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                <title>sonia gandhi - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>sonia gandhi RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>वंदे मातरम् पर विवाद: राष्ट्रगीत के सम्मान से बड़ी नहीं हो सकती राजनीत</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185453/controversy-over-vande-mataram-politics-cannot-be-bigger-than-respect"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को रोकने का संकेत दिया। इस आरोप के आधार पर कर्नाटक के मंगलुरु में भाजपा नेता विकास पुत्तूर ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कार्रवाई नहीं होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह मामला अभी आरोप और जांच के स्तर पर है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। कांग्रेस की ओर से इस पूरे आरोप को खारिज किया गया है। विवादित दृश्य को लेकर कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी मंच पर लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी लाने का संकेत दे रही थीं, न कि वंदे मातरम् रोकने का। दूसरी ओर भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ते हुए राजनीतिक और सार्वजनिक सवाल खड़े किए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लेकिन इस विवाद का एक बड़ा पक्ष केवल 15 अगस्त की घटना तक सीमित नहीं है। वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और देश की राजनीति में बहस का इतिहास बहुत पुराना है। इसलिए आज जब राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तब यह समझना भी जरूरी है कि अतीत में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के संबंध में क्या रुख अपनाया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि समय के साथ इसके कुछ अंशों और धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम लीग तथा कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई। 1930 के दशक में यह विषय कांग्रेस के सामने भी आया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1937 में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस पर आपत्ति जताई थी। नेहरू अभिलेखागार में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार, 17 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेस पर वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में थोपने का आरोप लगाया था। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस को लिखे पत्र में वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और उसके कुछ हिस्सों को लेकर चर्चा की। नेहरू ने लिखा कि गीत की ‘आनंदमठ’ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि वंदे मातरम् को लेकर पैदा हुआ विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था। यानी इतिहास को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि उस समय कांग्रेस के भीतर भी गीत को लेकर गहन विचार-विमर्श हुआ था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के इस्तेमाल पर विचार किया और 1937 में यह निर्णय सामने आया कि गीत के उन शुरुआती अंशों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर व्यापक सहमति थी। नेहरू के अपने वक्तव्य से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने इस विषय पर लंबे विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से आज की राजनीतिक बहस को एक ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। भाजपा इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस और उसके समर्थक इसे उस समय की सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय बताते हैं। इतिहास में दर्ज तथ्यों को देखते हुए यह कहना अधिक उचित है कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर उस दौर में महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक बहस हुई थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रगीत है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को भी समान सम्मान दिया जाएगा। इसलिए वंदे मातरम् को केवल एक राजनीतिक दल या विचारधारा से जोड़कर देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करना होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रगीत का सम्मान किसी सरकार, पार्टी या नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत का हिस्सा है जिसमें असंख्य लोगों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। यही कारण है कि इसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की अवमानना का आरोप गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि आरोप को प्रमाण मान लेने के बजाय निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगाती रही है। इसके समर्थन में वह कांग्रेस नेताओं के पुराने बयानों का भी उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए 2010 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ‘सैफ्रन टेररिज्म’ यानी ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने बाद में कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता और भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के ‘हिंदू आतंकवाद’ संबंधी बयान पर भी विवाद हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने स्वयं को उस शब्दावली से अलग करते हुए कहा था कि आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन घटनाओं से यह जरूर स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के बयान समय-समय पर बड़े राजनीतिक विवादों का कारण बने हैं। हालांकि किसी नेता के बयान को पूरे दल की आधिकारिक विचारधारा मान लेना भी उचित नहीं है। राजनीति में बयान आते हैं, उन पर विवाद होता है और कई बार स्वयं दल को सफाई भी देनी पड़ती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् पर वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाने की प्रवृत्ति कब समाप्त होगी। भाजपा कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की अपनी राजनीतिक दलीलें हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए इससे बड़ा प्रश्न राष्ट्रीय सम्मान का है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के मामले में भी यदि कोई आपत्तिजनक व्यवहार हुआ है तो उसकी जांच होनी चाहिए और यदि आरोप गलत हैं तो यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में न तो किसी नेता को केवल पद के कारण कानून से ऊपर माना जा सकता है और न ही किसी राजनीतिक विरोधी पर बिना प्रमाण आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">देशभक्ति किसी दल की बपौती नहीं है।कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी राजनीतिक दल देशभक्ति का प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं रखता। भारत की आजादी किसी एक परिवार, पार्टी या संगठन की देन नहीं है। करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, बलिदान और त्याग से देश स्वतंत्र हुआ। इसलिए ‘हमने देश आजाद कराया’ जैसी राजनीतिक मानसिकता से ऊपर उठना जरूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। 1937 के निर्णयों और उसके पीछे की परिस्थितियों पर राजनीतिक बहस भी हो सकती है। कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों की आलोचना भी लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस का अंतिम उद्देश्य किसी दल को देशद्रोही साबित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि वंदे मातरम् को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से आगे बढ़कर देश की नई पीढ़ी को उसके इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान के बारे में बताया जाए। जो गीत स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर राष्ट्रभावना जगाता रहा, उसके सम्मान में किसी भी प्रकार की कमी देश के लोकतांत्रिक संस्कारों के लिए उचित नहीं हो सकती। लेकिन सम्मान के साथ न्याय और तथ्य भी जरूरी हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के खिलाफ दर्ज शिकायत अब जांच का विषय है। पुलिस और जरूरत पड़ने पर न्यायपालिका यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी व्याख्या करते रहेंगे, लेकिन राष्ट्रगीत किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। इसलिए वंदे मातरम् का सम्मान राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक मर्यादा का विषय होना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;">        *कांतिलाल मांडोत*</div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="WhmR8e"></div></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 20:08:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संविधान पर हो रहा वैचारिक हमला- सोनिया गांधी का सरकार पर आरोप।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
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<div style="text-align:justify;">कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शनिवार को आरोप लगाया कि देश का संविधान खतरे में है और भाजपा उसे खत्म करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा एक आर्थिक और धार्मिक तानाशाही स्थापित करने के इरादे से संविधान की मूल भावना पर हमला कर रही है। सोनिया गांधी का यह संदेश दिल्ली में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी 'संवैधानिक चुनौतियां - दृष्टिकोण और मार्ग' में पढ़ा गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी हर मोर्चे पर संविधान की रक्षा करेगी - संसद में, अदालतों में और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153660/constituent-ideological-attack-on-the-constitution-sonia-gandhis-charge-on"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/rajneeti.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शनिवार को आरोप लगाया कि देश का संविधान खतरे में है और भाजपा उसे खत्म करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा एक आर्थिक और धार्मिक तानाशाही स्थापित करने के इरादे से संविधान की मूल भावना पर हमला कर रही है। सोनिया गांधी का यह संदेश दिल्ली में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी 'संवैधानिक चुनौतियां - दृष्टिकोण और मार्ग' में पढ़ा गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी हर मोर्चे पर संविधान की रक्षा करेगी - संसद में, अदालतों में और सड़कों पर भी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि, 'आज संविधान घिरा हुआ है। भाजपा-आरएसएस, जिन्होंने न तो स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और न ही समानता का सिद्धांत अपनाया, अब वही लोग सत्तासीन होकर उस संविधान की नींव को खत्म कर रहे हैं जिसका वे हमेशा विरोध करते रहे।' उन्होंने कहा कि भाजपा और आरएसएस के विचारक मनुस्मृति का गुणगान करते हैं, तिरंगे को नकारते हैं और 'हिंदू राष्ट्र' की कल्पना करते हैं जहां लोकतंत्र कमजोर और भेदभाव ही कानून बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी ने कहा कि सत्ता में आने के बाद भाजपा ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया, असहमति को अपराध बना दिया, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया, और दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और गरीबों के साथ धोखा किया। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा अब संविधान से समाजवाद और पंथनिरपेक्षता जैसे शब्दों को हटाने की कोशिश कर रही है, जो बाबा साहेब आंबेडकर के समान नागरिकता के सपने की बुनियाद हैं। उन्होंने वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी और उनकी टीम को इस महत्वपूर्ण चर्चा को शुरू करने के लिए बधाई दी और कहा कि कांग्रेस का मिशन स्पष्ट है, गणराज्य की पुनर्रचना करना और हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी ने कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र की नैतिक नींव है, जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित है। उन्होंने बताया कि संविधान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सोच और संघर्ष का परिणाम है। 1928 के नेहरू रिपोर्ट से लेकर 1934 में संविधान सभा की मांग तक, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने इसकी नींव रखी, और बाबा साहेब आंबेडकर ने इसे रूप दिया। 'आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि अगर सामाजिक और आर्थिक न्याय नहीं मिला, तो राजनीतिक लोकतंत्र सिर्फ एक दिखावा बन जाएगा। कांग्रेस ने इसे समझा और उस पर अमल किया, अधिकार बढ़ाए, संस्थाएं मजबूत कीं और सम्मान और समावेशिता को बढ़ावा दिया।'</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 Aug 2025 21:54:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अवरोधों के बीच तैयार हुआ विपक्षी एकता का प्रारंभिक रोडमैप</title>
                                    <description><![CDATA[पटना में 12 जून को प्रस्तावित बैठक टलने के पीछे कांग्रेस और दोनों मेजबान क्षेत्रीय दलों के बीच कुछ गलतफहमियां थीं। राजद और जदयू के दूसरी-तीसरी श्रेणी के नेता अपने-अपने तरीके से विपक्ष की इस बैठक को भुनाने में जुट गए थे जो कांग्रेस को पसंद नहीं आया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/130369/initial-roadmap-of-opposition-unity-prepared-amid-obstacles"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-06/rahul-gandgi.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li><strong>HighLights</strong></li>
<li><strong>भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों का प्रारंभिक रोडमैप तैयार</strong></li>
<li><strong>नीतीश के 'एक के खिलाफ एक' फार्मूले पर बढ़ चली चर्चा</strong></li>
<li><strong>अवरोधों के बीच तैयार हुआ विपक्षी एकता का रोडमैप</strong></li>
</ul>
<p> </p>
<p><strong>नई दिल्ली:</strong></p>
<p><strong> </strong>अंतर्विरोधों के बावजूद भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने का प्रारंभिक रोडमैप तैयार कर लिया गया है। जदयू-राजद की सक्रियता और कोशिशों से कांग्रेस पर दबाव बढ़ा है। नीतीश कुमार ने समान विचारधारा वाले दलों से बात कर एक-एक कर सारे अवरोध हटाए। उन दलों को भी राजी किया, जो एक-दूसरे के लिए अछूत थे।</p>
<p>वामदलों को तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) को कांग्रेस के साथ लाना आसान नहीं था, किंतु राजद एवं जदयू के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से 23 जून को पटना में बैठक की घोषणा से साफ है कि गतिरोधों को हाशिये पर डालकर एकता की बात आगे बढ़ चली है।</p>
<h4><strong>लालू-नीतीश को करना पड़ा हस्तक्षेप</strong></h4>
<p>बात बिगड़ने लगी तो शीर्ष नेताओं को हस्तक्षेप करना पड़ा। राजद के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से सहमति लेने के बाद ही 12 जून की तिथि तय हुई थी। बाद में कहा गया कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे अनुपस्थित रहेंगे। इसलिए बैठक की तारीख आगे बढ़ाने और उसमें कांग्रेस के दोनों शीर्ष नेताओं में से किसी एक के उपस्थित रहने के लिए नीतीश और लालू ने सोनिया गांधी से स्वयं बात की, जिसके बाद बैठक की नई तिथि तय की गई।</p>
<h4><strong>भाजपा से मोर्चा के लिए चार सौ सीटें चिह्नित</strong></h4>
<p>भाजपा नेतृत्व वाले राजग को केंद्र की सत्ता से बाहर करने के लिए नीतीश ने एक के खिलाफ एक का फार्मूला दिया है। दावा किया जा रहा है कि अब तक लगभग चार सौ ऐसी सीटें चिह्नित की गई हैं, जहां इस फार्मूले पर आगे बढ़ा जा सकता है। नीतीश समेत विपक्षी एकता के पैरोकार इसे कम से कम पांच सौ सीटों तक ले जाना चाहते हैं। कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा और कौन सी सीट किस दल के हिस्से में जाएगी, इस पर अभी माथापच्ची होना है।</p>
<h4><strong>गलतफहमियां के चलते टली थी बैठक</strong></h4>
<p>सूत्रों के अनुसार पटना में 12 जून को प्रस्तावित बैठक टलने के पीछे कांग्रेस और दोनों मेजबान क्षेत्रीय दलों के बीच कुछ गलतफहमियां थीं। राजद और जदयू के दूसरी-तीसरी श्रेणी के नेता अपने-अपने तरीके से विपक्ष की इस बैठक को भुनाने में जुट गए थे, जो कांग्रेस को पसंद नहीं आया। इसलिए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने बैठक में आने से लाचारी जता दी। यह भी कहा गया कि बैठक हिमाचल प्रदेश की किसी ठंडी जगह में हो।</p>
<p>संभव है कि इसे सुलझाने को पहली बैठक में ही कुछ समितियां गठित कर दी जाएं। नीतीश के अनुभव एवं स्वीकार्यता को देखते हुए उन्हें समन्वयक बनाया जा सकता है। तर्क है कि लालू को छोड़ किसी नेता का रिश्ता कांग्रेस से मधुर नहीं है। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, शरद पवार एवं उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं को एक मंच पर लाना सबके बस का नहीं है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
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                                            <category>लोक सभा चुनाव</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 08 Jun 2023 21:01:36 +0530</pubDate>
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