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                <title>रोजगार संकट - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>रोजगार संकट RSS Feed</description>
                
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                <title>संपादकीय पेज के लिए आलेख </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अंतर्राष्ट्रीय दबाव बेरोजगारी असमानता से जूझती आज़ादी ! </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है एक ओर अमेरिका का टेरिफ है चीन की दादागिरी है पाकिस्तान की साजिशें है और  बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185258/article-for-editorial-page"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img_20260727_151239-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अंतर्राष्ट्रीय दबाव बेरोजगारी असमानता से जूझती आज़ादी ! </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है एक ओर अमेरिका का टेरिफ है चीन की दादागिरी है पाकिस्तान की साजिशें है और  बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं उम्मीद हैं और इनके बीच बेरोजगारी महंगाई भ्रष्टाचार से कराहता आम आदमी और नशे अभद्रता रीलबाजी में फंसा जेनजी युवा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बेरोजगारी </div>
<div style="text-align:justify;">हालिया आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर लगभग 5.5% है, जो वैश्विक औसत (4.9%) के आसपास और कई प्रमुख जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्थिर स्थिति में है, हालांकि युवाओं के बीच यह दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है।आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश में कुल बेरोजगारी दर स्थिस्थिर है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की दर लगभग 5.1% और शहरी क्षेत्र की दर लगभग 6.4% से 6.6% के बीच दर्ज की गई है।युवा बेरोजगारी की समस्या चुनौती बनकठभारत में 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक (लगभग 15% से 16% के बीच) है, जो कौशल अंतराल और तकनीक-आधारित बदलावों को दर्शाती है। वैश्विक और भारतीय बाजारों में अनौपचारिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण पूर्णकालिक नौकरियों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> गरीबी की अंतहीन समस्या </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में आज भी गरीबी की समस्या विकराल बनी हुई है। भारत में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और काफी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी से जुड़े कई ऐसे आंकड़े हैं, जो वाकई डराने वाले हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 23.4 करोड़ लोग गरीबी के स्तर पर जीवन जीने को मजबूर हैं। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि गरीबी को मापने के लिए किस मानक या पैमाने का उपयोग किया जा रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक के संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर भारत में लगभग 23.4 करोड़ लोग घोर या बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है।विश्व बैंक के अत्यधिक गरीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि विश्व बैंक के मानकों ($2.15 प्रतिदिन आय) के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या घटकर लगभग 7.5 करोड़ (75 मिलियन) रह गई है। पिछले एक दशक में लगभग 26.9 से 27 करोड़ लोग इस अत्यधिक गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यदि उच्च स्तर यानी लगभग $4.20 प्रतिदिन के मानक को देखा जाए, तो भारत की लगभग 23.9% आबादी (करीब 34.2 करोड़ लोग) आर्थिक सुरक्षा के उस दायरे से नीचे आती है।</div>
<div style="text-align:justify;">उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 21.92 फीसदी लोग गरीबी की रेखा से नीचे अपना जीवन यापन कर रहे हैं।अगर इनकी संख्या की बात करें तो ये संख्या है 2697.83 लाख यानी 26 करोड़ 97 लाख गरीब हैं, वहीं, इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा गरीबी होती हैं, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में गरीबी का प्रतिशत 25.70 है जबकि शहरी क्षेत्र में यह प्रतिशत 13.70 फीसदी है। वहीं, कुल गरीबों में भी 21 करोड़ के करीब गरीब सिर्फ ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 5 करोड़ गरीब लोग रहते हैं. यानी देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का बड़ा हिस्सा गांव में रहने वाले हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर राज्य के हिसाब से देखें तो छोटे राज्यों में हाल ज्यादा बुरा है. जैसे दादरा और नागर हवेली में 39.31 फीसदी, झारखंड में 39.96 फीसदी, ओडिशा में 32. 59 फीसदी गरीब लोग रहते हैं. वहीं, उत्तरप्रदेश में करीब 29 और बिहार में करीब 33 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   भुखमरी </div>
<div style="text-align:justify;">नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कुल 123 देशों की सूची में भारत को 102वां स्थान मिला है। इस सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 25.8 है, जो देश में भूख और कुपोषण की स्थिति को 'गंभीर' श्रेणी में रखता है। 123 देशों की पड़ताल में भारत का स्थान 102 वां है इस के अनुसार 25.8श्रेणी गंभीर प्रमुख स्वास्थ्य व पोषण 12.0%बाल बौनापन उम्र के हिसाब से कम लंबाई 32.9%बाल कमज़ोरी लंबाई के हिसाब से कम वजन 18.7% रिपोर्ट में दूसरी सबसे अधिक बाल मृत्यु दर 2.8% है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> भुखमरी सूचकांक वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था।भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की वेबसाइट के अनुसार चीन, ब्राजील और कुवैत सहित अठारह देशों ने पांच से कम के जीएचआई स्कोर के साथ अग्रिम पंक्ति में है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्ष 2020 में भारत 107 देशों में 94वें स्थान पर था। अब 116 देशों में यह 101वें स्थान पर आ गया है। जीएचआई स्कोर की गणना चार संकेतकों पर की जाती है, जिनमें अल्पपोषण, कुपोषण, बच्चों की वृद्धि दर और बाल मृत्यु दर शामिल हैं।रिपोर्ट के अनुसार, पड़ोसी देश जैसे नेपाल (76), बांग्लादेश (76), म्यांमार (71) और पाकिस्तान (92) भी भुखमरी को लेकर चिंताजनक स्थिति में हैं, लेकिन भारत की तुलना में अपने नागरिकों को भोजन उपलब्ध कराने को लेकर इन देशों ने बेहतर प्रदर्शन किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> आंकड़ों के अनुसार, भारत में में संयुक्त राष्ट्र की अनुमानित गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 8.3 करोड़ लोग हैं।दुनिया की गरीब जनता का सबसे ज्यादा हिस्सा, 12.2 फीसदी भाग भारत और 12.2 फीसदी नाइजीरिया में है।लेकिन नाइजीरिया में 8,30,05,482 गरीबी रेखा के नीचे हैं जबकि भारत में यह संख्या 8,30,68,597 है।इन हालात में गरीबी को काबू करने की कोई सूरत अभी दूर तक दिखाई नही दे रही है। </div>
<div style="text-align:justify;">कुपोषण साल 2020 की विश्व खाद्य सुरक्षा की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उस समय 18.92 करोड़ लोग कुपोषित थे।साल 2021 में ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में भारत के 27.5 अंक हैं जो कि बहुत ही खराब स्थिति को दर्शाती है।एक वैश्विक पत्रिका द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 10 में से 7 भारतीय पौष्टिक आहार का खर्च नहीं उठा पाते हैं।एक ओर भुखमरी, दूसरी ओर 10.4 करोड़ टन अनाज सरकारी गोदामों में सड़ने के लिए पड़ा था।</div>
<div style="text-align:justify;">   भ्रष्टाचार </div>
<div style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। भारत का कुल स्कोर 39 (100 में से) है, जो पिछले वर्ष (2024 में 96वीं रैंक) की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार दर्शाता है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी की जाती है।डेनमार्क, फिनलैंड और सिंगापुर सबसे कम भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। भारत का प्रदर्शन (101रैंक)पाकिस्तान (136वीं रैंक), श्रीलंका (107वीं रैंक), और नेपाल (109वीं रैंक) से बेहतर है, लेकिन चीन (76वीं रैंक) और भूटान (18वीं रैंक) से पीछे है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जबकि भ्रष्टाचार अवधारणा सूचकांक 2021 में 180 देशों की सूची में भारत को 85वां स्थान मिला था ।ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछली बार के मुकाबले भारत की रैंकिंग एक स्थान का सुधार हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सार्वजनिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार के कथित स्तरों के आधार पर 180 देशों और क्षेत्रों की रैंकिंग की सूची तैयार की जाती है।इस रैंकिंग में सौ में से 40अंक हासिल कर भारत ने 85वां स्थान दर्ज किया है। यह हालात देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को बयान करते हैं।देश के तमाम सरकारी विभागों में बिना रिशवत कोई काम होना टेड़ी खीर है। </div>
<div style="text-align:justify;">   गरीब अमीर के बीच खाई </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (तीसरा संस्करण) पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के शीर्ष 10% सबसे अमीर लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का तीन-चौथाई (लगभग 75%) हिस्सा है, जबकि सबसे निचले 50% हिस्से के पास केवल 2% संपत्ति है।भारत में शीर्ष 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% ही मिलता है।देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है, और शीर्ष 10% के पास करीब 65% संपत्ति है।भारत में केवल 15.7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, और कुल श्रम आय में उनका हिस्सा महज 20% के आसपास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में असमानता गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जहाँ शीर्ष 10% राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा अर्जित करते हैं और शीर्ष 1% के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। इसे महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर के 15.7% पर स्थिर बने रहने से और बढ़ावा मिलता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जलवायु असमानता के लिए सबसे धनी 10% लोग निजी पूंजी से होने वाले उत्सर्जन के 77% के लिये उत्तरदायी हैं; केवल शीर्ष 1% अकेले 41% योगदान करते हैं, जो असमान ज़िम्मेदारी और जोखिम को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">   न्याय बना अन्याय</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में अदालतों में न्याय के लिए लम्बी लाइन लगीं है अगली पेशी अगले साल के चलते लाखों की संख्या में वादी व पीड़ित तारीख पर चक्कर काटते हुए दुनिया से चले जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता। स्थिति यह है कि देशभर की अदालतों में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल 5.64 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित (पेंडिंग) हैं।अदालत के स्तर पर लंबित मामलों का विवरणसुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च अदालत): लगभग 96,000 से अधिक केस पेंडिंग हैं।हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय): देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 63.76 लाख मामले पेंडिंग हैं।जिला और अधीनस्थ अदालतें (निचली अदालतें): कुल पेंडिंग मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 4.98 करोड़ से अधिक मामले निचली अदालतों में अटके हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक है।</div>
<div style="text-align:justify;">साइबर अपराध </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में अपराध की स्थिति भी बदतर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अंतिम उपलब्ध आंकड़े बताते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम "क्राइम इन इंडिया" रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक शारीरिक और हिंसक अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, जबकि डिजिटल व वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। देश में समग्र अपराध दर घटकर लगभग 418.9 प्रति लाख जनसंख्या पर आ गई है। विभिन्न डिजिटल और ऑनलाइन धोखाधड़ी में लगभग 17% से 18% की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल साइबर मामलों में से लगभग 72% से अधिक का उद्देश्य वित्तीय ठगी रहा है महिलाओं के विरुद्ध मामलों में आंशिक (लगभग 1.5%) कमी आई है, जबकि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में लगभग 7.8% की वृद्धि देखी गई है। हत्या के मामलों में लगभग 2.4% की गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि अपहरण और अन्य विवादित मामलों की संख्या में क्षेत्रीय भिन्नता बनी हुई है। वित्तीय गबन और धोखाधड़ी से जुड़े आर्थिक अपराधों में करीब 4.6% की वृद्धि हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीयों के राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट के प्रमुख लक्षणों में अनियंत्रित भ्रष्टाचार, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही, नागरिक अनुशासन का अभाव और राष्ट्रहित की तुलना में व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देना शामिल है। समाज में नैतिक मूल्यों और सहिष्णुता की कमी भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कभी भारतीय लोगों का राष्ट्रीय चरित्र विविधता में एकता, सहिष्णुता, आतिथ्य-सत्कार, परिवार के प्रति अटूट जुड़ाव और कठिन परिस्थितियों में भी उच्च सहनशक्ति (लचीलेपन) पर आधारित है। यहाँ के समाज में धर्म, आध्यात्मिकता और सामूहिक जीवन की भावना गहराई तक समाई हुई है।लेकिन अब स्थिति भिन्न हो चली है। समाज में नैतिक और सामाजिक पतन की शुरुआत हो गई है। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य और स्वीकृत बात बन गई है। लोग अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक हैं, लेकिन अपने मूल कर्तव्यों को भूल रहे हैं। विभिन्न समूहों के बीच सहनशीलता घट रही है और असहिष्णुता बढ़ रही है। 'मेरा क्या फायदा' की सोच ने सामूहिक कल्याण और देशभक्ति की भावना को पीछे छोड़ दिया है।सरकारी संपत्तियों, पार्कों और धरोहरों को गंदा करना या नुकसान पहुँचाना आम हो गया है। यातायात नियमों और सामान्य कानूनों का पालन न करने को शान की बात समझा जाता है। अपराध या दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में राजनीतिक दलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता अब इतना बढ़ गया है कि पिछले एक दशक में देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में सबसे कम समय का उपयोग किया जाता है विपक्ष संसद को अखाड़ा बनाने पर तुला है और सत्ता धारी विपक्ष के साथ सूक्ष्मता आम सहमति बनाने में नाकाम रहे हैं। देश ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर हुए प्रदर्शन में जैनजी के भीतर आक्रोश को देखा वहीं जैनजी के कंधे का इस्तेमाल करने की राजनीति को भी देखा वहीं आंदोलन की आड़ में अराजकता अभद्रता असंयमित गालीबाजी को भी सहन किया। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:17:12 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोनार नरहरी सेना ने पीएम को भेजा ज्ञापन: कम मेकिंग चार्ज के ऑफर से छोटे कारीगर बर्बादी की कगार </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;"><strong>भदोही, 5 मई 2026: </strong>सोनार समाज के छोटे कारीगरों व दुकानदारों की बदहाली को लेकर आज सोनार नरहरी सेना भदोही के पदाधिकारियों ने जिलाधिकारी,के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को संबोधित ज्ञापन सौंपा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">ज्ञापन में कहा गया कि प्रदेश के करोड़ों छोटे कारीगर व सराफा दुकानदार आज मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। बड़े-बड़े कॉर्पोरेट शोरूम व कंपनियां टीवी, अखबार व सोशल मीडिया पर "केवल 5% मेकिंग चार्ज मेकिंग चार्ज फ्री जैसे लुभावने ऑफर देकर ग्राहकों को गुमराह कर रही हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">संगठन ने बताया कि हाथ से बनी ज्वेलरी में मेहनत ज्यादा लगती है, इसलिए छोटे कारीगरों</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178509/sonar-narhari-sena-sent-memorandum-to-pm-small-artisans-on"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260507-wa0023.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>भदोही, 5 मई 2026: </strong>सोनार समाज के छोटे कारीगरों व दुकानदारों की बदहाली को लेकर आज सोनार नरहरी सेना भदोही के पदाधिकारियों ने जिलाधिकारी,के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को संबोधित ज्ञापन सौंपा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ज्ञापन में कहा गया कि प्रदेश के करोड़ों छोटे कारीगर व सराफा दुकानदार आज मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। बड़े-बड़े कॉर्पोरेट शोरूम व कंपनियां टीवी, अखबार व सोशल मीडिया पर "केवल 5% मेकिंग चार्ज मेकिंग चार्ज फ्री जैसे लुभावने ऑफर देकर ग्राहकों को गुमराह कर रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संगठन ने बताया कि हाथ से बनी ज्वेलरी में मेहनत ज्यादा लगती है, इसलिए छोटे कारीगरों का मेकिंग चार्ज 15% से 25% तक होता है। ग्राहक विज्ञापन देखकर छोटे दुकानदारों से माल लेना बंद कर रहा है। इससे पैतृक कारीगर बेरोजगार हो रहे हैं और दुकानें बंद होने की कगार पर हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोनार नरहरी सेना की प्रमुख मांगें  </div>
<div style="text-align:justify;">1.  पूरे देश में वन नेशन-वन मेकिंग चार्ज" नीति लागू कर न्यूनतम मेकिंग चार्ज फिक्स किया जाए।  </div>
<div style="text-align:justify;">2.  भ्रामक मेकिंग चार्ज के विज्ञापनों पर *सरकारी गाइडलाइन जारी कर रोक लगाई जाए।  </div>
<div style="text-align:justify;">3.  हॉलमार्किंग की तरह मेकिंग चार्ज में भी पारदर्शिता व एकरूपता लाई जाए।  </div>
<div style="text-align:justify;">4.  हस्तशिल्प कारीगरों को बचाने के लिए विशेष पैकेज दिया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">5 . स्वर्ण कला बोर्ड का गठन किया जाय।।</div>
<div style="text-align:justify;">जिला अध्यक्ष आनंद सोनी ने कहा, "प्रधानमंत्री जी हमेशा 'वोकल फॉर लोकल' की बात करते हैं। अगर छोटे कारीगर ही नहीं बचेंगे तो लोकल कैसे बचेगा? हम चाहते हैं कि सरकार छोटे सुनारों की रोजी-रोटी बचाए।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ज्ञापन सौंपते समय संगठन के आनन्द सोनी मुकेश स्वर्णकार राकेश वर्मा बनवारी स्वर्णकार धीरेन्द्र सेठ डॉ श्रवण सेठ सहित दर्जनों पदाधिकारी व कारीगर मौजूद रहे।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="WhmR8e"></div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178509/sonar-narhari-sena-sent-memorandum-to-pm-small-artisans-on</link>
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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 20:09:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भाजपा के लिए बडी चुनौती होगी  टीएमटी नेटवर्क को तोड़ना </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178074/the-big-challenge-for-bjp-will-be-to-break-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/rajneeti.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा ने पश्चिम बंगाल में  पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली ,भारी बहुमत भी  हासिल कर लिया ,किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना  करना  होगा।टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी।  पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना  नेटवर्क बनाना  है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को खत्म कर  यहां विकास के रास्ते खोलना एक बड़ी चुनौती होगी। भर्ती घोटालों के लिए बदनाम बंगाल को गंगा  सागर के जल से पवित्र करना  होगा। इस  सबके  लिए उसे कड़ी मेहनत करनी होगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पिछले 15 साल  से  बंगाल की नसों में इस कदर समाई हुई है कि उसे केवल चुनावी जीत से बेदखल नहीं किया जा सकता। भाजपा के लिए असली चुनौती शपथ ग्रहण के बाद शुरू होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बंगाल में सत्ता का अर्थ केवल सचिवालय (नबन्ना) पर कब्जा करना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पाड़ा</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहल्ले) और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बूथ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका कैडर-आधारित ढांचा है। पहले यह केडर बेस ढांचा पहले वामपंथियों के पास था</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  इसे  ममता बनर्जी ने एक लंबे और हिंसक संघर्ष के बाद अपने पाले में किया। आज टीएमसी का संगठन केवल एक राजनीतिक दल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में एक साधारण ग्रामीण के लिए टीएमसी का स्थानीय नेता ही कानून है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही रोजगार दिलाने वाला है । वही सामाजिक विवादों का निपटारा करने वाला </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दादा</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">है। भाजपा के लिए सबसे पहली और बड़ी बाधा इसी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बूथ-स्तर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के संगठन को तोड़ना है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपना आधार तो बढ़ाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसका ढांचा अभी भी कई जगहों पर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर से नीचे</span>'  <span lang="hi" xml:lang="hi">की ओर है। टीएमसी की जगह लेने के लिए भाजपा को ऐसे कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करनी होगी जो केवल चुनाव के समय सक्रिय न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साल के 365 दिन जनता के सुख-दुख में साथ खड़े रहें।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">टीएमसी की दादागिरी और गुंडागर्दी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का एक दुखद हिस्सा बन चुकी है। यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मसल पावर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनी पावर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का ऐसा गठजोड़ है जो विपक्षी कार्यकर्ताओं को पनपने नहीं देता। भाजपा यदि सरकार बना भी लेती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे एक ऐसी पुलिस व्यवस्था और प्रशासन को पुनर्जीवित करना होगा जो दशकों से राजनीतिक इशारों पर नाचने का आदी हो चुका है। टीएमसी के कार्यकर्ता जो स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंडिकेट और वसूली के तंत्र से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आसानी से अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। भाजपा को यहाँ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कानून के राज</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को बहाल करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वह स्वयं उसी हिंसा के चक्र में न फंस जाए। जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि भाजपा की सरकार में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक विचारधारा के कारण जान का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास बहाली की इस प्रक्रिया में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अस्मिता</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विकास</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। टीएमसी ने हमेशा भाजपा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">बोहिरागोतो) दल के रूप में चित्रित किया है। इस नैरेटिव को काटने के लिए भाजपा को बंगाली संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा और परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा को और अधिक प्रखरता से साबित करना होगा। केवल जय श्री राम के नारे से बंगाल नहीं जीता जा सकता</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ के लोगों के मन में महाप्रभु चैतन्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामकृष्ण परमहंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानंद और रबींद्रनाथ टैगोर के प्रति जो अगाध श्रद्धा है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। सुभाष चंद्र बोस उनके आदर्श हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  इन सब को उन्हें  अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाना होगा। जब तक बंगाल का सामान्य नागरिक यह महसूस नहीं करेगा कि भाजपा उसकी संस्कृति की संरक्षक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक पूर्ण विश्वास हासिल करना असंभव है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घुंसपेठियों के लिए महफूज पश्चिमी बंगाल से बाहरी देशों के अवैध प्रवासियों को रोकना भी एक चुनौती होगी।  हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती  और बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती से इस अवैध घुसपैंठियों के हौसले काफी कमजोर हैं।इन्हें पूरी तरह तोड़ना  होगा ।अच्छा यह है  कि कभी  सत्ताकाकेंद्र बिदूं  रही माकपा अब पूरी तरह हाशिंए पर चली गई  वरन कभी  उसकी पश्चिमी बंगाल में वही हालत थी तो वहां आज टीएमसी की हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर बंगाल आज एक बड़े संकट से गुजर रहा है। उद्योगों का पलायन और युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना एक कड़वी सच्चाई है। भाजपा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सोनार बांग्ला</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के सपने को हकीकत में बदलने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप देना होगा। सिंडिकेट राज को खत्म करना केवल पुलिसिया कार्रवाई से संभव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। यदि भाजपा बंगाल में बड़े निवेश लाने में सफल रहती है और आईटी से लेकर विनिर्माण क्षेत्र तक में नौकरियां पैदा करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो टीएमसी का कैडर जो आज केवल मजबूरी या लालच में सत्ता से चिपका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धीरे-धीरे बिखरने लगेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा के लिए एक और बड़ी चुनौती राज्य के जनसांख्यिकीय समीकरण हैं। बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण एक सच्चाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक स्थिर सरकार चलाने के लिए उसे समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतना होगा। टीएमसी का आधार केवल गुंडागर्दी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनकी विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मी भंडार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कन्याश्री</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">। इन योजनाओं ने महिलाओं के एक बड़े वर्ग को ममता बनर्जी के साथ जोड़ा है। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह न केवल इन योजनाओं का बेहतर विकल्प दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह टीएमसी के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भय के तंत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">भरोसे के तंत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में कितनी जल्दी बदल पाती है। संगठन बनाना ईंट-पत्थर जोड़ने जैसा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह लोगों के दिलों में जगह बनाने जैसा है। टीएमसी के घर पर कब्जा करने का मतलब उनके कार्यालयों पर झंडा फहराना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस आम बंगाली के मन से डर निकालना है जो आज अपनी राय जाहिर करने से कतराता है। भाजपा को एक ऐसी समावेशी राजनीति का परिचय देना होगा जहाँ विकास का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी कट-मनी या राजनीतिक भेदभाव के। यदि भाजपा इस परीक्षा में सफल होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी वह बंगाल में एक स्थायी और सार्थक परिवर्तन ला पाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलाव बनकर रह जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था का नहीं। बंगाल की मिट्टी को शांति और प्रगति की प्यास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो दल इस प्यास को बुझाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सही मायने में बंगाल का भाग्य विधाता बनेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार  हैं)  </span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:27:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>डिग्री तो मिली, लेकिन आज़ादी नहीं – युवा डिजिटल दास</title>
                                    <description><![CDATA[<p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की युवा पीढ़ी के लिए डिजिटल आज़ादी का सपना अब कठिन हकीकत बन चुका है। समुद्र तट पर काम करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुली हवा में लैपटॉप खोलकर पैसे कमाने और दुनिया घूमने की कल्पना अब छोटे-छोटे फ्लैट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली कटौती और लगातार काम के दबाव में उलझकर रह गई है। हर सुबह उठते ही नए प्रस्ताव भेजने की चिंता और कमाई की अनिश्चितता उनके दिन की शुरुआत बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रात खत्म होती है रिजेक्शन और अधूरी उम्मीदों की चिंता में। घंटों मेहनत के बावजूद केवल न्यूनतम मजदूरी मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सोशल मीडिया</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173806/got-degree-but-not-freedom-%E2%80%93-young-digital-das"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की युवा पीढ़ी के लिए डिजिटल आज़ादी का सपना अब कठिन हकीकत बन चुका है। समुद्र तट पर काम करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुली हवा में लैपटॉप खोलकर पैसे कमाने और दुनिया घूमने की कल्पना अब छोटे-छोटे फ्लैट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली कटौती और लगातार काम के दबाव में उलझकर रह गई है। हर सुबह उठते ही नए प्रस्ताव भेजने की चिंता और कमाई की अनिश्चितता उनके दिन की शुरुआत बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रात खत्म होती है रिजेक्शन और अधूरी उम्मीदों की चिंता में। घंटों मेहनत के बावजूद केवल न्यूनतम मजदूरी मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सोशल मीडिया की चमक-दमक से वास्तविकता का अंतर और गहरा दिखता है। यह कोई डिजिटल नोमैड की स्वप्निल दुनिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ‘डिजिटल भिखारी’ बनने की कठोर हकीकत है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल दुनिया अक्सर धोखा देती है। समुद्र तट पर काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉफी के साथ लैपटॉप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और योग करते हुए मीटिंग – यह केवल स्क्रीन पर दिखती झलक है। भारतीय युवा इसे देखकर सोचते हैं कि बस इंटरनेट और लैपटॉप चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकी सब आसान होगा। असलियत अलग है। भारत में गिग इकोनॉमी का जाल इतना जटिल है कि स्थिर कमाई और सुरक्षा मुश्किल है। इकोनॉमिक सर्वे </span>2025-26 <span lang="hi" xml:lang="hi">के अनुसार गिग वर्कर्स की संख्या </span>2021 <span lang="hi" xml:lang="hi">में </span>7.7 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक </span>1.2 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ तक बढ़ गई। करीब </span>40% <span lang="hi" xml:lang="hi">की मासिक कमाई </span>15,000 <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपये से कम है। विदेशी क्लाइंट उन्हें सस्ता विकल्प मानते हैं। यह स्वतंत्रता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नई गुलामी है – मेहनत ज्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमाई कम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा शून्य।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी के अवसरों की कमी और एआई के बढ़ते दबाव ने युवा पीढ़ी को फ्रीलांसिंग की ओर धकेल दिया है। स्टार्टअप बंद हो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित रोजगार सिकुड़ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और घर बैठे विदेशी मुद्रा कमाने का सपना आकर्षक बन गया है। लेकिन गिग इकोनॉमी में शुरुआत ही कठिन है। लाखों फ्रीलांसर एक ही प्रोजेक्ट के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। औसतन भारतीय फ्रीलांसर </span>10-15 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर प्रति घंटा चार्ज करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वैश्विक औसत </span>40 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर से अधिक है। खुद को सस्ता साबित करना उनकी दिनचर्या बन गई है। हर भेजा गया प्रपोजल गुहार की तरह और हर रिजेक्शन चोट की तरह महसूस होता है। यही वह शुरुआत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हें ‘डिजिटल भिखारी’ बनाती है – जहां क्लाइंट राजा और युवा पूरी तरह उसकी दया पर निर्भर होता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिन-रात की मेहनत के बावजूद युवा केवल अधूरी सफलता पाते हैं। रात के </span>3 <span lang="hi" xml:lang="hi">बजे क्लाइंट के संदेशों का जवाब देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनगिनत संशोधन मुफ्त में करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और फिर भी पेमेंट में देरी का सामना करना उनकी सामान्य दिनचर्या बन गई है। प्लेटफॉर्म फीस और टैक्स का बोझ लगातार बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्वास्थ्य बीमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन या छुट्टी जैसी सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है। अमेरिकी फ्रीलांसरों की तुलना में भारतीय चार गुना कम दर पर काम करते हैं। महीनों की मेहनत के बाद भी बचत नगण्य रहती है। ईएमआई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किराया और रोजमर्रा के बिलों का दबाव लगातार बना रहता है। गिग इकोनॉमी उन्हें बांधती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुरक्षा नहीं देती। सपना बड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हकीकत कड़वी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक दबाव अब स्पष्ट हो चुका है। डिजिटल भिखारी दिन-रात स्क्रीन से चिपके रहते हैं। अलग टाइम जोन की वजह से नींद गायब हो जाती है। लगातार रिजेक्शन और आर्थिक अनिश्चितता डर और बर्नआउट पैदा कर रही हैं। महिलाएं दोहरी जिम्मेदारी झेल रही हैं – घर और गिग दोनों का बोझ। कोई साथ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई यूनियन नहीं। पारंपरिक भिखारी सड़क पर खुलकर मांगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डिजिटल भिखारी अकेले कमरे में टूटता है। युवा पीढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश का भविष्य थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम की कैद में है। निराशा बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास घट रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कमजोर व्यवस्था समस्या को और गहरा कर रही है। शिक्षा केवल डिग्री देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्किल्स नहीं। गिग इकोनॉमी को बढ़ावा तो दिया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मजबूत कानून नहीं हैं। श्रमिकों को ‘स्वतंत्र ठेकेदार’ घोषित करके उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। बेरोजगारी के दबाव में युवा इस राह पर आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुरक्षा शून्य रहती है। अनुमान है कि </span>2029-30 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक गिग वर्कर्स </span>2.35 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ तक पहुंच जाएंगे। अधिकांश कम वेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिश्चितता और थकान में जीवन यापन कर रहे होंगे। विदेशी क्लाइंट्स की दया पर निर्भरता बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश और जमीन से कनेक्शन कमजोर हो रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब बदलाव का समय है। युवा समझें कि डिजिटल भिखारी बनने का कोई रास्ता नहीं है। स्किल्स में निवेश करें – एआई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष क्षेत्रों और लोकल नेटवर्किंग। स्थिर करियर या वास्तविक उद्यमिता चुनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां सम्मान और सुरक्षा हो। सरकार को गिग वर्कर्स के लिए मजबूत सुरक्षा कानून बनाना चाहिए। सोशल मीडिया की झूठी चमक छोड़ें और हकीकत देखें। सच्ची आज़ादी स्किल और आत्मनिर्भरता से आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीख से नहीं। यदि युवा एकजुट होकर अपनी कीमत तय करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह दौर बदला जा सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा पीढ़ी के लिए यह अंतिम चेतावनी है। डिजिटल नोमैड बनने का सपना देखने वाले आज ‘डिजिटल भिखारी’ बन चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां उनकी मेहनत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय और उम्मीदें पूरी तरह दूसरों की दया पर निर्भर हैं। परिवर्तन का सामर्थ्य उनके हाथ में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जागरूकता जरूरी है। अगर आज सचेत नहीं हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाला कल पूरी युवा पीढ़ी के लिए आर्थिक शोषण और मानसिक दबाव लेकर आएगा। असली स्वतंत्रता केवल कमाई में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आत्म-सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा और अपने फैसले लेने की शक्ति में है। उठो युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी योग्यता और मूल्य पहचानो – क्योंकि भीख मांगते हुए कोई सच्चा नोमैड या असली स्वतंत्र व्यक्ति कभी नहीं बन सकता।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:12:48 +0530</pubDate>
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