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                <title>legal news UP - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>अवैध जब्ती और जल्दबाज़ी में नीलामी पर राज्य सरकार को झटका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178295/state-government-shocked-by-illegal-seizure-and-hasty-auction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले में पुलिस ने याचिकाकर्ता चंद्रभान कुमार के व्यावसायिक वाहन को कथित गौ-तस्करी की सूचना पर रोका था। वाहन से 10 जीवित गोवंश बरामद होने का दावा करते हुए पुलिस ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 तथा पशु क्रूरता निवारण कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिलाधिकारी ने यह कहते हुए वाहन जब्त कर लिया कि गोवंश को वध के लिए बिहार ले जाया जा रहा था, जबकि वाहन बिहार सीमा के निकट पकड़ा गया। बाद में आयुक्त ने भी जब्ती आदेश बरकरार रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी दौरान, अपील लंबित रहते हुए प्रशासन ने वाहन की नीलामी मात्र 85 हजार रुपये में कर दी जबकि याचिकाकर्ता के अनुसार वाहन का बाजार मूल्य 7 लाख रुपये से अधिक था।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के भीतर गोवंश के परिवहन के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है और केवल बिहार सीमा के निकट वाहन पकड़े जाने से यह मान लेना कि पशुओं को वध हेतु बाहर ले जाया जा रहा था उचित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “संदेह चाहे कितना भी प्रबल हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि कार्यवाही लंबित रहते वाहन की नीलामी करना और वह भी इतनी कम कीमत पर प्रशासन की स्पष्ट मनमानी को दर्शाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने माना कि इससे याचिकाकर्ता को गंभीर आर्थिक नुकसान हुआ, क्योंकि वाहन उसकी आजीविका का मुख्य साधन है। पशुओं के प्रति क्रूरता के आरोपों पर भी अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने ऐसा कोई ठोस निष्कर्ष दर्ज नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि पशुओं को ऐसी शारीरिक चोट पहुंची थी, जिससे उनके जीवन को खतरा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार जब्ती की तारीख से वाहन वापसी तक 15 हजार रुपये प्रतिमाह आर्थिक क्षति के रूप में और 20 हजार रुपये मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए अदा करे।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि वाहन वापस नहीं किया जाता है तो सरकार को 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के अतिरिक्त अधिकतम 12 माह की अवधि तक मासिक क्षतिपूर्ति भी देनी होगी। अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह यह राशि उन अधिकारियों से वसूल सकती है, जिन्होंने मनमानी कार्रवाई को मंजूरी दी थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:56:38 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मौजूद ही नहीं जो कानून, उसी के तहत दे दिया तलाक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178293/divorced-under-a-law-that-does-not-exist"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/allahabad_high_court_1733678481057_1777910120637.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दायर की थी जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि संभवतः याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 का उल्लेख होना चाहिए, जो मुस्लिम महिलाओं को तलाक मांगने का अधिकार देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि केवल याचिका में गलत कानून का उल्लेख होने से आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता, यदि ट्रायल कोर्ट सही कानून के तहत अधिकार प्रयोग करे। हालांकि, इस मामले में फैमिली कोर्ट ने स्वयं अपने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उसी के तहत राहत भी प्रदान की।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा, “यह सुनिश्चित करना अदालत का दायित्व है कि जिस कानून का वह उल्लेख कर रही है, वह वास्तव में अस्तित्व में हो। केवल याचिका में हुई त्रुटि ट्रायल कोर्ट को वही गलती दोहराने का अधिकार नहीं देती।”</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने कहा कि अस्तित्वहीन कानून के आधार पर दिया गया निर्णय विधि और तथ्य दोनों की दृष्टि से दोषपूर्ण है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला पुनः उसी अदालत को भेज दिया और निर्देश दिया कि वह सही कानूनी प्रावधानों के तहत नया निर्णय पारित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने स्पष्ट किया कि नए सिरे से पूरा ट्रायल नहीं होगा और फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों व रिकॉर्ड के आधार पर ही निर्णय दे सकती है, जब तक उसे अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता न लगे। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को तीन माह के भीतर नया फैसला देने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:54:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अपमान की मंशा के बिना जाति से बुलाना अपराध नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के एक मामले में साफ तौर पर कहा है कि किसी को अपमानित करने की मंशा के बिना जाति से बुलाना एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस प्रकार के केस को जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप में एससी-एसटी एक्ट के अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं है। अभियोजन का दायित्व है कि पहली नजर में सबूतों के आधार पर अपराध होना साबित करे। इसी के साथ कोर्ट ने याची के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177978/calling-by-caste-without-intent-to-insult-is-not-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के एक मामले में साफ तौर पर कहा है कि किसी को अपमानित करने की मंशा के बिना जाति से बुलाना एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस प्रकार के केस को जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप में एससी-एसटी एक्ट के अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं है। अभियोजन का दायित्व है कि पहली नजर में सबूतों के आधार पर अपराध होना साबित करे। इसी के साथ कोर्ट ने याची के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। मारपीट और गाली-गलौज के आरोप में ही मामले में अब केस चलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से अमय पांडेय एवं तीन अन्य की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश जारी किया गया है। हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह ने यह आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">याचियों की ओर से वकील गणेश शंकर श्रीवास्तव एवं अश्वनी कुमार ने अपनी बहस में कहा कि मामले में अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया गया था।एफआईआर में कहीं भी जाति को लेकर अपराध का आरोप नहीं था। बाद में सीआरपीसी की धारा 161 के बयान में कहानी जोड़ी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह सिद्धार्थ नगर के अमय पांडेय के साथ ही अन्य तीन की अपील पर सुनवाई कर रहे थे. उन्होंने सभी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी. लेकिन कोर्ट ने ये साफ कर दुया कि गाली-गलौज और मारपीट से जुड़े आरोपों में आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 22:45:05 +0530</pubDate>
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                <title>24 मार्च से शुरू होगी यूपी बार काउंसिल चुनाव की मतगणना</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong> उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के चुनाव संपन्न होने के बाद अब मतगणना की तारीख घोषित कर दी गई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मतगणना आगामी 24 मार्च से शुरू होगी, जो प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक निर्धारित समय के भीतर संपन्न कराई जाएगी।चुनाव प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने के बाद अब अधिवक्ताओं की नजरें मतगणना और परिणामों पर टिकी हुई हैं। इस बार चुनाव में प्रदेश भर के बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने भाग लिया, जिससे मुकाबला काफी दिलचस्प और कड़ा माना जा रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मतगणना के दौरान पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कड़े</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173765/counting-of-votes-for-up-bar-council-elections-will-start"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260320-wa0289.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong> उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के चुनाव संपन्न होने के बाद अब मतगणना की तारीख घोषित कर दी गई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मतगणना आगामी 24 मार्च से शुरू होगी, जो प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक निर्धारित समय के भीतर संपन्न कराई जाएगी।चुनाव प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने के बाद अब अधिवक्ताओं की नजरें मतगणना और परिणामों पर टिकी हुई हैं। इस बार चुनाव में प्रदेश भर के बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने भाग लिया, जिससे मुकाबला काफी दिलचस्प और कड़ा माना जा रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मतगणना के दौरान पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कड़े इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ मतगणना स्थल पर अधिकृत व्यक्तियों को ही प्रवेश दिया जाएगा। संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि प्रक्रिया निष्पक्ष एवं सुचारू रूप से संपन्न हो।बार काउंसिल के पदों के लिए चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी और उनके समर्थक मतगणना की तैयारियों में जुटे हुए हैं। गौरतलब है कि यूपी बार काउंसिल चुनाव को अधिवक्ताओं के बीच काफी अहम माना जाता है, क्योंकि इसके जरिए अधिवक्ता समाज के प्रतिनिधियों का चयन होता है, जो उनके हितों और अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</div></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 20:49:56 +0530</pubDate>
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