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                <title>Human Values - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मैम, मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं.. और सब कुछ बदल गया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ फैसले दिमाग में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यता की भीगी तहों में जन्म लेते हैं। वे तर्क से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनदेखे दर्द की प्रतिध्वनि से आकार लेते हैं और फिर एक जीवन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंख्य संवेदनाओं का अर्थ बदल देते हैं। ऐसा ही एक क्षण मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा की अधिकारी और वर्तमान में सिंगरौली नगर निगम की आयुक्त (कमिश्नर) सविता प्रधान के जीवन में आया। सोशल मीडिया पर अंतिम चरण से जूझ रही एक बच्ची की सहज पंक्ति—“मैम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं”—इन सात शब्दों ने वर्षों से बंद स्मृतियों के द्वार खोल दिए।</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184617/maam-i-love-your-hair-and-everything-changed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1.-prof.-rkjain.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ फैसले दिमाग में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यता की भीगी तहों में जन्म लेते हैं। वे तर्क से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनदेखे दर्द की प्रतिध्वनि से आकार लेते हैं और फिर एक जीवन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंख्य संवेदनाओं का अर्थ बदल देते हैं। ऐसा ही एक क्षण मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा की अधिकारी और वर्तमान में सिंगरौली नगर निगम की आयुक्त (कमिश्नर) सविता प्रधान के जीवन में आया। सोशल मीडिया पर अंतिम चरण से जूझ रही एक बच्ची की सहज पंक्ति—“मैम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं”—इन सात शब्दों ने वर्षों से बंद स्मृतियों के द्वार खोल दिए। उनकी माँ तीन बार कैंसर से लड़ी थीं। कीमोथेरेपी के बाद सिर का सूनापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईने में अपरिचित चेहरा और भीतर चुपचाप दरकता आत्मसम्मान—यह सब उनके लिए सुनी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जी हुई सच्चाइयाँ थीं। इसलिए वह वाक्य प्रशंसा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ा की मौन पुकार था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने पहले उनके अंतर्मन को भिगो दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान वह नहीं होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे वह अपने पास रखता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे वह बिना हिचक किसी और के लिए छोड़ देता है। दो दिन बाद जब सविता प्रधान के लंबे बाल ज़मीन पर गिरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब केवल केश नहीं कटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी सौंदर्य का अदृश्य मुकुट भी उतर गया। उन्हीं बालों से बनी विग उस बच्ची तक पहुँची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए आईना अब तक बीमारी का दूसरा नाम था। सविता प्रधान ने सार्वजनिक रूप से लिखा कि असली सुंदरता बालों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आभूषणों या बाहरी आडंबर में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास में बसती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बिना झिझक इसी रूप में कार्यालय जाएँगी। उस दिन उनका साफ माथा केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं रहा</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पूरे शहर के सामने मौन संदेश बन गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने बता दिया कि स्वेच्छा से किया गया त्याग उपदेश नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे अनमोल पूँजी सुख नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पीड़ा है जो मनुष्य को दूसरों के आँसू पढ़ना सिखा देती है। सविता प्रधान की यात्रा सहज नहीं थी। बाल विवाह की अँधेरी गलियों से निकलकर उन्होंने घरेलू हिंसा की यातनाएँ झेली थीं। जीवन ने उन्हें बार-बार गिराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर बार वे अधिक दृढ़ होकर उठीं। मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा तक पहुँचना केवल प्रतियोगी परीक्षा में सफलता नहीं था</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह टूटे आत्मविश्वास के पुनर्जन्म का इतिहास था। शायद इसी कारण वे समझ सकीं कि रोशनी का अर्थ केवल स्वयं प्रकाशित होना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि किसी और के अँधेरे में अपनी लौ पहुँचा देना भी है। तभी एक बच्ची की पीड़ा उन्हें अपनी पीड़ा से अलग नहीं लगी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वही साझा दर्द करुणा बनकर उनके निर्णय में उतर आया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि लोग बुराई पर विश्वास कर लेते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि उन्हें अच्छाई पर भरोसा नहीं होता। सविता प्रधान का बदला हुआ रूप सामने आते ही सवाल उठने लगे—क्या परिवार में कोई शोक हुआ है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या कोई निजी संकट है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या इसके पीछे कोई छिपा कारण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने सहजता से कहा कि सब कुछ कुशल-मंगल है और यह कदम पूरी तरह उनकी अपनी इच्छा का है। उनका उत्तर केवल अफवाहों का खंडन नहीं था</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने उस सोच को भी बेनकाब कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हर सद्भावना में स्वार्थ तलाशती है। उन्होंने शब्दों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आचरण से सिद्ध किया कि करुणा को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर दिन दफ्तरों के दरवाज़े खुलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बहुत कम दिनों में किसी दिल का दरवाज़ा खुलता है। जिस दिन ऐसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था कागज़ों से निकलकर इंसानियत की भाषा बोलने लगती है। सविता प्रधान का बदला चेहरा भी हर सुबह मौन संदेश बनकर कार्यालय पहुँचा होगा। उन्होंने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने कर्मों से बता दिया कि अधिकारी केवल नियमों और फाइलों के लिए नहीं होते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे उन अनदेखे आँसुओं के लिए भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं होते। एक छोटी बच्ची की मासूम इच्छा ने प्रशासन और समाज के बीच खड़ी कठोर दीवार में संवेदना की ऐसी दरार बना दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ से दया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनापन और विश्वास की रोशनी भीतर उतर आई। उसी क्षण पद का वैभव पीछे छूट गया और मनुष्यता सबसे आगे खड़ी दिखाई दी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे बड़ी विरासत संपत्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना होती है। जो मनुष्य अपने दर्द को दूसरों के आँसू पोंछने की शक्ति बना लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय उसके लिए अलग इतिहास लिखता है। सविता प्रधान की माँ का तीन बार कैंसर से संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं उनका कठिन जीवन और फिर एक अनजान बच्ची के लिए अपने बाल समर्पित कर देना—ये तीनों घटनाएँ अलग-अलग नहीं हैं। ये एक ही जीवन-दर्शन के सूत्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बताते हैं कि पीड़ा यदि मनुष्य को कठोर न बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही उसे असाधारण बना देती है। चरित्र वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परिस्थितियों के थपेड़ों से नहीं बदलता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बाल कट जाने पर भी कम नहीं होता और पद छूट जाने पर भी समाप्त नहीं होता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यता का सबसे उजला क्षण वह होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई अपना सबसे प्रिय किसी अनजान की उम्मीद के नाम कर देता है। सविता प्रधान का निर्णय भी ऐसा ही क्षण है। यह केवल एक बच्ची के चेहरे पर मुस्कान लौटाने की घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे तंत्र के सामने रखा आईना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें व्यवस्था अपना मानवीय चेहरा देख सकती है। नियम आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संवेदना उससे भी अधिक। कागज़ निर्णय लिख सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी टूटे मन में जीने का साहस नहीं। सविता प्रधान ने सिद्ध कर दिया कि सत्ता का सर्वोच्च रूप आदेश देना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं का एक अंश किसी और के जीवन को समर्पित करना है। अब जब वह बच्ची आईने के सामने खड़ी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके सिर पर केवल विग नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी अजनबी के विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता और आत्मबल का स्पर्श भी होगा। शायद वही स्पर्श उसे जीवन भर यह भरोसा देगा कि दुनिया आज भी सुंदर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कुछ लोग अपने हिस्से की चमक बाँटकर दूसरों के जीवन में उजाला लिखना जानते हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 22:05:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संजीव-नी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव-नी।</strong><br /><br />माँ की सीख, पिता का अनुशासन<br /><br />माँ ने ऊँची आवाज़ में<br />बड़े बोल नहीं बोले<br />उन्होंने रोटी पर सीख मिला दी<br />मैं उसके स्वाद के संग<br />बड़ा होता रहा।<br /><br />पिता ने कम शब्द रखे ,<br />उनके मौन का अनुशासन<br />घड़ी की तरह चलता रहा<br />जब भी मैं भटकने लगा,<br />माँ की उँगली ने भीतर से<br />मेरा हाथ पकड़ लिया।<br /><br />जब भी मैं ठिठका<br />ठहरने लगा,<br />पिता की दूर-दृष्टि ने<br />मुझे फिर चलना सिखाया।<br /><br />माँ ने बताया कि मनुष्य होना<br />कोई अग्नि परीक्षा नहीं,<br />हर दिन का अभ्यास है।<br /><br />पिता ने सिखाया<br />ईमानदारी अलंकार नहीं<br />जीवन की आवश्यकता।<br />आज भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183953/sanjeevani"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>संजीव-नी।</strong><br /><br />माँ की सीख, पिता का अनुशासन<br /><br />माँ ने ऊँची आवाज़ में<br />बड़े बोल नहीं बोले<br />उन्होंने रोटी पर सीख मिला दी<br />मैं उसके स्वाद के संग<br />बड़ा होता रहा।<br /><br />पिता ने कम शब्द रखे ,<br />उनके मौन का अनुशासन<br />घड़ी की तरह चलता रहा<br />जब भी मैं भटकने लगा,<br />माँ की उँगली ने भीतर से<br />मेरा हाथ पकड़ लिया।<br /><br />जब भी मैं ठिठका<br />ठहरने लगा,<br />पिता की दूर-दृष्टि ने<br />मुझे फिर चलना सिखाया।<br /><br />माँ ने बताया कि मनुष्य होना<br />कोई अग्नि परीक्षा नहीं,<br />हर दिन का अभ्यास है।<br /><br />पिता ने सिखाया<br />ईमानदारी अलंकार नहीं<br />जीवन की आवश्यकता।<br />आज भी मेरे भीतर<br />एक रसोई धुआँ नहीं<br />संस्कार पकाती,<br />एक आँगन में<br />अनुशासन की धूप<br />में उजाला फैला ।<br /><br />मैं जहाँ भी पैर रखता ,<br />माँ की सीख<br />मेरे शब्दों को तौलती ,<br />पिता का अनुशासन<br />मेरे कदमों को रास्तों की<br />पहचान से पहले<br />ठोकरों से अवगत करा देता।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य/ज्योतिष</category>
                                            <category>कविता/कहानी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 22:25:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रीभूमि जिले के सोनबील दरगारबंद में डिजिटल क्रिएटर ग्रुप ने कराया सुजय दास का अंतिम संस्कार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>श्रीभूमि- </strong>कहते हैं कि इंसानियत की असली पहचान कठिन समय में होती है। जब किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देना भी मुश्किल हो जाए, तब मदद के लिए बढ़ा एक हाथ मानवता की सबसे बड़ी मिसाल बन जाता है। श्रीभूमि जिले के सोनबील दरगारबंद में ऐसी ही एक घटना सामने आई, जहां आर्थिक संकट से जूझ रहे एक परिवार की मदद के लिए सनबिल डिजिटल क्रिएटर ग्रुप के सदस्य आगे आए। श्रीभूमि जिले के सोनबील दरगारबंद निवासी सुजय दास लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे। रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के बाद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183798/digital-creator-group-performed-the-last-rites-of-sujay-das"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1001635293.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>श्रीभूमि- </strong>कहते हैं कि इंसानियत की असली पहचान कठिन समय में होती है। जब किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देना भी मुश्किल हो जाए, तब मदद के लिए बढ़ा एक हाथ मानवता की सबसे बड़ी मिसाल बन जाता है। श्रीभूमि जिले के सोनबील दरगारबंद में ऐसी ही एक घटना सामने आई, जहां आर्थिक संकट से जूझ रहे एक परिवार की मदद के लिए सनबिल डिजिटल क्रिएटर ग्रुप के सदस्य आगे आए। श्रीभूमि जिले के सोनबील दरगारबंद निवासी सुजय दास लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे। रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के बाद वह काफी समय से बिस्तर पर थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने जीवन के संघर्ष को जारी रखा। लेकिन आखिरकार गत 16 जुलाई की शाम उन्होंने अंतिम सांस ली। सुजय दास के निधन के बाद परिवार के सामने एक नई परेशानी खड़ी हो गई। आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के कारण अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना संभव नहीं हो पा रहा था। परिजनों के अनुसार, सहायता के लिए कई जगहों पर संपर्क किया गया, लेकिन समय पर कोई प्रभावी सहयोग नहीं मिल सका।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस कारण उनका पार्थिव शरीर रातभर घर में ही रखा रहा। इसी दौरान सुजय दास की पुत्री की सहायता की अपील सोनबील डिजिटल क्रिएटर ग्रुप के सदस्यों तक पहुंची। सूचना मिलते ही ग्रुप के सदस्य और कुछ स्थानीय संवेदनशील लोग तुरंत परिवार के पास पहुंचे और अंतिम संस्कार की व्यवस्था में जुट गए। ग्रुप के सदस्यों ने आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराते हुए सुजय दास को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इस घटना ने समाज के सामने एक गंभीर सवाल भी खड़ा किया। जहां कुछ लोगों ने आगे बढ़कर मानवता का परिचय दिया, वहीं दूसरी ओर यह भी देखने को मिला कि इस कठिन समय में गांव के अधिकांश लोग परिवार की सहायता के लिए आगे नहीं आए। केवल कुछ वरिष्ठ नागरिकों और संवेदनशील लोगों ने ही परिवार का साथ दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्तमान समय में जब सामाजिक संवेदनाएं कमजोर होती दिखाई दे रही हैं, ऐसे प्रयास समाज के लिए प्रेरणादायक हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोनबील डिजिटल क्रिएटर ग्रुप की पहल ने यह साबित किया कि सोशल मीडिया केवल सूचना प्रसार का माध्यम नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सहायता का प्रभावी जरिया भी बन सकता है। किसी व्यक्ति को मृत्यु के बाद सम्मानजनक विदाई मिलना केवल परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। दरगारबंद की यह घटना हमें मानवता, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी का महत्व याद दिलाती है।“मानवता की खूबसूरती तब और बढ़ जाती है, जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के किसी असहाय के साथ खड़ा होता है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>असम हिमाचल प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 21:46:04 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>विश्व क्षमा दिवस आत्मशुद्धि और मानवता का अमृत पर्व</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">हर वर्ष 7 जुलाई को विश्व क्षमा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को पुराने मतभेदों, कटु स्मृतियों और वैरभाव को भुलाकर स्वयं तथा दूसरों को क्षमा करने के लिए प्रेरित करना है। वर्ष 1994 में कनाडा में क्राइस्ट्स एंबेसडर्स क्रिश्चियन एंबेसी द्वारा इस दिवस की शुरुआत की गई थी। आज यह दिन केवल किसी एक देश या समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया में शांति, प्रेम, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का संदेश देने वाला अवसर बन चुका है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ के बीच क्षमा का महत्व पहले से कहीं</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182784/world-forgiveness-day-the-nectar-of-self-purification-and-humanity"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">हर वर्ष 7 जुलाई को विश्व क्षमा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को पुराने मतभेदों, कटु स्मृतियों और वैरभाव को भुलाकर स्वयं तथा दूसरों को क्षमा करने के लिए प्रेरित करना है। वर्ष 1994 में कनाडा में क्राइस्ट्स एंबेसडर्स क्रिश्चियन एंबेसी द्वारा इस दिवस की शुरुआत की गई थी। आज यह दिन केवल किसी एक देश या समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया में शांति, प्रेम, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का संदेश देने वाला अवसर बन चुका है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ के बीच क्षमा का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह केवल एक शब्द नहीं बल्कि जीवन को प्रकाशमान करने वाली ऐसी साधना है, जो व्यक्ति के भीतर के अंधकार को समाप्त कर देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्षमा का अर्थ केवल किसी से औपचारिक रूप से यह कह देना नहीं कि "मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ।" वास्तविक क्षमा हृदय की अनुभूति है। जब मन से क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध का भाव समाप्त हो जाता है, तभी सच्ची क्षमा जन्म लेती है। क्षमा अंतरात्मा का वह प्रकाश है जो मनुष्य को भीतर से निर्मल और शांत बनाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में क्षमा को धर्म, तप और महानता का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि "क्षमा वीरस्य भूषणम्", अर्थात क्षमा वीरों का आभूषण है। जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में दूसरों को क्षमा करने की क्षमता रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व क्षमा दिवस का महत्व केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक स्वास्थ्य अध्ययनों में यह प्रमाणित हो चुका है कि क्षमा करने वाला व्यक्ति तनाव, चिंता और अवसाद से अपेक्षाकृत जल्दी मुक्त हो जाता है। जब मन में कटुता रहती है तो उसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। रक्तचाप बढ़ता है, नींद प्रभावित होती है और मन अशांत बना रहता है। इसके विपरीत क्षमा का भाव मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और भावनात्मक संतुलन प्रदान करता है। इसलिए क्षमा केवल दूसरों के लिए नहीं बल्कि स्वयं के लिए भी सबसे बड़ा उपहार है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में क्षमा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है। विशेष रूप से जैन धर्म में क्षमा को आत्मशुद्धि का सर्वोच्च साधन माना गया है। चातुर्मास के दौरान आने वाले पर्यूषण पर्व के समापन पर संवत्सरी महापर्व मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक जैन श्रद्धालु अपने द्वारा जाने-अनजाने में हुई सभी भूलों के लिए सभी प्राणियों से क्षमा याचना करता है। वह विनम्र भाव से कहता है— "मिच्छामि दुक्कडम्", अर्थात यदि मुझसे मन, वचन या कर्म से कोई भूल हुई हो तो मुझे क्षमा करें। इसी भावना को प्राकृत गाथा में व्यक्त किया गया है—</div>
<div style="text-align:justify;">खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा वि खमंतु में। मित्ति में सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥</div>
<div style="text-align:justify;">इसका भावार्थ है कि मैं सभी जीवों से क्षमा मांगता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी प्राणियों के साथ मैत्रीभाव है और किसी के प्रति कोई वैर नहीं है। यह संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए शांति का सूत्र है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्षमा का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है जब हम केवल अपने प्रियजनों से ही नहीं बल्कि उन लोगों से भी क्षमा मांगें या उन्हें क्षमा करें जिनसे हमारे संबंधों में कटुता आ गई हो। अक्सर देखा जाता है कि लोग औपचारिक रूप से क्षमायाचना का संदेश भेज देते हैं, लेकिन मन में द्वेष बनाए रखते हैं। ऐसी क्षमा केवल शब्दों तक सीमित रहती है। सच्ची क्षमा वही है जो हृदय की गहराइयों से निकले और संबंधों में नई मधुरता का संचार करे। यदि हम अपने विरोधी के प्रति भी मैत्रीभाव रख सकें, तभी क्षमा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जीवन में कषाय अर्थात क्रोध, मान, माया और लोभ ही अधिकांश दुखों का कारण बनते हैं। जैन आगमों में कहा गया है कि कषाय ही कर्मों का मूल कारण है। इसलिए मनुष्य को अपने भीतर उठने वाले क्रोध और अहंकार को शीघ्र समाप्त कर देना चाहिए। परिवार और समाज में अधिकांश विवाद छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ होते हैं, लेकिन यदि समय रहते क्षमा और संवाद का मार्ग अपनाया जाए तो बड़े से बड़ा विवाद भी समाप्त हो सकता है। क्षमा संबंधों को जोड़ती है, जबकि अहंकार उन्हें तोड़ देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास और धर्मग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ क्षमा ने असंभव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों को भी बदल दिया। भगवान महावीर ने अपने विरोधियों के प्रति भी करुणा और क्षमा का भाव रखा। भगवान राम ने अपने धैर्य और विनम्रता से अनेक कठोर परिस्थितियों को सहज बना दिया। भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि के पदाघात को भी सहजता से स्वीकार किया। भगवान बुद्ध ने अपमान और कटु वचनों का उत्तर भी शांत मुस्कान से दिया। महात्मा गांधी ने भी सत्य और अहिंसा के साथ क्षमा को अपने जीवन का आधार बनाया। इन सभी महापुरुषों ने सिद्ध किया कि क्षमा दुर्बलता नहीं बल्कि आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समाज अनेक प्रकार के तनाव, पारिवारिक विघटन, सामाजिक संघर्ष और मानसिक अशांति से जूझ रहा है। ऐसे समय में विश्व क्षमा दिवस हमें आत्मचिंतन का अवसर देता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन बहुत छोटा है। यदि हम क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष को अपने भीतर स्थान देते रहेंगे तो सबसे अधिक नुकसान हमारा ही होगा। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने मन को शुद्ध करें, दूसरों की भूलों को क्षमा करें और अपनी भूलों के लिए विनम्रता से क्षमा मांगें। यही आत्मविकास का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व क्षमा दिवस केवल एक तिथि नहीं बल्कि मानवता का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि प्रेम, करुणा, मैत्री और क्षमा ही स्थायी सुख के आधार हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में क्षमा का भाव विकसित कर ले तो परिवारों में प्रेम बढ़ेगा, समाज में सौहार्द स्थापित होगा और विश्व में शांति का वातावरण बनेगा। यही इस दिवस का वास्तविक संदेश है कि हम अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर प्रेम और सद्भाव के दीप जलाएँ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आइए, इस विश्व क्षमा दिवस पर हम संकल्प लें कि किसी भी व्यक्ति के प्रति मन में वैरभाव नहीं रखेंगे। यदि हमसे किसी के प्रति कोई भूल हुई है तो विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगेंगे और जिसने हमें कष्ट पहुँचाया है, उसे भी खुले मन से क्षमा करेंगे। यही आत्मशुद्धि का मार्ग है, यही धर्म का सार है और यही मानव जीवन की सबसे बड़ी विजय है। सच ही कहा गया है—</div>
<div style="text-align:justify;">प्रेम क्षमा सद्भाव का संवत्सर दिन खासआतप घटे कषाय का बढ़े धर्म की प्यास।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 22:09:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु  में राष्ट्रीय सेवा योजना शिविर का हुआ शुभारम्भ</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता  </strong></div>
<div><strong>सिद्धार्थनगर,</strong></div>
<div>  </div>
<div>सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु परिसर में संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना की तीन इकाई,भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई इकाई, महारानी अहिल्या बाई होलकर इकाई, एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इकाई, के  सप्त दिवसीय विशेष शिविर का आयोजन कुलपति प्रो कविता शाह के निर्देशन  में  प्रारम्भ हुआ।</div>
<div>  </div>
<div>  सप्त दिवसीय विशेष शिविर के प्रथम दिवस का प्रारम्भ शिविर के उद्घाटन सत्र  को प्रो नीता यादव अधिष्ठाता छात्र कल्याण की अध्यक्षता में  हुआ । कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर किया गया। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि स्वयंसेवक- स्वयंसेविकाओं को बेहतर चरित्र निर्माण के साथ-</div>
<div> </div>
<div>कार्यक्रम</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172938/national-service-scheme-camp-started-at-siddharth-university-kapilvastu"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1772892943502.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात संवाददाता  </strong></div>
<div><strong>सिद्धार्थनगर,</strong></div>
<div> </div>
<div>सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु परिसर में संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना की तीन इकाई,भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई इकाई, महारानी अहिल्या बाई होलकर इकाई, एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इकाई, के  सप्त दिवसीय विशेष शिविर का आयोजन कुलपति प्रो कविता शाह के निर्देशन  में  प्रारम्भ हुआ।</div>
<div> </div>
<div> सप्त दिवसीय विशेष शिविर के प्रथम दिवस का प्रारम्भ शिविर के उद्घाटन सत्र  को प्रो नीता यादव अधिष्ठाता छात्र कल्याण की अध्यक्षता में  हुआ । कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर किया गया। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि स्वयंसेवक- स्वयंसेविकाओं को बेहतर चरित्र निर्माण के साथ- साथ एक सभ्य समाज के भी निर्माण करने की आवश्यकता है।</div>
<div> </div>
<div>कार्यक्रम के प्रथम बौद्धिक सत्र में मुख्य वक्ता के रुप में डॉ मनीषा वाजपेई, सहायक आचार्य, भौतिक विज्ञान विभाग ने "सभ्य समाज के निर्माण में राष्ट्रीय सेवा योजना की भूमिका"  विषय पर कहा कि  मानव जीवन का बेहतर निर्माण आदर्शों एवं मानव मूल्यों से ओतप्रोत होता है।</div>
<div> </div>
<div>इस तरह के जीवन निर्माण में स्वयंसेवक स्वयंसेविकाओं की सक्रियता बहुत अधिक प्रासंगिक होती है।मानवता को जीवंत रखने हेतु राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़े लोग अपने सम्पूर्ण जीवन को भारत माता को समर्पित कर देते हैं।  प्रथम दिवस के द्वितीय बौद्धिक सत्र में वक्ता के रुप में डॉ हरेंद्र कुमार शर्मा ने " मानव मूल्य निर्माण में राष्ट्रीय सेवा योजना का योगदान" विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  राष्ट्रीय सेवा योजना  का योगदान मानव मूल्य निर्माण में बहुत ही अधिक योगदान प्रदान करता है।</div>
<div> </div>
<div>राष्ट्रीय सेवा योजना भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई इकाई के कार्यक्रम अधिकारी डॉ यशवन्त यादव,  महारानी अहिल्या बाई होलकर इकाई की कार्यक्रम अधिकारी डॉ रक्षा एवं  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इकाई की कार्यक्रम अधिकारी डॉ सरिता सिंह के मार्गदर्शन एवं निर्देशन में संपूर्ण कार्यक्रम संचालित हुआ।</div>
<div> </div>
<div>सांस्कृतिक संध्या में स्वयंसेवक- स्वयंसेविकाओं ने मानव मूल्य से जुड़े गीत संगीत एवं अन्य विधा से उपस्थित सभी लोगों को आनंदित होने का अवसर प्रदान किया। उद्घाटन सत्र  का संचालन डॉ यशवन्त यादव, स्वागत डॉ रक्षा एवं आभार डॉ सरिता सिंह द्वारा किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 20:34:01 +0530</pubDate>
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