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                <title>टीबी अब लाइलाज नहीं समय पर पहचान और उपचार से संभव है पूरी तरह स्वस्थ जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">एक समय था जब टीबी यानी क्षय रोग का नाम सुनते ही मरीज और उसके परिवार में डर का माहौल बन जाता था। लोगों को लगता था कि यह बीमारी जीवन भर पीछा नहीं छोड़ेगी और इसका इलाज संभव नहीं है। जानकारी की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण अनेक मरीज समय पर उपचार नहीं ले पाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चिकित्सा विज्ञान ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज टीबी का प्रभावी इलाज उपलब्ध है और लाखों मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी रहे हैं। यही कारण है कि अब टीबी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180379/tb-is-no-longer-incurable-with-timely-detection-and-treatment"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/07_12_2024-tb_23844079_m.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">एक समय था जब टीबी यानी क्षय रोग का नाम सुनते ही मरीज और उसके परिवार में डर का माहौल बन जाता था। लोगों को लगता था कि यह बीमारी जीवन भर पीछा नहीं छोड़ेगी और इसका इलाज संभव नहीं है। जानकारी की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण अनेक मरीज समय पर उपचार नहीं ले पाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चिकित्सा विज्ञान ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज टीबी का प्रभावी इलाज उपलब्ध है और लाखों मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी रहे हैं। यही कारण है कि अब टीबी को लाइलाज बीमारी नहीं माना जाता बल्कि समय पर पहचान और नियमित उपचार से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टीबी एक संक्रामक रोग है जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है। यह बीमारी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु के कारण होती है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने छींकने या बोलने के दौरान निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से यह दूसरे लोगों तक फैल सकती है। हालांकि यह बीमारी केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहती बल्कि शरीर के अन्य अंगों जैसे हड्डियों लिम्फ नोड्स मस्तिष्क और गुर्दों को भी प्रभावित कर सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत लंबे समय से दुनिया में टीबी से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है जबकि भारत ने इससे पहले ही टीबी मुक्त बनने का संकल्प लिया था। हालांकि यह लक्ष्य अभी पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जागरूकता अभियान बेहतर जांच सुविधाएं और मुफ्त उपचार जैसी योजनाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में टीबी मरीजों की पहचान के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। 24 मार्च से शुरू किए गए 100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत हाई रिस्क गांवों और क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग की जा रही है। आधुनिक तकनीक से लैस पोर्टेबल एक्स रे मशीनों का उपयोग किया जा रहा है जो गांव गांव पहुंचकर लोगों की जांच कर रही हैं। इन मशीनों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सॉफ्टवेयर लगा है जो मौके पर ही टीबी की आशंका का संकेत दे सकता है। इससे संदिग्ध मरीजों की पहचान तेजी से हो रही है और उन्हें समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टीबी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोग शुरुआती लक्षणों को सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी रहना टीबी का प्रमुख संकेत माना जाता है। इसके अलावा बुखार का बार बार आना रात में अत्यधिक पसीना आना वजन कम होना भूख न लगना सीने में दर्द होना सांस फूलना थकान बने रहना और बलगम में खून आना भी इसके महत्वपूर्ण लक्षण हैं। यदि किसी व्यक्ति में ये लक्षण दिखाई दें तो तुरंत जांच करानी चाहिए। समय पर जांच होने से बीमारी गंभीर होने से पहले ही पकड़ में आ जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज टीबी की जांच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान और सटीक हो गई है। न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट जैसी आधुनिक जांच तकनीकों के माध्यम से कुछ ही समय में रोग की पुष्टि की जा सकती है। देशभर में सैकड़ों आधुनिक मशीनें स्थापित की गई हैं जिनसे छिपे हुए मरीज भी सामने आ रहे हैं। इससे संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद मिल रही है और मरीजों को शीघ्र उपचार मिल रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टीबी के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण बात नियमित दवा सेवन है। सरकार की ओर से टीबी मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उपचार की अवधि सामान्यतः छह महीने या उससे अधिक हो सकती है जो बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करती है। कई बार मरीज शुरुआती सुधार के बाद दवाएं लेना बंद कर देते हैं जिससे बीमारी दोबारा उभर सकती है और दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है। इसलिए चिकित्सकों की सलाह के अनुसार पूरा उपचार लेना अत्यंत आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पोषण भी टीबी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संतुलित आहार शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और मरीज को जल्दी स्वस्थ होने में सहायता करता है। पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन विटामिन और खनिज तत्वों का सेवन लाभकारी होता है। सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत टीबी मरीजों को पोषण सहायता भी प्रदान की जाती है ताकि उपचार के दौरान उन्हें आवश्यक पोषण मिल सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टीबी को लेकर समाज में फैली भ्रांतियां भी एक बड़ी समस्या रही हैं। कई लोग इस बीमारी को सामाजिक कलंक के रूप में देखते हैं जिसके कारण मरीज अपनी बीमारी छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे उपचार में देरी होती है और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि टीबी को एक सामान्य इलाज योग्य बीमारी के रूप में देखा जाए और मरीजों को सामाजिक सहयोग तथा मानसिक समर्थन दिया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोविड महामारी के दौरान टीबी नियंत्रण कार्यक्रमों पर भी असर पड़ा था जिससे कई मरीज समय पर जांच और उपचार से वंचित रह गए। लेकिन अब स्वास्थ्य विभाग फिर से सक्रिय होकर व्यापक स्तर पर जांच अभियान चला रहा है। गांवों और दूरदराज क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं ताकि कोई भी मरीज उपचार से वंचित न रहे। टीबी के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि इसमें पूरे समाज की भागीदारी आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति में लक्षण दिखाई दें तो उसे जांच के लिए प्रेरित करना चाहिए। परिवार और समुदाय का सहयोग मरीज के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उपचार पूरा करने में मदद करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज चिकित्सा विज्ञान और सरकारी प्रयासों की बदौलत टीबी का सफल उपचार संभव है। लाखों लोग इस बीमारी को हराकर स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। इसलिए टीबी के लक्षण दिखने पर घबराने की नहीं बल्कि तुरंत जांच और उपचार शुरू कराने की जरूरत है। जागरूकता समय पर पहचान नियमित दवा सेवन और संतुलित पोषण के माध्यम से टीबी को पूरी तरह हराया जा सकता है। यदि समाज और स्वास्थ्य तंत्र मिलकर प्रयास करें तो टीबी मुक्त भारत का सपना भी निश्चित रूप से साकार हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:51:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>मीडिया पड़ताल में आयुष्मान आरोग्य मंदिर तेनुआ पर लटकता मिला ताला</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गौर के अंतर्गत आयुष्मान आरोग्य मंदिर तेनुआ पर ताला लटकता मिला । आयुष्मान आरोग्य मंदिर तेनुआ पर लटकता ताला स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार की पोल खोल रहा है । आपको बता दे कि प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से न्याय व ग्राम पंचायत स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों / आयुष्मान आयोग मंदिरों का निर्माण कराया जा रहा है जिस पर सीएचओ की नियुक्ति की जा रही है ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के संचालन के आधार पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों / आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का संचालन करने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173437/media-investigation-found-lock-hanging-on-ayushman-arogya-mandir-tenua"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260317-wa0039.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गौर के अंतर्गत आयुष्मान आरोग्य मंदिर तेनुआ पर ताला लटकता मिला । आयुष्मान आरोग्य मंदिर तेनुआ पर लटकता ताला स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार की पोल खोल रहा है । आपको बता दे कि प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से न्याय व ग्राम पंचायत स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों / आयुष्मान आयोग मंदिरों का निर्माण कराया जा रहा है जिस पर सीएचओ की नियुक्ति की जा रही है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के संचालन के आधार पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों / आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का संचालन करने का निर्देश जारी है । प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों / आयुष्मान आरोग्य मंदिरों पर निःशुल्क खून, पेशाब , शुगर ,बलगम आदि की जांच की व्यवस्था उपलब्ध रहती है और सभी रोगों से संबंधित दवाइयां भी निःशुल्क मरीजों को वितरित की जाती है । प्रदेश सरकार के अथक प्रयास के बाद भी स्वास्थ्य सुविधाएं जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पा रही हैं अर्थात् स्वास्थ्य सेवाएं कागजों तक ही सीमित है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आयुष्मान आरोग्य मंदिर तेनुआ का समय से संचालन न होने से ग्रामीण क्षेत्र में मरीजों को झोलाछाप डॉक्टरों से मजबूर होकर इलाज करना पड़ रहा है एवं दवाइयां को शुल्क देकर खरीदना पड़ रहा है । सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गौर अधीक्षक , बीसीपीएम , डीसीपीएम व सीएमओ द्वारा यदि सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों / आयुष्मान आयोग मंदिरों की समय - समय पर जांच की जाती तो आज यह स्थिति नही रहती कि जहां जाइए वहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र / आयुष्मान आरोग्य मंदिर बंद ही मिलता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आखिर सरकार द्वारा प्राप्त दवाइयां कहां और किसको वितरित की जा रही हैं ? जो जांच का विषय बना हुआ है यदि ऐसे ही स्वास्थ्य व्यवस्था जिम्मेदार अधिकारी कार्य करते रहेंगे तो ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों को स्वास्थ्य सुविधा मिलना मुश्किल है । इस संबंध में ड्यूटी से गायब सीएचओ से फोन के माध्यम से जानकारी लेना चाहा तो सीएचओ का फोन नेटवर्क क्षेत्र से बाहर मिला । उक्त प्रकरण में सीएमओ डा० राजीव निगम ने जांच कर ड्यूटी से गायब सीएचओ के खिलाफ कार्रवाई करने करने का निर्देश दिया है ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:39:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तेरह साल का इंतज़ार और एक कठिन विदाई</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो जाती है। सामान्यतः हम जीवन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार माना जाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जब जीवन केवल सांसों का चलना भर रह जाता है और उसमें चेतना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और मानवीय गरिमा लगभग समाप्त हो जाती है। हाल के दिनों में चर्चा में आए हरीश राणा का मामला इसी विडंबना का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण बनकर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173408/thirteen-years-of-waiting-and-a-difficult-farewell"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो जाती है। सामान्यतः हम जीवन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जीवन को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार माना जाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जब जीवन केवल सांसों का चलना भर रह जाता है और उसमें चेतना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और मानवीय गरिमा लगभग समाप्त हो जाती है। हाल के दिनों में चर्चा में आए हरीश राणा का मामला इसी विडंबना का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण बनकर सामने आया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह चिकित्सा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कानून</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं के जटिल प्रश्नों को सामने लाने वाली घटना है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरीश राणा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले एक युवा थे। वर्ष </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">2013 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में एक दुर्घटना ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया। बताया जाता है कि वह पढ़ाई के दौरान एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह स्थायी कोमा जैसी अवस्था में चले गए। इस स्थिति को चिकित्सा भाषा में </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें व्यक्ति जीवित तो रहता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसके मस्तिष्क की चेतन क्रियाएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं। वह न बोल सकता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न चल सकता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न अपने आसपास की दुनिया को समझ सकता है। हरीश पिछले तेरह वर्षों तक इसी अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन वर्षों में उनका जीवन केवल चिकित्सा उपकरणों</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दवाइयों और कृत्रिम पोषण के सहारे चल रहा था। परिवार ने उनकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी। माता-पिता ने अपने बेटे को जीवित रखने के लिए हर संभव प्रयास किया। कई अस्पतालों में इलाज कराया गया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली गई</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। समय बीतने के साथ-साथ यह स्पष्ट होता गया कि अब उनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। डॉक्टरों ने भी यही राय दी कि मस्तिष्क को हुई गंभीर क्षति के कारण उनका सामान्य जीवन में लौटना लगभग असंभव है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी माता-पिता के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। एक ओर उनके सामने अपने बच्चे को खो देने का भय होता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर उसे इस तरह निर्जीव अवस्था में वर्षों तक देखना भी कम कष्टदायक नहीं होता। हरीश राणा के परिवार ने लगभग तेरह वर्षों तक इस पीड़ा को सहा। उन्होंने अपने बेटे की सेवा में दिन-रात बिताए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अंततः यह प्रश्न उनके सामने खड़ा हो गया कि क्या केवल सांस चलना ही जीवन कहलाता है। जब किसी व्यक्ति की चेतना समाप्त हो जाए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह अपने अस्तित्व का अनुभव भी न कर सके</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब क्या उसे कृत्रिम साधनों के सहारे जीवित रखना मानवीय है या अमानवीय</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">?</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं सवालों के साथ हरीश के परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि उनके बेटे को </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा मृत्यु</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाए। यह एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल कानूनी विषय है। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु यानी किसी व्यक्ति को जानबूझकर दवा देकर मृत्यु देना कानूनन अवैध है। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पैसिव यूथेनेशिया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की अनुमति दी जा सकती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपचार या उपकरणों को हटाया जाता है और मरीज को प्राकृतिक रूप से मृत्यु आने दी जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए हरीश राणा के जीवन-रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और उसी प्रकार गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी मानवीय अधिकारों का हिस्सा है। अदालत ने निर्देश दिया कि उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती किया जाए और चिकित्सा विशेषज्ञों की देखरेख में पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया अपनाई जाए।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस निर्णय के बाद जब हरीश राणा को एम्स ले जाया जा रहा था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब परिवार के बीच अत्यंत भावुक दृश्य देखने को मिला। परिवार के लोग उनके पास खड़े होकर उन्हें विदा दे रहे थे। एक आध्यात्मिक कार्यकर्ता ने उनके पास खड़े होकर कहा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, “</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सबको माफ करते हुए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ।</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह शब्द केवल एक व्यक्ति के लिए विदाई नहीं थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जीवन की गहरी सच्चाइयों को व्यक्त करने वाले शब्द थे। उस क्षण में वर्षों की पीड़ा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आशा और निराशा सब एक साथ दिखाई दे रहे थे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह घटना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं है। इसने पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। सवाल यह है कि क्या जीवन को हर कीमत पर बनाए रखना आवश्यक है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर कभी-कभी व्यक्ति की गरिमा और पीड़ा को देखते हुए उसे प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति देना अधिक मानवीय हो सकता है। चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य जीवन को बचाना है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब जीवन केवल कृत्रिम उपकरणों पर निर्भर रह जाए और उसमें चेतना का कोई संकेत न हो</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब डॉक्टरों और परिवार के सामने नैतिक दुविधा खड़ी हो जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस मामले ने यह भी दिखाया कि चिकित्सा निर्णय केवल वैज्ञानिक नहीं होते</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनमें गहरी मानवीय संवेदनाएँ भी शामिल होती हैं। डॉक्टरों के लिए भी यह आसान निर्णय नहीं होता कि किसी मरीज के जीवन-रक्षक उपकरण हटाए जाएँ। इसलिए ऐसी स्थितियों में कई स्तरों पर चिकित्सकीय और कानूनी समीक्षा की जाती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निर्णय पूरी तरह मानवीय</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिक और कानूनी आधार पर लिया गया है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ी बहस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। इससे पहले भी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अरुणा शानबाग</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे मामलों ने इस विषय पर चर्चा को जन्म दिया था। लेकिन हरीश राणा का मामला इसलिए अलग है क्योंकि इसमें अदालत ने पहली बार स्पष्ट रूप से जीवन-रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी और इसे </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा के साथ मृत्यु</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">” </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के अधिकार से जोड़ा।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि इसमें किसी प्रकार की सनसनी नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि केवल मानवीय पीड़ा और करुणा है। एक परिवार ने अपने बेटे को तेरह वर्षों तक संभालकर रखा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उम्मीद की कि शायद कोई चमत्कार हो जाए। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि वह कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट पाएगा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब उन्होंने भारी मन से उसे मुक्त करने का निर्णय लिया। यह निर्णय लेना किसी भी माता-पिता के लिए शायद दुनिया का सबसे कठिन निर्णय होता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि वह अनिश्चित है। कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है जहाँ कोई भी विकल्प आसान नहीं होता। हरीश राणा की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन केवल सांसों का नाम नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि चेतना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव और सम्मान के साथ जीने का नाम है। जब ये सब समाप्त हो जाएँ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब शायद मृत्यु भी एक प्रकार की मुक्ति बन जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना ने समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। यह संदेश करुणा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना और मानवीय गरिमा का है। यह हमें याद दिलाता है कि कानून और चिकित्सा के निर्णय केवल नियमों से नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मनुष्यता की गहराई से भी जुड़े होते हैं। हरीश राणा की कहानी अंततः हमें यही सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और कभी-कभी प्रेम का सबसे कठिन रूप किसी प्रिय व्यक्ति को शांति से विदा कर देना भी होता है।</span> </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 19:35:05 +0530</pubDate>
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