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                <title>us iran conflict - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>us iran conflict RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अमेरिकी हमलों के बावजूद अडिग ईरान : मिसाइल ताकत बरकरार, दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179243/irans-missile-power-intact-despite-us-attacks-not-ready-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों पर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार ईरान की मिसाइल क्षमता अब भी काफी हद तक सुरक्षित है और उसके अंडरग्राउंड नेटवर्क को अपेक्षित नुकसान नहीं पहुंचा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">खुफिया आकलनों के मुताबिक ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल जखीरे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बचाने में सफल रहा है। इतना ही नहीं, उसके 90 प्रतिशत भूमिगत मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च नेटवर्क अब भी सक्रिय स्थिति में हैं। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि ईरान ने वर्षों से जिस रणनीतिक तैयारी पर काम किया था, वह अमेरिकी हमलों के बावजूद पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थित मिसाइल ठिकानों तक ईरान ने दोबारा पहुंच बना ली है। यह वही क्षेत्र है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार गुजरता है। यदि यहां अस्थिरता बढ़ती है, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती यही है कि वह तकनीकी और सैन्य रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकत होने के बावजूद ईरान की “असममित युद्ध नीति” को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पा रहा। ईरान ने पारंपरिक युद्ध के बजाय ऐसे नेटवर्क तैयार किए हैं जो भूमिगत सुरंगों, मोबाइल लॉन्चरों और विकेंद्रीकृत मिसाइल ठिकानों पर आधारित हैं। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी ईरान की जवाबी क्षमता खत्म नहीं हुई। रिपोर्टों के अनुसार उसके लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर सुरक्षित हैं। इन लॉन्चरों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इन्हें किसी भी इलाके में ले जाकर अचानक हमला किया जा सकता है। इससे विरोधी देश लगातार अनिश्चितता और दबाव में रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की रणनीति केवल सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है। उसने पिछले दो दशकों में अपने रक्षा ढांचे को इस प्रकार विकसित किया है कि बाहरी हमलों की स्थिति में भी उसका कमांड और कंट्रोल सिस्टम सक्रिय बना रहे। अमेरिकी और इजरायली हमलों के खतरे को देखते हुए ईरान ने अपने मिसाइल नेटवर्क को पहाड़ों के भीतर और भूमिगत सुरंगों में स्थापित किया। यही वजह है कि अत्याधुनिक बमबारी के बावजूद अमेरिका उसकी पूरी सैन्य क्षमता को नष्ट नहीं कर पाया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना कि “ईरान के सामने केवल दो रास्ते हैं—समझौता या पूर्ण विनाश”, राजनीतिक रूप से भले ही आक्रामक संदेश हो, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं है। उसने समझौते के बदले युद्ध क्षतिपूर्ति, प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता की मान्यता जैसी शर्तें रखी हैं। यह दिखाता है कि ईरान खुद को कमजोर स्थिति में नहीं मानता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की इस निडरता के पीछे केवल सैन्य तैयारी ही नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक और राजनीतिक सोच भी जिम्मेदार है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान ने खुद को पश्चिमी दबाव के खिलाफ प्रतिरोध की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव के बावजूद उसने अपनी मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को लगातार विकसित किया। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी वहां की सत्ता व्यवस्था या सैन्य संरचना में कोई बड़ा टूटाव दिखाई नहीं देता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है। ट्रम्प का चीन दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका चाहता है कि शी जिनपिंग ईरान पर दबाव डाले। चीन और ईरान के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध मजबूत रहे हैं। चीन पश्चिम एशिया में स्थिरता चाहता है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। ऐसे में अमेरिका चीन को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि चीन खुलकर अमेरिकी रणनीति का समर्थन करेगा, इसकी संभावना कम दिखाई देती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान के मुद्दे ने वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित किया है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। दुनिया के लगभग एक तिहाई समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी क्षेत्र से गुजरता है। ईरान कई बार संकेत दे चुका है कि यदि उसके खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाया गया तो वह इस मार्ग को बाधित कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की नीति अपना रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य संरचना का बचा रहना अमेरिकी रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे देशों में बड़े सैन्य अभियान चलाए, लेकिन लंबे समय में वहां स्थिरता स्थापित नहीं कर पाया। ईरान का मामला उससे भी अधिक जटिल है, क्योंकि यहां मजबूत राष्ट्रवादी भावना, संगठित सैन्य ढांचा और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क मौजूद हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और इराक-सीरिया के कई सशस्त्र समूह ईरान के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। इसलिए ईरान पर हमला केवल एक देश के खिलाफ कार्रवाई नहीं बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित कर सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की मिसाइल क्षमता का बरकरार रहना यह भी दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध केवल हवाई हमलों से नहीं जीते जा सकते। तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद जमीनी तैयारी, नेटवर्क आधारित रक्षा और रणनीतिक धैर्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ईरान ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि कोई देश लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से अपनी रक्षा नीति तैयार करे तो वह महाशक्तियों के सामने भी टिक सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज की स्थिति में अमेरिका सैन्य दबाव के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान अपने अस्तित्व और संप्रभुता की लड़ाई के रूप में इसे प्रस्तुत कर रहा है। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान के भीतर भय या आत्मसमर्पण का माहौल नहीं दिखाई देता। बल्कि उसकी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह लंबे संघर्ष के लिए तैयार है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में शांति फिलहाल दूर नजर आती है। यदि बातचीत का रास्ता नहीं निकला तो आने वाले समय में यह टकराव और व्यापक रूप ले सकता है। लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका के लगातार हमलों और धमकियों के बावजूद ईरान की सैन्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह टूटी नहीं है। उसकी मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा सुरक्षित रहना इस बात का प्रमाण है कि यह संघर्ष केवल ताकत का नहीं, बल्कि रणनीति, धैर्य और राजनीतिक संकल्प का भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 21:11:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पहले सभ्यता मिटाने की धमकी और फिर ईरान को रिकंस्ट्रक्शन में मदद का वादा, 24 घंटे में ट्रंप के पलटने की पूरी कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महज 24 घंटे पहले ईरान को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे रहे थे। उन्होंने कहा था कि अगर ईरान उनकी बात नहीं मानता, तो “मंगलवार रात पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है।“ उनके इस बयान से पूरी दुनिया में दहशत का माहौल बन गया था। लेकिन ट्रंप अब ईरान के पुनर्निर्माण में मदद की बात कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में युद्धविराम समझौते को ‘‘विश्व शांति के लिए एक बड़ा दिन’’ घोषित किया और कहा कि अमेरिका ‘‘होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात की भीड़ को कम करने में मदद</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175576/first-the-threat-of-destroying-civilization-and-then-the-promise"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/top_news_today_1775567346779_1775567356175.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महज 24 घंटे पहले ईरान को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे रहे थे। उन्होंने कहा था कि अगर ईरान उनकी बात नहीं मानता, तो “मंगलवार रात पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है।“ उनके इस बयान से पूरी दुनिया में दहशत का माहौल बन गया था। लेकिन ट्रंप अब ईरान के पुनर्निर्माण में मदद की बात कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में युद्धविराम समझौते को ‘‘विश्व शांति के लिए एक बड़ा दिन’’ घोषित किया और कहा कि अमेरिका ‘‘होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात की भीड़ को कम करने में मदद करेगा।’’ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, ‘‘बहुत सारे सकारात्मक कदम उठाए जाएंगे!’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘इससे खूब आय होगी। ईरान पुनर्निर्माण प्रक्रिया शुरू कर सकता है। हम हर तरह की आपूर्ति लेकर जाएंगे और यह सुनिश्चित करने के लिए वहीं मौजूद रहेंगे कि सब कुछ ठीक से चले। मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा ही होगा।’’</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप की ‘ट्रुथ सोशल’ वेबसाइट पर दिए गए संदेश से वाशिंगटन की इस चिंता का संकेत मिलता है कि ईरान फारस की खाड़ी के संकरे मुहाने पर अपना नियंत्रण बनाए हुए है, जिससे शांति काल में कुल तेल और प्राकृतिक गैस का 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि यह यू-टर्न सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि  राजनीतिक भी हो सकता है। अमेरिका में चुनावी माहौल गर्म है और इस जंग के कारण ट्रंप की लोकप्रियता पर असर पड़ा है। ऐसे में शांति का संदेश देना उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। दूसरी तरफ, ईरान भी लगातार दबाव में था। आर्थिक संकट, सैन्य नुकसान और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उसे भी बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ा।राजनीतिक विश्लेषण सेवा</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले मंगलवार को उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दावा किया कि आज (मंगलवार) रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी। ट्रंप ने ट्रुथ पोस्ट में लिखा कि "आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी, जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही ट्रंप ने विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वो इसकी ख्वाहिश नहीं रखते। उन्होंने कहा, "मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो, लेकिन शायद हो जाए।" फिर दावा किया कि अब ईरान में पूर्ण सत्ता परिवर्तन की गुंजाइश है। उनके मुताबिक, इस बदलाव के साथ ही सत्ता पर ज्यादा होशियार और कम रेडिकल सोच वाले लोग काबिज होंगे। ट्रंप ने उम्मीद जताई कि अगर ऐसा हुआ तो "शायद कुछ बहुत ही शानदार हो जाए।" ट्रंप ने अपनी बातों को विराम देते हुए कहा- आज की रात दुनिया के इतिहास की एक बहुत बड़ी और खास पल साबित हो सकती है। पिछले 47 साल से चल रहे दमन, भ्रष्टाचार और हिंसा का अंत हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 22:04:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहुत आपत्तिजनक हैं ट्रंप के असंयमित असभ्य बयान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175393/trumps-uncontrolled-rude-statements-are-very-objectionable"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c0eb6ec0-68a6-11f0-83d0-5d68283eb47c.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद से लगभग बंद है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. ट्रंप ने होर्मुज को लेकर ईरान को कई बार धमकी दी है और इस समुद्री मार्ग को खोलने का अल्टीमेटम दे चुके हैं. उन्होंने होर्मुज को खोलने में अमेरिका की मदद नहीं करने के लिए यूरोपीय व नाटो सहयोगियों पर भी नाराजगी जताई है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने यहां तक चेतावनी दी कि अमेरिका नाटो से बाहर निकल सकता है. अपने इस पोस्ट में ट्रंप ने ईरान के लिए ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया, जिसकी किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से उम्मीद नहीं की जाती. हालांकि हम जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप पर कभी कोई मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस समय उनकी भाषा में जो गिरावट स्पष्ट स्पष्ट परिलक्षित है, कम से कम उसका विश्व समुदाय को विरोध करना चाहिए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल ईरान पर अमेरिका और इजरायल को जंग छेड़े छह सप्ताह हो चुके हैं, जिसमें कई बार जीत का दावा करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जीत के लक्षण नहीं दिखा पाए। बल्कि बार-बार युद्धविराम की अवधि को बदलते हैं और साथ ही उनकी धमकियां भी बदल रही हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के ऐलान से शुरु हुआ यह युद्ध अब नागरिकों को निशाने पर लेने की धमकियों पर उतर आया है। रविवार को ईस्टर के मौके पर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टूथ पर ट्रंप ने ईरान को धमकी दी कि 48 घंटों में होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खोलो वर्ना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने लिखा कि मंगलवार को ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक हमले हो सकते हैं, और इसे संघर्ष का निर्णायक क्षण बताया। लेकिन यह सब इसी तरह की शालीन भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। और यह पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपशब्द कहे हों। इससे पहले उन्हें पत्रकारों से चर्चा के दौरान या भाषण देते हुए भी अपशब्द बोलते देखा गया है। यह किसी लिहाज से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और वैश्विक नेताओं को खुलकर इसकी भर्त्सना करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी से इसकी शुरुआत हो तो कितना अच्छा रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी सीनेट के सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी के ​वरिष्ठ नेता चक शूमर ने ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के बयान को 'एक असंतुलित व्यक्ति की बकवास बताया'. उन्होंने कहा कि ट्रंप का यह रवैया अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर कर रहा है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के हालिया बयान को युद्ध अपराध की धमकी देने जैसा बताया. ट्रंप की पूर्व सहयोगी मार्जरी टेलर ग्रीन ने भी उनके बयान की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रपति 'पागलपन' की स्थिति में हैं. उन्होंने अमेरिकी प्रशासन के लोगों से दखल देने की अपील की. टेलर ग्रीन ने कहा कि यह युद्ध बिना उकसावे के शुरू किया गया और इससे निर्दोष लोगों की जान जा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैसे संयुक्त राष्ट्र में  ईरानी ई मिशन ने ट्रंप की की नवीनतम टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में' नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करने' की धमकी दे रहे हैं। मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, 'यदि संयुक्त राष्ट्र की अंतरात्मा जीवित होती, तो वह युद्ध भड़काने तो वह युद्ध भड़काने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की खुली और बेशर्म धमकी पर चुप नहीं रहती। ट्रंप इस क्षेत्र को एक अंतहीन युद्ध में घसीटना चाहते हैं।' इसमें कहा गया, 'यह नागरिकों को आतंकित करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावा है और युद्ध अपराध करने के इरादे का स्पष्ट प्रमाण है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें आगे कहा गया- 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सभी राज्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे युद्ध अपराधों के ऐसे जघन्य कृत्यों को रोकें। उन्हें अभी कार्रवाई करनी चाहिए। कल बहुत देर हो जाएगी।' वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष गलिबाफ ने कहा कि ट्रंप के 'लापरवाह कदमों से अमेरिका के हर परिवार को एक जीती-जागती नरक में धकेला जा रहा है, हमारा पूरा क्षेत्र जल उठेगा क्योंकि आप नेतन्याहू के आदेशों का पालन करने पर अड़े हैं।' गुलिबाफ के इस बयान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं, उसमें यही लगता है कि पटकथा कोई और लिख रहा है, केवल संवाद अदायगी ट्रंप की है। क्योंकि अपशब्द वाले बयान के बाद ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के एक पत्रकार से कहा, मुझे लगता है कि सोमवार को समझौता होने की अच्छी संभावना है, वे (ईरान) अभी बातचीत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तो ट्रंप को लगता है कि ईरान अब भी उनसे बात कर समझौता करेगा, जबकि ईरान की सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूनिट खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता ने कहा, 'अगर आम लोगों पर हमले दोहराए गए, तो हमारे अगले हमले और जवाबी कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और बड़े पैमाने पर होंगे।' ध्यान देने वाली बात यह है कि ईरान केवल धमका नहीं रहा है, अपनी बात पर अमल भी कर रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों समेत इजरायल पर ईरान के हमलों को कोई रोक नहीं पा रहा है, वहीं अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हुए हमले और एक अमेरिकी पायलट के लापता होने की घटना ने भी जाहिर कर दिया है कि अमेरिका उतना भी ताकतवर देश नहीं है, जितना बड़ा उसका हौव्वा खड़ा किया गया है। ईरान की पहाड़ियों में लापता पायलट को बचाने का दावा ट्रंप ने किया है, हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने बचाव के लिए आए सैन्य दस्ते पर भी हमला किया है। अब किसका दावा सही है और किसका गलत, यह तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो नजर आ ही रहा है कि इस युद्ध में अमेरिका को वैसी ही चोट पड़ रही है, जो पहले इराक, अफगानिस्तान, क्यूबा और वियतनाम में पड़ चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि 2019 में ट्रंप ने खुद एक पोस्ट में प. एशिया में अमेरिका की सैन्य दखलंदाजी और युद्ध को गलत ठहराया था, क्योंकि उसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और सैनिकों का नुकसान हुआ। लेकिन अब संभवतः एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के दबाव में ट्रंप ने पूरी दुनिया को युद्ध की बर्बादी में झोंक दिया है। अपनी गलती मानने की जगह रोजाना बेतुके, निर्लज्ज बयानों से उसे सही भी ठहरा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में परमाणु हथियार और सत्ता बदलने के नाम पर शुरु किया गया युद्ध मीनाब की मासूम बच्चियों का कातिल बना और उसके बाद ईरान की अधोसंरचना पर हमले ही किए जा रहे हैं, कम से कम 30 विश्वविद्यालयों और कई अस्पतालों, दवा कारखानों को बारुद से ढेर कर दिया गया है। यह सीधे-सीधे मानवता के खिलाफ अपराध है, जिसे रोकने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर आवाज उठानी चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:20:36 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>होर्मुज संकट और वैश्विक टकराव की नई दिशा क्या अमेरिका फंस गया है ईरान के जाल में</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस संघर्ष के पहले</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173425/hormuz-crisis-and-new-direction-of-global-conflict-is-america"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संघर्ष के पहले चरण में अमेरिका ने यह मान लिया था कि शुरुआती हमलों के बाद ईरान जल्दी झुक जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान ने लगातार जवाबी हमले किए और वह भी कई देशों तक फैलाकर। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ईरान केवल बचाव नहीं कर रहा बल्कि सक्रिय रणनीति के तहत क्षेत्रीय दबाव बना रहा है। अमेरिकी ठिकानों पर हमले और संचार तंत्र को नुकसान पहुंचाना इस बात का संकेत है कि ईरान तकनीकी और सैन्य स्तर पर तैयार था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार ईरान के पास अभी भी पर्याप्त संवर्धित यूरेनियम मौजूद है जिससे यह संकेत मिलता है कि वह दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका के शुरुआती हमले निर्णायक नहीं रहे।इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम केंद्र होर्मुज स्ट्रेट बन गया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की रीढ़ माना जाता है। यहां से रोजाना करोड़ों बैरल तेल और गैस गुजरती है। जब ईरान ने इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित किया तो वैश्विक बाजार में तुरंत असर दिखाई दिया। तेल की कीमतों में तेजी आई और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही वह कारण है कि ट्रम्प को अब अकेले लड़ना मुश्किल लग रहा है और उन्होंने नाटो के साथ साथ चीन और जापान जैसे देशों से मदद की अपील की है। यह कदम इस बात का संकेत है कि अमेरिका इस संकट को केवल अपनी सैन्य ताकत से हल नहीं कर पा रहा है।चीन और जापान से मदद मांगना एक रणनीतिक मजबूरी भी है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी अर्थव्यवस्था इस मार्ग पर निर्भर है। जापान भी ऊर्जा के लिए इस रास्ते पर निर्भर करता है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि ये देश भी इस मिशन में शामिल हों ताकि एक वैश्विक दबाव बनाया जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इन देशों की प्रतिक्रिया बहुत सतर्क रही है। कोई भी देश सीधे सैन्य हस्तक्षेप के लिए तैयार नहीं दिख रहा। इसका मुख्य कारण जोखिम है। होर्मुज स्ट्रेट बेहद संकरा मार्ग है और यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का मतलब सीधा खतरा है। ईरान ने यहां समुद्री माइन्स बिछाने की रणनीति अपनाई है जो किसी भी जहाज के लिए जानलेवा हो सकती है।समुद्री माइन्स को हटाना आसान काम नहीं है। आधुनिक माइन्स को पहचानना मुश्किल होता है और उन्हें निष्क्रिय करना जोखिम भरा होता है। इसके अलावा ईरान के पास मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी है जिससे वह किसी भी ऑपरेशन को बाधित कर सकता है। इस कारण कोई भी देश अपनी नौसेना को सीधे खतरे में डालने से बच रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और बड़ी चुनौती है कई देशों की सेनाओं का एक साथ संचालन। अलग अलग देशों की तकनीक कम्युनिकेशन और रणनीति अलग होती है। ऐसे में संयुक्त ऑपरेशन करना बेहद जटिल हो जाता है। यही वजह है कि अब तक कोई ठोस सैन्य गठबंधन सामने नहीं आया है।इस संकट का एक और पहलू है इसका वैश्विक असर। दुनिया की लगभग बीस प्रतिशत तेल सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ेगी और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से पूरा करता है। अगर सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर पेट्रोल डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा। इससे आम लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा और आर्थिक दबाव बढ़ेगा।भारत ने इस पूरे मामले में संतुलित रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं ताकि भारतीय जहाज सुरक्षित रह सकें और सप्लाई बनी रहे। भारत न तो सीधे इस संघर्ष में शामिल होना चाहता है और न ही अपने हितों को नुकसान होने देना चाहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते बल्कि आर्थिक और रणनीतिक नियंत्रण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करके अमेरिका को एक ऐसी स्थिति में ला दिया है जहां उसे वैश्विक समर्थन की जरूरत पड़ रही है।अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह बिना युद्ध को और बढ़ाए इस मार्ग को कैसे सुरक्षित बनाए। अगर संघर्ष और बढ़ता है तो इसमें और देश शामिल हो सकते हैं जिससे स्थिति और जटिल हो जाएगी।अंत में यह कहा जा सकता है कि यह संघर्ष अभी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचा है। न तो अमेरिका पूरी तरह जीत पाया है और न ही ईरान पीछे हटने को तैयार है। होर्मुज स्ट्रेट इस टकराव का केंद्र बना हुआ है और जब तक इसका समाधान नहीं निकलता तब तक वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बनी रहेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:10:10 +0530</pubDate>
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                <title>बेगुनाह मासूम स्कूली बच्चियों के खून का कौन जिम्मेदार? </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में एक स्कूल में 165 बच्चियां क्लास पढ़ाई के लिए मौजूद थी लेकिन उन्हे इस बात का गुमान नही रहा होगा कि प्रभुत्व की सनक में दुनिया के कथित ताकतवर देश की अंधी मिसाइल उनके जीवन का खात्मा कर देंगी। स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अब पेंटागन की शुरुआती जांच रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि 28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में स्थित शजराह तैय्यबेह स्कूल पर हुआ हमला दरअसल अमेरिकी सेना की एक गंभीर गलती का नतीजा था. जांच के मुताबिक अमेरिकी सेना उस इलाके में एक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में एक स्कूल में 165 बच्चियां क्लास पढ़ाई के लिए मौजूद थी लेकिन उन्हे इस बात का गुमान नही रहा होगा कि प्रभुत्व की सनक में दुनिया के कथित ताकतवर देश की अंधी मिसाइल उनके जीवन का खात्मा कर देंगी। स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अब पेंटागन की शुरुआती जांच रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि 28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में स्थित शजराह तैय्यबेह स्कूल पर हुआ हमला दरअसल अमेरिकी सेना की एक गंभीर गलती का नतीजा था. जांच के मुताबिक अमेरिकी सेना उस इलाके में एक ईरानी नौसैनिक ठिकाने को निशाना बना रही थी. लेकिन टार्गेट तय करते समय पुराने और गलत टार्गेटिंग डेटा का इस्तेमाल किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी वजह से दागी गई टॉमहॉक क्रूज मिसाइल अपने असली लक्ष्य से भटक गई और सीधे स्कूल की इमारत से जा टकराई.माना जाता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एआइ ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में काम को काफी आसान बना कर अच्छा अनुभव दिया है। मैडिकल, लीगल और एजुकेशन जैसे सैक्टर्स में डाटा संग्रहण और त्वरित गणना की सुविधा से कई अच्छे कार्य हो रहे हैं   लेकिन इसी बीच ईरान युद्ध के दौरान अमरीका द्वारा किए गए ए. आई. के इस्तेमाल और इस निशाने में हुई चूक के कारण हुई स्कूली बच्चियों की मौत ने दुनिया में दहशत की इबारत लिख ममदी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शुरुआती जांच में माना गया है कि यह हमला जानबूझकर नहीं किया गया था, बल्कि खुफिया जानकारी और टार्गेटिंग सिस्टम में हुई चूक के कारण यह हादसा हुआ. इस घटना के बाद अमेरिकी सैन्य तंत्र के अंदर भी टार्गेटिंग प्रक्रिया और डेटा की सटीकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं. वहीं इस हमले को लेकर जो  खुलासा सामने आ रहा है उसमे गंभीर चूक का अनुमान है पुरानी इंटेलिजेंस की वजह से शायद अमेरिका ने ईरान के एक एलिमेंट्री स्कूल पर जानलेवा मिसाइल हमला किया, जिसमें लड़ाई के शुरुआती घंटों में 165 से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर बच्चे थे. स्कूल पर बमबारी और उसमें बच्चों की मौत युद्ध का मुख्य मुद्दा बन गई है. अगर यह कन्फर्म हो जाता है कि यह यूएस के हाथों हुआ था, तो यह पिछले दो दशकों में अमेरिकी मिलिट्री ऑपरेशन की वजह से हुई सबसे ज्यादा आम लोगों की मौत की घटनाओं में से एक होगी.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल अग्रणी ए.आई. कंपनी एंथ्रोपिक ने इस साल जनवरी ही में पेंटागन के उस अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया, जिसके तहत अमरीकी सेना को 'सभी वैध उद्देश्यों' के लिए उसकी तकनीक तक 'असीमित पहुंच' मिल जाती। अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए, एंथ्रोपिक के सी.ई.ओ. डारियो अमोदेई ने 2 स्पष्ट शर्तें रखीं-अमरीकियों की बड़े पैमाने पर जासूसी नहीं की जाएगी और मानवीय निगरानी के बिना पूरी तरह से स्वायत्त हथियारों का इस्तेमाल युद्ध में नहीं किया जाएगा!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस निर्णय से एंथ्रोपिक को भारी नुकसान हुआ, परन्तु प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने तुरंत पेंटागन के साथ मानव नियंत्रण के बिना पूर्ण ए.आई. नियंत्रण के लिए समझौता कर लिया। इस समझौते के बाद अमरीका और इसराईल ने ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू कर दिया। युद्ध के पहले ही दिन 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके 10 टॉप कमांडरों की हत्या उनके परिसर में कर दी गई, जिसे दोनों देशों ने ए.आई. पर्शियन हमले की एक बड़ी जीत माना।लेकिन उसी दिन, 28 फरवरी को, एक और घातक हमला मीनाब में स्थित शजराह तैयबा गर्ल्स स्कूल पर भी किया गया। 2 मिसाइलों ने 45 सैकेंड में स्कूल को नष्ट कर दिया था। मीनाब में जो हुआ, वह ए.आई. के अंधाधुंध उपयोग का सबसे भयावह उदाहरण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">'शजराह तैयबा' गर्ल्स प्राइमरी स्कूल, जिसमें 165 से अधिक मासूम बच्चियां मौत से लड़ती, चीखती-चिल्लाती रहीं, तकनीकी भाषा में इसे ' सटीक हमला' कहा गया। जबकि ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि लड़कियों के स्कूल पर ईरान ने टोमहॉक मिसाइल से हमला किया था, जबकि सभी जानते हैं कि ईरान के पास यह मिसाइल नहीं है, यहां तक कि इसराईल के पास भी नहीं है, इसलिए उनके द्वारा सोशल मीडिया पर फैलाए गए झूठ से सच को छिपाने का काम किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू में हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया, बाद में कहा कि उन्हें पक्का नहीं पता कि कौन दोषी है, और फिर कहा कि वह पेंटागन की जांच के नतीजों को मान लेंगे. यह हाल ही में यह मामला और ज्यादा पेचीदा हो गयी जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहली बार रिपोर्ट किया कि शुरुआती जांच में पाया गया कि यूएस जिम्मेदार है.  शुरुआती नतीजों के बाद पेंटागन से तुरंत और जानकारी मांगी गई. व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि जांच अभी भी चल रही है.   </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">28 फरवरी को शजारेह तैयबेह एलिमेंट्री स्कूल पर हुआ हमला, जो ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास के बेस के पास है. हमले के लिए अमेरिका की जिम्मेदारी की ओर इशारा करते हुए सबूत बढ़ रहे हैं. ऐसे कई संकेत हैं जिससे पता चलता है कि स्कूल पर हमला टाला जा सकता था. ये हमले 28 फरवरी की सुबह हुए थे. तब स्कूल की बिल्डिंग छोटे बच्चों से भरी हुई थी.  न्यूज रिपोर्ट से पता चलता है कि स्क और उसी दिन हमले वाले दूसरे टारगेट, हवा से दिखने वाली ऐसी खासियतें थीं जिनसे हमले से पहले उन्हें सिविलियन साइट के तौर पर पहचाना जा सकता था. इस हमले के वीडियो में एक्सपर्ट्स ने अमेरिका में बनी टॉमहॉक क्रूज मिसाइल को मिलिट्री कंपाउंड में टकराते हुए देखा जा सकता है. जबकि उस इलाके से पहले से ही धुआं उठ रहा था जहां स्कूल था. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पब्लिक में मौजूद सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि स्कूल बिल्डिंग लगभग 2017 तक मिलिट्री कंपाउंड का हिस्सा थी, जब दोनों को अलग करने के लिए एक नई दीवार बनाई गई। प्रॉपर्टी पर एक वॉचटावर भी हटा दिया गया था. उसी समय की तस्वीरों से पता चलता है कि बिल्डिंग के चारों ओर की दीवारों पर चमकीले रंगों, खासकर नीले और गुलाबी रंग के म्यूरल बनाए गए थे. ये इतने चमकीले थे कि वे स्पेस से भी दिखाई देते हैं. स्कूल को ऑनलाइन मैप पर साफ तौर पर लेबल किया गया था और इसकी एक आसानी से मिलने वाली वेबसाइट है जिसमें स्टूडेंट्स, टीचर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स के बारे में जानकारी भरी हुई है. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध को कंट्रोल करने वाला इंटरनेशनल कानून उन स्ट्रक्चर्स, गाड़ियों और लोगों पर हमले करने से रोकता है जो मिलिट्री के निशाने और लड़ाके नहीं हैं. आम लोगों के घर, स्कूल, मेडिकल और सामाजिक जगहें आम तौर पर मिलिट्री हमलों के लिए बंद रहती हैं.बताया जा रहा है कि यह सारा मामला एआइ की चूक से हुआ है दरअसल 10 साल पहले इस क्षेत्र पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आई.आर.जी.सी.) ईरानी सशस्त्र बलों का एक सैन्य परिसर था।लेकिन डाटाबेस अपडेट न होने के कारण ए.आई. को यह मालूम नहीं पड़ा कि अब उसी स्थान पर बाईं ओर एक अस्पताल और दाईं तरफ एक अलग प्रवेश द्वार वाला स्कूल मौजूद है।</div>
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<div style="text-align:justify;">ए.आई. एल्गोरिद्म यह भी समझने में नाकाम रहा कि 7 से 12 साल की बच्चियां 'दुश्मन' नहीं होतीं। एक मशीन के लिए वे केवल 'कोलेटरल डैमेज' थीं। यह घटना साबित करती है कि जब हम युद्ध का पूर्ण नियंत्रण ए. आई. को देते हैं, तो हम युद्ध के मैदान से 'दया' और 'विवेक' को पूरी तरह से खत्म कर देते हैं।ए.आई. आधारित व्यापक निगरानी हमारी मौलिक स्वतंत्रताओं के लिए गंभीर और नए प्रकार के खतरे पैदा कर सकती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">किंग्स कॉलेज लंदन की रिसर्च ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि उन्नत ए. आई. मॉडल्स युद्ध की स्थिति में 95 प्रतिशत बार परमाणु विकल्प या अत्यधिक आक्रामकता को चुनते हैं। मशीनों के लिए 'जीत' ही एकमात्र लक्ष्य है, चाहे उसकी कीमत पूरी दुनिया का विनाश ही क्यों न हो। अगर हम आज ए.आई. को रक्षा क्षेत्र और समाज में खुली छूट देते हैं, तो हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जहां युद्ध का फैसला जनरल नहीं, बल्कि एक कोडिंग प्रोग्राम करेगा। लोगों की सुरक्षा ए.आई. डाटा का विश्लेषण करेगा! लेकिन 'ट्रिगर' पर उंगली और समाज का नियंत्रण हमेशा एक इंसान का ही होना चाहिए। क्या विश्व में लोकतंत्र का झंडाबरदार अमेरिका 165 बेगुनाह बच्चियों के नृशंसता पूर्ण हत्या का गुनाह कबूल करेगा? क्या इन मासूमों की हत्या का कोई अनुतोष हो सकता है? क्या यह नपुंसकता किसी देश को ताकतवर करार दे सकती है?</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 19:52:47 +0530</pubDate>
                
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