<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/58591/political-statement" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>राजनीतिक बयान - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/58591/rss</link>
                <description>राजनीतिक बयान RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>‘मैं इस्तीफा नहीं दूंगी’:क्या यह  ब्यान संवैधानिक है या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण?”</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178321/%E2%80%98i-will-not-resign%E2%80%99is-this-statement-constitutional-or-a-violation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hq720.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा में बहुमत से निर्धारित होती है।यदि किसी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं है, तो वह सरकार बनाने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार खो देता है।ऐसी स्थिति में या तो वैकल्पिक बहुमत सिद्ध किया जाता है या पद छोड़ना पड़ता है।इस दृष्टि से “बहुमत के बिना इस्तीफा न देने” का कथन या यूं कहें बहुमत वाले दल के लिए सक्ता हस्तांतरण हेतु पद न  छोड़ने जैसे वक्तव्य संवैधानिक भावना के विपरीत प्रतीत होते हैं। भारत में इस तरह का ब्यान शायद अपने आप में पहला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान केवल प्रावधानों का दस्तावेज नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता का भी आधार है।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि संविधान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू करने वाले लोग कितनी ईमानदारी से उसका पालन करते हैं।ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है,क्या इस तरह के ब्यान देने  की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?क्या यह जनादेश का अपमान नहीं है?</div>
<div style="text-align:justify;">ममता दीदी पर मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान महामहिम राष्ट्रपति के प्रदेश आगमन पर उन्हें प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान न देना, केन्द्रीय जांच एजेंसियों को सहयोग न करना, जांच में व्यवधान उत्पन्न करना,सघन मतदाता जांच का विरोध करना, चुनाव आयोग के अधिकारियों के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करना, समुदाय विशेष को लाभ पहुंचाना जैसे बहुत सारे आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं। इनमें कितने आरोप संवैधानिक रूप से सही है या नहीं यह न्यायलय का तय करना का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू विपक्षी दलों की ममता दीदी के इस्तीफा न देने वाले ब्यान पर प्रतिक्रिया न आना  है।जहाँ एक ओर समय-समय पर कई विपक्षी दल बार-बार यह आरोप लगाते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के शासन में “संविधान खतरे में है”, वहीं दूसरी ओर ममता दीदी के इस स्पष्ट बयान पर न तो विपक्षी दलों द्वारा अपेक्षित विरोध किया और न ही कोई  समझाइश दी गई अपितु 100 सीटों की चोरी के आरोप का समर्थन कर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर दिए, जबकि चुनाव में धांधली हुई या नहीं इसको तय करने के लिए न्यायालय, और उसकी शरण में जाना चाहिए यदि किसी प्रकार की आशंका है। चुनाव आयोग की हिंसा रहित निष्पक्ष चुनाव कराने के श्रम पर पानी फेरने से बचना चाहिए।ऐसा मौन समर्थन क्या भारतीय संविधान को खतरे में नहीं डालता? वास्तव में यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है:क्या संविधान की चिंता केवल राजनीतिक सुविधा का विषय है?क्या संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का पैमाना दलगत आधार पर बदल जाता है?यदि एक ओर “संविधान खतरे में” का नरेटिव गढ़ा जाए और दूसरी ओर ऐसे बयानों पर चुप्पी साध ली जाए, तो क्या यह उस नरेटिव की विश्वसनीयता को कमजोर नहीं करता ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि सिद्धांतों की निरंतरता का नाम है।जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों के लिए एक मानक और अपने सहयोगियों के लिए दूसरा मानक अपनाते हैं तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर गिरता है।इस संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि:संविधान की रक्षा का प्रश्न चयनात्मक नहीं हो सकता;लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेरा ऐसा मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति से उठा यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है।“बहुमत हासिल न करने पर भी मैं इस्तीफा नहीं दूंगी” जैसा कथन-संवैधानिक रूप से संदिग्ध और लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुपयुक्त प्रतीत होता है।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही विपक्ष की चुप्पी यह संकेत देती है कि भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की बजाय सुविधा का प्रभाव बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि-सत्ता या विपक्ष में कोई भी बैठे,सबके लिए संविधान सर्वोपरि रहे, और जनादेश का सम्मान अनिवार्य।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178321/%E2%80%98i-will-not-resign%E2%80%99is-this-statement-constitutional-or-a-violation</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/178321/%E2%80%98i-will-not-resign%E2%80%99is-this-statement-constitutional-or-a-violation</guid>
                <pubDate>Wed, 06 May 2026 16:54:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/hq720.jpg"                         length="143105"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धार्मिक आजादी को लेकर संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए केन्द्र सरकार है जिम्मेदार- प्रमोद तिवारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज-प्रतापगढ़।</strong> राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अमेरिकी अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग वर्ष 2026 की रिपोर्ट को गंभीर चिंता का विषय करार दिया है। उन्होने आयोग की सलाना रिपोर्ट के हवाले से यह दावा जताया है कि इसमें खुफिया एजेंसी रॉ तथा भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वारा अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग में हस्तक्षेप किये जाने की पुष्टि की गयी है। उन्होने कहा कि इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व खुफिया एजेंसी रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173439/central-government-is-responsible-for-violation-of-constitutional-rights-regarding"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260317-wa0110.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज-प्रतापगढ़।</strong> राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अमेरिकी अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग वर्ष 2026 की रिपोर्ट को गंभीर चिंता का विषय करार दिया है। उन्होने आयोग की सलाना रिपोर्ट के हवाले से यह दावा जताया है कि इसमें खुफिया एजेंसी रॉ तथा भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वारा अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग में हस्तक्षेप किये जाने की पुष्टि की गयी है। उन्होने कहा कि इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व खुफिया एजेंसी रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग के द्वारा देश में धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के द्वारा आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गयी है।उन्होने कहा कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है ऐसे में आयोग की यह सालाना रिपोर्ट विदेशों में भी देश की छवि को धूमिल बना गयी है। उन्होने यह भी कहा कि इस रिपोर्ट को लेकर देश के अधिकतर राजनैतिक दलों ने भी ताजा चिन्ता व्यक्त की है।  उन्होने कहा कि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर आयोग की रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि भारत के संविधान में सभी धर्मो को मानने वाले लोगों को प्रदत्त अधिकार का खुला उल्लंघन हो रहा है। सांसद प्रमोद तिवारी का बयान मंगलवार को यहां मीडिया प्रभारी ज्ञानप्रकाश शुक्ल के हवाले से निर्गत हुआ है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/173439/central-government-is-responsible-for-violation-of-constitutional-rights-regarding</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/173439/central-government-is-responsible-for-violation-of-constitutional-rights-regarding</guid>
                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:44:51 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-03/img-20260317-wa0110.jpg"                         length="66706"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        