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                <title>धार्मिक स्वतंत्रता - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>धार्मिक स्वतंत्रता RSS Feed</description>
                
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                <title>विविधता से एकात्मता की ओर</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
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<div style="text-align:justify;">आज विश्व के तमाम देश धार्मिक पहचान, नस्ली अस्मिता, अतिराष्ट्रवाद, युद्ध, सांस्कृतिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और बढ़ती वैचारिक दूरियों जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रहे है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।विज्ञान, परिवहन और संचार प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक दूरियां कम जरूर की हैं, लेकिन अनेक मामलों में मनुष्यों के बीच वैचारिक और भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में दिया गया संबोधन विशेष आकर्षण बना हुआ है। </div>
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<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत के संबोधन का</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186883/the-message-of-one-world-one-humanity-from-diversity-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20241207-wa00031.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
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<div style="text-align:justify;">आज विश्व के तमाम देश धार्मिक पहचान, नस्ली अस्मिता, अतिराष्ट्रवाद, युद्ध, सांस्कृतिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और बढ़ती वैचारिक दूरियों जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रहे है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।विज्ञान, परिवहन और संचार प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक दूरियां कम जरूर की हैं, लेकिन अनेक मामलों में मनुष्यों के बीच वैचारिक और भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में दिया गया संबोधन विशेष आकर्षण बना हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत के संबोधन का केंद्रीय विचार भारत की उस सभ्यतागत दृष्टि से जुड़ा था, जिसमें विविधता को एकता के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए ‘विविधता में एकता’ केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के डीएनए में रची-बसी है। उन्होंने अमेरिका में प्रचलित ‘बहुलतावाद’ की अवधारणा की तुलना भारत की ‘विविधता में एकता’ की दृष्टि से करते हुए कहा कि विविधता को समाप्त करने के बजाय उसे स्वीकार, सम्मान और संरक्षित किया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह विचार भारतीय चिंतन की उस परंपरा से भी जुड़ता है, जिसमें सत्य की अनेक अभिव्यक्तियों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध वचन ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ और महोपनिषद् का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी व्यापक दृष्टि के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन प्राचीन सूत्रों को आधुनिक लोकतंत्र, बहुलतावाद या मानवाधिकारों का सीधा पर्याय मानना उचित नहीं होगा, लेकिन वे भारतीय दार्शनिक परंपरा में सह-अस्तित्व, व्यापकता और मानवीय एकात्मता की गहरी भावना को अवश्य व्यक्त करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय दृष्टि में एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है। वास्तविक एकता तभी संभव है, जब अलग-अलग धर्म, भाषा, संस्कृति और जीवन-पद्धति से जुड़े लोग समान मानवीय गरिमा तथा पारस्परिक सम्मान के साथ रह सकें। यही कारण है कि भारतीयता को किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान तक सीमित कर देना भारत की बहुस्तरीय ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना को अत्यधिक सरल बना देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धार्मिक विविधता के प्रश्न पर भी यही कसौटी लागू होती है। भारत की सामाजिक संरचना सदियों से अनेक धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं, जातीय समूहों, क्षेत्रों और परंपराओं के सह-अस्तित्व से निर्मित हुई है। इसलिए विविधता का सम्मान केवल सहिष्णुता तक सीमित नहीं होना चाहिए; उसका आधार समान नागरिक गरिमा, कानून के समक्ष समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और पारस्परिक उत्तरदायित्व होना चाहिए।यहां भारतीय संविधान का संदर्भ स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को भारतीय गणराज्य के मूल आदर्शों के रूप में स्थापित करती है। अतः विविधता के प्रति सम्मान केवल किसी संगठन या विचारधारा की अपेक्षा नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था की भी मूल प्रतिबद्धता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि कर्तव्य, आचरण, मर्यादा और उत्तरदायित्व से भी जुड़ा रहा है। इस व्यापक अर्थ को समझना आज सभी धर्मावलंबियों के लिए जरूरी है। न्यूयॉर्क प्रवास के दौरान डॉ. भागवत ने न्यूयॉर्क स्थित इस्कॉन के ऐतिहासिक केंद्र का भी दौरा किया और सेवा-कार्य में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज दुनिया अनेक संघर्षों और द्वंद्वों से गुजर रही है और लोगों को जोड़ने वाली चेतना ही शांति का आधार बन सकती है; उन्होंने इसे ‘कृष्ण चेतना’ से जोड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने एक महत्वपूर्ण बात कही,जिस देश में भारतीय मूल के लोग रहते हैं, वह उनकी ‘कर्मभूमि’ है और वहां के प्रति उनकी जिम्मेदारी सर्वोपरि है। उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से अमेरिकी समाज और देश के प्रति निष्ठापूर्वक अपने दायित्व निभाने का आग्रह किया, साथ ही अपनी ‘जन्मभूमि’ भारत से प्राप्त मूल्यों को बनाए रखने की बात कही। यह संदेश प्रवासी भारतीयों को दो पहचानों के बीच संघर्ष में खड़ा करने के बजाय, अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोते हुए जिस देश में वे रहते हैं, उसके संविधान ,नियम-कानून के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा देता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत ने सामाजिक परिवर्तन में राजनीति की सीमाओं और समाज की भूमिका पर भी बल दिया। शिक्षा, संवाद, सेवा और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन को स्थायी परिवर्तन का आधार माना जा सकता है। सामाजिक समरसता केवल कानून या सत्ता के माध्यम से निर्मित नहीं होती; इसके लिए समाज की मानसिकता, पारस्परिक व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में दूसरे के प्रति सम्मान की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब दुनिया युद्ध, विस्थापन, धार्मिक संघर्ष, आर्थिक असमानता और जलवायु संकट जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रही है, तब ‘एक विश्व, एक मानवता’ का विचार निश्चित रूप से प्रासंगिक है। लेकिन किसी भी वैश्विक आदर्श की सार्थकता उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में उतरने से सिद्ध होती है। परिवार, शिक्षा मंदिर, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में दूसरे व्यक्ति की पहचान, आस्था, विचार और गरिमा का सम्मान ही इस विचार की वास्तविक परीक्षा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत यदि अपनी सभ्यतागत परंपरा के आधार पर विश्व को कोई संदेश देना चाहता है, तो वह यह हो सकता है कि विविधता को मिटाकर स्थायी एकता स्थापित नहीं की जा सकती। स्थायी एकता का आधार सम्मान, संवाद, सह-अस्तित्व और साझा मानवीय गरिमा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ भी तभी सार्थक होगा, जब वह केवल संस्कृत का एक सुंदर वाक्य या समारोहों में उद्धृत किया जाने वाला श्लोक न रहकर सामाजिक आचरण का सिद्धांत बने।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अतः विविधताओं को समाप्त किए बिना एकता, मतभेदों को मिटाए बिना संवाद और पहचान को नकारे बिना मानवता  उस व्यापक विचार की कसौटी है जिसे आज ‘एक विश्व, एक मानवता’ के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है। डॉ. मोहन भागवत का न्यूयॉर्क संबोधन इसी दृष्टि से विचार और विमर्श का विषय बनता है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एकता और मानव-एकात्मता का यह संदेश भाषणों से निकलकर समाज के दैनिक व्यवहार में कब और कितना उतरता है।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 20:46:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>समान नागरिक संहिता : समानता और विविधता के बीच संतुलन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कानून किसी समाज की केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं होता, बल्कि वह उसकी सामाजिक चेतना, न्याय-बोध और बदलती परिस्थितियों का दर्पण भी होता है। मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में विवाह, परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे विषय मुख्यतः परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय रीति-रिवाजों से संचालित होते थे। जैसे-जैसे राज्य संगठित हुए और नागरिक जीवन जटिल होता गया, इन बिखरे नियमों को लिखित और व्यवस्थित रूप देने की आवश्यकता महसूस हुई। नागरिक संहिताओं का विकास इसी दीर्घ यात्रा का परिणाम है।<br /><br />प्राचीन विधि-व्यवस्थाओं से लेकर रोमन विधि और यूरोपीय संहिताकरण तक कानून निरंतर बदलता रहा। 1804 की नेपोलियन संहिता इस यात्रा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186865/uniform-civil-code-balance-between-equality-and-diversity"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1001043288.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कानून किसी समाज की केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं होता, बल्कि वह उसकी सामाजिक चेतना, न्याय-बोध और बदलती परिस्थितियों का दर्पण भी होता है। मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में विवाह, परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे विषय मुख्यतः परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय रीति-रिवाजों से संचालित होते थे। जैसे-जैसे राज्य संगठित हुए और नागरिक जीवन जटिल होता गया, इन बिखरे नियमों को लिखित और व्यवस्थित रूप देने की आवश्यकता महसूस हुई। नागरिक संहिताओं का विकास इसी दीर्घ यात्रा का परिणाम है।<br /><br />प्राचीन विधि-व्यवस्थाओं से लेकर रोमन विधि और यूरोपीय संहिताकरण तक कानून निरंतर बदलता रहा। 1804 की नेपोलियन संहिता इस यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। उसने अनेक स्थानीय और परंपरागत नियमों को एक संगठित नागरिक विधि में पिरोने का प्रयास किया। इससे दुनिया के अनेक हिस्सों में संहिताबद्ध कानून की अवधारणा को बल मिला। हालांकि इतिहास यह भी बताता है कि कोई संहिता अपने समय की सामाजिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं होती। इसलिए कानून बन जाना अंतिम मंजिल नहीं; बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार उसका पुनर्मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी है।<br /><br />भारत की विधिक यात्रा अपनी विविध सामाजिक संरचना के कारण अधिक जटिल रही है। यहां अनेक धर्मों, भाषाओं, समुदायों और परंपराओं का सहअस्तित्व रहा है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार जैसे विषय लंबे समय तक अलग-अलग व्यक्तिगत विधियों से प्रभावित रहे। स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं के सामने चुनौती थी कि नागरिकों को समानता और समान अधिकार दिए जाएं, लेकिन साथ ही देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान भी बना रहे।<br /><br />भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 इसी विमर्श का महत्वपूर्ण आधार है। इसमें राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा की गई है। दूसरी ओर संविधान समानता, गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता को भी महत्वपूर्ण स्थान देता है। इसलिए समान नागरिक संहिता केवल कानून बनाने का प्रश्न नहीं है; यह विभिन्न संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी है।<br /><br />स्वतंत्र भारत में व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। विवाह, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े अनेक कानूनों में परिवर्तन किए गए। इन सुधारों ने यह सिद्ध किया कि परंपरा और कानून स्थायी रूप से एक-दूसरे से बंधे नहीं होते। समाज में जब समानता और न्याय की नई अपेक्षाएं पैदा होती हैं, तो कानून को भी उनका उत्तर देना पड़ता है। इसी क्रम में महिलाओं के अधिकार, विवाह में समानता, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे विषय व्यापक विधिक विमर्श का हिस्सा बने।<br /><br />समान नागरिक संहिता के पक्ष में सबसे प्रमुख तर्क विधिक समानता और लैंगिक न्याय का है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और भरण-पोषण जैसे मामलों में नागरिकों के अधिकार केवल धार्मिक पहचान के आधार पर अलग क्यों हों—यह प्रश्न स्वाभाविक है। विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि समान परिस्थितियों में किसी महिला के अधिकार केवल अलग व्यक्तिगत विधि के कारण बदल जाते हैं, तो संवैधानिक समानता की कसौटी पर उस व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।<br /><br />लेकिन समानता का अर्थ हर स्थिति में एकरूपता नहीं है। भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत विविध है। अनेक आदिवासी और स्थानीय समुदायों की अपनी पारिवारिक तथा उत्तराधिकार परंपराएं हैं। इसलिए समान नागरिक संहिता बनाते समय यह सावधानी जरूरी है कि समानता के नाम पर सांस्कृतिक विविधता को अनावश्यक रूप से समाप्त न किया जाए। जो अंतर सामाजिक विविधता को व्यक्त करते हैं और जो अंतर किसी नागरिक को असमान अधिकार देते हैं, दोनों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा।<br /><br />यहीं इस विमर्श की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी सामने आती है—समान कानून का लक्ष्य केवल समान नियम नहीं, बल्कि समान न्याय होना चाहिए। कानून को यह देखना होगा कि नागरिक की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकार सुरक्षित रहें। कोई परंपरा केवल इसलिए न्यायपूर्ण नहीं हो जाती कि वह पुरानी है; उसी तरह कोई नया नियम केवल इसलिए उचित नहीं हो जाता कि वह आधुनिक दिखाई देता है। कानून की असली परीक्षा उसके प्रभाव में होती है।<br /><br />भारत में गोवा की नागरिक विधि लंबे समय से समान नागरिक व्यवस्था की चर्चा का उदाहरण रही है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता को विधायी रूप देकर इस विमर्श को व्यावहारिक धरातल प्रदान किया। इससे बहस केवल सैद्धांतिक नहीं रही। अब यह देखने का अवसर है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य नागरिक मामलों को समान नियमों में लाने से प्रशासन, समाज और नागरिक अधिकारों पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ता है।<br /><br />किसी भी नागरिक संहिता की वास्तविक परीक्षा उसके लागू होने के बाद शुरू होती है। कानून की धाराएं बनाना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन उन्हें समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी रूप से पहुंचाना कठिन कार्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता, दस्तावेजों की उपलब्धता, पंजीकरण की सरल प्रक्रिया, अधिकारियों का प्रशिक्षण, न्यायालयों की क्षमता और आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को विधिक सहायता जैसे प्रश्न निर्णायक होंगे। कानून समान हो, लेकिन उसे समझने और लागू कराने की प्रक्रिया कठिन हो, तो समानता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।<br /><br />डिजिटल युग में निजता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और निजी संबंधों से जुड़ी सूचनाएं अत्यंत संवेदनशील होती हैं। इसलिए आधुनिक नागरिक संहिता को नागरिक अधिकारों के साथ निजी जानकारी की सुरक्षा का मजबूत ढांचा भी सुनिश्चित करना होगा। राज्य की भूमिका नागरिक को कानूनी सुरक्षा देना है, उसके निजी जीवन पर अनावश्यक नियंत्रण बढ़ाना नहीं।<br /><br />समान नागरिक संहिता को किसी समुदाय की जीत और दूसरे समुदाय की हार के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा। ऐसा दृष्टिकोण विधिक सुधार को सामाजिक न्याय के प्रश्न से हटाकर पहचान की राजनीति में ले जाता है। यदि इसे समान नागरिकता, लैंगिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के विस्तार के रूप में देखा जाए तो संवाद की संभावना अधिक मजबूत होगी। कानून जितना व्यापक हो, उसकी भाषा उतनी ही संयमित और प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।<br /><br />वास्तव में समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी चुनौती कानून की एकरूपता नहीं, बल्कि न्याय की समानता है। कानून की किताब में सभी बराबर हों और व्यवहार में कमजोर व्यक्ति न्याय से दूर रह जाए, तो संहिता का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए विधिक सुधार के साथ सस्ती न्याय व्यवस्था, प्रभावी विधिक सहायता, सरल प्रशासन और व्यापक कानूनी जागरूकता भी आवश्यक है।<br /><br />अंततः समान नागरिक संहिता को केवल ‘एक कानून’ के रूप में देखना उसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा। इसका मूल प्रश्न यह है कि आधुनिक भारत में नागरिक के अधिकार कितने समान, स्पष्ट और न्यायपूर्ण हैं। इतिहास बताता है कि नागरिक संहिताएं समय के साथ बदलती रही हैं और भविष्य में भी बदलेंगी। भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो लैंगिक न्याय को मजबूत करे, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करे, धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करे, सामाजिक विविधता को समझे और कानून के समक्ष समान नागरिकता को वास्तविक अर्थ प्रदान करे।<br /><br />कानून की अंतिम सफलता उसकी धाराओं की संख्या में नहीं, बल्कि उस क्षण में दिखाई देती है जब एक सामान्य नागरिक बिना भेदभाव, भय और अनावश्यक जटिलता के अपने अधिकार का उपयोग कर सके। समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी कसौटी भी यही होगी। यदि वह नागरिक को केवल समान नियम नहीं, बल्कि समान सम्मान, समान सुरक्षा और न्याय तक समान पहुंच दे सके, तभी नागरिक संहिताओं के सदियों पुराने विकास की भारतीय यात्रा अपने सार्थक पड़ाव तक पहुंच पाएगी।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 20:38:56 +0530</pubDate>
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                <title>धार्मिक आजादी को लेकर संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए केन्द्र सरकार है जिम्मेदार- प्रमोद तिवारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज-प्रतापगढ़।</strong> राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अमेरिकी अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग वर्ष 2026 की रिपोर्ट को गंभीर चिंता का विषय करार दिया है। उन्होने आयोग की सलाना रिपोर्ट के हवाले से यह दावा जताया है कि इसमें खुफिया एजेंसी रॉ तथा भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वारा अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग में हस्तक्षेप किये जाने की पुष्टि की गयी है। उन्होने कहा कि इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व खुफिया एजेंसी रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173439/central-government-is-responsible-for-violation-of-constitutional-rights-regarding"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260317-wa0110.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज-प्रतापगढ़।</strong> राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अमेरिकी अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग वर्ष 2026 की रिपोर्ट को गंभीर चिंता का विषय करार दिया है। उन्होने आयोग की सलाना रिपोर्ट के हवाले से यह दावा जताया है कि इसमें खुफिया एजेंसी रॉ तथा भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वारा अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग में हस्तक्षेप किये जाने की पुष्टि की गयी है। उन्होने कहा कि इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व खुफिया एजेंसी रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग के द्वारा देश में धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि अर्न्तराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के द्वारा आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गयी है।उन्होने कहा कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है ऐसे में आयोग की यह सालाना रिपोर्ट विदेशों में भी देश की छवि को धूमिल बना गयी है। उन्होने यह भी कहा कि इस रिपोर्ट को लेकर देश के अधिकतर राजनैतिक दलों ने भी ताजा चिन्ता व्यक्त की है।  उन्होने कहा कि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर आयोग की रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि भारत के संविधान में सभी धर्मो को मानने वाले लोगों को प्रदत्त अधिकार का खुला उल्लंघन हो रहा है। सांसद प्रमोद तिवारी का बयान मंगलवार को यहां मीडिया प्रभारी ज्ञानप्रकाश शुक्ल के हवाले से निर्गत हुआ है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:44:51 +0530</pubDate>
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