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                <title>Indian judiciary news - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian judiciary news RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>'क्रूर, जाति-भेद': सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा कोर्ट की ज़मानत की शर्तों को गलत ठहराया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने दलित-आदिवासी आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ़ करने को कहा गया था   सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों को ज़मानत की शर्तें लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई, जिसके तहत दलित और आदिवासी समुदायों के आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ़ करने थे। इन निर्देशों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने शर्त को "बुरा" बताया और कहा कि यह जातिगत भेदभाव दिखाता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, "हम गहराई से निराश और हताश हैं, और जिस तरह से ओडिशा राज्य की न्यायपालिका वास्तव में ऐसी कठोर, अपमानजनक और अपमानजनक शर्तें लागू करके</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178181/cruel-caste-discrimination-supreme-court-finds-odisha-courts-bail-conditions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images-(3).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने दलित-आदिवासी आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ़ करने को कहा गया था   सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों को ज़मानत की शर्तें लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई, जिसके तहत दलित और आदिवासी समुदायों के आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ़ करने थे। इन निर्देशों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने शर्त को "बुरा" बताया और कहा कि यह जातिगत भेदभाव दिखाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, "हम गहराई से निराश और हताश हैं, और जिस तरह से ओडिशा राज्य की न्यायपालिका वास्तव में ऐसी कठोर, अपमानजनक और अपमानजनक शर्तें लागू करके औपनिवेशिक मानसिकता की ओर लौट गई है, जो मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन हैं, उस पर अपनी कड़ी अस्वीकृति व्यक्त करते हैं। ऐसी शर्तें न्याय के कारण को आगे बढ़ाने के बजाय, अभियुक्त की गरिमा पर प्रहार करती हैं, और अपराध के आधार पर आगे बढ़ती हैं, जो कानून में पूरी तरह से अनुचित है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायालय ने जमानत की शर्तों को "शून्य और अमान्य" घोषित कर दिया। न्यायालय ने सभी न्यायालयों को भविष्य के किसी भी आदेश में ऐसी जमानत शर्त नहीं लगाने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, "हमारा मानना है कि किसी भी दूसरे राज्य की ज्यूडिशियरी को भी ऐसी जाति-भेद वाली और दबाने वाली शर्तें नहीं लगानी चाहिए, जिनसे गंभीर सामाजिक टकराव पैदा होने की संभावना हो।" साथ ही, कोर्ट ने आदेश की एक कॉपी देश भर के सभी हाई कोर्ट में भेजने का निर्देश दिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसी बुरी स्थितियों से ऐसा लगता है कि राज्य की ज्यूडिशियरी जाति-भेद करती है, क्योंकि आरोपी पिछड़े समुदाय से थे। न्यायालय ने कहा, "रिपोर्ट में कुछ दम प्रतीत होता है कि राज्य न्यायपालिका द्वारा ऐसे मामलों में कोई भी शर्तें नहीं लगाई जा रही हैं जहां आरोपी समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों से हैं।  यह मानते हुए कि ऐसी शर्तें अनजाने में या किसी पूर्व नियोजित पूर्वाग्रह के बिना लगाई गई थीं, शर्तों की प्रकृति इतनी घृणित, क्रूर, अपमानजनक और कानून के लिए अज्ञात है, कि यह सुझाव देते हुए एक गंभीर आक्षेप लगाने की क्षमता है कि ओडिशा न्यायपालिका जाति-आधारित पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।" </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 22:04:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पवन खेड़ा की सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मंजूर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, उसे आसानी से खतरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया कि अपराध शाखा थाना प्रकरण संख्या 04/2026 में गिरफ्तारी की स्थिति में पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">30 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177867/pawan-khedas-anticipatory-bail-approved-by-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/pawan-khera-3.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, उसे आसानी से खतरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया कि अपराध शाखा थाना प्रकरण संख्या 04/2026 में गिरफ्तारी की स्थिति में पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">30 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने यह भी माना कि दोनों पक्षों, पवन खेड़ा और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा की ओर से आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए हैं, लेकिन इससे किसी की आजादी से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, पवन खेड़ा के खिलाफ यह मामला रिंकी भुइयां सरमा से जुड़े बयान को लेकर दर्ज किया गया था। पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि उनके पास एक से अधिक पासपोर्ट हैं और विदेशों में संपत्तियां हैं। इसी बयान के आधार पर उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था, जिसके बाद उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत देते हुए कई शर्तें भी तय की हैं। पवन खेड़ा को जांच में पूरा सहयोग करना होगा और पुलिस द्वारा बुलाए जाने पर उपस्थित होना पड़ेगा। उन्हें साक्ष्यों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं होगी और बिना सक्षम न्यायालय की अनुमति के देश से बाहर नहीं जा सकेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि निचली अदालत जरूरत के अनुसार अतिरिक्त शर्तें लागू कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत पर विचार करते समय जिन दस्तावेजों और तथ्यों का उल्लेख किया गया है, उनका मामले के अंतिम निर्णय से कोई संबंध नहीं होगा और निचली अदालत इन टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार, आगे की कार्रवाई करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले पवन खेड़ा ने असम की निचली अदालत और गुवाहाटी उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन उन्हें वहां से राहत नहीं मिली थी। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इससे पहले तेलंगाना उच्च न्यायालय ने उन्हें एक हफ्ते की अंतरिम जमानत दी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाते हुए उन्हें अग्रिम जमानत के लिए गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 22:44:34 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>9 साल हिरासत में रहने के बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नहीं दी जमानत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हत्या के आरोपी को ज़मानत दी, जिसने हत्या के मामले में विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में लगभग नौ साल बिताए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के 'जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार' को समझने में नाकाम रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ज़मानत न देने के आदेश पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की। बेंच ने इस मामले को "बहुत चौंकाने वाला" और विवादित आदेश को "बहुत निराशाजनक" बताया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल खत्म हुए</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177861/allahabad-high-court-did-not-grant-bail-despite-being-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images-(3)3.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हत्या के आरोपी को ज़मानत दी, जिसने हत्या के मामले में विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में लगभग नौ साल बिताए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के 'जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार' को समझने में नाकाम रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ज़मानत न देने के आदेश पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की। बेंच ने इस मामले को "बहुत चौंकाने वाला" और विवादित आदेश को "बहुत निराशाजनक" बताया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल खत्म हुए बिना याचिकाकर्ता को इतने लंबे समय तक जेल में रखना, 'जल्द सुनवाई के अधिकार' का घोर उल्लंघन है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पहली बार नहीं है जब जस्टिस पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच ने ज़मानत के मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट की आलोचना की। हाल ही में, बेंच की ऐसी ही एक आलोचना के बाद हाईकोर्ट के जज ने अनुरोध किया था कि उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों की लिस्ट (रोस्टर) से हटा दिया जाए। पिछले साल, जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने निर्देश दिया था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक और जज को आपराधिक मामलों की लिस्ट से हटा दिया जाए। इस आदेश को बाद में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के अनुरोध पर वापस ले लिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता वैभव सिंह को 7 मार्च, 2017 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर गोरखपुर के कैंट पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149, 120-B और 302 के तहत अपराधों का आरोप है। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और मामला सेशंस कोर्ट को सौंप दिया गया, जहां ट्रायल अभी भी चल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबे समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता लगभग नौ सालों से एक विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में बंद है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले में गलती पाई, जिसमें उसने ट्रायल शुरू होने के बाद ज़मानत न देने के लिए 'X बनाम राजस्थान राज्य' (2024 INSC 909) मामले के पिछले फैसले का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि एक बार ट्रायल शुरू हो जाने के बाद आम तौर पर ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए और उस चरण में सबूतों में मौजूद कमियों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने माना कि हाई कोर्ट, जिस फैसले का हवाला दिया गया, उसका असली मतलब समझने में नाकाम रहा और उसने याचिकाकर्ता के लगातार जेल में रहने की मुख्य बात को नज़रअंदाज़ किया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि हाईकोर्ट को हिरासत की अवधि और जल्द सुनवाई के संवैधानिक आदेश पर विचार करना चाहिए था। कानून के स्थापित सिद्धांतों पर ज़ोर देते हुए बेंच ने दोहराया कि सिर्फ़ अपराध की गंभीरता के आधार पर किसी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब मुक़दमे में बेवजह देरी हो रही हो।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, “अपने कई फ़ैसलों में और कई मौकों पर हमने साफ़ शब्दों में कहा है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, लेकिन अगर आरोपी को जल्द सुनवाई का उसका अधिकार नहीं मिलता है और वह अपनी किसी भी गलती के बिना सालों से जेल में सड़ रहा है तो उसे अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला ऐसी स्थिति दिखाता है, जहां अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन साफ़ तौर पर रिकॉर्ड में दिख रहा था। इसलिए राहत देने से पहले राज्य के जवाब का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">तदनुसार, कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तुरंत ज़मानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते उस पर ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तें लागू होंगी। साथ ही अगर किसी अन्य मामले में उसकी ज़रूरत न हो</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 22:39:01 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बॉम्बे हाईकोर्ट ने खीझ कर 90 साल के बुजुर्ग के अवमानना केस की तारीख़ लगा दी साल 2046 की</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बॉम्बे कोर्ट ने 90 साल के एक बुजुर्ग को अगली तारीख़ साल 2046 की लगा दी है। यानी 20 साल बाद की। अगली तारीख़ आने तक क्या बुजुर्ग अदालत जाने की स्थिति में होंगी? दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला खीझकर दिया है। एक बुजुर्ग महिला द्वारा दायर 9 साल पुराने मानहानि के केस में यह बेहद असामान्य और सख्त फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने इस मामले को 2046 तक के लिए इसलिए टाल दिया क्योंकि कोर्ट को लगा कि यह केस दो बुजुर्गों के बीच अहंकार की लड़ाई है, जिसकी वजह से कोर्ट का बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177591/bombay-high-court-angrily-dates-the-contempt-case-of-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/bombay-highcourt_1713880877.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बॉम्बे कोर्ट ने 90 साल के एक बुजुर्ग को अगली तारीख़ साल 2046 की लगा दी है। यानी 20 साल बाद की। अगली तारीख़ आने तक क्या बुजुर्ग अदालत जाने की स्थिति में होंगी? दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला खीझकर दिया है। एक बुजुर्ग महिला द्वारा दायर 9 साल पुराने मानहानि के केस में यह बेहद असामान्य और सख्त फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने इस मामले को 2046 तक के लिए इसलिए टाल दिया क्योंकि कोर्ट को लगा कि यह केस दो बुजुर्गों के बीच अहंकार की लड़ाई है, जिसकी वजह से कोर्ट का बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा है। इसलिए इस मामले को अगले 20 साल तक नहीं सुना जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने 28 अप्रैल 2026 को दिए गए आदेश में साफ़ लिखा, 'यह उन मामलों में से एक है जिसमें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पार्टियों के बीच अहंकार की लड़ाई कोर्ट सिस्टम को जाम कर रही है। इससे उन अहम मामलों को सुनने का मौका नहीं मिल पाता जो वाकई प्राथमिकता के हैं।'</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता सीनियर सिटीजन या सुपर सीनियर सिटीजन हैं, इसलिए भी इस मामले को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। आदेश में साफ़ तौर पर लिखा गया, 'इस मामले को 2046 के बाद सूचीबद्ध किया जाए। किसी भी स्थिति में इसे सीनियर सिटीजन होने के आधार पर प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। यह साफ़ तौर पर कहा जाता है कि 2046 से पहले इस मामले को कभी भी सुनवाई के लिए नहीं लिया जाएगा।'</p>
<p style="text-align:justify;">यह विवाद श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में 2015 के वार्षिक आम बैठक से शुरू हुआ। सोसाइटी ने दो महिलाओं- लगभग 90 वर्षीय तारिणीबेन देसाई और दूसरी महिला- को सोसाइटी से निकालने का प्रस्ताव पास किया था। इन महिलाओं ने सोसाइटी के नोटिस, पत्र और प्रस्ताव को मानहानिकारक बताते हुए 2017 में कोर्ट में मुक़दमा दायर किया और 20 करोड़ रुपये का मुआवजा मांगा। उनका आरोप था कि इन पत्रों की वजह से उन्हें मानसिक परेशानी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पहले कई बार समझौता कराने की कोशिश की। एक बार तो कहा गया कि अगर सोसाइटी बिना शर्त माफी मांग ले तो मामला सुलझ सकता है, लेकिन 90 वर्षीय तारिणीबेन देसाई माफी स्वीकार करने को तैयार नहीं हुईं और केस आगे बढ़ाने पर अड़ी रहीं। 27 मार्च 2025 को जब मामला सुनवाई के लिए आया तो न तो महिलाएं कोर्ट में आईं और न ही उनके वकील। कोर्ट ने सख्त चेतावनी दी थी। अब 28 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने पूरे मामले को 20 साल के लिए फ्रीज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा, 'मैं इस मामले पर और कुछ नहीं कहना चाहता, बस अगले 20 साल तक इसे न उठाया जाए।'</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट का मानना है कि छोटे-छोटे अहंकार और व्यक्तिगत झगड़ों के कारण कोर्ट का समय उन गंभीर मामलों से छीन लिया जाता है, जिनमें आम लोगों की जान-माल, संपत्ति या अधिकारों से जुड़े बड़े मुद्दे होते हैं। यह फैसला कोर्ट की बढ़ती खीझ का नतीजा बताया जा रहा है, जहां छोटे-मोटे झगड़ों में सालों-साल तक समय बर्बाद होता रहता है। यह ख़बर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है। कई लोग कोर्ट के इस फैसले की तारीफ़ कर रहे हैं, तो कुछ इसे बहुत सख्त बता रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:49:35 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए देश में पहले से मौजूद कानून पर्याप्त हैं और किसी विधायी खालीपन की स्थिति नहीं है, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के अनुसार न्यायपालिका अपनी सीमा में रहकर ही काम कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक साफ किया है कि किसी भी अपराध के लिए सजा का निर्धारण करना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने दोहराया कि यह अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास सुरक्षित है।शक्तियों के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177589/supreme-court-refuses-to-issue-guidelines-regarding-hate-speech"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supream-court5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए देश में पहले से मौजूद कानून पर्याप्त हैं और किसी विधायी खालीपन की स्थिति नहीं है, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के अनुसार न्यायपालिका अपनी सीमा में रहकर ही काम कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक साफ किया है कि किसी भी अपराध के लिए सजा का निर्धारण करना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने दोहराया कि यह अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास सुरक्षित है।शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था न्यायपालिका को नए अपराध बनाने या न्यायिक निर्देशों के ज़रिए आपराधिक दायित्व का दायरा बढ़ाने की इजाज़त नहीं देती।" ज़्यादा-से-ज़्यादा कोर्ट सिर्फ़ सुधारों की ज़रूरत के बारे में विधायिका और कार्यपालिका का ध्यान खींच सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा "यह दलील कि हेट स्पीच का क्षेत्र कानूनी तौर पर खाली है, गलत है। मौजूदा आपराधिक कानून का ढांचा—जिसमें IPC के प्रावधान और उससे जुड़े कानून शामिल हैं—उन कामों से निपटने के लिए पर्याप्त है, जो दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं, या सार्वजनिक शांति भंग करते हैं। इसलिए यह क्षेत्र खाली नहीं है।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत कानून की कमी से नहीं, बल्कि उसके लागू होने में कमी से है। हालांकि, ऐसी चिंताओं के आधार पर न्यायपालिका द्वारा कानून बनाना सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करने का प्रावधान करती है, और पुलिस की लापरवाही के मामले में मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत करने का उपाय भी देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने में सक्षम हैं। इसलिए इस मुद्दे पर अलग से कोई न्यायिक दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए निर्देश दे सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं और न ही विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी तरह की नई नीति या कानून की आवश्यकता महसूस होती है, तो इस पर निर्णय लेना पूरी तरह विधायी प्राधिकरणों का काम है। अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय संविधान शक्ति विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की अलग-अलग भूमिकाएं निर्धारित हैं। इन्हीं सीमाओं के भीतर सभी संस्थाओं को कार्य करना होता है। अदालत ने लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें संभावित सुधारों का सुझाव दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी कहा: "हालांकि, हम मांगी गई गाइडलाइंस जारी करने से इनकार करते हैं, लेकिन हम यह कहना उचित समझते हैं कि हेट स्पीच और अफ़वाह फैलाने से जुड़े मुद्दे सीधे तौर पर भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने से जुड़े हैं। केंद्र और राज्यों के लिए यह खुला है कि वे अपनी समझ से विचार करें कि बदलते सामाजिक बदलावों और चुनौतियों को देखते हुए क्या और कानूनी कदम उठाने की ज़रूरत है, या 23 मार्च 2017 की विधि आयोग की रिपोर्ट 267 में सुझाए गए अनुसार उचित संशोधन किए जाएं।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:44:43 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>डीएनए टेस्ट में पिता न होने पर भरण-पोषण नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मां की अपील खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177023/no-maintenance-if-father-is-not-found-in-dna-test"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/untitled-design-2026-04-22t211803.878.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के लिए अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।  सुनवाई के दौरान पति की मांग पर डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसमें यह सामने आया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया, जिसे अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः कानून के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है, लेकिन जब डीएनए टेस्ट जैसी वैज्ञानिक जांच से पितृत्व स्पष्ट रूप से खारिज हो जाए और उस रिपोर्ट को चुनौती भी न दी गई हो, तो ऐसे साक्ष्य को प्राथमिकता दी जाएगी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, कोर्ट ने बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि वह बच्चे की स्थिति—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण—का आकलन करे और आवश्यक होने पर सहायता सुनिश्चित करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामलों में जैविक संबंध महत्वपूर्ण है और वैज्ञानिक साक्ष्य के सामने पारंपरिक कानूनी धारणा टिक नहीं सकती। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:14:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>केजरीवाल के मामले की सुनवाई से नहीं हटेंगी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा, याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों द्वारा दायर उन अर्जियों को खारिज किया, जिनमें शराब नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के हटने की मांग की गई थी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने टिप्पणी की कि सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं, यह नहीं माना जा सकता कि उनके मन में केजरीवाल के प्रति कोई पूर्वाग्रह है। जज ने आगे कहा कि किसी राजनेता को न्यायिक क्षमता का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">"किसी जज की क्षमता का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176875/justice-swarn-kanta-sharma-will-not-step-down-from-hearing"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/8_ksmehxhheaxmtkhltt3kd3nwetc_5xbg8chcgjn4c-qtv9ooxcauzxfdbpowwmm8vza5nykvw9oewz-9pgfydn3kakseyxvkzexyucwqksrh16hx436jbj3asqn9e_8vskoyva2mjouj2pj1tkwzeybjnndvictmapms_d219ddxmhlp3ocjbubelxd_qz.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों द्वारा दायर उन अर्जियों को खारिज किया, जिनमें शराब नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के हटने की मांग की गई थी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने टिप्पणी की कि सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं, यह नहीं माना जा सकता कि उनके मन में केजरीवाल के प्रति कोई पूर्वाग्रह है। जज ने आगे कहा कि किसी राजनेता को न्यायिक क्षमता का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">"किसी जज की क्षमता का फैसला हाईकोर्ट करता है, न कि कोई वादी... किसी राजनेता को अपनी सीमा पार करने और न्यायिक क्षमता का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती... हो सकता है कि कोई वादी हमेशा सफल न हो, और केवल हाईकोर्ट ही यह तय कर सकता है कि कोई फैसला गलत है या एकतरफा। जिला कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट सही ठहरा सकता है। यही बात हाईकोर्ट पर भी लागू होती है, जिसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट देखता है। वादी की यह सामान्य आशंका कि शायद यह अदालत उसे राहत न दे, जज पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाने का आधार नहीं बन सकती।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस शर्मा ने आगे कहा कि आरोपों का सामना होने पर कोई जज अपनी न्यायिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।  इस तरह का खतरा न केवल हाईकोर्टस् तक पहुंचेगा, बल्कि जिला कोर्ट तक भी जाएगा... अगर यह अदालत सुनवाई से हटने का फैसला सुनाकर यह संदेश देती है कि किसी वादी के दबाव में आकर वह ऐसा कर सकती है तो इससे जनता के मन में यह धारणा बन जाएगी कि जज किसी राजनीतिक दल के पक्ष में काम करते हैं..."</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जज ने आगे कहा कि सुनवाई से हटने की अर्जियों में जो "कहानी" गढ़ी गई, वह पूरी तरह से "अटकलों" पर आधारित पाई गई। इसके अलावा, सुनवाई से हटने की अर्जी के साथ कोई सबूत पेश नहीं किया गया, बल्कि उसमें जज की ईमानदारी और निष्पक्षता पर "आक्षेप, इशारे और संदेह" ही व्यक्त किए गए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "अगर मैं इन अर्जियों को मान लेती तो इससे एक परेशान करने वाली मिसाल कायम हो जाती। अब यह मेरा पक्का फ़र्ज़ बन जाता है कि मैं इसका बेखौफ़ होकर जवाब दूं। बदकिस्मती से आज मुझे दो मुक़दमेबाज़ों के बीच का झगड़ा नहीं, बल्कि एक मुक़दमेबाज़ और मेरे—एक जज—के बीच का झगड़ा सुलझाना है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 21:05:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कुंभ मेले से मशहूर हुई मोनालिसा, उनके पति फरमान ने कम उम्र मे शादी के दावे को नकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कुंभ मेले से मशहूर हुई मोनालिसा भोसले के पति मोहम्मद फरमान खान को एक अपहरण के मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है। यह मामला कथित तौर पर इस आरोप के आधार पर दर्ज किया गया था कि भोसले नाबालिग हैं और फरमान ने उनका अपहरण किया था [मोहम्मद फरमान और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य]।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने कोर्ट में दायर एक याचिका में, इस जोड़े ने कहा कि भोसले इस साल जनवरी में 18 साल की हो गईं और जब उन्होंने मार्च में फरमान से शादी की, तब</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176400/monalisa-became-famous-through-kumbh-mela-her-husband-farman-denied"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/monalisa-husband.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कुंभ मेले से मशहूर हुई मोनालिसा भोसले के पति मोहम्मद फरमान खान को एक अपहरण के मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है। यह मामला कथित तौर पर इस आरोप के आधार पर दर्ज किया गया था कि भोसले नाबालिग हैं और फरमान ने उनका अपहरण किया था [मोहम्मद फरमान और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य]।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने कोर्ट में दायर एक याचिका में, इस जोड़े ने कहा कि भोसले इस साल जनवरी में 18 साल की हो गईं और जब उन्होंने मार्च में फरमान से शादी की, तब वह बालिग थीं।इसलिए, उन्होंने अपनी शादी को लेकर दर्ज किसी भी मामले में अग्रिम ज़मानत मांगी।उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा मांगी, क्योंकि उन्हें डर था कि मध्य प्रदेश में भोसले के पिता की शिकायत पर कथित तौर पर दर्ज अपहरण के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">23 मार्च को, जस्टिस कौसर एडापगाथ ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया। उन्होंने पाया कि उनकी शादी के समर्थन में दस्तावेज़ मौजूद थे और यह बात भी सामने आई थी कि यह जोड़ा अब पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "Annexure AIII से पता चलता है कि याचिकाकर्ताओं ने 11.03.2026 को शादी की थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे अब पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहे हैं। इन परिस्थितियों में, अगली सुनवाई की तारीख तक याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार न करने का आदेश दिया जाता है।8 अप्रैल को, कोर्ट ने गिरफ्तारी से मिली इस सुरक्षा को 20 मई तक बढ़ा दिया, जब इस मामले की अगली सुनवाई होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह अंतरिम आदेश सीनियर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की इस बात को ध्यान में रखते हुए पारित किया कि मध्य प्रदेश (MP) पुलिस से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोनालिसा भोसले पिछले साल 2025 के कुंभ मेले में मोतियों की माला बेचते हुए अपने वीडियो वायरल होने के बाद अपनी आकर्षक खूबसूरती के कारण मशहूर हो गईं।उन्होंने 11 मार्च को केरल में फरमान से शादी की। इस शादी की मीडिया में खूब चर्चा हुई। इस जोड़े ने बताया कि वे एक मलयालम फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मिले थे और शादी करने से पहले उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">हालाँकि, उनकी अलग-अलग धर्मों की इस शादी पर विवाद खड़ा हो गया। कुछ लोगों ने दावा किया कि मोनालिसा की उम्र सिर्फ़ 16 साल है और इसलिए, उन्होंने शादी करने की कानूनी उम्र पूरी नहीं की है। गिरफ़्तारी की आशंका को देखते हुए, इस जोड़े ने मिलकर केरल हाईकोर्ट में अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी दी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 20:50:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत पर लगाई रोक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को तेलंगाना हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत के फैसले पर रोक लगा दी है। यह मामला असम पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा ने यह एफआईआर दर्ज कराई थी।पवन खेड़ा ने 5 अप्रैल को रिंकी भुइयां सरमा पर तीन आलग-अलग देशों का पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया था।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर की बेंच ने पवन खेड़ा और अन्य लोगों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176303/supreme-court-bans-anticipatory-bail-of-pawan-kheda"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/114185-pawan-khera-supreme-court.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को तेलंगाना हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत के फैसले पर रोक लगा दी है। यह मामला असम पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा ने यह एफआईआर दर्ज कराई थी।पवन खेड़ा ने 5 अप्रैल को रिंकी भुइयां सरमा पर तीन आलग-अलग देशों का पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर की बेंच ने पवन खेड़ा और अन्य लोगों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होगी।सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ असम सरकार द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया।असम सरकार की ओर से पेश होते हुए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि पवन खेड़ा की याचिका में इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि तेलंगाना में यह अधिकार क्षेत्र कैसे बनता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तुषार मेहता ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर गया कि इनमें से एक अपराध के लिए अधिकतम 10 साल की जेल की सजा का प्रावधान है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान पवन खेड़ा की तरफ से पेश किए गए नोट में बताया गया था कि उनकी पत्नी हैदराबाद में रहती हैं। लेकिन सॉलिसिटर जनरल ने इसके खिलाफ दलील दी कि उनकी पत्नी के आधार कार्ड में उन्हें दिल्ली का निवासी दिखाया गया है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अगर ऐसा है, तो कोई भी व्यक्ति पूरे देश में कहीं भी प्रॉपर्टी खरीद सकता है और अपनी पसंद की जगह से अग्रिम जमानत मांग सकता है। उन्होंने कहा कि यह 'फोरम-शॉपिंग' है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रिया इंदोरिया' मामले में अपने फैसले में ऐसी हरकतों को गलत ठहराया था।सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह प्रक्रिया का पूरी तरह से दुरुपयोग है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि वह असम क्यों नहीं जा सकते।  सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि याचिका में उन्होंने यह भी नहीं कहा है कि उनकी पत्नी की हैदराबाद में कोई संपत्ति है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश से हैरान हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पवन खेड़ा ने अग्रिम जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए एक अर्जी दाखिल की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">10 अप्रैल को तेलंगाना हाई कोर्ट ने पवन खेड़ा को कुछ शर्तों के साथ एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। पवन खेड़ा के खिलाफ केस गुवाहाटी क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। यह एफआईआर पवन खेड़ा की 5 अप्रैल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों के आधार पर दर्ज की गई थी। पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया था कि सीएम हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई पासपोर्ट हैं। साथ ही विदेशों में उनकी प्रॉपर्टी है। सीएम हिमंत ने चुनावी हलफनामे में इन तथ्यों के बारे में जानकारी नहीं दी है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 21:23:02 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मामलों के लंबित रहने के लिए केवल न्यायाधीशों को दोष न दें: न्यायमूर्ति अमानुल्लाह</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175923/dont-blame-judges-alone-for-pendency-of-cases-justice-amanullah"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supreme-court-judge.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को भी आत्ममंथन करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि लंबी-लंबी बहसें करना और बार-बार तारीख लेना जैसी आदतें मामलों के निपटारे में देरी का कारण बनती हैं, इसलिए इन पर विचार कर सुधार करना जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता’ विषय पर आईसीए के पांचवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि न्यायाधीश पहले से ही प्रतिदिन बहुत बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘निचली अदालत के स्तर पर, किसी भी न्यायाधीश के पास प्रतिदिन 400-500 से कम मामलों की सूची नहीं होती है। उच्च न्यायालयों में यह संख्या और भी अधिक है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हालांकि न्यायाधीशों को तय घंटों के लिए अदालत में बैठना और उनके सामने सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई करना अनिवार्य है, लेकिन वे वकीलों द्वारा की गई बहस के समय को हमेशा कम नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि हालांकि न्यायाधीश कभी-कभी वकीलों को अपनी दलीलों को दोहराने से रोक सकते हैं, लेकिन वे उन्हें अपना मामला पूरी तरह से प्रस्तुत करने की अनुमति देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:42:38 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बच्चों की तस्करी को हल्के में न लें, पूरे देश में गिरोह सक्रिय हैं: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि वे बच्चों की तस्करी को हल्के में न लें। साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि यह मुद्दा कानून-व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चिंताओं वाला है और इस पर राज्य के अधिकारियों के स्तर पर तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा, "कृपया इस मुद्दे को बहुत-बहुत गंभीरता से लें। बच्चों की तस्करी बेकाबू हो चुकी है। पूरे देश में गिरोह सक्रिय हैं। अगर आप सभी इस पर ध्यान नहीं देंगे तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। इस मामले में केवल राज्य सरकार और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175791/dont-take-child-trafficking-lightly-gangs-are-active-across-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि वे बच्चों की तस्करी को हल्के में न लें। साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि यह मुद्दा कानून-व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चिंताओं वाला है और इस पर राज्य के अधिकारियों के स्तर पर तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा, "कृपया इस मुद्दे को बहुत-बहुत गंभीरता से लें। बच्चों की तस्करी बेकाबू हो चुकी है। पूरे देश में गिरोह सक्रिय हैं। अगर आप सभी इस पर ध्यान नहीं देंगे तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। इस मामले में केवल राज्य सरकार और उसका गृह विभाग ही पूरी मुस्तैदी से कार्रवाई कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अदालत के तौर पर हम निगरानी कर सकते हैं, लेकिन आखिरकार कार्रवाई तो राज्य सरकार, पुलिस और अन्य एजेंसियों को ही करनी होगी। इसलिए यह हमारा विनम्र अनुरोध है।"</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने ऑनलाइन पेश हुए गृह सचिवों से बातचीत करते हुए कहा कि तस्करी के नेटवर्क पूरे देश में सक्रिय हैं। इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्य की मशीनरी को ही प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विश्वनाथन ने भी जस्टिस पारदीवाला की बात दोहराते हुए कहा, "यह बहुत ही गंभीर मामला है। हम रोज़ाना ऐसी रिपोर्टों में बढ़ोतरी देख रहे हैं। कभी-कभी हमें बच्चों को बचाए जाने की रिपोर्टें भी मिलती हैं। इसका मतलब है कि इस समस्या से निपटा जा सकता है। इसके लिए बस एक पक्के इरादे की ज़रूरत है। यह काम आप सभी को करना है, जो गृह विभाग के प्रमुख हैं। इसलिए कृपया इसे पूरी गंभीरता और लगन से करें। हम निगरानी करते रहेंगे और ज़रूरी निर्देश भी देंगे, लेकिन आखिरकार उन निर्देशों को लागू तो आपको ही अपने स्तर पर करना होगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बच्चों की तस्करी से निपटने के लिए 15 अप्रैल, 2025 को दिए गए अपने फैसले में जारी निर्देशों का पालन करने का आखिरी मौका दिया। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर उन्होंने निर्देशों के पालन की रिपोर्ट जमा नहीं की तो उन्हें "निर्देशों का पालन न करने वाले" (डिफॉल्टिंग) राज्यों की श्रेणी में रखा जाएगा। अदालत तस्करी के खिलाफ कानून को सख्ती से लागू करने के लिए कुछ खास संस्थागत उपाय करने के निर्देशों के पालन की निगरानी कर रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने 15 अप्रैल, 2025 को बच्चों की तस्करी से जुड़े एक मामले में आरोपी व्यक्तियों की ज़मानत रद्द कर दी थी। ऐसे अपराधों की समय-सीमा के भीतर जांच और सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश पर लागू होने वाले निर्देश जारी किए। कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया कि वे लंबित ट्रायल्स का डेटा इकट्ठा करें और छह महीने के अंदर, हो सके तो रोज़ाना के आधार पर, उन्हें पूरा करने के लिए सर्कुलर जारी करें, और इसकी रिपोर्ट दें कि निर्देशों का पालन हुआ है या नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने सभी राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे भारतीय इंस्टीट्यूट ऑफ़ रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BIRD) की 12 अप्रैल, 2023 की रिपोर्ट की सिफ़ारिशों को लागू करें। इन सिफ़ारिशों में लापता बच्चों के मामलों को तब तक मानव तस्करी का मामला मानना शामिल है, जब तक कि इसके विपरीत कुछ साबित न हो जाए। साथ ही मानव तस्करी विरोधी इकाइयों को मज़बूत करना, जांच के मानकों में सुधार करना और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी शामिल है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:46:07 +0530</pubDate>
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                <title>भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार होगी ईवीएम  की जांच, बॉम्बे हाई कोर्ट ने दी इजाजत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार बॉम्बे हाई कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की जांच और निरीक्षण की अनुमति दी है. यह आदेश जस्टिस सोमशेखर सुंदरेसन की ओर से दिया गया. इस मामले में याचिकाकर्ता कांग्रेस वर्किंग कमेटी के आमंत्रित सदस्य और पूर्व महाराष्ट्र मंत्री नसीम खान हैं, जबकि प्रतिवादी शिवसेना विधायक दिलीप लांडे हैं. 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दिलीप लांडे (एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना) ने मुंबई उपनगर जिले की चांदीवली सीट से नसीम खान को हराया था.</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव के बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ईवीएम में छेड़छाड़ और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175789/for-the-first-time-in-the-electoral-history-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/mumbai-4.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार बॉम्बे हाई कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की जांच और निरीक्षण की अनुमति दी है. यह आदेश जस्टिस सोमशेखर सुंदरेसन की ओर से दिया गया. इस मामले में याचिकाकर्ता कांग्रेस वर्किंग कमेटी के आमंत्रित सदस्य और पूर्व महाराष्ट्र मंत्री नसीम खान हैं, जबकि प्रतिवादी शिवसेना विधायक दिलीप लांडे हैं. 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दिलीप लांडे (एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना) ने मुंबई उपनगर जिले की चांदीवली सीट से नसीम खान को हराया था.</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव के बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ईवीएम में छेड़छाड़ और वोट चोरी के आरोप लगाए थे. अदालत के आदेश में कहा गया कि जैसे ही आवेदक की ओर से EVM जांच की अनुमति का आदेश जारी किया जाएगा, भारतीय चुनाव आयोग दो महीने के भीतर मशीनों का निरीक्षण पूरा करेगा. नसीम खान ने कहा कि भारत के इतिहास में अब तक चुनाव के बाद उम्मीदवारों और अधिकारियों की मौजूदगी में EVM की जांच नहीं हुई है. उन्होंने इसे “ऐतिहासिक आदेश और आवश्यक न्यायिक हस्तक्षेप” बताया.16 और 17 अप्रैल को मुंबई में 'डायग्नोस्टिक चेक' किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मुंबई उपनगर जिले की डिप्टी रिटर्निंग ऑफिसर अर्चना कदम ने जानकारी दी कि 16 और 17 अप्रैल को मुंबई में ईवीएम निर्माता भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बेंगलुरु) द्वारा केवल 'डायग्नोस्टिक चेक' किया जाएगा. कांग्रेस पार्टी ने अपने उम्मीदवारों से अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम और VVPAT (वोटर वेरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल) यूनिट्स की जांच की मांग करने को कहा था. दरअसल, कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया  गठबंधन के करीब दो दर्जन उम्मीदवारों ने ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर चिंता जताई थी.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2024 के फैसले का हवाला देते हुए नसीम खान ने कहा कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में 5% ईवीएम (कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और VVPAT) के “बर्न्ट मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर” की जांच चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ईवीएम निर्माता कंपनियों के इंजीनियरों की टीम द्वारा की जानी चाहिए.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:42:11 +0530</pubDate>
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