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                <title>legal news Hindi - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>'फॉर्च्युनर के लिए महिला की जान ले ली और  आरोपी पति को जमानत दे दी'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दहेज के लिए पत्नी की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध के आरोपी पति को जमानत देते वक्त हाईकोर्ट ने तथ्यों को पर गौर नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर जमानत दे दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में दहेज की वजह से शादीशुदा महिलाओं के साथ क्रूरता, हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178549/woman-killed-for-fortuner-and-accused-husband-granted-bail"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images245.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दहेज के लिए पत्नी की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध के आरोपी पति को जमानत देते वक्त हाईकोर्ट ने तथ्यों को पर गौर नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर जमानत दे दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में दहेज की वजह से शादीशुदा महिलाओं के साथ क्रूरता, हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि खासतौर पर ऐसे मामले उत्तर प्रदेश में देखे गए हैं. कोर्ट ने कहा कि 2023 के डेटा के अनुसार दुनियाभर में 6,156 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 2,122 उत्तर प्रदेश और 1,143 बिहार के हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, 'हमें यह देखकर अत्यंत दुख हुआ कि हाईकोर्ट ने दहेज हत्या जैसे संगीन अपराध में आरोपी को जमानत देते वक्त तथ्यों पर गौर नहीं किया. हमारा मानना है कि कोर्ट ने अभियुक्तों के पक्ष में अपने विवेक का प्रयोग करने में घोर त्रुटि की है.' कोर्ट ने कहा कि यह मामला महिलाओं के साथ दहेज को लेकर बढ़ती क्रूरता को दर्शाता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला साल 2024 का है, जब दहेज के लिए गाजियाबाद में एक महिला की हत्या कर दी गई थी. महिला की शादी फरवरी, 2019 में प्रिंस चौधरी नाम के शख्स से हुई थी. महिला के पिता ने एफआईआर में बताया कि उन्होंने शादी में 30 लाख रुपये खर्च किए, जिसमें एक आई20 कार और 10 लाख रुपये कैश शामिल हैं. कार एक एक्सीडेंट में डैमेज हो गई थी, जिसके बाद महिला का पति और ससुराल वाले एक फॉर्च्युनर कार और 10 लाख रुपये की डिमांड करने लगे.</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत के अनुसार जब ये मांग पूरी नहीं हुईं तो ससुरालवालों ने महिला का मारना शुरू कर दिया, उसको मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया. बाद में महिला के पिता ने 10 लाख रुपये की डिमांड पूरी कर दी. उन्होंने पति के रिश्तेदार के अकाउंट में 4 लाख रुपये ट्रांसफर किए और अलग-अलग मौकों पर 5 लाख रुपये कैश भी दिया. फिर भी ससुराल वाले महिला के साथ मारपीट करते रहे.</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत के अनुसार 11 जुलाई, 2024 को सुबह 7 बजे महिला ने रोते हुए पिता को फोन किया और बताया कि ससुराल में उसके साथ बहुत मारपीट हुई और उसको गला घोंटकर या फांसी लगाकर मारने की धमकी दी जा रही है. कुछ घंटे बाद महिला के घरवालों को एक रिश्तेदार ने फोन करके बताया कि उसको गला घोंटकर फांसी लगा दी गई है. जब महिला के पिता ससुराल पहुंचे तो वह वहां नहीं थी, उसको हॉस्पिटल ले जाया गया था, जहां पता चला कि वह मर चुकी है.</p>
<p style="text-align:justify;">हादसे के अगले ही दिन शिकायत दर्ज कर दी गई, जिसमें प्रिंस सहित 8 घरवालों को आरोपी बनाया गया. जांच के बाद प्रिंस और उसके माता पिता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और दहेज निषेध अधिनयम के तहत चार्जशीट दाखिल हुई.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:12:48 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाकर 38 करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> एक अहम घटनाक्रम में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को छोड़कर) से बढ़ाकर 38 (CJI को छोड़कर) करने के लिए एक बिल पेश करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। यह बिल 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन बिल, 2026', सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में ये संशोधन करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 33 (CJI को छोड़कर) की गई थी। यह प्रस्तावित कदम लंबित मामलों को देखते हुए उठाया जा रहा है। इस साल चार से ज़्यादा जजों के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178547/union-cabinet-approves-proposal-to-increase-the-number-of-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> एक अहम घटनाक्रम में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को छोड़कर) से बढ़ाकर 38 (CJI को छोड़कर) करने के लिए एक बिल पेश करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। यह बिल 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन बिल, 2026', सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में ये संशोधन करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 33 (CJI को छोड़कर) की गई थी। यह प्रस्तावित कदम लंबित मामलों को देखते हुए उठाया जा रहा है। इस साल चार से ज़्यादा जजों के रिटायर होने की संभावना को देखते हुए इस बिल को पेश करने से काम के बोझ में कुछ राहत मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:09:36 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>नाबालिग स्टूडेंट को बुर्का पहनाने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव के आरोपी स्टूडेंट को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद।हाईकोर्ट ने स्कूली स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी, जिस पर आरोप है कि उसने नाबालिग स्टूडेंट का कथित रूप से ब्रेनवॉश कर उसे बुर्का पहनने और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने आरोपी स्टूडेंट मालिश्का उर्फ मालिश्का फातमा को राहत देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान के अतिरिक्त रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्थापित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। FIR पीड़िता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178545/student-accused-of-forcing-minor-student-to-wear-burqa-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद।हाईकोर्ट ने स्कूली स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी, जिस पर आरोप है कि उसने नाबालिग स्टूडेंट का कथित रूप से ब्रेनवॉश कर उसे बुर्का पहनने और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने आरोपी स्टूडेंट मालिश्का उर्फ मालिश्का फातमा को राहत देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान के अतिरिक्त रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्थापित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। FIR पीड़िता के भाई ने दर्ज कराई। उसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी ने उसकी नाबालिग बहन का धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से उसका ब्रेनवॉश किया। यह भी कहा गया कि 20 दिसंबर 2025 को उसे जबरन बुर्का दिया गया और लगातार धर्म बदलने का दबाव बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि पीड़िता के बयान से स्पष्ट है कि उस पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला जा रहा था। FIR दर्ज करने में देरी के संबंध में यह दलील दी गई कि पीड़िता आरोपी के प्रभाव में थी, इसलिए जानकारी मिलने में समय लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं आरोपी की ओर से कहा गया कि वह पीड़िता से पहले से उसी विद्यालय में पढ़ रही थी और उसके खिलाफ किसी अन्य छात्रा को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने की कोई शिकायत नहीं है। अदालत को यह भी बताया गया कि मामले के मुख्य आरोप सह-अभियुक्त अलीना के खिलाफ हैं, जिसे हाईकोर्ट की समन्वय पीठ पहले ही अग्रिम जमानत दे चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने पाया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और पीड़िता के बयान के अलावा उसके खिलाफ अन्य स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही अदालत ने माना कि आरोपी के फरार होने की संभावना कम है तथा उसने जांच और ट्रायल में सहयोग का आश्वासन दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:07:09 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>तत्कालीन BJP MLA आरसी यादव के खिलाफ 2012 के दंगा मामले को वापस लेने की हाईकोर्ट ने दी अनुमति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश विधायक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178543/high-court-gives-permission-to-withdraw-2012-riots-case-against"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश विधायक यादव द्वारा दायर CrPC की धारा 482 के तहत याचिका और उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया। संक्षेप में मामला अभियोजन पक्ष के मूल मामले के अनुसार, 24 अक्टूबर, 2012 को मूर्तियां विसर्जन के लिए ले जा रहे कुछ ट्रैक्टरों के कारण रुदौली पुलिस स्टेशन के सामने ट्रैफिक जाम हो गया। हालांकि, पुलिस ने ड्राइवरों को आगे बढ़ने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने इसका पालन नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह दावा किया गया कि आवेदक उस समय स्थानीय विधायक थे। उन्होंने उन्हें निर्देश दिया था कि वे मूर्तियों को वहीं रोककर रखें, जब तक कि वह पुलिस स्टेशन के सामने न पहुंच जाएं। इसके कारण, घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई। इसके बाद जब विधायक यादव घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने पुलिस को बताया कि जब श्रद्धालु एक मस्जिद के पास से गुजर रहे थे, तो दूसरे समुदाय का एक लड़का गलती से रंग से सराबोर हो गया। कथित तौर पर इसके कारण गाली-गलौज और झगड़ा हुआ, जिसके दौरान एक मूर्ति भी टूट गई।</p>
<p style="text-align:justify;">एफआईआर  में आरोप लगाया गया कि आवेदक ने भड़काऊ बयान दिए। यह मांग की कि जुलूस आगे बढ़ने से पहले दोषियों को दंडित किया जाए। हालांकि, बाद में उनकी सलाह पर ट्रैक्टरों की आवाजाही शुरू हो गई, लेकिन तब तक गाँव में लगभग 2,000 से 3,000 लोग जमा हो चुके थे। इसके बाद आवेदक की कथित उकसाहट पर 250-300 लोग उस गाँव की ओर बढ़ने लगे, जहां दूसरे समुदाय के लोगों के साथ विवाद हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में, बेंच ने CrPC की धारा 321 के प्रावधानों के साथ-साथ इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों की जांच करते हुए पाया कि मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने के लिए अंतिम मार्गदर्शक विचार हमेशा न्याय प्रशासन का हित ही होना चाहिए। बंसी लाल बनाम चंदन लाल और शिवनंदन पासवान बनाम बिहार राज्य जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और किसी गलत मकसद से न्याय की सामान्य प्रक्रिया में दखल नहीं देना चाहिए। CrPC की धारा 482 के तहत अर्जी, मुकदमा वापस लेने की अर्जी, और साथ ही आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178543/high-court-gives-permission-to-withdraw-2012-riots-case-against</link>
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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:04:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वाराणसी कोर्ट ने PM मोदी पर X पोस्ट को लेकर मधु किश्वर के खिलाफ शिकायत पर पुलिस रिपोर्ट मांगी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>वाराणसी की एक कोर्ट में एक शिकायत दायर की गई है, जिसमें शिक्षाविद और लेखिका प्रो. मधु किश्वर के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य राजनीतिक नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। शिकायत के अनुसार, किश्वर ने कथित तौर पर X और अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर अपने वेरिफ़ाइड सोशल मीडिया अकाउंट का दुरुपयोग करके लगातार गुमराह करने वाला, झूठा, भड़काऊ और मानहानिकारक कंटेंट फैलाया।</p>
<p style="text-align:justify;">वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने शिकायत का संज्ञान लिया है, जिसमें पुलिस को निर्देश देने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175913/varanasi-court-seeks-police-report-on-complaint-against-madhu-kishwar"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/rahul-raises-questions-on-sir-says-cong-will-fight-it-politically-organisationally-legally-20260411t180304542jpg_1775910875079.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>वाराणसी की एक कोर्ट में एक शिकायत दायर की गई है, जिसमें शिक्षाविद और लेखिका प्रो. मधु किश्वर के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य राजनीतिक नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। शिकायत के अनुसार, किश्वर ने कथित तौर पर X और अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर अपने वेरिफ़ाइड सोशल मीडिया अकाउंट का दुरुपयोग करके लगातार गुमराह करने वाला, झूठा, भड़काऊ और मानहानिकारक कंटेंट फैलाया।</p>
<p style="text-align:justify;">वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने शिकायत का संज्ञान लिया है, जिसमें पुलिस को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह कथित तौर पर मानहानिकारक पोस्ट के लिए किश्वर के खिलाफ पहली सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करे। कोर्ट ने इस मामले को एक विविध मामले के तौर पर दर्ज किया है और इस मामले पर पुलिस से एक रिपोर्ट भी मांगी है।इस मामले में शिकायत भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लीगल सेल के संयोजक, वकील शशांक शेखर त्रिपाठी ने दायर की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत में विशेष रूप से आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों के खिलाफ किश्वर द्वारा किए गए कुछ पोस्ट बहुत ज़्यादा गुमराह करने वाले थे और उनका समाज पर व्यापक असर पड़ सकता था। आगे यह तर्क दिया गया कि चूंकि किश्वर एक वेरिफ़ाइड सोशल मीडिया अकाउंट चलाती हैं, इसलिए उनके बयानों को जनता द्वारा ज़्यादा विश्वसनीय माने जाने की संभावना है, जिससे उनका असर और गंभीरता बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत में यह भी कहा गया कि पहले किश्वर को कई कानूनी नोटिस जारी किए गए थे, जिसमें उनसे अपने दावों को साबित करने और कथित तौर पर आपत्तिजनक कंटेंट को बदलने या हटाने के लिए कहा गया था। हालांकि, उन्होंने कथित तौर पर कोई सहायक सामग्री पेश नहीं की और न ही कोई सुधार किया। यह तर्क दिया गया कि यह किश्वर की ओर से व्यवहार का एक दोहराया जाने वाला पैटर्न है, जिसका उद्देश्य समाज में भ्रम, असंतोष और कलह पैदा करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत में इस बात पर भी चिंता जताई गई कि ऐसा कंटेंट संस्थानों में जनता के विश्वास को कम कर सकता है, सांप्रदायिक सद्भाव को प्रभावित कर सकता है और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इसी आधार पर, तत्काल कानूनी हस्तक्षेप और FIR दर्ज करने की मांग की गई। इस मामले की सुनवाई कोर्ट 15 अप्रैल को करेगा, तब तक पुलिस से अपनी रिपोर्ट जमा करने की उम्मीद है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:24:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175787/allahabad-high-court-reprimands-the-man-who-falsely-accused-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। बेंच ने कहा कि अपनी ही पत्नी और बेटी के खिलाफ उसके दावे "पूरी तरह से झूठे" हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता "खुद को दूसरों से ज़्यादा पवित्र समझने की मानसिकता" (Holier-Than-Thou Syndrome) से ग्रस्त है और खुद को "समाज की सभी अनैतिकताओं के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा" समझता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका असल में पारिवारिक विवाद से जुड़ी थी। अपने ही परिवार पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाना पारिवारिक मामले को कोर्ट के सामने रखने का "सबसे घिनौना" तरीका है। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता द्वारा डिजिटल फॉर्मेट में दी गई कई वीडियो फाइलों और स्क्रीनशॉट की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए पुलिस ने उन्हें IIT कानपुर के C3iHub को सौंप दिया। हालांकि, IIT कानपुर की रिपोर्ट से पता चला कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई तस्वीरों और बरामद वीडियो में दिख रहे चेहरों में कोई मेल नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">फोरेंसिक जांच से यह भी पता चला कि बरामद मीडिया फाइलें लगभग 10-12 साल पुरानी थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि "उपलब्ध डिजिटल सबूत इस निष्कर्ष का समर्थन करते हैं कि पहचान गलत या भ्रामक तरीके से जोड़ी गई।"इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए बेंच ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की: "IIT कानपुर की उपरोक्त रिपोर्ट से हमें यह मानने का आधार मिलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने परिवार पर सेक्स रैकेट आदि में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप लगाए हैं, जिन्हें वेबसाइटों पर दिखाया गया, वे पूरी तरह से झूठे हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता लगातार अपने ही अहंकार में डूबा हुआ है। उसके परिवार पर सेक्स रैकेट में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप उसने लगाए, वे बेहद आपत्तिजनक हैं—जिनमें से कुछ तो रिकॉर्ड से हटाए जाने योग्य हैं अतः, इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि इन खोखले आरोपों के आधार पर पुलिस को किसी भी प्रकार के सेक्स रैकेट की जाँच करने का निर्देश जारी करने का कोई आधार नहीं है, याचिका खारिज कर दी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:38:30 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सेक्स के बाद ब्लैकमेल: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस को हनीट्रैप गैंग पर नकेल कसने का आदेश दिया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को उन गैंग के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जिन पर आरोप है कि वे पुरुषों को हनीट्रैप में फंसाकर उनसे पैसे ऐंठने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं [फौजिया और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य]।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की एक डिवीज़न बेंच ने कहा कि ऐसे मामले समाज में बहुत ही खतरनाक हालात को उजागर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "यह बहुत ही गंभीर मामला है," और उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति द्वारा हनीट्रैप का आरोप</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175050/blackmail-after-sex-allahabad-high-court-orders-police-to-crack"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1990383-allahabad-hc.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को उन गैंग के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जिन पर आरोप है कि वे पुरुषों को हनीट्रैप में फंसाकर उनसे पैसे ऐंठने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं [फौजिया और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य]।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की एक डिवीज़न बेंच ने कहा कि ऐसे मामले समाज में बहुत ही खतरनाक हालात को उजागर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "यह बहुत ही गंभीर मामला है," और उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति द्वारा हनीट्रैप का आरोप लगाए जाने के बाद, कुछ पुलिसकर्मियों सहित पांच लोगों के खिलाफ दर्ज जबरन वसूली के मामले को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मेरठ ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस द्वारा गहन जांच की ज़रूरत है। कोर्ट ने आगे कहा कि ज़िलों के पुलिस प्रमुखों को सतर्क किया जाना चाहिए ताकि वे अपने इलाकों में सक्रिय ऐसे गैंग के बारे में जागरूक रहें।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "उन्हें ज़ोन के सभी ज़िला पुलिस प्रमुखों को सख्त निगरानी रखने के लिए सतर्क करना चाहिए; अगर इस तरह का कोई गैंग सक्रिय है, या कोई अन्य गैंग भी सक्रिय है, जो महिलाओं का इस्तेमाल करके हनीट्रैप में फंसाकर या किसी अन्य तरीके से निर्दोष लोगों को ब्लैकमेल कर रहा है, और वही नतीजे दे रहा है। अगर इस तरह के अपराधों को जारी रहने दिया गया, तो एक सभ्य दुनिया में रहना मुश्किल हो जाएगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">बिजनौर पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामले में, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि बिजनौर के एक होटल में एक महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद, आरोपियों ने उसे ब्लैकमेल किया। पुलिस के मामले के अनुसार, महिला ने कुछ वीडियो क्लिप रिकॉर्ड कर लिए थे।उसने बताया कि आरोपियों ने मामला रफा-दफा करने के लिए 8 से 10 लाख रुपये की मांग की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, शिकायतकर्ता ने इस मामले की सूचना पुलिस को दी, जिसके बाद एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।इसके बाद आरोपियों ने FIR रद्द करवाने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। लेकिन, कोर्ट ने इस मामले को गंभीर बताते हुए याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं के वकील ने याचिका वापस ले ली।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "इस याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज किया जाता है, लेकिन उन निर्देशों के साथ, जो हमने ऊपर दिए हैं।"कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की जानकारी डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस, मेरठ ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ Police और उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को दी जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/175050/blackmail-after-sex-allahabad-high-court-orders-police-to-crack</link>
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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 20:56:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हाईकोर्ट का आदेश- वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट में उपस्थित हों न्यायिक मजिस्ट्रेट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174644/high-courts-order-judicial-magistrate-should-appear-in-the-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के पीठासीन अधिकारी को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कार्यालय को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पिछला और वर्तमान आदेश संबंधित अधिकारी तक समय पर पहुंच जाए ताकि आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:13:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुजरात में छह जजों को समय से पहले रिटायर होने का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>राज्य सरकार ने छह जजों को "जनहित में" न्यायपालिका से "समय से पहले रिटायर" होने का निर्देश दिया है, जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की इस संबंध में की गई सिफ़ारिशों के बाद जारी किया गया।इनमें से पाँच ज़िला जज हैं, जबकि एक सीनियर सिविल जज हैं। गुजरात सरकार के विधि विभाग ने 16 मार्च को इस संबंध में अधिसूचनाएँ जारी कीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन पाँच ज़िला जजों को समय से पहले रिटायर होने के लिए कहा गया है, वे हैं: प्रथमेश श्रीवास्तव, प्रधान ज़िला जज, मोरबी; प्रशांत जोशी, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, मोरबी;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173879/order-for-premature-retirement-of-six-judges-in-gujarat"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/judges.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>राज्य सरकार ने छह जजों को "जनहित में" न्यायपालिका से "समय से पहले रिटायर" होने का निर्देश दिया है, जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की इस संबंध में की गई सिफ़ारिशों के बाद जारी किया गया।इनमें से पाँच ज़िला जज हैं, जबकि एक सीनियर सिविल जज हैं। गुजरात सरकार के विधि विभाग ने 16 मार्च को इस संबंध में अधिसूचनाएँ जारी कीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन पाँच ज़िला जजों को समय से पहले रिटायर होने के लिए कहा गया है, वे हैं: प्रथमेश श्रीवास्तव, प्रधान ज़िला जज, मोरबी; प्रशांत जोशी, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, मोरबी; मोहम्मद इलियास मंडली, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, पोरबंदर; अली हुसैन शेख, तीसरे अतिरिक्त ज़िला जज, राजकोट (धोराजी); और किरीट कुमार दर्जी, अतिरिक्त ज़िला जज, अरावली (मोडासा)।</p>
<p style="text-align:justify;">छठे न्यायिक अधिकारी की पहचान जयेश कुमार पारिख के रूप में हुई है, जो प्रधान सीनियर सिविल जज और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, ध्रांगध्रा (सुरेंद्रनगर ज़िला) हैं।सूत्रों ने बताया कि इन छह जजों को समय से पहले रिटायर करने का आदेश गुजरात सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2002 के प्रावधानों के तहत जारी किया गया है, जिसे गुजरात राज्य न्यायिक सेवा नियम, 2005 के नियम 21 के साथ पढ़ा जाता है;  सदस्य को उप-नियम (1) के तहत जनहित में रिटायर किया जाना चाहिए, इस पर कम से कम तीन बार विचार किया जाएगा; यानी, जब वह 50 वर्ष, 55 वर्ष और 58 वर्ष की आयु पूरी करने वाला हो।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>अन्य राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:47:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यूपी गैंगस्टर एक्ट के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173877/up-gangster-act-has-serious-consequences-hence-strict-adherence-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं; खासकर तब जब किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता दांव पर हो।  जब कोई विशेष कार्य किया जाना हो, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए जैसा कि निर्धारित है—यहां कानून द्वारा निर्धारित—अन्यथा उसे बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो; एक ऐसी स्वतंत्रता जो सभी के लिए अनमोल है और जिसका उल्लंघन केवल कानून के अनुसार ही किया जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें उसने FIR को खारिज करने से इनकार किया था। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि गैंग चार्ट को तैयार करने और उसे आगे भेजने की प्रक्रिया में हुई स्पष्ट प्रक्रियागत अनियमितताओं ने FIR की पूरी बुनियाद को ही कमजोर (दोषपूर्ण) बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "गैंग चार्ट के लिए यह अनिवार्य है कि उसमें नोडल अधिकारी और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की सिफारिशें शामिल हों, जिन्हें पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमोदित किया गया हो। ये सिफारिशें लिखित रूप में होनी चाहिए और अनुमोदन पर हस्ताक्षर होने चाहिए। इस मामले में न तो अनिवार्य सिफारिशें उपलब्ध हैं और न ही किसी के हस्ताक्षर मौजूद हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला बहराइच में 1986 के अधिनियम की धारा 3(1) के तहत दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इस FIR में आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता (आरोपी) एक ऐसे गिरोह का हिस्सा था, जो जमीन पर अवैध कब्जा, रंगदारी वसूली और जालसाजी जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त था। अभियोजन पक्ष ने कानून के कड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए पूरी तरह से इस "गैंग चार्ट" पर ही भरोसा किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:44:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कॉलेजियम सही जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है: जस्टिस दीपांकर दत्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अतीत में उन जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है जिन्होंने साहस और ईमानदारी दिखाई; उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।"</p>
<p>जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई कल्पना' (Reimagining Judicial Governance) विषय पर आयोजित 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेजियम के सदस्यों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथी जजों की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173874/justice-dipankar-dutta-says-collegium-has-failed-to-protect-true"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अतीत में उन जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है जिन्होंने साहस और ईमानदारी दिखाई; उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।"</p>
<p>जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई कल्पना' (Reimagining Judicial Governance) विषय पर आयोजित 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेजियम के सदस्यों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथी जजों की रक्षा करनी चाहिए। </p>
<p>जस्टिस दत्ता सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का ज़िक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन (पदोन्नति) के रूप में चुकानी पड़े या इससे सत्ता में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं।</p>
<p>हाल ही में केरल हाई कोर्ट में आयोजित 'दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर स्मारक व्याख्यान' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था: "भले ही जजों को पता हो कि अलोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें अपने प्रमोशन, कार्यकाल में विस्तार (एक्सटेंशन) के रूप में चुकानी पड़ सकती है, लेकिन यह बात उनके फैसलों के आड़े नहीं आनी चाहिए।</p>
<p>आखिरकार, हर जज का अपना दृढ़ विश्वास, साहस और स्वतंत्रता ही सबसे ज़्यादा मायने रखती है।   काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत के आधार पर किया जाना चाहिए।  जुड़ाव, सामाजिक निकटता, लॉबिंग, अनौपचारिक सिफारिशें, या सत्ता में बैठे लोगों के साथ कथित नज़दीकी—चाहे वह न्यायिक हो, राजनीतिक हो या किसी और तरह की—को पूरी तरह से बाहर रखा जाना चाहिए।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:40:35 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जेलों में भीड़भाड़ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से मांगा ताजा डाटा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>देशभर की जेलों में बढ़ती भीड़भाड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपनी-अपनी जेलों की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। यह आदेश जेलों में भीड़भाड़ से संबंधित एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।</p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले में न्यायमित्र नियुक्त वकील गौरव अग्रवाल ने बताया कि कोर्ट के पास राज्यवार जेलों की ताजा स्थिति से जुड़ा कोई अपडेट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस पर पीठ ने स्पष्ट</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173872/supreme-court-strict-on-overcrowding-in-jails-seeks-latest-data"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>देशभर की जेलों में बढ़ती भीड़भाड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपनी-अपनी जेलों की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। यह आदेश जेलों में भीड़भाड़ से संबंधित एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।</p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले में न्यायमित्र नियुक्त वकील गौरव अग्रवाल ने बताया कि कोर्ट के पास राज्यवार जेलों की ताजा स्थिति से जुड़ा कोई अपडेट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को जेलों की पूरी जानकारी देनी होगी। इसमें हर जेल की क्षमता, वहां बंद कैदियों की कुल संख्या (विचाराधीन और सजायाफ्ता दोनों), तथा प्रत्येक जेल में भीड़भाड़ का प्रतिशत शामिल होगा। इसके अलावा, कोर्ट ने जेलों में भीड़ कम करने के लिए उठाए गए या प्रस्तावित कदमों की जानकारी भी मांगी है।</p><p style="text-align:justify;">अदालत ने महिलाओं की जेलों पर विशेष ध्यान देते हुए वहां उपलब्ध सुविधाओं का ब्योरा भी मांगा । सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये सभी हलफनामे संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के गृह सचिव की ओर से दाखिल किए जाएं। इसके लिए अंतिम तारीख 18 मई 2026 निर्धारित की गई है। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई 2026 को होगी।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:36:24 +0530</pubDate>
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