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                <title>education system india - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>​&quot;प्रतियोगी परीक्षाओं का निरस्तीकरण और परीक्षार्थियों की मनोदशा&quot;</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
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<div style="text-align:justify;">​प्रतियोगी परीक्षाएँ आज केवल आजीविका प्राप्त करने का माध्यम नहीं रह गई हैं, बल्कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का मुख्य द्वार भी हैं। इन परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना युवाओं के सपनों, आत्मसम्मान, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की दिशा तय करने का आधार बन चुका है। लाखों विद्यार्थी वर्षों तक अपने घर और परिजनों से दूर रहकर कठिन परिश्रम, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव के बीच तैयारी करते हैं। ऐसे में जब कोई प्रश्नपत्र लीक होता है या अनियमितताओं के कारण परीक्षा निरस्त की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक निर्णयों तक सीमित नहीं रहता।</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179254/cancellation-of-competitive-examinations-and-the-mood-of-the-candidates"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/exam-2_20260513024607.webp" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​प्रतियोगी परीक्षाएँ आज केवल आजीविका प्राप्त करने का माध्यम नहीं रह गई हैं, बल्कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का मुख्य द्वार भी हैं। इन परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना युवाओं के सपनों, आत्मसम्मान, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की दिशा तय करने का आधार बन चुका है। लाखों विद्यार्थी वर्षों तक अपने घर और परिजनों से दूर रहकर कठिन परिश्रम, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव के बीच तैयारी करते हैं। ऐसे में जब कोई प्रश्नपत्र लीक होता है या अनियमितताओं के कारण परीक्षा निरस्त की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक निर्णयों तक सीमित नहीं रहता। इसका सर्वाधिक प्रहार परीक्षार्थियों की मनोदशा पर पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​विशेषकर वे परीक्षार्थी अधिक आहत होते हैं, जिनके पेपर अच्छे गए थे और जिनके चयन की प्रबल संभावना थी। उनके मन में कई कई  तरह के प्रश्न जन्म लेने लगते हैं: क्या आगामी परीक्षा का स्तर पहले से कठिन होगा? क्या वे पुनः उसी दक्षता के साथ प्रदर्शन कर पाएंगे? वहीं दूसरी ओर, जिनके पेपर अच्छे नहीं हुए थे, उनके लिए यह एक नए अवसर के रूप में आता है। हालांकि, परीक्षा के बाद जो मानसिक विश्राम की स्थिति आती है, उससे निकलकर पुनः उसी लय और एकाग्रता के साथ परीक्षा तैयारी करना एक बड़ी चुनौती होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में, जहाँ सीमित अवसरों के बीच आरक्षण नीति और तीव्र प्रतिस्पर्धा मौजूद है, इन परीक्षाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक-एक पद के लिए लाखों अभ्यर्थी संघर्ष करते हैं। कई परिवार कर्ज लेकर बच्चों को बड़े शहरों में कोचिंग कराते हैं। ऐसी स्थिति में परीक्षा का निरस्त होना उनके लिए केवल एक सूचना नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक और आर्थिक आघात होता है।​जब परीक्षा निरस्त होती है, तो परीक्षार्थियों में गहरा मानसिक तनाव उत्पन्न होता है। वर्षों की तैयारी अचानक निरर्थक लगने लगती है। नई तिथि की अनिश्चितता और फिर से उसी दबाव भरे चक्र में लौटना अत्यंत कष्टकारी होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कई परीक्षार्थी अवसाद , निराशा और क्रोध का शिकार हो जाते हैं। विशेष रूप से वे अभ्यर्थी, जो आर्थिक रूप से विपन्न हैं या अपनी आयु-सीमा के अंतिम पड़ाव पर हैं, उनके लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। उन्हें महसूस होता है कि व्यवस्था की लापरवाही ने उनकी मेहनत का मूल्य छीन लिया है।​इसका दूसरा बड़ा प्रभाव व्यवस्था के प्रति अविश्वास के रूप में प्रकट होता है। बार-बार पेपर लीक और भ्रष्टाचार की खबरें युवाओं का भरोसा चयन प्रणाली से उठा देती हैं। जब ईमानदार परिश्रम का परिणाम संदिग्ध हो जाए, तो समाज में एक नैतिक संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यह समस्या विकराल होती जा रही है। अनिद्रा, चिंता  और सामाजिक अलगाव के साथ-साथ कई बार सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें तनाव को और बढ़ा देती हैं। अत्यंत संवेदनशील मामलों में यह हताशा आत्मघाती विचारों तक ले जाती है, जो राष्ट्र के लिए चिंताजनक है।​इसके साथ ही, आर्थिक क्षति भी एक बड़ा पक्ष है। विद्यार्थियों को यात्रा, आवास और अध्ययन सामग्री पर बार-बार व्यय करना पड़ता है। सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह दोहरा आर्थिक बोझ उनके भविष्य की योजनाओं को डगमगा देता है।</div>
<div style="text-align:justify;">​</div>
<div style="text-align:justify;">​इस समस्या के समाधान के लिए परीक्षा नियामक निकायों में स्वच्छ छवि वाले और ईमानदार अधिकारियों की नियुक्ति अनिवार्य है। इसके साथ ही आवश्यक हैं ​(अ)नकल माफिया और दोषियों के विरुद्ध त्वरित अदालती कार्यवाही और कठोर सजा प्रावधान(ब) प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए डिजिटल निगरानी और आधुनिक तकनीक का उपयोग।(स)परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों और कोचिंग सेंटरों की निगरानी व जवाबदेही सुनिश्चित करना।(द) परीक्षार्थियों के लिए सरकारी स्तर पर हेल्पलाइन और परामर्श की व्यवस्था।</div>
<div style="text-align:justify;">​</div>
<div style="text-align:justify;">अतः प्रतियोगी परीक्षाओं को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया न मानकर 'राष्ट्रीय प्रतिभा' के संरक्षण की प्रक्रिया समझा जाना चाहिए। यदि देश का युवा व्यवस्था पर विश्वास करेगा, तभी वह सकारात्मक ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान दे पाएगा। पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध परीक्षा प्रणाली आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 21:25:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आखिर क्यों सुसाइड कर रहे हैं एनआइटी के होनहार? </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">देश के प्रतिष्ठित कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) में द्वितीय वर्ष की एक छात्रा अपने छात्रावास के कमरे में मृत पाई गई, जिससे पिछले दो महीनों में परिसर में संदिग्ध छात्र मृत्यु का यह चौथा मामला सामने आया है।एनआईटी कुरुक्षेत्र में एक और छात्रा की आत्महत्या! यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर विफलता का संकेत है।एनआइटी में प्रवेश पाने के लिए छात्र छात्राओं द्वारा कठोर परिश्रम कर पढ़ाई कर प्रवेश परीक्षा पास कर तकनीकी शिक्षा लेने का सपना पूरा करने का मौका बिरले छात्रों को मिल पाता है लेकिन जब ऐसे होनहार छात्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176926/why-are-nit-aspirants-committing-suicide"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/sad_1_10-09-2020.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के प्रतिष्ठित कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) में द्वितीय वर्ष की एक छात्रा अपने छात्रावास के कमरे में मृत पाई गई, जिससे पिछले दो महीनों में परिसर में संदिग्ध छात्र मृत्यु का यह चौथा मामला सामने आया है।एनआईटी कुरुक्षेत्र में एक और छात्रा की आत्महत्या! यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर विफलता का संकेत है।एनआइटी में प्रवेश पाने के लिए छात्र छात्राओं द्वारा कठोर परिश्रम कर पढ़ाई कर प्रवेश परीक्षा पास कर तकनीकी शिक्षा लेने का सपना पूरा करने का मौका बिरले छात्रों को मिल पाता है लेकिन जब ऐसे होनहार छात्र छात्राओं द्वारा मौत को गले लगाने का सिलसिला चलता है तो इस संस्थान के माहौल पर भी सवालिया निशान लगता है। लगातार हो रही ऐसी घटनाएँ बताती हैं कि छात्रों का मानसिक दबाव, संस्थागत संवेदनहीनता और सपोर्ट सिस्टम की कमी अब खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है।सरकार और प्रशासन इन मौतों का मूक दर्शक बने हैं आखिर कब जागेंगे ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुरुवार 16 अप्रैल, 2026 को जब दीक्षा दुबे ने अपने दोस्तों के फोन का जवाब नहीं दिया, तो वे उसके कमरे में पहुँचे और कमरा अंदर से बंद पाया। सूचना मिलते ही पुलिस और फोरेंसिक टीमें दोपहर करीब 3 बजे मौके पर पहुँचीं और दरवाजा तोड़कर अंदर प्रवेश किया तो वह मृत पाई गईं। शव को पोस्टमार्टम के लिए एलएनजेपी सिविल अस्पताल भेज दिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;">घटना के पीछे का सटीक कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है। आगे की कार्यवाही जांच के निष्कर्षों और परिवार के बयानों पर निर्भर करेगी। फरवरी से अब तक एनआईटी कुरुक्षेत्र में यह चौथा मामला दर्ज किया गया है। आपको बता दें 16 फरवरी को तेलंगाना निवासी अंगोद शिव (19) अपने छात्रावास के कमरे में मृत पाए गए। प्रथम सेमेस्टर के छात्र अंगोद शिव संस्थान में कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग (सीएसई) की डिग्री हासिल कर रहे थे। नूह के एक अन्य छात्र ने 31 मार्च को एनआईटी कुरुक्षेत्र में आत्महत्या कर ली।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीसरी संदिग्ध मौत की सूचना 8 अप्रैल को मिली, जब हरियाणा के सिरसा निवासी प्रियांशु शर्मा अपने छात्रावास के कमरे में मृत पाए गए। वह सिविल इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक के तीसरे वर्ष के छात्र थे। हाल ही में 16 अप्रेल बिहार की रहने वाली 19 वर्षीय बीटेक छात्रा दीक्षा दुबे ने बृहस्पतिवार को कथित तौर आत्महत्या कर ली थी, जिसके बाद यह समिति गठित की गई है। छात्रा की मृत्यु के बाद परिसर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दीक्षा दुबे की मृत्यु पिछले दो महीनों में परिसर में हुई इस तरह की चौथी घटना थी।इतना ही नहीं 18 अप्रैल शनिवार देर रात करीब 12 बजे कल्पना छात्रावास में एक छात्रा ने आत्महत्या का प्रयास किया लेकिन मौके पर मौजूद अन्य छात्रों ने समय रहते उसे बचा लिया.  इस घटना के बाद कैंपस में तनाव और बढ़ गया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन संदिग्ध मौतों के चलते कैंपस में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र देर रात मुख्य द्वार पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए एकत्र हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि छात्रावास के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों का व्यवहार संतोषजनक नहीं था और उन्होंने स्थिति से निपटने के तरीके पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने घटना के सामने आने के बाद प्रतिक्रिया में लगने वाले समय पर भी सवाल उठाया। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र ने परिसर में हाल में छात्रों के आत्महत्या के मामलों की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साथ ही छात्रों की समस्याओं की जांच के लिए तीन अलग-अलग समितियां भी बनाई हैं। जांच समिति इस मुद्दे पर छात्रों, प्रोफेसर, वार्डन और अन्य कर्मचारियों के साथ बातचीत करेगी। एनआईटी के जनसंपर्क अधिकारी प्रोफेसर ज्ञान भूषण ने रविवार को कहा कि परिसर में हाल में हुई आत्महत्या की घटनाओं की जांच के लिए एक समिति गठित की गई है। समिति की अध्यक्षता छात्र कल्याण विभाग की डीन प्रोफेसर लिली दीवान कर रही हैं और इसमें प्रोफेसर जे.के. कपूर, प्रोफेसर प्रवीण अग्रवाल, डॉ. संदीप सिंघल और डॉ. मनोज सिन्हा शामिल हैं।पुलिस ने बताया था कि दुबे की कथित आत्महत्या के बाद शुक्रवार रात को बीटेक प्रथम वर्ष की एक अन्य छात्रा ने भी कथित तौर पर आत्महत्या का प्रयास किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संस्थान में मौजूदा स्थिति को देखते हुए और सभी छात्रों के सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी छात्रों के लिए अगले आदेश तक अवकाश रहेगा। एनआईटी प्रशासन की ओर से जारी एक नोटिस के अनुसार, उन्हें 19 अप्रैल तक अपने छात्रावास खाली करने होंगे। छात्रावासों में रह रहे लगभग 5,300 छात्रों में से 2,500 से अधिक छात्रों ने संस्थान के नोटिस के बाद शनिवार तक अपने कमरे खाली कर दिए। दूरदराज के राज्यों से आने वाले छात्रों के लिए स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने कहा कि प्रायोगिक परीक्षाओं समेत संशोधित परीक्षा कार्यक्रम की सूचना उचित समय पर दी जाएगी। छात्रों को परीक्षा शुरू होने से काफी पहले सूचित कर दिया जाएगा। हालांकि छात्रों का आरोप है कि पहले बनी जांच कमेटी ने भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया. कुछ छात्रों ने यह भी कहा कि उन्हें मानसिक दबाव और परेशान किया जा रहा है. इधर, बढ़ते विवाद के बीच एनआइटी प्रशासन ने 17 अप्रैल से 4 मई तक छुट्टियां घोषित कर दी हैं. छात्रों को हॉस्टल खाली करने का नोटिस दिया गया है. इस पर भी छात्रों ने नाराजगी जताई है और कहा है कि उन्हें जबरदस्ती घर भेजकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल उठता है कि एक प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थान में ऐसी क्या गड़बड़ी है कि भविष्य संवारने के लिए आए होनहार छात्र छात्राओं को सुसाइड करने की मजबूरी आन पड़ी है? इस के पीछे क्या संस्थान के शिक्षक प्रबंधन प्रशासन की कोई गड़बड़ी जिम्मेदार है या छात्रों के बीच में ही शेरों की खाल में कोई सियार छिपे हुए हैं और छात्र छात्राओं के साथ कोई अनैतिकता या अमानवीयता कर उन्हें सुसाइड करने के लिए मजबूर किया जा रहा है? की बार नशे के सौदागर और साइबर ठगी या निवेश के जाल मे फंसा कर ब्लेक मेल करने वाले गिरोह भी ऐसे वारदातों के पीछे जिम्मेदार हो सकते हैं। क्या वजह है कि सरकार ने एक के बाद एक हो रही सुसाइड की वारदातों को गंभीरता से नहीं लिया आखिर कब तक हमारे उच्च शिक्षा संस्थान होनहार बच्चों के सपनों को रौंद कर उनके जीवन से खिलवाड़ करते रहेंगे। जो भी हो इन सुसाइड मामलों की गंभीरता से जांच करानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 19:06:05 +0530</pubDate>
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                <title>अधिकारों की तुलना में कर्तव्य और जिम्मेदारियां के प्रति हम ज्यादा अनभिग्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रश्न केवल संवैधानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आईना भी है।  इसी प्रकार भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176919/we-are-more-ignorant-of-duties-and-responsibilities-than-rights"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/dgkdjgbvax1605352666.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रश्न केवल संवैधानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आईना भी है।  इसी प्रकार भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि कानून और नियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना और कार्यों में जीवित रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> आज हम जिस दौर में खड़े हैं, वहाँ एक ओर जनसंख्या का विस्तार, स्त्री-पुरुष अनुपात की जटिलता और शिक्षा का असमान वितरण दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर अधिकारों के प्रति तीव्र आग्रह और जिम्मेदारियों के प्रति अपेक्षाकृत शिथिल उदासीनता भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। यह विडंबना ही है कि जिस देश ने विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् और कर्तव्य ही धर्म है जैसे विचार दिए, उसी समाज में आज अधिकारों की माँग तो प्रमुखता से अंगीकार और स्वीकार करने की चाहत रखता है, परंतु कर्तव्यों और जिम्मेदारियां के निर्वहन में परिपक्वता का अभाव एवं दुराग्रह दिखाई देता है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत की जनसंख्या, जो अब विश्व में शीर्षतम जनसंख्या वाले देशों में शामिल है, यहां केवल संख्या का विषय नहीं बल्कि गुणवत्ता का प्रश्न भी है यह गुणवत्ता शिक्षा, सामाजिक समझ और संवैधानिक चेतना, जागरूकता पर आधारित होती है। जब हम स्त्री-पुरुष अनुपात की बात करते हैं, तो यह केवल आंकड़ों का संतुलन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता का संकेतक है। किंतु जब तक दोनों ही वर्ग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समान रूप से नहीं समझेंगे, तब तक वास्तविक प्रगति अधूरी और दिवा-स्वप्न ही रहेगी। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">शिक्षा इस पूरे विमर्श का केंद्र बिंदु है, क्योंकि शिक्षित समाज ही अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है, परंतु भारत में शिक्षा का प्रसार अभी भी समरूप नहीं है।ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, तथा विभिन्न आर्थिक वर्गों के बीच एक गहरी और बड़ी खाई मौजूद है। परिणामस्वरूप, एक बड़ा वर्ग अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक हो रहा है, परंतु कर्तव्यों के प्रति उसकी समझ अभी भी सीमित संकुचित है। भारतीय संविधान, जो नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उसी के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी स्पष्ट व्याख्या करता है, किंतु व्यवहारिक जीवन में अधिकारों की चर्चा अधिक होती है और कर्तव्यों की उपेक्षा। महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” परंतु आधुनिक समाज में यह विचार धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला गया है। इसी प्रकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि कानून और नियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना में जीवित रहते हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत में कानूनों की कमी नहीं है सड़क सुरक्षा से लेकर महिला संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण से लेकर शिक्षा के अधिकार तक हर क्षेत्र में स्पष्ट नियम बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन तभी संभव है जब नागरिक स्वयं जिम्मेदारी का परिचय दें। उदाहरण के लिए, सड़क पर यातायात नियमों का उल्लंघन केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन की कमी का संकेत है।इसी प्रकार, महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकते जब तक समाज में लैंगिक संवेदनशीलता और सम्मान की भावना विकसित न हो। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">स्त्री-पुरुष समानता के संदर्भ में भी यह स्पष्ट है कि अधिकारों की माँग के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है।जहाँ महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं, वहीं समाज के सभी वर्गों को उनके प्रति सम्मान और सहयोग का कर्तव्य निभाना होगा। शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद यदि नैतिक शिक्षा और नागरिकता के मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तो केवल डिग्रीधारी नागरिक तैयार होंगे, जागरूक और जिम्मेदार कर्तव्य निस्ट नागरिक नहीं। आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अधिकारों की आवाज़ को मजबूत किया है,</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> लेकिन कई बार यह जागरूकता एकतरफा हो जाती है, जहाँ केवल अधिकारों की बात होती है और जिम्मेदारियों की चर्चा गौण हो जाती है। यही असंतुलन समाज में तनाव और गहरे हरेअसंतोष को जन्म देता है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में प्रारंभ से ही नागरिक कर्तव्यों पर बल दिया जाए, परिवार और समाज में जिम्मेदारी की भावना को विकसित किया जाए, और शासन स्तर पर भी जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाया जाए कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> जब तक आम नागरिक स्वयं कानूनों का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक कोई भी व्यवस्था पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिक ही सर्वोच्च शक्ति हैं, और उनकी परिपक्वता ही राष्ट्र की दिशा और दशा तय करती है। इसलिए यह सही समय आत्ममंथन का है क्या हम केवल अपने अधिकारों के लिए सजग हैं, या अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही प्रतिबद्ध हैं?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> यदि इस प्रश्न का उत्तर पूर्ण ईमानदारी और सजगता  से खोजा जाए, तो स्पष्ट होगा कि हमें अभी लंबा सफर तय करना है। जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी के समन्वय से ही वह दिन आएगा जब भारत केवल अधिकारों के प्रति नहीं, बल्कि कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से परिपक्व राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा जिससे विकास की गति को सदैव सशक्त बल मिलेगा और विकास की संभावना चारों दिशाओं में व्याप्त होगी ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:47:29 +0530</pubDate>
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                <title>सिद्धार्थनगर :  1741परीक्षक, 363218 उत्तर पुस्तिकाओं का करेंगे  मूल्यांकन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर, </strong> माध्यमिक शिक्षा परिषद, प्रयागराज के निर्देश पर हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की कॉपियों की जांच के लिए जिले में तीन मूल्यांकन केंद्र बनाए गए हैं। इन केंद्रों पर  कुल 1741 परीक्षक और प्रधान परीक्षक  दोनों मिलाकर तैनात किए गए हैं। जिसमें कुल 363218  उत्तर पुस्तिकाओं  का मूल्यांकन करेंगे,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इंटरमीडिएट की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन रतनसेन इंटर कॉलेज बांसी में होगा।  जबकि हाईस्कूल की कॉपियों की जांच शिवपति इंटर कॉलेज शोहरतगढ़ और तिलक इंटर कॉलेज बांसी में की जाएगी। प्रशासन और माध्यमिक शिक्षा विभाग मूल्यांकन कार्य को समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पूरा करने की तैयारियों पूर्ण कर ली है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मूल्यांकन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173433/siddharthnagar-1741-examiners-will-evaluate-363218-answer-sheets"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/education.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर, </strong> माध्यमिक शिक्षा परिषद, प्रयागराज के निर्देश पर हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की कॉपियों की जांच के लिए जिले में तीन मूल्यांकन केंद्र बनाए गए हैं। इन केंद्रों पर  कुल 1741 परीक्षक और प्रधान परीक्षक  दोनों मिलाकर तैनात किए गए हैं। जिसमें कुल 363218  उत्तर पुस्तिकाओं  का मूल्यांकन करेंगे,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इंटरमीडिएट की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन रतनसेन इंटर कॉलेज बांसी में होगा।  जबकि हाईस्कूल की कॉपियों की जांच शिवपति इंटर कॉलेज शोहरतगढ़ और तिलक इंटर कॉलेज बांसी में की जाएगी। प्रशासन और माध्यमिक शिक्षा विभाग मूल्यांकन कार्य को समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पूरा करने की तैयारियों पूर्ण कर ली है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मूल्यांकन केंद्रों पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है। पुलिस बल की तैनाती, सीसीटीवी निगरानी, उत्तर पुस्तिकाओं का सुरक्षित रख-रखाव, पेयजल और बैठने जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जा रही हैं। अधिकारी केंद्रों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर रहे हैं ताकि मूल्यांकन के दौरान कोई अव्यवस्था न हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिला विद्यालय निरीक्षक अरुण कुमार ने बताया कि 18 मार्च से शुरू होने वाले मूल्यांकन कार्य को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई  हैं। बोर्ड के दिशा-निर्देशों के अनुसार केंद्रों पर सुरक्षा, पेयजल, बैठने की व्यवस्था समेत सभी जरूरी इंतजाम सुनिश्चित किए गए  हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:27:21 +0530</pubDate>
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