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                <title>प्रेरणादायक लेख - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>प्रेरणादायक लेख RSS Feed</description>
                
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                <title>दुनिया की नजरों में मुस्कुराती, भीतर पिता से ताकत लेती बेटी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर शुरू होता है—जहाँ निर्णयों की भीड़ में आत्मविश्वास मौन हो जाता है और रिश्तों की अपेक्षाएँ मन पर दबाव बनकर धीरे-धीरे कसने लगती हैं। विवाह के बाद स्त्री-जीवन में यह भार और गहरा हो जाता है—कभी शब्दों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मौन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी जिम्मेदारियों के नाम पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी “समझदारी” की कठोर परिभाषाओं में। बाहर से सब सामान्य लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भीतर हर दिन एक नई परीक्षा जैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका प्रश्नपत्र बदलता रहता है और उत्तर पहले से तय मान लिए जाते</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181465/smiling-daughter-in-the-eyes-of-the-world-taking-strength"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर शुरू होता है—जहाँ निर्णयों की भीड़ में आत्मविश्वास मौन हो जाता है और रिश्तों की अपेक्षाएँ मन पर दबाव बनकर धीरे-धीरे कसने लगती हैं। विवाह के बाद स्त्री-जीवन में यह भार और गहरा हो जाता है—कभी शब्दों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मौन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी जिम्मेदारियों के नाम पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी “समझदारी” की कठोर परिभाषाओं में। बाहर से सब सामान्य लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भीतर हर दिन एक नई परीक्षा जैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका प्रश्नपत्र बदलता रहता है और उत्तर पहले से तय मान लिए जाते हैं। ऐसे में अपनी इच्छाओं और दूसरों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना भी एक निरंतर संघर्ष बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिता का अदृश्य सहारा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे समय में सबसे बड़ा सहारा कोई सामने खड़ा व्यक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर बसा वह अदृश्य संस्कार होता है जो पिता ने बिना औपचारिक उपदेश के अपने आचरण से दिया होता है। उनके शब्द जीवन गढ़ने वाले सूत्र थे—“धैर्य रखो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब अच्छा होगा</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मन की राह पर अडिग रहो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म ही पहचान है</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">सहनशीलता को ताकत बनाओ</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर पर विश्वास रखो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ों का सम्मान और छोटों से स्नेह रखो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य और ईमानदारी थामे रहो</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">और “कठिन समय में हिम्मत मत छोड़ो।” विवाह के बाद जब जीवन जिम्मेदारियों और संघर्षों से भरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यही सूत्र भीतर से उठकर व्यक्ति को स्थिर रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही निर्णय की शक्ति देते हैं और कठिन मोड़ों पर टूटने से बचाकर आगे बढ़ने का साहस देते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान का कवच</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाह के बाद स्त्री के सामने सबसे बड़ा संघर्ष केवल बदलती परिस्थितियों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी पहचान को बनाए रखने का होता है—अनेक भूमिकाओं और अपेक्षाओं के बीच स्वयं को पीछे छूटने से बचाने का। ऐसे समय में पिता की शिक्षा एक अदृश्य कवच बनकर साथ रहती है। जब निर्णय भावनाओं में उलझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी सिखाई तर्कशीलता मार्ग दिखाती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जब रिश्ता दबाव बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनके संस्कारों से उपजा आत्मसम्मान दृढ़ करता है। यह कोई बाहरी सहारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का अनुशासन और चेतना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में संतुलन की सीख</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थ जीवन की सबसे कठिन परीक्षा संघर्ष नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संतुलन है—सपनों और जिम्मेदारियों के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौन और अभिव्यक्ति के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य और प्रतिरोध के बीच। ऐसे में पिता की सीख केवल मार्गदर्शन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का संतुलन बन जाती है। उन्होंने सिखाया कि झुकना कमजोरी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर टूटना स्वीकार्य नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">समझौता जीवन का हिस्सा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आत्मसम्मान कभी समझौते की वस्तु नहीं बन सकता। यही दृष्टि विवाह में स्त्री को केवल रिश्ते निभाने वाली नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयं को अक्षुण्ण रखने वाली शक्ति देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौन में पिता की स्मृति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कई बार जीवन ऐसे मोड़ पर आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ रिश्तों में शब्द बोझ बन जाते हैं और मौन और भारी हो जाता है। ऐसे क्षणों में पिता की स्मृति सहारे की तरह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर गूँजती शांत चेतना की तरह होती है—जो याद दिलाती है कि हर प्रतिक्रिया आवश्यक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर निर्णय विवेकपूर्ण होना चाहिए। तब वह बेटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब पत्नी बन चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने भीतर उस परिचित स्वर को फिर सुनती है—“सब कुछ बचाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सबसे पहले स्वयं को मत खोना।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरता का जीवन-सूत्र</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब सामाजिक अपेक्षाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक दायित्व और व्यक्तिगत आकांक्षाएँ एक साथ सामने खड़ी हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जीवन मानो तीन दिशाओं में खिंचते हुए संघर्ष का रूप ले लेता है। ऐसे समय में पिता की शिक्षा सबसे गहरी भूमिका निभाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह केवल भावनाओं को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विचारों को भी स्थिरता प्रदान करती है। पिता ने यह नहीं सिखाया होता कि कठिनाइयों में टूट पड़ना या हार मान लेना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह कि कठिनाइयों के बीच भी स्वयं को समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहचानना और अपने भीतर की आवाज़ को सुनना कभी नहीं छोड़ना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाओं की पूर्व-तैयारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ यह गहराई से समझ आने लगता है कि पिता केवल एक व्यक्ति नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे जीवन की हर अनदेखी परीक्षा के लिए की गई एक तैयारी थे। विवाह के बाद जब परिस्थितियाँ नए प्रश्न और नई चुनौतियाँ सामने रखती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी सीखें किसी पुस्तक के पन्नों की तरह नहीं खुलतीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर की चेतना बनकर सक्रिय हो उठती हैं। हर कठिन निर्णय के क्षण में उनका कोई वाक्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई दृष्टिकोण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई मूल्य या फिर उनका मौन ही अदृश्य शक्ति बनकर साथ खड़ा दिखाई देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुपस्थिति में उपस्थिति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे यह बोध और गहरा होता जाता है कि पिता भले ही इस दुनिया में नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनकी सबसे सशक्त उपस्थिति उनकी अनुपस्थिति में ही जीवित है। वे अब केवल एक आवाज़ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विवेक बन चुके हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अब सलाह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि निर्णयों की स्पष्टता हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अब साथ चलने वाले व्यक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का आत्मबल हैं। विवाह के संघर्षों में जब परिस्थितियाँ और लोग समझौतों की सीमाएँ बढ़ाने लगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पिता की सीख भीतर एक अंतिम मर्यादा-रेखा खींच देती है—जिसके आगे आत्मसम्मान कभी मौन नहीं रहता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ यह स्पष्ट हो जाता है कि पिता केवल एक संबंध नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जीवन की अदृश्य रीढ़ थे। उनके बिना भी जीवन आगे बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनके संस्कार हर कठिन मोड़ पर संभाल लेते हैं और गिरने नहीं देते। चाहे संघर्ष कितने भी जटिल हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता की सीख यही दृढ़ता देती है— टूट जाना कोई विकल्प नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और स्वयं को खो देना किसी भी समस्या का समाधान नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही उनकी सबसे गहरी विरासत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आँसुओं में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साहस और आत्मबल बनकर जीवनभर साथ रहती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:59:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आत्मनिर्भरता स्वाभिमानी राष्ट्र का प्रतीक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता ही मनुष्य को स्वाधीन बनाने की प्रेरणा देती है। आत्मनिर्भरता की स्थिति में व्यक्ति अपनी इच्छाओं अपनी सुविधा अनुसार पूरा कर सकता है, इसके लिए दूसरों की तरफ मुंह ताकने की जरूरत नहीं पड़ती है। आत्मनिर्भरता केवल मनुष्य के लिए व्यक्तिगत रूप से ही जरूरी नहीं है, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अति आवश्यक है ।एक स्वतंत्र राष्ट्र अपनी जनता को अपनी क्षमता के अनुसार सारी सुविधाएं तथा अन्य जीवन उपयोगी साधन उपलब्ध करा सकता है। भारत स्वतंत्रता के बाद हरित क्रांति सातवें दशक के प्रारंभ के बाद ही खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सका, इसके</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181459/self-reliance-is-a-symbol-of-a-self-respecting-nation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता ही मनुष्य को स्वाधीन बनाने की प्रेरणा देती है। आत्मनिर्भरता की स्थिति में व्यक्ति अपनी इच्छाओं अपनी सुविधा अनुसार पूरा कर सकता है, इसके लिए दूसरों की तरफ मुंह ताकने की जरूरत नहीं पड़ती है। आत्मनिर्भरता केवल मनुष्य के लिए व्यक्तिगत रूप से ही जरूरी नहीं है, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अति आवश्यक है ।एक स्वतंत्र राष्ट्र अपनी जनता को अपनी क्षमता के अनुसार सारी सुविधाएं तथा अन्य जीवन उपयोगी साधन उपलब्ध करा सकता है। भारत स्वतंत्रता के बाद हरित क्रांति सातवें दशक के प्रारंभ के बाद ही खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सका, इसके साथ ही भारत में खुशहाली की स्वाभाविक तौर पर वृद्धि हुई, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी कहा था कि "एक राष्ट्र की शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में है दूसरों से उधार लेकर काम चलाने में नहीं",पाकिस्तान की स्थिति बिल्कुल ऐसी ही है वह अभी तक स्वतंत्रता के बाद से 75 वर्ष के बाद भी संपूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, वह कर्जे से डूब गया है और अपने देश में खर्चा चलाने के लिए पूरी दुनिया से उधार मांगते हुए घूम रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान आत्मनिर्भर नहीं होने का एवं उधार की जिंदगी जीने का एक बहुत बड़ा उदाहरण है। जबकि भारत देश विज्ञान, टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस,इंजीनियरिंग और कृषि सेवा, खनिज,स्पेस रिसर्च में पूर्णता आत्मनिर्भर होकर विकसित देशों के बराबर खड़ा हुआ है। यह देशवासियों और देश के लिए अत्यंत गौरव का विषय है। आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन किसी भी देश की प्रगति विकास तथा और उसके नागरिकों की जिंदगी की जिजीविषा है जिससे वह संघर्ष कर आगे बढ़ता है। इतिहास गवाह है कि किसी भी महान लेखक को महान बनने तक निरंतर मेहनत कर किताबें लिखने का का श्रम करना पड़ा एवं आत्मनिर्भरता की स्थिति में विचार कर अपने विचारों को लिपिबद्ध करना पड़ा तब जाकर वह महानता की श्रेणी को प्राप्त कर सका। इसी तरह कोई छात्र अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसे स्वयं परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा एवं परीक्षा में मनोवांछित सफलता प्राप्त कर उसे स्वयं अध्ययन करना होगा। इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में भी मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर मेहनत कर दीक्षित सफलता प्राप्त करनी पड़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारा देश भारत भी आजादी के बाद से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रेषित हुआ आज स्थिति यह है कि वह विश्व में विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है। तमाम महापुरुषों के जीवन से भी हमें आत्मनिर्भरता तथा स्वावलंबन की शिक्षा मिलती रहती है।महात्मा गांधी अपना कार्य स्वयं किया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी "दैव दैव आलसी" पुकारा है, तब जाकर उनकी जिंदगी पटरी पर आई और हमें परिश्रम कर आत्म निर्भर होने की शिक्षा प्रदान की थी। दूसरों पर निर्भरता हमें दूसरों का अनुसरण करने के लिए मजबूर करती है। दूसरों पर निर्भर होने से हमें के अनुरूप ही जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। पराधीनता हमारा आत्मविश्वास सृजनशीलता सोचने की शक्ति को नष्ट कर देती है। गुलामी एक अभिशाप होती है, आत्मनिर्भरता की कमी हमें किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरों की कृपा पर जीने वाला व्यक्ति जीवन के अक्षय आनंद से वंचित रहता है। खुद के परिश्रम श्रम से आगे बढ़ने वाला देश या व्यक्ति या समाज सदैव प्रफुल्लित आत्म विश्वासी तथा विकास की ओर सदैव अग्रसर रहता है। हमें सदैव अपने अंदर के आत्मविश्वास, छिपी हुई क्षमताओं मनोबल का सहारा लेकर आत्मनिर्भर या स्वावलंबी बनने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को मनुष्य होने का अधिकार प्राप्त होता है। पराधीन देश सामान्य व्यक्ति सदैव पशु तुल्य होते हैं। जिनका अपना कोई विचार या व्यक्तित्व नहीं हो सकता है। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता - राम सहायक उनके होते, जो होते हैं, आप सहायक, हम सबको स्वयं पर भरोसा रखना आत्मबल बढ़ाने तथा आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा देती रहती हैं।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:45:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>छोटे-छोटे निरंतर प्रयासों से खुलते बड़े सफलता के द्वार।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">  मानव जीवन संघर्ष, परिश्रम, धैर्य और निरंतर प्रयासों की एक लंबी कहानी है। संसार में जितने भी महान व्यक्ति हुए  उनकी सफलता किसी एक दिन की चमत्कारी घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों तक किए गए छोटे-छोटे सतत प्रयासों का बड़ा परिणाम थी। सफलता का कोई सुगम और सरल नहीं होता। वह धीरे-धीरे तपकर, गिरकर, संभलकर और निरंतर आगे बढ़ने से प्राप्त होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस प्रकार छोटी-छोटी बूंदें मिलकर विशाल सागर का निर्माण करती हैं, उसी प्रकार मनुष्य के छोटे-छोटे प्रयास जीवन में बड़ी उपलब्धियों का आधार बनते हैं। किसी शायर ने कहा है</p>
<p style="text-align:justify;"><br />"पानी की छोटी बूंदों ने बढ़कर समंदर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178860/small-continuous-efforts-open-doors-to-big-success"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/47.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"> मानव जीवन संघर्ष, परिश्रम, धैर्य और निरंतर प्रयासों की एक लंबी कहानी है। संसार में जितने भी महान व्यक्ति हुए  उनकी सफलता किसी एक दिन की चमत्कारी घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों तक किए गए छोटे-छोटे सतत प्रयासों का बड़ा परिणाम थी। सफलता का कोई सुगम और सरल नहीं होता। वह धीरे-धीरे तपकर, गिरकर, संभलकर और निरंतर आगे बढ़ने से प्राप्त होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस प्रकार छोटी-छोटी बूंदें मिलकर विशाल सागर का निर्माण करती हैं, उसी प्रकार मनुष्य के छोटे-छोटे प्रयास जीवन में बड़ी उपलब्धियों का आधार बनते हैं। किसी शायर ने कहा है</p>
<p style="text-align:justify;"><br />"पानी की छोटी बूंदों ने बढ़कर समंदर बना दिया,<br />छोटे-छोटे प्रयासों ने आदमी का मुकद्दर बना दिया।"</p>
<p style="text-align:justify;"><br />आज का समय त्वरित परिणामों का समय माना जाता है। लोग चाहते हैं कि उन्हें बिना संघर्ष के तुरंत सफलता मिल जाए। किंतु प्रकृति का नियम है कि हर बड़ी उपलब्धि के पीछे लंबे समय तक किया गया श्रम और अनुशासन छिपा होता है। किसान बीज बोने के बाद प्रतिदिन उसकी देखभाल करता है। वह जानता है कि फसल एक दिन में नहीं उगेगी, परंतु यदि उसका प्रयास निरंतर रहेगा तो एक दिन खेत अवश्य लहलहाएगा। यही नियम मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है।<br />महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन ने बिजली के बल्ब का आविष्कार करने से पहले हजारों बार असफलताएँ झेली थीं। जब उनसे पूछा गया कि वे हजार बार असफल कैसे हुए, तब उन्होंने कहा कि</p>
<p style="text-align:justify;"><br />मैं असफल नहीं हुआ, मैंने केवल हजार ऐसे तरीके खोजे जो काम नहीं करते।<br />यह कथन हमें सिखाता है कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि सफलता की ओर बढ़ने का एक चरण होती है। यदि मनुष्य हर असफलता के बाद पुनः प्रयास करता रहे, तो अंततः सफलता उसके कदम चूमती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />इसी प्रकार महात्मा गांधी ने भी सत्य और अहिंसा के मार्ग पर निरंतर संघर्ष करते हुए भारत को स्वतंत्रता दिलाई। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि दृढ़ संकल्प और सतत प्रयास किसी भी बड़ी शक्ति को झुका सकते हैं। गांधीजी का प्रसिद्ध कथन है</p>
<p style="text-align:justify;"><br />यह कथन केवल राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है। जब कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य के लिए लगातार मेहनत करता है, तो प्रारंभ में लोग उसका उपहास उड़ाते हैं, किंतु अंततः वही व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />          भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जीवन भी छोटे-छोटे प्रयासों की महान कहानी है। साधारण परिवार में जन्म लेने वाले कलाम साहब ने कठिन परिस्थितियों में समाचार पत्र बाँटे, पढ़ाई की और अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया। निरंतर परिश्रम और अनुशासन के बल पर वे “मिसाइल मैन” कहलाए और देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचे। उन्होंने कहा था</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सपना वह नहीं जो आप सोते समय देखते हैं, सपना वह है जो आपको सोने न दे। उनका यह विचार युवाओं को निरंतर प्रयास और लक्ष्य के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। केवल सपना देखने से सफलता नहीं मिलती, बल्कि उसके लिए प्रतिदिन कर्म करना पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />जीवन में सफलता पाने के लिए सबसे आवश्यक है एक स्पष्ट लक्ष्य। बिना लक्ष्य के प्रयास दिशाहीन हो जाते हैं। जिस प्रकार नाविक बिना दिशा के समुद्र में भटक जाता है, उसी प्रकार लक्ष्यहीन मनुष्य भी अपने जीवन की ऊर्जा व्यर्थ कर देता है। यदि मनुष्य एक निश्चित लक्ष्य तय कर ले और उस दिशा में प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कार्य करता रहे, तो धीरे-धीरे सफलता उसके निकट आने लगती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />इतिहास गवाह है कि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को आत्मविश्वास और निरंतर कर्म का संदेश दिया था। उनका प्रसिद्ध वाक्य—<br />“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”</p>
<p style="text-align:justify;"><br />यह केवल प्रेरणादायक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का मूल मंत्र है। मनुष्य को कठिनाइयों, आलोचनाओं और असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए। निरंतर आगे बढ़ते रहना ही सफलता का मार्ग है।<br />        प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है। नदी पर्वतों से टकराकर रुकती नहीं, बल्कि अपना मार्ग स्वयं बना लेती है। चींटी बार-बार गिरने के बाद भी दीवार पर चढ़ने का प्रयास करती रहती है। सूर्य प्रतिदिन उगता है और अंधकार को दूर करता है। संसार का प्रत्येक जीव अपने सतत कर्म से जीवन का संतुलन बनाए रखता है। मनुष्य यदि प्रकृति से यह सीख ले ले कि निरंतरता ही सफलता का रहस्य है, तो उसका जीवन बदल सकता है।<br />            आज अनेक विद्यार्थी, युवा और कर्मचारी थोड़ी असफलता मिलते ही निराश हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि शायद सफलता उनके भाग्य में नहीं है। जबकि सत्य यह है कि सफलता भाग्य से अधिक परिश्रम और निरंतरता पर निर्भर करती है। भाग्य अवसर दे सकता है, किंतु उस अवसर को उपलब्धि में बदलने का कार्य केवल परिश्रम करता है।नेल्सन मंडेला ने 27 वर्षों तक जेल में रहने के बाद भी अपने संघर्ष को नहीं छोड़ा। अंततः वही व्यक्ति दक्षिण अफ्रीका का राष्ट्रपति बना और विश्वभर में मानवाधिकारों का प्रतीक बन गया। उन्होंने कहा था<br />मैं कभी नहीं हारता। या तो जीतता हूँ या सीखता हूँ।<br />यह विचार मनुष्य को हर परिस्थिति में सकारात्मक बने रहने की प्रेरणा देता है।<br />वास्तव में बड़ी सफलता कोई कठिन कार्य नहीं है। आवश्यकता केवल मजबूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट योजना, अनुशासन और निरंतर प्रयास की होती है। यदि मनुष्य प्रतिदिन अपने लक्ष्य की ओर एक छोटा कदम भी बढ़ाता रहे, तो समय के साथ वही कदम उसे महान उपलब्धियों तक पहुँचा देते हैं।<br />अतः यह कहना बिल्कुल उचित है कि छोटे-छोटे निरंतर प्रयास ही बड़ी सफलताओं के द्वार खोलते हैं। सफलता अचानक नहीं आती, बल्कि धीरे-धीरे हमारे प्रयासों की सीढ़ियों पर चढ़कर हमारे जीवन में प्रवेश करती है। इसलिए मनुष्य को कभी निराश नहीं होना चाहिए। कठिनाइयाँ आएँगी, असफलताएँ मिलेंगी, लोग आलोचना करेंगे, किंतु जो व्यक्ति अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है और निरंतर कर्म करता रहता है, वही अंततः इतिहास रचता है। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक,स्तंभकार,रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</p>
<div style="text-align:justify;">कविता,</div>
<div style="text-align:justify;">संजीव-नी।<br /><br />सफलता के इंद्रधनुष।<br /><br />धीरे-धीरे<br />ओस की बूंदों-सी<br />मन के आँगन में उतरती सफलता।<br />वह शोर मचाकर नहीं आती,<br />न ही किसी ऊँचे<br />सिंहासन पर विराज कर<br />अपना परिचय देती ।<br /><br />वो चुपचाप<br />थके हुए हाथों की लकीरों में<br />मुस्कान बनकर खिलती ।<br /><br />नन्हे-नन्हे प्रयासों की<br />सुगंध जब<br />हर सुबह के साथ<br />थोड़ा-थोड़ा आकाश थामने लगती ,<br />तब कहीं जाकर<br />सफलता का इंद्रधनुष<br />जीवन की देहरी पर उतरता है।<br /><br />एक दीपक<br />हर रोज़ थोड़ा-सा दीप्त होता ,<br />तभी तो<br />अंधेरों से भरी रात<br />धीरे-धीरे उजाले में<br />परिणीत होती।<br /><br />कोई नदी भी<br />पहले ही सागर नहीं बनती,<br />पहले<br />पत्थरों से बातें करती हुई,<br />फिर राहों को सहलाती हुई,<br />धीमे-धीमे मचलती आगे बढ़ती।<br /><br />सपनों की मिट्टी में<br />विश्वास के बीज बोने पड़ते ,<br />फिर धैर्य की फुहारें<br />उन्हें सींचती रहती ,<br />तब<br />उम्मीद के फूलों पर<br />सफलता की खुशबू पनपती ।<br /><br />कितना सुंदर लगता<br />जब संघर्ष भी<br />प्रार्थना-सा शांत हो जाए,<br />और मेहनत<br />मां की लोरी सी<br />भली लगने लगे।<br /><br />सफलता<br />एक दिन में नहीं,<br />पर एक दिन<br />ज़रूर मिलती<br />जब मन थककर,<br />रुककर चलना नहीं छोड़ता,<br />जब उम्मीद<br />आख़िरी दीप की तरह<br />धीमे-धीमे जलती रहती ।<br /><br />तब जीवन के नभ पर<br />रंग बिखेरता<br />सफलता का वह इंद्रधनुष,<br />जो संदेश देता<br />छोटे-छोटे कदम ही<br />एक दिन<br />लंबी यात्राओं का<br />उत्सव बन जाते ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 13:58:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संयम का कवच और क्रोध पर विजय का मार्ग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मनुष्य के जीवन में संयम का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला आधार स्तंभ है। यदि व्यक्ति हर परिस्थिति में स्वयं को संयमित रख सकता है, तो वह वास्तव में शिक्षित और परिपक्व कहलाने योग्य है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने मन की उत्तेजनाओं और आवेगों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, उसकी शिक्षा और योग्यता भी व्यर्थ सिद्ध हो जाती है। जीवन में सफलता पाने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं का स्वामी बने और अपनी भावनाओं को संतुलित रखे।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि आत्मसंयम के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175596/the-shield-of-restraint-and-the-path-to-victory-over"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मनुष्य के जीवन में संयम का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला आधार स्तंभ है। यदि व्यक्ति हर परिस्थिति में स्वयं को संयमित रख सकता है, तो वह वास्तव में शिक्षित और परिपक्व कहलाने योग्य है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने मन की उत्तेजनाओं और आवेगों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, उसकी शिक्षा और योग्यता भी व्यर्थ सिद्ध हो जाती है। जीवन में सफलता पाने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं का स्वामी बने और अपनी भावनाओं को संतुलित रखे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि आत्मसंयम के अभाव ने अनेक प्रतिभाशाली व्यक्तियों के जीवन को नष्ट कर दिया। उनकी उच्च आकांक्षाएं, अद्भुत योग्यताएं और उपलब्धियां इसलिए निष्फल हो गईं क्योंकि वे अपने मन को नियंत्रित नहीं कर सके। जब व्यक्ति उत्तेजनाओं के प्रवाह में बह जाता है, तब वह अपने विवेक को खो देता है और वही क्षण उसके पतन का कारण बनता है। अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां लोग क्षणिक क्रोध के कारण ऐसे निर्णय ले लेते हैं, जिनका दुष्परिणाम उन्हें जीवनभर भुगतना पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाज में प्रतिदिन ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं, जहां क्रोध के आवेश में आकर व्यक्ति हिंसक हो जाता है और अपने ही जीवन को संकट में डाल देता है। क्रोध कुछ क्षणों का होता है, लेकिन उसका प्रभाव स्थायी हो सकता है। यह व्यक्ति के चरित्र पर ऐसा दाग छोड़ जाता है, जिसे मिटाना कठिन होता है। क्रोध के प्रभाव में व्यक्ति का विवेक नष्ट हो जाता है, उसके विचारों की दिशा बदल जाती है और वह सही-गलत का भेद भूल जाता है। परिणामस्वरूप उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और वह पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्रोध केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव शारीरिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी पड़ता है। यह एक प्रकार का आत्मदाह है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति की ऊर्जा और शांति को नष्ट करता है। वैज्ञानिक शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि क्रोध व्यक्ति की कार्यक्षमता को कम कर देता है और शरीर में हानिकारक तत्वों का निर्माण करता है। इस प्रकार क्रोध न केवल मानसिक संतुलन को बिगाड़ता है, बल्कि शरीर को भी नुकसान पहुंचाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">व्यक्ति का स्वभाव उसके जीवन को निर्धारित करता है। यदि कोई व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार और समाज पर भी पड़ता है। एक क्रोधी व्यक्ति के कारण परिवार की शांति भंग हो जाती है और संबंधों में तनाव उत्पन्न हो जाता है। लोग ऐसे व्यक्ति से दूरी बनाना पसंद करते हैं, क्योंकि उसका व्यवहार अप्रत्याशित और अस्थिर होता है। इस प्रकार क्रोध व्यक्ति को अकेला कर देता है और उसे सामाजिक रूप से भी कमजोर बना देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संयम का अर्थ केवल क्रोध को दबाना नहीं है, बल्कि अपने मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना है कि वह परिस्थितियों के अनुसार संतुलित प्रतिक्रिया दे सके। जब व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीख लेता है, तब वह हर परिस्थिति में स्थिर और शांत रह सकता है। यह स्थिति उसे जीवन में आगे बढ़ने और सफलता प्राप्त करने में सहायता करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तेजनाओं से बचने के लिए सबसे आवश्यक है आत्मचेतना। व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि क्रोध का कोई लाभ नहीं है, बल्कि यह केवल हानि ही पहुंचाता है। जब भी क्रोध उत्पन्न हो, उस समय तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय के लिए मौन धारण करना चाहिए। थोड़ी देर के लिए उस स्थान से हट जाना या किसी अन्य कार्य में लग जाना भी सहायक हो सकता है। इस प्रकार व्यक्ति अपने मन को शांत कर सकता है और अनावश्यक विवाद से बच सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त, सहिष्णुता और क्षमा का भाव भी अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति हमारे प्रति कठोर व्यवहार करता है, तो हमें भी उसी प्रकार प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं है। मुस्कराकर और धैर्यपूर्वक स्थिति को संभालना ही सच्ची समझदारी है। जब हम क्रोध के स्थान पर शांति का मार्ग अपनाते हैं, तो सामने वाला व्यक्ति भी धीरे-धीरे शांत हो जाता है। इस प्रकार हम न केवल स्वयं को बल्कि दूसरों को भी सकारात्मक दिशा में प्रेरित कर सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जीवन का उद्देश्य अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना है। संयम इस यात्रा का मार्गदर्शक है, जो हमें सही दिशा में ले जाता है। यदि हम अपने जीवन में संयम को अपनाते हैं और क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाओं से दूर रहते हैं, तो हमारा जीवन अधिक सुखी और सफल बन सकता है। संयम हमें आंतरिक शक्ति प्रदान करता है और हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि संयम ही वह कवच है, जो हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों से बचाता है। यह हमें न केवल बाहरी संघर्षों से सुरक्षित रखता है, बल्कि हमारे भीतर की अशांति को भी समाप्त करता है। यदि हम संयम को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लें, तो हम निश्चित रूप से एक संतुलित, शांत और सफल जीवन जी सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 18:57:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुसंगति त्यागें धर्मबुद्धि जागे जीवन बने उज्ज्वल और संस्कारित</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन संगति से निर्मित होता है। जैसा वातावरण मिलता है वैसा ही मनुष्य का स्वभाव बनता जाता है। प्राचीन नीतिकारों ने स्पष्ट कहा है कि अच्छे और बुरे लोगों का प्रभाव मन पर अवश्य पड़ता है। आम और नीम के उदाहरण से यह बात समझाई गई है कि यदि दोनों के मूल एक साथ जुड़े हों तो मीठा आम भी कड़वाहट ग्रहण कर लेता है। यही स्थिति मनुष्य जीवन में भी देखी जाती है। कुसंगति का प्रभाव धीरे धीरे व्यक्ति के विचारों और आचरण को बदल देता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि मनुष्य अपनी संगति को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174765/give-up-bad-company-awaken-your-religious-mind-let-your"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन संगति से निर्मित होता है। जैसा वातावरण मिलता है वैसा ही मनुष्य का स्वभाव बनता जाता है। प्राचीन नीतिकारों ने स्पष्ट कहा है कि अच्छे और बुरे लोगों का प्रभाव मन पर अवश्य पड़ता है। आम और नीम के उदाहरण से यह बात समझाई गई है कि यदि दोनों के मूल एक साथ जुड़े हों तो मीठा आम भी कड़वाहट ग्रहण कर लेता है। यही स्थिति मनुष्य जीवन में भी देखी जाती है। कुसंगति का प्रभाव धीरे धीरे व्यक्ति के विचारों और आचरण को बदल देता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि मनुष्य अपनी संगति को लेकर सजग रहे और सदैव उत्तम मार्ग का चयन करे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बुरे लोगों का प्रभाव जल्दी क्यों पड़ता है और अच्छे लोगों का प्रभाव उतनी तीव्रता से क्यों नहीं पड़ता। इसका कारण मनुष्य की प्रवृत्ति में छिपा हुआ है। बुराई आकर्षक प्रतीत होती है और वह सरल मार्ग का भ्रम देती है। जबकि अच्छाई में अनुशासन और संयम की आवश्यकता होती है। सज्जन का हृदय कोमल होता है इसलिए वह दूसरों के प्रभाव में जल्दी आ सकता है जबकि दुर्जन कठोर होता है और अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता। यही कारण है कि सज्जन व्यक्ति को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अविवेक है। बाहरी शत्रु उतना नुकसान नहीं पहुंचाता जितना कि गलत निर्णय और गलत संगति पहुंचा देती है। परिवार में भी यदि माता पिता विवेकशील नहीं हैं तो वे अपनी संतान को सही दिशा नहीं दे पाते। आज के समय में यह देखा जा रहा है कि माता पिता अपने बच्चों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने पर तो ध्यान देते हैं लेकिन उनके नैतिक और आध्यात्मिक विकास की ओर उतना ध्यान नहीं देते। परिणामस्वरूप बच्चे भटक जाते हैं और जीवन के सही मार्ग से दूर हो जाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संस्कारों का निर्माण बचपन से ही होता है। बालक का मन अत्यंत कोमल होता है। वह जैसा देखता है वैसा ही सीखता है। इसलिए यह आवश्यक है कि उसे अच्छा वातावरण दिया जाए। आज के युग में मनोरंजन के साधनों ने बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डाला है। यदि इन साधनों का उपयोग सावधानी से नहीं किया गया तो यह बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकते हैं। इसलिए माता पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों के व्यवहार पर ध्यान दें और उन्हें सही मार्ग दिखाएं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक प्रेरक प्रसंग इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति जो स्वयं सुन नहीं सकता था वह प्रतिदिन अपने बच्चों को लेकर संतों के प्रवचन में जाता था। जब लोगों ने उससे पूछा कि उसे तो कुछ सुनाई नहीं देता फिर वह क्यों आता है तो उसने उत्तर दिया कि वह अपने बच्चों के संस्कारों के लिए आता है। उसका मानना था कि यदि बच्चे अच्छे संस्कारों से युक्त होंगे तो वे जीवन में सही निर्णय लेंगे और धन का सदुपयोग करेंगे। यह दृष्टिकोण हर माता पिता के लिए प्रेरणादायक है। परंपराओं का संरक्षण भी अत्यंत आवश्यक है। यदि हम अपनी अच्छी परंपराओं को नहीं बचाएंगे तो समाज में नैतिकता का पतन हो जाएगा। नई पीढ़ी को आधुनिकता के साथ साथ संस्कारों का भी ज्ञान होना चाहिए। केवल भौतिक उन्नति से जीवन सफल नहीं होता। नैतिक मूल्यों और धर्मबुद्धि के बिना जीवन अधूरा रह जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में बुराइयों का प्रभाव बढ़ता हुआ दिखाई देता है लेकिन यह सत्य है कि अंततः विजय सत्य की ही होती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि असत्य और अधर्म अधिक समय तक टिक नहीं सकते। इसलिए हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि सजग रहकर समाज में जागरूकता फैलानी चाहिए। संगति का प्रभाव इतना गहरा होता है कि वह मनुष्य के जीवन की दिशा बदल सकता है। यदि व्यक्ति बुरे लोगों के संपर्क में रहता है तो वह धीरे धीरे उनके जैसा बनने लगता है। प्रारंभ में यह प्रभाव छोटा होता है लेकिन समय के साथ यह गहरा हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने मित्रों और परिचितों का चयन सोच समझकर करें।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक हास्य प्रसंग के माध्यम से भी यह समझाया गया है कि बुरी आदतें धीरे धीरे विकसित होती हैं। प्रारंभ में वे छोटी लगती हैं लेकिन बाद में वे गंभीर रूप ले लेती हैं। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति को गलत आदत लग जाए तो उसे छोड़ना कठिन हो जाता है। इसलिए शुरुआत में ही सावधानी बरतनी चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक अन्य उदाहरण में बताया गया है कि एक व्यक्ति ने शेर का पालन किया। वह उसे शाकाहारी बनाना चाहता था लेकिन अंततः शेर ने अपने स्वभाव को नहीं छोड़ा। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि स्वभाव और संगति का प्रभाव कितना गहरा होता है। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि बुरे तत्वों के साथ रहकर अच्छा बने रहना अत्यंत कठिन है।महापुरुषों ने हमेशा कुसंगति से दूर रहने की शिक्षा दी है। उन्होंने कहा है कि बुरे मित्र से अच्छा है कि व्यक्ति अकेला रहे। काजल की कोठरी में जाने से दाग लगना निश्चित है। इसलिए हमें अपने जीवन को पवित्र बनाए रखने के लिए बुरी संगति से बचना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है। यदि हम इसे अच्छे कार्यों में लगाते हैं तो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। लेकिन यदि हम इसे व्यर्थ में गंवाते हैं तो यह हमें गलत दिशा में ले जा सकता है। खाली मन में नकारात्मक विचार जल्दी प्रवेश करते हैं इसलिए हमें सदैव व्यस्त और जागरूक रहना चाहिए।आत्मावलोकन भी अत्यंत आवश्यक है। यदि हम प्रतिदिन अपने कार्यों और विचारों का विश्लेषण करें तो हम अपनी गलतियों को पहचान सकते हैं और उन्हें सुधार सकते हैं। जो व्यक्ति स्वयं के प्रति सजग होता है वह कभी भी बुराई के प्रभाव में नहीं आता। अंततः यह कहा जा सकता है कि कुसंगति से बचना और सद्गुणों को अपनाना ही जीवन की सफलता का मूल मंत्र है। हमें स्वयं भी अच्छे मार्ग पर चलना चाहिए और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनना चाहिए। जब हम अपने जीवन को प्रकाशमय बनाएंगे तभी समाज और राष्ट्र का कल्याण संभव होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:19:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बातें बची हैं, पर बातचीत क्यों खत्म हो रही है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज हमारे पास शब्दों की कोई कमी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमी है उस सच्चाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस गहराई और उस आत्मीय स्पर्श की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शब्दों को साधारण ‘बात’ से उठाकर सच्ची</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बातचीत</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में बदल देता है। हम दिन भर अनगिनत लोगों से बात करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिक्रियाएँ देते हैं—फिर भी जब रात की खामोशी उतरती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भीतर एक अजीब-सा खालीपन रह जाता है। यह खालीपन यूँ ही नहीं जन्म लेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इस बात का साक्षी है कि ‘बातें’ तो बहुत हुईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ‘बातचीत’ कहीं खो गई। क्योंकि</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174000/there-are-still-things-left-but-why-are-the-conversations"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas15.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज हमारे पास शब्दों की कोई कमी नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमी है उस सच्चाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस गहराई और उस आत्मीय स्पर्श की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शब्दों को साधारण ‘बात’ से उठाकर सच्ची</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बातचीत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में बदल देता है। हम दिन भर अनगिनत लोगों से बात करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिक्रियाएँ देते हैं—फिर भी जब रात की खामोशी उतरती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भीतर एक अजीब-सा खालीपन रह जाता है। यह खालीपन यूँ ही नहीं जन्म लेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इस बात का साक्षी है कि ‘बातें’ तो बहुत हुईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ‘बातचीत’ कहीं खो गई। क्योंकि बातचीत केवल शब्दों का मेल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दो मनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो भावनाओं और दो आत्माओं का सच्चा जुड़ाव है—और जब यह जुड़ाव नहीं बनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शब्द केवल शोर बनकर रह जाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज बातचीत के खत्म होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमने उसे एक औपचारिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक आदत और एक रूटीन बना दिया है। “क्या हाल है</span>?”, “<span lang="hi" xml:lang="hi">सब ठीक</span>?”, “<span lang="hi" xml:lang="hi">खाना खाया</span>?”—<span lang="hi" xml:lang="hi">ये सवाल जरूरी जरूर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ये रिश्तों में जीवन नहीं भरते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सिर्फ उनकी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। असली बातचीत तब जन्म लेती है जब हम सतह से नीचे उतरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम सच में जानना चाहते हैं कि सामने वाला कैसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके भीतर क्या चल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौन-सी बातें उसे चुप कर रही हैं। और सबसे जरूरी—जब हम इन सवालों के जवाब सुनने के लिए ठहरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना जल्दबाजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना औपचारिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी संवेदनशीलता के साथ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी सबसे बड़ी कमी यही है कि हम सुनना भूल गए हैं—हम सिर्फ जवाब देने के लिए इंतज़ार करते हैं। जब कोई अपनी बात कह रहा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब हमारा ध्यान उसकी भावनाओं पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपने अगले शब्दों पर होता है। यही कारण है कि सामने वाला सुना हुआ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अनदेखा और अनसुना महसूस करता है। यही अनदेखापन धीरे-धीरे एक गहरी दूरी में बदल जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बिना शोर किए रिश्तों को कमजोर कर देता है और अंततः बातचीत को खत्म कर देता है। शायद अब समय आ गया है कि हम फिर से सीखें—कम बोलना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सच में सुनना और दिल से जुड़ना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डर और असुरक्षा भी बातचीत को गहराई तक पहुँचने से रोक देते हैं। हम अपनी सच्ची भावनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने भीतर छिपे सच और अपनी नाज़ुक संवेदनाओं को व्यक्त करने से कतराते हैं—कहीं हमें गलत न समझ लिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं हमारी कमजोरी उजागर न हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं हमारी छवि टूट न जाए। इसलिए हम सुरक्षित शब्दों का सहारा लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतही बातें करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अपने असली भावों को भीतर ही दबाए रखते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि जहाँ जोखिम नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ सच्ची गहराई भी नहीं होती। बातचीत तब जीवंत और अर्थपूर्ण बनती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम अपने भीतर की सच्चाई को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी अपूर्णताओं और असहजताओं के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहसपूर्वक सामने रखने का हौसला करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक ने बातचीत को तेज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुविधाजनक और हर पल उपलब्ध जरूर बना दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसे गहराई और संवेदनशीलता नहीं दे पाई। टेक्स्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमोजी और छोटे-छोटे संदेशों ने भावनाओं को सीमित और संक्षिप्त कर दिया है। हम तुरंत जवाब तो दे देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन शब्दों को महसूस करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें समझने और उनके पीछे छिपे भावों को पकड़ने का समय नहीं लेते। जबकि सच्ची बातचीत को समय चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठहराव चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और एक ऐसा धैर्य चाहिए जिसमें शब्दों के बीच की खामोशी भी सुनी जा सके। जब हर चीज़ जल्दबाज़ी में हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बातचीत भी उसी जल्दबाज़ी की शिकार हो जाती है—और यही कारण है कि आज हम एक-दूसरे से जुड़े तो हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वास्तव में समझे नहीं जाते।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक और गहरी और अक्सर अनदेखी वजह है—अहंकार। छोटे-छोटे मुद्दों पर हम चुप्पी ओढ़ लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सोचकर कि “पहले वह क्यों नहीं बोलता</span>?”, “<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं ही क्यों पहल करूँ</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">यह ‘मैं’ और ‘मेरी’ की भावना ही बातचीत का सबसे बड़ा अवरोध बन जाती है। जबकि सच्ची बातचीत तब जीवित रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई एक झुकने का साहस करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई एक अपने अहंकार से ऊपर उठकर पहला कदम बढ़ाता है। लेकिन जब दोनों ओर अहंकार की दीवार खड़ी हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब शब्द खत्म नहीं होते—बस उनके बीच का रास्ता बंद हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वहीं से बातचीत धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का जीवन इतना तेज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतना व्यस्त और इतना उलझा हुआ हो गया है कि हमने बातचीत को अपनी प्राथमिकताओं की सूची से लगभग बाहर ही कर दिया है। काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महत्वाकांक्षाएँ और जिम्मेदारियों के बीच हम बातचीत को बार-बार “बाद में” टालते रहते हैं—जैसे वह कोई गैर-ज़रूरी चीज़ हो। लेकिन सच्चाई यह है कि रिश्ते ‘बाद में’ नहीं चलते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे केवल ‘अभी’ में ही जीवित रहते हैं। उन्हें समय चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चा ध्यान चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सबसे बढ़कर—हमारी पूरी उपस्थिति चाहिए। जब हम किसी के साथ होते हुए भी अपने विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोन या काम में उलझे रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बातचीत धीरे-धीरे अपनी सांसें खोने लगती है और अनजाने में ही रिश्तों की गर्माहट कम होने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बातचीत को बचाने के लिए हमें अपने भीतर लौटना होगा—थोड़ा ठहरकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा समझकर। हमें यह गहराई से समझना होगा कि बातचीत कोई साधारण तकनीक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक बेहद संवेदनशील और जीवंत प्रक्रिया है—जिसमें समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी और पारस्परिक समझ की सच्ची जरूरत होती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें फिर से सीखना होगा—पूरी एकाग्रता के साथ सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चाई और स्पष्टता से बोलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और बिना किसी शर्त के एक-दूसरे को स्वीकार करना। क्योंकि जब बातचीत खत्म होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो रिश्ते अचानक नहीं टूटते—वे धीरे-धीरे भीतर से खोखले हो जाते हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और एक दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर्फ शब्द रह जाते हैं… बातचीत नहीं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 20:43:05 +0530</pubDate>
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