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                <title>organic farming India - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183198/steps-towards-natural-farming"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है, बल्कि जल संरक्षण, कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संतुलन और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भी प्रभावी भूमिका निभाती है। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय ने सौराष्ट्र क्षेत्र के विभिन्न जिलों में मिट्टी के नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर प्राकृतिक खेती के प्रभावों का अध्ययन किया।  इस शोध में सामने आया कि जिन खेतों में लगातार पांच वर्षों तक प्राकृतिक खेती अपनाई गई, वहां मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा 0.45 प्रतिशत से बढ़कर 0.93 प्रतिशत तक पहुंच गई। किसी भी कृषि भूमि के लिए ऑर्गेनिक कार्बन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यही मिट्टी की उर्वरता, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता और पौधों के पोषण का आधार होता है। ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ने का अर्थ है कि मिट्टी अधिक जीवंत, उपजाऊ और दीर्घकाल तक उत्पादन देने में सक्षम हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शोध में यह भी पाया गया कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले खेतों में वर्षा और सिंचाई का पानी पहले की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में मिट्टी के भीतर समा रहा है। पानी के समाने की दर 6.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा से बढ़कर 14.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा हो गई। इससे वर्षा जल का बेहतर संरक्षण संभव हुआ और भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिला। इसी प्रकार मिट्टी की नमी संग्रहण क्षमता 12.75 प्रतिशत से बढ़कर 19.84 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका सीधा लाभ किसानों को सूखे की स्थिति में मिलता है क्योंकि मिट्टी लंबे समय तक नमी बनाए रखती है और फसलों को बार-बार सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है।</div>
<div style="text-align:justify;">मिट्टी की संरचना में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। प्राकृतिक खेती वाले खेतों में मिट्टी की छिद्रता 34.63 प्रतिशत से बढ़कर 41.08 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिससे पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा और पानी मिलना संभव हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं मिट्टी का घनत्व भी कम हुआ, जिससे भूमि अधिक भुरभुरी और खेती के लिए अनुकूल बनी। ऐसी मिट्टी में जड़ों का विकास बेहतर होता है और पौधे अधिक स्वस्थ रहते हैं। सौराष्ट्र के विभिन्न जिलों में किए गए अध्ययन से यह भी सामने आया कि ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा हर जिले में अलग-अलग है। पोरबंदर की मिट्टी में सबसे अधिक 0.82 प्रतिशत ऑर्गेनिक कार्बन दर्ज किया गया, जबकि गिर सोमनाथ में 0.75 प्रतिशत और जूनागढ़ में 0.72 प्रतिशत पाया गया। दूसरी ओर सुरेंद्रनगर, भावनगर और जामनगर में यह मात्रा अपेक्षाकृत कम रही। पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र का औसत ऑर्गेनिक कार्बन 0.57 प्रतिशत दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती का विस्तार होगा, वहां यह स्तर आने वाले वर्षों में और बेहतर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सीमित उपयोग, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण, जीवामृत और अन्य प्राकृतिक घोलों का प्रयोग तथा न्यूनतम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन संग्रहण की क्षमता बढ़ती है। शोध के अनुसार प्राकृतिक खेती के माध्यम से प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष चार से आठ टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का जलवायु लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है और खेती जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहयोगी बनती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही कारण है कि आज प्राकृतिक खेती को केवल वैकल्पिक कृषि पद्धति नहीं बल्कि "क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर" के रूप में देखा जा रहा है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और जल संकट जैसी परिस्थितियों में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। कम लागत, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता इसे भविष्य की कृषि व्यवस्था का मजबूत आधार बना रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों की रुचि लगातार बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में हजारों किसान इस पद्धति को अपना चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारें भी प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान और वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही हैं। किसानों के सफल अनुभव दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। जो किसान पहले रासायनिक खेती छोड़ने को लेकर आशंकित थे, वे अब प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणाम देखकर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का आर्थिक पक्ष भी किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और महंगे कृषि रसायनों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गोबर, गोमूत्र, जैविक अवशेष और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। इसके साथ ही प्राकृतिक तरीके से उत्पादित खाद्यान्न, फल और सब्जियों की बाजार में मांग भी बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बन रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी प्राकृतिक खेती का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रासायनिक अवशेषों से मुक्त खाद्यान्न उपभोक्ताओं को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हैं। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता के कारण लोग प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे किसानों के लिए नए बाजार और अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का शोध यह स्पष्ट संदेश देता है कि प्राकृतिक खेती केवल भावनात्मक या पारंपरिक विचार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित एक प्रभावी कृषि प्रणाली है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जल संरक्षण करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने, खेती की लागत कम करने और किसानों की आय बढ़ाने जैसे अनेक क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। यदि देश में प्राकृतिक खेती का दायरा लगातार बढ़ता है, तो यह केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं करेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास के राष्ट्रीय उद्देश्यों को भी नई दिशा देगी। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का यह शोध इसी परिवर्तन की मजबूत वैज्ञानिक पुष्टि है और यह विश्वास जगाता है कि भविष्य की समृद्ध खेती प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 22:09:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारतीय कृषि एक अहम मोड़ पर: अब बदलने का समय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">आज भारतीय खेती एक ऐसे दौर में खड़ी है, जहाँ बदलाव जरूरी हो गया है। मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी बारिश समय पर नहीं होती, कभी जरूरत से ज्यादा हो जाती है। तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। इन सबका सीधा असर खेती और किसानों की कमाई पर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ मौसम ही नहीं, हमारी कुछ खेती की आदतें भी परेशानी बढ़ा रही हैं। जैसे जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल करना, रासायनिक खादों पर ज्यादा निर्भर रहना और पराली जलाना। इससे मिट्टी कमजोर हो रही है और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है। धीरे-धीरे इससे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177724/indian-agriculture-is-at-a-critical-juncture-now-is-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/whatsapp-image-2026-04-30-at-8.20.18-pm-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज भारतीय खेती एक ऐसे दौर में खड़ी है, जहाँ बदलाव जरूरी हो गया है। मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी बारिश समय पर नहीं होती, कभी जरूरत से ज्यादा हो जाती है। तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। इन सबका सीधा असर खेती और किसानों की कमाई पर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ मौसम ही नहीं, हमारी कुछ खेती की आदतें भी परेशानी बढ़ा रही हैं। जैसे जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल करना, रासायनिक खादों पर ज्यादा निर्भर रहना और पराली जलाना। इससे मिट्टी कमजोर हो रही है और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है। धीरे-धीरे इससे फसल की पैदावार भी कम हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/whatsapp-image-2026-04-30-at-8.20.18-pm.jpeg" alt="भारतीय कृषि एक अहम मोड़ पर: अब बदलने का समय" width="527" height="351"></img></p>
<p style="text-align:justify;">भारत में बहुत बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। लेकिन यही क्षेत्र मौसम के बदलाव से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। अगर मानसून कमजोर पड़ जाए या अचानक गर्मी बढ़ जाए, तो इसका असर सिर्फ खेत तक नहीं रहता—किसानों की आय, बाजार के दाम और पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अब “जलवायु के हिसाब से खेती” अपनाना जरूरी हो गया है। इसका मतलब है पानी का सही इस्तेमाल, मौसम के अनुसार फसल चुनना, मिट्टी की सेहत बनाए रखना और पराली जलाने से बचना। ये छोटे-छोटे कदम आगे चलकर बड़ा फर्क ला सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छी बात ये है कि इस दिशा में काम शुरू हो चुका है। कई संस्थाएं किसानों को नई तकनीकें सिखा रही हैं। सरकार भी कई योजनाओं के जरिए मदद कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत पानी बचाने पर जोर दिया जा रहा है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड से किसानों को पता चलता है कि खेत में किस तरह की खाद कितनी मात्रा में डालनी है। परंपरागत कृषि विकास योजना से जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन मौसम के असर को कम करने पर काम करता है, और फसल बीमा योजना मुश्किल समय में किसानों को आर्थिक सहारा देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिशा सही है, लेकिन काम को और तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है। क्योंकि मौसम तेजी से बदल रहा है, तो हमें भी उतनी ही जल्दी कदम उठाने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सीधी बात है—आज जो फैसले हम लेंगे, वही कल की खेती तय करेंगे। अगर अभी सही कदम उठाए गए, तो हम किसानों को मजबूत बना सकते हैं, खाने की सुरक्षा बनाए रख सकते हैं और गांव की अर्थव्यवस्था को बेहतर कर सकते हैं। अब समय है—किसानों का साथ देने का, पर्यावरण को बचाने का और सही दिशा में आगे बढ़ने का।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. नवाज़ अहमद खान<br />प्रोफेसर<br />आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 20:52:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जलवायु अनुकूलन खेती आज के समय कि मांग - नसीम अंसारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़।</strong> पृथ्वी दिवस सप्ताह के अवसर पर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से शनिवार को स्वयंसेवी संस्था तरुण चेतना द्वारा ग्राम रामपुर बेला में पृथ्वी दिवस समारोह उत्साहपूर्वक मनाया गया।इस अवसर पर 'तरुण चेतना' के निदेशक नसीम अंसारी ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में पृथ्वी को बचाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्यता बन गई है।अंसारी ने जलवायु-स्मार्ट कृषि पर जोर देते हुए बताया कि यह पद्धति एक एकीकृत दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य बदलते मौसम में कृषि उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177247/climate-adaptation-farming-is-the-need-of-the-hour-%E2%80%93"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260425-wa00641.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़।</strong> पृथ्वी दिवस सप्ताह के अवसर पर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से शनिवार को स्वयंसेवी संस्था तरुण चेतना द्वारा ग्राम रामपुर बेला में पृथ्वी दिवस समारोह उत्साहपूर्वक मनाया गया।इस अवसर पर 'तरुण चेतना' के निदेशक नसीम अंसारी ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में पृथ्वी को बचाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्यता बन गई है।अंसारी ने जलवायु-स्मार्ट कृषि पर जोर देते हुए बताया कि यह पद्धति एक एकीकृत दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य बदलते मौसम में कृषि उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन विकसित करना और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में पृथ्वी संरक्षण पर प्रकाश डालते हुए संस्था के उप निदेशक श्याम शंकर शुक्ला ने कहा कि वैज्ञानिक और प्राकृतिक खेती के माध्यम से हम मिट्टी की उर्वरता बनाए रख सकते हैं और जल संरक्षण को बढ़ावा दे सकते हैं। इससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलेगी।संस्था के उप निदेशक श्याम शंकर शुक्ला ने पृथ्वी संरक्षण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्षा जल संचयन और पानी की बर्बादी रोकने के तरीकों पर चर्चा करते हुए एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का पूरी तरह बहिष्कार करने की अपील की। इस अवसर पर ग्राम प्रधान शिवकुमारी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ग्राम स्तर पर छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने ग्रामीणों से स्वच्छता और हरियाली बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। इसी क्रम में समाजसेवी रामआसरे वर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होना चाहिए और अपने दैनिक जीवन में ऐसे कार्य करने चाहिए जो प्रकृति के अनुकूल हों। इस मौके पर तरुण चेतना के अभियान समन्वयक हुश्नारा बानो ने कहा कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ वातावरण छोड़ना हमारा नैतिक कर्तव्य है।कार्यक्रम का संचालन बाल अधिकार परियोजना के कोऑर्डिनेटर रजनीश कुमार द्वारा किया गया। कार्यक्रम में कलावती, संस्था के सह-निदेशक हकीम अंसारी, शोभावती मौर्या, सावित्री देवी, बृजलाल वर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:12:04 +0530</pubDate>
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                <title>कलवारी में पीएम प्रणाम – किसान सभा” आयोजित</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> बस्ती जिले के कलवारी थाना क्षेत्र है किसानों को जागरूक करने के लिए  पीएमकेएसके कृषक भारती सेवा केंद्र, कलवारी पर “पीएम प्रणाम  किसान सभा” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में किसानों को आधुनिक खेती के साथ उर्वरकों के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग के प्रति जागरूक किया गया।सभा के मुख्य अतिथि ग्राम प्रधान अगौना विजय यादव एवं कृभको बस्ती के क्षेत्रीय प्रतिनिधि सुदीप सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए कृभको के उत्पाद रायजोसुपर, सिवारिका, जिंक तथा बायो-फर्टिलाइजर के प्रभावी उपयोग की जानकारी दी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उन्होंने बताया कि पीएम प्रणाम योजना के तहत रासायनिक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग कर लागत घटाई</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176941/pm-pranam-%E2%80%93-kisan-sabha%E2%80%9D-organized-in-calvary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260422-wa0043.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> बस्ती जिले के कलवारी थाना क्षेत्र है किसानों को जागरूक करने के लिए  पीएमकेएसके कृषक भारती सेवा केंद्र, कलवारी पर “पीएम प्रणाम  किसान सभा” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में किसानों को आधुनिक खेती के साथ उर्वरकों के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग के प्रति जागरूक किया गया।सभा के मुख्य अतिथि ग्राम प्रधान अगौना विजय यादव एवं कृभको बस्ती के क्षेत्रीय प्रतिनिधि सुदीप सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए कृभको के उत्पाद रायजोसुपर, सिवारिका, जिंक तथा बायो-फर्टिलाइजर के प्रभावी उपयोग की जानकारी दी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उन्होंने बताया कि पीएम प्रणाम योजना के तहत रासायनिक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग कर लागत घटाई जा सकती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनाए रखी जा सकती है। इस अवसर पर कृषक भारती सेवा केंद्र कलवारी के सचिव शिवम गुप्ता ने किसानों से अपील की कि भविष्य में खाद की संभावित समस्या से बचने के लिए सभी किसान शीघ्र अपनी फार्मर रजिस्ट्री कराएं, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर मिल सके। कार्यक्रम में क्षेत्र के अनेक किसान मौजूद रहे और उन्होंने कृषि से जुड़े विभिन्न विषयों पर जानकारी प्राप्त की गई।</div></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>किसान</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 19:31:32 +0530</pubDate>
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                <title>अमेठी में श्रीअन्न (मिलेट्स) को बढ़ावा देने के लिए भव्य रोड शो आयोजित</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अमेठी।</strong> जनपद में संचालित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन कार्यक्रम के अंतर्गत शुक्रवार को श्रीअन्न (मिलेट्स) की खेती को बढ़ावा देने और इसके पोषण संबंधी लाभों के प्रति जागरूकता फैलाने हेतु जनपद स्तरीय रोड शो का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ जिलाधिकारी संजय चौहान ने कलेक्ट्रेट परिसर से हरी झंडी दिखाकर किया। यह रोड शो लगभग 100 दोपहिया वाहनों और दो प्रचार वाहनों के माध्यम से कलेक्ट्रेट गौरीगंज से कृषि भवन ताला तक निकाला गया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर कृषि विभाग के उप कृषि निदेशक सतेन्द्र कुमार, भूमि संरक्षण अधिकारी संदीप कुमार, जिला उद्यान अधिकारी रणविजय सिंह सहित अन्य</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173720/grand-road-show-organized-in-amethi-to-promote-sri-anna"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/2-6.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अमेठी।</strong> जनपद में संचालित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन कार्यक्रम के अंतर्गत शुक्रवार को श्रीअन्न (मिलेट्स) की खेती को बढ़ावा देने और इसके पोषण संबंधी लाभों के प्रति जागरूकता फैलाने हेतु जनपद स्तरीय रोड शो का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ जिलाधिकारी संजय चौहान ने कलेक्ट्रेट परिसर से हरी झंडी दिखाकर किया। यह रोड शो लगभग 100 दोपहिया वाहनों और दो प्रचार वाहनों के माध्यम से कलेक्ट्रेट गौरीगंज से कृषि भवन ताला तक निकाला गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर कृषि विभाग के उप कृषि निदेशक सतेन्द्र कुमार, भूमि संरक्षण अधिकारी संदीप कुमार, जिला उद्यान अधिकारी रणविजय सिंह सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। उप कृषि निदेशक ने बताया कि इस रोड शो का मुख्य उद्देश्य किसानों और आमजन को मिलेट्स (ज्वार, बाजरा, रागी, कंगनी, कोदो, सांवा, चेना, कुटकी, रामदाना एवं कुट्ट) के महत्व के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने बताया कि मिलेट्स को “सुपर फूड” कहा जाता है, क्योंकि इनमें प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि श्रीअन्न ग्लूटेन-फ्री होने के साथ-साथ विटामिन, एंजाइम और इनसॉल्युबल फाइबर से भरपूर होता है। इसके अलावा इसमें बीटा-कैरोटीन, नियासिन, विटामिन बी-6, फोलिक एसिड, पोटैशियम, मैग्नीशियम और जस्ता जैसे खनिज भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से श्रीअन्न अत्यंत लाभकारी है। इसके सेवन से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, शरीर में ऑक्सीजन आपूर्ति बढ़ती है और मेटाबॉलिज्म संतुलित रहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उच्च फाइबर होने के कारण यह पाचन में सहायक है और डायबिटीज मरीजों में ग्लूकोज स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। साथ ही यह ब्लड प्रेशर नियंत्रण, हृदय रोगों से बचाव और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी सहायक है। कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को श्रीअन्न की खेती अपनाने और आमजन को इसे दैनिक आहार में शामिल करने के लिए प्रेरित किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 19:07:29 +0530</pubDate>
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