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                <title>INDIRA GANDHI - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>INDIRA GANDHI RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>51 साल पहले 18 मई को ही भारत बना था परमाणु संपन्न देश,। राहुल गांधी ने किया पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान के पोकरण से 18 मई को ठीक 51 साल पहले दुनिया को भारत के परमाणु संपन्न होने का आभास हुआ था। 18 मई 1974 को ऑपरेशन 'स्माइलिंग बुद्धा' ने भारत को परमाणु ताकत वाले देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया था। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक तस्वीर साझा कर उस उपलब्धि को नमन किया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने सोशल प्लेटफॉर्म फेसबुक पोस्ट में अपनी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद किया और उन अथक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने लिखा- "श्रीमती इंदिरा गांधी के दूरदर्शी और निर्णायक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/152006/india-had-become-a-nuclear-rich-country-on-may-18"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-05/whatsapp-image-2025-05-18-at-21.19.28_3a7718d3.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान के पोकरण से 18 मई को ठीक 51 साल पहले दुनिया को भारत के परमाणु संपन्न होने का आभास हुआ था। 18 मई 1974 को ऑपरेशन 'स्माइलिंग बुद्धा' ने भारत को परमाणु ताकत वाले देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया था। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक तस्वीर साझा कर उस उपलब्धि को नमन किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने सोशल प्लेटफॉर्म फेसबुक पोस्ट में अपनी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद किया और उन अथक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने लिखा- "श्रीमती इंदिरा गांधी के दूरदर्शी और निर्णायक नेतृत्व में, भारत ने 51 साल पहले राजस्थान के पोकरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण, 'ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा' किया था।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने उन हीरोज को याद किया जिनकी काबिलियत के बूते भारत दुनिया के छह परमाणु संपन्न राष्ट्रों में शामिल हो गया। उन्होंने आगे लिखा- "मैं उन प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं जिनके समर्पण ने इसे संभव बनाया। उनकी विरासत आज भी जीवित है, जो पीढ़ियों को तकनीकी उन्नति करने और भारत की सामरिक क्षमताओं को मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस परमाणु परीक्षण को सफल बनाने में एक दशक से भी ज्यादा का समय लगा था। देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की अथक मेहनत के बल पर दुनिया हमारी अहमियत समझ पाई थी। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में शामिल अमेरिका, रूस, फ्रांस, यूके, चीन ही परमाणु ताकत से संपन्न थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने इस परमाणु परीक्षण में पूरी गोपनीयता बरती। जैसे ही दुनिया को पता चला, शोर मच गया। अमेरिका ने भारत के परमाणु कार्यक्रम पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्षों बाद भारत ने पोकरण-2 के जरिए फिर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। इसे ऑपरेशन शक्ति का नाम दिया गया, जो मई 1998 में भारत के पांच परमाणु हथियार परीक्षणों की एक श्रृंखला थी। ये बम राजस्थान में भारतीय सेना के पोकरण परीक्षण रेंज में ब्लास्ट किए गए थे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 May 2025 21:21:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इमरजेंसी में इंदिरा सरकार के खिलाफ अड़ गए थे मनोज कुमार! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>वह आपात काल का दौर था जब बड़े से बड़े एक्टर प्रोड्यूसर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलने या फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं रखते थे सैंसरशिप इतना कि फिल्म में आम आदमी की दशा महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी को केंद्र में रखकर फिल्माना भी जुर्म बन गया था लेकिन अभिनेता मनोज कुमार तो मनोज कुमार ठहरे उन्होंने न सिर्फ आम आदमी को केंद्र में रखकर फिल्म बनाई बल्कि सरकार की रोक के खिलाफ अदालत में लडाई भी लड़ी और सरकार को पटखनी दी। </div>
<div>  </div>
<div>बॉलीवुड के  एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे हैं. उन्होंने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150802/manoj-kumar-was-adamant-against-indira-government-in-emergency"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/download-(5)1.jpg" alt=""></a><br /><div>वह आपात काल का दौर था जब बड़े से बड़े एक्टर प्रोड्यूसर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलने या फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं रखते थे सैंसरशिप इतना कि फिल्म में आम आदमी की दशा महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी को केंद्र में रखकर फिल्माना भी जुर्म बन गया था लेकिन अभिनेता मनोज कुमार तो मनोज कुमार ठहरे उन्होंने न सिर्फ आम आदमी को केंद्र में रखकर फिल्म बनाई बल्कि सरकार की रोक के खिलाफ अदालत में लडाई भी लड़ी और सरकार को पटखनी दी। </div>
<div> </div>
<div>बॉलीवुड के  एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे हैं. उन्होंने 87 साल की उम्र में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में आखिरी सांस ली. वो लंबे समय से उम्र संबंधित बीमारियों से जूझ रहे थे. मनोज कुमार अपनी देशभक्ति फिल्मों की वजह से फेमस थे. मनोज कुमार को लोग भारत कुमार कहकर बुलाते थे. मनोज कुमार के साथ बॉलीवुड के एक युग का भी आज अंत हो गया है. उनकी फिल्में जितनी हिट रही हैं उतनी ही उनकी पर्सनल लाइफ मुश्किल में रही. उन्होंने  बंटवारे का दर्द भी झेला है.</div>
<div>मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को ब्रिटिश भारत के एबटाबाद (अब पाकिस्तान) में हुआ था. बंटवारे के बाद उनका पूरा परिवार दिल्ली आकर बस गया था.</div>
<div> </div>
<div>एक दौर ऐसा आया कि पूरब पश्चिम की जबरदस्त कामयाबी के बाद मनोज कुमार देशभक्ति के नायक बन गए। उनपर फिल्माए गए गीत के बोल "जीते हो किसी ने देश तो क्या हमने तो दिलों को जीता है यहां राम अभी तक है नर में नारी में अभी तक सीता है" हर देशवासी के दिल में एक जज्बा पैदा करने में कामयाब रहे। </div>
<div>पाकिस्तान के एबटाबाद में जन्में मनोज कुमार को सिर्फ 10 साल की उम्र में बंटवारे का दर्द झेलना पड़ा था.  उन्हें जलियाला शेर खान से दिल्ली जाना पड़ गया था. जबकि मनोज कुमार का परिवार विजय नगर, किंग्सवे कैंप में शरणार्थियों के तौर पर रहा और वो भी कुछ समय के बाद दिल्ली के पुराने राजेंद्र नगर इलाके में चले गए। </div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार ने अपनी पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से की. उन्होंने ग्रेजुएशन करने के बाद ही फिल्म इंडस्ट्री में जाने का फैसला कर लिया था. उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा मनोज कुमार इतने बड़े स्टार हैं। मनोज कुमार की 1957 में पहली फिल्म फैशन आई थी. इस फिल्म में उन्होंने 80 साल के बुजुर्ग का रोल निभाया था. इसके बाद वो हरियाली और रास्ता में नजर आए थे. इस फिल्म के बाद से मनोज कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. इस फिल्म ने उनकी किस्मत चमका दी थी. उसके बाद से मनोज कुमार की हिट फिल्मों की लाइन लग गई थी. जिसमें वो कौन थी, गुमनाम, हिमालय की गोद में जैसी कई फिल्में शामिल हैं. ये सारी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई थीं।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार ने कई हिट फिल्में देने के बाद डायरेक्शन में कदम रखा. उन्होंने उपकार, जय हिंद. क्लर्क, क्रांति, रोटी कपड़ा और मकार, शोर, पूरब और पश्चिम जैसी कई फिल्मों का डायरेक्शन किया. मनोज कुमार देशभक्ति की फिल्मों के लिए पर्याय बन गए। फिर शुरू हुआ नया सफर जिसमें देशभक्ति वाली फिल्में ,मतलब मनोज कुमार. 15 अगस्त और 26 जनवरी पर बजने वाले देशभक्ति गीतों को याद करेंगे तो ज्यादातर में मनोज कुमार मिलेंगे. बॉलिवुड में वह 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर हो गए. चेहरे पर हाथ फेरती उनकी अदा की दीवानी कई पीढ़ी रही. शुक्रवार सुबह मनोज कुमार हमेशा के लिए खामोश हो गए. बॉलिवुड सदमे हैं और उनके चाहने वाले उनके गीतों को गुनगुना रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था, इनका जन्म 24 जुलाई, 1937 को एबटाबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन के कारण उनका परिवार दिल्ली आ गया था और इस दौरान उन्हें शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा था. तब उनकी उम्र 10 साल थी. बाद में गोस्वामी परिवार राजधानी के पटेल नगर इलाके में बस गया।</div>
<div> </div>
<div>अभिनेता मनोज कुनार ने हिंदू कॉलेज से डिग्री हासिल की है.साल 1949 में उन्होंने अपना नाम मनोज कुमार रखा लिया था. दरअसल उनके पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार ने फिल्म शबनम में इसी नाम का किरदार निभाया था.साल 1960 में आई कांच की गुड़िया उनकी पहली मुख्य भूमिका वाली फिल्म थी.मनोज कुमार और उनकी पत्नी शशि के दो बेटे हैं, विशाल और कुणाल।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार ने अपने करियर में कुल 35 फिल्मों में काम किया था. दरअसल दिलीप कुमार की फिल्म शबनम देखने के बाद उन्होंने अपना नाम बदला था. इसी के बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया में आने का फैसला लिया. मनोज ने कांच की गुड़िया, वो कौन थी, क्रांति, पूरब और पश्चिम और शिरडी वाले साई बाबा में यादगार रोल निभाए. साल 1995 में मैदान ए जंग में की रिलीज के बाद मनोज ने एक्टिंग की दुनिया से तौबा कर लिया. साल 1999 में उन्होंने आखिरी फिल्म जय हिंद को डायरेक्ट किया था. फिल्मी करियर को विराम लगाते ही मनोज कुमार ने पॉलिटिक्स की दुनिया में कदम रखा था। </div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार को पद्मश्री और दादासाहेब फाल्के, किशोर कुमार अवॉर्ड से नवाजा गया था. वहीं उन्हें फिल्मफेयर की ओर से बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड कई दफा मिले. मनोज कुमार को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।</div>
<div> </div>
<div>देशभक्ति आधारित फिल्मों से मनोज कुमार का जुड़ाव 1965 में आयी शहीद से हुआ था, जिसमें उन्होंने सरदार भगत सिंह का किरदार निभाया था। प्रेम धवन रचित फिल्म का संगीत बेहद सफल रहा था और आज भी देशभक्ति के गीतों के लिए जाना जाता है। मेरा रंग दे बसंती चोला, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, पगड़ी सम्भाल जट्टा और ऐ वतन ऐ वतन... बजते हैं तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। </div>
<div> </div>
<div>1967 मनोज कुमार के लिए काफी अच्छा साबित हुआ। रोमांटिक ड्रामा पत्थर के सनम और उपकार बड़ी हिट रही थीं। उपकार इसलिए भी खास है, क्योंकि इसके साथ उन्होंने निर्देशन में कदम रखा। इसी फिल्म के बाद से उन्हें भारत कुमार का नाम मिल गया।</div>
<div> </div>
<div>उपकार’ फिल्म उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर बनाई थी। दरअसल, साल 1965 में जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था, तब इस युद्ध के बाद ही मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मुलाकात की थी, जिसमें उन्होंने अभिनेता से युद्ध से होने वाली परेशानियों पर एक फिल्म बनाने के लिए कहा था। हालांकि, इस फिल्म को खुद लाल बहादुर शास्त्री नहीं देख पाए थे।</div>
<div> </div>
<div>ताशकंद से लौटने के बाद लाल बहादुर शास्त्री इस फिल्म को देखने वाले थे, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।मनोज कुमार की फिल्में लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को भी काफी पसंद आती थीl उन्होंने उपकार फिल्म लाल बहादुर शास्त्री के नारे 'जय जवान, जय किसान' से प्रेरणा लेकर बनाई थी।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल, देश में आपातकाल लगने के बाद मनोज कुमार ने इसका विरोध किया था. इससे सरकार नाराज हो गई थी. कहा जाता है कि जब तत्‍कालीन मंत्री विध्याचरण शुक्‍ला ने इंदिरा गांधी और उनके आपातकाल के फेवर में मनोज कुमार को प्रो-इमरजेंसी डॉक्‍यूमेंट्री बनाने का ऑफर दिया तो उन्‍होंने इनकार कर दिया था. इतना ही नहीं मनोज कुमार ने डॉक्‍यूमेंट्री के लेखक अमृता प्रीतम को फोन कर इतना तक कह दिया था कि क्‍या लेखक के तौर पर समझौता कर लिए हो।</div>
<div> </div>
<div>यही वजह रही कि मनोज कुमार के लिए इमरजेंसी का दौर चुनौतीपूर्ण रहा. उस दौर में उनकी फ‍िल्‍में भी फ्लाप हो गई थींइतना ही नहीं मनोज कुमार की एक फ‍िल्‍म दस नंबरी पर रोक तक लगा दी गई थी. इससे उनका करियर भी समाप्‍त होने का डर था, हालांकि वह डरे नहीं.   मनोज कुमार ने सरकार के खिलाफ केस तक कर दिया और वह केस जीत भी गए थे. वह एकलौते अभिनेता थे, जिन्‍होंने सरकार से केस जीता।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार ने एचएल गोस्वामी और कृष्णा कुमारी गोस्वामी के घर जन्म लिया था. मनोज के एक भाई और बहन थे. मनोज ने शशि गोस्वामी से शादी रचाई, जिनसे उनके दो बच्चे कुणाल और साशा हुए. बता दें कि टीवी के जाने-माने प्रोड्यूसर मनीष गोस्वामी उनके कजिन हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Apr 2025 16:56:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंदिरा गांधी जो दूर दृष्टि पक्का इरादा और कठोर निर्णय लेने वाली राजनेत्री थी।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div><strong>दया शंकर त्रिपाठी।</strong></div>
<div>  </div>
<div>यदि देश की सेवा करते हुए मेरी मृत्यु भी हो जाये तो मुझे इसका गर्व होगा, मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे खून का एक-एक कतरा राष्ट्र के विकास में योगदान और इसे सुदृढ़ और उर्जावान बनाएगा ।यह वाक्य किसी फिल्म का डायलॉग नहीं बल्कि आयरन लेडी इंदिरा गांधी का था।</div>
<div>  </div>
<h4><strong>जब इंदिरा गांधी को एक हफ़्ते तक तिहाड़ जेल में रखा गया।</strong></h4>
<div>  </div>
<div>जब 1977 का चुनाव हारने के डेढ़ साल बाद इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमंगलूर से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो वोटिंग के दिन पूरे इलाक़े में मूसलाधार बारिश हुई. इसके बावजूद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147584/indira-gandhi-was-a-far-sighted-strong-willed-politician-who-took-tough"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/20250120_185635.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div><strong>दया शंकर त्रिपाठी।</strong></div>
<div> </div>
<div>यदि देश की सेवा करते हुए मेरी मृत्यु भी हो जाये तो मुझे इसका गर्व होगा, मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे खून का एक-एक कतरा राष्ट्र के विकास में योगदान और इसे सुदृढ़ और उर्जावान बनाएगा ।यह वाक्य किसी फिल्म का डायलॉग नहीं बल्कि आयरन लेडी इंदिरा गांधी का था।</div>
<div> </div>
<h4><strong>जब इंदिरा गांधी को एक हफ़्ते तक तिहाड़ जेल में रखा गया।</strong></h4>
<div> </div>
<div>जब 1977 का चुनाव हारने के डेढ़ साल बाद इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमंगलूर से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो वोटिंग के दिन पूरे इलाक़े में मूसलाधार बारिश हुई. इसके बावजूद लगभग तीन चौथाई मतदाता वोट डालने पहुंचे।. इंदिरा गांधी उसी दिन दिल्ली वापस आ गईं.। दो दिन बाद जब वो विपक्ष के नेता के तौर पर सोवियत संघ के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भाग लेने सोवियत दूतावास जा रही थीं तभी उन्हें ख़बर मिली कि वो 70 हज़ार वोटों से लोकसभा का उप-चुनाव जीत गई हैं.।</div>
<div> </div>
<h4><strong>समारोह में सोवियत राजदूत ने इंदिरा की जीत की ख़ुशी में जाम उठाया.</strong></h4>
<div> </div>
<div>चार दिन बाद इंदिरा गांधी को लंदन के लिए रवाना होना था. उनके साथ सोनिया गांधी भी लंदन गईं. वहाँ से दिल्ली वापस लौटने से पहले इंदिरा और सोनिया लंदन की मशहूर ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट पर राहुल और प्रियंका के लिए ख़रीदारी करने निकलीं.उस समय उन्होंने कल्पना नहीं की होगी कि दिल्ली में उन्हें संसद से निष्कासित करने और उनकी गिरफ़्तारी की तैयारी शुरू हो चुकी है... संसद की विशेषाधिकार समिति ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए मारुति केस की जाँच कर रहे उद्योग मंत्रालय के चार अधिकारियों को तंग करने का दोषी पाया था।</div>
<div> </div>
<div>इससे पहले कि ये रिपोर्ट संसद में पेश की जाती जनता पार्टी संसदीय बोर्ड ने तय कर लिया कि इंदिरा गांधी इस मामले में दोषी हैं और उनको इसकी सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इससे पहले कि इन आरोपों पर किसी अदालत में सुनवाई होती, जनता पार्टी के नेताओं ने सदन में अपने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए उन्हें संसद सत्र समाप्त होने तक जेल भेजने और उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त करने का फ़ैसला ले लिया।</div>
<div> </div>
<div>पुपुल जयकर इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, "इंदिरा को पता था कि शाह आयोग की जाँच, गिरफ़्तारी की कोशिश और सीबीआई की पूछताछ के प्रयास असफल हो जाने के बाद विशेषाधिकार कमेटी का इस्तेमाल उनके राजनीतिक भविष्य को बर्बाद करने के लिए किया जाएगा. इसलिए उन्होंने तय किया कि वो लोकसभा के पटल पर अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देंगीं."</div>
<div> </div>
<h4><strong>संसद में जैसे ही इंदिरा गांधी ने बोलना शुरू किया जनता पार्टी के सांसदों ने शोर मचाकर उन्हें चुप कराने की कोशिश की.</strong></h4>
<div> </div>
<div>इंदिरा गांधी ने अपने भाषण में कहा, "जनता पार्टी संसदीय बोर्ड ने पहले ही मुझे इस मामले में दोषी मान लिया है, इसलिए मेरे लिए अपने बचाव में कहने का कुछ मतलब नहीं है. लेकिन क्या मुझे साफ़ तौर पर ये कहने का अधिकार है कि मैंने संसद के किसी विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं किया है?"</div>
<div> </div>
<div>"इस विषय पर पहले ही देश की कई अदालतों में आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं. इसके बावजूद इस पर मुझे यहाँ सज़ा देकर पूरे मामले को प्री-जज करने की कोशिश की जा रही है."</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा, "सरकार के इस क़दम का उद्देश्य प्रतिशोध है. किसी भी प्रजातांत्रिक देश के इतिहास में विपक्षी दल के नेता की इस तरह से चरित्र-हनन की कोशिश नहीं की गई है."</div>
<div> </div>
<div>इंदिरा गांधी ने कहा, "आपातकाल की ज़्यादतियों के लिए मैं पहले ही कई मंचों पर माफ़ी माँग चुकी हूँ और यहाँ पर भी मैं दोबारा माफ़ी माँगती हूँ."</div>
<div> </div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-01/20250120_185635.jpg" alt="इंदिरा गांधी जो दूर दृष्टि पक्का इरादा और कठोर निर्णय लेने वाली राजनेत्री थी।" width="1024" height="585"></img></div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा, "मैं एक अदना इंसान हूँ लेकिन मैं हमेशा कुछ मूल्यों और लक्ष्यों के प्रति निष्ठावान रही हूँ. आपकी दी हुई हर सज़ा मुझे और मज़बूत बनाएगी. मेरा सूटकेस पहले से ही पैक्ड है. उसमें मुझे सिर्फ़ गर्म कपड़े रखने हैं."</div>
<div> </div>
<div>भाषण समाप्त करते ही इंदिरा गांधी अपनी जगह से उठीं और सांसदों की तरफ़ अपनी पीठ करती हुई बाहर निकल गईं. स्पैनिश लेखक हाविए मोरो अपनी किताब 'द रेड साड़ी' में लिखते हैं, "वहाँ से एक बार फिर पलट कर उन्होंने सदन पर एक गहरी और लंबी नज़र डाली और अपनी हथेली ऊपर उठाते हुए बोलीं, 'मैं वापस आऊँगी.'</div>
<div> </div>
<div>उस दिन रात के खाने में सोनिया ने पास्ता बनाया था. मीठे में अमरूद की क्रीम और इलाहाबाद का मशहूर आम पापड़ था.आम पापड़ उन्हें हमेशा अपने बचपन की याद दिलाता था. खाने के बाद उन्होंने प्रियंका को बुलाया और कहा, 'मेरे साथ स्क्रैबल खेलो.'</div>
<div>अगले दिन इंदिरा को गिरफ़्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया.</div>
<div> </div>
<div>सागारिका घोष इंदिरा गांधी की जीवनी 'इंदिरा, इंडियाज़ मोस्ट पॉवरफ़ुल प्राइम मिनिस्टर' में लिखती हैं, "हज़ारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इंदिरा को जेल भेजे जाने के विरोध में गिरफ़्तारी दी."</div>
<div> </div>
<div>"दो व्यक्तियों देवेंद्र और भोलानाथ पांडे ने खिलौना पिस्तौल और क्रिकेट की गेंद की मदद से इंडियन एयरलाइंस के एक जहाज़ को हाइजैक करने की कोशिश की. वो लखनऊ से दिल्ली जाने वाली फ़्लाइट को वो ज़बरदस्ती बनारस ले गए."</div>
<div> </div>
<div>वहाँ उन्होंने इंदिरा गांधी की तुरंत रिहाई और संजय गांधी के ख़िलाफ़ सारे केस वापस लिए जाने की माँग की. दो साल बाद उन दोनों को उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए कांग्रेस का टिकट दिया गया और उन्होंने चुनाव मे जीत भी दर्ज की</div>
<div> </div>
<div>तिहाड़ में उन्हें उसी कोठरी में रखा गया जहाँ आपातकाल के दौरान जॉर्ज फ़र्नांडिस को रखा गया था. वहाँ उनकी दिनचर्या सुबह पाँच बजे शुरू हो जाती थी. पुपुल जयकर लिखती हैं, "उठते ही वो योगासन और प्राणायाम करती थीं. उसके बाद वो एक शाम पहले लाया गया ठंडा दूध पीती थीं जो सोनिया लाती थीं. उसके बाद वो फिर सोने चली जाती थी."</div>
<div> </div>
<div>
<blockquote class="format2">
<div>"उठने के बाद वो नहाती थीं, थोड़ी देर के लिए ध्यान करती थीं और किताब पढ़ती थीं. उन्हें जेल में छह किताबें लाने की अनुमति दी गई थी. उनका खाना उनके घर पर बनता था जिसे सोनिया गांधी खुद हर सुबह और शाम लाती थीं."</div>
<div> </div>
<div>कैथरीन फ़्रैंक इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, "इंदिरा गांधी को सोने के लिए लकड़ी का एक पलंग दिया गया था. लेकिन उस पर गद्दा नहीं था. खिड़कियों पर न तो पर्दे थे और न ही शीशे, सिर्फ़ सलाखें थीं."</div>
<div> </div>
<div>"दिसंबर के महीने में रात को काफ़ी ठंड हो जाती थी. इंदिरा ठंड से बचने के लिए खिड़की की सलाखों पर कंबल टाँग देती थीं और खुद रज़ाई ओढ़ कर सोती थीं."</div>
<div> </div>
<div>अगले दिन जेल के वार्डेन ने उन्हें बताया कि राजीव गांधी और सोनिया उनसे मिलने आए हैं.</div>
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<div>उन्हें ये देखकर बुरा लगा कि इंदिरा को इन परिस्थितियों में जेल में रहना पड़ रहा है.</div>
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<div>इंदिरा ने उनसे अपने पोते-पोती के बारे में पूछा.</div>
<div> </div>
<div>हाविए मोरो लिखते हैं, "राजीव ने इंदिरा से कहा, 'प्रियंका आपसे मिलने आना चाहती थीं. प्रियंका का नाम सुनते ही इंदिरा का चेहरा चमक उठा."</div>
<div> </div>
<div>"वो बोली 'अगली बार उसको भी लेकर आओ. उसके लिए ये देखना अच्छा होगा कि जेल किस तरह की होती है. नेहरू परिवार में शुरू से ही अपने परिवारजनों से मिलने जेल जाने की प्रथा है."</div>
<div> </div>
<div>अगली बार जब राजीव और सोनिया उनसे मिलने आए तो अपने साथ प्रियंका को भी लाए.</div>
<div> </div>
<div>चलते-चलते इंदिरा ने सोनिया से अनुरोध किया कि वो उनकी तरफ़ से चरण सिंह को फूलों का एक गुलदस्ता और एक जन्मदिन नोट भेज दें</div>
<div> </div>
<div>जनता पार्टी सरकार का कार्यकाल समाप्त होने में अभी तीन साल बाकी थे. लेकिन इंदिरा गांधी को अंदाज़ा हो चला था कि जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं में नेतृत्व को लेकर ज़बरदस्त खींचतान हो रही है.</div>
<div> </div>
<div>चरण सिंह प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से बहुत नाराज़ चल रहे थे. इंदिरा ने सोचा कि चरण सिंह की महत्वाकांक्षा को बढ़ावा देकर उनके और मोरारजी देसाई के बीच खाई को और चौड़ा किया जा सकता है.</div>
<div> </div>
<div>शायद चरण सिंह को फूल भेजने के पीछे यही मक़सद था.</div>
<div> </div>
<div>जैसे ही वो जेल से बाहर आईं चरण सिंह का एक पत्र उनका इंतज़ार कर रहा था जिसमें उन्हें उनके पोते के जन्म पर घर आने की दावत दी गई थी.</div>
<div> </div>
<div>पुपुल जयकर लिखती हैं, "जब इंदिरा गांधी चरण सिंह के घर पहुँचीं तो चरण सिंह और उनकी पत्नी ने अपने पोर्टिको में उनका स्वागत किया. दिलचस्प बात ये थी कि उस समारोह में मोरारजी देसाई को भी आमंत्रित किया गया था. इंदिरा और देसाई एक ही सोफ़े पर बैठे."</div>
<div> </div>
<div>"इस दौरान मोरारजी पूरी तरह से असहज दिखे. उन्होंने इंदिरा से एक शब्द भी बात नहीं की. इंदिरा ने चरण सिंह और उनकी पत्नी के साथ बहुत गर्मजोशी से बात की. उन्होंने मिठाई खाई और नवजात बच्चे को गोद में लेकर उसे आशीर्वाद दिया."</div>
<div> </div>
<div>जेल से रिहा होने के एक हफ़्ते बाद इंदिरा चिकमंगलूर गईं.</div>
<div> </div>
<div>वहाँ उन्होंने मतदाताओं को संबोधित करते हुए कहा, "आपके फ़ैसले को जनता सरकार ने ग़ैर-क़ानूनी तरीके से और जान-बूझकर नामंज़ूर कर दिया है."</div>
<div> </div>
<div>इस बीच इंदिरा गांधी ने मोरारजी सरकार को गिराने के लिए चरण सिंह को अपना समर्थन दे दिया. चरण सिंह ने 28 जुलाई, 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.</div>
<div> </div>
<div>शपथ लेते ही उन्होंने इंदिरा गांधी को आभार व्यक्त करने के लिए फ़ोन किया. उन्होंने कहा कि वो उनसे मिलने आएंगे.</div>
<div> </div>
<div>पहले वो बीजू पटनायक को देखने विलिंग्टन अस्पताल जाएंगे और वहाँ से लौटते हुए इंदिरा गांधी के निवास 12 विलिंग्टन क्रेसेंट पर रुकेंगे.</div>
<div> </div>
<div>सत्यपाल मलिक याद करते हैं, "लेकिन चरण सिंह के किसी रिश्तेदार ने अंतिम समय पर उनके कान भरे, अब आप प्रधानमंत्री हैं. आप क्यों उनके यहाँ जा रहे हैं, उनको आपसे मिलने आना चाहिए."</div>
<div> </div>
<div>नीरजा चौधरी अपनी किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' में लिखती हैं, "इंदिरा गांधी अपने घर के पोर्टिको में हाथों में गुलदस्ता लिए चरण सिंह का इंतज़ार कर रही थीं. उनके साथ कांग्रेस के करीब 25 वरिष्ठ नेता भी खड़े थे."</div>
<div> </div>
<div>"इंदिरा गांधी ने देखा कि चरण सिंह की कारों का काफ़िला उनके घर के सामने से बिना उनके गेट की तरफ़ मुड़े निकल गया. इंदिरा गांधी का चेहरा ग़ुस्से से लाल पड़ गया. उन्होंने गुलदस्ता ज़मीन पर फेंक दिया और घर के अंदर चली गईं."</div>
<div> </div>
<div>सत्यपाल मलिक ने मुझे बताया कि मैं उसी समय समझ गया कि चरण सिंह की सरकार बहुत अधिक दिनों तक चलने वाली नहीं.</div>
<div> </div>
<div>बाद में चरण सिंह ने इंदिरा गांधी से बात करने की कोशिश की लेकिन उनका जवाब था, 'अब नहीं.'</div>
<div> </div>
<div>19 अगस्त को इंदिरा गांधी ने चरण सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह को एक बार भी संसद का सामना किए बिना अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ गया.</div>
<div> </div>
<div>राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने लोकसभा भंग कर नए आम चुनाव की घोषणा की.</div>
<div> </div>
<div>हाविए मोरो लिखते हैं, "इंदिरा गांधी ने दो सूटकेसों में आधा दर्जन सूती साड़ियाँ, दो थर्मस एक गर्म पानी के लिए और दूसरा ठंडे दूध के लिए, दो कुशन, मूंगफली, थोड़े से ड्राई फ़्रूट और धूप से बचने के लिए एक छाता लेकर पूरे देश में चुनाव प्रचार के लिए निकल पड़ीं."</div>
<div> </div>
<div>"उन्होंने कुल 70 हज़ार किलोमीटर का रास्ता तय किया और औसतन रोज़ करीब 20 चुनावी सभाओं को संबोधित किया."</div>
<div> </div>
<div>मोरो ने अंदाज़ा लगाया कि भारत के हर चार मतदाता में से एक ने उन्हें या तो सुना या देखा.</div>
<div> </div>
<div>इंदिरा ने प्याज़ और आलू के दाम को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया. उनके चुनाव प्रचार का मुख्य संदेश था, 'चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें'</div>
<div> </div>
<div>इंदिरा की प्रधानमंत्री के रूप में वापसी</div>
<div> </div>
<div>6 जनवरी को मतगणना के पहले ही घंटे से संकेत आने लगे कि जिस महिला को जनता ने 33 महीने पहले 'इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया था, 'उसी महिला को जनता ने एक बार फिर प्रधानमंत्री बनाने का फ़ैसला कर लिया था.</div>
<div> </div>
<div>इंदिरा कांग्रेस को कुल 353 सीटें मिलीं.</div>
<div> </div>
<div>दो साल पहले सत्ता में आने वाली जनता पार्टी महज़ 31 सीटें जीत पाई.</div>
<div> </div>
<div>14 जनवरी, 1980 को उन्होंने चौथी बार राष्ट्रपति भवन के अशोक हॉल में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.</div>
<div> </div>
<div>जब एक विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा कि एक बार फिर भारत की नेता बनने पर आपको कैसा लग रहा है, इंदिरा का जवाब था, "मैं हमेशा ही भारत की नेता रही हूं।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</blockquote>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jan 2025 21:03:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>' इमरजेंसी ' की लोकप्रियता के मायने</title>
                                    <description><![CDATA[<p>कंगना रनौत की बहुचर्चित फिल्म ' इमरजेंसी ' बॉक्स आफिस पर हिट होती है या फ्लाफ ये कहना अभी कठिन है क्योंकि ; इमरजेंसी ' की ओपननिंग से कोई भी अनुमान लगना कठिन है।  इमरजेंसी ने दर्शकों को फिलहाल दो दिन तो अपनी और आकर्षित कर ये संकेत  दिए हैं कि ' इमरजेंसी ' आज भी कौतूहल का विषय है और किंचित लोकप्रिय भी।</p>
<p>सिनेप्लेक्स में फिल्म देखने वाली आज की पीढ़ी ने सचमुच की ' इमरजेंसी ' नहीं देखी ,इसलिए उसे भाजपा संसद कंगना रनौत '  की इमरजेंसी  ' में स्वाभाविक दिलचस्पी है। देश में आजादी के बाद पहली</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/147516/meaning-of-popularity-of-emergency"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-01/kangana-indira-a_d.jpg" alt=""></a><br /><p>कंगना रनौत की बहुचर्चित फिल्म ' इमरजेंसी ' बॉक्स आफिस पर हिट होती है या फ्लाफ ये कहना अभी कठिन है क्योंकि ; इमरजेंसी ' की ओपननिंग से कोई भी अनुमान लगना कठिन है।  इमरजेंसी ने दर्शकों को फिलहाल दो दिन तो अपनी और आकर्षित कर ये संकेत  दिए हैं कि ' इमरजेंसी ' आज भी कौतूहल का विषय है और किंचित लोकप्रिय भी।</p>
<p>सिनेप्लेक्स में फिल्म देखने वाली आज की पीढ़ी ने सचमुच की ' इमरजेंसी ' नहीं देखी ,इसलिए उसे भाजपा संसद कंगना रनौत '  की इमरजेंसी  ' में स्वाभाविक दिलचस्पी है। देश में आजादी के बाद पहली  और फिलहाल अंतिम बार ' इमरजेंसी  ' यानि आपातकाल 50  साल पहले लगा था। उस समय कांग्रेस का शासन था और प्रधानमंत्री के पद पर श्रीमती इंद्रा गाँधी आसीन थीं। इमरजेंसी  लागू होने के बाद विपक्षी नेताओं को चुन-चुन कर गिरफ्तार किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया था।आज की ' इमरजेंसी ' रजतपट की ' इमरजेंसी ' है। इसके जरिये तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को एक खलनायिका  के रूप में प्रस्तुत करना और इसके जरिये दिल्ली जीतने की एक अतृप्त अभिलाषा को पूरा करना है। चुनाव जितने के लिए ' इमरजेंसी ' की तर्ज पर पहले भी अनेक फ़िल्में बन चुकीं हैं।</p>
<p> असली ' इमरजेंसी ' 25 जून, 1975 को घोषित की गयी थी ,  इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल लगाए जाने पर अपनी मुहर लगाई थी। ये इमरजेंसी 21 मार्च, 1977 तक देशभर में लागू रही। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ये 21 महीने काफी विवादास्पद रहे। इन 21 महीनों में जो कुछ भी हुआ। सत्ता दल अभी भी कांग्रेस को समय-समय पर कोसते रहते हैं। संयोग से इन पंक्तियों का लेखक यानि मै समझदार हो चुका था ,लेकिन क़ानून की दृष्टि में नाबालिग था इसलिए औरों की तरह जेल नहीं गया।</p>
<p>उन  दिनों दूरदर्शन नहीं था केवल रेडियो था इसलिए  देश में इमरजेंसी लगाए जाने की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रेडियो के माध्यम से की थी। 26 जून, 1975 की सुबह इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर कहा, 'राष्ट्रपति ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी है। इसमें घबराने की कोई बात नहीं है।</p>
<p>मुझे अच्छी तरह से याद है कि  आपातकाल की घोषणा किए जाने के कुछ ही समय  पहले ही  सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले पर सशर्त रोक लगा दी, जिसमें लोकसभा के लिए उनके चुनाव को अमान्य घोषित किया गया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को संसदीय कार्यवाही से दूर रहने को भी कहा था । वैसे इमरजेंसी से पहले इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 1971 के लोकसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की थी।</p>
<p>तत्कालीन 521 सदस्यीय संसद में कांग्रेस ने 352 सीटें जीती थीं। दिसंबर 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान के युद्ध से आजाद कराकर इंदिरा गांधी आयरन लेडी के नाम से जानी जा रही थीं। इसके कुछ सालों बाद ही देश में इमरजेंसी की घोषणा ने आयरन लेडी के कामों पर ही सवाल खड़े कर दिए थे।</p>
<p>जिन परिस्थितियों में देश में पहली बार ' इमरजेंसी ' लगाईं गयी थी  उन दिनों के हालात आज के हालत जैसे ही थे।जैसे आज नरेंद्र मोदी की सरकार पर आरोप लगाए जा रहे हैं ठीक वैसे ही आरोप इंदिरा गांधी की सरकार पर लगाए जा रहे थे। । गुजरात में सरकार के खिलाफ छात्रों का नवनिर्माण आंदोलन चल रहा था। बिहार में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चल रहा था। 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे हड़ताल चल रही थी।</p>
<p>12 जून, 1975 का इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा के लिए चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया गया था। गुजरात चुनावों में पांच दलों के गठबंधन से कांग्रेस की हार और 26 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली ने इंदिरा गांधी की सरकार को मुश्किल में डाल दिया था। हलनिक आज का विपक्ष का गठबंधन मोदी जी कि लिए उतना खतरनाक नहीं बन पाया है।  </p>
<p>देश में यदि ' इमरजेंसी न लगती तो देश को भाजपा न मिलती। देश में नफरत की वो आंधी न चलती जो आज चल रही है।  इंदिरा गाँधी की ' इमरजेंसी में तमाम ज्यादतियां भी हुईं , लोगों की जबरन नसबंदी कराई  गयी, अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाये गए । लेकिन इमरजेंसी में नागरिक बोध भी बढ़ा ।  सरकारी दफ्तरों में अधिकारी कर्मचारी ही नहीं बल्कि रेलें ,बसें भी समय से चलने लगीं। लेकिन ' इमरजेंसी ' एक काला अध्याय बनी सो बनी। इस ' इमरजेंसी के लिए बाद में कांग्रेस और इंदिरा गाँधी परिवार के अनेक सदस्य सदन के भीतर और सदन के बाहर देश से माफ़ी भी मांग चुके हैं ,लेकिन भाजपा ने कांग्रेस को कभी माफ़ नहीं किया ,और आज तो ' इमरजेंसी ' पर फिल्म ही बना दी।</p>
<p>देश में ' इमरजेंसी पर पहले भी अनेक फ़िल्में बनी ।  ' किस्सा कुर्सी का' और आंधी जैसी फ़िल्में भी बनीं ,लेकिन वे भी कांग्रेस के खिलाफ वातावरण पैदा नहीं कर पायी।  पीछे वर्षों में कांग्रेस को खलनायक  साबित करने के लिए ' दी कश्मीर फाइल बनी,केरल फाइल बनी। फिल्मों के जरिये राजनेताओं को नायक और खलनायक बनाने की मुहीम जारी है। सरकार खुद इन फिल्मों का प्रमोशन करती है। हाल ही में ' दी साबरमती ' बनी।  खुद प्रधानमंत्री जी ने इनका प्रमोशन किया ।</p>
<p>' इमरजेंसी ' फिल्म के लिए भाजपा की वे संसद कंगना रनौत काम आयीं जो देश की आजादी का दिन 15  अगस्त 1947  नहीं 5  अगस्त 2014  मानतीं हैं। कंगना ने श्रीमती इंदिरा गाँधी की भूमिका में जान डालने की बहुत कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुईं।कंगना से पहले सुचित्रा सेन ने फिल्म ' आंधी ' में इंदिरा गाँधी बनने की कोशीश कीथी  ' इमरजेंसी देखकर लौटे हमरे मित्र बता रहे हैं कि  ' कंगना की ' इमरजेंसी ' इंदिरा गाँधी को खलनायक भी ढंग से नहीं बना पायी ,कोशिश जरूर की।</p>
<p>बेहतर होता की फिल्म के लिए कंगना की जगह प्रियंका वाड्रा को चुना जाता ।  एक तो कंगना के मेकअप का खर्च बचता ,दूसरे अभिनय में जान भी आती। दरअसल इंदिरा गाँधी की नकल करना आसान नहीं है। इंदिरा गाँधी को उनके अपराध के लिए देश की जनता ने असली ' इमरजेंसी के ढाई साल बाद ही माफ़ कर दिया था और प्रचंड बहुमत से जीतकर वापस सत्ता सौंपी थी।</p>
<p>आज की ' इमरजेंसी देखने वालों को ये जानना जरूरी है कि  जिस इंदिरा गाँधी को फिल्म के जरिये खलनायिका दिखाया गया है उसी इंदिरा गाँधी के साथ ही दस साल पहले तक देश ने कांग्रेस के  4  प्रधानमंत्री  चुने हैं। यानि जनता कभी की ' इमरजेंसी ' को भूल चुकी  है ।  भाजपा और भाजपा की सरकार बार-बार इमरजेंसी का जिक्र कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है ,लेकिन  उल्लू सीधा करना और बात है लेकिन हकीकत को झुठलाना और बात। फिर भी चूंकि कंगना की ' इमरजेंसी ' में इंदिरा गाँधी हैं इसलिए उनकी फिल्म की लागत तो निकल ही आएगी ,क्योंकि अंधभक्त दर्शक तो ये फिल्म देखेंगे ही ।  मुमकिन है कि  डबल इंजिन की सरकारें इस फिल्म को कर मुक्त घोषित कर दें ,</p>
<p>खबर है कि  पहले दिन जहां ' इमरजेंसी '  ने 2.5 करोड़ का बिजनेस किया था वहीं दूसरे दिन  ये आंकड़ा 2.74 करोड़ पहुंच गया है। इस हिसाब से फिल्म का कुल कलेक्शन 5.24 करोड़ रुपये पहुंच गया है। फिलहाल ये आंकड़ा अभी और बढ़ेगा और फिल्म को सप्ताहांत का भरपूर फायदा मिलता नजर आ रहा है।लेकिन प्रयागराज में महाकुम्भ के कारण ' इमरजेंसी ' उतना लाभ नहीं दे पा रही है जितना की अनुमान  लगाया गया था।</p>
<p>इस फिम के जरिये भाजपा यदि 2025  में दिल्ली विधानसभा जीत जाये तो मै मानूंगा की ' इमरजेंसी ' बंनाने का कुछ हासिल भाजपा को हुआ,कंगना रनौत को हुआ। दिल्ली जीतने के लिए भाजप जूते-चप्पल और साड़ियां तो पहले से बाँट रही  है। 'कंगना की ' इमरजेंसी ' कामयाब हो ,ऐसी मेरी शुभकामनायें हैं ,लेकिन मेरी शुभकामनायें कंगना कि कितने काम आएंगीं ,मै खुद नहीं जानता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/147516/meaning-of-popularity-of-emergency</link>
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                <pubDate>Sun, 19 Jan 2025 17:46:03 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व और कृतित्व नरेंद्र मोदी पर भारी ।</title>
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<div><strong>जे.पी.सिंह।</strong></div>
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<div>आज पूरा देश आपातकाल बनाम  अघोषित आपातकाल की बहस से गुजर रहा है।तो हमको याद रखना चाहिए कि जब आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार बनी थी और गिर गयी तब चुनावों में इंदिरा गाँधी की  वापसी हुई और तब इंदिरा सरकार ने जनता प्पर्टी सरकार द्वारा किये गये संविधान संशोधन को वापस नहीं किया न आपातकाल फिर दोहराया लेकिन इसके विपरीत बहुमत से कम आने के बावजूद नरन्द्र मोदी ने  तीसरी पारी दिल्ली  के सीएम केजरीवाल को सीबीआई से गिरफ्तार करवाकर शुरू की है। और संसद में स्पीकर से आपातकाल पर प्रस्ताव पेश करवाकर टकराव का रास्ता खोल</div></div></div></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142658/indira-gandhis-personality-and-work-outweigh-narendra-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/इंदिरा-गांधी-का-व्यक्तित्व-और-कृतित्व-नरेंद्र-मोदी-पर-भारी-।.jpg" alt=""></a><br /><div class="adn ads">
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<div><strong>जे.पी.सिंह।</strong></div>
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<div>आज पूरा देश आपातकाल बनाम  अघोषित आपातकाल की बहस से गुजर रहा है।तो हमको याद रखना चाहिए कि जब आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार बनी थी और गिर गयी तब चुनावों में इंदिरा गाँधी की  वापसी हुई और तब इंदिरा सरकार ने जनता प्पर्टी सरकार द्वारा किये गये संविधान संशोधन को वापस नहीं किया न आपातकाल फिर दोहराया लेकिन इसके विपरीत बहुमत से कम आने के बावजूद नरन्द्र मोदी ने  तीसरी पारी दिल्ली  के सीएम केजरीवाल को सीबीआई से गिरफ्तार करवाकर शुरू की है। और संसद में स्पीकर से आपातकाल पर प्रस्ताव पेश करवाकर टकराव का रास्ता खोल दिया है। इंदिरा गाँधी जो भी करती थीं डंके की चोट पर करती थीं जबकि नरेंद्र मोदी परदे के पीछे से घात लगाकर वार करने के लिए जाने जाते  हैं ।   </div>
<div> </div>
<div>इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना की तो इंदिरा गाँधी के खाते में बैंक राष्ट्रीयकरण , प्रिवी पर्स और पाकिस्तान के विभाजन के साथ परमाणु परीक्षण जैसी उपलब्धियां हैं जबकि मोदी के खाते में बहुमत का दुरूपयोग,अडानी अंबानी ,कार्पोरेट परस्ती ,ईडी ,सीबीआई का दुरूपयोग ,बिना सबूत के विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी ,पेगासस से जासूसी,सम्प्र५दयिक्त राजनीति ,गुजरात नरसंहार,अघोषित आपातकाल ,सरकारी संपत्तियों की बिक्री ,उछ शिक्षण संस्थाओं का अवमूल्यन जैसी कुख्यात उपलब्धियां हैं। इंदिरा गाँधी प्रेस से भागती नहीं थीं जबकि मोदी केवल प्रायोजित साक्षात्कार देते हैं । इंदिरा गाँधीधाराप्रवाह बोलती थीं जबकि मोदी बिना टेलीप्रोम्पटरके एक वाक्य नहीं बोल सकते ।   </div>
<div> </div>
<div><strong>दोनों नेताओं में समान क्या है- आज्ञाकारी राष्ट्रपति और राज्यपाल</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने राज्यपाल के पद का दुरुपयोग कर राज्यों में अपने पसंदीदा लोगों को बिठाया और तुच्छ आधार पर सरकारों को गिराने में उनका इस्तेमाल किया, जैसा कि 1969 में पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी की संयुक्त मोर्चा सरकार और 1984 में आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की सरकार के मामलों में देखा जा सकता है। केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद की सरकार को बर्खास्त करने का आदेश नेहरू ने दिया था, लेकिन अपनी राजनीतिक रूप से प्रतिभाशाली बेटी की सलाह पर।</div>
<div> </div>
<div>मोदी ने अपने राज्यपालों का इस्तेमाल कई राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया है, जैसा कि गोवा, मणिपुर, मेघालय और नागालैंड में देखा गया है। पिछले महीने, उन्होंने राज्यपाल का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी, उनकी अपनी भाजपा, सत्ता में आए। बिल्कुल विपरीत कदम, कोई सार्वजनिक नैतिकता नहीं, और संविधान की व्याख्या मनमाने ढंग से बदल रही है।</div>
<div>इंदिरा गांधी ने पार्टी के दब्बू नेताओं को राष्ट्रपति के रूप में चुना, चाहे वह ज्ञानी जैल सिंह हों जो कुख्यात रूप से उनके लिए कार का दरवाज़ा खोलते थे, या फ़ख़रुद्दीन अली अहमद जो 19 महीने लंबे आपातकाल का समर्थन करते थे। मोदी ने भाजपा के वफादारों को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया है।</div>
<div> </div>
<div><strong>संसद और संविधान के प्रति कम सम्मान</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने अपनी स्थिति और विचारधारा को मजबूत करने, संघवाद की कीमत पर केंद्र को मजबूत करने और नागरिकों की स्वतंत्रता को कम करने के लिए कानून और संविधान में अधिकतम संशोधन किए। उन्होंने संसद में सीमित उपस्थिति बनाए रखी और यहां तक कि कैबिनेट मंत्रियों को भी कई फैसलों (आपातकाल और बैंक राष्ट्रीयकरण दो महत्वपूर्ण फैसले) के बारे में उनके लिए जाने के बाद पता चलता था।</div>
<div>इंदिरा गांधी ने संविधान में अधिकतम संशोधन किए और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इसके कई पहलुओं को बदला। मोदी ने इस साल के बजट सहित 40 से अधिक विधेयकों को बिना किसी चर्चा के पारित करवा लिया। </div>
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<div>मोदी का संसद के प्रति और भी कम सम्मान है। उन्होंने पिछले सत्र में केंद्रीय बजट सहित 40 से अधिक विधेयक बिना चर्चा के पारित करवा लिए। नोटबंदी आदि सहित कई निर्णय पहले प्रधानमंत्री और उनके करीबी लोगों द्वारा लिए गए और उसके बाद ही उन्हें कैबिनेट और विधानमंडल के साथ साझा किया गया। संसद के पिछले सत्र में, मोदी के एक और वफादार अध्यक्ष ने सुनिश्चित किया कि विपक्ष के प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव को आगे न बढ़ाया जा सके।</div>
<div> </div>
<div><strong>समझौतावादी आरबीआई, बैंकिंग प्रणाली और क्रोनी पूंजीवाद।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को अपने इशारे पर काम करने दिया। उन्होंने मुद्रा से जुड़े फैसले एकतरफा लिए। 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में बिरला, टाटा और मफतलाल जैसे क्रोनी पूंजीपतियों का बोलबाला था। मोदी ने काले धन पर लगाम लगाने, आतंकी वित्तपोषण की कमर तोड़ने, डिजिटल अर्थव्यवस्था लाने और नकली मुद्रा को खत्म करने के नाम पर प्रचलन में मौजूद 86% मुद्रा को बंद कर दिया। इनमें से कोई भी पूरी तरह या पूरी तरह से हासिल नहीं हुआ है, और अर्थव्यवस्था में बराबर या उससे ज़्यादा नकदी वापस आ गई है,। लेकिन सीमा पार या आंतरिक आतंकवाद का कोई अंत नहीं हुआ है। आरबीआई की स्वायत्तता तार-तार हो चुकी है। अंबानी, अडानी और रुइया जैसे कारोबारी समूह आज राज कर रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div><strong>पाकिस्तान और मुसलमान का डर।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की धमकी का इस्तेमाल किया और बांग्लादेश की आजादी के लिए सफल लड़ाई के बाद भी, जिसकी घरेलू स्तर पर काफी प्रशंसा हुई, उन्होंने इस डर को जिंदा रखा। उन्होंने भारत में चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान के प्रति नफरत का इस्तेमाल किया।</div>
<div>मोदी ने पाकिस्तान के डर का पूरा इस्तेमाल किया है, भले ही उन्होंने नवाज शरीफ के घर अचानक जाकर भारतीय वायुसेना के अड्डे पर हमले की जमीनी जांच के लिए उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को पठानकोट बुलाया हो।</div>
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<div>सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक का खूब प्रचार किया गया, लेकिन सीमा पार हमलों में कोई कमी नहीं आई है। और पाकिस्तान को हर चुनाव अभियान में घसीटा जाता है; मोदी ने तो यहां तक कह दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुजरात चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान की मदद मांगी थी। कहने की जरूरत नहीं कि यह बेतुका आरोप चुनाव खत्म होने के दिन ही खत्म हो गया, लेकिन कर्नाटक में फिर से उछाला गया।18वीं लोकसभा का चुनाव मोदी ने मुसलमान और मंगल सूत्र छीन लिए जाने का भय दिखाकर लदा है जो किसी से छिपा नहीं है ।</div>
<div> </div>
<div><strong>प्रतिबद्ध  न्यायपालिका ।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने एक दब्बू सुप्रीम कोर्ट सुनिश्चित किया, जस्टिस एएन रे को तीन अन्य को दरकिनार करके भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया, और अपने पसंदीदा सेना जनरलों को बारी-बारी से शीर्ष पदों पर बिठाया। उनके शासन ने न्यायाधीशों के इतिहास के आधार पर उच्च न्यायालयों में नियुक्तियाँ सुनिश्चित कीं।</div>
<div>कम से कम नौ उच्च न्यायालयों ने कहा कि आपातकाल की घोषणा के बाद भी कोई व्यक्ति अपनी हिरासत को चुनौती दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने, तब जस्टिस रे के नेतृत्व में, इन सभी को खारिज कर दिया, और राज्य की उस दलील को बरकरार रखा जिसमें किसी व्यक्ति को गिरफ़्तारी के कारणों/आधारों के बारे में बताए बिना उसे हिरासत में रखने या उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निलंबित करने या उसे जीवन के अधिकार से वंचित करने के अधिकार के लिए राज्य को पूर्ण रूप से अधिकार दिया गया था (बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला)।</div>
<div> </div>
<div>आज सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सरकार के दबाव की ओर इशारा करते हुए संवेदनशील मामलों के अनियमित आवंटन की ओर इशारा किया है।न्यायपालिका में वैचारिक रूप से  प्रतिबद्द  कैडर जजों की नियुक्ति की जा रही है जो सरकारी नीतियों की राष्ट्रवाद के नाम पर पुष्टि कर रहे  हैं।जजों  की  नियुक्ति में देरी करना न्यायपालिका पर दबाव बनाने का एक और तरीका है; पूर्व सीजेआई टीएस ठाकुर ने कई बार इस समस्या को उठाया है। जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में इसलिए नहीं भेजा गया क्योंकि उनके पिछले फैसले सरकार की आलोचना करते थे। यह एक खुला रहस्य है।</div>
<div> </div>
<div><strong>प्रेस की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों पर अंकुश ।</strong></div>
<div>आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर रूप से अंकुश लगाया गया था, जबकि आधिकारिक रूप से दी गई जानकारी से परे जानकारी साझा करने के मामले में मोदी मीडिया की अनदेखी कर रहे हैं।</div>
<div>इंदिरा गांधी को खास तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता और आम तौर पर नागरिकों की राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई सम्मान नहीं था। उन्होंने आपातकाल की घोषणा की, नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया और प्रेस की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से सीमित कर दिया। 1970 के दशक के मध्य में उनकी सरकार द्वारा छात्रों के राजनीतिक अधिकारों पर गंभीर रूप से अंकुश लगाया गया और परिसरों में आतंक का राज कायम किया गया।</div>
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<div>मोदी को मीडिया के साथ और भी अधिक समझौता करने के लिए जाना जाता है, जो उन्हें दी गई जानकारी से परे किसी भी जानकारी को साझा करने में उनकी उपेक्षा करते हैं, आलोचनात्मक कवरेज की अनुपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए मीडिया मालिकों का उपयोग करते हैं, और अब कहा जाता है कि वे संवेदनशीलता और राष्ट्रीय हितों के आधार पर सूचना देने से इनकार करके आरटीआई अधिनियम को भारी रूप से कमजोर करने के अलावा ऑनलाइन मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास कर रहे हैं।</div>
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<div><strong>यद्यपि मोदी ने आपातकाल की घोषणा नहीं की है, लेकिन अघोषित आपातकाल चल रहा है। </strong></div>
<div>आज विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक-राजनीतिक तनाव अपने सबसे बुरे दौर में है, क्योंकि गोमांस या गाय के व्यापार, घर वापसी के दावे, लव जिहाद के विवाद, कुछ राज्यों में बलात्कारियों के साथ सत्तारूढ़ पार्टी का खड़ा होना आदि जैसे मुद्दों पर भीड़ द्वारा हत्या और गुंडागर्दी हो रही है। प्रतिशोध की राजनीति के कारण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय सहित विश्वविद्यालय परिसरों और संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार संघर्ष हो रहे हैं।जिसे चाहे बिना ठोस साबुत के यूएपीए पीएमएलए जैसे काले कानूनों में बुक कर दिया जा रहा है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण भीमा कोरेगांव में बंद दर्जनों बुद्धिजीवी,मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और सामजिक कार्यकर्ता हैं । सरकारी नीतियों की आलोचना आज सबसे बड़ा अपराध बन गया है। </div>
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<div><strong>नौकरशाही का वर्चस्व।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी किसी चुनौती को बर्दाश्त नहीं करती थीं और अक्सर पहले निर्णय लेती थीं और बाद में मंत्रिमंडल से उस पर मुहर लगाने के लिए कहती थीं। मोदी के मंत्रिमंडल में न तो ऐसे दिग्गज हैं जो जमीनी स्तर से उठकर उनके सामने खड़े हो सकें, न ही उनके मंत्रिमंडल के साथ इंदिरा गांधी से कोई अलग व्यवहार है। औसत दर्जे के पसंदीदा लोगों को अहम मंत्रालय सौंपकर, संभावित चुनौती देने वालों को चुप कराकर और मंत्रियों की संख्या और गुणवत्ता की कमी से जूझते हुए, मोदी ने एक-व्यक्ति सरकार और पीएमओ को सत्ता का सबसे शक्तिशाली केंद्र बनाने की कला को निखारा है ।मोदी राज में किसी मंत्री की कोई हैसियत नहीं है ,यहाँ तक की उनके पीएस तक पीएमओ से दिए जाते हैं। </div>
<div> </div>
<div><strong>संस्थाओं को कमजोर करना</strong></div>
<div>दोनों के बीच अगली समानता भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के साथ उनके व्यवहार का तरीका है। इंदिरा युग में मुख्य चुनाव आयुक्त पीएमओ के निर्देशों पर काम करने के लिए जाने जाते थे। आज, चुनाव आयोग (ईसीआई) पूरी तरह मोदी के इशारों पर नाच रहा है ।</div>
<div>इंदिरा गांधी के शासनकाल में मुख्य चुनाव आयुक्तों को पीएमओ के निर्देशों पर काम करने के लिए जाना जाता था। मोदी राज  में चुनाव आयोग ने भी ऐसा ही किया है।</div>
<div>इंदिरा गांधी और मोदी ने विरोधियों को डराने के लिए 'पिंजरे में बंद तोते' - केंद्रीय जांच ब्यूरो - और प्रवर्तन निदेशालय और खुफिया ब्यूरो का भी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया है। </div>
<div> </div>
<div>असीमित शक्ति की अपनी बेधड़क खोज में इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका - सुप्रीम कोर्ट, संसद, कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी, राष्ट्रपति का कार्यालय, नौकरशाही का इस्पात ढांचा - और यहां तक कि चौथे स्तंभ (मीडिया) सहित लगभग सभी संवैधानिक संस्थानों को निर्दयतापूर्वक कमजोर कर दिया। उनका उद्देश्य हर किसी को अपनी लाइन में लाना या अपने एजेंडे को पूरा करना था। यही कारण है कि बैंकों और अन्य उद्योगों के राष्ट्रीयकरण या अलोकप्रिय प्रिवी पर्स के उन्मूलन जैसे उनके कुछ बहुत ही सकारात्मक कार्यों में भी अभी भी एक विरोधाभासी छवि थी और उन निर्णयों में अधिकारपूर्ण प्रवृत्ति ने टाले जा सकने वाले विवादों और आलोचनाओं को जन्म दिया।</div>
<div>भारत वर्तमान में सभी संस्थाओं और संवैधानिक प्राधिकार के स्रोतों की स्वतंत्रता और प्रभावकारिता में इसी प्रकार की गिरावट से गुजर रहा है, जबकि अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं की गई है और भ्रष्टाचार के कई कथित मामलों, जैसे बिड़ला-सहारा डायरी, छत्तीसगढ़ में पीडीएस घोटाला आदि में कोई जांच शुरू नहीं की गई है।</div>
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<div><strong>नारेबाजी की समानता ।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने प्रभावी ढंग से नारा लगाया, “वे इंदिरा को बाहर करना चाहते हैं, मैं गरीबी को बाहर करना चाहता हूं।” मोदी इसे बड़े आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल करते हैं, “वे मोदी को बाहर करना चाहते हैं, मैं भ्रष्टाचार को बाहर करना चाहता हूं।” जीवन से बड़ी छवि, मीडिया का भरपूर उपयोग करना (और आज के संदर्भ में, सोशल मीडिया), झूठ और तथ्यों को मिलाकर एक ईश्वरीय छवि बनाना आदि, इंदिरा गांधी और मोदी दोनों की व्यक्तिगत शैली की पहचान है।</div>
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<div>उन्होंने अपनी पार्टी के अध्यक्ष डीके बरुआ से कहलवाया, “इंदिरा भारत है, भारत इंदिरा है”। मोदी ने अपने दूसरे व्यक्तित्व को पार्टी का नेतृत्व करने और बिना कोई सवाल किए अपने एजेंडे पर काम करने के लिए कहा। दोनों प्रधानमंत्रियों ने स्थिरता और एक मजबूत नेतृत्व के डर को सत्ता पाने और उसमें बने रहने के अपने उद्देश्य के रूप में इस्तेमाल किया । वे जिस भी सार्वजनिक कार्यक्रम में जाते हैं, वहां “मोदी, मोदी” का नारा लगाया जाता है।</div>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/142658/indira-gandhis-personality-and-work-outweigh-narendra-modi</link>
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                <pubDate>Sun, 30 Jun 2024 17:36:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व और कृतित्व नरेंद्र मोदी पर भारी ।</title>
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<div>इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना की तो इंदिरा गाँधी के खाते में बैंक राष्ट्रीयकरण , प्रिवी पर्स और पाकिस्तान के विभाजन के साथ परमाणु परीक्षण जैसी उपलब्धियां हैं जबकि मोदी के खाते में बहुमत का दुरूपयोग,अडानी अंबानी ,कार्पोरेट परस्ती ,ईडी ,सीबीआई का दुरूपयोग ,बिना सबूत के विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी ,पेगासस से जासूसी,सम्प्र५दयिक्त राजनीति ,गुजरात नरसंहार,अघोषित आपातकाल ,सरकारी संपत्तियों की बिक्री ,उछ शिक्षण संस्थाओं का अवमूल्यन जैसी कुख्यात उपलब्धियां हैं। इंदिरा गाँधी प्रेस से भागती नहीं थीं जबकि मोदी केवल प्रायोजित साक्षात्कार देते हैं । इंदिरा गाँधीधाराप्रवाह बोलती थीं जबकि मोदी बिना टेलीप्रोम्पटरके एक वाक्य नहीं बोल सकते ।   </div>
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<div>दोनों नेताओं में समान क्या है-</div>
<div>आज्ञाकारी राष्ट्रपति और राज्यपाल</div>
<div>इंदिरा गांधी ने राज्यपाल के पद का दुरुपयोग कर राज्यों में अपने पसंदीदा लोगों को बिठाया और तुच्छ आधार पर सरकारों को गिराने में उनका इस्तेमाल किया, जैसा कि 1969 में पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी की संयुक्त मोर्चा सरकार और 1984 में आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की सरकार के मामलों में देखा जा सकता है। केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद की सरकार को बर्खास्त करने का आदेश नेहरू ने दिया था, लेकिन अपनी राजनीतिक रूप से प्रतिभाशाली बेटी की सलाह पर।</div>
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<div>मोदी ने अपने राज्यपालों का इस्तेमाल कई राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया है, जैसा कि गोवा, मणिपुर, मेघालय और नागालैंड में देखा गया है। पिछले महीने, उन्होंने राज्यपाल का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी, उनकी अपनी भाजपा, सत्ता में आए। बिल्कुल विपरीत कदम, कोई सार्वजनिक नैतिकता नहीं, और संविधान की व्याख्या मनमाने ढंग से बदल रही है।</div>
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<div>इंदिरा गांधी ने पार्टी के दब्बू नेताओं को राष्ट्रपति के रूप में चुना, चाहे वह ज्ञानी जैल सिंह हों जो कुख्यात रूप से उनके लिए कार का दरवाज़ा खोलते थे, या फ़ख़रुद्दीन अली अहमद जो 19 महीने लंबे आपातकाल का समर्थन करते थे। मोदी ने भाजपा के वफादारों को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया है।</div>
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<div><strong>संसद और संविधान के प्रति कम सम्मान</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने अपनी स्थिति और विचारधारा को मजबूत करने, संघवाद की कीमत पर केंद्र को मजबूत करने और नागरिकों की स्वतंत्रता को कम करने के लिए कानून और संविधान में अधिकतम संशोधन किए। उन्होंने संसद में सीमित उपस्थिति बनाए रखी और यहां तक कि कैबिनेट मंत्रियों को भी कई फैसलों (आपातकाल और बैंक राष्ट्रीयकरण दो महत्वपूर्ण फैसले) के बारे में उनके लिए जाने के बाद पता चलता था।</div>
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<div>इंदिरा गांधी ने संविधान में अधिकतम संशोधन किए और अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इसके कई पहलुओं को बदला। मोदी ने इस साल के बजट सहित 40 से अधिक विधेयकों को बिना किसी चर्चा के पारित करवा लिया। </div>
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<div>मोदी का संसद के प्रति और भी कम सम्मान है। उन्होंने पिछले सत्र में केंद्रीय बजट सहित 40 से अधिक विधेयक बिना चर्चा के पारित करवा लिए। नोटबंदी आदि सहित कई निर्णय पहले प्रधानमंत्री और उनके करीबी लोगों द्वारा लिए गए और उसके बाद ही उन्हें कैबिनेट और विधानमंडल के साथ साझा किया गया। संसद के पिछले सत्र में, मोदी के एक और वफादार अध्यक्ष ने सुनिश्चित किया कि विपक्ष के प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव को आगे न बढ़ाया जा सके।</div>
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<div><strong>समझौतावादी आरबीआई, बैंकिंग प्रणाली और क्रोनी पूंजीवाद।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को अपने इशारे पर काम करने दिया। उन्होंने मुद्रा से जुड़े फैसले एकतरफा लिए। 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में बिरला, टाटा और मफतलाल जैसे क्रोनी पूंजीपतियों का बोलबाला था।</div>
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<div>मोदी ने काले धन पर लगाम लगाने, आतंकी वित्तपोषण की कमर तोड़ने, डिजिटल अर्थव्यवस्था लाने और नकली मुद्रा को खत्म करने के नाम पर प्रचलन में मौजूद 86% मुद्रा को बंद कर दिया। इनमें से कोई भी पूरी तरह या पूरी तरह से हासिल नहीं हुआ है, और अर्थव्यवस्था में बराबर या उससे ज़्यादा नकदी वापस आ गई है,। लेकिन सीमा पार या आंतरिक आतंकवाद का कोई अंत नहीं हुआ है। आरबीआई की स्वायत्तता तार-तार हो चुकी है। अंबानी, अडानी और रुइया जैसे कारोबारी समूह आज राज कर रहे हैं।</div>
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<div><strong>पाकिस्तान और मुसलमान का डर ।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की धमकी का इस्तेमाल किया और बांग्लादेश की आजादी के लिए सफल लड़ाई के बाद भी, जिसकी घरेलू स्तर पर काफी प्रशंसा हुई, उन्होंने इस डर को जिंदा रखा। उन्होंने भारत में चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान के प्रति नफरत का इस्तेमाल किया।</div>
<div>मोदी ने पाकिस्तान के डर का पूरा इस्तेमाल किया है, भले ही उन्होंने नवाज शरीफ के घर अचानक जाकर भारतीय वायुसेना के अड्डे पर हमले की जमीनी जांच के लिए उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को पठानकोट बुलाया हो।</div>
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<div>सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक का खूब प्रचार किया गया, लेकिन सीमा पार हमलों में कोई कमी नहीं आई है। और पाकिस्तान को हर चुनाव अभियान में घसीटा जाता है; मोदी ने तो यहां तक कह दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुजरात चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान की मदद मांगी थी। कहने की जरूरत नहीं कि यह बेतुका आरोप चुनाव खत्म होने के दिन ही खत्म हो गया, लेकिन कर्नाटक में फिर से उछाला गया।18वीं लोकसभा का चुनाव मोदी ने मुसलमान और मंगल सूत्र छीन लिए जाने का भय दिखाकर लदा है जो किसी से छिपा नहीं है ।</div>
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<div><strong>प्रतिबद्ध  न्यायपालिका ।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने एक दब्बू सुप्रीम कोर्ट सुनिश्चित किया, जस्टिस एएन रे को तीन अन्य को दरकिनार करके भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया, और अपने पसंदीदा सेना जनरलों को बारी-बारी से शीर्ष पदों पर बिठाया। उनके शासन ने न्यायाधीशों के इतिहास के आधार पर उच्च न्यायालयों में नियुक्तियाँ सुनिश्चित कीं।</div>
<div>कम से कम नौ उच्च न्यायालयों ने कहा कि आपातकाल की घोषणा के बाद भी कोई व्यक्ति अपनी हिरासत को चुनौती दे सकता है।</div>
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<div>सुप्रीम कोर्ट ने, तब जस्टिस रे के नेतृत्व में, इन सभी को खारिज कर दिया, और राज्य की उस दलील को बरकरार रखा जिसमें किसी व्यक्ति को गिरफ़्तारी के कारणों/आधारों के बारे में बताए बिना उसे हिरासत में रखने या उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निलंबित करने या उसे जीवन के अधिकार से वंचित करने के अधिकार के लिए राज्य को पूर्ण रूप से अधिकार दिया गया था (बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला)।</div>
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<div>आज सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सरकार के दबाव की ओर इशारा करते हुए संवेदनशील मामलों के अनियमित आवंटन की ओर इशारा किया है।न्यायपालिका में वैचारिक रूप से  प्रतिबद्द  कैडर जजों की नियुक्ति की जा रही है जो सरकारी नीतियों की राष्ट्रवाद के नाम पर पुष्टि कर रहे  हैं।जजों  की  नियुक्ति में देरी करना न्यायपालिका पर दबाव बनाने का एक और तरीका है; पूर्व सीजेआई टीएस ठाकुर ने कई बार इस समस्या को उठाया है। जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में इसलिए नहीं भेजा गया क्योंकि उनके पिछले फैसले सरकार की आलोचना करते थे। यह एक खुला रहस्य है।</div>
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<div><strong>प्रेस की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों पर अंकुश ।</strong></div>
<div>आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर रूप से अंकुश लगाया गया था, जबकि आधिकारिक रूप से दी गई जानकारी से परे जानकारी साझा करने के मामले में मोदी मीडिया की अनदेखी कर रहे हैं। इंदिरा गांधी को खास तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता और आम तौर पर नागरिकों की राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई सम्मान नहीं था। उन्होंने आपातकाल की घोषणा की, नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया और प्रेस की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से सीमित कर दिया। 1970 के दशक के मध्य में उनकी सरकार द्वारा छात्रों के राजनीतिक अधिकारों पर गंभीर रूप से अंकुश लगाया गया और परिसरों में आतंक का राज कायम किया गया।</div>
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<div>मोदी को मीडिया के साथ और भी अधिक समझौता करने के लिए जाना जाता है, जो उन्हें दी गई जानकारी से परे किसी भी जानकारी को साझा करने में उनकी उपेक्षा करते हैं, आलोचनात्मक कवरेज की अनुपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए मीडिया मालिकों का उपयोग करते हैं, और अब कहा जाता है कि वे संवेदनशीलता और राष्ट्रीय हितों के आधार पर सूचना देने से इनकार करके आरटीआई अधिनियम को भारी रूप से कमजोर करने के अलावा ऑनलाइन मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास कर रहे हैं।</div>
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<div>यद्यपि मोदी ने आपातकाल की घोषणा नहीं की है, लेकिन अघोषित आपातकाल चल रहा है। आज विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक-राजनीतिक तनाव अपने सबसे बुरे दौर में है, क्योंकि गोमांस या गाय के व्यापार, घर वापसी के दावे, लव जिहाद के विवाद, कुछ राज्यों में बलात्कारियों के साथ सत्तारूढ़ पार्टी का खड़ा होना आदि जैसे मुद्दों पर भीड़ द्वारा हत्या और गुंडागर्दी हो रही है। प्रतिशोध की राजनीति के कारण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय सहित विश्वविद्यालय परिसरों और संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार संघर्ष हो रहे हैं।जिसे चाहे बिना ठोस साबुत के यूएपीए पीएमएलए जैसे काले कानूनों में बुक कर दिया जा रहा है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण भीमा कोरेगांव में बंद दर्जनों बुद्धिजीवी,मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और सामजिक कार्यकर्ता हैं । सरकारी नीतियों की आलोचना आज सबसे बड़ा अपराध बन गया है। </div>
<div>नौकरशाही का वर्चस्व ।</div>
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<div>इंदिरा गांधी किसी चुनौती को बर्दाश्त नहीं करती थीं और अक्सर पहले निर्णय लेती थीं और बाद में मंत्रिमंडल से उस पर मुहर लगाने के लिए कहती थीं। मोदी के मंत्रिमंडल में न तो ऐसे दिग्गज हैं जो जमीनी स्तर से उठकर उनके सामने खड़े हो सकें, न ही उनके मंत्रिमंडल के साथ इंदिरा गांधी से कोई अलग व्यवहार है। औसत दर्जे के पसंदीदा लोगों को अहम मंत्रालय सौंपकर, संभावित चुनौती देने वालों को चुप कराकर और मंत्रियों की संख्या और गुणवत्ता की कमी से जूझते हुए, मोदी ने एक-व्यक्ति सरकार और पीएमओ को सत्ता का सबसे शक्तिशाली केंद्र बनाने की कला को निखारा है ।मोदी राज में किसी मंत्री की कोई हैसियत नहीं है ,यहाँ तक की उनके पीएस तक पीएमओ से दिए जाते हैं। </div>
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<div><strong>संस्थाओं को कमजोर करना</strong></div>
<div>दोनों के बीच अगली समानता भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के साथ उनके व्यवहार का तरीका है। इंदिरा युग में मुख्य चुनाव आयुक्त पीएमओ के निर्देशों पर काम करने के लिए जाने जाते थे। आज, चुनाव आयोग (ईसीआई) पूरी तरह मोदी के इशारों पर नाच रहा है । इंदिरा गांधी के शासनकाल में मुख्य चुनाव आयुक्तों को पीएमओ के निर्देशों पर काम करने के लिए जाना जाता था। मोदी राज  में चुनाव आयोग ने भी ऐसा ही किया है।</div>
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<div>इंदिरा गांधी और मोदी ने विरोधियों को डराने के लिए 'पिंजरे में बंद तोते' - केंद्रीय जांच ब्यूरो - और प्रवर्तन निदेशालय और खुफिया ब्यूरो का भी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया है। असीमित शक्ति की अपनी बेधड़क खोज में इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका - सुप्रीम कोर्ट, संसद, कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी, राष्ट्रपति का कार्यालय, नौकरशाही का इस्पात ढांचा - और यहां तक कि चौथे स्तंभ (मीडिया) सहित लगभग सभी संवैधानिक संस्थानों को निर्दयतापूर्वक कमजोर कर दिया। उनका उद्देश्य हर किसी को अपनी लाइन में लाना या अपने एजेंडे को पूरा करना था। यही कारण है कि बैंकों और अन्य उद्योगों के राष्ट्रीयकरण या अलोकप्रिय प्रिवी पर्स के उन्मूलन जैसे उनके कुछ बहुत ही सकारात्मक कार्यों में भी अभी भी एक विरोधाभासी छवि थी और उन निर्णयों में अधिकारपूर्ण प्रवृत्ति ने टाले जा सकने वाले विवादों और आलोचनाओं को जन्म दिया।</div>
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<div>भारत वर्तमान में सभी संस्थाओं और संवैधानिक प्राधिकार के स्रोतों की स्वतंत्रता और प्रभावकारिता में इसी प्रकार की गिरावट से गुजर रहा है, जबकि अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं की गई है और भ्रष्टाचार के कई कथित मामलों, जैसे बिड़ला-सहारा डायरी, छत्तीसगढ़ में पीडीएस घोटाला आदि में कोई जांच शुरू नहीं की गई है।</div>
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<div><strong>नारेबाजी की समानता ।</strong></div>
<div>इंदिरा गांधी ने प्रभावी ढंग से नारा लगाया, “वे इंदिरा को बाहर करना चाहते हैं, मैं गरीबी को बाहर करना चाहता हूं।” मोदी इसे बड़े आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल करते हैं, “वे मोदी को बाहर करना चाहते हैं, मैं भ्रष्टाचार को बाहर करना चाहता हूं।” जीवन से बड़ी छवि, मीडिया का भरपूर उपयोग करना (और आज के संदर्भ में, सोशल मीडिया), झूठ और तथ्यों को मिलाकर एक ईश्वरीय छवि बनाना आदि, इंदिरा गांधी और मोदी दोनों की व्यक्तिगत शैली की पहचान है।</div>
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<div>उन्होंने अपनी पार्टी के अध्यक्ष डीके बरुआ से कहलवाया, “इंदिरा भारत है, भारत इंदिरा है”। मोदी ने अपने दूसरे व्यक्तित्व को पार्टी का नेतृत्व करने और बिना कोई सवाल किए अपने एजेंडे पर काम करने के लिए कहा। दोनों प्रधानमंत्रियों ने स्थिरता और एक मजबूत नेतृत्व के डर को सत्ता पाने और उसमें बने रहने के अपने उद्देश्य के रूप में इस्तेमाल किया । वे जिस भी सार्वजनिक कार्यक्रम में जाते हैं, वहां “मोदी, मोदी” का नारा लगाया जाता है।</div>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Jun 2024 16:23:54 +0530</pubDate>
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                <title>'इमर्जेंसी' मुद्दा कितना प्रासंगिक है आज </title>
                                    <description><![CDATA[<div>एनडीए ने 25 जून को काला दिवस मनाया इसका कारण था कि 25 जून सन् 1975 को उस समय की देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित की थी। हालांकि उस समय क्या हालात थे इमरजेंसी सही थी या ग़लत मैं इस मुद्दे पर नहीं जाना चाहता। लेकिन प्रश्न यह है कि आज 50 साल बाद उस समय देश में लगी इमरजेंसी का मुद्दा आज की तारीख में कितना प्रासंगिक है। भारतीय जनता पार्टी बीच-बीच में इमरजेंसी को लेकर कांग्रेस को घेरती चली आ रही है। 1975 में जब देश में इमरजेंसी लगी थी उस समय को समझने वाले</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142546/how-relevant-is-the-emergency-issue-today%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/667a70f7cd9ca-indira-gandhi-252542690-16x9-(1).jpg" alt=""></a><br /><div>एनडीए ने 25 जून को काला दिवस मनाया इसका कारण था कि 25 जून सन् 1975 को उस समय की देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित की थी। हालांकि उस समय क्या हालात थे इमरजेंसी सही थी या ग़लत मैं इस मुद्दे पर नहीं जाना चाहता। लेकिन प्रश्न यह है कि आज 50 साल बाद उस समय देश में लगी इमरजेंसी का मुद्दा आज की तारीख में कितना प्रासंगिक है। भारतीय जनता पार्टी बीच-बीच में इमरजेंसी को लेकर कांग्रेस को घेरती चली आ रही है। 1975 में जब देश में इमरजेंसी लगी थी उस समय को समझने वाले आज बहुत ही कम लोग होंगे और जो जीवित होंगे और इसके जानकार होंगे उनकी उम्र कम से कम 70 साल होगी। आज की युवा पीढ़ी को तो इस विषय में ज्ञान ही नहीं होगा। लेकिन आपसी तकरार में इस ज्वलंत मुद्दे को उठाना</div>
<div> </div>
<div>भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना असरकारक होगा। कांग्रेस ने इसके जबाब में कहा है कि आज भी देश में अघोषित इमरजेंसी लगी है बस फर्क यह है कि इसकी घोषणा नहीं हुई है।‌ अठाहरवीं लोकसभा के पहले दिन सदन में पक्ष और विपक्ष  दोनो ने 'इमरजेंसी' का मुद्दा उठाया। विपक्ष के हो-हल्ले के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 25 जून 1975 को उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपी गई इमरजेंसी का जिक्र किया और इसे देश के लोकतंत्र पर धब्बा बताया। वहीं कांग्रेस ने आरोप लगाया कि देश में अघोषित इमरजेंसी चल रही है। सालों से पक्ष-विपक्ष आपातकाल का विषय उठा कर एक-दूसरे को घेरते रहे हैं। हाल के चुनाव में विपक्ष ने इसे दमदारी से चुनावी सभाओं में बोला। आरोप लगाया कि मोदी सरकार सत्ता में आई तो संविधान को बदल देगी।</div>
<div> </div>
<div> सदन में पहले दिन सभी सांसदों का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था तो विपक्ष के सभी सांसद सदन में संविधान की किताब हांथ में लेकर आए। उनका कहना कि भारतीय जनता पार्टी देश के संविधान को बदलना चाहती है और हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे। जब संविधान में परिवर्तन की बात आती है तो इसे एक तरह से इमरजेंसी से जोड़कर भी देखा जाता है। हालांकि संविधान परिवर्तन व आपातकाल लगाना दोनो ही अलग-अलग विषय है।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन यह भी सच है कि जब इमरजेंसी लगाई गई तब से अब तक यही आरोप लगाया जाता रहा है कि इंदिरा गांधी ने संविधान का गला घोंट दिया था। और यह भी सही है कि भारतीय संविधान में इमरजेंसी</div>
<div>लगाने का प्रावधान है। संविधान बदलने आइंदा चुनाव न होने, अल्पसंख्यकों के अधिकार छीने जाने के मुद्दे चुनाव में भाजपा पर भारी पड़े और संसद में वह अल्पमत में आ गई। हालांकि यह भी सच है कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई थी और बाद के वर्षों में कांग्रेस को इसकी नुकसान झेलना पड़ा था।</div>
<div> </div>
<div>आज भी इमरजेंसी की बदनामी कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रही है। जब भी मौका मिलता है मोदी और उनकी भाजपा इमरजेंसी पर कांग्रेस को घेरती है। कांग्रेस ने आज तक 1975 की इमरजेंसी पर सीधे तौर पर माफी नहीं मांगी है। वैसे, 75 की इमरजेंसी का मुद्दा अब कांग्रेस को चुनावी मैदान में नुकसान नहीं पहुंचाता। क्यों कि अब वह लोग इस दुनियां में बहुत ही कम बचे जिन्होंने इमरजेंसी का दंश झेला था। हां, जब कभी कांग्रेस नेताओं को इस मुद्दे के उठने पर असहज जरूर होना पड़ता है। लेकिन विपक्षी दल 5-7 साल से जो अघोषित आपातकाल का राग अलापे हुए हैं, उसने मोदी सरकार की लोकप्रियता जरूर गिरा दी है और आगे भी भाजपा को इसका डर बना हुआ है। इसलिए मोदी सरकार को ज्यादा उदार स्वरूप अपनाने की जरूरत है।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय जनता पार्टी को अब इमरजेंसी के सवाल से दूर रहना होगा क्योंकि यह उनके अन्य कामों का ध्यान भटकाकर विपक्ष को अन्य मौके उछालने का अवसर देता है। भारतीय जनता पार्टी को अब केवल वर्तमान और भविष्य की राजनीति करनी होगी जो कि उसके पास है। विपक्ष को भी अब इमरजेंसी के मुद्दे से कोई घबड़ाहट नहीं होती है। जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित की थी उसके बाद इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं क्योंकि उस समय के लोगों ने इमरजेंसी को झेला था और उसका दंड कांग्रेस पार्टी को हार के रुप में दिया था। लेकिन कांग्रेस आज तक इमरजेंसी को सही करार देती है। कांग्रेस का कहना है कि उस समय लगाई गई इमरजेंसी उस समय की मांग थी।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन इमरजेंसी लगाने की जरूरत क्यों पड़ी जब कि सरकार लगातार कांग्रेस की ही रही इस प्रश्न का जवाब कांग्रेस के पास आज तक नहीं है। बरहाल यह मुद्दा अब काफी पुराना हो चुका है और जनता केवल वर्तमान और भविष्य को देखना चाहती है। यदि भाजपा 1975 की इमरजेंसी पर कांग्रेस को घेरती है तो कांग्रेस वर्तमान में सरकार के उठाए गए कदमों को लेकर यह बताने की कोशिश करती है कि इमरजेंसी तो आज भी देश में लगी हुई है। जो कि अघोषित है और उसका फायदा भी इस बार के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को मिला है।</div>
<div> </div>
<div>पुराने मुद्दों को उठाकर अब जनता को उस समय की याद दिलाना सही नहीं है। क्यों कि इस पीढ़ी ने इमरजेंसी को नहीं देखा है और न ही इमरजेंसी के विषय में आज कल की पीढ़ी ज्यादा कुछ समझती है बल्कि यह जनता में एक ग़लत मैसेज जा रहा है इस पर भारतीय जनता पार्टी को गौर करना होगा। यदि भाजपा कांग्रेस की इमरजेंसी को लेकर विपक्ष को घेरती है तो कांग्रेस वर्तमान को इमरजेंसी बताकर भारतीय जनता पार्टी को घेर रही है और शायद इस चुनाव में कांग्रेस अपने मकसद में कामयाब हती दिखाई दी है। भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत से अल्पमत में आ चुकी है इसलिए भारतीय जनता पार्टी को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। वैसे तो आज भी भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी है और कांग्रेस उससे बहुत पीछे है। लेकिन वक्त किसी ने नहीं देखा।</div>
<div> </div>
<div>किसी समय कांग्रेस भी देश की सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी। यह जनता है और उसका मूड पलटता रहता है। भारतीय जनता पार्टी को वह राजनीति करानी होगी जो आज की जरूरत है। अपने कार्यों को जनता को बताना होगा। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को काफी निराशा हाथ लगी है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना किसी की बात को करते हुए अपने कार्यों को जनता को बताने का काम शुरू कर दिया है और यह भारतीय जनता पार्टी के लिए एक अच्छी पहल है।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 27 Jun 2024 16:42:52 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>हाथी के दन्त और कांग्रेस के सिद्धांत दोनों दो तरह के होते है – विवेकानन्द मिश्र</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>बस्ती।</strong> भारत के इतिहास में हर साल एक ऐसी तारीख आती है जिसके आने से हमें उन काले दिनों की याद आ ही जाती है। जिसे हम भूलने की कोशिश तो करते हैं लेकिन भूल नहीं पाते हैं। उन्हीं काली तारीखों में एक तारीख है 25 जून साल 1975 में देश के पीएम पद पर इंदिरा गांधी आसीन थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने कार्यकाल के दौरान कई ऐसे फैसले भी लिए जिसका उल्लेख इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। 50 साल पहले यानि कि 25 जून 1975 की रात पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक फैसले ने ना</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142545/there-are-two-types-of-elephants-teeth-and-principles-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/img-20240626-wa0190-(2).jpg" alt=""></a><br /><div><strong>बस्ती।</strong> भारत के इतिहास में हर साल एक ऐसी तारीख आती है जिसके आने से हमें उन काले दिनों की याद आ ही जाती है। जिसे हम भूलने की कोशिश तो करते हैं लेकिन भूल नहीं पाते हैं। उन्हीं काली तारीखों में एक तारीख है 25 जून साल 1975 में देश के पीएम पद पर इंदिरा गांधी आसीन थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने कार्यकाल के दौरान कई ऐसे फैसले भी लिए जिसका उल्लेख इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। 50 साल पहले यानि कि 25 जून 1975 की रात पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक फैसले ने ना केवल इतिहास के पन्नों पर छाप छोड़ा बल्कि उसका खामिजा पूरे देश की जनता को उठाना पड़ा।</div>
<div> </div>
<div>मंगलवार को भाजपा कार्यालय पर आयोजित संगोष्ठी में लोकतन्त्र सेनानी दादा विजय सेन सिंह, बृजेश कुमार अग्रवाल, प्रेम नारायण आजाद, रशीद अहमद, राजेंद्र गौड़, व माता प्रसाद पाण्डेय को अंग वस्त्र भेट कर सम्मानित किया गया। जिलाध्यक्ष विवेकानन्द मिश्र ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मुख्य अतिथि क्षेत्रीय उपाध्यक्ष संजीव राय सहित सभी अतिथियों का अभिवादन किया।क्षेत्रीय उपाध्यक्ष संजीव राय ने अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुये सर्वप्रथम उनलोगों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किया जिन्होंने आपातकाल की मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया था और 1975-1977 के दौरान यातनाएं झेलीं थी।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों ने उस नाजुक मोड़ पर देश के लोकतंत्र को न केवल बचाया वरन लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत किया तथा यह सुनिश्चित किया कि सालों साल तक किसी की हिम्मत न हो सके फिर से ऐसा दुस्साहस करने की। श्री राय ने कहा की उनका बलिदान आने वाली कई पीढ़ियों के लिए वंदनीय है।</div>
<div> </div>
<div>जिलाध्यक्ष विवेकानन्द मिश्र ने आपातकाल की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुये कहा कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस में सिंडिकेट युग की शुरुआत हो गई और अंततः कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये।  उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि उस वक्त कांग्रेस के असंतुष्टों को पार्टी नहीं छोड़नी चाहिये थी, उन्हें पार्टी के अंदर रहते हुये संघर्ष करना चाहिए था ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत बनी रहती। उन लोगों के पार्टी छोड़ने से सत्ता और संगठन की सारी बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों में आ गई और वह निरंकुश और तानाशाह हो गई और उसका ही परिणाम था कि देश को आपातकाल जैसी वीभत्स परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। </div>
<div> </div>
<div>इस मौके पर यशकांत सिंह, राम श्रिंगार ओझा, रघुनाथ सिंह, राम चरन चौधरी, चन्द्रशेखर मुन्ना, अभिषेक कुमार, राकेश शर्मा, अभिनव उपाध्याय, अश्वनी उपाध्याय, जटा शंकर शुक्ल, केके सिंह, दिनेश प्रताप सिंह, अमृत कुमार वर्मा, गजेन्द्र सिंह, मनमोहन श्रीवास्तव काजू, अलोक पाण्डेय, अवनीश सिंह, अखिलेश शुक्ल, अंकित पाण्डेय, सतेन्द्र सिंह भोलू, श्रुति कुमार अग्रहरी, रवि तिवारी, प्रेम प्रकाश चौधरी, प्रमोद कन्नौजिया, नीरज पाण्डेय, गजेन्द्र मणि त्रिपाठी, अजीत शुक्ल, अरविन्द श्रीवास्तव, गौरव मणि त्रिपाठी, गौरव अग्रवाल, अभिषेक सिंह,  आदि मौजूद रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Jun 2024 16:38:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संविधान को रौंद कांग्रेस की इंदिरा ने लगाया आपातकाल</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>  देवरिया। </strong>आपातकाल की बरसी पर जेल गये भुजौली कालोनी निवासी लोकतंत्र रक्षक सेनानी शीतल गुप्ता को भाजपा कार्यकर्ताओं ने अंगवस्त्र और माल्यार्पण कर सम्मानित किया। इस दौरान शीतल गुप्ता ने आपातकाल के संस्मरण को कार्यकर्त्ताओं से साझा करते हुये कहा कि कांग्रेस की नेता इंदिरा ने अपनी सत्ता के लिये संविधान को रौंदकर देश पर आपातकाल थोपा था।इस दौरान देश मे सबकी आजादी छीन ली गयी थी।</div>
<div>  </div>
<div>  किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष मिश्र ने कहा कि आज से 50 साल पहले आज ही के दिन कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने भारत के संविधान का गला घोटते हुए लोकतंत्र को पूरी तरह</div>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142508/congresss-indira-trampled-the-constitution-and-imposed-emergency"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/hindi-divas49.jpg" alt=""></a><br /><div><strong> देवरिया। </strong>आपातकाल की बरसी पर जेल गये भुजौली कालोनी निवासी लोकतंत्र रक्षक सेनानी शीतल गुप्ता को भाजपा कार्यकर्ताओं ने अंगवस्त्र और माल्यार्पण कर सम्मानित किया। इस दौरान शीतल गुप्ता ने आपातकाल के संस्मरण को कार्यकर्त्ताओं से साझा करते हुये कहा कि कांग्रेस की नेता इंदिरा ने अपनी सत्ता के लिये संविधान को रौंदकर देश पर आपातकाल थोपा था।इस दौरान देश मे सबकी आजादी छीन ली गयी थी।</div>
<div> </div>
<div> किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष मिश्र ने कहा कि आज से 50 साल पहले आज ही के दिन कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने भारत के संविधान का गला घोटते हुए लोकतंत्र को पूरी तरह समाप्त करने की साजिश रची थी। उन्होंने कहा कि आपातकाल का दिन आपातकाल के विरोध में उठे हर स्वर को नमन करने का दिन है। अम्बिकेश पाण्डेय ने कहा कि कांग्रेस सरकार देश मे आपातकाल लगाकर लोकतंत्र के सभी स्तम्भो को कमजोर करने का प्रयास किया। इस अवसर पर सभासद अमित मिश्रा, सोनू गुप्ता,नवीन सिंह, राजेश कुमार, धर्मेंद्र मणि, राजेन्द्र कुमार,संदेश शर्मा,सूरज पटेल,अरविंद आदि उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Jun 2024 16:24:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सच्चा नेता जीत का श्रेय अकेले नहीं लेता', दादी इंदिरा गांधी की तारीफ में वरुण गांधी ने शेयर किया ये पत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>पीलीभीत</strong></div>
<div>  </div>
<div>  </div>
<div>  पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी ने अपनी दादी एवं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जमकर तारीफ की है। उन्होंने शुक्रवार को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक पत्र को एक्स पर शेयर किया, जिसे इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में भारतीय सेना की जीत पर सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को लिखा था। इस पत्र में इंदिरा गांधी ने सेना प्रमुख, भारतीय सेना के जवानों के साहस और वीरता की प्रशंसा करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया था</div>
<div>  </div>
<div>  वरुण गांधी ने अपनी दादी का लिखा पत्र शेयर करते हुए लिखा, '1971 के युद्ध में ऐतिहासिक</div>
<div> </div>
<div>इसी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/137523/a-true-leader-does-not-take-credit-for-victory-alone"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-12/img-20231222-wa0579.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>पीलीभीत</strong></div>
<div> </div>
<div> </div>
<div> पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी ने अपनी दादी एवं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जमकर तारीफ की है। उन्होंने शुक्रवार को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक पत्र को एक्स पर शेयर किया, जिसे इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में भारतीय सेना की जीत पर सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को लिखा था। इस पत्र में इंदिरा गांधी ने सेना प्रमुख, भारतीय सेना के जवानों के साहस और वीरता की प्रशंसा करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया था</div>
<div> </div>
<div> वरुण गांधी ने अपनी दादी का लिखा पत्र शेयर करते हुए लिखा, '1971 के युद्ध में ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को पत्र लिखा था। एक सच्चा नेता जानता है कि पूरी टीम ही जीतती है और जानता है कि कब बड़ा दिल रखना है और अकेले श्रेय नहीं लेना है। आज के दिन पूरा भारत इन दोनों महान भारतीय महानायकों को सलाम करता है। </div>
<div> </div>
<div>इसी तरह 31 अक्तूबर 2023 को भाजपा सांसद ने इंदिरा गांधी के बलिदान दिवस पर एक ट्वीट किया था। उन्होंने बचपन की फोटो दादी के साथ शेयर किया था। लिखा था, 'अप्रतिम साहस एवं संघर्ष की प्रतीक और लोकतांत्रिक समाजवाद की प्रणेता रही मेरी दादी स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी को उनके बलिदान दिवस पर शत शत नमन। आपमें कठोर फैसले लेने के दृढ़निश्चय के साथ-साथ मातृत्व एक बेहद सरल और सौम्य कोमलता भी थी। आप सही मायने में ‘देश की मां’ हैं</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 22 Dec 2023 17:51:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंदिरा गांधी ने इतिहास ही नहीं भूगोल बदला था-  अरशद अली</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div>  </div>
<div>  </div>
<div>स्वतंत्र प्रभात।</div>
<div>प्रयागराज ।</div>
<div>  </div>
<div>  अल्पसंख्यक कांग्रेस के शहर अध्यक्ष  अरशद अली  के नेतृत्व में पूर्व प्रधानमंत्री आयरन लेडी इन्दिरा गांधी जी की जन्यति पर सर्किट हाउस चौराहा पर उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण करते हुए अल्पसंख्यक कांग्रेस के पदाधिकारियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की और और करेली स्थित कार्यालय में आयोजित गोष्ठी में पीसीसी सदस्य फुजेल हाशमी द्वारा उन महिलाओं को सामाजिक उत्थान के प्रयास एवं योगदान के लिए सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया।</div>
<div>  </div>
<div>इस मौके पर अल्पसंख्यक विभाग के शहर अध्यक्ष अरशद अली ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री आयरन लेडी इन्दिरा गांधी जी ने बैंको के राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स व परमाणु परीक्षण</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/137050/indira-gandhi-changed-not-only-history-but-geography-%E2%80%93-arshad"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/इंदिरा-गांधी-ने-इतिहास-ही-नहीं-भूगोल-बदला-था- -अरशद-अली.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>स्वतंत्र प्रभात।</div>
<div>प्रयागराज ।</div>
<div> </div>
<div> अल्पसंख्यक कांग्रेस के शहर अध्यक्ष  अरशद अली  के नेतृत्व में पूर्व प्रधानमंत्री आयरन लेडी इन्दिरा गांधी जी की जन्यति पर सर्किट हाउस चौराहा पर उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण करते हुए अल्पसंख्यक कांग्रेस के पदाधिकारियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की और और करेली स्थित कार्यालय में आयोजित गोष्ठी में पीसीसी सदस्य फुजेल हाशमी द्वारा उन महिलाओं को सामाजिक उत्थान के प्रयास एवं योगदान के लिए सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया।</div>
<div> </div>
<div>इस मौके पर अल्पसंख्यक विभाग के शहर अध्यक्ष अरशद अली ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री आयरन लेडी इन्दिरा गांधी जी ने बैंको के राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स व परमाणु परीक्षण जैसे अपने कड़े फैसलों और दृढ़ प्रतिज्ञ इरादों के साथ भारत को विश्वशक्ति बनाने वाली थी।</div>
<div> </div>
<div>  तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन व हेनरी किसिंजर जैसे विदेश मंत्री को भी पाक सहित कई मसलों पर अपनी कूटनीति से अचंभित कर देने वाली व विचारों एवं कर्मों से शक्ति का एहसास कराने वाली, भारत को सच्चे मायनों में आत्मनिर्भर बनाने वाली, पूरी दुनिया में भारत का डंका बजाने वाली, लगभग 93,000 युद्ध बंदियों के साथ वास्तव में पाकिस्तान को जीतकर नया इतिहास रचने व वैश्विक भूगोल बदलने का अदम्य साहस और असीम क्षमता रखने वाली बेहद विनम्र एवं दूरदर्शी थी ।</div>
<div> </div>
<div>इस मौके पर शहर अध्यक्ष अरशद अली, पीसीसी सदस्य फुजैल हाशमी, शहर उपाध्यक्ष परवेज सिद्दीकी, नाज़ खान, शाहीन बेगम,तालिब अहमद, महफूज अहमद, जाहिद नेता, मुख्तार अहमद, गुलाम वारिस, आदि मौजूद रहे।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/137050/indira-gandhi-changed-not-only-history-but-geography-%E2%80%93-arshad</link>
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                <pubDate>Sun, 19 Nov 2023 19:54:04 +0530</pubDate>
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                <title>कांग्रेस सरकार की मुखिया इंदिरा गांधी के खिलाफ गिरीश नारायण पांडेय ने दी थी गवाही</title>
                                    <description><![CDATA[ 11 माह रहे जेल में सब कुछ हो गया चौपाट, मुलायम सरकार ने आपातकाल में जेल गए लोगों को लोकतंत्र सेनानी की दी थी उपाधि]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/131341/girish-narayan-pandey-testified-against-indira-gandhi-the-head-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-06/img-20230625-wa0435.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div><strong>रिपोर्ट:संदीप कुमार-फिज</strong></div>
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<div><strong>लालगंज रायबरेली।</strong></div>
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<div>रविवार 25 जून ,आज ही के दिन 25 जून 1975 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार की मुखिया श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया था। आपातकाल के भय से लोग घरों में दुबक गए थे। लेकिन फिर भी हजारों लोगों ने जेल जाकर आपातकाल का विरोध किया था। जिसके कारण जल्द ही आपातकाल हटाकर कांग्रेस सरकार को हिंदुस्तान में चुनाव कराना पड़ा था। चुनाव में कांग्रेस की भारी शिकस्त हुई थी और विपक्ष की सरकार मोरारजी देसाई की अगुवाई में बनी थी। जेल गए लोगों को बाद में मुलायम सिंह यादव की सरकार में लोकतंत्र सेनानी की पदवी दी थी और आजीवन पेंशन का अधिकार भी दिया था।</div>
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<div> लालगंज से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दायित्व धारी कार्यकर्ता गिरीश नारायण पांडे को आपातकाल लागू होते ही पुलिस ने पकड़ कर जेल में बंद कर दिया था। पुलिस के द्वारा पकड़े जाने की दास्तां बयां करते हुए पूर्व मंत्री गिरीश नारायण पांडे ने बताया कि बरसात की वह रात याद करके आज भी हम और हमारा परिवार सिहर उठते हैं। उनकी आंखो में चमक आ जाती है।</div>
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<div>आपातकाल के समय को याद करते हुए वह बताते हैं कि 3 जुलाई 1975 की रात लगभग डेढ़ बजे अचानक घर के दरवाजे को खटखटाया गया। वह छत पर लेटे थे।दरवाजा खोलने पर बूंदाबांदी के बीच लालगंज थाने के दरोगा रामदेव पांडेय अकेले खड़े नजर आए। लेकिन आनन-फानन आसपास छिपी पुलिस ने उन्हें घेर लिया।दरोगा ने कहा कि एसडीएम साहब थाने पर बैठे हैं, मिलना चाहते हैं।</div>
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<div>इस पर श्रीपांडेय ने कहा कि इतनी रात क्या काम हो सकता है,सुबह मुलाकात करूंगा। पुलिस ने उन्हें जीप में बैठाने का प्रयास किया लेकिन दरोगा जी के काफी मानमनौव्वल के बाद वह उनके साथ पैदल ही मेन रोड होते हुए कोतवाली पहुंचे। तब लालगंज थाना कोतवाली वर्तमान में कमल गेस्ट हाउस पुराने बस स्टेशन के सामने था।वहां सलोन के एसडीएम बैठे थे।कारण पूंछने पर उन्होंने बताया कि डीएम व एसपी के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है, क्यों किया जा रहा है यह तो उन्हें भी नही पता।रात वहीं बिताने के बाद दूसरे दिन सुबह प्राइवेट बस से उन्हें रायबरेली कोतवाली ले जाया गया जहां तिलोई के रामगोपाल त्रिपाठी, अधिवक्ता रामवरदान सिंह, राजकुमार अवस्थी,रामशंकर अवस्थी (शिवगढ़) को भी लाया गया था।वहां इस बात पर पुलिस वाले मंथन करते रहे कि आखिर उन सब के खिलाफ एफआईआर क्या लिखी जाए। तीन बजे दोपहर में दिल्ली से निर्देश मिलने पर मुकदमा लिखा गया कि वह सब गिरीश नारायण पांडेय के दरवाजे पर दरी बिछा कर इंदिरा सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर तख्ता पलटने की बात कह रहे थे।</div>
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<div>देशद्रोह का मुकदमा लिखकर सभी सातों लोगों को जेल के बैरक नंबर नौ में भेज दिया गया।वहां चाय मांगने पर जेलर ने मना कर दिया।शाम को सब्जी व रोटी खाने के लिए आई तो खराब खाना देख राजकुमार ने थाली फेक दी। बी क्लास बैरक देने की मांग को लेकर सभी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। 24 घंटे बाद तत्कालीन डीएम श्यामसुंदर सूरी को उनकी बात माननी पड़ी और तब जाकर सुविधाएं मिलनी शुरू हुई। श्रीपांडेय बताते हैं कि वार्डन से कुछ भी पूंछने पर वह जवाब नही देता था। काफी जोर देने के बाद उसने बताया कि उन सभी से बात करने को उच्चाधिकारियों ने मना किया है। जिले से उनकी बेल खारिज हो गई।</div>
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<div><strong>एक माह की मिली पैरोल</strong></div>
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<div>उस समय गिरीश नारायण पांडेय के पास लालगंज से डलमऊ के मध्य पांच किलोमीटर रेललाईन बिछाने व स्टेशन आदि के निर्माण का ठेका था। जेल जाने के चलते लगभग तीन सौ मजदूर सीमेंट आदि सामग्री लेकर भाग गए। रेललाईन का लोकार्पण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को करना था। काम ठप्प देख डिप्टी चीफ इंजीनियर रेलवे अग्रवाल जी ने डीएम श्याम सुंदर सूरी से मामला बताया। जिस पर रेललाइन पूरा करने के लिए पांच माह जेल में रहने के बाद एक माह का पैरोल मिला। जिसमें उन्होंने रेललाइन का काम पूरा किया।इसके बाद फिर जेल चले गए।</div>
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<div><strong>11 माह बाद हाईकोर्ट से मिली जमानत</strong></div>
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<div>श्रीपांडेय बताते हैं कि उनके वकील ने सलाह दी कि यदि वह तत्कालीन इंदिरा सरकार के बीस सूत्रीय कार्यक्रम को समर्थन करें और डीएम स्वयं जज से कहे तभी जमानत संभव है। लेकिन उन्होंने यह स्वीकार नही किया।</div>
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<div>इसी बीच लालगंज पुलिस के द्वारा बनाए गए मुकदमें के गवाहों ने यह लिखकर शपथ पत्र दिया कि दर्ज किया गया मुकदमा झूठा है। जिस पर  हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कुंवर बहादुर अस्थाना ने उन्हें जमानत दी। लगभग 11 माह बाद वह जेल से छूटे।</div>
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<div><strong>15 दिन तक उन्हें परिवारी जनों से छुपा कर रखा गया</strong></div>
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<div>पूर्व मंत्री श्री पांडेय ने बताया कि 15 दिन तक घर वालों को पता नही चल सका कि उन्हें कहां रखा गया है। प्रशासन का आतंक इतना था कि लोग उनके घर के सामने से गुजरने में भी डरते थे कि कहीं जेल में बंद न कर दिए जाएं।</div>
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<div><strong>जेल में लगाते थे शाखा</strong></div>
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<div>पूर्व मंत्री गिरीश नारायण पांडे उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तहसील कार्यवाह थे। उन्हों ने बताया कि वह जेल मे शाखा लगाते थे। सभी लोग सुबह से ही योग आदि करते थे। जेल प्रशासन ने कभी यह करने से उन सबको नही रोंका। हालांकि कांग्रेसी नेता मामले की शिकायत लेकर डीएम से मिले थे। लेकिन डीएम ने इस मामले में कोई कार्रवाई नही की थी।</div>
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<div><strong>इंदिरा गांधी के खिलाफ गवाही देना पड़ा महंगा</strong></div>
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<div>1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेश नीति सरकार भ्रष्ट तरीके से चुनाव जीती थी। धनबल और बाहुबल के जरिए श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थी। रायबरेली लोकसभा का चुनाव इंदिरा गांधी जीती थी। खिलाफ चुनाव लड़े राजनारायण ने कोर्ट में इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती दी थी जिसकी सुनवाई तत्कालीन जज जगमोहन लाल सिन्हा कर रहे ।</div>
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<div>लालगंज के संघ कार्यकर्ता गिरीश नारायण पांडे उस मुकदमे में अहम गवाह थे। कांग्रेश के दिग्गज नेता यशपाल कपूर आदि ने गिरीश नारायण पांडे को हर तरीके का प्रलोभन दिया लेकिन श्री पांडे नहीं टिके और उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ गवाही दी। ईमानदार जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया।</div>
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<div>कांग्रेस ने जज को भी खरीदने का प्रयास किया था और यह दबाव भी डाला गया था कि निर्णय की तारीख बढ़ा दी जाए लेकिन ईमानदार जज टस से मस नहीं हुए और निर्भीक होकर फैसला सुनाया।चुनाव रद्द होने और सांसदी  जाते ही इंदिरा गांधी आपे से बाहर हो गई थी और उन्होंने देश में इमरजेंसी लागू कर दी थी।</div>
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<div>बाद में भाजपा से विधायक और मंत्री बने, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के चहेते और उनकी नजर में ईमानदार नेता रहे गिरीश नारायण पांडे को1991 मे विधायकी का टिकट मिला ।वे दो बार विधायक बने और कल्याण सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने। उन्हें मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने विधि एवं न्याय मंत्री का दायित्व देखकर प्रदेश की सेवा करने का अवसर दिया था जिसमें वे खरे उतरे लेकिन राम मंदिर आंदोलन के कारण सरकार चली गई और वह बहुत समय तक मंत्री नहीं रहे। लेकिन फिर भी उन्होंने ईमानदारी पूर्वक कैबिनेट मंत्री के कार्यकाल का निर्वहन किया।</div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 26 Jun 2023 16:04:35 +0530</pubDate>
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