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                <title>बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य RSS Feed</description>
                
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                <title>बाल संरक्षण की आवश्यकता और वैश्विक प्रयास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस प्रत्येक वर्ष 1 जून को विश्वभर में मनाया जाता है। यह दिवस बच्चों की सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से समर्पित है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके बच्चे होते हैं क्योंकि वही भविष्य के नागरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकार और नीति निर्माता बनते हैं। यदि बच्चों को सुरक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षित और स्वस्थ वातावरण प्राप्त हो तो राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि वे शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबी और उपेक्षा का सामना करते हैं</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180366/child-protection-needs-and-global-efforts"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/image.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस प्रत्येक वर्ष 1 जून को विश्वभर में मनाया जाता है। यह दिवस बच्चों की सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से समर्पित है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके बच्चे होते हैं क्योंकि वही भविष्य के नागरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकार और नीति निर्माता बनते हैं। यदि बच्चों को सुरक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षित और स्वस्थ वातावरण प्राप्त हो तो राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि वे शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबी और उपेक्षा का सामना करते हैं तो समाज का विकास भी प्रभावित होता है। इसी कारण बाल सुरक्षा केवल सामाजिक विषय नहीं बल्कि मानवीय और नैतिक दायित्व भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस का इतिहास 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों से जुड़ा हुआ है। 1925 में स्विट्जरलैंड के जिनेवा में बच्चों के कल्याण पर एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों पर विशेष चर्चा हुई। बाद में 1949 में मास्को में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महिला लोकतांत्रिक संघ की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि बच्चों के संरक्षण और अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए एक विशेष दिवस मनाया जाना चाहिए। इसके बाद 1 जून 1950 को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस मनाया गया। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण लाखों बच्चे अनाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विस्थापित और निर्धन हो चुके थे। युद्ध ने बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला था और उनकी सुरक्षा के लिए वैश्विक प्रयासों की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। यही कारण था कि इस दिवस को मानवीय संवेदना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का प्रतीक माना गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ इस दिवस का महत्व लगातार बढ़ता गया। संयुक्त राष्ट्र ने भी बच्चों के अधिकारों को वैश्विक स्तर पर महत्व दिया। 1954 में विश्व बाल दिवस की स्थापना की गई और 20 नवंबर 1959 को बाल अधिकारों की घोषणा स्वीकार की गई। इसके बाद 1989 में बाल अधिकारों पर सम्मेलन को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपनाया। इस सम्मेलन में बच्चों के शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिव्यक्ति और विकास के अधिकारों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई। आज विश्व के अधिकांश देश बाल अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी अनेक क्षेत्रों में बच्चों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा है। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि आत्मविश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक और व्यक्तित्व निर्माण का आधार है। एक शिक्षित बच्चा अपने अधिकारों को समझता है और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाने में सक्षम बनता है। फिर भी आज विश्व में करोड़ों बच्चे विद्यालय से दूर हैं। गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक असमानता और बाल श्रम इसके प्रमुख कारण हैं। अनेक बच्चे आर्थिक मजबूरी के कारण छोटी आयु में काम करने लगते हैं जिससे उनका बचपन छिन जाता है। बाल श्रम बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास को प्रभावित करता है तथा उन्हें शोषण के चक्र में फँसा देता है। इसलिए सरकारों और सामाजिक संगठनों का यह दायित्व है कि वे प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा पहुँचाएँ और बाल श्रम को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाएँ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाल विवाह भी बाल अधिकारों के लिए एक गंभीर चुनौती है। अनेक समाजों में आज भी कम आयु में बच्चों विशेषकर बालिकाओं का विवाह कर दिया जाता है। इससे उनकी शिक्षा बाधित होती है और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कम आयु में मातृत्व अनेक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देता है। साथ ही बाल विवाह लड़कियों की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को भी सीमित कर देता है। इस समस्या के समाधान के लिए कानूनी प्रतिबंधों के साथ सामाजिक जागरूकता भी आवश्यक है। जब तक समाज अपनी सोच में परिवर्तन नहीं लाएगा तब तक केवल कानून पर्याप्त सिद्ध नहीं होंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में बच्चों के सामने नई चुनौतियाँ भी उभर रही हैं। तकनीकी विकास ने जहाँ ज्ञान और संचार के नए अवसर दिए हैं वहीं अनेक जोखिम भी उत्पन्न किए हैं। इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों के माध्यम से बच्चों का आभासी शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साइबर धमकी और अनुपयुक्त सामग्री तक पहुँच बढ़ी है। अनेक बच्चे मानसिक तनाव और अकेलेपन का अनुभव कर रहे हैं। इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी भावनाओं को समझना और सुरक्षित डिजिटल वातावरण प्रदान करना आज की आवश्यकता है। केवल तकनीकी नियंत्रण पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों को सही और गलत के बीच अंतर समझाने की भी आवश्यकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन चुका है। प्रतियोगिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक दबाव और अकेलापन बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। यदि किसी बच्चे को प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग और समझ नहीं मिलती तो वह अवसाद और भय का शिकार हो सकता है। स्वस्थ मानसिक विकास के लिए बच्चों को ऐसा वातावरण चाहिए जहाँ वे अपनी भावनाओं को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें। परिवार और विद्यालय को बच्चों के लिए केवल अनुशासन का केंद्र नहीं बल्कि विश्वास और सुरक्षा का स्थान बनना चाहिए। एक संवेदनशील समाज ही स्वस्थ और आत्मविश्वासी पीढ़ी का निर्माण कर सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक स्तर पर युद्ध और प्राकृतिक आपदाएँ बच्चों के जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में लाखों बच्चे विद्यालयों से वंचित हो जाते हैं और अनेक बच्चों को विस्थापन का सामना करना पड़ता है। कुछ क्षेत्रों में बच्चों को सैनिक गतिविधियों में भी शामिल किया जाता है जो मानवता के लिए अत्यंत दुखद स्थिति है। प्राकृतिक आपदाएँ और महामारियाँ भी बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालती हैं। ऐसे समय में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और मानवीय सहायता अत्यंत आवश्यक हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ राहत कार्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से बच्चों की सहायता करने का प्रयास करती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज में बाल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षक बच्चों को सही दिशा दे सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावक उन्हें प्रेम और सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं तथा सामाजिक संगठन जागरूकता फैलाकर सहायता पहुँचा सकते हैं। विद्यालयों में बाल अधिकारों पर चर्चा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक कार्यक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निबंध प्रतियोगिताएँ और जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं ताकि बच्चे अपने अधिकारों को समझ सकें। मीडिया भी बाल सुरक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि समाज का प्रत्येक वर्ग इस दिशा में सक्रिय हो जाए तो बच्चों के जीवन में बड़ा परिवर्तन संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता इस बात की है कि बाल संरक्षण को केवल सरकारी योजना न माना जाए बल्कि सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए। प्रत्येक बच्चे को भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और सुरक्षा का अधिकार मिलना चाहिए। किसी भी बच्चे को हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोषण और उपेक्षा का सामना न करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सुनिश्चित करना पूरे समाज का दायित्व है। बच्चों के सपनों की रक्षा करना ही भविष्य की रक्षा करना है। यदि हम आज बच्चों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देंगे तो आने वाला समाज अधिक शांतिपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण और मानवीय होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस हमें यह संदेश देता है कि बच्चों की सुरक्षा केवल एक दिन का विषय नहीं बल्कि निरंतर चलने वाला प्रयास है। यह दिवस हमें आत्मचिंतन करने और अपने दायित्वों को समझने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक बच्चे में अपार संभावनाएँ छिपी होती हैं और उन संभावनाओं को विकसित करने के लिए प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा और सुरक्षा आवश्यक है। जब समाज बच्चों के अधिकारों का सम्मान करना सीख जाएगा तब वास्तविक प्रगति संभव होगी। यही इस दिवस की सबसे बड़ी सार्थकता है और यही वह संदेश है जिसे पूरी मानवता को अपनाना चाहिए।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:21:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सावधान! सोशल मीडिया तबाह कर रहा है बचपन </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव का उल्लेख  राज्यसभा में किया गया। राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार, 2022 में भारत में लगभग 13,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, जो 2013 की तुलना में लगभग दोगुनी संख्या है। यही नहीं आज भारत में कुल आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी विद्यार्थियों की है। याद रहे 4 फरवरी को गाजियाबाद में 12, 14 और 16 वर्ष की तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि यह घटना ऑनलाइन खेलों की लत से जुड़ी थी।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173588/be-careful-social-media-is-destroying-childhood"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव का उल्लेख  राज्यसभा में किया गया। राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार, 2022 में भारत में लगभग 13,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, जो 2013 की तुलना में लगभग दोगुनी संख्या है। यही नहीं आज भारत में कुल आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी विद्यार्थियों की है। याद रहे 4 फरवरी को गाजियाबाद में 12, 14 और 16 वर्ष की तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली। बताया गया कि यह घटना ऑनलाइन खेलों की लत से जुड़ी थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज इंटरनैट के जमाने में हर चीज मोबाइल फोन पर उपलब्ध होने के कारण सोशल मीडिया का महत्व बहुत बढ़ गया है और लोग बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे जहां उपयोगी जानकारी मिलती है वहीं इस पर उपलब्ध अनुचित और अश्लील सामग्री बच्चों के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो रही है।स्कूल हो या घर, हर जगह बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल करते रहते हैं। सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर डाल रहा है और बच्चों में नींद की कमी भी देखी गई है। यह बच्चों में डिप्रैशन, चिंता और तनाव उत्पन्न करने का कारण भी बन रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत में सोशल मीडिया प्लेटफार्म के उपयोगकर्ताओं में लगभग एक-तिहाई किशोर हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में 2010 के बाद किशोरों में अवसाद और आत्महत्या के मामलों में तेज वृद्धि देखी गई, ठीक उसी समय जब एक कंपनी फेसबुक ने युवाओं को आक्रामक रूप से अपने मंच की ओर आकर्षित करना शुरू किया।सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अधिक समय बिताने के कारण बच्चों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है तथा माता-पिता के साथ उनकी दूरी एवं स्वभाव में हिंसक प्रवृत्ति बढ़ने के साथ-साथ एकाग्रता में कमी आ रही है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोशल मीडिया की लत से बच्चों को बचाने की खातिर आस्ट्रेलिया, इंगलैंड, मलेशिया, स्पेन, नार्वे, जर्मनी, इटली व चीन तथा चंद अन्य देशों ने भी बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लागू कर दिए हैं।इसी सिलसिले में फ्रांस सरकार ने भी 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की कवायद शुरू कर दी है। देश की नैशनल असैम्बली ने इससे संबंधित बिल को स्वीकृति दे दी है। इसे देश में 1 सितम्बर, 2026 से शुरू होने वाले आगामी शिक्षा सत्र से लागू कर दिया जाएगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि अक्सर बच्चों को व्यस्त रखने या उनका ध्यान भटकाने के नाम पर बहुत कम उम्र में ही उनके हाथों में टैबलेट और मोबाइल फोन दे देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 27 प्रतिशत किशोरों में सोशल मीडिया प्लेटफार्म की लत के लक्षण दिखते हैं। इसके साथ-साथ पढ़ाई में गिरावट, चिंता और आत्मविश्वास की कमी भी देखी जा रही है। उन्होंने सदन में कहा कि एक सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों में लगभग 33 प्रतिशत बच्चे साइबर उत्पीड़न का सामना करते हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, किशोरों से जुड़े हिंसक अपराधों की हिस्सेदारी 2016 में 32 प्रतिशत थी, जो 2022 तक बढ़कर लगभग 50 फीसदी के करीब पहुंच गई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि फ्रांस ने 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और विद्यालयों में मोबाइल फोन पर भी रोक लगाई है। ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन लगाने के कड़े फैसला लिया गया ऑस्ट्रेलिया ने इसे 16 वर्ष से कम आयु तक सीमित किया है। हाल ही में इंडोनेशिया ने भी किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई है और ऐसा करने वाला वह एशिया का पहला देश बन गया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> स्पेन और जर्मनी भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति 'इमैनुएल मैक्रों' का कहना है कि "हमारे बच्चों के दिमाग बिकाऊ नहीं हैं। बच्चों की मानसिक और भावनात्मक सेहत को उन कम्पनियों के भरोसे पर नहीं छोड़ा जा सकता जिनका उद्देश्य सिर्फ लाभ कमाना है।"'डेनमार्क' की प्रधनामंत्री 'मेटे फ्रैडिरकसन' ने भी कहा है कि, "हमने एक राक्षस को जन्म दिया है जो बच्चों से उनका बचपन छीन रहा है।"</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वहीं स्वीडन के कोरोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने ऑरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के साथ यह स्टडी की. स्टडी के दौरान रिसर्चर ने देखा कि बच्चे कितने समय तक अलग-अलग डिजिटल एक्टिविटी करते हैं. स्टडी में भाग लेने वाले बच्चों ने एवरेज 2.3 घंटे टीवी या ऑनलाइन वीडियो देखे, 1.4 घंटे तक सोशल मीडिया यूज किया और 1.5 घंटे तक वीडियो गेम्स खेलें. इन सारी एक्टिविटीज में से केवल सोशल मीडिया के यूज के कारण उन्हें अंटेशन से जुड़ी दिक्कतें आईं. शोधार्थी का कहना है कि सोशल मीडिया के कारण बच्चों की ध्यान क्षमता कम हो रही है.  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत में पहले से ही डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढांचा मौजूद है, जिसमें 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए अभिभावकों की सत्यापित सहमति जैसे प्रावधान हैं। लेकिन हमें इससे आगे बढ़कर सोशल मीडिया कंपनियों को और अधिक जवाबदेह बनाना होगा।बता दें कि पिछले कुछ समय से भारत में नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया पर अश्लील और हिंसा को बढ़ावा देने वाली सामग्री देख कर बलात्कार जैसी वारदातें करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">23 अक्तूबर, 2025 को 'जोधपुर' (राजस्थान) में 3 वर्षीय बच्ची से बलात्कार करने के आरोप में पुलिस ने एक किशोर को गिरफ्तार किया। आरोपी के मोबाइल की जांच करने से पता चला कि उसने वारदात करने से पहले 15-20 अश्लील वीडियो देखे थे।6 फरवरी, 2026 को 'बदायूं' (उत्तर प्रदेश) के 'दातागंज' में 8 और 14 साल की उम्र के 2 लड़कों को मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो देखने के बाद एक 6 साल की बच्ची से सामूहिक बलात्कार करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">13 फरवरी, 2026 को 'रीवा' (मध्य प्रदेश) में कुरकुरे दिलवाने के बहाने अपनी 6 वर्षीय बहन से बलात्कार करने के आरोप में एक 14 वर्षीय नाबालिग को पुलिस ने हिरासत में लिया।7 मार्च, 2026 को हाथरस (उत्तर प्रदेश) में जंगल में चारा लेने गई चौथी क्लास की छात्रा को मोबाइल फोन पर अश्लील सामग्री देखने के आदी 2 लड़के बेर देने अपने साथ ले गए और उससे बलात्कार कर डाला। दोनों लड़कों को पुलिस ने पकड़ लिया है।इस तरह की घटनाओं को देखते हुए 6 मार्च, 2026 को आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और ऐसा कदम उठाने वाले ये देश के पहले 2 राज्य बन गए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आंध्र व कर्नाटक सरकारों द्वारा उक्त प्रतिबंध लगाने से बच्चों के चारित्रिक पतन को किसी सीमा तक रोकने में सहायता मिलेगी।  सरकार की ओरसे करवाए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 10-15 साल के 96 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते थे और उनमें से 10 में से सात हानिकारक कंटेंट के संपर्क में आए थे. इसमें महिलाओं के प्रति नफरत और हिंसक सामग्री के साथ-साथ खाने की बीमारियों और आत्महत्या को बढ़ावा देने वाला कंटेंट भी शामिल था. </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अब तक 10 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन लागू करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, थ्रेड्स, टिकटॉक, ट्विच, एक्स, यूट्यूब, किक और रेडिट शामिल हैं. ऐसे में बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए यह कदम बहुत ही सराहनीय है.अतः सभी राज्यों में इस तरह के कानून को तुरंत सख्तीपूर्वक लागू करने और उस पर अमल सुनिश्चित करवाने की जरूरत है, ताकि बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 17:11:45 +0530</pubDate>
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