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                <title>High Court Judgment - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>High Court Judgment RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>UAPA के तहत ज़मानत देने से मना करने का आधार सिर्फ़ इस्लामिक सेमिनार में हिस्सा लेना नहीं हो सकता</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी तीन लोगों को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि इस्लामिक साहित्य पर किसी सेमिनार में सिर्फ़ हिस्सा लेना ही, UAPA के तहत ज़मानत पर रोक लगाने वाले प्रावधानों के तहत अपने आप में कोई अपराध नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीज़न बेंच ने कहा कि सेमिनार में हिस्सा लेने के अलावा, अभियोजन पक्ष आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई भी प्रथम दृष्टया सबूत पेश नहीं कर पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने कहा: "वर्नन (उपर्युक्त) मामले</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178297/mere-participation-in-islamic-seminar-cannot-be-the-basis-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी तीन लोगों को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि इस्लामिक साहित्य पर किसी सेमिनार में सिर्फ़ हिस्सा लेना ही, UAPA के तहत ज़मानत पर रोक लगाने वाले प्रावधानों के तहत अपने आप में कोई अपराध नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीज़न बेंच ने कहा कि सेमिनार में हिस्सा लेने के अलावा, अभियोजन पक्ष आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई भी प्रथम दृष्टया सबूत पेश नहीं कर पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने कहा: "वर्नन (उपर्युक्त) मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार, जैसा कि ऊपर बताया गया, UAPA Act, 1967 के अध्याय IV और अध्याय VI के तहत सूचीबद्ध अपराधों को करने की साज़िश का कोई भी विश्वसनीय मामला नहीं बनता।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए सिर्फ़ सेमिनार में हिस्सा लेना ही UAPA Act की ज़मानत पर रोक लगाने वाली धाराओं के तहत अपने आप में कोई अपराध नहीं हो सकता। हमारी सुविचारित राय है कि अपीलकर्ताओं को ज़मानत दी जा सकती है, क्योंकि यह बात मानी हुई है कि मुक़दमे में अभी काफ़ी समय लगेगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी लोगों ने स्पेशल NIA कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें उनकी ज़मानत अर्ज़ियां खारिज की गई थीं। आरोपी लोगों ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष द्वारा जुटाए गए सबूत नाकाफ़ी हैं और उन पर लगाए गए आरोप ज़्यादातर अटकलों पर आधारित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">NIA के वकील ने इन अर्ज़ियों का विरोध करते हुए दावा किया कि CrPC की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज गवाहों के बयान यह दिखाते हैं कि आरोपी लोग कट्टरपंथी विचारधारा वाले थे और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने की ओर झुकाव रखते थे। वकील ने आगे कहा कि कुछ सामग्री बरामद की गई, जिसमें इस्लामिक साहित्य की फ़ोटोकॉपी भी शामिल थी, जो उनकी कथित मानसिकता और इरादे को दर्शाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के वर्नन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) मामले पर भरोसा करते हुए कहा कि बिना पुष्टि वाले या कमज़ोर सबूत, जिनमें बिना हस्ताक्षर वाले दस्तावेज़ या तीसरे पक्ष के बीच हुए संवाद शामिल हैं, UAPA के सख़्त प्रावधानों के तहत किसी का दोष साबित करने या ज़मानत देने से मना करने का उचित आधार नहीं बन सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ़ साहित्य अपने पास रखना—भले ही वह हिंसा को प्रेरित करता हो या उसका प्रचार करता हो—अपने आप में न तो गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 2002 की धारा 15 के अर्थ के तहत 'आतंकवादी कृत्य' माना जाएगा, और न ही इस अधिनियम के अध्याय IV और VI के तहत कोई अन्य अपराध।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:59:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अवैध जब्ती और जल्दबाज़ी में नीलामी पर राज्य सरकार को झटका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178295/state-government-shocked-by-illegal-seizure-and-hasty-auction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले में पुलिस ने याचिकाकर्ता चंद्रभान कुमार के व्यावसायिक वाहन को कथित गौ-तस्करी की सूचना पर रोका था। वाहन से 10 जीवित गोवंश बरामद होने का दावा करते हुए पुलिस ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 तथा पशु क्रूरता निवारण कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिलाधिकारी ने यह कहते हुए वाहन जब्त कर लिया कि गोवंश को वध के लिए बिहार ले जाया जा रहा था, जबकि वाहन बिहार सीमा के निकट पकड़ा गया। बाद में आयुक्त ने भी जब्ती आदेश बरकरार रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी दौरान, अपील लंबित रहते हुए प्रशासन ने वाहन की नीलामी मात्र 85 हजार रुपये में कर दी जबकि याचिकाकर्ता के अनुसार वाहन का बाजार मूल्य 7 लाख रुपये से अधिक था।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के भीतर गोवंश के परिवहन के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है और केवल बिहार सीमा के निकट वाहन पकड़े जाने से यह मान लेना कि पशुओं को वध हेतु बाहर ले जाया जा रहा था उचित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “संदेह चाहे कितना भी प्रबल हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि कार्यवाही लंबित रहते वाहन की नीलामी करना और वह भी इतनी कम कीमत पर प्रशासन की स्पष्ट मनमानी को दर्शाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने माना कि इससे याचिकाकर्ता को गंभीर आर्थिक नुकसान हुआ, क्योंकि वाहन उसकी आजीविका का मुख्य साधन है। पशुओं के प्रति क्रूरता के आरोपों पर भी अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने ऐसा कोई ठोस निष्कर्ष दर्ज नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि पशुओं को ऐसी शारीरिक चोट पहुंची थी, जिससे उनके जीवन को खतरा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार जब्ती की तारीख से वाहन वापसी तक 15 हजार रुपये प्रतिमाह आर्थिक क्षति के रूप में और 20 हजार रुपये मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए अदा करे।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि वाहन वापस नहीं किया जाता है तो सरकार को 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के अतिरिक्त अधिकतम 12 माह की अवधि तक मासिक क्षतिपूर्ति भी देनी होगी। अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह यह राशि उन अधिकारियों से वसूल सकती है, जिन्होंने मनमानी कार्रवाई को मंजूरी दी थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:56:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मौजूद ही नहीं जो कानून, उसी के तहत दे दिया तलाक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178293/divorced-under-a-law-that-does-not-exist"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/allahabad_high_court_1733678481057_1777910120637.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दायर की थी जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि संभवतः याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 का उल्लेख होना चाहिए, जो मुस्लिम महिलाओं को तलाक मांगने का अधिकार देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि केवल याचिका में गलत कानून का उल्लेख होने से आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता, यदि ट्रायल कोर्ट सही कानून के तहत अधिकार प्रयोग करे। हालांकि, इस मामले में फैमिली कोर्ट ने स्वयं अपने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उसी के तहत राहत भी प्रदान की।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा, “यह सुनिश्चित करना अदालत का दायित्व है कि जिस कानून का वह उल्लेख कर रही है, वह वास्तव में अस्तित्व में हो। केवल याचिका में हुई त्रुटि ट्रायल कोर्ट को वही गलती दोहराने का अधिकार नहीं देती।”</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने कहा कि अस्तित्वहीन कानून के आधार पर दिया गया निर्णय विधि और तथ्य दोनों की दृष्टि से दोषपूर्ण है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला पुनः उसी अदालत को भेज दिया और निर्देश दिया कि वह सही कानूनी प्रावधानों के तहत नया निर्णय पारित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने स्पष्ट किया कि नए सिरे से पूरा ट्रायल नहीं होगा और फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों व रिकॉर्ड के आधार पर ही निर्णय दे सकती है, जब तक उसे अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता न लगे। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को तीन माह के भीतर नया फैसला देने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:54:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बंगाल एसआईआर: जाँच के बाद डॉक्टर से पुलिसकर्मी तक के नाम गायब</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174642/names-of-doctors-to-policemen-missing-after-bengal-sir-investigation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1754143774943_bihar_sir_draft_voter_list.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को मौक़ा मिल रहा है? यदि अब तक ट्रिब्यूनल ही नहीं बना है तो क्या लाखों लोग मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाएँगे?</p>
<p style="text-align:justify;">ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि राज्य में अंडर एडजुडिकेशन रहे मतदाताओं के बड़े पैमाने पर नाम कटने के मामले सामने आए हैं। राज्य में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के अधीन थे। 705 न्यायिक अधिकारियों की टीम ने अब तक 37 लाख मामलों का फ़ैसला कर लिया है। दो सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने यह साफ़ नहीं किया है कि अब तक कितने नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तक पूरे राज्य में 15 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। राज्य में सबसे ज़्यादा मुर्शिदाबाद में 11 लाख और मालदा में 8.28 लाख मामले जांच के अधीन थे।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 19 ट्रिब्यूनल बनने थे, जो 23 जिलों को कवर करेंगे, लेकिन अभी तक पूरी तरह सेटअप नहीं हुए। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि समय बहुत कम बचा है। नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक है, ऐसे में लाखों सच्चे वोटर चुनाव से बाहर हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कई गांवों में लोग चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, जब तक इन मामलों की सुनवाई न हो। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाने के लिए है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग दावा कर रहे हैं कि दस्तावेज देने के बावजूद उनका नाम बिना वजह काटा गया। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले काफी गर्माया हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:11:05 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174640/there-is-no-legal-obligation-on-the-daughter-in-law-to-maintain"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कोई नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न लगे, किसी कानूनी आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।"विधायिका ने अपनी समझदारी से, सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया। दूसरे शब्दों में, विधायिका की यह मंशा नहीं है कि उक्त प्रावधान के तहत बहू पर उसके सास-ससुर के भरण-पोषण का दायित्व डाला जाए।"</p><p style="text-align:justify;">इसके साथ ही पीठ ने एक बुजुर्ग दंपति द्वारा अपनी बहू के खिलाफ दायर की गई एक आपराधिक पुनरीक्षण खारिज की। याचिकाकर्ताओं ने आगरा के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट द्वारा अगस्त, 2025 में पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण की मांग करने वाले उनके आवेदन खारिज कर दिया गया था।</p><p style="text-align:justify;">माता-पिता ने यह दलील दी कि वे वृद्ध, अनपढ़, निर्धन हैं और अपने दिवंगत बेटे के जीवित रहते पूरी तरह से उसी पर निर्भर हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि उनकी बहू, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है, उसकी अपनी पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे दिवंगत बेटे के सभी सेवा और रिटायरमेंट लाभ भी प्राप्त हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि अपनी वृद्ध सास-ससुर के भरण-पोषण के बहू के नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि बहू को पुलिस में नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवंगत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित दलीलें भरण-पोषण की इन संक्षिप्त कार्यवाहियों में विचार के दायरे में नहीं आती हैं। अतः, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता, विकृति या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:07:07 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गर्भवती नाबालिग की असंवेदनशील काउंसलिंग के लिए मेडिकल बोर्ड को फटकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते मेडिकल बोर्ड और चीफ मेडिकल ऑफिसर (सीएएमओ), हाथरस को तब फटकारा, जब वे एक समय-संवेदनशील रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में लगभग 30 हफ़्ते की गर्भावस्था के उन्नत चरण में गर्भपात की मांग की गई थी, जिस पर कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की: "आज, याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल से मिले निर्देशों के आधार पर कोर्ट को सूचित किया कि मेडिकल बोर्ड बस उसके पास गया और उससे कहा,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173554/allahabad-high-court-reprimands-the-medical-board-for-insensitive-counseling"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते मेडिकल बोर्ड और चीफ मेडिकल ऑफिसर (सीएएमओ), हाथरस को तब फटकारा, जब वे एक समय-संवेदनशील रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में लगभग 30 हफ़्ते की गर्भावस्था के उन्नत चरण में गर्भपात की मांग की गई थी, जिस पर कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की: "आज, याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल से मिले निर्देशों के आधार पर कोर्ट को सूचित किया कि मेडिकल बोर्ड बस उसके पास गया और उससे कहा, 'आपका ख्याल रखा जाएगा'। इसके अलावा कुछ नहीं कहा; और अब उपर्युक्त रिपोर्ट जमा कर दी गई, जो मेडिकल बोर्ड की असंवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पहले सीएमओ, हाथरस को 'युद्ध स्तर' पर एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। इस बोर्ड को याचिकाकर्ता को गर्भपात की स्थिति में उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले परिणामों के बारे में परामर्श देना था। साथ ही यह भी समझाना था कि यदि वह बच्चे को जन्म देने का विकल्प चुनती है तो उस पर न तो चिकित्सा खर्च की कोई ज़िम्मेदारी होगी और न ही बच्चे की, जिसे गोद दे दिया जाएगा; और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी राज्य की होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने गौर किया कि विशिष्ट निर्देशों के बावजूद, "मेडिकल बोर्ड की जो रिपोर्ट हमारे सामने रखी गई, उसमें हीमोग्लोबिन, ब्लड ग्रुप, HIV, HBs, Ag, और HCV से संबंधित जांचों के अलावा; और भ्रूण की गर्भावस्था की अवधि से संबंधित जांचों के अलावा, कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि याचिकाकर्ता ने गर्भपात करवाने या गर्भावस्था जारी रखने की अपनी इच्छा के बारे में क्या कहा था।"</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि पहले याचिकाकर्ता के वकील ने इस बात पर चिंता जताई कि यदि हाईकोर्ट द्वारा कोई सदस्य नामित नहीं किया जाता है तो पैनल असंवेदनशील हो सकता है, कोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने वास्तव में असंवेदनशील तरीके से काम किया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने जे एन  कॉलेज अस्पताल, अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय , अलीगढ़ के प्रिंसिपल को एक आवश्यक पक्ष के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया। इसने DALSA, हाथरस के सचिव को तत्काल एक बैठक आयोजित करने और पहले से गठित मेडिकल बोर्ड में J.N. कॉलेज, अलीगढ़ के प्रिंसिपल के परामर्श से मनोवैज्ञानिक को शामिल करने का निर्देश दिया</p>
<p style="text-align:justify;">जहाँ गर्भपात से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाना हो। या (ii) क्या लीगल सर्विसेज़ कमेटी के किसी पैनल वकील को नियुक्त करना संभव है, जो उपर्युक्त कमेटी के कार्यों का समन्वय करे और उसकी अध्यक्षता करे। साथ ही सीधे संबंधित अदालत को रिपोर्ट करे? यह उन मामलों में किया जा सकता है, जहां गर्भपात के लिए याचिकाएं विचाराधीन हों और मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट मांगने का निर्देश जारी किया गया हो।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 21:09:58 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>गैंगस्टर से सिर्फ रिश्तेदारी के आधार पर संपत्ति जब्त नहीं: इलाहाबाद हाइकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति केवल इस आधार पर जब्त नहीं की जा सकती कि वह किसी गैंगस्टर का रिश्तेदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति जब्ती के लिए अपराध और संपत्ति के बीच सीधा संबंध (नेक्सस) साबित होना जरूरी है। जस्टिस राज बीर सिंह की पीठ ने मंसूर अंसारी की अपील स्वीकार करते हुए उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश रद्द कर दिया। मंसूर अंसारी, कुख्यात गैंगस्टर मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा मंसूर अंसारी की दुकानों और भवन को 'बेनेमी संपत्ति' बताते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173551/allahabad-high-court-will-not-confiscate-property-from-gangster-merely"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति केवल इस आधार पर जब्त नहीं की जा सकती कि वह किसी गैंगस्टर का रिश्तेदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति जब्ती के लिए अपराध और संपत्ति के बीच सीधा संबंध (नेक्सस) साबित होना जरूरी है। जस्टिस राज बीर सिंह की पीठ ने मंसूर अंसारी की अपील स्वीकार करते हुए उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश रद्द कर दिया। मंसूर अंसारी, कुख्यात गैंगस्टर मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा मंसूर अंसारी की दुकानों और भवन को 'बेनेमी संपत्ति' बताते हुए जब्त किया गया, जिसे गाजीपुर के विशेष न्यायालय (गैंगस्टर एक्ट) ने भी सही ठहराया।</p>
<p style="text-align:justify;">हाइकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 1986 के तहत संपत्ति जब्त करने की शक्ति असीमित नहीं है। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति ने गैंग के सदस्य या संचालक के रूप में किसी अपराध से अर्जित धन से संपत्ति बनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, “सिर्फ आरोप या संदेह के आधार पर संपत्ति जब्त नहीं की जा सकती। अपराध और संपत्ति के बीच स्पष्ट संबंध होना अनिवार्य है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्वास करने का कारण केवल शक या अंदाजे पर आधारित नहीं हो सकता बल्कि ठोस साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। इस मामले में अदालत ने पाया कि राज्य ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि संपत्ति अपराध से अर्जित धन से बनाई गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि कानून के तहत यह जरूरी नहीं है कि संपत्ति वापस पाने के लिए व्यक्ति खुद अपनी आय का स्रोत साबित करे। पहले राज्य को यह सिद्ध करना होगा कि संपत्ति अपराध से जुड़ी है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि मंसूर अंसारी के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाइकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मुख्तार अंसारी का रिश्तेदार होने के आधार पर संपत्ति जब्त करना पूरी तरह गलत है। अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट और स्पेशल कोर्ट के आदेशों को मनमाना और बिना आधार बताते हुए रद्द कर दिया और राज्य सरकार को तत्काल संपत्ति मुक्त करने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 21:06:23 +0530</pubDate>
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