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                <title>राष्ट्र निर्माण - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने पर अभिनंदन समारोह आयोजि</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली। </strong>इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण ट्रस्ट द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब के उपाध्यक्ष सभागार एनेक्सी में अभिनंदन एवं शुभकामना समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">समारोह में चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं नई दिल्ली नगर परिषद एनडीएमसी के सदस्य दिनेश प्रताप सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में नवश्री धार्मिक लीला समिति, लालकिला के महामंत्री प्रकाश बैराठी तथा विश्व हिंदू परिषद,</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181423/congratulatory-ceremony-organized-on-completion-of-12-years-of-prime"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260617-wa0003.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली। </strong>इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण ट्रस्ट द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब के उपाध्यक्ष सभागार एनेक्सी में अभिनंदन एवं शुभकामना समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समारोह में चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं नई दिल्ली नगर परिषद एनडीएमसी के सदस्य दिनेश प्रताप सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में नवश्री धार्मिक लीला समिति, लालकिला के महामंत्री प्रकाश बैराठी तथा विश्व हिंदू परिषद, इंद्रप्रस्थ प्रांत के प्रांत मंत्री सुरेंद्र गुप्ता भी मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुरेंद्र गुप्ता ने की।अपने संबोधन में प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान देश में आधारभूत संरचना, अर्थव्यवस्था और विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय विकास हुआ है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है।अध्यक्षीय संबोधन में सुरेंद्र गुप्ता ने सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने समाज की सुरक्षा और सहायता के लिए संचालित हिंदू हेल्पलाइन की जानकारी दी। साथ ही दिल्ली के ऐतिहासिक महत्व और इंद्रप्रस्थ की अवधारणा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि देश विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने राष्ट्र निर्माण में जनभागीदारी और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की आवश्यकता पर बल दिया।समारोह के अंत में इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण ट्रस्ट की ओर से सभी अतिथियों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम के आयोजन में ट्रस्ट के संयोजक सुशांत अग्रवाल,सह-संयोजक हर्ष कप्तान तथा सह-संयोजक गरिमा बंसल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।</div>
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                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 20:08:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>11जून को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती है!इस अवसर पर यह आलेख है</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180928/11th-june-is-the-birth-anniversary-of-pandit-ram-prasad"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260610-wa0050.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। 9 अगस्त 1925 की काकोरी की रात।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बैठो, ये कहानी छोटी नहीं है। ये वो दास्तान है जो खून, पसीने और मिट्टी की खुशबू से लिखी गई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1925 का हिंदुस्तान देखो। अंग्रेज़ हर चीज़ पर टैक्स लगा रहे थे। नमक पर, कपड़े पर, रेल के टिकट पर। किसान की फसल सस्ते में लूट ली जाती, और उसी फसल को दुगने दाम पर बेचा जाता। लगान न दे पाने पर गाँव के गाँव उजड़ जाते थे। कांग्रेस वाले सत्याग्रह कर रहे थे, लाठी खा रहे थे, जेल जा रहे थे। मैं उनका सम्मान करता हूँ। गांधी जी का अहिंसा का रास्ता लाखों को जोड़ रहा था। पर मेरा दिल कहता था कि जो राज़ बंदूक के दम पर आया है, वो बंदूक के दम पर ही जाएगा।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1924 में हमने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। मैं, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, सचिंद्र बख्शी, मनमथनाथ गुप्त। सबकी उम्र 25 से कम थी। पर हौसला पहाड़ से ऊँचा था। हमारा मकसद साफ था। अंग्रेजों के पास हथियार हैं, पैसा है, ताकत है। हमारे पास कुछ नहीं। तो हम उनका ही खजाना लूटेंगे। उसी पैसे से हथियार खरीदेंगे। उसी हथियार से क्रांति का अलाव जलाएंगे। लोग कहते थे ये डकैती है। मैं कहता हूँ, जब एक देश को लूटा जा रहा हो, तो लुटेरों से लूटना डकैती नहीं, कर्तव्य है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मौका मिला 9 अगस्त 1925 को। लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन रोज़ सरकारी खजाना ले जाती थी। लखनऊ, शाहजहाँपुर, बरेली, मुरादाबाद के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह इसी ट्रेन में होती थी। गार्ड के डिब्बे में लोहे की पेटियाँ रखी होती थीं। वही हमारा निशाना था। काकोरी लखनऊ से 15 मील दूर एक छोटा स्टेशन है। हमने तय किया कि ट्रेन जैसे ही काकोरी पार करेगी, चेन खींचकर रोक देंगे। गार्ड का डिब्बा तोड़ेंगे, खजाना निकालेंगे और जंगल में गायब हो जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">टीम में दस लोग थे। मैं "राम" बनकर बैठा था। अशफाक "अहमद" बनकर। चंद्रशेखर आज़ाद हमारा बाहुबल था। राजेंद्र लाहिड़ी का दिमाग ठंडा था, निशाना पक्का था। मनमथनाथ सबसे छोटा था, पर हिम्मत में सबसे बड़ा। सचिंद्र बख्शी, मुरारी शर्मा, मुकुंदी लाल, केशव चक्रवर्ती भी साथ थे। हमने हफ्तों तक रिहर्सल की। शाहजहाँपुर के जंगलों में रात-रात भर अभ्यास किया। कैसे चेन खींचनी है, कैसे ताला तोड़ना है, कैसे भागना है। मैंने उस दिन अपनी डायरी में लिखा था: "अगर हम मर गए तो शहीद कहलाएँगे। अगर बच गए तो क्रांति का बीज बो देंगे।"</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">9 अगस्त की दोपहर। धूप आग बरसा रही थी। हम अलग-अलग स्टेशनों से ट्रेन में चढ़े। टिकट लेकर, आम मुसाफिर बनकर। ट्रेन चली। दिल की धड़कनें तेज थीं। पर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। जैसे ही ट्रेन काकोरी स्टेशन पार कर जंगल की तरफ बढ़ी, मनमथनाथ ने चेन खींच दी। कड़क की आवाज़ आई। ट्रेन हिली और रुक गई। हम आठ लोग एक साथ उठे। गार्ड के डिब्बे की तरफ लपके। ताला तोड़ा। अंदर लोहे की पेटियाँ थीं। चंद्रशेखर ने रिवॉल्वर तान दी और कहा, "खोलो जल्दी!" गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। उसने कांपते हाथों से चाबी दे दी।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पेटियाँ खुलीं। नोटों की गड्डियाँ, सिक्के, सरकारी कागज। हमने अंदाजा लगाया, लगभग आठ हजार रुपये। आज के हिसाब से करीब पंद्रह लाख। लेकिन तभी गलती हो गई। शायद गार्ड ने ब्रेक छोड़ा, या ट्रेन अपने आप हिल गई। राजेंद्र ने जल्दी में एक पेटी धक्का देकर नीचे फेंक दी। धमाके की आवाज़ हुई। उसी धमाके में एक यात्री अहमद अली नीचे गिर गया। सिर पर चोट लगी और उसकी मौत हो गई। उस पल मेरा कलेजा बैठ गया। हम लुटेरे नहीं थे। हमारा मकसद किसी की जान लेना नहीं था। पर क्रांति में खून बहता ही है। उस दिन मैंने जाना कि आज़ादी की कीमत सिर्फ हमारा खून नहीं होता, कभी-कभी बेगुनाहों का खून भी बहता है। उस यात्री की मौत का बोझ आज भी मेरे सीने पर है। हमने जितना हो सका खजाना समेटा और जंगल में भागे। पीछे पुलिस की सीटी बज रही थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लूट के बाद हम बिखर गए। पर अंग्रेज़ों की सीआईडी कोई कम नहीं थी। गाँव-गाँव, घर-घर छान मारा। मुखबिरों को पैसा दिया गया। सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी पकड़े गए। फिर मैं 1 नवंबर 1925 को शाहजहाँपुर में पकड़ा गया। अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद बच निकले। वो 1931 तक लड़े, और जब चारों तरफ से घिर गए तो खुद को गोली मार ली। जिंदा पकड़े जाने से बेहतर मौत थी उनके लिए।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुकदमा चला लखनऊ में। नाम दिया गया "काकोरी षड्यंत्र केस"। कठघरे में खड़े होकर मैंने जज से कहा: "हम चोर नहीं हैं। हम वो लोग हैं जो अपनी माँ भारत को आज़ाद कराना चाहते हैं। अगर इसके लिए फाँसी भी मिले, तो वो हमारे लिए माला है।" अदालत ने 40 लोगों पर मुकदमा चलाया। 16 को सज़ा हुई। मुझे, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। फैसला सुनकर मैं हँस पड़ा। "मौत से डरते तो हम 14 साल की उम्र में आर्य समाज न ज्वाइन करते।" मुकदमे के दौरान हमने कोर्ट को ही अपना मंच बना लिया। हर पेशी पर देशभक्ति के नारे लगते थे। "इंकलाब ज़िंदाबाद" की गूँज पूरे लखनऊ में सुनाई देती थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुझे गोरखपुर जेल की कोठरी नंबर 11 में रखा गया। फाँसी 19 दिसंबर 1927 को तय हुई। मेरे पास 40 दिन थे। मैं रोया नहीं। माफी नहीं माँगी। मैंने कलम उठाई। पेंसिल से 120 पन्ने लिखे। मेरी आत्मकथा _कातिल की कलम से_। मैंने लिखा कि कैसे मेरा दादा अकाल में ग्वालियर छोड़कर आया था। कैसे माँ ने मुझे भूखे पेट सुलाया था। कैसे 14 साल की उम्र में स्वामी दयानंद सरस्वती की _सत्यार्थ प्रकाश_ ने मेरे अंदर आग लगा दी थी। कैसे मैंने "मैनपुरी षड्यंत्र" में हिस्सा लिया था 1918 में।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">रात को नींद नहीं आती थी। अशफाक पास वाली कोठरी में था। हम दीवार के उस पार बात करते थे। एक रात मैंने उससे कहा, "अशफाक, अगर हम बच गए तो साथ मिलकर मदरसा खोलेंगे। जहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों पढ़ेंगे।" उसने जवाब दिया, "बिस्मिल भाई, हम बचेंगे नहीं। लेकिन हमारे मरने के बाद हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम एक साथ मर सकते हैं।" उसी जेल में मैंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" लिखा।  </div><div style="text-align:justify;">_"मेरा रंग दे बसंती चोला,  </div><div style="text-align:justify;">माय रंग दे बसंती चोला।"_  </div><div style="text-align:justify;">सोचो, जिसे कल फाँसी होनी है, वो बसंत की बात कर रहा है। मौत से डरने वाला ऐसा नहीं लिखता। जेल में मुझे रोज़ गीता पढ़ने का मौका मिलता था। मैंने पाया कि गीता में भी कर्म और त्याग की बात है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" वही मैं कर रहा था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोग पूछते हैं, हिंदू-मुस्लिम एक साथ कैसे लड़ सकते हैं? मैं कहता हूँ, देखो अशफाक को। अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर का ही था। उसकी उम्र मुझसे दो साल छोटी थी। जब पहली बार मिला था, तो लगा जैसे बरसों का साथी हो। वो उर्दू का शायर था। मैं हिंदी का। वो कुरान पढ़ता था, मैं गीता। पर जब देश की बात आती, तो हम एक थे। काकोरी की रात उसने मुझसे कहा था, "बिस्मिल भाई, अगर आज हम मर गए तो हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं हैं।" और वही हुआ। 19 दिसंबर 1927 को हम एक साथ फाँसी पर चढ़े। अशफाक की आखिरी ख्वाहिश थी कि उसकी लाश को शाहजहाँपुर में दफनाया जाए। अंग्रेजों ने मना कर दिया। उसे फैजाबाद में दफनाया गया। आज भी उसकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों चादर चढ़ाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">18 दिसंबर की रात जेलर आया। बोला, "बिस्मिल, कल सुबह छह बजे फाँसी है।" मैंने नहाया, नए कपड़े पहने, गीता का पाठ किया। अशफाक ने कुरान पढ़ी। रोशन सिंह ने गुरुवाणी गाई। रात को मैंने आखिरी शेर लिखा:  </div><div style="text-align:justify;">_"अगर एक झटके में कुर्बानी दे दूँ तो क्या है,  </div><div style="text-align:justify;">बार-बार मरूँ वतन पर यही आरजू है।"_  </div><div style="text-align:justify;">सुबह पाँच बजे दरवाजा खुला। मैं बाहर निकला। फाँसी का तख्ता तैयार था। जेलर ने पूछा, "आखिरी इच्छा?" मैंने कहा, "मेरे शरीर को तिरंगे में लपेट देना। और हाँ, मेरे मरने के बाद मेरी कविताएँ मत जलाना।" फंदा मेरे गले में डाला गया। मैंने ऊपर देखा। आसमान साफ था। और मेरे मुँह से निकला:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;">मरते-मरते देश को ज़िंदा मगर कर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">धड़ाम की आवाज़ आई। और सब शांत हो गया। उसी दिन अशफाक, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी भी फाँसी पर चढ़े। चार नौजवान। चार धर्म। एक मकसद।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हमारी फाँसी ने हिंदुस्तान को झकझोर दिया। अखबारों में लिखा गया, "चार नौजवान, चार धर्म, एक मकसद"। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बन गई हमारी फाँसी। काकोरी के बाद क्रांति की आग और भड़क गई। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। भगत सिंह कहते थे, "बिस्मिल का खून बेकार नहीं जाएगा।" उन्होंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" को अपना नारा बनाया। लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी से पहले वही गीत गाया था। 1947 में जब आज़ादी मिली, तो नेहरू ने लाल किले से कहा था कि आज़ादी में उन अनाम शहीदों का खून शामिल है जिनके नाम इतिहास में नहीं लिखे गए। मेरा नाम लिखा गया। पर मैं अनाम रहना पसंद करता। क्योंकि क्रांति किसी एक नाम से नहीं होती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज 2025 है। हिंदुस्तान आज़ाद है। पर मैं देखता हूँ कि तुम लोग आपस में लड़ रहे हो। हिंदू-मुस्लिम, जाति-धर्म, भाषा-प्रांत। अशफाक और मैं अगर आज ज़िंदा होते, तो हमारा पहला काम ये होता कि तुम्हें समझाते। दुश्मन बाहर नहीं, अंदर है। नफरत ही असली अंग्रेज है। मेरी कविता याद रखो:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">देश हित मतलब सिर्फ सीमा पर लड़ना नहीं। देश हित मतलब भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करना, लड़की को पढ़ाना। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मेरी फाँसी बेकार नहीं जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">काकोरी कांड में हमने आठ हजार रुपये लूटे थे। पर जो हमने लूटा वो पैसा नहीं था। हमने अंग्रेजों का डर लूटा था। हमने नौजवानों का खौफ तोड़ा था। हमने साबित किया कि 20-25 साल के लड़के भी साम्राज्य को चुनौती दे सकते हैं। आज तुम मोबाइल चलाते हो, मैं कलम चलाता था। ज़माना बदला है, लेकिन दुश्मन वही है। अन्याय, गरीबी, नफरत। मेरी कलम अब तुम्हारे हाथ में है। लिखो। बोलो। लड़ो। लेकिन याद रखो, बंदूक से पहले दिल जीतना ज़रूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जेल में मैंने कई गीत लिखे। कुछ छपे, कुछ खो गए। "सरफरोशी की तमन्ना" तो तुम जानते ही हो। पर एक और गीत था जो मैं अक्सर गाता था:  </div><div style="text-align:justify;">_"वतन पर जो फिदा होगा,  </div><div style="text-align:justify;">अमर वो नौजवान होगा।  </div><div style="text-align:justify;">रहेगा याद दुनिया में,  </div><div style="text-align:justify;">वही बेनामो-निशान होगा।"_  </div><div style="text-align:justify;">मैं चाहता था कि नौजवान डरना छोड़ दे। मरना नहीं, जीना सीखे। पर ऐसे जीना जो गुलामी में न हो। भगत सिंह ने लिखा था कि वो मेरी कविताएँ पढ़कर ही क्रांतिकारी बना। अगर मेरी एक कविता ने भगत सिंह को बना दिया, तो मेरा जीवन सफल है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मैं रामप्रसाद बिस्मिल। शाहजहाँपुर का बेटा। हिंदुस्तान का दीवाना। 30 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ गया। पर मेरे शब्द आज भी ज़िंदा हैं। अगर तुम "सरफरोशी की तमन्ना" गुनगुनाओगे, तो मैं मरा नहीं कहलाऊँगा।  </div><div style="text-align:justify;">_"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,  </div><div style="text-align:justify;">देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।"_  </div><div style="text-align:justify;">मेरी कहानी खत्म हुई। अब तुम्हारी शुरू होती है। तुम क्या करोगे? क्या तुम भी देश के लिए कुछ करोगे? या सिर्फ इतिहास पढ़कर भूल जाओगे? फैसला तुम्हारा है।</div></div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"><div class="hp"><br /></div><div class="eqJbab cZD3Qb"><br /></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:34:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का</span></p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180910/ram-prasad-bismils-immortal-name-in-the-freedom-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:31:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उच्चीकृत कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में चयनित अभ्यर्थियों को डीएम ने दिया नियुक्ति पत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;"><strong>भदोही। </strong>जनपद के उच्चीकृत कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में प्रधानाचार्या एवं पीजीटी विभिन्न विषयों के पदों पर चयनित अभ्यर्थियों को सोमवार को जिलाधिकारी कक्ष में आयोजित कार्यक्रम के दौरान नियुक्ति पत्र वितरित किए गए। जिलाधिकारी शैलेष कुमार ने चयनित 21 अभ्यर्थियों में से उपस्थित 09 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र सौंपते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर जिलाधिकारी ने कहा कि शिक्षक समाज एवं राष्ट्र निर्माण का आधार स्तंभ होता है। विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की स्थापना दूरस्थ एवं</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178941/dm-gave-appointment-letters-to-the-candidates-selected-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260511-wa0020.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>भदोही। </strong>जनपद के उच्चीकृत कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में प्रधानाचार्या एवं पीजीटी विभिन्न विषयों के पदों पर चयनित अभ्यर्थियों को सोमवार को जिलाधिकारी कक्ष में आयोजित कार्यक्रम के दौरान नियुक्ति पत्र वितरित किए गए। जिलाधिकारी शैलेष कुमार ने चयनित 21 अभ्यर्थियों में से उपस्थित 09 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र सौंपते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर जिलाधिकारी ने कहा कि शिक्षक समाज एवं राष्ट्र निर्माण का आधार स्तंभ होता है। विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की स्थापना दूरस्थ एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिलाधिकारी ने नवचयनित शिक्षकों से पूर्ण समर्पण, अनुशासन एवं निष्ठा के साथ कार्य करने की अपील करते हुए कहा कि वे छात्राओं के सर्वांगीण विकास, नैतिक शिक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पर विशेष ध्यान दें। उन्होंने कहा कि विद्यालयों में सकारात्मक शैक्षिक वातावरण तैयार करना शिक्षकों की प्राथमिक जिम्मेदारी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में नियुक्ति पत्र प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों में उत्साह देखा गया। नवचयनित शिक्षकों ने भी अपने दायित्वों का ईमानदारीपूर्वक निर्वहन करने का संकल्प लिया। इस दौरान शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने चयन प्रक्रिया एवं विद्यालयों की कार्यप्रणाली से संबंधित जानकारी दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) कुंवर वीरेंद्र मौर्य, अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) विजय नारायण सिंह, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी शिवम पाण्डेय सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt">
<div class="hp"> </div>
<div class="eqJbab cZD3Qb"></div>
</div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 18:57:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऑपरेशन सिंदूर” की प्रथम वर्षगांठ सैन्य गरिमा एवं राष्ट्रभक्ति के साथ आयोजित।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>15 यूपी बटालियन एनसीसी प्रयागराज के तत्वावधान में “ऑपरेशन सिंदूर” की प्रथम वर्षगांठ चार दिवसीय कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत अत्यंत उत्साह, सैन्य अनुशासन एवं राष्ट्रभक्ति के वातावरण में मनाई गई। बटालियन मुख्यालय सहित विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में आयोजित कार्यक्रमों में एनसीसी कैडेट्स, एएनओ, पीआई स्टाफ तथा समस्त कॉम्बैटेंट एवं नॉन-कॉम्बैटेंट स्टाफ ने पूर्ण समर्पण एवं राष्ट्रीय गौरव के साथ सहभागिता की।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के प्रारम्भ में अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले में शहीद हुए निर्दोष नागरिकों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उल्लेखनीय है कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पर्यटकों एवं निहत्थे नागरिकों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178639/first-anniversary-of-%E2%80%9Coperation-sindoor%E2%80%9D-organized-with-military-dignity-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260508-wa0123.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>15 यूपी बटालियन एनसीसी प्रयागराज के तत्वावधान में “ऑपरेशन सिंदूर” की प्रथम वर्षगांठ चार दिवसीय कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत अत्यंत उत्साह, सैन्य अनुशासन एवं राष्ट्रभक्ति के वातावरण में मनाई गई। बटालियन मुख्यालय सहित विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में आयोजित कार्यक्रमों में एनसीसी कैडेट्स, एएनओ, पीआई स्टाफ तथा समस्त कॉम्बैटेंट एवं नॉन-कॉम्बैटेंट स्टाफ ने पूर्ण समर्पण एवं राष्ट्रीय गौरव के साथ सहभागिता की।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के प्रारम्भ में अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले में शहीद हुए निर्दोष नागरिकों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उल्लेखनीय है कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पर्यटकों एवं निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाकर एक वीभत्स आतंकी हमला किया गया था, जिसमें अनेक भारतीय न शहीदों की पुण्य स्मृति, दिवंगत आत्माओं की शांति तथा राष्ट्र की सुख- समृद्धि हेतु बटालियन परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य हवन-पूजन का आयोजन किया गया। उपस्थित कैडेट्स एवं स्टाफ ने राष्ट्र की सुरक्षा, एकता एवं शांति के लिए सामूहिक संकल्प भी लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">15 यूपी बटालियन एनसीसी प्रयागराज की कमान अधिकारी कर्नल ऋतु श्रीवास्तव ने कैडेट्स को संबोधित करते हुए कहा कि “ऑपरेशन सिंदूर” भारतीय सैन्य शक्ति, साहस एवं राष्ट्र की अखंडता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्होंने युवाओं को अनुशासन, नेतृत्व, साहस एवं राष्ट्रसेवा की भावना को जीवन में आत्मसात करने हेतु प्रेरित किया तथा कहा कि एनसीसी राष्ट्र निर्माण की वह सशक्त धारा है, जो युवाओं में कर्तव्यनिष्ठा एवं देशभक्ति का संचार करती है।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के अंतर्गत चित्रकला एवं पोस्टर निर्माण प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया, जिसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय, नेहरू ग्राम भारती मानित विश्वविद्यालय, नेशनल इंटर कॉलेज हंडिया , हंडिया पी जी कॉलेज एवं गोमती इण्टर कॉलेज फूलपुर के कैडेट्स एवं एएनओ ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया। प्रतिभागियों ने अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता, वीर सैनिकों के पराक्रम एवं मातृभूमि के प्रति समर्पण को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कर्नल ऋतु श्रीवास्तव ने प्रतिभागियों की रचनात्मक प्रतिभा एवं उत्साह की सराहना करते हुए कहा कि एनसीसी केवल प्रशिक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के प्रति समर्पित, अनुशासित एवं उत्तरदायी नागरिकों के निर्माण का सशक्त मंच है।</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 May 2026 20:47:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई गई।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज। </strong>रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर सरस्वती विद्या मंदिर माधव ज्ञान केंद्र में श्रद्धापूर्वक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय के प्रधानाचार्य, आचार्यगण एवं छात्र-छात्राओं ने गुरुदेव टैगोर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।इस अवसर पर मुख्य वक्ता सतीश शुक्ल ने गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि टैगोर जी ने भारतीय संस्कृति, शिक्षा एवं साहित्य को नई दिशा प्रदान की।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने विद्यार्थियों को टैगोर जी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का संदेश दिया।कार्यक्रम में विद्यालय के प्रधानाचार्य</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178500/rabindranath-tagores-birth-anniversary-was-celebrated-with-devotion"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260507-wa0106.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज। </strong>रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर सरस्वती विद्या मंदिर माधव ज्ञान केंद्र में श्रद्धापूर्वक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय के प्रधानाचार्य, आचार्यगण एवं छात्र-छात्राओं ने गुरुदेव टैगोर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।इस अवसर पर मुख्य वक्ता सतीश शुक्ल ने गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि टैगोर जी ने भारतीय संस्कृति, शिक्षा एवं साहित्य को नई दिशा प्रदान की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने विद्यार्थियों को टैगोर जी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का संदेश दिया।कार्यक्रम में विद्यालय के प्रधानाचार्य सहित समस्त आचार्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही। अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य अजय कुमार मिश्र ने भैया-बहनों को गुरुदेव टैगोर के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन पथ पर निरंतर आगे बढ़ने का शुभाशीष प्रदान किया।</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 19:57:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नए भारत का स्वर्णिम अध्याय: नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में विकास, शक्ति और वैश्विक प्रतिष्ठा की गाथा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">वर्ष 2014 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली। उस समय भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और उसकी जीडीपी लगभग 1.86 ट्रिलियन डॉलर थी। आज, एक दशक के भीतर भारत न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी प्रतिष्ठा भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। प्रति व्यक्ति आय का लगभग दोगुना हो जाना इस बात का प्रमाण है कि विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में आई यह तेजी केवल आंकड़ों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178327/the-golden-chapter-of-new-india-the-story-of-development"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa01634.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">वर्ष 2014 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली। उस समय भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और उसकी जीडीपी लगभग 1.86 ट्रिलियन डॉलर थी। आज, एक दशक के भीतर भारत न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी प्रतिष्ठा भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। प्रति व्यक्ति आय का लगभग दोगुना हो जाना इस बात का प्रमाण है कि विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में आई यह तेजी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक परिवर्तन का संकेत है। 2026 तक भारत की जीडीपी 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने का अनुमान है और 7.4 से 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बनाए हुए है। यह उपलब्धि सरकार की नीतियों, आर्थिक सुधारों और मजबूत नेतृत्व का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस परिवर्तन में अमित शाह की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने संगठन को मजबूत करते हुए भाजपा को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया। मोदी और शाह की जोड़ी ने राजनीति को केवल सत्ता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में जो बदलाव आया है, वह अभूतपूर्व है। सड़कों का विस्तार, हाईवे का निर्माण, रेलवे का आधुनिकीकरण और हवाई अड्डों की संख्या में वृद्धि—इन सभी ने भारत को एक नए युग में प्रवेश कराया है। आधुनिक ट्रेनों, विद्युतीकरण और सुरक्षा तकनीकों ने यात्रा को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाया है। गांवों तक सड़क और बिजली पहुंचाना विकास को समावेशी बनाने का प्रयास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डिजिटल इंडिया अभियान ने भारत को तकनीकी रूप से सशक्त बनाया है। यूपीआई जैसी व्यवस्था ने देश को डिजिटल भुगतान में अग्रणी बना दिया है। आज सरकारी सेवाएं मोबाइल पर उपलब्ध हैं, जिससे पारदर्शिता और गति दोनों में वृद्धि हुई है। यह परिवर्तन आम नागरिक के जीवन को आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामाजिक कल्याण की योजनाओं ने भी करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव लाया है। जन धन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी पहलों ने गरीब और वंचित वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ा है। यह केवल योजनाएं नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का प्रयास हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रेलवे क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ट्रैक का तेजी से विद्युतीकरण, आधुनिक ट्रेनों का संचालन, और सुरक्षा प्रणाली का विकास—इन सभी ने भारतीय रेलवे को नई पहचान दी है। पर्यावरण संरक्षण के लिए भी रेलवे ने सौर ऊर्जा, एलईडी लाइटिंग और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे कदम उठाए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का पुनर्विकास भी इस दौर की एक विशेष पहचान रहा है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर और महाकाल लोक जैसे प्रोजेक्ट्स ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को नया जीवन दिया है। यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कानूनी और नीतिगत सुधारों ने भी देश की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तीन तलाक कानून, अनुच्छेद 370 का हटाया जाना और नागरिकता संशोधन कानून जैसे फैसलों ने सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित किया है। इन निर्णयों को समर्थक जहां साहसिक कदम मानते हैं, वहीं आलोचक इनके प्रभावों पर चर्चा करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">विदेश नीति के क्षेत्र में भारत ने एक नई पहचान बनाई है। “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर आधारित नीति ने भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है। अमेरिका, रूस और अन्य प्रमुख देशों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखते हुए भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक दृष्टि से भी भाजपा का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। देश के अधिकांश राज्यों में पार्टी की मजबूत उपस्थिति यह दर्शाती है कि संगठन और नेतृत्व दोनों स्तरों पर पार्टी ने प्रभावी कार्य किया है। बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देना इसकी सफलता का आधार रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, इस विकास यात्रा में चुनौतियां भी मौजूद हैं। रोजगार सृजन, आय असमानता और कृषि क्षेत्र की समस्याएं ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन यह भी सच है कि सरकार इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सुधार की दिशा में प्रयासरत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र मोदी का नेतृत्व केवल प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक दृष्टिकोण है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना देखता है। “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य इसी सोच का परिणाम है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक संकल्प है, जिसे साकार करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमित शाह की रणनीतिक क्षमता और संगठनात्मक कौशल ने इस दृष्टिकोण को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने पार्टी को मजबूत करते हुए उसे हर स्तर पर सशक्त बनाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां वह न केवल अपने अतीत पर गर्व करता है, बल्कि भविष्य को लेकर भी आश्वस्त है। यह आत्मविश्वास पिछले कुछ वर्षों में हुए विकास का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भारत ने जिस गति से प्रगति की है, वह न केवल देशवासियों के लिए गर्व का विषय है, बल्कि दुनिया के लिए भी एक उदाहरण है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि यही दिशा और प्रयास जारी रहे, तो भारत जल्द ही एक विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, यह दौर केवल राजनीतिक सफलता का नहीं, बल्कि एक युग निर्माण का दौर है, जिसमें भारत अपनी नई पहचान गढ़ रहा है और वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">        <strong>*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 17:22:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्ञान,संस्कार और चरित्र से ही श्रेष्ठ  समाज और राष्ट्र का निर्माण</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विचार और सिद्धांत व्यक्ति के अंदर की अतः प्रज्ञा होती है। और यह सिद्धांत तथा अंतः विचारधारा जनमानस तक पहुंचने से बाधित किया जाए अंतरात्मा को प्रभावित करती है और इसके गहरे प्रभाव से व्यक्ति वह सब कर सकता है जो बिना मार्गदर्शन के व्यक्ति नहीं कर सकता। प्राचीन काल से अब तक वैचारिक सिद्धांत और विचारधारा सदैव समाज के दिग्दर्शक मार्गदर्शक रहे हैं। इनकी भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है।यदि यही सिद्धांत और अंतःप्रज्ञा जनमानस आत्मसात कर लेता है, तो इसका प्रभाव एक जन आंदोलन का रूप ले लेता है और यहीं से युग परिवर्तन की लहर प्रस्फुटित  होती है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176709/building-a-better-society-and-nation-only-through-knowledge-culture"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विचार और सिद्धांत व्यक्ति के अंदर की अतः प्रज्ञा होती है। और यह सिद्धांत तथा अंतः विचारधारा जनमानस तक पहुंचने से बाधित किया जाए अंतरात्मा को प्रभावित करती है और इसके गहरे प्रभाव से व्यक्ति वह सब कर सकता है जो बिना मार्गदर्शन के व्यक्ति नहीं कर सकता। प्राचीन काल से अब तक वैचारिक सिद्धांत और विचारधारा सदैव समाज के दिग्दर्शक मार्गदर्शक रहे हैं। इनकी भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है।यदि यही सिद्धांत और अंतःप्रज्ञा जनमानस आत्मसात कर लेता है, तो इसका प्रभाव एक जन आंदोलन का रूप ले लेता है और यहीं से युग परिवर्तन की लहर प्रस्फुटित  होती है।</p><p style="text-align:justify;"> प्राचीन यूनान में एक बहुत ही कुरूप किंतु विद्वान व्यक्ति रहते थे,उनके विचारों में मौलिकता,नयापन जनजागृति की अद्भुत क्षमता थी। उनकी विद्वता के कारण आम जनमानस होने राजा से ज्यादा महत्व और बुद्धिमान मानते थे। राजकीय तानाशाही के चलते उनके विचारों के कारण उनको मृत्युदंड दे दिया गया। जहर का प्याला पीने के बाद भी विद्वान, चिंतक, सुकरात अमर हो गए, उनकी विचारधारा आज भी जीवित है, एवं लोग उसे अपनाकर अपना जीवन सुधारने में इसका उपयोग करते हैं। </p><p style="text-align:justify;">अब्राहम लिंकन ने अमेरिकी स्वतंत्रता के बाद दास प्रथा के बारे में कहा था कि दास भी मनुष्य हैं, उन्हें भी उतना ही जीने का अधिकार है जितना स्वामी को है। अब्राहम लिंकन के आंदोलनकारी विचार से तत्कालीन समय में अमेरिका के लोग घबरा गए थे,और उनकी हत्या कर दी गई थी। पर अब्राहम लिंकन के विचारों ने दास प्रथा के उन्मूलन की अंतर आत्मा को जागृत कर दिया था, और जनमानस ने अपने अधिकारों के लिए लड़ते हुए दास प्रथा से मुक्ति पाई थी।<br /></p><p style="text-align:justify;">स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि हम जो सोचते हैं वही बन जाते हैं। विचार एवं सिद्धांत ही व्यक्ति का निर्माण करता है। वही दुष्ट होने या महान होने का निर्णायक है। और बिना विचारों सिद्धांतों के व्यक्त व्यक्ति का अस्तित्व ही नहीं । विवेकानंद जी के विचार सर्व कालीन प्रासंगिक है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उनके जीवित रहते हुए थे। आज हमारे बीच विवेकानंद जी स शरीर मौजूद नहीं है, पर उनके विचारों की महत्ता कायम है।भौतिक शरीर के नष्ट हो जाने से और भौतिक विचार तथा सिद्धांत उतनी ही तीव्रता रखते हैं, वेग रखते हैं, जो एक समाज में परिवर्तन ला सकती है।</p><p style="text-align:justify;">विचारों की यह अमरता तथा तीव्रता किसी भी तानाशाह के लिए इतनी खतरनाक है, जितनी की सुप्त शेर की गुफा में रहना। जनता के मध्य शुद्ध विचारधारा के जागृत होने पर क्रांति लाई जा सकती है। फिर चाहे वह फ्रांस के वर्साय के महल का विध्वंस हो अथवा भारत की स्वतंत्रता हेतु वृहद आंदोलन हो। व्यक्ति या व्यक्तियों के दबाव को दबाने के बाद विचारों की पीड़िता ने जनसामान्य को एक गरजते हुए सिंह में तब्दील कर दिया था। यह शाश्वत सत्य है कि व्यक्ति को जरूर आप दबा सकते हैं,पर विचारधारा सिद्धांत अजर अमर होते हैं,और वही युग निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाते हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">विचारों के संदर्भ में कहा जाता है कि एक व्यक्ति का विचार तब तक उस व्यक्ति के पास है, जब तक वह अकेला है किंतु जैसे ही विचारधारा एवं सिद्धांत का प्रचार प्रसार होता है, तो वह व्यक्ति अकेला ना रह कर उस जैसे हजारों लाखों लोग उसके साथ हो जाते हैं। तब वह अकेला नहीं रह जाता। वह अपने विचारों के माध्यम से जन सामान्य को प्रभावित कर लोगों को उस लड़ाई में शामिल कर लेता है, जिस लड़ाई के वह कभी अकेले नहीं लड़ सकता था। विचारों सिद्धांतों की तीव्रता आवेश तथा सघनता किसी भी क्रांतिकारी लक्ष्य की प्राप्ति में एक बड़ा साधक हो सकता है।</p><p style="text-align:justify;"> विचार व सिद्धांत एक से दूसरे व्यक्ति तक स्थानांतरित होते रहते हैं। जिसमें विचारों को सघनता प्राप्त होती है। ताकि सत्ता के दमन के समय वैचारिक अमरता स्थाई बनी रहे। चीन उत्तर कोरिया जैसे राष्ट्रों में विचारों के इस स्वतंत्र का प्रवाह को बाधित नियंत्रित कर दिया गया। अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों को प्रतिबंधित कर दमन चक्र चलाया गया। वहां विचार और सिद्धांत विद्वान व्यक्ति तक ही सीमित रहे उसका फैलाव या विस्तार नहीं हो पाया। जो मानव समाज तथा मानव अधिकारों की संवेदना तथा धाराओं का उल्लंघन भी है।<br /></p><p style="text-align:justify;">किसी स्वस्थ,स्वतंत्र राष्ट्र के लिए व्यक्ति समाज और राष्ट्र के विचारों की स्वतंत्रता नवीनता तथा उत्कृष्टता अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि विचारधारा और सिद्धांतों को रोक पाना किसी भी सत्ता या निरंकुश राजा के नियंत्रण में नहीं होता। विचारों और सिद्धांत अनादि काल से गतिशील है तथा अनंत तक जगत तक गतिशील रहेंगे,और उसका प्रतिपादक एवं अनुशीलन कर्ता विचारों के साथ अमर हो जाते हैं।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 18:39:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>जब व्यवस्था बोलती है, तो नाम सिविल सेवकों का होता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस उस अदृश्य शक्ति का उत्सव है जो देश की शासन व्यवस्था को गति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरता और दिशा प्रदान करती है। </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल को मनाया जाने वाला यह दिन उन सिविल सेवकों के योगदान को रेखांकित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल प्रशासनिक पदों पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि परिवर्तन के वाहक के रूप में कार्य करते हैं। ये अधिकारी योजनाओं को नीति-पत्रों से निकालकर समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ते हैं और विकास को जमीनी स्तर पर जीवंत बनाते हैं। संकट की घड़ी हो या विकास की चुनौती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी त्वरित निर्णय क्षमता और निष्ठा पूरे राष्ट्र को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176705/when-the-system-speaks-the-name-of-the-civil-servants"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/national_civil_services_day.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस उस अदृश्य शक्ति का उत्सव है जो देश की शासन व्यवस्था को गति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरता और दिशा प्रदान करती है। </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल को मनाया जाने वाला यह दिन उन सिविल सेवकों के योगदान को रेखांकित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो केवल प्रशासनिक पदों पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि परिवर्तन के वाहक के रूप में कार्य करते हैं। ये अधिकारी योजनाओं को नीति-पत्रों से निकालकर समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ते हैं और विकास को जमीनी स्तर पर जीवंत बनाते हैं। संकट की घड़ी हो या विकास की चुनौती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी त्वरित निर्णय क्षमता और निष्ठा पूरे राष्ट्र को संतुलन और विश्वास देती है। यह अवसर हमें उनके मौन लेकिन प्रभावशाली योगदान को समझने और एक ऐसे प्रशासन के निर्माण का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशील और जनकेंद्रित हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस का ऐतिहासिक आधार उतना ही प्रेरक है जितना इसका वर्तमान संदेश।</span> 21 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>1947 <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरदार वल्लभभाई पटेल ने दिल्ली के मेटकाफ हाउस में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय प्रशासनिक सेवा (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">आईएएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रथम बैच के परिवीक्षाधीन अधिकारियों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को संबोधित किया था। उन्होंने उन्हें ‘देश का स्टील फ्रेम’ (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो एक मजबूत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष और ईमानदार प्रशासन की राष्ट्र निर्माण में अनिवार्य भूमिका को दर्शाता है। उनका यह संदेश सिविल सेवकों के लिए निर्भीकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्षता और जनसेवा की स्पष्ट दिशा बन गया। यह दिवस उसी विचार को जीवंत करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब प्रशासनिक सेवाओं के महत्व को पुनः स्मरण करते हुए उनके योगदान को सम्मान और कृतज्ञता के साथ स्वीकार किया जाता है तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी निर्णायक भूमिका को और अधिक सशक्त करने का संकल्प लिया जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस का उद्देश्य सिविल सेवकों के योगदान को सम्मान देना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें जनसेवा में अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देना है। इस अवसर पर केंद्र सरकार द्वारा उत्कृष्ट कार्य करने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारियों/जिलों/संगठनों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री पुरस्कार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदान किए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उनके उल्लेखनीय प्रयासों और सफल क्रियान्वयन का सम्मान है। यह सम्मान न केवल उनकी मेहनत को मान्यता देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे प्रशासन तंत्र में बेहतर कार्य की प्रेरणा भी पैदा करता है। साथ ही यह दिन पारदर्शिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाबदेही और जन-केंद्रित शासन को मजबूत करने का संदेश देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि सरकारी योजनाएँ बिना बाधा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सकें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे देश में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक और आर्थिक विविधता अत्यधिक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिविल सेवकों की भूमिका केवल प्रशासन तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्र की जीवनरेखा के समान है। वे नीतियों को लागू करने वाले साधारण कार्यकर्ता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय और सामाजिक सद्भाव के वास्तविक रक्षक हैं। विकास योजनाओं को गाँव-गाँव तक पहुँचाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंचित और कमजोर वर्ग के अधिकारों को सुनिश्चित करना तथा समाज को एकता के सूत्र में बाँधना—ये सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ उनके कंधों पर होती हैं। संकट के समय उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। चाहे कोविड-</span>19 <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी महामारी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएँ हों या कोई अन्य राष्ट्रीय संकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिविल सेवक सदैव अग्रिम पंक्ति में रहकर देश को संभालते हैं। उनकी अटूट निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण और कर्तव्यपरायणता ही भारत को हर कठिन परिस्थिति में स्थिरता और प्रगति की दिशा प्रदान करती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का समय तकनीकी परिवर्तन और डिजिटल नवाचार का युग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने सिविल सेवकों की जिम्मेदारियों को पहले से अधिक व्यापक और जटिल बना दिया है। अब उन्हें पारंपरिक प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाकर शासन को अधिक पारदर्शी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेज और प्रभावी बनाना होता है। डिजिटल इंडिया जैसी पहलों ने ई-गवर्नेंस को मजबूत किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे ऑनलाइन सेवाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल लेन-देन और सरल प्रक्रियाएँ जनता तक सुविधाजनक रूप से पहुँच रही हैं। साथ ही साइबर सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेटा संरक्षण और डिजिटल जागरूकता जैसी नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। ऐसे में सिविल सेवकों का दायित्व है कि वे इन चुनौतियों का समाधान करते हुए प्रशासन को अधिक सक्षम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन-केंद्रित और भविष्य उन्मुख बनाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि भारत एक सशक्त डिजिटल राष्ट्र के रूप में निरंतर आगे बढ़ सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज सिविल सेवकों के सामने सामाजिक-आर्थिक असमानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरणीय संकट और जनसंख्या वृद्धि जैसी गंभीर चुनौतियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके लिए दीर्घकालिक और प्रभावी समाधान जरूरी हैं। इनसे निपटने के लिए नवाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग और दूरदर्शी सोच अपनाना आवश्यक है। आदर्श सिविल सेवक वही है जो निष्पक्षता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी और जवाबदेही के साथ जनहित को सर्वोपरि रखे। राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस इस विचार को मजबूत करता है और प्रशासन में सुधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षता और पारदर्शिता पर चिंतन का अवसर देता है। निरंतर प्रशिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी दक्षता और मजबूत व्यवस्था से सिविल सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है तथा जन-केंद्रित दृष्टिकोण से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रशासन वास्तव में जनता के हित में कार्य करे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस सिविल सेवकों के लिए आत्मचिंतन और कर्तव्यनिष्ठा को पुनः जागृत करने का प्रेरक अवसर है। यह दिन सरदार वल्लभभाई पटेल के उस विचार को फिर से सशक्त करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उन्होंने निष्पक्षता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी और जनता के प्रति जवाबदेही को सुशासन की आधारशिला बताया था। इस अवसर पर सिविल सेवकों को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संविधान और नागरिकों के हित में पूर्ण समर्पण के साथ कार्य करेंगे। उनकी यह निष्ठा ही भारत को मजबूत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने में आधार बनती है। यह दिवस उनके योगदान को सम्मान देने के साथ यह विश्वास भी जगाता है कि सिविल सेवाएँ ही राष्ट्र की एकता और विकास की वास्तविक शक्ति हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 18:30:32 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दायित्व बोध से ही श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्रख्यात चिंतक वाल्टेयर ने कहा था जितने अधिक अधिकार, उतनी अधिक जिम्मेदारी। यह कथन आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह संयम और जिम्मेदारी से संचालित हो अन्यथा वह स्वच्छंदता बनकर अराजकता को जन्म देती है। मानव सभ्यता के विकास की समूची यात्रा यदि किसी सूक्ष्म सूत्र में पिरोई जा सकती है, तो वह है,अधिकार और उत्तरदायित्व का संतुलन।</p>
<p style="text-align:justify;">यह संतुलन ही वह धुरी है, जिस पर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की संरचना और आधारशिला टिकती है। प्रख्यात चिंतक वाल्टेयर का यह कथन जितने अधिक अधिकार, उतनी अधिक जिम्मेदारी,केवल एक वाक्य नहीं,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174876/building-a-great-nation-through-a-sense-of-responsibility"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रख्यात चिंतक वाल्टेयर ने कहा था जितने अधिक अधिकार, उतनी अधिक जिम्मेदारी। यह कथन आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह संयम और जिम्मेदारी से संचालित हो अन्यथा वह स्वच्छंदता बनकर अराजकता को जन्म देती है। मानव सभ्यता के विकास की समूची यात्रा यदि किसी सूक्ष्म सूत्र में पिरोई जा सकती है, तो वह है,अधिकार और उत्तरदायित्व का संतुलन।</p>
<p style="text-align:justify;">यह संतुलन ही वह धुरी है, जिस पर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की संरचना और आधारशिला टिकती है। प्रख्यात चिंतक वाल्टेयर का यह कथन जितने अधिक अधिकार, उतनी अधिक जिम्मेदारी,केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन का शाश्वत सिद्धांत है। आज जब आधुनिकता के प्रवाह में मनुष्य अधिकारों की नई-नई परिभाषाएँ गढ़ रहा है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम अपने उत्तरदायित्वों के प्रति उतने ही सजग हैं जितने अपने अधिकारों के प्रति?</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता का अर्थ केवल बंधनों से मुक्ति नहीं है, बल्कि वह एक अनुशासित चेतना का नाम है। जब स्वतंत्रता संयम और उत्तरदायित्व से संचालित होती है, तभी वह समाज में समरसता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है; अन्यथा वही स्वतंत्रता स्वच्छंदता बनकर अराजकता को जन्म देती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने भी स्पष्ट कहा था कि कर्तव्यों के हिमालय से अधिकारों की गंगा बहती है, यह कथन इस मूल को इंगित करता है कि अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत हमारे कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला भारतीय संविधान में निहित है, जिसने नागरिकों को व्यापक मूल अधिकार प्रदान किए। यह व्यवस्था उन ऐतिहासिक विषमताओं को दूर करने के लिए थी, जिनसे समाज का एक बड़ा वर्ग पीड़ित रहा था। परंतु इसी संविधान ने मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया, ताकि अधिकारों का उपयोग संतुलित, मर्यादित और राष्ट्रहितकारी बना रहे। यह द्वंद्व नहीं, बल्कि द्वैत में एकता का अद्भुत उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में  माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देना नागरिक स्वतंत्रता की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इस अधिकार के साथ यह दायित्व भी जुड़ता है कि हम अपनी स्वतंत्रता का उपयोग इस प्रकार करें कि वह दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण न करे। अधिकारों की सीमा वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ दूसरे के अधिकारों का क्षेत्र आरंभ होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक युग में जागरूकता का विस्तार हुआ है, किंतु नैतिक अनुशासन और कर्तव्य-बोध अपेक्षित गति से विकसित नहीं हो पाए हैं। परिणामस्वरूप समाज में एक विचित्र असंतुलन दिखाई देता है।अधिकारों की माँग प्रबल है, किंतु उत्तरदायित्व के निर्वहन में शिथिलता स्पष्ट है। यही असंतुलन लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। संविधान के निर्माता डॉक्टर बी आर अंबेडकर जी ने चेताया था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह भी असफल हो जाएगा। यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नागरिकों के चरित्र और जिम्मेदारी पर निर्भर करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इस विश्वास के साथ चुनती है कि वे लोककल्याण की भावना से शासन करेंगे। किंतु जब जनप्रतिनिधि अधिकारों के मद में अपने उत्तरदायित्वों को विस्मृत कर देते हैं, तब शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और निरंकुशता का प्रवेश हो जाता है। इस संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का यह कथन स्मरणीय है जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन तभी संभव है, जब जनता स्वयं अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन भारतीय चिंतन में भी अधिकार और कर्तव्य के इस संतुलन को अत्यंत महत्व दिया गया है। ऐतिहासिक चिंतक कौटिल्य ने अपने ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में स्पष्ट कहा है कि जिस राज्य की प्रजा कष्ट में हो, वहाँ शासक का वैभव नैतिक रूप से अनुचित है। यह विचार शासन और समाज के बीच उत्तरदायित्व की गहरी कड़ी को उजागर करता है।सार्वजनिक जीवन में भी यह सिद्धांत समान रूप से लागू होता है। स्वच्छ सड़कें, शुद्ध जल, सुरक्षित वातावरणये सभी हमारे अधिकार हैं, किंतु इन्हें बनाए रखना हमारा दायित्व भी है। पर्यावरण संकट इसका ज्वलंत उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">दलाई लामा जी ने कहा है कि यह पृथ्वी हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली, बल्कि हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है। यदि हम इस उधार को संजोकर नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। आज मूल जरूरत इस बात की है कि हम अधिकार और उत्तरदायित्व के बीच कृत्रिम विभाजन को समाप्त करें और उन्हें एक समग्र दृष्टि से देखें। ये दोनों विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हैं,एक के बिना दूसरा अधूरा है। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जितना सजग होता है, उतना ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी हो जाता है, तभी समाज में संतुलन और समरसता स्थापित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों या नीतियों का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक के छोटे-छोटे प्रयासों से निर्मित होता है। एक ईमानदार करदाता, एक सजग मतदाता, एक जिम्मेदार नागरिक,ये सभी राष्ट्र की नींव को मजबूत करते हैं। स्वामी विवेकानंद जी  का यह आह्वान आज भी उतना ही प्रासंगिक है उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। यह लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं, बल्कि एक सशक्त, समृद्ध और नैतिक राष्ट्र के निर्माण का है।</p>
<p style="text-align:justify;">अतः यह स्पष्ट है कि अधिकार और उत्तरदायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,अविभाज्य, अपरिहार्य और परस्पर पूरक। यदि हम केवल अधिकारों की माँग करेंगे और कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे, तो लोकतंत्र का स्वरूप विकृत हो जाएगा। किंतु यदि हम इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर पाए, तो न केवल लोकतंत्र सुदृढ़ होगा, बल्कि राष्ट्र भी उन्नति के शिखर पर पहुँचेगा।<br />समय की पुकार यही है कि हम अपने भीतर उत्तरदायित्व की उस ज्योति को प्रज्वलित करें, जो अधिकारों को प्रकाशमान करती है। यही सच्चा राष्ट्र-चिंतन है, यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही भविष्य का पथ भी।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 17:32:17 +0530</pubDate>
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                <title>राष्ट्रीय सेवा योजना सामाजिक संवेदनशीलता और मानव मूल्यों के विकास का सशक्त माध्यम है : प्रो. सत्येंद्र कुमार दूबे</title>
                                    <description><![CDATA[<div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता </strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर, </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के  राष्ट्रीय सेवा योजना की तीनों इकाइयों — भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई इकाई, महारानी अहिल्या बाई होलकर इकाई एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इकाई — के सप्त दिवसीय विशेष शिविर के तृतीय दिवस पर सोमवार को  जनजागरण एवं स्वच्छता अभियान के साथ बौद्धिक सत्र का आयोजन किया गया। स्वयंसेवक-स्वयंसेविकाओं ने शिविर स्थल की स्वच्छता के पश्चात ग्राम संग्रामपुर में जनसंपर्क कर स्वच्छता, सेवा भाव एवं जनसहभागिता के प्रति ग्रामीणों को जागरूक किया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बौद्धिक सत्र में अध्यक्षता करते हुए प्रो. सत्येन्द्र कुमार दुबे (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग) ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना युवाओं</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173039/national-service-scheme-is-a-powerful-medium-for-development-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1773061459179.jpg" alt=""></a><br /><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता </strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर, </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के  राष्ट्रीय सेवा योजना की तीनों इकाइयों — भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई इकाई, महारानी अहिल्या बाई होलकर इकाई एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इकाई — के सप्त दिवसीय विशेष शिविर के तृतीय दिवस पर सोमवार को  जनजागरण एवं स्वच्छता अभियान के साथ बौद्धिक सत्र का आयोजन किया गया। स्वयंसेवक-स्वयंसेविकाओं ने शिविर स्थल की स्वच्छता के पश्चात ग्राम संग्रामपुर में जनसंपर्क कर स्वच्छता, सेवा भाव एवं जनसहभागिता के प्रति ग्रामीणों को जागरूक किया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बौद्धिक सत्र में अध्यक्षता करते हुए प्रो. सत्येन्द्र कुमार दुबे (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग) ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना युवाओं के चरित्र निर्माण, सामाजिक संवेदनशीलता और मानव मूल्यों के विकास का सशक्त माध्यम है। समाज को सकारात्मक दिशा देने में धैर्य, सहनशीलता और सेवा भाव जैसे गुणों का विशेष महत्व है,</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> जिन्हें एनएसएस के माध्यम से विकसित किया जाता है। मुख्य वक्ता डॉ. अरविन्द कुमार रावत (सहायक आचार्य, लोक प्रशासन विभाग) ने कहा कि आदर्श, मानव मूल्य और लोक संस्कृति के संरक्षण में राष्ट्रीय सेवा योजना की महत्वपूर्ण भूमिका है। एनएसएस के स्वयंसेवक समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना के साथ एक आदर्श नागरिक के रूप में समाज निर्माण में सक्रिय योगदान देते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में डॉ. विशाल गुप्ता तथा डॉ. विमल चन्द्र वर्मा ने भी राष्ट्र निर्माण, सामाजिक सौहार्द एवं स्वच्छता के महत्व पर विचार व्यक्त किए। संध्या सत्र में स्वयंसेवक-स्वयंसेविकाओं द्वारा महिला दिवस, लोक संस्कृति और सामाजिक मूल्यों पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी गईं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम का संचालन डॉ. यशवन्त यादव के निर्देशन में हुआ। स्वागत एवं आभार डॉ. सरिता सिंह द्वारा व्यक्त किया गया।</div></div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 22:04:24 +0530</pubDate>
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