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                <title>स्वास्थ्य समाचार - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>स्वास्थ्य समाचार RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 उत्साहपूर्वक मनाया गया</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र सिंह भुल्लर </strong></div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली, 21 जून।</strong> वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 "स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग" थीम के तहत बड़े उत्साह और व्यापक जनभागीदारी के साथ मनाया गया। अस्पताल परिसर में आयोजित सामूहिक योग सत्र में 1,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया, जिनमें संकाय सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग अधिकारी, विद्यार्थी, प्रशासनिक कर्मचारी तथा अन्य स्टाफ सदस्य शामिल रहे। यह संस्थान द्वारा आयोजित सबसे बड़े स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रमों में से एक रहा।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल की निदेशक डॉ. कविता शर्मा थीं। इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. चारू बांबा, वरिष्ठ</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181883/international-yoga-day-2026-celebrated-with-enthusiasm-in-vmmc-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260621-wa0032.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र सिंह भुल्लर </strong></div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली, 21 जून।</strong> वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 "स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग" थीम के तहत बड़े उत्साह और व्यापक जनभागीदारी के साथ मनाया गया। अस्पताल परिसर में आयोजित सामूहिक योग सत्र में 1,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया, जिनमें संकाय सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग अधिकारी, विद्यार्थी, प्रशासनिक कर्मचारी तथा अन्य स्टाफ सदस्य शामिल रहे। यह संस्थान द्वारा आयोजित सबसे बड़े स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रमों में से एक रहा।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल की निदेशक डॉ. कविता शर्मा थीं। इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. चारू बांबा, वरिष्ठ मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. आर.पी. अरोड़ा, केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद सीसीआरवाईएन की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. सुजाता सहित वरिष्ठ संकाय सदस्य, विभागाध्यक्ष, स्वास्थ्यकर्मी एवं अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।अपने संबोधन में डॉ. कविता शर्मा ने योग को शारीरिक फिटनेस, मानसिक स्वास्थ्य और स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए एक समग्र जीवनशैली बताया। उन्होंने कहा कि योग न केवल रोगों की रोकथाम में सहायक है, बल्कि यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है, तनाव कम करता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाता है। उन्होंने सभी स्वास्थ्यकर्मियों और नागरिकों से योग को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।</div>
<div style="text-align:justify;">योग सत्र के दौरान प्रतिभागियों ने डॉ. सुजाता और उनकी टीम के मार्गदर्शन में कॉमन योगा प्रोटोकॉल (सीवाईपी) का अभ्यास किया। सत्र में विभिन्न योगासन, प्राणायाम, ध्यान और विश्राम तकनीकों का अभ्यास कराया गया। विशेषज्ञों ने योग के वैज्ञानिक लाभों और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम में इसकी भूमिका के बारे में भी जानकारी दी।कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने कोलकाता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन का सीधा प्रसारण भी देखा और सुना। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में स्वास्थ्य, सामंजस्य, आत्मबल और सतत जीवनशैली को बढ़ावा देने में योग की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।योग सत्र के बाद अस्पताल परिसर में वृक्षारोपण अभियान आयोजित किया गया। निदेशक डॉ. कविता शर्मा, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. चारू बांबा और वरिष्ठ सीएमओ डॉ. आर.पी. अरोड़ा ने पौधारोपण कर अभियान की शुरुआत की। इस दौरान परिसर में कई पौधे लगाए गए, जो पर्यावरण संरक्षण और हरित भविष्य के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. आर.पी. अरोड़ा रहे, जिनके नेतृत्व और प्रयासों से आयोजन का सफल संचालन सुनिश्चित हुआ। आयोजन टीम ने विभिन्न विभागों की सहभागिता सुनिश्चित करने और कार्यक्रम को सुचारु रूप से संपन्न कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</div>
<div style="text-align:justify;">यह आयोजन वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल की निवारक स्वास्थ्य सेवाओं, जनकल्याण, पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साथ ही, इसने आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली में पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों के महत्व को भी रेखांकित किया।कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने अपने दैनिक जीवन में योग को अपनाने, परिवार और समाज में स्वस्थ आदतों को बढ़ावा देने तथा एक स्वस्थ, खुशहाल और टिकाऊ समाज के निर्माण में योगदान देने का संकल्प लिया। 1,000 से अधिक प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने समग्र स्वास्थ्य और कल्याण के लिए योग की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाया।</div>
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                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 13:23:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चिकित्सकों ने कहा - हीट स्ट्रोक के लिए बचाव ही सुरक्षा है, बेवजह धूप में निकलने से बचें </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, कानपुर शाखा द्वारा आज “हीट स्ट्रोक (लू) से बचाव” के विषय पर एक महत्वपूर्ण पत्रकार वार्ता का आयोजन आईएमए भवन कानपुर में किया गया। इस अवसर पर शहर के वरिष्ठ एवं विशेषज्ञ चिकित्सकों ने आमजन को बढ़ती गर्मी के खतरों और उससे बचाव के उपायों के प्रति जागरूक किया।</div>
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<div style="text-align:justify;">प्रेस वार्ता में चिकित्सकों ने बताया कि भीषण गर्मी में सतर्क रहें, हीट स्ट्रोक से बचाव ही जीवन रक्षक। विशेषज्ञों ने बताया कि हीट स्ट्रोक एक गंभीर चिकित्सीय आपात स्थिति है, जिसमें शरीर का तापमान 40°C या उससे अधिक हो जाता है और शरीर की ताप नियंत्रित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177393/doctors-said-prevention-is-the-only-safety-for-heat"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001864693.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, कानपुर शाखा द्वारा आज “हीट स्ट्रोक (लू) से बचाव” के विषय पर एक महत्वपूर्ण पत्रकार वार्ता का आयोजन आईएमए भवन कानपुर में किया गया। इस अवसर पर शहर के वरिष्ठ एवं विशेषज्ञ चिकित्सकों ने आमजन को बढ़ती गर्मी के खतरों और उससे बचाव के उपायों के प्रति जागरूक किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रेस वार्ता में चिकित्सकों ने बताया कि भीषण गर्मी में सतर्क रहें, हीट स्ट्रोक से बचाव ही जीवन रक्षक। विशेषज्ञों ने बताया कि हीट स्ट्रोक एक गंभीर चिकित्सीय आपात स्थिति है, जिसमें शरीर का तापमान 40°C या उससे अधिक हो जाता है और शरीर की ताप नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। समय पर उपचार न मिलने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। तेज बुखार एवं शरीर का अत्यधिक गर्म होना, सिरदर्द, चक्कर आना, कमजोरी, उल्टी या मतली, पसीना कम आना या बंद हो जाना, त्वचा का लाल, सूखा और गर्म होना, भ्रम, बेहोशी या दौरे हीट स्ट्रोक के लक्षण हैं, विशेषज्ञों ने बताया कि बुजुर्ग एवं छोटे बच्चे इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बाहर काम करने वाले लोग (मजदूर, ट्रैफिक पुलिस आदि) हृदय, किडनी या अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीज डिहाइड्रेशन से पीड़ित व्यक्ति के लिए “लापरवाही जानलेवा हो सकती है” चिकित्सकों ने चेताया कि हीट स्ट्रोक को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। समय पर पहचान और तत्काल उपचार अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी, ORS, नींबू पानी, छाछ आदि का सेवन करेंधूप में निकलते समय सिर को ढकें (टोपी/गमछा/छाता) लेकर चलें, हल्के, ढीले एवं सूती कपड़े पहनें, दोपहर 12 से 4 बजे के बीच अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें।</div>
<div style="text-align:justify;">   </div>
<div style="text-align:justify;"> इस पत्रकार वार्ता को आईएमए कानपुर अध्यक्ष डॉ. अनुराग मेहरोत्रा, डॉ. शालिनी मोहन सचिव आईएमए कानपुर, डॉ. डी.पी. अग्रवाल, वरिष्ठ फिजिशियन, डॉ. ए. सी. अग्रवाल, वरिष्ठ फिजिशियन, डॉ. पुनीत दीक्षित बरिष्ठ न्यूरोलोगिस्ट, डॉ आलोक वर्मा, न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ आशुतोष त्रिवेदी, फिजिशियन, डॉ राहुल कपूर, फिजिशियन, डॉ विशाल सिंह, वित्त सचिव, डॉ. दीपक श्रीवास्तव वैज्ञानिक सचिव तथा अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों ने संयुक्त रूप से संबोधित किया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>स्वास्थ्य-आरोग्य</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:35:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तेरह साल का इंतज़ार और एक कठिन विदाई</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो जाती है। सामान्यतः हम जीवन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार माना जाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जब जीवन केवल सांसों का चलना भर रह जाता है और उसमें चेतना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और मानवीय गरिमा लगभग समाप्त हो जाती है। हाल के दिनों में चर्चा में आए हरीश राणा का मामला इसी विडंबना का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण बनकर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173408/thirteen-years-of-waiting-and-a-difficult-farewell"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो जाती है। सामान्यतः हम जीवन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार माना जाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जब जीवन केवल सांसों का चलना भर रह जाता है और उसमें चेतना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और मानवीय गरिमा लगभग समाप्त हो जाती है। हाल के दिनों में चर्चा में आए हरीश राणा का मामला इसी विडंबना का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण बनकर सामने आया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह चिकित्सा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कानून</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं के जटिल प्रश्नों को सामने लाने वाली घटना है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरीश राणा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले एक युवा थे। वर्ष </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">2013 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में एक दुर्घटना ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया। बताया जाता है कि वह पढ़ाई के दौरान एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह स्थायी कोमा जैसी अवस्था में चले गए। इस स्थिति को चिकित्सा भाषा में </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें व्यक्ति जीवित तो रहता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसके मस्तिष्क की चेतन क्रियाएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं। वह न बोल सकता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न चल सकता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न अपने आसपास की दुनिया को समझ सकता है। हरीश पिछले तेरह वर्षों तक इसी अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन वर्षों में उनका जीवन केवल चिकित्सा उपकरणों</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दवाइयों और कृत्रिम पोषण के सहारे चल रहा था। परिवार ने उनकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी। माता-पिता ने अपने बेटे को जीवित रखने के लिए हर संभव प्रयास किया। कई अस्पतालों में इलाज कराया गया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली गई</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। समय बीतने के साथ-साथ यह स्पष्ट होता गया कि अब उनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। डॉक्टरों ने भी यही राय दी कि मस्तिष्क को हुई गंभीर क्षति के कारण उनका सामान्य जीवन में लौटना लगभग असंभव है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी माता-पिता के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। एक ओर उनके सामने अपने बच्चे को खो देने का भय होता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर उसे इस तरह निर्जीव अवस्था में वर्षों तक देखना भी कम कष्टदायक नहीं होता। हरीश राणा के परिवार ने लगभग तेरह वर्षों तक इस पीड़ा को सहा। उन्होंने अपने बेटे की सेवा में दिन-रात बिताए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अंततः यह प्रश्न उनके सामने खड़ा हो गया कि क्या केवल सांस चलना ही जीवन कहलाता है। जब किसी व्यक्ति की चेतना समाप्त हो जाए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह अपने अस्तित्व का अनुभव भी न कर सके</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब क्या उसे कृत्रिम साधनों के सहारे जीवित रखना मानवीय है या अमानवीय</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">?</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं सवालों के साथ हरीश के परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि उनके बेटे को </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा मृत्यु</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाए। यह एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल कानूनी विषय है। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु यानी किसी व्यक्ति को जानबूझकर दवा देकर मृत्यु देना कानूनन अवैध है। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पैसिव यूथेनेशिया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की अनुमति दी जा सकती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपचार या उपकरणों को हटाया जाता है और मरीज को प्राकृतिक रूप से मृत्यु आने दी जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए हरीश राणा के जीवन-रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और उसी प्रकार गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी मानवीय अधिकारों का हिस्सा है। अदालत ने निर्देश दिया कि उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती किया जाए और चिकित्सा विशेषज्ञों की देखरेख में पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया अपनाई जाए।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस निर्णय के बाद जब हरीश राणा को एम्स ले जाया जा रहा था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब परिवार के बीच अत्यंत भावुक दृश्य देखने को मिला। परिवार के लोग उनके पास खड़े होकर उन्हें विदा दे रहे थे। एक आध्यात्मिक कार्यकर्ता ने उनके पास खड़े होकर कहा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, “</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सबको माफ करते हुए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ।</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शब्द केवल एक व्यक्ति के लिए विदाई नहीं थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जीवन की गहरी सच्चाइयों को व्यक्त करने वाले शब्द थे। उस क्षण में वर्षों की पीड़ा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आशा और निराशा सब एक साथ दिखाई दे रहे थे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह घटना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं है। इसने पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। सवाल यह है कि क्या जीवन को हर कीमत पर बनाए रखना आवश्यक है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर कभी-कभी व्यक्ति की गरिमा और पीड़ा को देखते हुए उसे प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति देना अधिक मानवीय हो सकता है। चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य जीवन को बचाना है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब जीवन केवल कृत्रिम उपकरणों पर निर्भर रह जाए और उसमें चेतना का कोई संकेत न हो</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब डॉक्टरों और परिवार के सामने नैतिक दुविधा खड़ी हो जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस मामले ने यह भी दिखाया कि चिकित्सा निर्णय केवल वैज्ञानिक नहीं होते</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनमें गहरी मानवीय संवेदनाएँ भी शामिल होती हैं। डॉक्टरों के लिए भी यह आसान निर्णय नहीं होता कि किसी मरीज के जीवन-रक्षक उपकरण हटाए जाएँ। इसलिए ऐसी स्थितियों में कई स्तरों पर चिकित्सकीय और कानूनी समीक्षा की जाती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निर्णय पूरी तरह मानवीय</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिक और कानूनी आधार पर लिया गया है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ी बहस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। इससे पहले भी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अरुणा शानबाग</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे मामलों ने इस विषय पर चर्चा को जन्म दिया था। लेकिन हरीश राणा का मामला इसलिए अलग है क्योंकि इसमें अदालत ने पहली बार स्पष्ट रूप से जीवन-रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी और इसे </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा के साथ मृत्यु</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के अधिकार से जोड़ा।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि इसमें किसी प्रकार की सनसनी नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि केवल मानवीय पीड़ा और करुणा है। एक परिवार ने अपने बेटे को तेरह वर्षों तक संभालकर रखा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उम्मीद की कि शायद कोई चमत्कार हो जाए। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि वह कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट पाएगा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब उन्होंने भारी मन से उसे मुक्त करने का निर्णय लिया। यह निर्णय लेना किसी भी माता-पिता के लिए शायद दुनिया का सबसे कठिन निर्णय होता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि वह अनिश्चित है। कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है जहाँ कोई भी विकल्प आसान नहीं होता। हरीश राणा की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन केवल सांसों का नाम नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि चेतना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव और सम्मान के साथ जीने का नाम है। जब ये सब समाप्त हो जाएँ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब शायद मृत्यु भी एक प्रकार की मुक्ति बन जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना ने समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। यह संदेश करुणा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना और मानवीय गरिमा का है। यह हमें याद दिलाता है कि कानून और चिकित्सा के निर्णय केवल नियमों से नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मनुष्यता की गहराई से भी जुड़े होते हैं। हरीश राणा की कहानी अंततः हमें यही सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और कभी-कभी प्रेम का सबसे कठिन रूप किसी प्रिय व्यक्ति को शांति से विदा कर देना भी होता है।</span> </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 19:35:05 +0530</pubDate>
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