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                <title>होर्मुज जलडमरूमध्य - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>होर्मुज जलडमरूमध्य RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>होर्मुज : सुरक्षा पहले, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार ने हाल ही में जहाज मालिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिप मैनेजरों और भर्ती एजेंसियों को सलाह दी है कि अगली सूचना तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों की नई तैनाती न की जाए। यह कदम खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक जहाजों पर हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की उस नीति का संकेत है जिसमें विदेशों में काम कर रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि इस निर्णय</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183610/hormuz-security-first-but-challenges-are-no-less"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार ने हाल ही में जहाज मालिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिप मैनेजरों और भर्ती एजेंसियों को सलाह दी है कि अगली सूचना तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों की नई तैनाती न की जाए। यह कदम खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक जहाजों पर हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की उस नीति का संकेत है जिसमें विदेशों में काम कर रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि इस निर्णय के दूरगामी आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी हो सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों महत्वपूर्ण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं। भारत भी अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा भाग खाड़ी देशों से आयात करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इस मार्ग की सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण होर्मुज क्षेत्र में कई व्यापारिक जहाज हमलों का शिकार हुए हैं। कुछ घटनाओं में भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए और एक भारतीय सीफेरर की मौत के बाद भारत सरकार ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसके बाद समुद्री प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से भारतीय नाविकों की नई तैनाती रोकने की सलाह जारी की।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रतिबंध स्थायी नहीं बल्कि परिस्थितियों के सामान्य होने तक एहतियाती कदम माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत दुनिया में सबसे अधिक समुद्री कर्मी उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। लाखों भारतीय विभिन्न विदेशी जहाजों पर कार्यरत हैं। ऐसे में होर्मुज मार्ग पर तैनाती रुकने से अनेक नाविकों की नई नियुक्तियां प्रभावित हो सकती हैं। जहाजरानी कंपनियों को वैकल्पिक क्रू की व्यवस्था करनी पड़ेगी। कुछ भारतीय नाविकों की आय प्रभावित हो सकती है। समुद्री रोजगार बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या प्रभाव</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल यह आदेश केवल भारतीय नाविकों की तैनाती से जुड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल आयात पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यदि होर्मुज मार्ग पूरी तरह बाधित होता है तो भारत सहित पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है। इससे महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ेगा। भारत पिछले कुछ वर्षों से तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे कदम भविष्य के संकटों से निपटने में मदद कर सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या यह फैसला उचित है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवीय दृष्टि से देखें तो यह निर्णय उचित प्रतीत होता है। किसी भी आर्थिक लाभ से अधिक महत्वपूर्ण नागरिकों का जीवन है। जब किसी क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति हो और व्यापारिक जहाज लगातार निशाने पर हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सरकार का पहला दायित्व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि लंबे समय तक प्रतिबंध रहने पर भारतीय समुद्री उद्योग और नाविकों के रोजगार पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए सरकार को सुरक्षा के साथ-साथ प्रभावित नाविकों के हितों का भी ध्यान रखना होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आगे की राह- भारत को केवल अस्थायी प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं— समुद्री सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। संकटग्रस्त क्षेत्रों में भारतीय नाविकों के लिए बेहतर सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करना। प्रभावित नाविकों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराने में सहायता देना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा आयात के स्रोतों में और विविधता लाना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्री जोखिमों की निगरानी के लिए आधुनिक तंत्र विकसित करना। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भारतीय नाविकों की तैनाती रोकने का निर्णय सुरक्षा की दृष्टि से एक सतर्क और जिम्मेदार कदम है। यह बताता है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। हालांकि इसके आर्थिक और रोजगार संबंधी प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि क्षेत्रीय तनाव जल्द कम होता है तो यह प्रतिबंध अस्थायी साबित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि स्थिति लंबी खिंचती है तो भारत को समुद्री व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा और नाविकों के रोजगार के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 20:56:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिकी हमलों के बावजूद अडिग ईरान : मिसाइल ताकत बरकरार, दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179243/irans-missile-power-intact-despite-us-attacks-not-ready-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों पर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार ईरान की मिसाइल क्षमता अब भी काफी हद तक सुरक्षित है और उसके अंडरग्राउंड नेटवर्क को अपेक्षित नुकसान नहीं पहुंचा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">खुफिया आकलनों के मुताबिक ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल जखीरे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बचाने में सफल रहा है। इतना ही नहीं, उसके 90 प्रतिशत भूमिगत मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च नेटवर्क अब भी सक्रिय स्थिति में हैं। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि ईरान ने वर्षों से जिस रणनीतिक तैयारी पर काम किया था, वह अमेरिकी हमलों के बावजूद पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थित मिसाइल ठिकानों तक ईरान ने दोबारा पहुंच बना ली है। यह वही क्षेत्र है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार गुजरता है। यदि यहां अस्थिरता बढ़ती है, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती यही है कि वह तकनीकी और सैन्य रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकत होने के बावजूद ईरान की “असममित युद्ध नीति” को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पा रहा। ईरान ने पारंपरिक युद्ध के बजाय ऐसे नेटवर्क तैयार किए हैं जो भूमिगत सुरंगों, मोबाइल लॉन्चरों और विकेंद्रीकृत मिसाइल ठिकानों पर आधारित हैं। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी ईरान की जवाबी क्षमता खत्म नहीं हुई। रिपोर्टों के अनुसार उसके लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर सुरक्षित हैं। इन लॉन्चरों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इन्हें किसी भी इलाके में ले जाकर अचानक हमला किया जा सकता है। इससे विरोधी देश लगातार अनिश्चितता और दबाव में रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की रणनीति केवल सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है। उसने पिछले दो दशकों में अपने रक्षा ढांचे को इस प्रकार विकसित किया है कि बाहरी हमलों की स्थिति में भी उसका कमांड और कंट्रोल सिस्टम सक्रिय बना रहे। अमेरिकी और इजरायली हमलों के खतरे को देखते हुए ईरान ने अपने मिसाइल नेटवर्क को पहाड़ों के भीतर और भूमिगत सुरंगों में स्थापित किया। यही वजह है कि अत्याधुनिक बमबारी के बावजूद अमेरिका उसकी पूरी सैन्य क्षमता को नष्ट नहीं कर पाया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना कि “ईरान के सामने केवल दो रास्ते हैं—समझौता या पूर्ण विनाश”, राजनीतिक रूप से भले ही आक्रामक संदेश हो, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं है। उसने समझौते के बदले युद्ध क्षतिपूर्ति, प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता की मान्यता जैसी शर्तें रखी हैं। यह दिखाता है कि ईरान खुद को कमजोर स्थिति में नहीं मानता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की इस निडरता के पीछे केवल सैन्य तैयारी ही नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक और राजनीतिक सोच भी जिम्मेदार है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान ने खुद को पश्चिमी दबाव के खिलाफ प्रतिरोध की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव के बावजूद उसने अपनी मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को लगातार विकसित किया। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी वहां की सत्ता व्यवस्था या सैन्य संरचना में कोई बड़ा टूटाव दिखाई नहीं देता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है। ट्रम्प का चीन दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका चाहता है कि शी जिनपिंग ईरान पर दबाव डाले। चीन और ईरान के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध मजबूत रहे हैं। चीन पश्चिम एशिया में स्थिरता चाहता है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। ऐसे में अमेरिका चीन को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि चीन खुलकर अमेरिकी रणनीति का समर्थन करेगा, इसकी संभावना कम दिखाई देती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान के मुद्दे ने वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित किया है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। दुनिया के लगभग एक तिहाई समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी क्षेत्र से गुजरता है। ईरान कई बार संकेत दे चुका है कि यदि उसके खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाया गया तो वह इस मार्ग को बाधित कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की नीति अपना रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य संरचना का बचा रहना अमेरिकी रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे देशों में बड़े सैन्य अभियान चलाए, लेकिन लंबे समय में वहां स्थिरता स्थापित नहीं कर पाया। ईरान का मामला उससे भी अधिक जटिल है, क्योंकि यहां मजबूत राष्ट्रवादी भावना, संगठित सैन्य ढांचा और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क मौजूद हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और इराक-सीरिया के कई सशस्त्र समूह ईरान के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। इसलिए ईरान पर हमला केवल एक देश के खिलाफ कार्रवाई नहीं बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित कर सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की मिसाइल क्षमता का बरकरार रहना यह भी दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध केवल हवाई हमलों से नहीं जीते जा सकते। तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद जमीनी तैयारी, नेटवर्क आधारित रक्षा और रणनीतिक धैर्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ईरान ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि कोई देश लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से अपनी रक्षा नीति तैयार करे तो वह महाशक्तियों के सामने भी टिक सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज की स्थिति में अमेरिका सैन्य दबाव के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान अपने अस्तित्व और संप्रभुता की लड़ाई के रूप में इसे प्रस्तुत कर रहा है। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान के भीतर भय या आत्मसमर्पण का माहौल नहीं दिखाई देता। बल्कि उसकी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह लंबे संघर्ष के लिए तैयार है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में शांति फिलहाल दूर नजर आती है। यदि बातचीत का रास्ता नहीं निकला तो आने वाले समय में यह टकराव और व्यापक रूप ले सकता है। लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका के लगातार हमलों और धमकियों के बावजूद ईरान की सैन्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह टूटी नहीं है। उसकी मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा सुरक्षित रहना इस बात का प्रमाण है कि यह संघर्ष केवल ताकत का नहीं, बल्कि रणनीति, धैर्य और राजनीतिक संकल्प का भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 21:11:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार शीर्षक पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बरेली। </strong>महाराजा अग्रसेन महाविद्यालय में भूगोल विभाग द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार शीर्षक पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. आर. पी. सिंह पूर्व कुलपति, सदस्य उत्तर प्रदेष उच्च शिक्षा सेवा आयोग एवं पूर्व प्राचार्य बरेली काॅलेज बरेली, शैक्षिक  उन्नयन समिति के चेयरमैन अजय कुमार अग्रवाल, प्रबंध समिति के सदस्य अशोक कुमार गोयल, निदेषक डाॅ. प्रवीन कुमार अग्रवाल, अतिथि पवन कुलश्रेष्ठ, महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. सौरभ अग्रवाल, कला संकाय समन्वयक डाॅ. सीमा श्रीवास्तव, कार्यक्रम समन्वयक भूगोल विभाग के प्रवक्ता डाॅ. तरूण पाण्डेय, सह समन्वयक राकेश कुमार द्वारा दीप प्रज्जवलित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177302/one-day-seminar-organized-on-strait-of-hormuz-gateway-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260426-wa0006.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बरेली। </strong>महाराजा अग्रसेन महाविद्यालय में भूगोल विभाग द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार शीर्षक पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. आर. पी. सिंह पूर्व कुलपति, सदस्य उत्तर प्रदेष उच्च शिक्षा सेवा आयोग एवं पूर्व प्राचार्य बरेली काॅलेज बरेली, शैक्षिक  उन्नयन समिति के चेयरमैन अजय कुमार अग्रवाल, प्रबंध समिति के सदस्य अशोक कुमार गोयल, निदेषक डाॅ. प्रवीन कुमार अग्रवाल, अतिथि पवन कुलश्रेष्ठ, महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. सौरभ अग्रवाल, कला संकाय समन्वयक डाॅ. सीमा श्रीवास्तव, कार्यक्रम समन्वयक भूगोल विभाग के प्रवक्ता डाॅ. तरूण पाण्डेय, सह समन्वयक राकेश कुमार द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम की रूपरेखा डाॅ. तरूण पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत की गई। संगोष्ठी में छात्र-छात्राओं द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश शीर्षक पर अपने विचार प्रस्तुत किये गये। आज की संगोष्ठी में मुख्य अतिथि ने भू-राजनीति एवं जलमार्गो के वर्चस्व पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भू-राजनीति में जल मार्गो का विशेष महत्व है क्योंकि यही जलमार्ग किसी देश की अर्थव्यवस्था का आधार बनते है। वर्तमान में ईरान एवं अमेरिका के मध्य चल रहे युद्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इस समय पर फारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ी के मध्य स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य एक ऐसा जल मार्ग है जहां से होकर विभिन्न देशो के लिए कच्चा तेल एवं गैस से लदे मालवाहक जहाज निकलते है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में चल रहे विवाद के कारण यहां से निकलने वाले मालवाहक जहाजो को कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। जो कि आयात-निर्यात में बाधा उत्पन्न कर रहें है। जिससे विभिन्न देशो की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ रहा है।  शैक्षिक उन्नयन समिति के चेयरमैन ने अपने अविभाषण में होर्मुज जलडमरूमध्य के अतिरिक्त विश्व के अन्य महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य पर प्रकाश डाला। निदेशक महोदय ने ईरान आयातित तेल एवं गैस के बढ़ते हुए मूल्यों पर चिंता व्यक्त की।इस कार्यक्रम के दौरान श्रेष्ठ प्रतिभागियों को पुरूस्कृत किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संगोष्ठी के अन्त में प्रबन्ध समिति ने मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान भूगोल विभाग के दोनों प्रवक्ताओं को भी उनके प्रयासों के लिए सम्मानित किया गया। महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. सौरभ अग्रवाल ने सभी का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठी से छात्र-छात्राओं के चहुंमुखी विकास में सार्थक सिद्ध होती है। मंच संचालन भूगोल विभाग के प्रवक्ता राकेश कुमार ने किया । संगोष्ठी को सफल बनाने में डाॅ. आरती बंसल, प्रीती यादव, डाॅ. बृजेश नंदिनी, गोविन्द सिंह, रामलखन, संगीता चैहान का विशेष योगदान रहा। संगोष्ठी में डाॅ. के.के.अग्रवाल, डाॅ. के.के. मेहरोत्रा, डाॅ. रेशु जौहरी, मंयक षर्मा, शोभित अग्रवाल, अजीत सिंह, डाॅ. सुमित अग्रवाल, डाॅ. निशा परवीन, डाॅ. पूजा अग्रवाल, डाॅ. राजपाल वर्मा, प्रथमेश कुमार, प्रफुल्ल पाठक सहित तमाम स्टाफ मौजूद रहा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 18:09:00 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>युद्ध नहीं, संवाद ही समाधान: अमेरिका–ईरान तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176587/america-iran-tension-is-solved-by-dialogue-not-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c8979c10-0dca-11f1-b7e1-afb6d0884c18.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और दोनों पक्षों के बयान सामने आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे गंभीर प्रयास जारी हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और यहां तक कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक, इस तनाव का असर गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर जब बात परमाणु कार्यक्रम और एनरिच्ड यूरेनियम की आती है, तो यह केवल रणनीतिक ताकत का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान के पास मौजूद ज्यादा एनरिच्ड यूरेनियम को हासिल करेगा। यह बयान केवल एक कूटनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई का संकेत भी माना जा रहा है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि यदि तय समय सीमा तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो मौजूदा संघर्ष विराम समाप्त हो सकता है और हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, ईरान का रुख भी कम सख्त नहीं है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानता है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी इसे शक की नजर से देखते हैं। यही अविश्वास इस पूरे विवाद की जड़ है, जिसने वर्षों से समाधान को मुश्किल बना रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस तनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का खतरा सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करता है। हाल ही में इस क्षेत्र में अस्थिरता के कारण कई जहाजों ने अपने रास्ते बदल दिए या यात्रा टाल दी, जिससे बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प और महत्वपूर्ण दोनों है। पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में दोनों पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच देने की कोशिश की है। इस्लामाबाद में संभावित वार्ता इसी प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, मध्यस्थता आसान नहीं होती, खासकर तब जब दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास हो और उनके हित एक-दूसरे के विपरीत हों। फिर भी, कूटनीति का यही उद्देश्य होता है कि संवाद के माध्यम से ऐसे समाधान खोजे जाएं जो सभी के लिए स्वीकार्य हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि जब-जब बातचीत के रास्ते बंद हुए हैं, तब-तब संघर्ष ने जन्म लिया है और उसका खामियाजा केवल संबंधित देशों ने ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने भुगता है। युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। यह केवल विनाश, अस्थिरता और मानवीय संकट को जन्म देता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता अत्यधिक है, किसी भी बड़े संघर्ष का प्रभाव दूरगामी और गंभीर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद का एक और पहलू यह है कि यह केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि हर कदम पर संदेह और आशंका बनी रहती है। ऐसे में किसी भी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होता। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि धैर्य, समझ और पारदर्शिता की भी जरूरत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के अन्य बड़े देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वे चाहते हैं कि यह विवाद शांतिपूर्ण तरीके से सुलझे, क्योंकि किसी भी तरह का युद्ध वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, एक नया संघर्ष स्थिति को और जटिल बना सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर इस बार की वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता लाने में भी मदद करेगा। इससे वैश्विक बाजारों में भरोसा बढ़ेगा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं कम होंगी। लेकिन अगर यह वार्ता विफल होती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। तनाव बढ़ सकता है, सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है और क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की आग में झुलस सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में सबसे जरूरी है संयम और समझदारी। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके फैसलों का असर केवल उनके देशों तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता को प्रभावित करता है। इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है। कूटनीति, संवाद और सहयोग ही ऐसे रास्ते हैं जो स्थायी शांति की ओर ले जा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे यह तय करना है कि वह संघर्ष का रास्ता चुनेगी या सहयोग का। अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश इस अवसर का उपयोग करेंगे और ऐसा समाधान निकालेंगे जो न केवल उनके लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए हितकारी हो। युद्ध किसी भी हालत में समाधान नहीं है, और इतिहास ने बार-बार इस सच्चाई को साबित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:06:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धोखा और नाकामी का मसौदा रही इस्लामाबाद वार्ता </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">करीब डेड़ महीने से से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175979/islamabad-talks-remained-a-draft-of-deception-and-failure"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/on3hke0s_america-iran_625x300_12_april_26.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">करीब डेड़ महीने से से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान जाने तक कई बुरी खबरों को झेलकर भी अपनी शर्तों पर टिका हुआ है, उसे अमेरिका भला एक वार्ता के विफल होने से क्या हिला पाएगा। असल में तो इस्लामाबाद वार्ता की असफलता अमेरिका के लिए बुरी खबर है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य की चाबी अब भी ईरान के हाथ में ही है और इससे भी बढ़कर उसके पास सिर न झुकाने का जो जज्बा है, वो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप  के पास नहीं है। ट्रंप नेतन्याहू की मर्जी से युद्ध छेड़ते हैं और समझौता भी नहीं कर पाते, क्योंकि नेतन्याहू ऐसा नहीं चाहते।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें बीते दिनों न्यूयार्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि बेंजामिन नेतन्याहू 11 फरवरी को अमेरिका में थे, जहां उन्होंने ट्रंप के सामने एक पूरी रणनीति बताई थी कि ईरान पर हमला करना चाहिए, क्योंकि वह अभी कमजोर है। इससे ईरान में सत्ता बदली जा सकती है और उसके संसाधनों पर कब्जा भी किया जा सकता है। नेतन्याहू ऐसे ही प्रस्ताव पहले बराक ओबामा, जो बाइडेन और जार्ज बुश को भी दे चुके थे, लेकिन इन तीनों राष्ट्रपतियों ने अपने कार्यकाल में ऐसा कोई फैसला नहीं लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह खुलासा पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने हाल ही में किया है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप नेतन्याहू की बात मानने को मजबूर हो गए। क्या इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स के खुलासे हैं, इस सवाल का जवाब अभी मिलना बाकी है। बहरहाल, यह वार्ता बेनतीजा रही, क्योंकि एक तरफ इजरायल लेबनान पर अपने हमले नहीं रोक रहा था, जबकि ईरान की 10 शर्तों में यह एक अहम शर्त थी कि लेबनान पर हमले रुकने चाहिए। दूसरी तरफ अमेरिका ने भी अपने रुख में इंच भर का बदलाव नहीं दिखाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान वार्ता बिना नतीजे के खत्म हो गई. लेकिन बातचीत के नाम पर असली फायदा डोनाल्ड ट्रंप ने उठाया है. अमेरिका ने होर्मुज में माइंस हटाने वाले जहाज भेज दिए हैं. वहीं पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब में जेट भेजे हैं. इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या बातचीत के नाम पर ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई गई. कहीं बातचीत में उलझाकर उसे फिर से धोखा तो नहीं दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्योंकि बातचीत के बीच ही अमेरिका ने माइंस हटाने के लिए अपने दो सैन्य जहाजों को होर्मुज के पार ईरान के पास भेज दिया है. करीब 21 घंटे तक चली मैराथन बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को खाली हाथ लौटना पड़ा. वेंस ने साफ कहा कि अमेरिका ने अपनी ‘रेड लाइन’ बता दी थी, लेकिन ईरान ने उन्हें मानने से इनकार कर दिया. दूसरी तरफ ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा शर्तें थोप दीं और बातचीत को संतुलित नहीं रखा.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां यह भी गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच 5 अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध की भरपाई, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना और ईरान के खिलाफ तथा पूरे क्षेत्र में चल रहे युद्ध को पूरी तरह खत्म करने जैसे विषय शामिल रहे। लेकिन इन मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई। अमेरिका न ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हुआ, न उसने होर्मुज पर अपना रुख साफ किया। दरअसल पिछले दस दिनों में ही ट्रम्प दो बिल्कुल अलग-अलग बातें कह चुके हैं। पहले उन्होंने कहा था कि होर्मज में अमेरिका की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, अमेरिका को वहां से गुजरने वाले तेल की जरूरत नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर कुछ ही दिनों बाद उन्होंने कहा कि यह अमेरिका की मांगों का सबसे जरूरी हिस्सा है, और अगर इसे खुला नहीं रखा गया तो कोई बातचीत नहीं हो सकती। वैसे यह तय है कि होर्मुज बनारसमध्य पर अमेरिका अपना कब्जा चाहता है, क्योंकि ईरान ते इस पर न केवल नाकेबंदी की है, बल्कि अब शुल्क चिनेको एरुआत भी कर दी है और ट्रंप इससे बुरी तरह गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरानी संसद से मंजूरी मिलने के बाद अब नामिरिखोलूश्यनरी गाईस कॉर्पस को होर्मुज से गुजरने पाहा से शुल्क वसूलने का अधिकार मिल गया है। एक बेरल तेल पर एक डॉलर ईरान वसूलेगा, साथ ही क्रिप्टो करेंसी में भुगतान की व्यवस्था भी होगी, ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का कोई असर न पड़े। ईरान की इस रणनीति से उसे आर्थिक मजबूती मिलेगी, अमेरिका को इस बात का अहसास हो चुका है। इसलिए अब उसने फिर से अपने पत्ते फेंटने शुरु किए हैं, ताकि युद्ध को जायज ठहरा सके। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इस युद्ध ने एक तरफ ईरान और खाड़ी देशों समेत पूरी दुनिया में घोर तबाही मचाई है, वहीं एक नयी वैश्विक व्यवस्था भी तैयार की है, जिसमें ईरान निस्संदेह एक आदर्श की तरह उभरा है। ईरान ने संदेश दे दिया है कि महाशक्ति की अवधारणा और उसके हौव्वे को आत्मबल से कैसे तोड़ा जा सकता है। अब अन्य देशों को भी यह प्रेरणा मिली है कि वे अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने से इंकार करने की हिम्मत दिखाएं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने फाइटर जेट तैनात कर दिए. यह तैनाती दोनों देशों के रक्षा समझौते के तहत की गई, लेकिन इसे ईरान के लिए एक सख्त संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है. यह अमेरिका की दोहरी रणनीति थी ताकि एक तरफ बातचीत के जरिए समाधान का दिखावा किया जाए, दूसरी तरफ सैन्य दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाई घटनाक्रम की तुलना 28 फरवरी की उस घटना से भी की जा रही है, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था. यह हमला ऐसे समय में किया गया था जब दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी. जब किसी को हमले की उम्मीद नहीं थी तब ईरान पर अटैक हुआ, जिसमें सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए. इस बात का खतरा पहले से था कि कहीं अमेरिका बातचीत के बीच धोखा न दे दे वही हुआ अब ईरान को और मजबूती से खड़े होने की जरूरत होगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 19:25:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पहले सभ्यता मिटाने की धमकी और फिर ईरान को रिकंस्ट्रक्शन में मदद का वादा, 24 घंटे में ट्रंप के पलटने की पूरी कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महज 24 घंटे पहले ईरान को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे रहे थे। उन्होंने कहा था कि अगर ईरान उनकी बात नहीं मानता, तो “मंगलवार रात पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है।“ उनके इस बयान से पूरी दुनिया में दहशत का माहौल बन गया था। लेकिन ट्रंप अब ईरान के पुनर्निर्माण में मदद की बात कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में युद्धविराम समझौते को ‘‘विश्व शांति के लिए एक बड़ा दिन’’ घोषित किया और कहा कि अमेरिका ‘‘होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात की भीड़ को कम करने में मदद</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175576/first-the-threat-of-destroying-civilization-and-then-the-promise"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/top_news_today_1775567346779_1775567356175.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महज 24 घंटे पहले ईरान को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे रहे थे। उन्होंने कहा था कि अगर ईरान उनकी बात नहीं मानता, तो “मंगलवार रात पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है।“ उनके इस बयान से पूरी दुनिया में दहशत का माहौल बन गया था। लेकिन ट्रंप अब ईरान के पुनर्निर्माण में मदद की बात कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में युद्धविराम समझौते को ‘‘विश्व शांति के लिए एक बड़ा दिन’’ घोषित किया और कहा कि अमेरिका ‘‘होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात की भीड़ को कम करने में मदद करेगा।’’ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, ‘‘बहुत सारे सकारात्मक कदम उठाए जाएंगे!’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘इससे खूब आय होगी। ईरान पुनर्निर्माण प्रक्रिया शुरू कर सकता है। हम हर तरह की आपूर्ति लेकर जाएंगे और यह सुनिश्चित करने के लिए वहीं मौजूद रहेंगे कि सब कुछ ठीक से चले। मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा ही होगा।’’</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप की ‘ट्रुथ सोशल’ वेबसाइट पर दिए गए संदेश से वाशिंगटन की इस चिंता का संकेत मिलता है कि ईरान फारस की खाड़ी के संकरे मुहाने पर अपना नियंत्रण बनाए हुए है, जिससे शांति काल में कुल तेल और प्राकृतिक गैस का 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि यह यू-टर्न सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि  राजनीतिक भी हो सकता है। अमेरिका में चुनावी माहौल गर्म है और इस जंग के कारण ट्रंप की लोकप्रियता पर असर पड़ा है। ऐसे में शांति का संदेश देना उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। दूसरी तरफ, ईरान भी लगातार दबाव में था। आर्थिक संकट, सैन्य नुकसान और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उसे भी बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ा।राजनीतिक विश्लेषण सेवा</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले मंगलवार को उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दावा किया कि आज (मंगलवार) रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी। ट्रंप ने ट्रुथ पोस्ट में लिखा कि "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी, जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही ट्रंप ने विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वो इसकी ख्वाहिश नहीं रखते। उन्होंने कहा, "मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो, लेकिन शायद हो जाए।" फिर दावा किया कि अब ईरान में पूर्ण सत्ता परिवर्तन की गुंजाइश है। उनके मुताबिक, इस बदलाव के साथ ही सत्ता पर ज्यादा होशियार और कम रेडिकल सोच वाले लोग काबिज होंगे। ट्रंप ने उम्मीद जताई कि अगर ऐसा हुआ तो "शायद कुछ बहुत ही शानदार हो जाए।" ट्रंप ने अपनी बातों को विराम देते हुए कहा- आज की रात दुनिया के इतिहास की एक बहुत बड़ी और खास पल साबित हो सकती है। पिछले 47 साल से चल रहे दमन, भ्रष्टाचार और हिंसा का अंत हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 22:04:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहुत आपत्तिजनक हैं ट्रंप के असंयमित असभ्य बयान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175393/trumps-uncontrolled-rude-statements-are-very-objectionable"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c0eb6ec0-68a6-11f0-83d0-5d68283eb47c.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद से लगभग बंद है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. ट्रंप ने होर्मुज को लेकर ईरान को कई बार धमकी दी है और इस समुद्री मार्ग को खोलने का अल्टीमेटम दे चुके हैं. उन्होंने होर्मुज को खोलने में अमेरिका की मदद नहीं करने के लिए यूरोपीय व नाटो सहयोगियों पर भी नाराजगी जताई है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने यहां तक चेतावनी दी कि अमेरिका नाटो से बाहर निकल सकता है. अपने इस पोस्ट में ट्रंप ने ईरान के लिए ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया, जिसकी किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से उम्मीद नहीं की जाती. हालांकि हम जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप पर कभी कोई मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस समय उनकी भाषा में जो गिरावट स्पष्ट स्पष्ट परिलक्षित है, कम से कम उसका विश्व समुदाय को विरोध करना चाहिए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल ईरान पर अमेरिका और इजरायल को जंग छेड़े छह सप्ताह हो चुके हैं, जिसमें कई बार जीत का दावा करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जीत के लक्षण नहीं दिखा पाए। बल्कि बार-बार युद्धविराम की अवधि को बदलते हैं और साथ ही उनकी धमकियां भी बदल रही हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के ऐलान से शुरु हुआ यह युद्ध अब नागरिकों को निशाने पर लेने की धमकियों पर उतर आया है। रविवार को ईस्टर के मौके पर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टूथ पर ट्रंप ने ईरान को धमकी दी कि 48 घंटों में होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खोलो वर्ना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने लिखा कि मंगलवार को ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक हमले हो सकते हैं, और इसे संघर्ष का निर्णायक क्षण बताया। लेकिन यह सब इसी तरह की शालीन भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। और यह पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपशब्द कहे हों। इससे पहले उन्हें पत्रकारों से चर्चा के दौरान या भाषण देते हुए भी अपशब्द बोलते देखा गया है। यह किसी लिहाज से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और वैश्विक नेताओं को खुलकर इसकी भर्त्सना करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी से इसकी शुरुआत हो तो कितना अच्छा रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी सीनेट के सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी के ​वरिष्ठ नेता चक शूमर ने ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के बयान को 'एक असंतुलित व्यक्ति की बकवास बताया'. उन्होंने कहा कि ट्रंप का यह रवैया अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर कर रहा है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के हालिया बयान को युद्ध अपराध की धमकी देने जैसा बताया. ट्रंप की पूर्व सहयोगी मार्जरी टेलर ग्रीन ने भी उनके बयान की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रपति 'पागलपन' की स्थिति में हैं. उन्होंने अमेरिकी प्रशासन के लोगों से दखल देने की अपील की. टेलर ग्रीन ने कहा कि यह युद्ध बिना उकसावे के शुरू किया गया और इससे निर्दोष लोगों की जान जा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैसे संयुक्त राष्ट्र में  ईरानी ई मिशन ने ट्रंप की की नवीनतम टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में' नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करने' की धमकी दे रहे हैं। मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, 'यदि संयुक्त राष्ट्र की अंतरात्मा जीवित होती, तो वह युद्ध भड़काने तो वह युद्ध भड़काने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की खुली और बेशर्म धमकी पर चुप नहीं रहती। ट्रंप इस क्षेत्र को एक अंतहीन युद्ध में घसीटना चाहते हैं।' इसमें कहा गया, 'यह नागरिकों को आतंकित करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावा है और युद्ध अपराध करने के इरादे का स्पष्ट प्रमाण है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें आगे कहा गया- 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सभी राज्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे युद्ध अपराधों के ऐसे जघन्य कृत्यों को रोकें। उन्हें अभी कार्रवाई करनी चाहिए। कल बहुत देर हो जाएगी।' वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष गलिबाफ ने कहा कि ट्रंप के 'लापरवाह कदमों से अमेरिका के हर परिवार को एक जीती-जागती नरक में धकेला जा रहा है, हमारा पूरा क्षेत्र जल उठेगा क्योंकि आप नेतन्याहू के आदेशों का पालन करने पर अड़े हैं।' गुलिबाफ के इस बयान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं, उसमें यही लगता है कि पटकथा कोई और लिख रहा है, केवल संवाद अदायगी ट्रंप की है। क्योंकि अपशब्द वाले बयान के बाद ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के एक पत्रकार से कहा, मुझे लगता है कि सोमवार को समझौता होने की अच्छी संभावना है, वे (ईरान) अभी बातचीत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तो ट्रंप को लगता है कि ईरान अब भी उनसे बात कर समझौता करेगा, जबकि ईरान की सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूनिट खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता ने कहा, 'अगर आम लोगों पर हमले दोहराए गए, तो हमारे अगले हमले और जवाबी कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और बड़े पैमाने पर होंगे।' ध्यान देने वाली बात यह है कि ईरान केवल धमका नहीं रहा है, अपनी बात पर अमल भी कर रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों समेत इजरायल पर ईरान के हमलों को कोई रोक नहीं पा रहा है, वहीं अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हुए हमले और एक अमेरिकी पायलट के लापता होने की घटना ने भी जाहिर कर दिया है कि अमेरिका उतना भी ताकतवर देश नहीं है, जितना बड़ा उसका हौव्वा खड़ा किया गया है। ईरान की पहाड़ियों में लापता पायलट को बचाने का दावा ट्रंप ने किया है, हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने बचाव के लिए आए सैन्य दस्ते पर भी हमला किया है। अब किसका दावा सही है और किसका गलत, यह तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो नजर आ ही रहा है कि इस युद्ध में अमेरिका को वैसी ही चोट पड़ रही है, जो पहले इराक, अफगानिस्तान, क्यूबा और वियतनाम में पड़ चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि 2019 में ट्रंप ने खुद एक पोस्ट में प. एशिया में अमेरिका की सैन्य दखलंदाजी और युद्ध को गलत ठहराया था, क्योंकि उसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और सैनिकों का नुकसान हुआ। लेकिन अब संभवतः एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के दबाव में ट्रंप ने पूरी दुनिया को युद्ध की बर्बादी में झोंक दिया है। अपनी गलती मानने की जगह रोजाना बेतुके, निर्लज्ज बयानों से उसे सही भी ठहरा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में परमाणु हथियार और सत्ता बदलने के नाम पर शुरु किया गया युद्ध मीनाब की मासूम बच्चियों का कातिल बना और उसके बाद ईरान की अधोसंरचना पर हमले ही किए जा रहे हैं, कम से कम 30 विश्वविद्यालयों और कई अस्पतालों, दवा कारखानों को बारुद से ढेर कर दिया गया है। यह सीधे-सीधे मानवता के खिलाफ अपराध है, जिसे रोकने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर आवाज उठानी चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:20:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>होर्मुज संकट के बीच वैश्विक तनाव और संवाद की आवश्यकता,होरमुज संकट का समाधान बातचीत से ही सम्भव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, इस समय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले तेल और गैस की आपूर्ति पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक बाजार, महंगाई और आम जनजीवन पर पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174987/global-tension-amid-hormuz-crisis-and-need-for-dialogue-solution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, इस समय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले तेल और गैस की आपूर्ति पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक बाजार, महंगाई और आम जनजीवन पर पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक में साठ से अधिक देशों ने भाग लिया, जिसमें इस संकट को सुलझाने के उपायों पर विचार किया गया। इस बैठक में भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरे संकट का समाधान केवल बातचीत और शांति के माध्यम से ही संभव है। भारत का यह रुख उसकी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जिसमें वह हमेशा संवाद, संयम और संतुलन को प्राथमिकता देता रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत द्वारा यह भी बताया गया कि इस संघर्ष में अब तक केवल भारतीय नागरिकों की मृत्यु हुई है, जो विदेशी जहाजों पर काम कर रहे थे। यह तथ्य इस संकट की गंभीरता को और बढ़ा देता है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि युद्ध का प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह निर्दोष लोगों की जान भी लेता है। भारत का यह बयान एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चेतावनी भी है कि यदि समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस संघर्ष को अपनी रणनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं। अमेरिकी नेतृत्व द्वारा दिए गए बयान इस बात का संकेत देते हैं कि वे इस युद्ध को अपनी शक्ति और प्रभुत्व स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। हालांकि उन्होंने बातचीत की बात भी की है, लेकिन उनके वक्तव्यों में कठोरता और चेतावनी का स्वर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इस प्रकार के विरोधाभासी संकेत स्थिति को और जटिल बना देते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की ओर से भी कड़ा रुख अपनाया गया है। उसने स्पष्ट किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य उसके नियंत्रण में है और यह तभी खुलेगा जब उसकी शर्तों को स्वीकार किया जाएगा। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर तनाव को बढ़ाने वाली है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो तेल की आपूर्ति में भारी कमी आ सकती है, जिससे विश्वभर में ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है। इस संघर्ष का एक और गंभीर पहलू मानवीय संकट है। विभिन्न देशों में हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग घायल या विस्थापित हुए हैं। अस्पतालों, स्कूलों और अन्य बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचा है। यह स्थिति दर्शाती है कि युद्ध केवल सैनिकों के बीच नहीं होता, बल्कि इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस स्थिति पर चिंता व्यक्त की है और युद्धविराम की अपील की है। उनका मानना है कि यदि यह संघर्ष जारी रहा तो इसके परिणामस्वरूप वैश्विक आर्थिक मंदी, खाद्य संकट और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से विकासशील देशों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर होगा, क्योंकि वे पहले से ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।भारत का रुख इस पूरे परिदृश्य में संतुलित और दूरदर्शी दिखाई देता है। उसने न तो किसी पक्ष का समर्थन किया है और न ही किसी के खिलाफ आक्रामक बयान दिए हैं। इसके बजाय उसने शांति और संवाद का मार्ग अपनाने की अपील की है। यह नीति न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी आवश्यक है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, इस प्रकार के संकट से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ता है। इसलिए भारत का यह प्रयास कि स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाए, पूरी तरह से व्यावहारिक और आवश्यक है।वर्तमान परिस्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि युद्धों ने केवल विनाश और पीड़ा ही दी है। इसके विपरीत, संवाद और सहयोग के माध्यम से ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। इसलिए सभी देशों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ बैठकर समाधान खोजने की आवश्यकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि होर्मुज संकट केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती का सामना केवल शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि समझदारी, संयम और संवाद से किया जा सकता है। यदि विश्व समुदाय समय रहते सही कदम उठाता है, तो इस संकट को टाला जा सकता है और एक स्थिर तथा शांतिपूर्ण भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 18:54:39 +0530</pubDate>
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                <title>'मित्र देशों के जहाज गुजर सकेंगे', भारत सहित  5 देश के लिए ईरान ने खोला होर्मुज का दरवाजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong></span>पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच ईरान ने ऐलान किया है कि वह भारत समेत पांच मित्र देशों से संबंधित जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, जिससे उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि अन्य देशों के लिए पहुंच सीमित रहेगी। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बावजूद भारत के साथ-साथ रूस, चीन, पाकिस्तान और इराक के जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से सुरक्षित मार्ग प्रदान किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ईरानी सरकारी टेलीविजन को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174313/ships-of-friendly-countries-will-be-able-to-pass-through"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(3)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong></span>पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच ईरान ने ऐलान किया है कि वह भारत समेत पांच मित्र देशों से संबंधित जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, जिससे उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि अन्य देशों के लिए पहुंच सीमित रहेगी। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बावजूद भारत के साथ-साथ रूस, चीन, पाकिस्तान और इराक के जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से सुरक्षित मार्ग प्रदान किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ईरानी सरकारी टेलीविजन को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद नहीं किया गया है और कुछ ऐसे देशों को प्रतिबंधों से छूट दी गई हैm जिनके साथ ईरान के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी के अनुसार, अराघची ने कहा, "शत्रु को जलडमरूमध्य से गुजरने देने का कोई कारण नहीं है। हमने कुछ ऐसे देशों को गुजरने की अनुमति दी है, जिन्हें हम मित्र मानते हैं। हमने चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान को आने-जाने की अनुमति दी है।"</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही, उन्होंने संकेत दिया कि जिन देशों को शत्रु माना जाता है या जो मौजूदा संघर्ष में शामिल हैं, उनसे जुड़े जहाजों को जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल और कुछ खाड़ी देशों के जहाज, जो वर्तमान संकट में भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अराघची ने महत्वपूर्ण जलमार्ग पर ईरान के नियंत्रण पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि देश ने दशकों बाद इस क्षेत्र में अपना अधिकार प्रदर्शित किया है।उन्होंने कहा कि जब ईरान ने शुरू में होर्मुज जलडमरूमध्य की आंशिक नाकाबंदी की घोषणा की थी ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 21:00:12 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम एशिया का संघर्ष और युद्धविराम की शर्तें</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174234/the-conflict-in-west-asia-and-the-terms-of-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260325_174829.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात प्रमुख रूप से सामने आती है। यह मांग नई नहीं है। लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा मानते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में ईरान के कार्यक्रम को सीमित करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है। पहली नजर में यह मांग तर्कसंगत लग सकती है, क्योंकि परमाणु हथियारों का प्रसार किसी भी क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, ईरान का तर्क है कि उसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। यदि अन्य देशों के पास मिसाइल और रक्षा प्रणाली है, तो केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाना क्या न्यायसंगत कहा जा सकता है?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से इस विवाद का मूल प्रश्न उठता है—क्या वैश्विक नियम सभी देशों पर समान रूप से लागू होते हैं या शक्तिशाली देशों के हितों के अनुसार तय किए जाते हैं? ईरान की नजर में अमेरिकी प्रस्ताव एकतरफा है, जिसमें उसे अपनी सामरिक ताकत छोड़ने के लिए कहा जा रहा है, जबकि बदले में केवल प्रतिबंधों में राहत और कुछ आर्थिक सहयोग का वादा किया जा रहा है। यह सौदा ईरान के लिए असंतुलित प्रतीत होता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी तरफ, ईरान की शर्तें भी कम कठोर नहीं हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की मांग इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। यदि इस पर किसी एक देश का प्रभुत्व मान लिया जाए, तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ईरान की यह मांग कई देशों के लिए स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की मांग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। किसी भी युद्ध में नागरिकों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान होता है, और अंतरराष्ट्रीय कानून भी यह मानता है कि आक्रामक पक्ष को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन यहां समस्या यह है कि दोनों पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को आक्रामक बताते हैं। ऐसे में मुआवजे का निर्धारण एक जटिल और विवादास्पद प्रक्रिया बन जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की यह शर्त कि भविष्य में उस पर फिर से युद्ध न थोपा जाए, सैद्धांतिक रूप से उचित लगती है। हर देश अपनी सुरक्षा और स्थिरता चाहता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी गारंटी देना लगभग असंभव होता है। इतिहास गवाह है कि समझौतों और संधियों के बावजूद युद्ध होते रहे हैं। इसलिए यह मांग व्यावहारिक कम और आदर्शवादी अधिक प्रतीत होती है।इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—विश्व राजनीति का शक्ति संतुलन। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने और अपने सहयोगियों के हितों की रक्षा करे। वहीं ईरान जैसे देश के लिए अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि दोनों पक्षों की शर्तें अपने-अपने दृष्टिकोण से सही लगती हैं, लेकिन एक-दूसरे के लिए अस्वीकार्य बन जाती हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो दोनों पक्षों की शर्तों में कुछ उचित तत्व हैं और कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण भी। अमेरिका की यह मांग कि ईरान अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे, एकतरफा दबाव की तरह दिखती है। वहीं ईरान की यह जिद कि उसे होर्मुज पर पूर्ण अधिकार दिया जाए, वैश्विक संतुलन के लिए खतरा बन सकती है। इसी तरह मुआवजे और भविष्य में युद्ध न होने की गारंटी जैसी शर्तें नैतिक रूप से सही होते हुए भी व्यावहारिक कठिनाइयों से भरी हैं।</div><div style="text-align:justify;">वास्तविक समाधान इन चरम स्थितियों के बीच कहीं छिपा हुआ है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> किसी भी स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष कुछ समझौते करें। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे पारदर्शी और सीमित करने पर सहमत हो सकता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी उसे सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की ठोस गारंटी दे सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए बहुपक्षीय नियंत्रण या अंतरराष्ट्रीय निगरानी एक बेहतर विकल्प हो सकता है, जिससे किसी एक देश का प्रभुत्व स्थापित न हो।</div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि युद्धविराम की वर्तमान शर्तें न पूरी तरह सही हैं और न पूरी तरह गलत। वे दोनों पक्षों की रणनीतिक सोच और राष्ट्रीय हितों का प्रतिबिंब हैं। लेकिन यदि इन शर्तों पर जिद बनी रही, तो शांति की संभावना कमजोर होती जाएगी। इतिहास यही सिखाता है कि युद्ध का अंत केवल शक्ति से नहीं, बल्कि समझदारी और संतुलित समझौतों से होता है। पश्चिम एशिया में स्थायी शांति तभी संभव है जब दोनों पक्ष अपने अधिकतम लाभ के बजाय साझा हितों को प्राथमिकता दें।</div><div style="text-align:justify;">*कांतिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 19:01:47 +0530</pubDate>
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                <title>पश्चिम एशिया संकट के बीच एकजुट हुए 22 देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>पश्चिम एशिया संकट के बीच दुनिया के 22 देशों ने मिलकर ईरान से अपील की है कि वह अपने हमले तुरंत बंद करे और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल दे। इन देशों में यूएई, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी,  जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया समेत कई बड़े देश शामिल हैं। इन सभी ने एक संयुक्त बयान जारी करके ईरान की कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। इन देशों का कहना है कि ईरान ने हाल ही में बिना हथियार वाले व्यापारिक जहाजों पर हमले किए, तेल और गैस से जुड़ी महत्वपूर्ण सुविधाओं को निशाना बनाया और होर्मुज जलडमरूमध्य को</p>
<p style="text-align:justify;">एक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173881/22-countries-united-amid-west-asia-crisis"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/48.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>पश्चिम एशिया संकट के बीच दुनिया के 22 देशों ने मिलकर ईरान से अपील की है कि वह अपने हमले तुरंत बंद करे और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल दे। इन देशों में यूएई, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया समेत कई बड़े देश शामिल हैं। इन सभी ने एक संयुक्त बयान जारी करके ईरान की कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। इन देशों का कहना है कि ईरान ने हाल ही में बिना हथियार वाले व्यापारिक जहाजों पर हमले किए, तेल और गैस से जुड़ी महत्वपूर्ण सुविधाओं को निशाना बनाया और होर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग बंद कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक संयुक्त बयान में देशों ने कहा कि समुद्र में जहाजों की आवाजाही की आजादी अंतरराष्ट्रीय कानून का अहम हिस्सा है। ईरान की इन हरकतों का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, खासकर गरीब और कमजोर देशों को इसका सबसे ज्यादा नुकसान होगा। जिन 22 देशों ने यह पत्र लिखा है- उसमें संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, लातविया, स्लोवेनिया, एस्टोनिया, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, चेकिया, रोमानिया, बहरीन, लिथुआनिया और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का व्यापार होता है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था जब अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले किए थे, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की भी मौत हो गई थी। ईरान के नए सर्वोच्च नेता और अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई ने अपने पहले सार्वजनिक संदेश में कहा है कि ईरान अपने मारे गए लोगों का बदला जरूर लेगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद रखने की नीति जारी रहेगी और पड़ोसी देशों को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मेजबानी बंद करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में चल रहे इस संघर्ष में भारी जानमाल का नुकसान हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, ईरान में 1300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, लेबनान में 1000+ मौतें और लाखों लोग बेघर हुए हैं। वहीं इस्राइल में 15 लोगों की मौत हुई है और अमेरिका में 13 सैनिकों की मौत हुई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:52:03 +0530</pubDate>
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