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                <title>NEP 2020 - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>NEP 2020 RSS Feed</description>
                
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                <title>एबीवीपी होशियारपुर ने पंजाब की शिक्षा व्यवस्था में सुधारों की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>होशियारपुर-</strong>  अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), होशियारपुर ने पंजाब के राज्यपाल के नाम संबोधित एक ज्ञापन सहायक आयुक्त, होशियारपुर को सौंपा। ज्ञापन में पंजाब की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाते हुए पेपर लीक की लगातार घटनाओं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, स्थायी शिक्षकों की भर्ती, छात्रवृत्तियों के समय पर वितरण, छात्रसंघ चुनावों की बहाली, शैक्षणिक ढांचे के सुदृढ़ीकरण, शोध एवं नवाचार को बढ़ावा, नशामुक्त शैक्षणिक परिसर तथा रोजगारोन्मुख शिक्षा जैसी प्रमुख मांगें रखी गईं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर एबीवीपी पंजाब के प्रदेश सह मंत्री अंकित कुंद्रा ने कहा कि लगातार हो रहे पेपर लीक ने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184333/abvp-hoshiarpur-demands-reforms-in-punjabs-education-system"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1000974385-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>होशियारपुर-</strong> अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), होशियारपुर ने पंजाब के राज्यपाल के नाम संबोधित एक ज्ञापन सहायक आयुक्त, होशियारपुर को सौंपा। ज्ञापन में पंजाब की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाते हुए पेपर लीक की लगातार घटनाओं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, स्थायी शिक्षकों की भर्ती, छात्रवृत्तियों के समय पर वितरण, छात्रसंघ चुनावों की बहाली, शैक्षणिक ढांचे के सुदृढ़ीकरण, शोध एवं नवाचार को बढ़ावा, नशामुक्त शैक्षणिक परिसर तथा रोजगारोन्मुख शिक्षा जैसी प्रमुख मांगें रखी गईं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर एबीवीपी पंजाब के प्रदेश सह मंत्री अंकित कुंद्रा ने कहा कि लगातार हो रहे पेपर लीक ने लाखों मेहनती विद्यार्थियों का विश्वास तोड़ा है और पंजाब की परीक्षा प्रणाली की खामियों को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि सरकार के अनेक दावों के बावजूद विद्यार्थी आज भी असुरक्षित और निराश महसूस कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंकित कुंद्रा ने कहा कि वर्ष 2022 में विजिलेंस ब्यूरो को भेजे गए पेपर लीक के मामले आज भी लंबित हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया कि वर्षों बीत जाने के बावजूद इन मामलों में ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने मांग की कि सभी लंबित मामलों की समयबद्ध जांच पूरी कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने सुरक्षित एवं पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, एनईपी-2020 के पूर्ण तंत्र क्रियान्वयन, स्थायी शिक्षकों की भर्ती, छात्रवृत्तियों के समय पर वितरण, छात्रसंघ चुनावों की बहाली, फीस नियंत्रण, करियर एवं प्लेसमेंट सेल तथा उद्योग-शिक्षा सहयोग को मजबूत करने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद छात्रों के हितों के लिए निरंतर संघर्ष करती रहेगी और शिक्षा व्यवस्था में सार्थक सुधार होने तक अपनी आवाज़ बुलंद करती रहेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर अंकित कुंद्रा (प्रदेश सह मंत्री, एबीवीपी पंजाब), रितेश शर्मा (नगर सह मंत्री, एबीवीपी होशियारपुर) तथा अभिषेक कुमार (इकाई सदस्य, एबीवीपी होशियारपुर) उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 22:25:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>कोचिंग संस्कृति के शिकंजे में शिक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक विकास और राष्ट्रीय निर्माण का सबसे प्रभावशाली साधन माना गया है। प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना रहा है जो विवेकशील, नैतिक, संवेदनशील और समाजोपयोगी हो। शिक्षा व्यक्ति को केवल जीविका कमाने की क्षमता नहीं देती, बल्कि जीवन को समझने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की दृष्टि भी प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से पिछले तीन दशकों में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समानांतर विकसित हुई कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा के इसी मूल उद्देश्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180134/education-in-the-clutches-of-coaching-culture"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/symbolic_image_1544311335.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक विकास और राष्ट्रीय निर्माण का सबसे प्रभावशाली साधन माना गया है। प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना रहा है जो विवेकशील, नैतिक, संवेदनशील और समाजोपयोगी हो। शिक्षा व्यक्ति को केवल जीविका कमाने की क्षमता नहीं देती, बल्कि जीवन को समझने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की दृष्टि भी प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से पिछले तीन दशकों में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समानांतर विकसित हुई कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा के इसी मूल उद्देश्य को गंभीर चुनौती दी है। आज स्थिति यह है कि ज्ञान, जिज्ञासा और बौद्धिक विकास की अपेक्षा परीक्षा, अंक, रैंक और चयन को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। परिणामस्वरूप शिक्षा का व्यापक मानवीय स्वरूप सिकुड़कर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी तक सीमित होता दिखाई दे रहा है।<br /><br />कोचिंग संस्थानों का उदय अचानक नहीं हुआ। यह हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों और समाज की बढ़ती आकांक्षाओं का परिणाम था। उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में सीटों की सीमित संख्या, बढ़ती जनसंख्या, तीव्र प्रतिस्पर्धा तथा बेहतर जीवन की इच्छा ने विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन की ओर आकर्षित किया। प्रारंभिक दौर में कोचिंग संस्थान उन छात्रों के लिए सहायक मंच थे जिन्हें किसी विशेष विषय में अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती थी। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था इतनी विस्तृत और प्रभावशाली हो गई कि उसने विद्यालयों और महाविद्यालयों की भूमिका को ही चुनौती देना शुरू कर दिया।<br /><br />आज देश के अनेक शहरों में कोचिंग उद्योग एक विशाल आर्थिक तंत्र का रूप ले चुका है। राजस्थान का कोटा, उत्तर प्रदेश का प्रयागराज, दिल्ली का मुखर्जी नगर, हैदराबाद, पुणे, पटना और कई अन्य शहर शिक्षा से अधिक कोचिंग के लिए पहचाने जाने लगे हैं। हजारों छात्र अपने घरों से दूर जाकर वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं। उनके दैनिक जीवन का केंद्र विद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि कोचिंग संस्थान बन जाते हैं। यह परिवर्तन केवल संस्थागत बदलाव नहीं है; यह शिक्षा के चरित्र में आए गहरे परिवर्तन का संकेत है।<br /><br />सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना है? यदि नहीं, तो वर्तमान व्यवस्था किस दिशा में जा रही है? आज अधिकांश विद्यार्थी किसी विषय को उसकी बौद्धिक सुंदरता या व्यावहारिक उपयोगिता के कारण नहीं पढ़ते, बल्कि इसलिए पढ़ते हैं क्योंकि वह परीक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। विज्ञान, गणित, इतिहास, साहित्य और समाजशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन जिज्ञासा से अधिक अंकों के लिए किया जाने लगा है। विद्यार्थियों को यह बताया जाता है कि कौन-सा अध्याय महत्वपूर्ण है, कौन-सा प्रश्न बार-बार पूछा जाता है और किस प्रकार न्यूनतम समय में अधिकतम अंक प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करने से हटकर परीक्षा प्रबंधन तक सीमित हो जाता है।<br /><br />यह प्रवृत्ति रचनात्मकता और मौलिक चिंतन के लिए भी चुनौती बन रही है। महान वैज्ञानिक, साहित्यकार, दार्शनिक और नवप्रवर्तक केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करके नहीं बने। उनकी सफलता के पीछे स्वतंत्र चिंतन, प्रयोग करने का साहस और असफलता से सीखने की क्षमता थी। लेकिन वर्तमान कोचिंग-केंद्रित वातावरण में विद्यार्थियों को निर्धारित उत्तरों और निश्चित पद्धतियों के भीतर सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास बाधित हो सकता है। वे समस्या का समाधान खोजने के बजाय पहले से तैयार समाधान याद करने लगते हैं।<br /><br />कोचिंग संस्कृति का एक अन्य गंभीर प्रभाव सामाजिक असमानता के रूप में सामने आया है। गुणवत्तापूर्ण कोचिंग प्राप्त करना आज अत्यंत महंगा हो गया है। प्रतिष्ठित संस्थानों की फीस कई परिवारों की वार्षिक आय के बराबर होती है। इसके अतिरिक्त आवास, भोजन, अध्ययन सामग्री और अन्य खर्च अलग से होते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं, जबकि कमजोर वर्ग के छात्र अनेक बाधाओं का सामना करते हैं। इस प्रकार शिक्षा, जो समान अवसर का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे आर्थिक संसाधनों पर निर्भर होती जा रही है।<br /><br />इस स्थिति का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जब किसी समाज में सफलता की परिभाषा कुछ चुनिंदा परीक्षाओं और संस्थानों तक सीमित हो जाती है, तब लाखों युवाओं पर असामान्य दबाव उत्पन्न होता है। विद्यार्थी कम उम्र में ही यह मानने लगते हैं कि यदि वे किसी विशेष परीक्षा में सफल नहीं हुए तो उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। यह सोच उन्हें निरंतर तनाव, चिंता और भय की स्थिति में रखती है। प्रतिस्पर्धा की यह तीव्रता कई बार मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है।<br /><br />हाल के वर्षों में विद्यार्थियों में तनाव, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी से जुड़ी समस्याओं में वृद्धि देखी गई है। अनेक छात्र अपने परिवार की अपेक्षाओं, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन नहीं बना पाते। जब सफलता ही सम्मान का एकमात्र आधार बन जाए और असफलता को सामाजिक कलंक की तरह देखा जाए, तब मानसिक दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चिंता का विषय है।<br /><br />कोचिंग उद्योग के विस्तार ने शिक्षा के व्यावसायीकरण को भी बढ़ावा दिया है। आज शिक्षा एक बड़े बाजार का रूप लेती दिखाई देती है। आकर्षक विज्ञापन, सफलता की कहानियां, टॉपरों की तस्वीरें, चयन प्रतिशत और रैंकिंग के दावे छात्रों और अभिभावकों को प्रभावित करते हैं। कई बार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट जाता है और विपणन रणनीतियां प्रमुख हो जाती हैं। शिक्षा सेवा से अधिक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत की जाने लगती है। इससे शिक्षा के नैतिक और सामाजिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।<br /><br />प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं और चयन प्रक्रियाओं पर उठते सवालों ने भी इस संकट को और गहरा किया है। जब कोई छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है और फिर परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है, तो उसका विश्वास टूटता है। शिक्षा व्यवस्था का आधार ही विश्वास और पारदर्शिता है। यदि यह आधार कमजोर पड़ जाए तो प्रतिभा, परिश्रम और ईमानदारी का महत्व कम होने लगता है। इससे पूरे समाज में निराशा और असंतोष का वातावरण बन सकता है।<br /><br />हालांकि कोचिंग संस्थानों की भूमिका को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं होगा। अनेक संस्थानों ने गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन, उत्कृष्ट अध्ययन सामग्री और विशेषज्ञ शिक्षकों के माध्यम से छात्रों को लाभ पहुंचाया है। दूरदराज के क्षेत्रों के अनेक विद्यार्थियों को इन्हीं संस्थानों के माध्यम से बेहतर अवसर प्राप्त हुए हैं। कई छात्रों के लिए कोचिंग वास्तव में सफलता का माध्यम बनी है। इसलिए समस्या कोचिंग के अस्तित्व में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की उस निर्भरता में है जहां कोचिंग अनिवार्य प्रतीत होने लगी है।<br /><br />यदि विद्यालयों और महाविद्यालयों की शिक्षा पर्याप्त प्रभावी हो, तो अतिरिक्त कोचिंग की आवश्यकता सीमित रह सकती है। दुर्भाग्य से अनेक विद्यालयों में शिक्षण की गुणवत्ता, संसाधनों की उपलब्धता और शिक्षकों की संख्या जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। कई स्थानों पर छात्रों को मूलभूत अवधारणाएं भी पर्याप्त रूप से नहीं सिखाई जातीं। ऐसी स्थिति में कोचिंग संस्थान उस रिक्त स्थान को भरने का प्रयास करते हैं जिसे औपचारिक शिक्षा व्यवस्था भरने में असफल रही है।<br /><br />समाधान केवल कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण लगाने से नहीं निकलेगा। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं। सबसे पहले विद्यालयी शिक्षा को इतना मजबूत बनाना होगा कि छात्र को बुनियादी ज्ञान और अवधारणाओं के लिए बाहरी सहायता पर निर्भर न रहना पड़े। शिक्षकों के प्रशिक्षण, आधुनिक शिक्षण तकनीकों, डिजिटल संसाधनों और गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम पर विशेष ध्यान देना होगा।<br /><br />साथ ही परीक्षा प्रणाली में भी परिवर्तन आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था अक्सर रटने की क्षमता और सीमित प्रकार के प्रश्नों पर आधारित होती है। यदि परीक्षाएं विश्लेषणात्मक सोच, समस्या समाधान, सृजनात्मकता और व्यावहारिक समझ का मूल्यांकन करें, तो कोचिंग आधारित तैयारी का प्रभाव स्वतः कम हो सकता है। शिक्षा का मूल्यांकन केवल अंक देने की प्रक्रिया नहीं होना चाहिए; उसे छात्र की वास्तविक क्षमता को पहचानने का माध्यम बनना चाहिए।<br /><br />राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी बहुआयामी शिक्षा, कौशल विकास और समग्र मूल्यांकन पर जोर दिया है। यदि इन सिद्धांतों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए तो शिक्षा का स्वरूप अधिक संतुलित और व्यापक बन सकता है। विद्यार्थियों को केवल डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनने की दिशा में नहीं, बल्कि विविध प्रतिभाओं और रुचियों के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए।<br /><br />अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा या भविष्य की चिंता के कारण बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाएं थोप देते हैं। उन्हें यह समझना होगा कि प्रत्येक बच्चे की क्षमता, रुचि और व्यक्तित्व अलग होता है। सफलता का अर्थ केवल किसी प्रतिष्ठित परीक्षा में चयन नहीं है। एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार, लेखक, उद्यमी या सामाजिक कार्यकर्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है जितना किसी अन्य पेशे का व्यक्ति।<br /><br />समाज को भी सफलता की अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। यदि हम केवल अंकों और रैंक के आधार पर व्यक्तियों का मूल्यांकन करेंगे, तो शिक्षा का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ता जाएगा। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहां सीखने, प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और असफलताओं से सीखने को प्रोत्साहन मिले।<br /><br />अंततः कोचिंग संस्कृति का प्रश्न केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह उस समाज की दिशा का प्रश्न है जिसे हम भविष्य में निर्मित करना चाहते हैं। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता रह जाएगा, तो हम कुशल परीक्षार्थी तो तैयार कर सकते हैं, लेकिन विचारशील नागरिक नहीं। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके विश्वविद्यालयों, विद्यालयों और युवाओं की जिज्ञासा में निहित होती है, न कि केवल उसकी परीक्षा प्रणालियों में।<br /><br />आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को फिर से ज्ञान, विवेक, सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों से जोड़ा जाए। कोचिंग संस्कृति की उपयोगिता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उसे शिक्षा का विकल्प नहीं बनने दिया जा सकता। जब विद्यालय सीखने का केंद्र बनेंगे, परीक्षाएं समझ का मूल्यांकन करेंगी और समाज सफलता को व्यापक दृष्टि से देखेगा, तभी शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी। यही वह मार्ग है जो भारत को केवल प्रतिभाशाली युवाओं का नहीं, बल्कि विचारशील, नवाचारी और संवेदनशील नागरिकों का राष्ट्र बना सकता है।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:26:23 +0530</pubDate>
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                <title>नवारंभ उत्सव के साथ बाल वाटिका नामांकन अभियान की शुरुआत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज। </strong>राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुपालन में तथा राज्य परियोजना निदेशक समग्र शिक्षा उत्तर प्रदेश के निर्देशों के क्रम में, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रयागराज के मार्गदर्शन में शैक्षिक सत्र 2026-27 हेतु 3-4 वर्ष के बच्चों का बाल वाटिका में नामांकन एवं 6 वर्ष पूर्ण कर चुके बच्चों का कक्षा 1 में प्रवेश सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिनांक 25 मार्च 2026 को प्राथमिक विद्यालय महेवा विद्यापीठ, विकासखंड चाका में “नवारंभ उत्सव” का भव्य आयोजन किया गया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी चाका, कैलाश सिंह एवं विशिष्ट अतिथि एआरपी  आरती केसरी द्वारा मां सरस्वती</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174177/bal-vatika-nomination-campaign-started-with-navarambha-utsav"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260325-wa0217.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज। </strong>राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुपालन में तथा राज्य परियोजना निदेशक समग्र शिक्षा उत्तर प्रदेश के निर्देशों के क्रम में, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रयागराज के मार्गदर्शन में शैक्षिक सत्र 2026-27 हेतु 3-4 वर्ष के बच्चों का बाल वाटिका में नामांकन एवं 6 वर्ष पूर्ण कर चुके बच्चों का कक्षा 1 में प्रवेश सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिनांक 25 मार्च 2026 को प्राथमिक विद्यालय महेवा विद्यापीठ, विकासखंड चाका में “नवारंभ उत्सव” का भव्य आयोजन किया गया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी चाका, कैलाश सिंह एवं विशिष्ट अतिथि एआरपी  आरती केसरी द्वारा मां सरस्वती के पूजन के साथ किया गया। इस अवसर पर बाल वाटिका में नामांकित बच्चों का रोली, चंदन एवं फूलमालाओं से स्वागत किया गया तथा रेत पर लेखन गतिविधि के माध्यम से उनका अनौपचारिक प्रवेश कराया गया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान बच्चों द्वारा आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं, जिससे उपस्थित अभिभावक एवं अतिथि भावविभोर हो उठे। सभी बच्चों को अतिथियों द्वारा स्टेशनरी किट प्रदान कर प्रोत्साहित किया गया।कार्यक्रम का संचालन प्रधानाध्यापिका श्रीमती निधि जैन द्वारा किया गया। उन्होंने सभी अतिथियों एवं अभिभावकों का स्वागत करते हुए अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया।विद्यालय के समस्त शिक्षकगण, आंगनबाड़ी कार्यकत्री, ईसीसीई एजुकेटर, डीएलएड प्रशिक्षु एवं अभिभावकों के सक्रिय सहयोग से कार्यक्रम उत्साहपूर्ण वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 20:13:22 +0530</pubDate>
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