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                <title>सुप्रीम कोर्ट फैसला - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>सुप्रीम कोर्ट फैसला RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>'क्रूर, जाति-भेद': सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा कोर्ट की ज़मानत की शर्तों को गलत ठहराया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने दलित-आदिवासी आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ़ करने को कहा गया था   सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों को ज़मानत की शर्तें लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई, जिसके तहत दलित और आदिवासी समुदायों के आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ़ करने थे। इन निर्देशों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने शर्त को "बुरा" बताया और कहा कि यह जातिगत भेदभाव दिखाता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, "हम गहराई से निराश और हताश हैं, और जिस तरह से ओडिशा राज्य की न्यायपालिका वास्तव में ऐसी कठोर, अपमानजनक और अपमानजनक शर्तें लागू करके</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178181/cruel-caste-discrimination-supreme-court-finds-odisha-courts-bail-conditions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images-(3).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने दलित-आदिवासी आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ़ करने को कहा गया था   सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों को ज़मानत की शर्तें लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई, जिसके तहत दलित और आदिवासी समुदायों के आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ़ करने थे। इन निर्देशों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने शर्त को "बुरा" बताया और कहा कि यह जातिगत भेदभाव दिखाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, "हम गहराई से निराश और हताश हैं, और जिस तरह से ओडिशा राज्य की न्यायपालिका वास्तव में ऐसी कठोर, अपमानजनक और अपमानजनक शर्तें लागू करके औपनिवेशिक मानसिकता की ओर लौट गई है, जो मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन हैं, उस पर अपनी कड़ी अस्वीकृति व्यक्त करते हैं। ऐसी शर्तें न्याय के कारण को आगे बढ़ाने के बजाय, अभियुक्त की गरिमा पर प्रहार करती हैं, और अपराध के आधार पर आगे बढ़ती हैं, जो कानून में पूरी तरह से अनुचित है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायालय ने जमानत की शर्तों को "शून्य और अमान्य" घोषित कर दिया। न्यायालय ने सभी न्यायालयों को भविष्य के किसी भी आदेश में ऐसी जमानत शर्त नहीं लगाने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, "हमारा मानना है कि किसी भी दूसरे राज्य की ज्यूडिशियरी को भी ऐसी जाति-भेद वाली और दबाने वाली शर्तें नहीं लगानी चाहिए, जिनसे गंभीर सामाजिक टकराव पैदा होने की संभावना हो।" साथ ही, कोर्ट ने आदेश की एक कॉपी देश भर के सभी हाई कोर्ट में भेजने का निर्देश दिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसी बुरी स्थितियों से ऐसा लगता है कि राज्य की ज्यूडिशियरी जाति-भेद करती है, क्योंकि आरोपी पिछड़े समुदाय से थे। न्यायालय ने कहा, "रिपोर्ट में कुछ दम प्रतीत होता है कि राज्य न्यायपालिका द्वारा ऐसे मामलों में कोई भी शर्तें नहीं लगाई जा रही हैं जहां आरोपी समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों से हैं।  यह मानते हुए कि ऐसी शर्तें अनजाने में या किसी पूर्व नियोजित पूर्वाग्रह के बिना लगाई गई थीं, शर्तों की प्रकृति इतनी घृणित, क्रूर, अपमानजनक और कानून के लिए अज्ञात है, कि यह सुझाव देते हुए एक गंभीर आक्षेप लगाने की क्षमता है कि ओडिशा न्यायपालिका जाति-आधारित पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।" </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 22:04:52 +0530</pubDate>
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                <title>पवन खेड़ा की सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मंजूर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, उसे आसानी से खतरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया कि अपराध शाखा थाना प्रकरण संख्या 04/2026 में गिरफ्तारी की स्थिति में पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">30 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177867/pawan-khedas-anticipatory-bail-approved-by-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/pawan-khera-3.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, उसे आसानी से खतरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया कि अपराध शाखा थाना प्रकरण संख्या 04/2026 में गिरफ्तारी की स्थिति में पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">30 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने यह भी माना कि दोनों पक्षों, पवन खेड़ा और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा की ओर से आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए हैं, लेकिन इससे किसी की आजादी से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, पवन खेड़ा के खिलाफ यह मामला रिंकी भुइयां सरमा से जुड़े बयान को लेकर दर्ज किया गया था। पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि उनके पास एक से अधिक पासपोर्ट हैं और विदेशों में संपत्तियां हैं। इसी बयान के आधार पर उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था, जिसके बाद उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत देते हुए कई शर्तें भी तय की हैं। पवन खेड़ा को जांच में पूरा सहयोग करना होगा और पुलिस द्वारा बुलाए जाने पर उपस्थित होना पड़ेगा। उन्हें साक्ष्यों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं होगी और बिना सक्षम न्यायालय की अनुमति के देश से बाहर नहीं जा सकेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि निचली अदालत जरूरत के अनुसार अतिरिक्त शर्तें लागू कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत पर विचार करते समय जिन दस्तावेजों और तथ्यों का उल्लेख किया गया है, उनका मामले के अंतिम निर्णय से कोई संबंध नहीं होगा और निचली अदालत इन टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार, आगे की कार्रवाई करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले पवन खेड़ा ने असम की निचली अदालत और गुवाहाटी उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन उन्हें वहां से राहत नहीं मिली थी। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इससे पहले तेलंगाना उच्च न्यायालय ने उन्हें एक हफ्ते की अंतरिम जमानत दी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाते हुए उन्हें अग्रिम जमानत के लिए गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 22:44:34 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा की  अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला रखा सुरक्षित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुयान सरमा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि असम के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई पासपोर्ट हैं और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं। इन आरोपों के बाद रिनिकी भुइयां शर्मा ने खेड़ा और अन्य के खिलाफ गुवाहाटी क्राइम ब्रांच थाने में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177745/supreme-court-reserves-verdict-on-pawan-khedas-anticipatory-bail-plea"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/pawan-khera-2.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुयान सरमा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि असम के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई पासपोर्ट हैं और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं। इन आरोपों के बाद रिनिकी भुइयां शर्मा ने खेड़ा और अन्य के खिलाफ गुवाहाटी क्राइम ब्रांच थाने में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोप ट्रायल का विषय हैं और गिरफ्तारी की कोई आवश्यकता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि जिन धाराओं में मामला दर्ज है, उनमें से कई जमानती हैं और बाकी में भी गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, इसलिए अग्रिम जमानत से इनकार करना उचित नहीं होगा। सिंहवी ने यह भी तर्क दिया कि यदि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत नहीं दी जाती, तो इस कानूनी प्रावधान का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं, असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि खेड़ा ने मुख्यमंत्री की पत्नी के पासपोर्ट से जुड़े फर्जी और छेड़छाड़ किए गए दस्तावेज पेश किए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि खेड़ा जांच से बच रहे हैं और लगातार वीडियो जारी कर गलत तथ्यों को प्रचारित कर रहे हैं। मेहता ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप निराधार और गलत हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पवन खेड़ा ने 24 अप्रैल को गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत देने से इनकार करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इससे पहले तेलंगाना हाई कोर्ट ने उन्हें सात दिनों की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी, लेकिन असम पुलिस की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इस राहत पर अंतरिम रोक लगा दी और खेड़ा को गुवाहाटी हाईकोर्ट का रुख करने को कहा था। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं, जो तय करेगा कि पवन खेड़ा को गिरफ्तारी से राहत मिलेगी या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:12:05 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>उचित मुआवजे की सांविधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता: समीक्षा याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि भूमि अधिग्रहण मामलों में उचित मुआवजे की सांविधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षतिपूर्ति और ब्याज वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकते। शीर्ष अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की समीक्षा याचिका खारिज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">एनएचएआई ने 4 फरवरी, 2025 के फैसले की समीक्षा मांगी थी। इस फैसले में कहा गया था कि 2019 का निर्णय पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा। 2019 के फैसले में एनएचएआई अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के किसानों को मुआवजा और ब्याज देने की बात थी।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174306/constitutional-guarantee-of-fair-compensation-cannot-be-diluted-review-petition"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/sc.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि भूमि अधिग्रहण मामलों में उचित मुआवजे की सांविधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षतिपूर्ति और ब्याज वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकते। शीर्ष अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की समीक्षा याचिका खारिज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">एनएचएआई ने 4 फरवरी, 2025 के फैसले की समीक्षा मांगी थी। इस फैसले में कहा गया था कि 2019 का निर्णय पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा। 2019 के फैसले में एनएचएआई अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के किसानों को मुआवजा और ब्याज देने की बात थी। पीठ ने कहा कि भूस्वामियों को देय ब्याज भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार नौ फीसदी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एनएचएआई अधिनियम के पांच फीसदी की सीमा के अनुसार नहीं होगा। एनएचएआई ने दावा किया था कि वित्तीय देनदारी 29,000 करोड़ रुपये होगी। पहले यह राशि 100 करोड़ रुपये बताई गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वित्तीय देनदारी का अनुमान समीक्षा का वैध आधार नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, पीठ ने कहा कि उसके पिछले निर्णयों को सीमित स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। यह निर्णय के दायरे और प्रभाव की सुसंगत समझ सुनिश्चित करने के लिए है। यह निर्विवाद है कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के भूस्वामी क्षतिपूर्ति और ब्याज के हकदार हैं। ये उचित मुआवजे का हिस्सा हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 20:51:46 +0530</pubDate>
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                <title>यूपी गैंगस्टर एक्ट के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173877/up-gangster-act-has-serious-consequences-hence-strict-adherence-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं; खासकर तब जब किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता दांव पर हो।  जब कोई विशेष कार्य किया जाना हो, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए जैसा कि निर्धारित है—यहां कानून द्वारा निर्धारित—अन्यथा उसे बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो; एक ऐसी स्वतंत्रता जो सभी के लिए अनमोल है और जिसका उल्लंघन केवल कानून के अनुसार ही किया जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें उसने FIR को खारिज करने से इनकार किया था। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि गैंग चार्ट को तैयार करने और उसे आगे भेजने की प्रक्रिया में हुई स्पष्ट प्रक्रियागत अनियमितताओं ने FIR की पूरी बुनियाद को ही कमजोर (दोषपूर्ण) बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "गैंग चार्ट के लिए यह अनिवार्य है कि उसमें नोडल अधिकारी और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की सिफारिशें शामिल हों, जिन्हें पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमोदित किया गया हो। ये सिफारिशें लिखित रूप में होनी चाहिए और अनुमोदन पर हस्ताक्षर होने चाहिए। इस मामले में न तो अनिवार्य सिफारिशें उपलब्ध हैं और न ही किसी के हस्ताक्षर मौजूद हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला बहराइच में 1986 के अधिनियम की धारा 3(1) के तहत दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इस FIR में आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता (आरोपी) एक ऐसे गिरोह का हिस्सा था, जो जमीन पर अवैध कब्जा, रंगदारी वसूली और जालसाजी जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त था। अभियोजन पक्ष ने कानून के कड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए पूरी तरह से इस "गैंग चार्ट" पर ही भरोसा किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:44:41 +0530</pubDate>
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