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                <title>Uttar Pradesh Legal News - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Uttar Pradesh Legal News RSS Feed</description>
                
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                <title>हाईकोर्ट की सख्ती बरकरार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क में अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। माननीय न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकलपीठ ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया माना कि 22 अप्रैल 2026 को पारित आदेश की अवहेलना का मामला बनता है। हालांकि, न्यायालय ने इस स्तर पर नोटिस जारी किए बिना संबंधित अधिकारियों को एक माह का अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया है कि पूर्व आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आदेश के अनुपालन की सूचना याची को भी उपलब्ध कराने को कहा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184391/high-courts-strictness-remains-intact"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1002152235.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क में अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। माननीय न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकलपीठ ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया माना कि 22 अप्रैल 2026 को पारित आदेश की अवहेलना का मामला बनता है। हालांकि, न्यायालय ने इस स्तर पर नोटिस जारी किए बिना संबंधित अधिकारियों को एक माह का अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया है कि पूर्व आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आदेश के अनुपालन की सूचना याची को भी उपलब्ध कराने को कहा गया है। यदि आदेश का पालन नहीं किया जाता है, तो याची को पुनः न्यायालय आकर अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जनहित याचिका में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि नगर निगम एवं कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) के अभिलेखों में ब्लॉक-8 पार्क/खेल मैदान के रूप में दर्ज सार्वजनिक भूमि का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने जिला मजिस्ट्रेट, नगर आयुक्त एवं केडीए उपाध्यक्ष को निर्देश दिया था कि पार्क को अतिक्रमणमुक्त कर उसका मूल स्वरूप बहाल किया जाए तथा भविष्य में उसका उपयोग केवल पार्क एवं खेल मैदान के रूप में ही सुनिश्चित किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अवमानना याचिका में कहा गया है कि 29 अप्रैल 2026 को न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध करा दी गई थी, लेकिन तीन माह से अधिक समय बीतने के बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके विपरीत पार्क का मूल स्वरूप बहाल करने के बजाय विवादित निर्माणों को यथावत बनाए रखा गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम ने कथित विकास कार्यों के नाम पर पार्क में पहले से मौजूद अवैध निर्माणों की अनदेखी करते हुए तथा अवैध कब्जेदारों से मिलीभगत कर नगर निगम के पार्क के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से पर नियमों के विपरीत इंटरलॉकिंग बिछा दी। इससे पार्क का हरित क्षेत्र और मूल स्वरूप गंभीर रूप से प्रभावित हुआ तथा वर्षों पुराना हरा-भरा सार्वजनिक पार्क कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया। आरोप है कि यह कार्य न केवल सार्वजनिक पार्क के उद्देश्य के विपरीत है, बल्कि माननीय हाईकोर्ट के आदेश की भावना के भी प्रतिकूल है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याची प्रकाश वीर आर्य ने गंभीर आरोप लगाया कि माननीय हाईकोर्ट की आंखों में धूल झोंकने के उद्देश्य से 22 अप्रैल 2026 के आदेश के बाद नगर निगम ने रातोंरात पार्क के भीतर लगे तथाकथित विकास कार्यों के मूल शिलापट्ट को, जिस पर "ब्लॉक-8 पार्क" अंकित था, हटाकर उसकी जगह "बालाजी पार्क" नाम का नया शिलापट्ट स्थापित कर दिया। उनका कहना है कि यह परिवर्तन न्यायालय के समक्ष वास्तविक स्थिति को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया। उन्होंने बताया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत नगर निगम के उद्यान अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई आधिकारिक सूचना में भी संबंधित स्थल का नाम "ब्लॉक-8 पार्क" ही दर्ज है। ऐसे में अभिलेखों के विपरीत नया शिलापट्ट लगाए जाने से नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ब्लॉक-8 निवासी जे.पी. दुबे, एडवोकेट ने कहा कि यह मामला केवल एक पार्क का नहीं, बल्कि माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की गरिमा, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा तथा कानून के शासन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अभिलेखों के विपरीत शिलापट्ट बदला गया तथा अवैध निर्माणों को संरक्षण देते हुए पार्क के अधिकांश हिस्से को कंक्रीट में बदल दिया गया, तो पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी बीच केस्को की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। केस्को की जांच आख्या में उल्लेख किया गया है कि विवादित परिसर को क्षेत्रीय पार्षद द्वारा दिए गए एनओसी एवं अन्य प्रपत्रों के आधार पर नया विद्युत संयोजन स्वीकृत किया गया। केस्को यह स्पष्ट नहीं कर सका कि किस कानून, नियम या शासनादेश के तहत किसी नगर निगम पार्षद को सार्वजनिक पार्क की भूमि पर बने निर्माण के लिए एनओसी जारी करने का अधिकार प्राप्त है। क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि सार्वजनिक पार्क के रूप में दर्ज भूमि और हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद सक्षम प्राधिकारी से सत्यापन किए बिना विद्युत संयोजन प्रदान करना नियमों के विपरीत है। अब पूरे शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि एक माह की अवधि में संबंधित अधिकारी हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हैं या नहीं। यदि निर्धारित अवधि में आदेश का अनुपालन नहीं हुआ, तो मामला पुनः हाईकोर्ट पहुंचेगा और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 21:52:16 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सार्वजनिक जमीन पर नमाज या बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने या बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन करने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों के अधीन है. कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के संभल जिले के इकोना गांव में एक भूमि पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए की.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने एक व्यक्ति आसीन द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता का दावा था कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177976/allahabad-high-court-has-no-right-to-hold-namaz-or"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने या बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन करने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों के अधीन है. कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के संभल जिले के इकोना गांव में एक भूमि पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए की.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने एक व्यक्ति आसीन द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता का दावा था कि भूमि उसकी निजी संपत्ति है और वह वहां प्रार्थना करने के लिए अधिकारियों से सुरक्षा चाहता है. याचिकाकर्ता के अनुसार, 16 जून 2023 को दर्ज गिफ्ट डीड के माध्यम से भूमि उसके स्वामित्व में है.</p>
<p style="text-align:justify;">उसने तर्क दिया कि निजी संपत्ति पर नमाज पढ़ने के लिए किसी पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं है और इस पर रोक लगाना उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. उत्तर प्रदेश सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि आबादी भूमि के रूप में दर्ज है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए है. सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कानूनी स्वामित्व साबित नहीं किया. गिफ्ट डीड में भूमि की स्पष्ट पहचान नहीं दी गई है और केवल अस्पष्ट सीमा विवरण दिए गए हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने अदालत को बताया कि उस जगह पर परंपरागत रूप से केवल ईद के मौके पर नमाज पढ़ी जाती रही है. किसी भी रिवाज पर रोक नहीं लगाई गई है. लेकिन याचिकाकर्ता गांव के अंदर और बाहर से लोगों को बुलाकर नियमित सामूहिक नमाज शुरू करने की कोशिश कर रहा है, जिससे स्थानीय सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है. सार्वजनिक भूमि का उपयोग आम लोगों के लिए है और इसे बार-बार धार्मिक गतिविधियों के लिए हड़पने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे आवागमन और नागरिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने निजी पूजा और संगठित धार्मिक सभाओं के बीच अंतर स्पष्ट किया. घर के अंदर या सीमित निजी जगह पर व्यक्तिगत प्रार्थना पूरी तरह संरक्षित है, लेकिन जब यह संगठित हो जाती है और बड़ी संख्या में लोग शामिल होने लगते हैं, तो यह सार्वजनिक चरित्र ग्रहण कर लेती है और राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित की जा सकती है.</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों को वास्तविक उपद्रव होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. यदि कोई गतिविधि सार्वजनिक व्यवस्था या सांप्रदायिक सद्भाव को प्रभावित करने की संभावना रखती है, तो वे निवारक कार्रवाई कर सकते हैं. चूंकि याचिकाकर्ता स्वामित्व साबित करने में असफल रहा और भूमि सार्वजनिक श्रेणी में ही दर्ज रही, इसलिए अदालत ने याचिका खारिज कर दी.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 22:43:51 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अधिवक्ता सुरक्षा अधिनियम के  मुद्दे पर वकीलों का स्वर हुआ मुखर, हुई तेज नारेबाजी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता </strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़।</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आल इण्डिया रूरल बार एसोसिएशन के बैनरतले बुधवार को भी अधिवक्ता सुरक्षा अधिनियम को लेकर वकीलों के विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी दिखा। एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानप्रकाश शुक्ल एवं महासचिव अनिल कुमार तिवारी की अगुवाई में एकजुट हुए अधिवक्ताओं ने विधेयक को लेकर सरकार की लापरवाही पर गुस्से का इजहार किया। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानप्रकाश शुक्ल ने कहा कि राजधानी समेत प्रदेश के विभिन्न जनपदों में अधिवक्ता की सुरक्षा को लेकर सरकार से संसद में विधेयक ले आने की लगातार मांग कर रहे हैं। उन्होने कहा कि केन्द्रीय बजट में भी सरकार ने अधिवक्ताओं की सुरक्षा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173157/lawyers-became-vocal-on-the-issue-of-advocates-protection-act"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260311-wa0091.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता </strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़।</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आल इण्डिया रूरल बार एसोसिएशन के बैनरतले बुधवार को भी अधिवक्ता सुरक्षा अधिनियम को लेकर वकीलों के विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी दिखा। एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानप्रकाश शुक्ल एवं महासचिव अनिल कुमार तिवारी की अगुवाई में एकजुट हुए अधिवक्ताओं ने विधेयक को लेकर सरकार की लापरवाही पर गुस्से का इजहार किया। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञानप्रकाश शुक्ल ने कहा कि राजधानी समेत प्रदेश के विभिन्न जनपदों में अधिवक्ता की सुरक्षा को लेकर सरकार से संसद में विधेयक ले आने की लगातार मांग कर रहे हैं। उन्होने कहा कि केन्द्रीय बजट में भी सरकार ने अधिवक्ताओं की सुरक्षा एवं कल्याणकारी योजनाओं को लेकर किसी भी पैकेज का ऐलान नहीं किया। महासचिव अनिल कुमार तिवारी ने कहा कि संसद के बजट सत्र में अधिवक्ताओ की सुरक्षा, बुजुर्ग अधिवक्ता पेंशन, युवा अधिवक्ताओ को प्रोत्साहन भत्ता, न्यायिक क्षेत्र में महिला अधिवक्ताओं के आरक्षण से जुड़ा कानून नहीं लाया गया </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तो अधिवक्ता नई दिल्ली में संसद भवन का घेराव करेंगे। आम सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश मिश्र व संचालन अधिवक्ता शैलेन्द्र तिवारी ने किया। लखनऊ मंडल अध्यक्ष आनन्द त्रिपाठी ने सुरक्षा अधिनियम के मसौदे की बिंदुवार जानकारियां दी। आम सभा को वरिष्ठ अधिवक्ता विजय पाल, बृजेश श्रीवास्तव, रोहित तिवारी, विपिन शुक्ला, हृदय पाण्डेय, सत्येन्द्र बहादुर लाल श्रीवास्तव, ओम शुक्ला, राजेश तिवारी, हरेकृष्ण तिवारी ने भी संबोधित किया। इस मौके पर विकास मिश्र, कौशलेंद्र वर्मा,महेन्द्र शुक्ला, टीपी त्रिपाठी, अनीता वर्मा, आयुष त्रिपाठी, अशोक दीक्षित, डीपी सिंह, टीके बोस आदि अधिवक्ता मौजूद रहे। आभार प्रदर्शन जिला इकाई अध्यक्ष जितेन्द्र तिवारी ने किया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 22:22:41 +0530</pubDate>
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