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                <title>Lord Ram - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Lord Ram RSS Feed</description>
                
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                <title>त्याग और समर्पण की देवी - माँ जानकी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ई0 प्रभात किशोर</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जनहितकारी भयहारी ।,अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुन्दर सिंहासन तेहिं पर आसन कोटि हुताशन द्युतिकारी ।, सिर छत्र बिराजै सखि संग भाजै निज-निज कारज करधारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुर सिद्ध सुजाना हनै निशाना चढ़े बिमाना समुदाई।, बरसहिं बहुफूला मंगल मूला अनुकूला सिया गुन गाई ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">दम्पति अनुरागेउ प्रेम सुपागेउ यह सुख लायउं मनलाई।, अस्तुति सिय केरी प्रेमलतेरी बरनि सुचेरी सिर नाई ।। </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में जानकी नवमी या सीता नवमी का काफी महत्व है। जनक नंदिनी और भगवान राम की अद्र्धांगिनी मां सीता का प्रकटीकरण वैशाख मास के शुक्ल पक्ष</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177278/goddess-of-sacrifice-and-dedication-maa-janaki"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/sita-navami-730_1682620129.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ई0 प्रभात किशोर</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जनहितकारी भयहारी ।,अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुन्दर सिंहासन तेहिं पर आसन कोटि हुताशन द्युतिकारी ।, सिर छत्र बिराजै सखि संग भाजै निज-निज कारज करधारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुर सिद्ध सुजाना हनै निशाना चढ़े बिमाना समुदाई।, बरसहिं बहुफूला मंगल मूला अनुकूला सिया गुन गाई ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">दम्पति अनुरागेउ प्रेम सुपागेउ यह सुख लायउं मनलाई।, अस्तुति सिय केरी प्रेमलतेरी बरनि सुचेरी सिर नाई ।। </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में जानकी नवमी या सीता नवमी का काफी महत्व है। जनक नंदिनी और भगवान राम की अद्र्धांगिनी मां सीता का प्रकटीकरण वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। यह शुभ दिवस रामनवमी के ठीक एक माह बाद पड़ता है और पूरे देश में धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">माँ सीता मिथिला के राजा (जिसे विदेह भी कहा जाता है) राजा जनक की दत्तक पुत्री थी, इसलिए उन्हें जानकी या जनक नंदिनी के नाम से भी संबोधित किया जाता है। सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार राजा जनक बिहार के वर्तमान सीतामढ़ी में एक यज्ञ अनुष्ठान के दौरान भूमि की जुताई कर रहे थे। इस दौरान उन्हें खेत के गड्ढे में एक सोने के घड़े में एक बच्ची मिली, जिसे निःसंतान राजा ने दिव्य उपहार स्वरूप अपनी प्यारी बेटी के रूप में अपना लिया। श्री राम भगवान विष्णु के अवतार थे और माँ सीता को उनकी पत्नी देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। भूमि के गर्भ से प्रकट होने के कारण उन्हें भूमिजा भी कहा जाता है।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">प्रभु श्री राम और मां सीता को एक आदर्श युगल माना जाता है। हालाँकि उनके सांसारिक मार्ग में अनेकानेक बाधाएँ आईं, लेकिन अपने संबंधों को लेकर वे सदैव अटल रहे। माँ सीता का चरित्र मानव जगत में एक आदर्श महिला का प्रतीक है और लगभग सभी परिवारों में यह आकांक्षा रहती है कि उनके यहां बेटी, जीवनसाथी, बहू, भाभी या माँ के रूप में देवी सीता जैसी कन्या हो। वे अपने समर्पण, ईमानदारी, साहस, पवित्रता और आत्म-बलिदान के लिए जानी जाती हैं। वे एक राजकुमारी थी, लेकिन वनवास गमन में पतिव्रता स्त्री की भांति उन्होने अपने पति का साथ दिया। वह लक्ष्मण और हनुमान को अपने भाई और पुत्र के रूप में प्यार करती थी। उन्होंने छद्म साधु वेशधारी रावण को भिक्षा देकर गरीबों और संतों की मदद करने की परंपरा का पालन किया। अपहरण के दौरान वानरों के बीच अपने आभूषण फेंककर उन्होने बुद्धिमत्ता का परिचय दिया, जो बाद में श्री राम-सेना को अपहरण मार्ग का पता लगाने में सहायक सिद्ध हुआ। अपहरण के बाद, उन्होने रावण को अपने कुकर्मों के कारण उसके वंश के सर्वनाश की चेतावनी भी दी।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">गर्भावस्था के दौरान सीता अपने अलगाव या अनौपचारिक तलाक से अप्रसन्न एवं कुंठित थीं, परन्तु उन्होने इस विकट परिस्थिति का साहसपूर्वक सामना किया । उन्होने अपने बच्चों को जन्म देने और उन्हें सभी गुणों से लैस करने का निर्णय किया। अपनी मानव जीवनयात्रा के अंतिम दौर में वे एक एकल माँ के रूप में रहीं। उन्होने स्वयं को पीड़ित नहीं माना और समान अधिकारों की मांग के लिए अयोध्या वापस नहीं गई। वे राजा एवं पति के बीच भूमिका चुनने में श्री राम के आंतरिक द्वंद को समझती थी। उन्होंने राजा जनक के परिवार की प्यारी बेटी, दशरथ के परिवार की बहू, प्रभु राम की पत्नी और अंत में महाराज लव एवं कुश की माँ के रूप में अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन किया। जब लव और कुश को अयोध्या की प्रजा और पिता राम ने स्वीकार कर लिया, तो माता के रूप में उनकी अंतिम भूमिका भी पूर्ण हो गई और वह इस क्रूर जगत, जहां पवित्रता हेतु महिलाओं से प्रमाण की आवश्यकता होती है, से मुक्ति पाने के लिए धरती माता के गर्भ में वापस लौट आईं।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">जानकी नवमी के शुभ दिवस पर, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सफल जीवन के लिए उपवास रखती हैं और आशीर्वाद हेतु श्री राम और मां सीता की पूजा-अर्चना करती हैं। राम, सीता और लक्ष्मण  के साथ-साथ धरती माता का प्रतिनिधित्व करने वाले हल की भी पूजा का विधान है। भक्तजन ऋग्वेद 4.57.6 के सीता श्लोक का जाप कर उनकी वंदना करते हैं- ‘‘<em>अर्वाची सुभगे भवः सीते वंदामहे त्वा । यथा नः सुभगास्सि यथाः नः सुफलास्सि</em> ।।‘‘  (हे मां सीते, हमें दर्शन दीजिए । हम आपके समक्ष शीश झुकाते हैं। हे रिद्धि-सिद्धि की सर्वोच्च देवी, कृपया अपनी दया और उदारता दिखाएं और हमारे लिए शुभ फलप्राप्ति के अग्रदूत बनें )।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> माँ सीता, उनका चरित्र और संघर्षमय जीवन भारतीय उपमहाद्वीप की समृद्ध संस्कृति का अभिन्न अंग है। ऐसी मान्यता है कि जानकी नवमी पर पूजा-अनुष्ठान और व्रत करने से विनय, मातृत्व, त्याग और समर्पण जैसे गुणों की प्राप्ति होती है और एक सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:35:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>प्रज्ञा पुराण कथा सुनने से धन्य हो जाता है मानव जीवन : कैलाश नाथ तिवारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता </strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर,  </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नगर पंचायत बिस्कोहर क्षेत्र के भरौली कैथोलिया में चल रहे गायत्री महायज्ञ एवं प्रज्ञा पुराण कथा के पहले दिन वृहस्पतिवार रात श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे नजर आए। कथा व्यास कैलाश नाथ तिवारी ने प्रज्ञा पुराण की रोचक कथा सुनाते हुए इसके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला।कथा के दौरान उन्होंने कहा कि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा रचित प्रज्ञा पुराण केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक है। इसके अध्ययन से व्यक्ति के जीवन में आने वाले अनेक संकट दूर होते हैं और परिवार को उन्नति के मार्ग</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173023/human-life-becomes-blessed-by-listening-to-pragya-purana-katha"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1772803543856.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता </strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर,  </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नगर पंचायत बिस्कोहर क्षेत्र के भरौली कैथोलिया में चल रहे गायत्री महायज्ञ एवं प्रज्ञा पुराण कथा के पहले दिन वृहस्पतिवार रात श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे नजर आए। कथा व्यास कैलाश नाथ तिवारी ने प्रज्ञा पुराण की रोचक कथा सुनाते हुए इसके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला।कथा के दौरान उन्होंने कहा कि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा रचित प्रज्ञा पुराण केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक है। इसके अध्ययन से व्यक्ति के जीवन में आने वाले अनेक संकट दूर होते हैं और परिवार को उन्नति के मार्ग पर ले जाने की प्रेरणा मिलती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कथा व्यास ने भगवान विष्णु और नारद के संवाद का भी भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि नारद जी ने भगवान विष्णु से प्रश्न किया कि त्रेता युग में श्रीराम और द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर आपने पृथ्वी को पापों से मुक्त किया, लेकिन कलयुग में मनुष्य अनेक दुखों और परेशानियों से घिरा हुआ है। ऐसे में उसके दुखों का अंत कैसे होगा।</div><div style="text-align:justify;">इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि कलयुग में मनुष्य के दुखों से मुक्ति पाने और सांसारिक भवसागर से पार होने का सरल उपाय प्रज्ञा पुराण का अध्ययन और उसके आदर्शों को जीवन में अपनाना है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कथा के समापन पर श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण किया गया। इस अवसर पर मिठाई लाल यादव, आदर्श राम मौर्य, जंगली यादव, लवकुश यादव सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 21:14:34 +0530</pubDate>
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