<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/60989/digital-economy-india" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>digital economy India - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/60989/rss</link>
                <description>digital economy India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आ अब लौट चलें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों की जान को खतरा मंडराने लगा और विदेशी शासको के पराई पान के व्यवहार से परेशान होकर वापस घर लौटने की मानसिकता बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, सांस्कृतिक तनाव और कठोर होती आव्रजन नीतियों के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष, अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा पश्चिमी देशों में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ने विदेशी नागरिकों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों के सामने वीजा, स्थायी निवास और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अनेक देशों में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग तेज हुई है, जिसके कारण प्रवासी समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। हाल के वर्षों में अमेरिका की एच-1बी वीजा नीतियों में बदलाव और बढ़ती अनिश्चितताओं ने हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को भविष्य के प्रति चिंतित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मूल के लाखों पेशेवर विदेशों में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वभर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है।  इनमें बड़ी संख्या डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और शोधकर्ताओं की है। केवल भारतीय छात्रों की बात करें तो वर्ष 2024 तक 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में अध्ययन कर रहे थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चमकदार तस्वीर अक्सर दिखाई जाती है, किंतु उसके पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक पीड़ा कम चर्चा में आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक सफलता के बावजूद सांस्कृतिक अकेलापन, परिवार से दूरी, बुजुर्ग माता-पिता की चिंता, बच्चों की पहचान का संकट तथा नस्लीय भेदभाव के अनुभव अनेक प्रवासी भारतीयों को भीतर से विचलित करते हैं। पश्चिमी देशों में जीवन की बढ़ती लागत ने भी स्थिति कठिन बना दी है। ऊंचे किराए, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा का खर्च और नौकरी की असुरक्षा ने उस आकर्षण को कमजोर किया है जो कभी विदेशों को अवसरों की स्वर्णभूमि बनाता था। अनेक भारतीय पेशेवर स्वीकार करते हैं कि आर्थिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक संतोष की कमी उन्हें लगातार परेशान करती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भारतीय प्रवासी समुदाय को "ब्रेन ड्रेन" नहीं बल्कि "ब्रेन बैंक" बताया है। उनका मानना है कि प्रतिभाएं जहां अवसर मिलते हैं वहां जाती हैं, किंतु वे अनुभव, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दृष्टि के रूप में अपने देश को भी समृद्ध करती हैं।  यह विचार आज और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब विदेशों से लौटकर भारत में स्टार्टअप, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अब केवल प्रतिभा निर्यातक देश नहीं रह गया है, बल्कि प्रतिभाओं को आकर्षित करने वाला देश भी बनने लगा है। कई भर्ती एजेंसियों ने बताया है कि विदेशों में कार्यरत अनुभवी भारतीय पेशेवरों की वापसी की प्रवृत्ति पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी सच है कि भारत को अभी बहुत कार्य करना बाकी है। अनुसंधान एवं विकास पर खर्च, शहरी अवसंरचना, प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए विश्वस्तरीय वातावरण नहीं बनाएगा, तब तक प्रतिभा पलायन पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिस्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि दुनिया का भू-राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है। विदेशी धरती पर बसे भारतीय पेशेवर अब केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता, सामाजिक अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्व देने लगे हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अपने देश में संघर्ष करना पराए देश में असुरक्षा के साथ जीने से कहीं अधिक संतोषजनक हो सकता है। माता-पिता की वृद्ध आंखें, अपनी भाषा की मिठास, अपने त्योहारों की खुशबू और अपनी मिट्टी का अपनापन किसी भी मुद्रा में नहीं खरीदा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत उन लाखों प्रतिभाशाली प्रवासी भारतीयों को पुकार रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत से विश्व के बड़े संस्थानों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यदि वही ज्ञान, अनुभव और नवाचार भारत की धरती पर लगे तो विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अनेक भारतीय पेशेवरों के मन में एक ही स्वर गूंज रहा है,विदेशों की चमक बहुत देख ली, अब अपने देश की धड़कनों को महसूस करने का समय है। सचमुच, यह समय कह रहा है,"आ अब लौट चलें।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now</guid>
                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:37:59 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg"                         length="154899"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डिग्री तो मिली, लेकिन आज़ादी नहीं – युवा डिजिटल दास</title>
                                    <description><![CDATA[<p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की युवा पीढ़ी के लिए डिजिटल आज़ादी का सपना अब कठिन हकीकत बन चुका है। समुद्र तट पर काम करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुली हवा में लैपटॉप खोलकर पैसे कमाने और दुनिया घूमने की कल्पना अब छोटे-छोटे फ्लैट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली कटौती और लगातार काम के दबाव में उलझकर रह गई है। हर सुबह उठते ही नए प्रस्ताव भेजने की चिंता और कमाई की अनिश्चितता उनके दिन की शुरुआत बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रात खत्म होती है रिजेक्शन और अधूरी उम्मीदों की चिंता में। घंटों मेहनत के बावजूद केवल न्यूनतम मजदूरी मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सोशल मीडिया</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173806/got-degree-but-not-freedom-%E2%80%93-young-digital-das"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की युवा पीढ़ी के लिए डिजिटल आज़ादी का सपना अब कठिन हकीकत बन चुका है। समुद्र तट पर काम करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुली हवा में लैपटॉप खोलकर पैसे कमाने और दुनिया घूमने की कल्पना अब छोटे-छोटे फ्लैट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली कटौती और लगातार काम के दबाव में उलझकर रह गई है। हर सुबह उठते ही नए प्रस्ताव भेजने की चिंता और कमाई की अनिश्चितता उनके दिन की शुरुआत बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रात खत्म होती है रिजेक्शन और अधूरी उम्मीदों की चिंता में। घंटों मेहनत के बावजूद केवल न्यूनतम मजदूरी मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सोशल मीडिया की चमक-दमक से वास्तविकता का अंतर और गहरा दिखता है। यह कोई डिजिटल नोमैड की स्वप्निल दुनिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ‘डिजिटल भिखारी’ बनने की कठोर हकीकत है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल दुनिया अक्सर धोखा देती है। समुद्र तट पर काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉफी के साथ लैपटॉप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और योग करते हुए मीटिंग – यह केवल स्क्रीन पर दिखती झलक है। भारतीय युवा इसे देखकर सोचते हैं कि बस इंटरनेट और लैपटॉप चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाकी सब आसान होगा। असलियत अलग है। भारत में गिग इकोनॉमी का जाल इतना जटिल है कि स्थिर कमाई और सुरक्षा मुश्किल है। इकोनॉमिक सर्वे </span>2025-26 <span lang="hi" xml:lang="hi">के अनुसार गिग वर्कर्स की संख्या </span>2021 <span lang="hi" xml:lang="hi">में </span>7.7 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक </span>1.2 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ तक बढ़ गई। करीब </span>40% <span lang="hi" xml:lang="hi">की मासिक कमाई </span>15,000 <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपये से कम है। विदेशी क्लाइंट उन्हें सस्ता विकल्प मानते हैं। यह स्वतंत्रता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नई गुलामी है – मेहनत ज्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमाई कम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा शून्य।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी के अवसरों की कमी और एआई के बढ़ते दबाव ने युवा पीढ़ी को फ्रीलांसिंग की ओर धकेल दिया है। स्टार्टअप बंद हो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित रोजगार सिकुड़ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और घर बैठे विदेशी मुद्रा कमाने का सपना आकर्षक बन गया है। लेकिन गिग इकोनॉमी में शुरुआत ही कठिन है। लाखों फ्रीलांसर एक ही प्रोजेक्ट के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। औसतन भारतीय फ्रीलांसर </span>10-15 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर प्रति घंटा चार्ज करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वैश्विक औसत </span>40 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर से अधिक है। खुद को सस्ता साबित करना उनकी दिनचर्या बन गई है। हर भेजा गया प्रपोजल गुहार की तरह और हर रिजेक्शन चोट की तरह महसूस होता है। यही वह शुरुआत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हें ‘डिजिटल भिखारी’ बनाती है – जहां क्लाइंट राजा और युवा पूरी तरह उसकी दया पर निर्भर होता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिन-रात की मेहनत के बावजूद युवा केवल अधूरी सफलता पाते हैं। रात के </span>3 <span lang="hi" xml:lang="hi">बजे क्लाइंट के संदेशों का जवाब देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनगिनत संशोधन मुफ्त में करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और फिर भी पेमेंट में देरी का सामना करना उनकी सामान्य दिनचर्या बन गई है। प्लेटफॉर्म फीस और टैक्स का बोझ लगातार बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्वास्थ्य बीमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन या छुट्टी जैसी सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है। अमेरिकी फ्रीलांसरों की तुलना में भारतीय चार गुना कम दर पर काम करते हैं। महीनों की मेहनत के बाद भी बचत नगण्य रहती है। ईएमआई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किराया और रोजमर्रा के बिलों का दबाव लगातार बना रहता है। गिग इकोनॉमी उन्हें बांधती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुरक्षा नहीं देती। सपना बड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हकीकत कड़वी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक दबाव अब स्पष्ट हो चुका है। डिजिटल भिखारी दिन-रात स्क्रीन से चिपके रहते हैं। अलग टाइम जोन की वजह से नींद गायब हो जाती है। लगातार रिजेक्शन और आर्थिक अनिश्चितता डर और बर्नआउट पैदा कर रही हैं। महिलाएं दोहरी जिम्मेदारी झेल रही हैं – घर और गिग दोनों का बोझ। कोई साथ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई यूनियन नहीं। पारंपरिक भिखारी सड़क पर खुलकर मांगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डिजिटल भिखारी अकेले कमरे में टूटता है। युवा पीढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश का भविष्य थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम की कैद में है। निराशा बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास घट रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कमजोर व्यवस्था समस्या को और गहरा कर रही है। शिक्षा केवल डिग्री देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्किल्स नहीं। गिग इकोनॉमी को बढ़ावा तो दिया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मजबूत कानून नहीं हैं। श्रमिकों को ‘स्वतंत्र ठेकेदार’ घोषित करके उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। बेरोजगारी के दबाव में युवा इस राह पर आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सुरक्षा शून्य रहती है। अनुमान है कि </span>2029-30 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक गिग वर्कर्स </span>2.35 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ तक पहुंच जाएंगे। अधिकांश कम वेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिश्चितता और थकान में जीवन यापन कर रहे होंगे। विदेशी क्लाइंट्स की दया पर निर्भरता बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश और जमीन से कनेक्शन कमजोर हो रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब बदलाव का समय है। युवा समझें कि डिजिटल भिखारी बनने का कोई रास्ता नहीं है। स्किल्स में निवेश करें – एआई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष क्षेत्रों और लोकल नेटवर्किंग। स्थिर करियर या वास्तविक उद्यमिता चुनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां सम्मान और सुरक्षा हो। सरकार को गिग वर्कर्स के लिए मजबूत सुरक्षा कानून बनाना चाहिए। सोशल मीडिया की झूठी चमक छोड़ें और हकीकत देखें। सच्ची आज़ादी स्किल और आत्मनिर्भरता से आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीख से नहीं। यदि युवा एकजुट होकर अपनी कीमत तय करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह दौर बदला जा सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा पीढ़ी के लिए यह अंतिम चेतावनी है। डिजिटल नोमैड बनने का सपना देखने वाले आज ‘डिजिटल भिखारी’ बन चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां उनकी मेहनत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय और उम्मीदें पूरी तरह दूसरों की दया पर निर्भर हैं। परिवर्तन का सामर्थ्य उनके हाथ में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जागरूकता जरूरी है। अगर आज सचेत नहीं हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाला कल पूरी युवा पीढ़ी के लिए आर्थिक शोषण और मानसिक दबाव लेकर आएगा। असली स्वतंत्रता केवल कमाई में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आत्म-सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा और अपने फैसले लेने की शक्ति में है। उठो युवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी योग्यता और मूल्य पहचानो – क्योंकि भीख मांगते हुए कोई सच्चा नोमैड या असली स्वतंत्र व्यक्ति कभी नहीं बन सकता।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/173806/got-degree-but-not-freedom-%E2%80%93-young-digital-das</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/173806/got-degree-but-not-freedom-%E2%80%93-young-digital-das</guid>
                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:12:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-03/hindi-divas13.jpg"                         length="137237"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        