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                <title>बंगाल चुनाव - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>बंगाल चुनाव RSS Feed</description>
                
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                <title>टूटती तृणमूल कांग्रेस और ममता: संगठनात्मक कमजोरी और जनविश्वास का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181935/disintegrating-trinamool-congress-and-mamta-organizational-weakness-and-crisis-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(4).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे की कमी को दर्शाता है। नीचे के स्तर पर भी ब्लॉक और पंचायत स्तर पर गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है।</p>
<p><br />नियोग, कोयला, गोरू तस्करी और राशन घोटाले जैसे मामलों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए। ED और CBI की कार्रवाई ने संगठन की साख को नुकसान पहुंचाया। आम लोगों में यह धारणा मजबूत हुई है कि सत्ता के साथ भ्रष्टाचार भी जड़ें जमा चुका है। इससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं और मतदाता का एक हिस्सा विकल्प तलाश रहा है।<br />                  टीएमसी आज भी पूरी तरह ममता बनर्जी के व्यक्तित्व पर टिकी है। पार्टी का ढांचा संस्थागत कम, परिवार और करीबी नेताओं के इर्द-गिर्द ज्यादा केंद्रित है। अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद ने भी पुराने नेताओं में असहजता पैदा की है। जब कोई संगठन एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है, तो उस व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और राजनीतिक रणनीति ही पार्टी का भविष्य तय करने लगती है। फिलहाल ताजा खबर यह है कि टीएमसी एक और बड़ी टूट की कगार पर खड़ी है और यह निश्चित हो गया है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब टीएमसी को उभरने का मौका शायद ही मिल सके। कल सोमवार को नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी उपस्थित नज़र आईं तो वहीं दावा है कि उनकी पार्टी के 20 सांसदो ने बगावत कर दी है। सूचना है कि पार्टी के कई सांसद भाजपा नेताओं से मिलकर बगावत की रणनीति बना रहे थे।</p>
<p>केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर सोमवार को ही टीएमसी के कई सांसदों ने मुलाकात के बाद अलग गुट बनाने का दावा किया है। पता चला है कि इस बैठक में टीएमसी के पांच सांसद मौजूद रहे। इनमें शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बसुनिया, कालिपद सोरेन व अनूप चक्रवर्ती शामिल हैं। टीएमसी के लोकसभा में 28 व राज्यसभा में 12 सांसद हैं। सूत्र बताते हैं कि बागी सांसदों ने रविवार को एक बैठक की थी, और उसी वक्त अलग गुट बनाने का ऐलान कर टीएमसी को झटका दिया जाने पर विचार हुआ है।</p>
<p>जब विधायक दल में टूट हुई थी तो सांसदों के बग़ावत की चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया था। ऐसा बताया जा रहा है कि बाग़ी सांसद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के भी संपर्क में हैं और बहुत ही जल्द एक नये गुट का ऐलान हो सकता है। टीएमसी की सांसद काकोली घोष ने दावा किया है कि बागी सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है और लोकसभा स्पीकर को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। कोई भी पार्टी जब चुनाव हारती है तब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है</p>
<p>अपनी पार्टी को टूट से बचाने की क्यों कि हर कोई सत्ता के लड्डू खाना चाहता है, बेकार में विपक्ष में अब कोई बैठना नहीं चाहता है। इसके लिए केंद्र में कांग्रेस में टूट, दिल्ली में आप में टूट उत्तर प्रदेश में सपा में टूट और महाराष्ट्र का उदाहरण देखा जा सकता है। यही संकट अब इस समय टीएमसी के ऊपर मंडरा रहा है। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी को टूटने से कितना बचा पातीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:45:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भाजपा के लिए बडी चुनौती होगी  टीएमटी नेटवर्क को तोड़ना </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178074/the-big-challenge-for-bjp-will-be-to-break-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/rajneeti.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को खत्म कर  यहां विकास के रास्ते खोलना एक बड़ी चुनौती होगी। भर्ती घोटालों के लिए बदनाम बंगाल को गंगा  सागर के जल से पवित्र करना  होगा। इस  सबके  लिए उसे कड़ी मेहनत करनी होगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पिछले 15 साल  से  बंगाल की नसों में इस कदर समाई हुई है कि उसे केवल चुनावी जीत से बेदखल नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए असली चुनौती शपथ ग्रहण के बाद शुरू होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बंगाल में सत्ता का अर्थ केवल सचिवालय (नबन्ना) पर कब्जा करना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पाड़ा</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहल्ले) और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बूथ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका कैडर-आधारित ढांचा है। पहले यह केडर बेस ढांचा पहले वामपंथियों के पास था</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  इसे  ममता बनर्जी ने एक लंबे और हिंसक संघर्ष के बाद अपने पाले में किया। आज टीएमसी का संगठन केवल एक राजनीतिक दल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में एक साधारण ग्रामीण के लिए टीएमसी का स्थानीय नेता ही कानून है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही रोजगार दिलाने वाला है । वही सामाजिक विवादों का निपटारा करने वाला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दादा</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">है। भाजपा के लिए सबसे पहली और बड़ी बाधा इसी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बूथ-स्तर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के संगठन को तोड़ना है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपना आधार तो बढ़ाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसका ढांचा अभी भी कई जगहों पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर से नीचे</span>'  <span lang="hi" xml:lang="hi">की ओर है। टीएमसी की जगह लेने के लिए भाजपा को ऐसे कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करनी होगी जो केवल चुनाव के समय सक्रिय न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साल के 365 दिन जनता के सुख-दुख में साथ खड़े रहें।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">टीएमसी की दादागिरी और गुंडागर्दी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का एक दुखद हिस्सा बन चुकी है। यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मसल पावर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनी पावर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का ऐसा गठजोड़ है जो विपक्षी कार्यकर्ताओं को पनपने नहीं देता। भाजपा यदि सरकार बना भी लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे एक ऐसी पुलिस व्यवस्था और प्रशासन को पुनर्जीवित करना होगा जो दशकों से राजनीतिक इशारों पर नाचने का आदी हो चुका है। टीएमसी के कार्यकर्ता जो स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंडिकेट और वसूली के तंत्र से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आसानी से अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। भाजपा को यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कानून के राज</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को बहाल करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वह स्वयं उसी हिंसा के चक्र में न फंस जाए। जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि भाजपा की सरकार में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक विचारधारा के कारण जान का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास बहाली की इस प्रक्रिया में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विकास</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। टीएमसी ने हमेशा भाजपा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">बोहिरागोतो) दल के रूप में चित्रित किया है। इस नैरेटिव को काटने के लिए भाजपा को बंगाली संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा और परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा को और अधिक प्रखरता से साबित करना होगा। केवल जय श्री राम के नारे से बंगाल नहीं जीता जा सकता</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ के लोगों के मन में महाप्रभु चैतन्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामकृष्ण परमहंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानंद और रबींद्रनाथ टैगोर के प्रति जो अगाध श्रद्धा है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। सुभाष चंद्र बोस उनके आदर्श हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  इन सब को उन्हें  अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाना होगा। जब तक बंगाल का सामान्य नागरिक यह महसूस नहीं करेगा कि भाजपा उसकी संस्कृति की संरक्षक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक पूर्ण विश्वास हासिल करना असंभव है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घुंसपेठियों के लिए महफूज पश्चिमी बंगाल से बाहरी देशों के अवैध प्रवासियों को रोकना भी एक चुनौती होगी।  हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती  और बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती से इस अवैध घुसपैंठियों के हौसले काफी कमजोर हैं।इन्हें पूरी तरह तोड़ना  होगा ।अच्छा यह है  कि कभी  सत्ताकाकेंद्र बिदूं  रही माकपा अब पूरी तरह हाशिंए पर चली गई  वरन कभी  उसकी पश्चिमी बंगाल में वही हालत थी तो वहां आज टीएमसी की हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर बंगाल आज एक बड़े संकट से गुजर रहा है। उद्योगों का पलायन और युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना एक कड़वी सच्चाई है। भाजपा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सोनार बांग्ला</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के सपने को हकीकत में बदलने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप देना होगा। सिंडिकेट राज को खत्म करना केवल पुलिसिया कार्रवाई से संभव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। यदि भाजपा बंगाल में बड़े निवेश लाने में सफल रहती है और आईटी से लेकर विनिर्माण क्षेत्र तक में नौकरियां पैदा करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो टीएमसी का कैडर जो आज केवल मजबूरी या लालच में सत्ता से चिपका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धीरे-धीरे बिखरने लगेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा के लिए एक और बड़ी चुनौती राज्य के जनसांख्यिकीय समीकरण हैं। बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण एक सच्चाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक स्थिर सरकार चलाने के लिए उसे समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतना होगा। टीएमसी का आधार केवल गुंडागर्दी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनकी विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मी भंडार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कन्याश्री</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">। इन योजनाओं ने महिलाओं के एक बड़े वर्ग को ममता बनर्जी के साथ जोड़ा है। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह न केवल इन योजनाओं का बेहतर विकल्प दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह टीएमसी के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भय के तंत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भरोसे के तंत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में कितनी जल्दी बदल पाती है। संगठन बनाना ईंट-पत्थर जोड़ने जैसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह लोगों के दिलों में जगह बनाने जैसा है। टीएमसी के घर पर कब्जा करने का मतलब उनके कार्यालयों पर झंडा फहराना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस आम बंगाली के मन से डर निकालना है जो आज अपनी राय जाहिर करने से कतराता है। भाजपा को एक ऐसी समावेशी राजनीति का परिचय देना होगा जहाँ विकास का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी कट-मनी या राजनीतिक भेदभाव के। यदि भाजपा इस परीक्षा में सफल होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी वह बंगाल में एक स्थायी और सार्थक परिवर्तन ला पाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलाव बनकर रह जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था का नहीं। बंगाल की मिट्टी को शांति और प्रगति की प्यास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो दल इस प्यास को बुझाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सही मायने में बंगाल का भाग्य विधाता बनेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)  </span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:27:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बंगाल चुनाव: 'यहां से दफा हो जाओ', टीएमसी नेताओं से चुनाव आयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने चुनाव आयोग (ईसी) के साथ हुई बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ बेहद असम्मानजनक व्यवहार किया और बैठक के महज 7 मिनट के भीतर उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि वे अपनी पार्टी के प्रतिनिधियों के साथ पूरी तैयारी के साथ चुनाव आयोग के पास गए थे। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी की प्रमुख ममता बनर्जी की ओर से चुनाव आयोग को 9 चिट्ठियां भेजी गई थीं, लेकिन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175582/bengal-elections-get-lost-from-here-tmc-leaders-make-serious"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/vkfbk1c5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने चुनाव आयोग (ईसी) के साथ हुई बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ बेहद असम्मानजनक व्यवहार किया और बैठक के महज 7 मिनट के भीतर उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि वे अपनी पार्टी के प्रतिनिधियों के साथ पूरी तैयारी के साथ चुनाव आयोग के पास गए थे। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी की प्रमुख ममता बनर्जी की ओर से चुनाव आयोग को 9 चिट्ठियां भेजी गई थीं, लेकिन उनमें से किसी का भी न तो जवाब दिया गया और न ही कोई संज्ञान लिया। उन्होंने कहा कि यह अपने आप में गंभीर मामला है, क्योंकि एक संवैधानिक संस्था को इस तरह की चिट्ठियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ओ’ब्रायन के मुताबिक, बैठक सुबह करीब 10 बजकर 2 मिनट पर शुरू हुई और 7-8 मिनट में ही खत्म हो गई। इस दौरान उन्होंने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ऐसे अधिकारी चुनाव प्रक्रिया में शामिल हैं, जिनका संबंध भारतीय जनता पार्टी से है। उन्होंने ऐसे 6 उदाहरण चुनाव आयोग के सामने रखे और कहा कि इससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने अधिकारियों के ट्रांसफर और नियुक्तियों को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि अगर इस तरह के अधिकारियों को जिम्मेदारी दी जाएगी, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कैसे संभव हो पाएंगे। लेकिन जैसे ही उन्होंने ये मुद्दे उठाए, मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन्हें बीच में रोक दिया और कथित तौर पर "यहां से निकल जाओ" कह दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">डेरेक ओ’ब्रायन ने इस पूरे घटनाक्रम को शर्मनाक बताया। उन्होंने कहा कि अपने 22 साल के राजनीतिक करियर और 16 साल के संसदीय अनुभव में उन्होंने कभी भी किसी संवैधानिक संस्था के साथ ऐसी स्थिति नहीं देखी। उन्होंने खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगर चुनाव आयोग के पास बैठक का वीडियो या ऑडियो रिकॉर्ड है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए ताकि सच सामने आ सके।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी कहा कि जब उनका प्रतिनिधिमंडल बाहर निकल रहा था, तब उनके एक सहयोगी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को बधाई दी कि वे भारत के इतिहास में पहले ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जिनके खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में हटाने के नोटिस दिए गए हैं।ओ’ब्रायन ने आगे बताया कि इस मुद्दे को लेकर सभी विपक्षी दल एकजुट हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि जब वे बैठक में पहुंचे, तो शुरुआत में ही यह कहा गया कि उनका प्रतिनिधिमंडल अधिकृत नहीं है, जबकि वे पूरी तरह अधिकृत होकर गए थे। इसके बाद जब उन्होंने अपने मुद्दे रखने शुरू किए, तो उन्हें बोलने का मौका ही नहीं दिया गया।ओ’ब्रायन ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता बेहद जरूरी है और अगर इस पर सवाल उठते हैं, तो यह पूरे सिस्टम के लिए चिंता की बात है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 22:17:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>पांच राज्यों के चुनाव में बदलते समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और भविष्य की रणनीति तय करने वाले साबित हो सकते हैं। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति को लेकर है, क्योंकि पार्टी अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित करने के प्रयास में है। इन चुनावों में भाजपा का फोकस विकास,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173809/changing-equations-in-elections-of-five-states"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और भविष्य की रणनीति तय करने वाले साबित हो सकते हैं। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति को लेकर है, क्योंकि पार्टी अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित करने के प्रयास में है। इन चुनावों में भाजपा का फोकस विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और कल्याणकारी योजनाओं के संतुलन पर है, जबकि विपक्षी दल क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक न्याय और लोकल मुद्दों के सहारे मुकाबला कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम में जहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा सरकार अपने विकास मॉडल, बुनियादी ढांचे के विस्तार और ‘असमिया अस्मिता’ की रक्षा को मुख्य मुद्दा बना रही है, वहीं पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा की रणनीति पूरी तरह अलग और अधिक जटिल दिखाई देती है। असम में भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है और यहां उसका फोकस सत्ता बनाए रखने पर है, जबकि बंगाल और दक्षिण भारत में वह विस्तारवादी रणनीति के तहत नई सामाजिक और राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में मुकाबला मुख्यतः भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच केंद्रित है, जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने इस बार 103 नए चेहरों को मैदान में उतारकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। फिल्मी सितारों की संख्या घटाकर आम और जमीनी स्तर से जुड़े उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि टीएमसी एंटी-इन्कम्बेंसी को कम करने और नए वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति अपना रही है। इसके जवाब में भाजपा का फोकस ‘परिवर्तन’ के नारे, भ्रष्टाचार के आरोप, केंद्रीय योजनाओं के लाभ और ‘डबल इंजन सरकार’ के वादे पर है। भाजपा बंगाल में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा और घोटालों जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है, जिससे वह शहरी और मध्यम वर्ग के साथ-साथ युवा मतदाताओं को अपने पक्ष में कर सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल में भाजपा की एक और महत्वपूर्ण रणनीति हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थानीय पहचान के साथ जोड़ने की है, जिसमें धार्मिक स्थलों, परंपराओं और त्योहारों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा रहा है। हालांकि यह रणनीति पूरी तरह सफल होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा स्थानीय बंगाली अस्मिता के साथ कितनी सहजता से खुद को जोड़ पाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, लेकिन यहां पार्टी लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। केरल की राजनीति परंपरागत रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच घूमती रही है, लेकिन भाजपा अब इस द्विध्रुवीय राजनीति को तोड़ने की कोशिश में है। भाजपा का फोकस यहां सबरीमाला मंदिर मुद्दा, हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण, और केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों को जोड़ने पर है। साथ ही पार्टी ईसाई समुदाय के साथ भी संवाद बढ़ाकर सामाजिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में भाजपा की चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि यहां द्रविड़ राजनीति का गहरा प्रभाव है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के बीच पारंपरिक मुकाबले में भाजपा खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। यहां भाजपा का चुनावी विजन ‘संस्कृति बनाम द्रविड़ विचारधारा’ के साथ-साथ विकास और निवेश को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता, केंद्र की योजनाएं और राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय संदर्भ में प्रस्तुत करना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सभी राज्यों में भाजपा जिन प्रमुख मुद्दों पर जनता को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, उनमें सबसे पहले विकास और बुनियादी ढांचे का विस्तार है। सड़क, रेलवे, डिजिटल कनेक्टिविटी और रोजगार के अवसरों को पार्टी अपने सबसे बड़े उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरा बड़ा मुद्दा ‘डबल इंजन सरकार’ का है, जिसमें यह दावा किया जाता है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से विकास तेजी से होता है। तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा कल्याणकारी योजनाएं हैं, जैसे मुफ्त राशन, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और पीएम आवास योजना, जिनके लाभार्थियों को भाजपा अपने स्थायी वोट बैंक में बदलने की कोशिश कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सख्ती और भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी भाजपा के चुनावी अभियान का हिस्सा हैं। वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व भी कई राज्यों में पार्टी के लिए प्रभावी हथियार बने हुए हैं, हालांकि दक्षिण भारत में इसे अधिक सावधानी से इस्तेमाल किया जा रहा है।इस बार के चुनावों में यह भी देखने को मिल रहा है कि भाजपा स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति अपना रही है, ताकि यह धारणा खत्म की जा सके कि पार्टी केवल केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर है। साथ ही सोशल मीडिया, डिजिटल कैंपेन और डेटा आधारित चुनावी रणनीति का भी व्यापक उपयोग किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्षी दल भी अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं। बंगाल में टीएमसी जहां ‘दीदी के 10 संकल्प’ और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं और गरीब वर्ग को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं केरल में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस बदलाव का नारा दे रही है। इन सबके बीच चुनावी मुकाबला केवल नीतियों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और धारणा का भी बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के ये चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता का संघर्ष नहीं हैं, बल्कि यह भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार, विपक्ष की एकजुटता और भारतीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने वाले हैं। भाजपा जहां विकास, राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर उसे चुनौती दे रहा है। आने वाले परिणाम यह तय करेंगे कि क्या भाजपा अपनी रणनीति में सफल होती है या फिर क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ बनाए रखते है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:18:24 +0530</pubDate>
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