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                <title>High Court Order - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>High Court Order RSS Feed</description>
                
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                <title>पार्क प्रकरण में मुख्यमंत्री कार्यालय का हस्तक्षेप, नगर विकास विभाग को भेजा गया मामला</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>कानपुर। </strong>गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क  में कथित अतिक्रमण, धार्मिक संरचना एवं नवीन निर्माण के मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रकरण को नगर विकास तथा नगरीय रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को अग्रसारित किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह कार्रवाई 18 अगस्त 2026 को की गई है।</div>
<div>  </div>
<div>जनहित याचिका संख्या 1023/2026 के याचिकाकर्ता प्रकाश वीर आर्य की ओर से मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक पार्क को अतिक्रमणमुक्त कर उसके मूल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186418/chief-ministers-offices-intervention-in-park-issue-case-sent-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1002244502.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>कानपुर। </strong>गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क  में कथित अतिक्रमण, धार्मिक संरचना एवं नवीन निर्माण के मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रकरण को नगर विकास तथा नगरीय रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को अग्रसारित किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह कार्रवाई 18 अगस्त 2026 को की गई है।</div>
<div> </div>
<div>जनहित याचिका संख्या 1023/2026 के याचिकाकर्ता प्रकाश वीर आर्य की ओर से मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक पार्क को अतिक्रमणमुक्त कर उसके मूल स्वरूप में बहाल करने तथा पार्क की भूमि का उपयोग पार्क/खेल मैदान के रूप में सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।</div>
<div> </div>
<div>शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद जिलाधिकारी कार्यालय को भेजे गए प्रकरण में उद्यान विभाग द्वारा 21 जुलाई 2026 को ऐसी जांच आख्या प्रस्तुत की गई, जिसमें विवादित निर्माण को ‘पूर्व से निर्मित मंदिर’ बताया गया, जबकि उनके अनुसार निरीक्षण के समय भी संबंधित संरचना पर गुंबद का निर्माण कार्य चल रहा था और नवीन निर्माण के प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद थे।</div>
<div> </div>
<div>शिकायत में जांच आख्या पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि यदि संबंधित भूमि नगर निगम/केडीए के अभिलेखों में सार्वजनिक पार्क/ओपन स्पेस के रूप में दर्ज है तो विवादित निर्माण के निर्माण वर्ष, आयु, स्वीकृति, अनुमति तथा वैधानिक अभिलेखों का परीक्षण किया जाना चाहिए था। केवल स्थल का फोटो लेकर किसी निर्माण को ‘पूर्व से निर्मित’ बता देना अभिलेखीय एवं निष्पक्ष जांच का विकल्प नहीं हो सकता।</div>
<div>प्रकाश वीर आर्य ने मुख्यमंत्री कार्यालय से 21 जुलाई की जांच आख्या को निरस्त कर स्वतंत्र एवं वरिष्ठ अधिकारी से पुनः जांच कराने की मांग की है। साथ ही यह भी मांग की गई है कि विवादित निर्माण को ‘पूर्व से निर्मित मंदिर’ बताने का आधार स्पष्ट किया जाए और यह बताया जाए कि इसके समर्थन में कौन-कौन से सरकारी अभिलेख, स्वीकृति, अनुमति अथवा अन्य वैधानिक दस्तावेज उपलब्ध हैं।</div>
<div> </div>
<div>शिकायत में पार्क में कथित अतिक्रमण एवं नवीन निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और पूर्व एवं वर्तमान कार्यप्रणाली की भी जांच कर व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित करने की मांग की गई है।</div>
<div> </div>
<div>शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री कार्यालय से माननीय हाईकोर्ट के 22 अप्रैल 2026 के आदेश का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित कराने तथा पार्क को सभी अवैध अतिक्रमण एवं नवीन निर्माण से मुक्त कर उसके मूल स्वरूप में बहाल कराने का भी अनुरोध किया है।</div>
<div> </div>
<div>मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा 18 अगस्त को प्रकरण नगर विकास विभाग के उच्च अधिकारियों को अग्रसारित किए जाने के बाद अब इस मामले में शासन स्तर पर होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 17:28:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्रतिबंधित चाइनीज मांझा व सिंथेटिक मांझे की बिक्री पर पूर्ण रोक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अमेठी। </strong> उच्च न्यायालय के आदेशों तथा उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशों के अनुपालन में राज्य कर विभाग, अमेठी में उपायुक्त पीयूषकांत श्रीवास्तव की अध्यक्षता में स्थानीय छोटे दुकानदारों एवं व्यापारियों के साथ समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य प्रतिबंधित चाइनीज मांझा एवं सिंथेटिक मांझे की बिक्री, भंडारण और उपयोग पर प्रभावी रोक सुनिश्चित करना था। उपायुक्त ने बताया कि अमेठी जनपद में कोई निर्माता (मैन्युफैक्चरर) नहीं है और यहां मुख्य रूप से छोटे व्यापारी ही मांझे की खरीद-बिक्री करते हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ऐसे में सभी व्यापारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे प्रतिबंधित सिंथेटिक मांझा, सीसायुक्त (प्लास्टिक कोटेड) मांझा,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183119/complete-ban-on-sale-of-banned-chinese-manja-and-synthetic"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1-2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अमेठी। </strong> उच्च न्यायालय के आदेशों तथा उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशों के अनुपालन में राज्य कर विभाग, अमेठी में उपायुक्त पीयूषकांत श्रीवास्तव की अध्यक्षता में स्थानीय छोटे दुकानदारों एवं व्यापारियों के साथ समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य प्रतिबंधित चाइनीज मांझा एवं सिंथेटिक मांझे की बिक्री, भंडारण और उपयोग पर प्रभावी रोक सुनिश्चित करना था। उपायुक्त ने बताया कि अमेठी जनपद में कोई निर्माता (मैन्युफैक्चरर) नहीं है और यहां मुख्य रूप से छोटे व्यापारी ही मांझे की खरीद-बिक्री करते हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ऐसे में सभी व्यापारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे प्रतिबंधित सिंथेटिक मांझा, सीसायुक्त (प्लास्टिक कोटेड) मांझा, नायलॉन पतंग डोरी तथा चाइनीज मांझे का भंडारण, उपयोग और बिक्री पूरी तरह बंद करें। बैठक में उपायुक्त ने बताया कि नायलॉन एवं सिंथेटिक मांझा अत्यंत खतरनाक होता है। इससे दोपहिया वाहन चालकों, राहगीरों और पक्षियों के घायल होने तथा जान जाने जैसी गंभीर घटनाएं सामने आती रही हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसलिए जनहित और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इस पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई भी छोटा या बड़ा दुकानदार प्रतिबंधित मांझे की खरीद-बिक्री अथवा भंडारण में संलिप्त पाया गया, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। बैठक में उपस्थित सभी व्यापारियों ने जनहित एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लेते हुए प्रतिबंधित मांझे की बिक्री नहीं करने का सामूहिक आश्वासन दिया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 21:42:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> उच्च न्यायालय का बड़ा आदेश: पुलिस एसआई भर्ती में विवादित ऊंचाई मापी जाएगी, वीडियोग्राफी अनिवार्य</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>सचिन बाजपेई </strong><br /><strong>लखनऊ।</strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर सिविल पुलिस भर्ती 2025 में ऊंचाई मापने को लेकर उठे विवाद में याचिकाकर्ता   शुभम शर्मा को महत्वपूर्ण राहत देते हुए उनकी ऊंचाई दोबारा मापने का आदेश दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकलपीठ ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता शुभम शर्मा की ऊंचाई 6 जुलाई 2026 को सुबह 11:30 बजे लखनऊ स्थित रिजर्व पुलिस लाइंस में विशेषज्ञों की पैनल द्वारा दोबारा मापी जाए। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी अनिवार्य रूप से की जाएगी और रिपोर्ट अदालत में 16 जुलाई 2026 को पेश की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182684/big-order-of-high-court-controversial-height-measurement-in-police"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/high-court-lucknow.jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>सचिन बाजपेई </strong><br /><strong>लखनऊ।</strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर सिविल पुलिस भर्ती 2025 में ऊंचाई मापने को लेकर उठे विवाद में याचिकाकर्ता   शुभम शर्मा को महत्वपूर्ण राहत देते हुए उनकी ऊंचाई दोबारा मापने का आदेश दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकलपीठ ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता शुभम शर्मा की ऊंचाई 6 जुलाई 2026 को सुबह 11:30 बजे लखनऊ स्थित रिजर्व पुलिस लाइंस में विशेषज्ञों की पैनल द्वारा दोबारा मापी जाए। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी अनिवार्य रूप से की जाएगी और रिपोर्ट अदालत में 16 जुलाई 2026 को पेश की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में शुभम शर्मा ने आरोप लगाया था कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान दस्तावेज सत्यापन और शारीरिक मानक परीक्षण में उनकी ऊंचाई गलत तरीके से 167.0 सेमी और 167.1 सेमी मापी गई, जबकि आगरा जिला अस्पताल के मेडिकल अधिकारी द्वारा जारी प्रमाण-पत्र में उनकी ऊंचाई 168.2 सेमी बताई गई है। याचिकाकर्ता ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन दोबारा मापने पर भी वही ऊंचाई दर्ज की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने याचिकाकर्ता के आगरा जिला अस्पताल के प्रमाण-पत्र को गंभीरता से लिया और मामले में हस्तक्षेप किया। राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील ने तर्क दिया कि ऊंचाई मापने की उचित प्रक्रिया है और आपत्ति पर दोबारा माप लिया गया था, इसलिए अदालती हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिवक्ता सुभाष चन्द्र यादव  ने याची की तरफ से पूरा मामला कोर्ट को बताया जिसपर कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद याचिका पर विचार योग्य पाया और ऊंचाई मापने की नई प्रक्रिया शुरू करने का आदेश पारित किया। अधिवक्ता सुभाष चन्द्र यादव के पक्ष में यह आदेश  भर्ती प्रक्रिया के लिए प्रेरणा दायक बन सकता है l </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह आदेश उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो भर्ती परीक्षा में ऊंचाई मापने को लेकर विवाद में फंस जाते हैं। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 15:46:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्टिंग ऑपरेशन के बाद दर्ज रंगदारी केस में हाईकोर्ट से पत्रकारों को बड़ी राहत</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><strong>भोपाल।</strong> </p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने देवास में कथित भ्रूण लिंग परीक्षण, अवैध गर्भपात और कन्या भ्रूण हत्या के खुलासे से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन के बाद दर्ज रंगदारी के मामले में पत्रकारों को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। न्यायालय ने <strong>तहलका डिजिटल न्यूज</strong> के पत्रकार <strong>विनय अरोड़ा</strong> को अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) मंजूर कर दी है। इससे पहले 25 जून को इसी मामले में सह-आरोपी पत्रकार <strong>रजनी</strong> को नियमित जमानत मिल चुकी थी।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों मामलों की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति <strong>पवन कुमार द्विवेदी</strong> ने की। अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करते हुए पाया कि स्टिंग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182652/big-relief-to-journalists-from-high-court-in-extortion-case"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/476977-madhya-pradesh-high-court-gwalior-bench.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><strong>भोपाल।</strong> </p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने देवास में कथित भ्रूण लिंग परीक्षण, अवैध गर्भपात और कन्या भ्रूण हत्या के खुलासे से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन के बाद दर्ज रंगदारी के मामले में पत्रकारों को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। न्यायालय ने <strong>तहलका डिजिटल न्यूज</strong> के पत्रकार <strong>विनय अरोड़ा</strong> को अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) मंजूर कर दी है। इससे पहले 25 जून को इसी मामले में सह-आरोपी पत्रकार <strong>रजनी</strong> को नियमित जमानत मिल चुकी थी।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों मामलों की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति <strong>पवन कुमार द्विवेदी</strong> ने की। अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करते हुए पाया कि स्टिंग ऑपरेशन के दौरान तैयार किए गए वीडियो एफआईआर दर्ज होने से पहले ही राज्य एवं केंद्र सरकार के संबंधित अधिकारियों को भेजे जा चुके थे। अदालत ने प्रथम दृष्टया इसी तथ्य को राहत दिए जाने का महत्वपूर्ण आधार माना।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>एफआईआर से पहले अधिकारियों को भेजे गए थे वीडियो</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2 जुलाई को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि 6 अप्रैल 2026 को स्टिंग ऑपरेशन के वीडियो मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य आयुक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की अध्यक्ष, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तथा देवास के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को भेजे गए थे। इसके अतिरिक्त 6 और 7 अप्रैल को भी संबंधित अधिकारियों को वीडियो उपलब्ध कराए गए। इसके बाद 7 अप्रैल को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विनय अरोड़ा को अग्रिम जमानत प्रदान की। इससे पहले पत्रकार रजनी को जमानत देते समय भी न्यायालय ने इसी प्रकार की परिस्थितियों का उल्लेख किया था।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है पूरा मामला</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देवास के कोतवाली थाने में दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि पत्रकार विनय अरोड़ा, रजनी और अन्य लोगों ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो के आधार पर शिकायतकर्ता से रंगदारी वसूलने और दबाव बनाने का प्रयास किया।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 308(5) एवं 308(6) (रंगदारी), धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) तथा धारा 3(5) (समान उद्देश्य) के तहत प्रकरण दर्ज किया है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>पत्रकारों का पक्ष</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पत्रकारों की ओर से अदालत में दलील दी गई कि स्टिंग ऑपरेशन का उद्देश्य समाज में चल रही कथित अवैध गतिविधियों का पर्दाफाश करना था। उनके अनुसार, स्टिंग के दौरान <strong>पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994</strong> तथा <strong>मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971</strong> के उल्लंघन से जुड़े कथित अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण, गैरकानूनी गर्भपात और कन्या भ्रूण हत्या के मामलों का खुलासा किया गया था।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि स्टिंग ऑपरेशन के वीडियो एफआईआर दर्ज होने से पहले ही संबंधित सरकारी अधिकारियों को सौंप दिए गए थे। ऐसे में रंगदारी के आरोप निराधार हैं और यह कार्रवाई कथित अवैध गतिविधियों के खुलासे के बाद प्रतिशोध स्वरूप की गई है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>राज्य सरकार ने जताया विरोध</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। सरकारी पक्ष का तर्क था कि पत्रकारों ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो का इस्तेमाल शिकायतकर्ता को ब्लैकमेल करने और दबाव बनाने के लिए किया।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की जा रही है और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दोनों पत्रकारों को कानून के अनुरूप राहत प्रदान की गई है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>जमानत की शर्तें</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने अपने 2 जुलाई के आदेश में निर्देश दिया कि यदि विनय अरोड़ा को इस मामले में गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें 50 हजार रुपये के निजी मुचलके तथा समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा किया जाए।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वहीं, 25 जून को पारित आदेश में पत्रकार रजनी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके एवं एक सक्षम जमानतदार पर नियमित जमानत देने का निर्देश दिया गया था। साथ ही उन्हें ट्रायल कोर्ट में नियमित रूप से उपस्थित रहने की शर्त का पालन करने को कहा गया है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>अधिवक्ताओं ने रखा पक्ष</strong></h3><p style="text-align:justify;">मामले में पत्रकारों की ओर से अधिवक्ता <strong>अमन मालवीय</strong> ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता <strong>सुरेंद्र सिंह अलावा</strong> एवं <strong>हेमंत शर्मा</strong> ने न्यायालय में अपना पक्ष रखा। अब मामले की आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 21:04:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद भी ब्लॉक-8 पार्क पर कार्रवाई नहीं, शासन पहुंची शिकायत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविन्द नगर के ब्लॉक-8 स्थित रामदेवी आर्य पार्क का मामला अब शासन स्तर तक पहुंच गया है। पार्क पर हुए अतिक्रमण, कंक्रीट निर्माण, धार्मिक संरचनाओं के विस्तार तथा माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में कथित शिथिलता को लेकर नगर विकास मंत्री कार्यालय ने मामले को प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग को अग्रिम कार्रवाई हेतु प्रेषित कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जनहित याचिका संख्या 1023/2026 के याचिकाकर्ता एवं गोविन्द नगर व्यापार मंडल के अध्यक्ष प्रकाश वीर आर्य द्वारा भेजे गए विस्तृत प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम एवं केडीए के अभिलेखों में सार्वजनिक पार्क एवं ओपन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181568/government-did-not-take-action-on-block-8-park-even-after"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1002015129.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविन्द नगर के ब्लॉक-8 स्थित रामदेवी आर्य पार्क का मामला अब शासन स्तर तक पहुंच गया है। पार्क पर हुए अतिक्रमण, कंक्रीट निर्माण, धार्मिक संरचनाओं के विस्तार तथा माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में कथित शिथिलता को लेकर नगर विकास मंत्री कार्यालय ने मामले को प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग को अग्रिम कार्रवाई हेतु प्रेषित कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनहित याचिका संख्या 1023/2026 के याचिकाकर्ता एवं गोविन्द नगर व्यापार मंडल के अध्यक्ष प्रकाश वीर आर्य द्वारा भेजे गए विस्तृत प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम एवं केडीए के अभिलेखों में सार्वजनिक पार्क एवं ओपन स्पेस के रूप में दर्ज भूमि पर वर्षों से अवैध कब्जे और निर्माण कार्य होते रहे, लेकिन संबंधित विभाग प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय प्रकरणों का निस्तारण कागजों तक सीमित रखते रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 22 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में ब्लॉक-8 स्थित पार्क में हुए निर्माण कार्यों पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस भूमि को पार्क एवं खेल मैदान के रूप में सुरक्षित रखा गया हो, वहां निर्माण और अतिक्रमण किस प्रकार होने दिया गया। न्यायालय ने संबंधित प्राधिकरणों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पार्कों और खुले स्थानों को अतिक्रमण मुक्त रखा जाए तथा किए गए अतिक्रमणों को हटाकर उन्हें उनके मूल स्वरूप में बहाल किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रकाश वीर आर्य का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति 29 अप्रैल को जिलाधिकारी कार्यालय में प्राप्त कराए जाने के बावजूद अब तक पार्क को अतिक्रमण मुक्त कराने अथवा उसके मूल स्वरूप की बहाली के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इसके विपरीत पार्क क्षेत्र में नई गतिविधियों और कब्जों की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रकरण का एक और गंभीर पहलू तब सामने आया जब केस्को को लिखित शिकायत और न्यायालयीय आदेशों की जानकारी दिए जाने के बावजूद पार्क में स्थित विवादित धार्मिक संरचना पर नया विद्युत संयोजन स्थापित कर दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सार्वजनिक पार्क की विवादित भूमि पर स्थित संरचनाओं को सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने से अवैध कब्जों को अप्रत्यक्ष संरक्षण मिलता है तथा भविष्य में ऐसे कब्जों को स्थायित्व प्रदान करने का आधार तैयार होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रार्थना पत्र में पार्क में अवैध रूप से निर्मित कंक्रीट ढांचों एवं इंटरलॉकिंग को हटाकर पूरे क्षेत्र को पुनः पार्क के रूप में विकसित करने, नए कब्जों एवं मूर्ति स्थापना पर तत्काल रोक लगाने, विद्युत संयोजन प्रकरण की जांच कराने तथा जिम्मेदार अधिकारियों एवं अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई किए जाने की मांग की गई है। नगर विकास मंत्री कार्यालय द्वारा मामले को प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग को भेजे जाने के बाद अब क्षेत्रीय नागरिकों की निगाहें शासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि हाईकोर्ट के आदेशों और शासन स्तर पर संज्ञान लिए जाने के बाद भी पार्क को उसका मूल स्वरूप नहीं मिल पाता, तो यह सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 16:45:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वकील अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने के लिए PIL याचिकाकर्ता नहीं बन सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176405/lawyer-cannot-become-pil-petitioner-to-further-interests-of-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court_1623565927.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वे पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के आधार पर उद्योगों को प्राकृतिक गैस कनेक्शन उपलब्ध कराएं।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में अपनी पहचान और साख बताते हुए याचिकाकर्ता ने अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा था कि वह जिला फिरोजाबाद में वकालत करने वाला वकील है, कुछ उद्योगों का कानूनी सलाहकार है। साथ ही वह औद्योगिक प्राधिकरणों के समक्ष उद्योगों से जुड़े मामलों को देखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अतः, यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को भविष्य में इस तरह के किसी भी प्रयास में शामिल न होने की चेतावनी देते हुए, PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 20:57:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“किशोर संबंधों में अक्सर लड़कों को भुगतने पड़ते हैं परिणाम”।</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;"><br />मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक युवक की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, जिसे निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 366 तथा पाक्सो एक्ट, 2012 की धारा 5(l) सहपठित धारा 6 के तहत एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में दोषी ठहराया था।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस एन माला ने कहा कि यह मामला दो किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है, जो अंततः माता-पिता के विरोध के कारण विवाद में बदल गया। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में अक्सर परिणामों का सामना केवल लड़कों को करना पड़ता है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173059/%E2%80%9Cboys-often-suffer-the-consequences-in-teen-relationships%E2%80%9D"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/627183-750x450408468-justice-gr-swaminathan-and-madurai-bench2.jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;"><br />मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक युवक की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, जिसे निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 366 तथा पाक्सो एक्ट, 2012 की धारा 5(l) सहपठित धारा 6 के तहत एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में दोषी ठहराया था।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस एन माला ने कहा कि यह मामला दो किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है, जो अंततः माता-पिता के विरोध के कारण विवाद में बदल गया। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में अक्सर परिणामों का सामना केवल लड़कों को करना पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, “यह एक सामान्य मामला है जिसमें किशोरों के बीच सहमति से बने संबंध का अंत माता-पिता के मतभेद के कारण हुआ। ऐसे मामलों में अक्सर लड़की पर परिवार का दबाव होता है और बाद में उसकी शादी कहीं और करा दी जाती है, जिसके बाद लड़के के खिलाफ पाक्सो  के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है, जिससे उसे लंबी अवधि तक जेल में रहना पड़ता है।”</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि यदि पाक्सो  अधिनियम की धारा 43 के तहत कानून के प्रावधानों और उसकी कठोरता के बारे में व्यापक जागरूकता फैलाई जाए तो ऐसे मामलों में कमी लाई जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि इस कानून के कठोर प्रावधानों की जानकारी के अभाव में इसका दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी संदर्भ में अदालत ने तमिलनाडु के चीफ सेक्रेटरी को निर्देश दिया कि वे पाक्सो अधिनियम की धारा 43 का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाएं और आम जनता, बच्चों तथा अभिभावकों में कानून के प्रति जागरूकता बढ़ाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि सरकारी और निजी स्कूलों तथा कॉलेजों में जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं, ताकि कानून और उसके परिणामों के बारे में जानकारी दी जा सके। यह मामला उस अपील से संबंधित था जिसमें आरोपी ने स्पेशल कोर्ट नागरकोइल के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे दोषी ठहराया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अभियोजन के अनुसार, घटना के समय लड़की की उम्र 16 वर्ष थी। आरोपी, जो लड़की के भाई का मित्र था, उससे परिचित हुआ और बाद में उससे प्रेम का इज़हार करते हुए विवाह की इच्छा जताई। लड़की ने बताया कि उसके माता-पिता उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी कराना चाहते हैं, जिसके बाद आरोपी उसे घर से ले गया और अपने रिश्तेदार के घर में उससे विवाह कर लिया। बाद में जिला बाल संरक्षण अधिकारी को एक गुमनाम कॉल मिलने पर दोनों को हिरासत में लिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अपील में आरोपी ने तर्क दिया कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और लड़की ने स्वेच्छा से उसके साथ जाने का निर्णय लिया था। उसने यह भी कहा कि लड़की के शुरुआती बयानों में उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं था और निचली अदालत ने उसके विरोधाभासी बयान पर भरोसा करके गलती की।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने पाया कि लड़की की उम्र साबित करने के लिए अभियोजन ने जन्म प्रमाणपत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट की केवल फोटोकॉपी पेश की थी, जबकि उनके मूल दस्तावेज उपलब्ध थे। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/173059/%E2%80%9Cboys-often-suffer-the-consequences-in-teen-relationships%E2%80%9D</link>
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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 22:50:55 +0530</pubDate>
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