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                <title>प्रेरणादायक कहानी - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>प्रेरणादायक कहानी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी हर काम से नहीं हटती पीछे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>महराजगंज/रायबरेली:</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जहां बढ़ती उम्र के साथ अधिकांश लोग दूसरों के सहारे जीवन व्यतीत करने लगते हैं, वहीं विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी अपनी मेहनत, आत्मनिर्भरता और अदम्य जीवटता से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या किसी युवा महिला से कम नहीं है। घर के लगभग सभी काम वह स्वयं करती हैं और अपनी सक्रिय जीवनशैली से यह साबित कर रही हैं कि, इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">        </div>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181678/purbin-an-elderly-mother-of-more-than-90-years-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260619-wa0383.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>महराजगंज/रायबरेली:</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जहां बढ़ती उम्र के साथ अधिकांश लोग दूसरों के सहारे जीवन व्यतीत करने लगते हैं, वहीं विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी अपनी मेहनत, आत्मनिर्भरता और अदम्य जीवटता से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या किसी युवा महिला से कम नहीं है। घर के लगभग सभी काम वह स्वयं करती हैं और अपनी सक्रिय जीवनशैली से यह साबित कर रही हैं कि, इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">      आपको बता दें कि, मां पुरबिन का परिवार भरा-पूरा है। उनके एक पुत्र संतलाल लोधी हैं, जो वर्तमान में ग्राम प्रधान हैं, जबकि उनकी दो बेटियां विवाह के बाद अपने-अपने परिवारों में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही हैं। परिवार में बहू, दो नाती, दो नातिन और दो पनाती भी हैं। परिवार के सभी सदस्य उनका सम्मान करते हैं और उनकी देखभाल के लिए तत्पर रहते हैं, फिर भी मां पुरबिन आत्मनिर्भर जीवन जीना ही पसंद करती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">         बुजुर्ग मां पुरबिन की एक विशेष इच्छा भी है। वह चाहती हैं कि, अपने जीवनकाल में अपने एक अविवाहित नाती का विवाह अपनी आंखों से देखें। यही इच्छा उनके जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">         उम्र बढ़ने के बावजूद उनकी दिनचर्या आज भी बेहद सक्रिय है। वह घर में झाड़ू लगाने से लेकर भोजन बनाने तक के सभी कार्य स्वयं करती हैं। पशुओं की देखभाल, गाय-भैंस का दूध निकालना, खैलर चलाकर मट्ठा तैयार करना, गोबर उठाना, चावल साफ करना तथा अपने हाथों से आटा गूंधकर मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां बनाना उनके रोजमर्रा के कार्यों में शामिल है। उम्र के प्रभाव से उनकी कमर भले ही झुक गई हो, लेकिन उनके हौसले और कार्य करने की क्षमता में आज भी कोई कमी दिखाई नहीं देती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        ग्रामीण परिवेश में सादगीपूर्ण जीवन, नियमित शारीरिक श्रम और अनुशासित दिनचर्या को ही वह अपनी अच्छी सेहत का राज मानती हैं। उनका कहना है कि, शरीर को स्वस्थ और सक्रिय बनाए रखने के लिए लगातार काम करना जरूरी है। यही कारण है कि, परिवार के मना करने के बावजूद वह स्वयं अपने काम करना पसंद करती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        मां पुरबिन बताती हैं कि, उनका बेटा ग्राम प्रधान होने के नाते उन्हें आराम करने की सलाह देता है, लेकिन वह मानती हैं कि, निष्क्रियता शरीर को कमजोर बना देती है। इसलिए वह अपने दैनिक कार्यों को ही व्यायाम और स्वास्थ्य का आधार मानती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        आज के समय में, जब कम उम्र में ही लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, मां पुरबिन की जीवनशैली समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आती है। उनकी मेहनत, अनुशासन और आत्मनिर्भरता यह सिखाती है कि, नियमित श्रम, सकारात्मक सोच और सक्रिय जीवनशैली इंसान को लंबे समय तक स्वस्थ, सक्षम और आत्मविश्वासी बनाए रख सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        मां पुरबिन की यह प्रेरणादायी कहानी न केवल ग्रामीण महिलाओं के लिए बल्कि हर आयु वर्ग के लोगों के लिए एक मिसाल है। उनकी जीवटता और कर्मशीलता को देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि, उम्र भले ही 90 पार कर जाए, लेकिन हौसले जवान हों तो जीवन की रफ्तार कभी नहीं थमती।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 22:17:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>11जून को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती है!इस अवसर पर यह आलेख है</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180928/11th-june-is-the-birth-anniversary-of-pandit-ram-prasad"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260610-wa0050.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। 9 अगस्त 1925 की काकोरी की रात।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बैठो, ये कहानी छोटी नहीं है। ये वो दास्तान है जो खून, पसीने और मिट्टी की खुशबू से लिखी गई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1925 का हिंदुस्तान देखो। अंग्रेज़ हर चीज़ पर टैक्स लगा रहे थे। नमक पर, कपड़े पर, रेल के टिकट पर। किसान की फसल सस्ते में लूट ली जाती, और उसी फसल को दुगने दाम पर बेचा जाता। लगान न दे पाने पर गाँव के गाँव उजड़ जाते थे। कांग्रेस वाले सत्याग्रह कर रहे थे, लाठी खा रहे थे, जेल जा रहे थे। मैं उनका सम्मान करता हूँ। गांधी जी का अहिंसा का रास्ता लाखों को जोड़ रहा था। पर मेरा दिल कहता था कि जो राज़ बंदूक के दम पर आया है, वो बंदूक के दम पर ही जाएगा।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1924 में हमने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। मैं, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, सचिंद्र बख्शी, मनमथनाथ गुप्त। सबकी उम्र 25 से कम थी। पर हौसला पहाड़ से ऊँचा था। हमारा मकसद साफ था। अंग्रेजों के पास हथियार हैं, पैसा है, ताकत है। हमारे पास कुछ नहीं। तो हम उनका ही खजाना लूटेंगे। उसी पैसे से हथियार खरीदेंगे। उसी हथियार से क्रांति का अलाव जलाएंगे। लोग कहते थे ये डकैती है। मैं कहता हूँ, जब एक देश को लूटा जा रहा हो, तो लुटेरों से लूटना डकैती नहीं, कर्तव्य है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मौका मिला 9 अगस्त 1925 को। लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन रोज़ सरकारी खजाना ले जाती थी। लखनऊ, शाहजहाँपुर, बरेली, मुरादाबाद के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह इसी ट्रेन में होती थी। गार्ड के डिब्बे में लोहे की पेटियाँ रखी होती थीं। वही हमारा निशाना था। काकोरी लखनऊ से 15 मील दूर एक छोटा स्टेशन है। हमने तय किया कि ट्रेन जैसे ही काकोरी पार करेगी, चेन खींचकर रोक देंगे। गार्ड का डिब्बा तोड़ेंगे, खजाना निकालेंगे और जंगल में गायब हो जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">टीम में दस लोग थे। मैं "राम" बनकर बैठा था। अशफाक "अहमद" बनकर। चंद्रशेखर आज़ाद हमारा बाहुबल था। राजेंद्र लाहिड़ी का दिमाग ठंडा था, निशाना पक्का था। मनमथनाथ सबसे छोटा था, पर हिम्मत में सबसे बड़ा। सचिंद्र बख्शी, मुरारी शर्मा, मुकुंदी लाल, केशव चक्रवर्ती भी साथ थे। हमने हफ्तों तक रिहर्सल की। शाहजहाँपुर के जंगलों में रात-रात भर अभ्यास किया। कैसे चेन खींचनी है, कैसे ताला तोड़ना है, कैसे भागना है। मैंने उस दिन अपनी डायरी में लिखा था: "अगर हम मर गए तो शहीद कहलाएँगे। अगर बच गए तो क्रांति का बीज बो देंगे।"</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">9 अगस्त की दोपहर। धूप आग बरसा रही थी। हम अलग-अलग स्टेशनों से ट्रेन में चढ़े। टिकट लेकर, आम मुसाफिर बनकर। ट्रेन चली। दिल की धड़कनें तेज थीं। पर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। जैसे ही ट्रेन काकोरी स्टेशन पार कर जंगल की तरफ बढ़ी, मनमथनाथ ने चेन खींच दी। कड़क की आवाज़ आई। ट्रेन हिली और रुक गई। हम आठ लोग एक साथ उठे। गार्ड के डिब्बे की तरफ लपके। ताला तोड़ा। अंदर लोहे की पेटियाँ थीं। चंद्रशेखर ने रिवॉल्वर तान दी और कहा, "खोलो जल्दी!" गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। उसने कांपते हाथों से चाबी दे दी।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पेटियाँ खुलीं। नोटों की गड्डियाँ, सिक्के, सरकारी कागज। हमने अंदाजा लगाया, लगभग आठ हजार रुपये। आज के हिसाब से करीब पंद्रह लाख। लेकिन तभी गलती हो गई। शायद गार्ड ने ब्रेक छोड़ा, या ट्रेन अपने आप हिल गई। राजेंद्र ने जल्दी में एक पेटी धक्का देकर नीचे फेंक दी। धमाके की आवाज़ हुई। उसी धमाके में एक यात्री अहमद अली नीचे गिर गया। सिर पर चोट लगी और उसकी मौत हो गई। उस पल मेरा कलेजा बैठ गया। हम लुटेरे नहीं थे। हमारा मकसद किसी की जान लेना नहीं था। पर क्रांति में खून बहता ही है। उस दिन मैंने जाना कि आज़ादी की कीमत सिर्फ हमारा खून नहीं होता, कभी-कभी बेगुनाहों का खून भी बहता है। उस यात्री की मौत का बोझ आज भी मेरे सीने पर है। हमने जितना हो सका खजाना समेटा और जंगल में भागे। पीछे पुलिस की सीटी बज रही थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लूट के बाद हम बिखर गए। पर अंग्रेज़ों की सीआईडी कोई कम नहीं थी। गाँव-गाँव, घर-घर छान मारा। मुखबिरों को पैसा दिया गया। सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी पकड़े गए। फिर मैं 1 नवंबर 1925 को शाहजहाँपुर में पकड़ा गया। अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद बच निकले। वो 1931 तक लड़े, और जब चारों तरफ से घिर गए तो खुद को गोली मार ली। जिंदा पकड़े जाने से बेहतर मौत थी उनके लिए।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुकदमा चला लखनऊ में। नाम दिया गया "काकोरी षड्यंत्र केस"। कठघरे में खड़े होकर मैंने जज से कहा: "हम चोर नहीं हैं। हम वो लोग हैं जो अपनी माँ भारत को आज़ाद कराना चाहते हैं। अगर इसके लिए फाँसी भी मिले, तो वो हमारे लिए माला है।" अदालत ने 40 लोगों पर मुकदमा चलाया। 16 को सज़ा हुई। मुझे, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। फैसला सुनकर मैं हँस पड़ा। "मौत से डरते तो हम 14 साल की उम्र में आर्य समाज न ज्वाइन करते।" मुकदमे के दौरान हमने कोर्ट को ही अपना मंच बना लिया। हर पेशी पर देशभक्ति के नारे लगते थे। "इंकलाब ज़िंदाबाद" की गूँज पूरे लखनऊ में सुनाई देती थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुझे गोरखपुर जेल की कोठरी नंबर 11 में रखा गया। फाँसी 19 दिसंबर 1927 को तय हुई। मेरे पास 40 दिन थे। मैं रोया नहीं। माफी नहीं माँगी। मैंने कलम उठाई। पेंसिल से 120 पन्ने लिखे। मेरी आत्मकथा _कातिल की कलम से_। मैंने लिखा कि कैसे मेरा दादा अकाल में ग्वालियर छोड़कर आया था। कैसे माँ ने मुझे भूखे पेट सुलाया था। कैसे 14 साल की उम्र में स्वामी दयानंद सरस्वती की _सत्यार्थ प्रकाश_ ने मेरे अंदर आग लगा दी थी। कैसे मैंने "मैनपुरी षड्यंत्र" में हिस्सा लिया था 1918 में।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">रात को नींद नहीं आती थी। अशफाक पास वाली कोठरी में था। हम दीवार के उस पार बात करते थे। एक रात मैंने उससे कहा, "अशफाक, अगर हम बच गए तो साथ मिलकर मदरसा खोलेंगे। जहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों पढ़ेंगे।" उसने जवाब दिया, "बिस्मिल भाई, हम बचेंगे नहीं। लेकिन हमारे मरने के बाद हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम एक साथ मर सकते हैं।" उसी जेल में मैंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" लिखा।  </div><div style="text-align:justify;">_"मेरा रंग दे बसंती चोला,  </div><div style="text-align:justify;">माय रंग दे बसंती चोला।"_  </div><div style="text-align:justify;">सोचो, जिसे कल फाँसी होनी है, वो बसंत की बात कर रहा है। मौत से डरने वाला ऐसा नहीं लिखता। जेल में मुझे रोज़ गीता पढ़ने का मौका मिलता था। मैंने पाया कि गीता में भी कर्म और त्याग की बात है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" वही मैं कर रहा था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोग पूछते हैं, हिंदू-मुस्लिम एक साथ कैसे लड़ सकते हैं? मैं कहता हूँ, देखो अशफाक को। अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर का ही था। उसकी उम्र मुझसे दो साल छोटी थी। जब पहली बार मिला था, तो लगा जैसे बरसों का साथी हो। वो उर्दू का शायर था। मैं हिंदी का। वो कुरान पढ़ता था, मैं गीता। पर जब देश की बात आती, तो हम एक थे। काकोरी की रात उसने मुझसे कहा था, "बिस्मिल भाई, अगर आज हम मर गए तो हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं हैं।" और वही हुआ। 19 दिसंबर 1927 को हम एक साथ फाँसी पर चढ़े। अशफाक की आखिरी ख्वाहिश थी कि उसकी लाश को शाहजहाँपुर में दफनाया जाए। अंग्रेजों ने मना कर दिया। उसे फैजाबाद में दफनाया गया। आज भी उसकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों चादर चढ़ाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">18 दिसंबर की रात जेलर आया। बोला, "बिस्मिल, कल सुबह छह बजे फाँसी है।" मैंने नहाया, नए कपड़े पहने, गीता का पाठ किया। अशफाक ने कुरान पढ़ी। रोशन सिंह ने गुरुवाणी गाई। रात को मैंने आखिरी शेर लिखा:  </div><div style="text-align:justify;">_"अगर एक झटके में कुर्बानी दे दूँ तो क्या है,  </div><div style="text-align:justify;">बार-बार मरूँ वतन पर यही आरजू है।"_  </div><div style="text-align:justify;">सुबह पाँच बजे दरवाजा खुला। मैं बाहर निकला। फाँसी का तख्ता तैयार था। जेलर ने पूछा, "आखिरी इच्छा?" मैंने कहा, "मेरे शरीर को तिरंगे में लपेट देना। और हाँ, मेरे मरने के बाद मेरी कविताएँ मत जलाना।" फंदा मेरे गले में डाला गया। मैंने ऊपर देखा। आसमान साफ था। और मेरे मुँह से निकला:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;">मरते-मरते देश को ज़िंदा मगर कर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">धड़ाम की आवाज़ आई। और सब शांत हो गया। उसी दिन अशफाक, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी भी फाँसी पर चढ़े। चार नौजवान। चार धर्म। एक मकसद।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हमारी फाँसी ने हिंदुस्तान को झकझोर दिया। अखबारों में लिखा गया, "चार नौजवान, चार धर्म, एक मकसद"। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बन गई हमारी फाँसी। काकोरी के बाद क्रांति की आग और भड़क गई। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। भगत सिंह कहते थे, "बिस्मिल का खून बेकार नहीं जाएगा।" उन्होंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" को अपना नारा बनाया। लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी से पहले वही गीत गाया था। 1947 में जब आज़ादी मिली, तो नेहरू ने लाल किले से कहा था कि आज़ादी में उन अनाम शहीदों का खून शामिल है जिनके नाम इतिहास में नहीं लिखे गए। मेरा नाम लिखा गया। पर मैं अनाम रहना पसंद करता। क्योंकि क्रांति किसी एक नाम से नहीं होती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज 2025 है। हिंदुस्तान आज़ाद है। पर मैं देखता हूँ कि तुम लोग आपस में लड़ रहे हो। हिंदू-मुस्लिम, जाति-धर्म, भाषा-प्रांत। अशफाक और मैं अगर आज ज़िंदा होते, तो हमारा पहला काम ये होता कि तुम्हें समझाते। दुश्मन बाहर नहीं, अंदर है। नफरत ही असली अंग्रेज है। मेरी कविता याद रखो:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">देश हित मतलब सिर्फ सीमा पर लड़ना नहीं। देश हित मतलब भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करना, लड़की को पढ़ाना। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मेरी फाँसी बेकार नहीं जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">काकोरी कांड में हमने आठ हजार रुपये लूटे थे। पर जो हमने लूटा वो पैसा नहीं था। हमने अंग्रेजों का डर लूटा था। हमने नौजवानों का खौफ तोड़ा था। हमने साबित किया कि 20-25 साल के लड़के भी साम्राज्य को चुनौती दे सकते हैं। आज तुम मोबाइल चलाते हो, मैं कलम चलाता था। ज़माना बदला है, लेकिन दुश्मन वही है। अन्याय, गरीबी, नफरत। मेरी कलम अब तुम्हारे हाथ में है। लिखो। बोलो। लड़ो। लेकिन याद रखो, बंदूक से पहले दिल जीतना ज़रूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जेल में मैंने कई गीत लिखे। कुछ छपे, कुछ खो गए। "सरफरोशी की तमन्ना" तो तुम जानते ही हो। पर एक और गीत था जो मैं अक्सर गाता था:  </div><div style="text-align:justify;">_"वतन पर जो फिदा होगा,  </div><div style="text-align:justify;">अमर वो नौजवान होगा।  </div><div style="text-align:justify;">रहेगा याद दुनिया में,  </div><div style="text-align:justify;">वही बेनामो-निशान होगा।"_  </div><div style="text-align:justify;">मैं चाहता था कि नौजवान डरना छोड़ दे। मरना नहीं, जीना सीखे। पर ऐसे जीना जो गुलामी में न हो। भगत सिंह ने लिखा था कि वो मेरी कविताएँ पढ़कर ही क्रांतिकारी बना। अगर मेरी एक कविता ने भगत सिंह को बना दिया, तो मेरा जीवन सफल है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मैं रामप्रसाद बिस्मिल। शाहजहाँपुर का बेटा। हिंदुस्तान का दीवाना। 30 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ गया। पर मेरे शब्द आज भी ज़िंदा हैं। अगर तुम "सरफरोशी की तमन्ना" गुनगुनाओगे, तो मैं मरा नहीं कहलाऊँगा।  </div><div style="text-align:justify;">_"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,  </div><div style="text-align:justify;">देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।"_  </div><div style="text-align:justify;">मेरी कहानी खत्म हुई। अब तुम्हारी शुरू होती है। तुम क्या करोगे? क्या तुम भी देश के लिए कुछ करोगे? या सिर्फ इतिहास पढ़कर भूल जाओगे? फैसला तुम्हारा है।</div></div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"><div class="hp"><br /></div><div class="eqJbab cZD3Qb"><br /></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:34:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का</span></p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180910/ram-prasad-bismils-immortal-name-in-the-freedom-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:31:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ऑपरेशन सिंदूर में जवानों की सेवा कर 11 वर्षीय श्रवण सिंह बना देशभक्ति, समर्पण और साहस का अद्भुत प्रतीक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178865/11-year-old-shravan-singh-became-a-wonderful-symbol-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/4488d7a01b06f10315418667501c682d17484130177341201_original.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और खेलों में खोए रहते हैं, उस उम्र में श्रवण सिंह भारतीय सेना के जवानों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर चुका था। उसका हर कदम राष्ट्रभक्ति की उस पवित्र भावना से प्रेरित था, जो किसी साधारण बच्चे में नहीं, बल्कि किसी असाधारण आत्मा में ही दिखाई देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय सेना सीमा पर पूरी मुस्तैदी से डटी हुई थी, तब श्रवण सिंह बिना किसी भय और संकोच के जवानों के बीच पहुंचता रहा। सुबह होते ही वह चाय लेकर खेतों और कच्चे रास्तों से गुजरता हुआ सेना के कैंप तक पहुंच जाता। दोपहर की भीषण गर्मी में वह जवानों के लिए बर्फ लेकर जाता ताकि देश की रक्षा में लगे सैनिकों को थोड़ी राहत मिल सके। शाम के समय वह दूध और लस्सी लेकर फिर कैंप में पहुंच जाता। उसके मन में न कोई डर था, न कोई स्वार्थ। उसके भीतर केवल एक ही भावना थी—देश के वीर जवानों की सेवा करना। यह भावना किसी किताब से नहीं आती, यह राष्ट्रप्रेम की वह आग होती है जो आत्मा में जन्म लेती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह जब जवानों के बीच जाता था तो उनके साथ बड़े गर्व से घूमता और उनकी बंदूक हाथ में लेकर कहता, “मैं भी बड़ा होकर सैनिक बनूंगा।” यह केवल एक मासूम इच्छा नहीं थी, बल्कि उस बालक के हृदय में धधकती देशभक्ति की लौ थी। उसकी आंखों में सेना की वर्दी के प्रति जो सम्मान था, वह बताता है कि भारत की नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम की भावना कितनी गहरी है। श्रवण के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जो जज्बा दिखाई देता है, वह वास्तव में करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय सेना भी इस नन्हे सिपाही के समर्पण और सेवा भावना से अत्यंत प्रभावित हुई। सेना ने श्रवण को केवल सम्मान ही नहीं दिया, बल्कि उसे अपने परिवार का हिस्सा मानते हुए “गोद” ले लिया। यह किसी भी बच्चे के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। सेना ने उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाई। जब जवानों को पता चला कि श्रवण डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा है, तब उन्होंने तुरंत उसकी चिकित्सा की व्यवस्था की। उसकी बेहतर पढ़ाई के लिए प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया गया और आगे की शिक्षा के लिए कपूरथला भेजने का निर्णय लिया गया। यह केवल सहायता नहीं, बल्कि उस देशभक्त बालक के प्रति सेना का प्रेम और सम्मान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह की कहानी यह सिद्ध करती है कि देशभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती। केवल 11 वर्ष की उम्र में उसने जो कार्य किया, वह बड़े-बड़े लोगों के लिए भी प्रेरणा बन गया। वह न किसी पुरस्कार के लिए काम कर रहा था, न किसी प्रसिद्धि के लिए। उसके मन में केवल भारत माता के प्रति प्रेम था। यही कारण है कि उसकी सेवा भावना को पूरे देश ने सलाम किया और उसे प्रधानमंत्री बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी श्रवण सिंह की खुलकर प्रशंसा की। बाल पुरस्कार समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने उसके जज्बे को याद करते हुए कहा था कि जिन कपड़ों और चप्पलों में यह बच्चा देश सेवा कर रहा था, उन्हें संभालकर रखा जाए क्योंकि वे इतिहास का हिस्सा हैं। प्रधानमंत्री के ये शब्द केवल तारीफ नहीं थे, बल्कि उस बालक के राष्ट्रप्रेम को दिया गया सर्वोच्च सम्मान थे। देश के प्रधानमंत्री का किसी छोटे बच्चे के समर्पण को इस प्रकार सम्मान देना यह दर्शाता है कि श्रवण का कार्य कितना असाधारण था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह को देशभर की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। कश्मीर से लेकर इंदौर तक उसे बुलाकर सम्मान दिया गया। उसे पहली बार हवाई जहाज में बैठाकर इंदौर ले जाया गया। यह सब उस बच्चे के लिए किसी सपने जैसा था, लेकिन इन सब उपलब्धियों के बाद भी श्रवण के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया। वह आज भी उसी सादगी और विनम्रता के साथ अपने गांव में रहता है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आईपीएल में पंजाब किंग्स की मालकिन और प्रसिद्ध अभिनेत्री प्रीति जिंटा ने भी श्रवण को मोहाली आमंत्रित किया। वहां उसने उनके साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा। लेकिन श्रवण के लिए सबसे बड़ा गौरव क्रिकेट मैच देखना नहीं, बल्कि भारतीय सेना के जवानों के बीच रहना था। उसके लिए सैनिकों की वर्दी किसी हीरो से कम नहीं थी। यही कारण है कि वह हर समय सेना के प्रति सम्मान और प्रेम से भरा दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है। उसके पिता सोना सिंह एक छोटे किसान हैं और मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इस परिवार ने अपने बेटे में देशभक्ति और संस्कारों की जो भावना जगाई, वह वास्तव में अनुकरणीय है। श्रवण के माता-पिता को भी यह अंदाजा नहीं था कि उनका छोटा-सा बेटा एक दिन पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाएगा। लेकिन सच्चाई यही है कि महानता कभी साधनों से नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से जन्म लेती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब समाज में स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की भावना बढ़ती दिखाई देती है, तब श्रवण सिंह जैसे बच्चे आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। वह बताता है कि सच्चा देशप्रेम क्या होता है। देशभक्ति केवल नारों और भाषणों से सिद्ध नहीं होती, बल्कि सेवा, त्याग और समर्पण से प्रकट होती है। श्रवण ने यह साबित कर दिया कि यदि मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम हो तो छोटी उम्र भी बड़े कार्य करने से नहीं रोक सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह वास्तव में भारत माता का वह वीर पुत्र है, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी। उसकी आंखों में सैनिक बनने का सपना केवल उसका व्यक्तिगत सपना नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरव का सपना है। वह करोड़ों बच्चों के लिए उदाहरण है कि देश के प्रति प्रेम और सम्मान बचपन से ही जीवन का सबसे बड़ा संस्कार होना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह नन्हा सिपाही केवल पंजाब का नहीं, बल्कि पूरे भारत का गौरव बन चुका है। उसकी देशभक्ति, निस्वार्थ सेवा और समर्पण की भावना हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की नई ऊर्जा भरती है। श्रवण सिंह जैसे बच्चे ही भारत के भविष्य की असली ताकत हैं, जिनके कारण यह विश्वास और मजबूत होता है कि भारत की आत्मा आज भी देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओतप्रोत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div>  <strong>    *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 15:59:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समझाइश और सख्ती से बदली तस्वीर अमरावती के नशामुक्त गांवों ने दिखाया नया रास्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महाराष्ट्र </strong>के अमरावती जिले के गांवों से निकली यह कहानी केवल एक बदलाव की नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण की कहानी है। कभी शराबखोरी के लिए बदनाम रहे ये गांव आज अनुशासन, आत्मसम्मान और जागरूकता के प्रतीक बन गए हैं। मेलबाट क्षेत्र से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे 19 गांवों को नशामुक्त बना चुका है और अब यही गांव आसपास के 20 गांवों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया बल्कि वर्षों की मेहनत, धैर्य और सामूहिक संकल्प का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इन गांवों का अतीत बेहद कठिन था। शराब यहां केवल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178068/the-picture-changed-through-persuasion-and-strictness-drug-free-villages"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महाराष्ट्र </strong>के अमरावती जिले के गांवों से निकली यह कहानी केवल एक बदलाव की नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण की कहानी है। कभी शराबखोरी के लिए बदनाम रहे ये गांव आज अनुशासन, आत्मसम्मान और जागरूकता के प्रतीक बन गए हैं। मेलबाट क्षेत्र से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे 19 गांवों को नशामुक्त बना चुका है और अब यही गांव आसपास के 20 गांवों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया बल्कि वर्षों की मेहनत, धैर्य और सामूहिक संकल्प का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन गांवों का अतीत बेहद कठिन था। शराब यहां केवल एक आदत नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। पुरुष अपनी मेहनत की कमाई शराब में खर्च कर देते थे, जिससे परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते थे। घरों में झगड़े होते थे, महिलाओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था और बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया था। सामाजिक स्तर पर भी इन गांवों की छवि खराब हो चुकी थी। रिश्तेदार तक शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रमों में इन्हें बुलाने से कतराते थे। यह सामाजिक बहिष्कार धीरे-धीरे लोगों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्थिति को बदलने के लिए आदिवासी पंचायत, समाजसेवकों, ग्रामीणों और पुलिस ने मिलकर प्रयास शुरू किए। गांवों में लगातार बैठकें आयोजित की गईं। लोगों को समझाया गया कि नशा उनके शरीर, परिवार और भविष्य के लिए कितना घातक है। शुरुआत में इन प्रयासों का विरोध हुआ। कई लोग अपनी आदत छोड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन समझाइश का सिलसिला रुका नहीं। धीरे-धीरे लोगों की सोच में बदलाव आने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब केवल समझाने से बात नहीं बनी तो पंचायत ने सख्ती का रास्ता अपनाया। गांव में शराब पीने वाले और शराब परोसने वाले दोनों पर पांच हजार रुपये का जुर्माना तय किया गया। यह नियम सभी पर समान रूप से लागू किया गया और इसका कड़ाई से पालन किया गया। इस निर्णय ने लोगों को झकझोर दिया। शुरुआत में लोग डर के कारण शराब से दूर रहने लगे, लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने इसके सकारात्मक परिणाम देखे, यह बदलाव उनकी आदत बन गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लगातार सात वर्षों तक चले इस अभियान ने आखिरकार सफलता दिलाई। 19 गांव पूरी तरह नशामुक्त हो गए। यह उपलब्धि केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन गई। गांवों में नियमित बैठकों का आयोजन जारी रहा जिससे लोगों को लगातार जागरूक किया जाता रहा। यह निरंतर प्रयास ही इस सफलता की असली ताकत बना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नशा छोड़ने के बाद इन गांवों में सबसे बड़ा बदलाव सामाजिक सम्मान के रूप में देखने को मिला। जिन लोगों को पहले समाज में तिरस्कार झेलना पड़ता था, उन्हें अब सम्मान के साथ स्वीकार किया जाने लगा। शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में उन्हें बुलाया जाने लगा। यह बदलाव उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक स्तर पर भी बड़ा परिवर्तन आया। पहले जो पैसा शराब में बर्बाद होता था, अब वही पैसा घर के सुधार, बच्चों की पढ़ाई और बचत में खर्च होने लगा। टूटे-फूटे घरों की जगह पक्के मकान बनने लगे। कई लोगों ने छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू किए। कोई किराना दुकान चलाने लगा तो कोई दूध बेचने लगा। इससे गांवों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बदलाव का सबसे सकारात्मक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा। पहले महिलाएं आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान रहती थीं, लेकिन अब उनके जीवन में स्थिरता आई है। उनके हाथ में पैसे बचने लगे हैं और वे परिवार के निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं। बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलने लगी है। जो बच्चे पहले स्कूल नहीं जा पाते थे, अब वे शहरों में पढ़ाई कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरी कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू यह है कि जो लोग कभी शराब के आदी थे, वही अब नशामुक्ति के सबसे बड़े प्रचारक बन गए हैं। उन्होंने अपनी गलतियों से सीख ली और अब वे दूसरों को उसी रास्ते पर चलने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने टीम बनाकर आसपास के 20 गांवों में जागरूकता अभियान शुरू किया है। वे गांव-गांव जाकर लोगों को बताते हैं कि शराब किस तरह शरीर और परिवार को नुकसान पहुंचाती है और कैसे इससे बाहर निकलकर जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनकी बातों का असर इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि वे खुद इस अनुभव से गुजर चुके हैं। वे लोगों को केवल सलाह नहीं देते बल्कि अपनी जीवन कहानी साझा करते हैं। यह सच्चाई लोगों को गहराई से प्रभावित करती है और उन्हें सोचने पर मजबूर करती है। आज यह पहल एक जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। लोग एक-दूसरे को प्रेरित कर रहे हैं और नशामुक्ति को अपनी जिम्मेदारी मान रहे हैं। यह सामूहिक जागरूकता ही इस सफलता की सबसे बड़ी वजह है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में नशे की समस्या एक गंभीर चुनौती है। हर साल हजारों लोग शराब और तंबाकू के कारण अपनी जान गंवाते हैं। इसके बावजूद लोग इस खतरे को नजरअंदाज करते रहते हैं। ऐसे में अमरावती के गांवों की यह पहल एक नई दिशा दिखाती है। यह साबित करती है कि अगर समाज जागरूक हो जाए और मिलकर प्रयास करे तो किसी भी बुराई को खत्म किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">समझाइश और सख्ती का संतुलित मेल इस सफलता की कुंजी रहा है। केवल कानून से बदलाव संभव नहीं होता और केवल समझाने से भी हर बार परिणाम नहीं मिलता। जब दोनों का सही संतुलन बनाया जाता है तब स्थायी परिवर्तन संभव होता है। अमरावती के गांवों ने यही कर दिखाया है।</div>
<div style="text-align:justify;">आज जब ये गांव दूसरे गांवों को नशामुक्त करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं तो यह स्पष्ट है कि यह पहल केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी। यह धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है। अगर देश के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के प्रयास किए जाएं तो नशामुक्त भारत का सपना साकार हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">अमरावती की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि बदलाव बाहर से नहीं बल्कि भीतर से आता है। जब समाज खुद अपने दोषों को पहचानकर उन्हें सुधारने का प्रयास करता है तो कोई भी समस्या बड़ी नहीं रहती। यह केवल नशामुक्ति की कहानी नहीं बल्कि आत्मसम्मान, एकता और बेहतर भविष्य की दिशा में उठाए गए मजबूत कदम की कहानी है।</div>
<div style="text-align:justify;">        <strong>*कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:19:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसान के बेटे ने बदली तकदीर, पिछड़े बहुल तराई क्षेत्र के अंकुर सिद्धार्थ बने नायब तहसीलदार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बलरामपुर( रमईडीह)- </strong>विकास खण्ड बलरामपुर के बलुई ग्रामीण और तराई बहुल क्षेत्र से एक ऐसी सफलता की कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ पूरे इलाके का मान बढ़ाया है, बल्कि संघर्ष कर रहे युवाओं के लिए नई राह भी दिखाई है। ग्राम पंचायत बलुई निवासी किसान परिवार के होनहार पुत्र अंकुर सिद्धार्थ , पिता अरविन्द कुमार, का चयन प्रतिष्ठित नयाब तहसीलदार के पद पर हुआ है। अंकुर की इस ऐतिहासिक सफलता की खबर मिलते ही गांव, क्षेत्र और जनपद में खुशी की लहर दौड़ गई। बधाई देने वालों का उनके घर पर तांता लग गया। अध्यापक हरीशचंद्र लेखपाल श्रीनिवासन,राजू</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174688/farmers-son-changed-his-destiny-ankur-siddharth-of-backward-dominated"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260331-wa0392.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बलरामपुर( रमईडीह)- </strong>विकास खण्ड बलरामपुर के बलुई ग्रामीण और तराई बहुल क्षेत्र से एक ऐसी सफलता की कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ पूरे इलाके का मान बढ़ाया है, बल्कि संघर्ष कर रहे युवाओं के लिए नई राह भी दिखाई है। ग्राम पंचायत बलुई निवासी किसान परिवार के होनहार पुत्र अंकुर सिद्धार्थ , पिता अरविन्द कुमार, का चयन प्रतिष्ठित नयाब तहसीलदार के पद पर हुआ है। अंकुर की इस ऐतिहासिक सफलता की खबर मिलते ही गांव, क्षेत्र और जनपद में खुशी की लहर दौड़ गई। बधाई देने वालों का उनके घर पर तांता लग गया। अध्यापक हरीशचंद्र लेखपाल श्रीनिवासन,राजू यादव, श्याम सुंदर , अभिनव,कमल अधिवक्ता महेंद्र तिवारी विधायक पलटूं राम सहित दर्जनों ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षकों ने इसे पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का क्षण बताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>साधारण पृष्ठभूमि, असाधारण उपलब्धि</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अंकुर सिद्धार्थ एक साधारण किसान परिवार से आते हैं, जहां संसाधनों की कमी हमेशा चुनौती बनी रही। बावजूद इसके उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। सीमित सुविधाओं और ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि मेहनत और लगन के दम पर किसी भी मुकाम को हासिल किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गांव से शुरू हुई सफलता की यात्रा</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अंकुर सिद्धार्थ की प्रारम्भिक शिक्षा कक्षा 1 से 5 तक किसान आदर्श बाल विद्या मंदिर रमई डीह से हुई, जहां से उन्होंने अपनी नींव मजबूत की। इसके बाद उन्होंने कक्षा 6 से कक्षा 12 तक नवोदय विद्यालय बलरामपुर से उत्तीर्ण की। बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से आई, आई,टी बीटेक की डिग्री हासिल की। शिक्षा के हर पड़ाव पर उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>संघर्ष, मेहनत और संकल्प की मिसाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अंकुर की सफलता के पीछे वर्षों की कठिन मेहनत, अनुशासन और मजबूत संकल्प है। ग्रामीण परिवेश में पढ़ाई के दौरान कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन उन्होंने हर मुश्किल को अवसर में बदलते हुए अपने सपनों को साकार किया। युवाओं के लिए प्रेरणा अंकुर सिद्धार्थ की यह उपलब्धि आज क्षेत्र के हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के छात्र-छात्राओं के लिए यह संदेश है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो सफलता अवश्य मिलती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गांव में जश्न का माहौल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अकुर के चयन की खबर मिलते ही उनके गांव बलुई सहित पूरे क्षेत्र में जश्न का माहौल है। लोगों ने मिठाई बांटकर अपनी खुशी का इजहार किया और अंकुर सिद्धार्थ के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। ग्रामीणों का कहना है कि अंकुर ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी शहर या संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि सही दिशा और मेहनत से हर सपना साकार किया जा सकता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/174688/farmers-son-changed-his-destiny-ankur-siddharth-of-backward-dominated</link>
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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 19:03:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसान के बेटे ने बदली तकदीर, थारू बहुल क्षेत्र के अर्जुन चौधरी बने असिस्टेंट कमिश्नर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>रमेश कुमार यादव </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बलरामपुर।</strong> जनपद के सुदूर ग्रामीण और थारू बहुल क्षेत्र से एक ऐसी सफलता की कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ पूरे इलाके का मान बढ़ाया है, बल्कि संघर्ष कर रहे युवाओं के लिए नई राह भी दिखाई है। विकास खंड पचपेड़वा के ग्राम पंचायत विशुनपुर विश्राम के मजरा मसहा निवासी किसान परिवार के होनहार पुत्र अर्जुन कुमार चौधरी, पिता हरी चरन, का चयन प्रतिष्ठित असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर हुआ है। अर्जुन की इस ऐतिहासिक सफलता की खबर मिलते ही गांव, क्षेत्र और जनपद में खुशी की लहर दौड़ गई। बधाई देने वालों का उनके घर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174568/farmers-son-changed-his-destiny-arjun-choudhary-became-assistant-commissioner"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1001674864.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>रमेश कुमार यादव </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बलरामपुर।</strong> जनपद के सुदूर ग्रामीण और थारू बहुल क्षेत्र से एक ऐसी सफलता की कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ पूरे इलाके का मान बढ़ाया है, बल्कि संघर्ष कर रहे युवाओं के लिए नई राह भी दिखाई है। विकास खंड पचपेड़वा के ग्राम पंचायत विशुनपुर विश्राम के मजरा मसहा निवासी किसान परिवार के होनहार पुत्र अर्जुन कुमार चौधरी, पिता हरी चरन, का चयन प्रतिष्ठित असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर हुआ है। अर्जुन की इस ऐतिहासिक सफलता की खबर मिलते ही गांव, क्षेत्र और जनपद में खुशी की लहर दौड़ गई। बधाई देने वालों का उनके घर पर तांता लग गया। ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षकों ने इसे पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का क्षण बताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>साधारण पृष्ठभूमि, असाधारण उपलब्धि</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन कुमार चौधरी एक साधारण किसान परिवार से आते हैं, जहां संसाधनों की कमी हमेशा चुनौती बनी रही। बावजूद इसके उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। सीमित सुविधाओं और ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि मेहनत और लगन के दम पर किसी भी मुकाम को हासिल किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गांव से शुरू हुई सफलता की यात्रा</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन की प्रारम्भिक शिक्षा लव्य विद्या निकेतन, विशुनपुर विश्राम से हुई, जहां से उन्होंने अपनी नींव मजबूत की। इसके बाद उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा गांधी स्मारक विद्यालय, बढ़ाई पुरवा से उत्तीर्ण की। इंटरमीडिएट की पढ़ाई गोंडा से पूरी करने के बाद उन्होंने स्नातक की डिग्री विमला विक्रम महाविद्यालय, पचपेड़वा से हासिल की। शिक्षा के हर पड़ाव पर उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>संघर्ष, मेहनत और संकल्प की मिसाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन की सफलता के पीछे वर्षों की कठिन मेहनत, अनुशासन और मजबूत संकल्प है। ग्रामीण परिवेश में पढ़ाई के दौरान कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन उन्होंने हर मुश्किल को अवसर में बदलते हुए अपने सपनों को साकार किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>युवाओं के लिए प्रेरणा</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन कुमार चौधरी की यह उपलब्धि आज क्षेत्र के हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के छात्र-छात्राओं के लिए यह संदेश है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो सफलता अवश्य मिलती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गांव में जश्न का माहौल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन के चयन की खबर मिलते ही उनके गांव मसहा सहित पूरे विशुनपुर विश्राम क्षेत्र में जश्न का माहौल है। लोगों ने मिठाई बांटकर अपनी खुशी का इजहार किया और अर्जुन के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। ग्रामीणों का कहना है कि अर्जुन ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी शहर या संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि सही दिशा और मेहनत से हर सपना साकार किया जा सकता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 19:33:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>संघर्ष से सफलता तक: ऋषभ चौरसिया बने युवाओं के प्रेरणास्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong> आज के दौर में जहां युवा अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं रिशब चौरसिया ने अपने हुनर, मेहनत और समर्पण से पूरे देश में एक खास मुकाम हासिल किया है। डांस, स्पोर्ट्स, फिटनेस और समाजसेवा जैसे कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परचम लहराते हुए उन्होंने न केवल खुद को स्थापित किया, बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा भी बने हैं।ऋषभ चौरसिया का सफर आसान नहीं रहा, लेकिन उनकी लगन और मेहनत ने उन्हें लगातार आगे बढ़ाया। उन्होंने द डांस कम्पनी इंडिया में पूरे देश के टॉप 30 में अपनी जगह बनाई।</div>
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<div style="text-align:justify;">इसके साथ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173732/from-struggle-to-success-rishabh-chaurasia-became-a-source-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260320-wa0219.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong> आज के दौर में जहां युवा अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं रिशब चौरसिया ने अपने हुनर, मेहनत और समर्पण से पूरे देश में एक खास मुकाम हासिल किया है। डांस, स्पोर्ट्स, फिटनेस और समाजसेवा जैसे कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परचम लहराते हुए उन्होंने न केवल खुद को स्थापित किया, बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा भी बने हैं।ऋषभ चौरसिया का सफर आसान नहीं रहा, लेकिन उनकी लगन और मेहनत ने उन्हें लगातार आगे बढ़ाया। उन्होंने द डांस कम्पनी इंडिया में पूरे देश के टॉप 30 में अपनी जगह बनाई।</div>
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<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही वे 2013 में नेशनल फुटबॉल प्लेयर के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं।उनकी उपलब्धियों की सूची काफी लंबी है—वे मिस्टर इंडिया के प्रथम विजेता रहे हैं और वर्ष 2023 में मिस्टर वर्सटाइल का खिताब भी अपने नाम किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने देश का नाम रोशन किया, जहां 2022 में वर्ल्ड डांस ओलंपियाड में दूसरा स्थान प्राप्त किया।डांस की दुनिया में उनकी पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें 2022 और 2023 में बेस्ट कोरियोग्राफर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा उन्हें भारत गौरव सम्मान 2022, गांधी स्मृति सम्मान और इंडियन कल्चर अवॉर्ड 2022 जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है।रिशब चौरसिया कई रियलिटी शोज़ जैसे इंडिया टैलेंट, टैलेंट प्लस सीजन-2 और द फेमेड डांस चैंपियनशिप में भी चयनित रह चुके हैं। साथ ही उन्होंने इंटरनेशनल ग्रूवफेस्ट के तहत मलेशिया और वियतनाम जैसे देशों में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।सिर्फ डांस ही नहीं, वे मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स और फिटनेस के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने आर डी एक्स योगा सेंटर, डांस सेंटर, मॉडलिंग क्लास, म्यूजिक क्लास, फिटनेस एवं एक्सरसाइज सेंटर और इवेंट मैनेजमेंट जैसी कई संस्थाओं की स्थापना कर युवाओं को मंच प्रदान किया है।शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। वे गवर्नमेंट ऑफ इंडिया उद्यम से प्रमाणित हैं और चंडीगढ़ छाया स्कूल ऑफ आर्ट के प्रिंसिपल के रूप में कार्य कर चुके हैं। साथ ही कोलकाता सुरो भारती यूनिवर्सिटी से प्रमाणित सेंटर संचालित करते हैं और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में एग्जामिनर के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले 15 वर्षों से वे एक सर्टिफाइड डांस टीचर के रूप में कई स्कूलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। वे बॉलीवुड और भोजपुरी एल्बमों में भी कलाकारों को डांस सिखा चुके हैं। समाज सेवा के क्षेत्र में भी ऋषभ चौरसिया पीछे नहीं हैं। वे सिविल डिफेंस में फायर फाइटर के रूप में कार्यरत हैं और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में डांस सिखाकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देते हैं।ऋषभ चौरसिया का मानना है कि “अगर मेहनत सच्ची हो तो कोई भी सपना दूर नहीं।” आज वे न केवल एक सफल कलाकार और ट्रेनर हैं, बल्कि समाज के लिए एक सच्चे मार्गदर्शक भी बन चुके हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 19:37:43 +0530</pubDate>
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