisonment-to-two-culprits-in-the-murder-of-an"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260408-wa0101.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> जनपद में वर्ष 2021 में हुए सनसनीखेज बुजुर्ग महिला हत्याकांड में अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश रजनीश कुमार मिश्रा की अदालत ने दोषी धीरज गुप्ता और रिंकू जायसवाल उर्फ कचौड़ी को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में उम्रकैद के साथ दंडित किया।यह मामला अगस्त 2021 का है, जब 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला को लालच का शिकार बनाया गया। आरोपियों ने पहले महिला का विश्वास जीता और फिर करीब 4.5 लाख रुपये व गहनों की ठगी की। इसके बाद अपने अपराध को छिपाने के लिए महिला की हत्या कर दी गई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हत्या के बाद आरोपियों ने शव को सोरांव क्षेत्र में जमीन में दफनाकर सबूत मिटाने का प्रयास किया, ताकि घटना का कोई सुराग न मिल सके। हालांकि, पुलिस की सतर्कता और तकनीकी जांच ने पूरे मामले का खुलासा कर दिया।जांच के दौरान पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और लोकेशन ट्रैकिंग के आधार पर संदिग्धों तक पहुंच बनाई। कड़ी पूछताछ में दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया, जिसके बाद उनकी निशानदेही पर महिला का शव बरामद किया गया। अभियोजन पक्ष ने अदालत में मजबूत साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए, जिसके आधार पर न्यायालय ने दोनों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 19:27:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं तय होगा मालिकाना हक: इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करना नहीं है। ऐसे विवादों का समाधान केवल सिविल कोर्ट में ही किया जा सकता है। जस्टिस जे.जे. मुनीर ने यह फैसला सुनाते हुए नायब तहसीलदार के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें 34 साल बाद दायर नामांतरण निरस्तीकरण की अर्जी को खारिज कर दिया गया। अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच का विवाद जटिल मालिकाना हक से जुड़ा है, जिसे म्यूटेशन अधिकारी तय नहीं कर सकते।”</p><p style="text-align:justify;">मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि विवादित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175323/ownership-rights-will-not-be-decided-in-mutation-proceedings-clear"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/whatsapp-image-2025-12-27-at-114044-pm_1774421573.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करना नहीं है। ऐसे विवादों का समाधान केवल सिविल कोर्ट में ही किया जा सकता है। जस्टिस जे.जे. मुनीर ने यह फैसला सुनाते हुए नायब तहसीलदार के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें 34 साल बाद दायर नामांतरण निरस्तीकरण की अर्जी को खारिज कर दिया गया। अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच का विवाद जटिल मालिकाना हक से जुड़ा है, जिसे म्यूटेशन अधिकारी तय नहीं कर सकते।”</p><p style="text-align:justify;">मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि विवादित भूमि उसके पूर्वजों की भुमिधारी संपत्ति है और वह लगातार कब्जे में रहा है। उसने यह भी कहा कि वर्ष 1970 में प्रतिवादी का नाम धोखाधड़ी और गलत तथ्यों के आधार पर दर्ज कर दिया गया हालांकि, अदालत ने पाया कि उस समय प्रतिवादी भी जमीन पर कब्जे में था और पारिवारिक नामों में समानता के कारण म्यूटेशन के दौरान भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई होगी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में उत्तराधिकार से जुड़े जटिल प्रश्न शामिल हैं, जिन्हें म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं सुलझाया जा सकता।</p><p style="text-align:justify;">अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में सही उपाय सिविल कोर्ट में वाद दायर कर मालिकाना हक की घोषणा कराना है। अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता द्वारा 1970 के आदेश को चुनौती देने में अत्यधिक देरी हुई, जिससे उसकी अर्जी समय-सीमा के कारण भी स्वीकार नहीं की जा सकती।हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करता है तो नायब तहसीलदार की टिप्पणियां उस पर बाध्यकारी नहीं होंगी और अदालत स्वतंत्र रूप से मामले का निर्णय करेगी। इस प्रकार हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह दोहराया कि म्यूटेशन केवल राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया है, न कि संपत्ति के अधिकार तय करने का मंच।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 20:11:33 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस से पूछा: एफआईआर  में केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे 'माननीय' या 'श्री' क्यों नहीं लिखा?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा है कि पुलिस ने अपनी दर्ज की गई एक एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) में एक केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे 'माननीय' या 'श्री' क्यों नहीं लिखा [हर्षित शर्मा और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य]। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ  ने राज्य के गृह सचिव से इस मामले में सम्मानजनक उपाधि (honorific) के न लिखे जाने का कारण बताने को कहा।कोर्ट ने कहा कि पुलिस को यह उपाधि जोड़नी चाहिए थी, भले ही शिकायतकर्ता ने इसका ज़िक्र</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175056/allahabad-high-court-asks-up-police-why-honorable-or-shri"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/download.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा है कि पुलिस ने अपनी दर्ज की गई एक एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) में एक केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे 'माननीय' या 'श्री' क्यों नहीं लिखा [हर्षित शर्मा और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य]। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ  ने राज्य के गृह सचिव से इस मामले में सम्मानजनक उपाधि (honorific) के न लिखे जाने का कारण बताने को कहा।कोर्ट ने कहा कि पुलिस को यह उपाधि जोड़नी चाहिए थी, भले ही शिकायतकर्ता ने इसका ज़िक्र न किया हो।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ के अपर मुख्य सचिव (गृह) अपने हलफनामे में यह स्पष्ट करें कि FIR में जिस माननीय केंद्रीय मंत्री का नाम आया है, उनके नाम के आगे सामान्य सम्मानजनक उपाधि 'माननीय' क्यों नहीं लिखी गई, और एक जगह तो उनका ज़िक्र सिर्फ़ उनके नाम से किया गया है, बिना 'श्री' लगाए। भले ही लिखित रिपोर्ट में शिकायतकर्ता ने माननीय मंत्री का ज़िक्र सही तरीके से न किया हो, लेकिन 'चेक FIR' लिखते समय पुलिस का यह फ़र्ज़ था कि वह प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सम्मानजनक उपाधि जोड़ती, भले ही कोष्ठक (brackets) में ही सही।"</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी; इस एफआईआर में आपराधिक धमकी और आपराधिक विश्वासघात के आरोप लगाए गए थे। आरोप है कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता से नौकरी दिलाने के बहाने 80 लाख रुपये लिए थे। पुलिस शिकायत के अनुसार, बाद में उन्होंने वह रकम वापस नहीं की और उसे जान से मारने की धमकी भी दी।इस मामले में केंद्रीय मंत्री आरोपी नहीं हैं, लेकिन FIR में उनका नाम आया है।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट इस एफआईआर को रद्द करने वाली याचिका पर 6 अप्रैल को सुनवाई करेगा। 30 मार्च को, कोर्ट ने सरकारी वकील से आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों के संबंध में कुछ निर्देश लेने को कहा था। दिलचस्प बात यह है कि एक अन्य मामले में, हाई कोर्ट ने हाल ही में यूपी  पुलिस से यह सवाल किया था कि उसने ट्रायल कोर्ट  को "निचली अदालत" (the court below) क्यों कहा।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट के आदेश के जवाब में दायर एक हलफनामे में, कुशीनगर के पुलिस अधीक्षक ने निम्नलिखित बातें लिखी थीं:"जिस पर निचली अदालत ने 03.01.2026 को अपराध का संज्ञान लिया।" न्यायमूर्ति हरवीर सिंह ने अब पुलिस अधिकारी को अपने शब्दों के चयन के बारे में स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।इस मामले पर 10 अप्रैल को विचार किया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 21:20:59 +0530</pubDate>
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                <title>बंगाल एसआईआर: जाँच के बाद डॉक्टर से पुलिसकर्मी तक के नाम गायब</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174642/names-of-doctors-to-policemen-missing-after-bengal-sir-investigation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1754143774943_bihar_sir_draft_voter_list.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को मौक़ा मिल रहा है? यदि अब तक ट्रिब्यूनल ही नहीं बना है तो क्या लाखों लोग मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाएँगे?</p>
<p style="text-align:justify;">ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि राज्य में अंडर एडजुडिकेशन रहे मतदाताओं के बड़े पैमाने पर नाम कटने के मामले सामने आए हैं। राज्य में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के अधीन थे। 705 न्यायिक अधिकारियों की टीम ने अब तक 37 लाख मामलों का फ़ैसला कर लिया है। दो सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने यह साफ़ नहीं किया है कि अब तक कितने नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तक पूरे राज्य में 15 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। राज्य में सबसे ज़्यादा मुर्शिदाबाद में 11 लाख और मालदा में 8.28 लाख मामले जांच के अधीन थे।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 19 ट्रिब्यूनल बनने थे, जो 23 जिलों को कवर करेंगे, लेकिन अभी तक पूरी तरह सेटअप नहीं हुए। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि समय बहुत कम बचा है। नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक है, ऐसे में लाखों सच्चे वोटर चुनाव से बाहर हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कई गांवों में लोग चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, जब तक इन मामलों की सुनवाई न हो। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाने के लिए है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग दावा कर रहे हैं कि दस्तावेज देने के बावजूद उनका नाम बिना वजह काटा गया। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले काफी गर्माया हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:11:05 +0530</pubDate>
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                <title>बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174640/there-is-no-legal-obligation-on-the-daughter-in-law-to-maintain"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कोई नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न लगे, किसी कानूनी आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।"विधायिका ने अपनी समझदारी से, सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया। दूसरे शब्दों में, विधायिका की यह मंशा नहीं है कि उक्त प्रावधान के तहत बहू पर उसके सास-ससुर के भरण-पोषण का दायित्व डाला जाए।"</p><p style="text-align:justify;">इसके साथ ही पीठ ने एक बुजुर्ग दंपति द्वारा अपनी बहू के खिलाफ दायर की गई एक आपराधिक पुनरीक्षण खारिज की। याचिकाकर्ताओं ने आगरा के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट द्वारा अगस्त, 2025 में पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण की मांग करने वाले उनके आवेदन खारिज कर दिया गया था।</p><p style="text-align:justify;">माता-पिता ने यह दलील दी कि वे वृद्ध, अनपढ़, निर्धन हैं और अपने दिवंगत बेटे के जीवित रहते पूरी तरह से उसी पर निर्भर हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि उनकी बहू, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है, उसकी अपनी पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे दिवंगत बेटे के सभी सेवा और रिटायरमेंट लाभ भी प्राप्त हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि अपनी वृद्ध सास-ससुर के भरण-पोषण के बहू के नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि बहू को पुलिस में नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवंगत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित दलीलें भरण-पोषण की इन संक्षिप्त कार्यवाहियों में विचार के दायरे में नहीं आती हैं। अतः, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता, विकृति या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:07:07 +0530</pubDate>
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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी, जिसके बाद अदालत ने दोनों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174186/relief-to-swami-avimukteshwarananda-from-allahabad-high-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260325-wa0193.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी, जिसके बाद अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए यह निर्णय सुनाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी, हालांकि मामले की जांच जारी रहेगी।यह मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां एक ओर समर्थक इस फैसले को न्यायिक राहत मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पीड़ित पक्ष न्याय की मांग पर कायम है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 20:24:48 +0530</pubDate>
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