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                <title>गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता मानकर सुप्रीम कोर्ट ने रचा सामाजिक न्याय का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181065/supreme-court-created-a-new-chapter-of-social-justice-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला भी है। सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे को लेकर सर्वोच्च अदालत ने जो मानक निर्धारित किया है वह महिलाओं के सम्मान और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता दोनों का प्रतीक है।</div>
<div>अदृश्य श्रम को मिली प्रतिष्ठा</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि गृहिणियों के काम का मूल्य कम से कम 30 हजार रुपए प्रतिमाह माना जाना चाहिए और इसी आधार पर मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि गृहिणियां केवल परिवार का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति हैं। यह टिप्पणी अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार इतने स्पष्ट और प्रभावशाली शब्दों में गृहिणियों की भूमिका को राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया है।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल किसी भी समाज की प्रगति का आधार मजबूत परिवार होता है और मजबूत परिवार का आधार अक्सर एक समर्पित महिला होती है। वह बिना किसी वेतन और अवकाश के चौबीसों घंटे कार्य करती है। उसकी मेहनत का कोई हिसाब नहीं रखा जाता और उसके योगदान को आर्थिक आंकड़ों में नहीं मापा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर महिलाओं के अदृश्य श्रम को वह सम्मान दिया है जिसकी मांग लंबे समय से की जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div>पुरानी सोच को बदलने वाला निर्णय है।अब तक सड़क दुर्घटना मामलों में गृहिणियों की आय का अनुमान अक्सर कुशल मजदूर की मजदूरी के आधार पर लगाया जाता था। यह व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक थी बल्कि महिलाओं के योगदान को कम करके आंकने वाली भी थी। अदालत ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि घरेलू कार्यों को सामान्य मजदूरी के पैमाने पर नहीं तौला जा सकता</div>
<div> </div>
<div>यह निर्णय इस बात की स्वीकारोक्ति है कि घर संभालना एक पूर्णकालिक और बहुआयामी जिम्मेदारी है। गृहिणी एक साथ प्रबंधक शिक्षक मार्गदर्शक परिचारिका और परिवार की भावनात्मक शक्ति के रूप में कार्य करती है। इसलिए उसके योगदान की तुलना किसी एक पेशे या मजदूरी से नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाकर न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत की है।</div>
<div> </div>
<div>महिला सम्मान की दिशा में बड़ा कदम कहा जा सकता है।</div>
<div>यह फैसला केवल मुआवजे की राशि बढ़ाने का मामला नहीं है बल्कि महिलाओं के सम्मान को कानूनी मान्यता देने का प्रयास भी है। भारतीय समाज में आज भी अनेक महिलाएं अपने कार्यों के लिए सामाजिक सराहना तो पाती हैं लेकिन आर्थिक पहचान नहीं मिलती। अदालत ने इस स्थिति को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</div>
<div> </div>
<div>जब देश की सर्वोच्च अदालत किसी गृहिणी को राष्ट्र निर्माता कहती है तब यह संदेश केवल न्यायालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज तक पहुंचता है। इससे महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है और यह स्वीकार किया जाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कार्यालयों और उद्योगों में नहीं बल्कि घरों के भीतर भी होता है।</div>
<div> </div>
<div>न्याय प्रणाली का  संवेदनशील उदाहरण है और इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता न्यायपालिका की संवेदनशीलता है। अदालत ने कहा कि मुआवजा तय करते समय केवल महिला की आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। उसकी उम्र शिक्षा कौशल पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक परिस्थितियां भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। यह दृष्टिकोण बताता है कि न्यायालय जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए निर्णय दे रहा है</div>
<div> </div>
<div>कई बार दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु के बाद परिवार केवल एक सदस्य को नहीं खोता बल्कि पूरे परिवार की व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। बच्चों का भविष्य बुजुर्गों की देखभाल और घर की स्थिरता पर गहरा असर पड़ता है। अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भावनात्मक और पारिवारिक क्षति को भी मुआवजे का हिस्सा माना है। यह न्याय की मानवीय और व्यावहारिक व्याख्या है।</div>
<div> </div>
<div>त्वरित न्याय के प्रति प्रतिबद्धता</div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुआवजे की गणना का नया आधार निर्धारित नहीं किया बल्कि न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों की निगरानी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश स्वयं करें और दावों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाए।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। दुर्घटना पीड़ित परिवार अक्सर वर्षों तक मुआवजे की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में अदालत का यह निर्देश न्याय को समयबद्ध और पीड़ित केंद्रित बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल सिद्धांतों की बात नहीं कर रहा बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना चाहता है</div>
<div>न्यायपालिका की प्रगतिशील सोच</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशील और दूरदर्शी सोच का परिचायक है। अदालत ने यह समझा कि बदलते समय में महिलाओं की भूमिका को पुराने मानकों से नहीं आंका जा सकता। आज महिलाओं का योगदान केवल आर्थिक कमाई तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूत बनाने में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
<div> </div>
<div>इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसकी वेतन पर्ची से नहीं तय किया जा सकता। समाज के लिए किए गए उसके योगदान को भी समान महत्व मिलना चाहिए। गृहिणियों के मामले में यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका अधिकांश श्रम घर की चारदीवारी के भीतर ही रह जाता है।</div>
<div>सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत शुरू हो चुका है।</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला भविष्य में व्यापक सामाजिक बदलाव का आधार बन सकता है। इससे महिलाओं के घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व पर नई चर्चा शुरू होगी। नीति निर्माण के स्तर पर भी घरेलू श्रम को लेकर गंभीर विचार हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे करोड़ों गृहिणियों को यह एहसास होगा कि उनके कार्यों को देश की सर्वोच्च अदालत ने सम्मान और मान्यता दी है</div>
<div> </div>
<div>समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि घर का काम स्वाभाविक जिम्मेदारी है और उसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू श्रम भी उतना ही मूल्यवान है जितना किसी अन्य पेशे में किया जाने वाला कार्य। यह विचार महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में सहायक होगा</div>
<div> </div>
<div>न्याय और सम्मान का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला है।सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने गृहिणियों के अदृश्य श्रम को पहचान दी है महिलाओं के सम्मान को नई ऊंचाई प्रदान की है और दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायपूर्ण राहत सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया है</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला बताता है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा देकर सर्वोच्च अदालत ने न्याय और संवेदनशीलता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। यह निर्णय आने वाले वर्षों में महिला सम्मान सामाजिक न्याय और मानवीय न्यायशास्त्र के एक आदर्श उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। भारत की न्याय प्रणाली ने इस फैसले के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा न्याय वही है जो समाज के सबसे अनदेखे और उपेक्षित योगदान को भी सम्मानपूर्वक पहचान दे सके।</div>
<div>     <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:01:28 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मधु किश्वर ने पीएम पर भ्रामक वीडियो किया था साझा, हाईकोर्ट ने खारिज की अग्रिम जमानत याचिका</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े भ्रामक और आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा करने के मामले में फंसी प्रसिद्ध लेखिका और शिक्षाविद् मधु पूर्णिमा किश्वर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस अमन चौधरी की अदालत ने माना कि मामले की परिस्थितियां अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और जांच के हित में हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> मधु किश्वर ने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए अग्रिम जमानत की मांग की थी। उनके खिलाफ चंडीगढ़</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180383/madhu-kishwar-had-shared-a-misleading-video-on-pm"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/5660-1780059936803_m.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े भ्रामक और आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा करने के मामले में फंसी प्रसिद्ध लेखिका और शिक्षाविद् मधु पूर्णिमा किश्वर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस अमन चौधरी की अदालत ने माना कि मामले की परिस्थितियां अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और जांच के हित में हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> मधु किश्वर ने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए अग्रिम जमानत की मांग की थी। उनके खिलाफ चंडीगढ़ के सेक्टर-26 थाना में मामला दर्ज है। याचिका में मधु किश्वर की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने केवल 14 सेकंड का एक वीडियो री-ट्वीट किया था। उनका कहना था कि इसमें कोई दुर्भावना नहीं थी और जालसाजी अथवा वीडियो तैयार करने से उनका कोई संबंध नहीं है। वहीं, चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से अदालत को बताया गया कि यह केवल साधारण री-ट्वीट का मामला नहीं है। जांच में सामने आया कि संबंधित वीडियो पहले अन्य सोशल मीडिया मंचों पर डाला गया था लेकिन मधु किश्वर ने उसे डाउनलोड कर अपने एक्स अकाउंट से दोबारा पोस्ट किया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">प्रशासन ने अदालत को बताया कि उनके लाखों फॉलोअर्स होने के कारण वीडियो को व्यापक प्रसार मिला और उसे करीब 1.74 लाख व्यूज प्राप्त हुए। इससे भ्रामक सूचना फैलाने और एक सांविधानिक पद की छवि को नुकसान पहुंचाने में मदद मिली। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ है कि जांच एजेंसी की ओर से भेजे गए नोटिसों के बावजूद याचिकाकर्ता जांच में शामिल नहीं हुईं जबकि अन्य सह-आरोपी जांच में शामिल हो चुके हैं। कोर्ट ने इसे उनके आचरण का महत्वपूर्ण पहलू माना।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रचनात्मक आलोचना और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति अथवा सांविधानिक पद के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर है। अदालत के अनुसार, बड़े सोशल मीडिया प्रभाव वाले व्यक्तियों की पोस्ट का व्यापक असर पड़ सकता है और ऐसी सामग्री सामाजिक सौहार्द तथा सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। इन सभी तथ्यों, जांच की आवश्यकता और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में तय सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने मधु किश्वर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।l</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>ब्रेकिंग न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 19:00:12 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>नोएडा हिंसा मामला: 'हाईकोर्ट जाइए, यहां पहले ही 93000 केस लंबित'</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक छात्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आकृति चौधरी की ओर से पेश वकील से कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाएं। पीठ ने कहा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके यहां आता है। सुप्रीम कोर्ट में 93 हजार मामले पहले से ही  लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आकृति चौधरी के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178831/noida-violence-case-go-to-high-court-already-93000-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/noida-1778235469797.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक छात्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आकृति चौधरी की ओर से पेश वकील से कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाएं। पीठ ने कहा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके यहां आता है। सुप्रीम कोर्ट में 93 हजार मामले पहले से ही  लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आकृति चौधरी के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए और जमानत की मांग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं। शीर्ष कोर्ट ने केशव आनंद नाम के व्यक्ति की याचिका पर पुलिस अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा की एक कोर्ट ने पहले तीन महिलाओं आकृति चौधरी, मनीषा चौहान और सृष्टि गुप्ता की शर्तों के साथ पुलिस रिमांड की अनुमति दी थी। इन पर 13 अप्रैल के औद्योगिक मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जांच के दौरान उनके वकीलों को मौजूद रहने की अनुमति होगी। आकृति चौधरी और सृष्टि गुप्ता दोनों दिल्ली की रहने वाली हैं और उनकी उम्र 20 के आसपास है।चौधरी ने दौलत राम कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर किया है, जबकि मनीषा नोएडा की एक औद्योगिक इकाई में काम करती हैं।पुलिस ने हिरासत के लिए दायर आवेदन में कहा था कि आरोपियों के घर से अहम साक्ष्य मिलने की पूरी संभावना है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा में पिछले महीने फैक्टरी मजदूरों का विरोध प्रदर्शन वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुआ था। अधिकारियों के अनुसार, कई औद्योगिक इकाइयों के मजदूर लंबे समय से वेतन संशोधन की मांग को लेकर इकट्ठा हुए और नारेबाजी की। हालांकि, यह प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गया क्योंकि कुछ लोगों ने कथित तौर पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, पत्थर फेंके और एक वाहन में आग लगा दी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 22:22:26 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>UAPA के तहत ज़मानत देने से मना करने का आधार सिर्फ़ इस्लामिक सेमिनार में हिस्सा लेना नहीं हो सकता</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी तीन लोगों को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि इस्लामिक साहित्य पर किसी सेमिनार में सिर्फ़ हिस्सा लेना ही, UAPA के तहत ज़मानत पर रोक लगाने वाले प्रावधानों के तहत अपने आप में कोई अपराध नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीज़न बेंच ने कहा कि सेमिनार में हिस्सा लेने के अलावा, अभियोजन पक्ष आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई भी प्रथम दृष्टया सबूत पेश नहीं कर पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने कहा: "वर्नन (उपर्युक्त) मामले</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178297/mere-participation-in-islamic-seminar-cannot-be-the-basis-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी तीन लोगों को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि इस्लामिक साहित्य पर किसी सेमिनार में सिर्फ़ हिस्सा लेना ही, UAPA के तहत ज़मानत पर रोक लगाने वाले प्रावधानों के तहत अपने आप में कोई अपराध नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीज़न बेंच ने कहा कि सेमिनार में हिस्सा लेने के अलावा, अभियोजन पक्ष आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई भी प्रथम दृष्टया सबूत पेश नहीं कर पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने कहा: "वर्नन (उपर्युक्त) मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार, जैसा कि ऊपर बताया गया, UAPA Act, 1967 के अध्याय IV और अध्याय VI के तहत सूचीबद्ध अपराधों को करने की साज़िश का कोई भी विश्वसनीय मामला नहीं बनता।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए सिर्फ़ सेमिनार में हिस्सा लेना ही UAPA Act की ज़मानत पर रोक लगाने वाली धाराओं के तहत अपने आप में कोई अपराध नहीं हो सकता। हमारी सुविचारित राय है कि अपीलकर्ताओं को ज़मानत दी जा सकती है, क्योंकि यह बात मानी हुई है कि मुक़दमे में अभी काफ़ी समय लगेगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी लोगों ने स्पेशल NIA कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें उनकी ज़मानत अर्ज़ियां खारिज की गई थीं। आरोपी लोगों ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष द्वारा जुटाए गए सबूत नाकाफ़ी हैं और उन पर लगाए गए आरोप ज़्यादातर अटकलों पर आधारित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">NIA के वकील ने इन अर्ज़ियों का विरोध करते हुए दावा किया कि CrPC की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज गवाहों के बयान यह दिखाते हैं कि आरोपी लोग कट्टरपंथी विचारधारा वाले थे और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने की ओर झुकाव रखते थे। वकील ने आगे कहा कि कुछ सामग्री बरामद की गई, जिसमें इस्लामिक साहित्य की फ़ोटोकॉपी भी शामिल थी, जो उनकी कथित मानसिकता और इरादे को दर्शाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के वर्नन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) मामले पर भरोसा करते हुए कहा कि बिना पुष्टि वाले या कमज़ोर सबूत, जिनमें बिना हस्ताक्षर वाले दस्तावेज़ या तीसरे पक्ष के बीच हुए संवाद शामिल हैं, UAPA के सख़्त प्रावधानों के तहत किसी का दोष साबित करने या ज़मानत देने से मना करने का उचित आधार नहीं बन सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ़ साहित्य अपने पास रखना—भले ही वह हिंसा को प्रेरित करता हो या उसका प्रचार करता हो—अपने आप में न तो गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 2002 की धारा 15 के अर्थ के तहत 'आतंकवादी कृत्य' माना जाएगा, और न ही इस अधिनियम के अध्याय IV और VI के तहत कोई अन्य अपराध।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:59:13 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>'क्रूर, जाति-भेद': सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा कोर्ट की ज़मानत की शर्तों को गलत ठहराया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने दलित-आदिवासी आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ़ करने को कहा गया था   सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों को ज़मानत की शर्तें लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई, जिसके तहत दलित और आदिवासी समुदायों के आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ़ करने थे। इन निर्देशों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने शर्त को "बुरा" बताया और कहा कि यह जातिगत भेदभाव दिखाता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, "हम गहराई से निराश और हताश हैं, और जिस तरह से ओडिशा राज्य की न्यायपालिका वास्तव में ऐसी कठोर, अपमानजनक और अपमानजनक शर्तें लागू करके</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178181/cruel-caste-discrimination-supreme-court-finds-odisha-courts-bail-conditions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images-(3).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने दलित-आदिवासी आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ़ करने को कहा गया था   सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों को ज़मानत की शर्तें लगाने के लिए कड़ी फटकार लगाई, जिसके तहत दलित और आदिवासी समुदायों के आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ़ करने थे। इन निर्देशों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने शर्त को "बुरा" बताया और कहा कि यह जातिगत भेदभाव दिखाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, "हम गहराई से निराश और हताश हैं, और जिस तरह से ओडिशा राज्य की न्यायपालिका वास्तव में ऐसी कठोर, अपमानजनक और अपमानजनक शर्तें लागू करके औपनिवेशिक मानसिकता की ओर लौट गई है, जो मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन हैं, उस पर अपनी कड़ी अस्वीकृति व्यक्त करते हैं। ऐसी शर्तें न्याय के कारण को आगे बढ़ाने के बजाय, अभियुक्त की गरिमा पर प्रहार करती हैं, और अपराध के आधार पर आगे बढ़ती हैं, जो कानून में पूरी तरह से अनुचित है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायालय ने जमानत की शर्तों को "शून्य और अमान्य" घोषित कर दिया। न्यायालय ने सभी न्यायालयों को भविष्य के किसी भी आदेश में ऐसी जमानत शर्त नहीं लगाने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, "हमारा मानना है कि किसी भी दूसरे राज्य की ज्यूडिशियरी को भी ऐसी जाति-भेद वाली और दबाने वाली शर्तें नहीं लगानी चाहिए, जिनसे गंभीर सामाजिक टकराव पैदा होने की संभावना हो।" साथ ही, कोर्ट ने आदेश की एक कॉपी देश भर के सभी हाई कोर्ट में भेजने का निर्देश दिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसी बुरी स्थितियों से ऐसा लगता है कि राज्य की ज्यूडिशियरी जाति-भेद करती है, क्योंकि आरोपी पिछड़े समुदाय से थे। न्यायालय ने कहा, "रिपोर्ट में कुछ दम प्रतीत होता है कि राज्य न्यायपालिका द्वारा ऐसे मामलों में कोई भी शर्तें नहीं लगाई जा रही हैं जहां आरोपी समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों से हैं।  यह मानते हुए कि ऐसी शर्तें अनजाने में या किसी पूर्व नियोजित पूर्वाग्रह के बिना लगाई गई थीं, शर्तों की प्रकृति इतनी घृणित, क्रूर, अपमानजनक और कानून के लिए अज्ञात है, कि यह सुझाव देते हुए एक गंभीर आक्षेप लगाने की क्षमता है कि ओडिशा न्यायपालिका जाति-आधारित पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।" </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 22:04:52 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट के राडार पर 'इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से सवाल किया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत क्यों दी, जिस पर पहली नज़र में दहेज हत्या के आरोप हैं। कोर्ट ने आरोपी पति की ज़मानत रद्द कर दी और उसे एक हफ़्ते के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल एक साल के अंदर पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच, मृतक के पिता द्वारा दायर एक स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पति को दी गई ज़मानत को चुनौती</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177743/allahabad-high-court-on-the-radar-of-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(3)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से सवाल किया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत क्यों दी, जिस पर पहली नज़र में दहेज हत्या के आरोप हैं। कोर्ट ने आरोपी पति की ज़मानत रद्द कर दी और उसे एक हफ़्ते के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल एक साल के अंदर पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच, मृतक के पिता द्वारा दायर एक स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पति को दी गई ज़मानत को चुनौती दी गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में, कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी, जिसमें बताया गया था कि मृतक की गर्दन के आस-पास चोट के निशान थे। जब कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि वे एक काउंटर-एफ़िडेविट (जवाबी हलफ़नामा) दायर करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस पारदीवाला ने कहा: "इस तरह के आरोपों और शादी के सात साल के अंदर हुई मौत के मामले में, आपको ज़मानत क्यों दी जानी चाहिए? वकील साहब, मुद्दे पर बात करें, कमज़ोर दलीलें न दें, वरना हम यहीं और अभी आपकी ज़मानत रद्द कर देंगे। आप पर दहेज हत्या का आरोप है, और आपकी पत्नी आपके ही घर में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी। उसके शरीर पर बाहरी चोट के निशान थे। आप अपनी पत्नी की मौत के बारे में क्या सफ़ाई देंगे?"</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने हाई कोर्ट से सवाल किया: "इस हाई कोर्ट में क्या दिक्कत है, यह हमारी समझ से बाहर है। जिन मामलों में ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए, उनमें भी ज़मानत दे दी जाती है।"</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह इस बात पर भी विचार करे कि आरोपी 18 महीने से हिरासत में है। इस पर, जस्टिस पारदीवाला ने मौखिक रूप से टिप्पणी की: "आप कुछ कहना चाहते हैं, मिस्टर वकील साहब? यह हत्या का मामला है। 304B, हाँ। उसकी गला घोंटकर हत्या की गई है; क्या आप चाहते हैं कि हम इसे करके दिखाएँ? पेज 31 [पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का] पर आइए।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने ज़मानत रद्द करने का आदेश दिया। अपने आदेश में, कोर्ट ने कहा कि शादी फरवरी 2019 में हुई थी और पत्नी की अप्राकृतिक मौत जुलाई 2024 में हुई। कोर्ट ने आगे कहा कि यह बात निर्विवाद है कि मृतक की मौत शादी के सात साल के अंदर हुई थी और आरोप दहेज से जुड़ी मौत के हैं। ऐसे हालात में, हाई कोर्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B के तहत अनुमान को ध्यान में रखना चाहिए था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया, जिसमें मृतक के शरीर पर मौत से पहले लगी चोटों का ज़िक्र था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने साफ़ किया कि वह मामले के गुण-दोष पर आगे कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, क्योंकि अभी मुक़दमा चल रहा है और अब तक सिर्फ़ एक गवाह की ही गवाही हुई है। हालाँकि, कुल मिलाकर हालात को देखते हुए, कोर्ट इस बात से संतुष्ट था कि ज़मानत देने वाला विवादित आदेश क़ानून की नज़र में सही नहीं है। इसलिए, प्रतिवादी को दी गई ज़मानत रद्द कर दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी को निर्देश दिया गया कि वह एक हफ़्ते के अंदर जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करे। ट्रायल कोर्ट को भी निर्देश दिया गया है कि वह एक साल के अंदर मुक़दमा पूरा करने की कोशिश करे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी जज ने तब भी निराशा ज़ाहिर की थी, जब हाई कोर्ट ने दहेज से जुड़ी मौत के एक मामले में, पहली नज़र में लगे आरोपों पर विचार किए बिना, अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए ज़मानत दे दी थी। इसके बाद, हाई कोर्ट के उस जज ने हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से अनुरोध किया कि उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों की ज़िम्मेदारी न दी जाए, और सुप्रीम कोर्ट की आलोचना को "हतोत्साहित करने वाला" बताया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने पिछले साल एक अनोखा आदेश दिया था। उन्होंने हाई कोर्ट के एक दूसरे जज के आदेश पर आपत्ति जताई थी, जिसमें पैसे की वसूली के लिए सिविल उपाय के प्रभावी न होने के आधार पर एक आपराधिक शिकायत को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। बेंच ने कड़ी टिप्पणियाँ करते हुए कहा कि उक्त जज से उनके रिटायरमेंट तक आपराधिक क्षेत्राधिकार वापस ले लिया जाना चाहिए और उन्हें हाई कोर्ट के किसी अनुभवी वरिष्ठ जज के साथ एक डिवीज़न बेंच में बैठाया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:10:18 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सिर्फ दो मुकदमों से किसी को गुंडा नहीं कहा जा सकता- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177155/no-one-can-be-called-a-goon-with-just-two"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों के आधार पर उसे आदतन अपराधी बताते हुए समाज के लिए खतरा माना था। यह भी कहा गया कि उसकी गतिविधियों से इलाके में भय का माहौल बन गया, जिससे लोग उसके खिलाफ गवाही देने से कतराते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदतन अपराधी साबित करने के लिए केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत कार्रवाई के लिए यह दिखाना जरूरी है कि व्यक्ति लगातार अपराधों में लिप्त रहा हो। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने अपने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक या दो मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति आदतन अपराधी है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि घटनाओं के बीच लंबा अंतर हो तो आदतन होने का तत्व और भी कमजोर हो जाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को केवल दो मामलों के आधार पर गुंडा घोषित करना उचित नहीं है। इसलिए उसके खिलाफ की गई पूरी कार्यवाही को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया गया।।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:24:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डीएनए टेस्ट में पिता न होने पर भरण-पोषण नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मां की अपील खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177023/no-maintenance-if-father-is-not-found-in-dna-test"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/untitled-design-2026-04-22t211803.878.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के लिए अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।  सुनवाई के दौरान पति की मांग पर डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसमें यह सामने आया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया, जिसे अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः कानून के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है, लेकिन जब डीएनए टेस्ट जैसी वैज्ञानिक जांच से पितृत्व स्पष्ट रूप से खारिज हो जाए और उस रिपोर्ट को चुनौती भी न दी गई हो, तो ऐसे साक्ष्य को प्राथमिकता दी जाएगी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, कोर्ट ने बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि वह बच्चे की स्थिति—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण—का आकलन करे और आवश्यक होने पर सहायता सुनिश्चित करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामलों में जैविक संबंध महत्वपूर्ण है और वैज्ञानिक साक्ष्य के सामने पारंपरिक कानूनी धारणा टिक नहीं सकती। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:14:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पुलिस ने रोका तो वहीं से मानी जाएगी गिरफ्तारी, 24 घंटे की सीमा कागज नहीं, वास्तविक हिरासत से तय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जैसे ही पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति की आवाजाही रोक देती है, उसी क्षण से उसे गिरफ्तार माना जाएगा। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा भी उसी समय से शुरू होगी, न कि कागजों में दर्ज गिरफ्तारी के समय से।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला अमृतसर में ट्रामाडोल टैबलेट बरामदगी से जुड़ी जांच से सामने आया। याचिकाकर्ता को 31 अक्टूबर 2025 की रात करीब 11 बजे देहरादून से एजेंसी ने अपने साथ रखा और अगले दिन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176641/if-stopped-by-the-police-arrest-will-be-considered-from"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/601906-punjab-haryana-hc-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जैसे ही पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति की आवाजाही रोक देती है, उसी क्षण से उसे गिरफ्तार माना जाएगा। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा भी उसी समय से शुरू होगी, न कि कागजों में दर्ज गिरफ्तारी के समय से।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला अमृतसर में ट्रामाडोल टैबलेट बरामदगी से जुड़ी जांच से सामने आया। याचिकाकर्ता को 31 अक्टूबर 2025 की रात करीब 11 बजे देहरादून से एजेंसी ने अपने साथ रखा और अगले दिन भी वह उनके नियंत्रण में रहा। हालांकि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी 1 नवंबर रात 9 बजे दिखाई गई और 2 नवंबर दोपहर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस सुमित गोयल ने पाया कि याची को न्यायिक अनुमति के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया जो संविधान का उल्लंघन है। इस आधार पर अदालत ने उसकी रिहाई के आदेश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियां पूछताछ या रोककर रखने जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर गिरफ्तारी को टाल नहीं सकतीं। यदि व्यक्ति अपनी इच्छा से कहीं नहीं जा सकता तो वह गिरफ्तारी ही मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो या पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज समय निर्णायक नहीं है। मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिए गए कि वे केवल दस्तावेजों पर निर्भर न रहें बल्कि वास्तविक परिस्थितियों को देखकर गिरफ्तारी का समय तय करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 20:31:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वकील अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने के लिए PIL याचिकाकर्ता नहीं बन सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176405/lawyer-cannot-become-pil-petitioner-to-further-interests-of-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court_1623565927.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वे पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के आधार पर उद्योगों को प्राकृतिक गैस कनेक्शन उपलब्ध कराएं।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में अपनी पहचान और साख बताते हुए याचिकाकर्ता ने अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा था कि वह जिला फिरोजाबाद में वकालत करने वाला वकील है, कुछ उद्योगों का कानूनी सलाहकार है। साथ ही वह औद्योगिक प्राधिकरणों के समक्ष उद्योगों से जुड़े मामलों को देखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अतः, यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को भविष्य में इस तरह के किसी भी प्रयास में शामिल न होने की चेतावनी देते हुए, PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 20:57:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुंभ मेले से मशहूर हुई मोनालिसा, उनके पति फरमान ने कम उम्र मे शादी के दावे को नकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कुंभ मेले से मशहूर हुई मोनालिसा भोसले के पति मोहम्मद फरमान खान को एक अपहरण के मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है। यह मामला कथित तौर पर इस आरोप के आधार पर दर्ज किया गया था कि भोसले नाबालिग हैं और फरमान ने उनका अपहरण किया था [मोहम्मद फरमान और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य]।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने कोर्ट में दायर एक याचिका में, इस जोड़े ने कहा कि भोसले इस साल जनवरी में 18 साल की हो गईं और जब उन्होंने मार्च में फरमान से शादी की, तब</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176400/monalisa-became-famous-through-kumbh-mela-her-husband-farman-denied"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/monalisa-husband.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कुंभ मेले से मशहूर हुई मोनालिसा भोसले के पति मोहम्मद फरमान खान को एक अपहरण के मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है। यह मामला कथित तौर पर इस आरोप के आधार पर दर्ज किया गया था कि भोसले नाबालिग हैं और फरमान ने उनका अपहरण किया था [मोहम्मद फरमान और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य]।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने कोर्ट में दायर एक याचिका में, इस जोड़े ने कहा कि भोसले इस साल जनवरी में 18 साल की हो गईं और जब उन्होंने मार्च में फरमान से शादी की, तब वह बालिग थीं।इसलिए, उन्होंने अपनी शादी को लेकर दर्ज किसी भी मामले में अग्रिम ज़मानत मांगी।उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा मांगी, क्योंकि उन्हें डर था कि मध्य प्रदेश में भोसले के पिता की शिकायत पर कथित तौर पर दर्ज अपहरण के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">23 मार्च को, जस्टिस कौसर एडापगाथ ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया। उन्होंने पाया कि उनकी शादी के समर्थन में दस्तावेज़ मौजूद थे और यह बात भी सामने आई थी कि यह जोड़ा अब पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "Annexure AIII से पता चलता है कि याचिकाकर्ताओं ने 11.03.2026 को शादी की थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे अब पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहे हैं। इन परिस्थितियों में, अगली सुनवाई की तारीख तक याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार न करने का आदेश दिया जाता है।8 अप्रैल को, कोर्ट ने गिरफ्तारी से मिली इस सुरक्षा को 20 मई तक बढ़ा दिया, जब इस मामले की अगली सुनवाई होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह अंतरिम आदेश सीनियर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की इस बात को ध्यान में रखते हुए पारित किया कि मध्य प्रदेश (MP) पुलिस से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोनालिसा भोसले पिछले साल 2025 के कुंभ मेले में मोतियों की माला बेचते हुए अपने वीडियो वायरल होने के बाद अपनी आकर्षक खूबसूरती के कारण मशहूर हो गईं।उन्होंने 11 मार्च को केरल में फरमान से शादी की। इस शादी की मीडिया में खूब चर्चा हुई। इस जोड़े ने बताया कि वे एक मलयालम फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मिले थे और शादी करने से पहले उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">हालाँकि, उनकी अलग-अलग धर्मों की इस शादी पर विवाद खड़ा हो गया। कुछ लोगों ने दावा किया कि मोनालिसा की उम्र सिर्फ़ 16 साल है और इसलिए, उन्होंने शादी करने की कानूनी उम्र पूरी नहीं की है। गिरफ़्तारी की आशंका को देखते हुए, इस जोड़े ने मिलकर केरल हाईकोर्ट में अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी दी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 20:50:00 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत पर लगाई रोक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को तेलंगाना हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत के फैसले पर रोक लगा दी है। यह मामला असम पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा ने यह एफआईआर दर्ज कराई थी।पवन खेड़ा ने 5 अप्रैल को रिंकी भुइयां सरमा पर तीन आलग-अलग देशों का पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया था।</div>
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<div style="text-align:justify;">जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर की बेंच ने पवन खेड़ा और अन्य लोगों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176303/supreme-court-bans-anticipatory-bail-of-pawan-kheda"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/114185-pawan-khera-supreme-court.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को तेलंगाना हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत के फैसले पर रोक लगा दी है। यह मामला असम पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा ने यह एफआईआर दर्ज कराई थी।पवन खेड़ा ने 5 अप्रैल को रिंकी भुइयां सरमा पर तीन आलग-अलग देशों का पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया था।</div>
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<div style="text-align:justify;">जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर की बेंच ने पवन खेड़ा और अन्य लोगों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होगी।सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ असम सरकार द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया।असम सरकार की ओर से पेश होते हुए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि पवन खेड़ा की याचिका में इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि तेलंगाना में यह अधिकार क्षेत्र कैसे बनता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">तुषार मेहता ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर गया कि इनमें से एक अपराध के लिए अधिकतम 10 साल की जेल की सजा का प्रावधान है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान पवन खेड़ा की तरफ से पेश किए गए नोट में बताया गया था कि उनकी पत्नी हैदराबाद में रहती हैं। लेकिन सॉलिसिटर जनरल ने इसके खिलाफ दलील दी कि उनकी पत्नी के आधार कार्ड में उन्हें दिल्ली का निवासी दिखाया गया है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अगर ऐसा है, तो कोई भी व्यक्ति पूरे देश में कहीं भी प्रॉपर्टी खरीद सकता है और अपनी पसंद की जगह से अग्रिम जमानत मांग सकता है। उन्होंने कहा कि यह 'फोरम-शॉपिंग' है। </div>
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<div style="text-align:justify;">उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रिया इंदोरिया' मामले में अपने फैसले में ऐसी हरकतों को गलत ठहराया था।सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह प्रक्रिया का पूरी तरह से दुरुपयोग है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि वह असम क्यों नहीं जा सकते।  सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि याचिका में उन्होंने यह भी नहीं कहा है कि उनकी पत्नी की हैदराबाद में कोई संपत्ति है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश से हैरान हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पवन खेड़ा ने अग्रिम जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए एक अर्जी दाखिल की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">10 अप्रैल को तेलंगाना हाई कोर्ट ने पवन खेड़ा को कुछ शर्तों के साथ एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। पवन खेड़ा के खिलाफ केस गुवाहाटी क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। यह एफआईआर पवन खेड़ा की 5 अप्रैल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों के आधार पर दर्ज की गई थी। पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया था कि सीएम हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई पासपोर्ट हैं। साथ ही विदेशों में उनकी प्रॉपर्टी है। सीएम हिमंत ने चुनावी हलफनामे में इन तथ्यों के बारे में जानकारी नहीं दी है।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 21:23:02 +0530</pubDate>
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