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                <title>judiciary news India - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>judiciary news India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने थारू समुदाय को दी राहत, कहा- वन अधिकार अधिनियम मौजूदा अधिकारों को मान्यता देता है</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अधिकारी वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने से पहले जारी किए गए अदालती आदेशों पर आँख मूंदकर भरोसा करके जंगल में रहने वालों के मौजूदा कानूनी अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।  जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने इस तरह लखीमपुर की ज़िला स्तरीय समिति द्वारा 2021 में पारित आदेश रद्द किया। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस आदेश में समिति ने 'थारू' समुदाय के 107 सदस्यों के वन अधिकारों - विशेष रूप से अपनी आजीविका के लिए छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने और उनका उपयोग करने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177159/allahabad-high-court-gave-relief-to-tharu-community-and-said"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अधिकारी वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने से पहले जारी किए गए अदालती आदेशों पर आँख मूंदकर भरोसा करके जंगल में रहने वालों के मौजूदा कानूनी अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।  जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने इस तरह लखीमपुर की ज़िला स्तरीय समिति द्वारा 2021 में पारित आदेश रद्द किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस आदेश में समिति ने 'थारू' समुदाय के 107 सदस्यों के वन अधिकारों - विशेष रूप से अपनी आजीविका के लिए छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने और उनका उपयोग करने के अधिकार - के दावों को अंतिम रूप देने से इनकार किया था।  संक्षेप में कहें तो अपने आदेश में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) नियम, 2007 के तहत गठित समिति ने याचिकाकर्ताओं के दावों को खारिज करने के लिए, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक अंतरिम आदेश पर भरोसा किया था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वन निवासियों के लाभ के लिए बनाया गया। उन्होंने दलील दी कि अधिनियम की धारा 3 के तहत उनके अधिकारों में गाँव की सीमाओं के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से इकट्ठा किए जाने वाले छोटे वन उत्पादों का स्वामित्व, उन तक पहुंच और उनका उपयोग शामिल है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संबंध में उन्होंने जनजातीय मामलों के मंत्रालय के 2013 के सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि 2006 का अधिनियम, जो बाद में बना कानून है, पिछली तारीख के सभी अदालती फैसलों या आदेशों को रद्द करता है।  बेंच ने उनके रुख में औचित्य पाया और कहा कि 2006 के अधिनियम का उद्देश्य जंगल में रहने वाली इन अनुसूचित जनजातियों को जंगल और वन भूमि पर उनके कब्ज़े को मान्यता देना और उन्हें सौंपना है, साथ ही उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अधिनियम की धारा 4 की शुरुआत 'नॉन-ऑब्स्टैन्टे' (किसी अन्य कानून के होते हुए भी प्रभावी) खंड से होती है। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार इन अधिकारों को मान्यता देती है और उन्हें सौंपती है, भले ही उस समय लागू किसी अन्य कानून में इसके विपरीत कुछ भी कहा गया हो। इस संबंध में कोर्ट ने यह साफ़ किया कि इस एक्ट के लागू होने से विधायिका ने इन जंगल में रहने वालों के लिए कोई नए अधिकार नहीं बनाए; बल्कि इसने इन लोगों के पहले से मौजूद अधिकारों और कब्ज़े को मान्यता दी थी, जो अलग-अलग कारणों से पारंपरिक रूप से जंगल में अपने रहने की इस जगह तक ही सीमित थे। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने विवादित आदेश में कमी पाई। बेंच ने कहा कि इस आदेश में 2006 के एक्ट के संबंधित प्रावधानों को ध्यान में नहीं रखा गया। इसमें सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर विचार किया गया, जो 2000 में यानी एक्ट के लागू होने से पहले पारित किया गया। इसी के मद्देनज़र, विवादित आदेश रद्द किया गया। साथ ही अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि वे संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर दें।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:31:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>NCLT आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, इलाहाबाद में दाखिल मामलों की जांच अब वहीं होगी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NCLT के प्रधान पीठ नई दिल्ली के उस आदेश पर आंशिक रोक लगाई, जिसमें इलाहाबाद पीठ में दाखिल याचिकाओं और आवेदनों की संयुक्त जांच का निर्देश दिया गया था।  जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के वकील द्वारा निर्देश लेने के लिए चार सप्ताह का समय मांगे जाने के बीच यह स्पष्ट किया कि इलाहाबाद में दाखिल याचिकाओं की जांच केवल वहीं की रजिस्ट्री द्वारा की जाएगी। यह मामला कंपनी लॉ बार एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका में 27 फरवरी, 2026 को जारी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177157/high-courts-stay-on-nclt-order-investigation-of-cases-filed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/669281-750x450669236-nclt-allahabad-hc-1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NCLT के प्रधान पीठ नई दिल्ली के उस आदेश पर आंशिक रोक लगाई, जिसमें इलाहाबाद पीठ में दाखिल याचिकाओं और आवेदनों की संयुक्त जांच का निर्देश दिया गया था।  जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के वकील द्वारा निर्देश लेने के लिए चार सप्ताह का समय मांगे जाने के बीच यह स्पष्ट किया कि इलाहाबाद में दाखिल याचिकाओं की जांच केवल वहीं की रजिस्ट्री द्वारा की जाएगी। यह मामला कंपनी लॉ बार एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका में 27 फरवरी, 2026 को जारी उस सार्वजनिक सूचना को चुनौती दी गई, जिसमें राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की प्रधान पीठ नई दिल्ली के रजिस्ट्रार ने निर्देश दिया कि इलाहाबाद पीठ में दाखिल मामलों की जांच संयुक्त रूप से की जाएगी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस आदेश के कारण भौतिक रूप से दस्तावेज इलाहाबाद में दाखिल किए जा रहे थे, जबकि ऑनलाइन फाइलिंग नई दिल्ली की प्रधान पीठ में हो रही थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके चलते फरवरी से ही प्रधान पीठ की रजिस्ट्री द्वारा फाइलों में बार-बार आपत्तियां लगाई जा रही थीं और खामियों को दूर नहीं किया जा रहा था।  यह भी दलील दी गई कि इस व्यवस्था में केवल इलाहाबाद पीठ को ही निशाना बनाया गया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष से सवाल किया कि जब याचिकाएं इलाहाबाद में दाखिल हो रही हैं, तो उनकी जांच किसी अन्य पीठ द्वारा क्यों की जानी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई बाद में निर्धारित की जाएगी।।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:26:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत झूठे मामलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत तीसरे पक्ष द्वारा झूठे मामले दर्ज किए जाने के “परेशान करने वाले ट्रेंड” पर चिंता जताई। [मोहम्मद फैजान और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य]।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने यह बात एक ऐसे मामले में कही, जिसमें तीन मुस्लिम आदमियों पर 2021 के एंटी-कन्वर्जन कानून के तहत केस दर्ज किया गया था।</p><p style="text-align:justify;">कथित पीड़िता ने एक बयान में इन दावों से इनकार किया कि उसे आरोपियों में से एक आदमी "लुभा" रहा था। इसके बजाय, उसने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176409/what-action-was-taken-against-false-cases-under-anti-conversion-law"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court-1.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत तीसरे पक्ष द्वारा झूठे मामले दर्ज किए जाने के “परेशान करने वाले ट्रेंड” पर चिंता जताई। [मोहम्मद फैजान और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य]।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने यह बात एक ऐसे मामले में कही, जिसमें तीन मुस्लिम आदमियों पर 2021 के एंटी-कन्वर्जन कानून के तहत केस दर्ज किया गया था।</p><p style="text-align:justify;">कथित पीड़िता ने एक बयान में इन दावों से इनकार किया कि उसे आरोपियों में से एक आदमी "लुभा" रहा था। इसके बजाय, उसने दावा किया कि वह उससे प्यार करती थी, और उसे अपने रिश्तेदारों और थर्ड-पार्टी से हैरेसमेंट का डर था। कोर्ट ने कहा, "FIR में लगाए गए आरोपों के मुकाबले पीड़िता का बयान एक परेशान करने वाले ट्रेंड को जन्म देता है, जिसे कोर्ट बार-बार उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलीजन एक्ट, 2021 के प्रोविजन्स के तहत थर्ड-पार्टी द्वारा दर्ज की जा रही FIRs के संबंध में देख रही है।"</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अब राज्य सरकार को एक एफिडेविट फाइल करके इस ट्रेंड से निपटने के लिए की जा रही कार्रवाई के बारे में बताने का निर्देश दिया है।कोर्ट ने आदेश दिया, “UP सरकार के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) भी अपना पर्सनल एफिडेविट फाइल करेंगे, जिसमें बताया जाएगा कि ऐसे मामलों में क्या एक्शन लिया जा रहा है, जहां एक्ट 2021 के प्रोविजन के तहत FIR इधर-उधर दर्ज की जा रही हैं और उसके बाद FIR साफ तौर पर गलत निकलीं, जिससे अधिकारियों का कीमती समय ऐसी FIR को पकड़ने में बर्बाद हो रहा है, जिनका कोई आधार भी नहीं है।”</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि अगर एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) 19 मई से पहले एफिडेविट फाइल नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें कोर्ट की मदद के लिए रिकॉर्ड के साथ खुद पेश होना होगा। यह एक पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था जिसमें बहराइच जिले के पुलिस स्टेशन थाना कोतवली नगर द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS) और उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलीजन एक्ट, 2021 के अलग-अलग प्रोविजन के तहत रजिस्टर्ड FIR को रद्द करने की मांग की गई थी।</p><p style="text-align:justify;">यह केस एक आदमी की कंप्लेंट पर रजिस्टर किया गया था, जिसने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी को एक मुस्लिम आदमी ने दो और लोगों की मदद से बहला-फुसलाकर भगा लिया था। कंप्लेंट करने वाले ने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि आरोपी उसकी बेटी का धर्म बदलने और उसे एक मुस्लिम आदमी से शादी करने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि कथित विक्टिम ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में कहा है कि वह बालिग है और पिछले तीन साल से उस आदमी से प्यार करती है।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने ऑर्डर में लिखा, “उसने आगे कहा है कि उसका धर्म नहीं बदला गया है, न ही पिटीशनर ने उससे शादी की है और न ही उसके साथ फिजिकल रिलेशन बनाए हैं, न ही पिटीशनर नंबर 3 या उसके रिश्तेदारों ने विक्टिम को धर्म बदलने के लिए मजबूर किया है। उसने आगे कहा है कि वह पिटीशनर नंबर 3 के साथ रहना चाहती है और उसका धर्म नहीं बदला गया है। उसने अपने बयान में यह भी रिक्वेस्ट की है कि हिंदू ऑर्गनाइजेशन के मेंबर उसे या उसके रिश्तेदारों को परेशान न करें।”</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि, पहली नज़र में, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर दबाव में काम कर रहा था या कुछ दूसरी वजहों से 'मना' गया था।कोर्ट ने थर्ड पार्टी द्वारा ऐसे केस रजिस्टर करने के ट्रेंड पर ध्यान दिया। बेंच ने कहा, “यह एक परेशान करने वाला ट्रेंड है जो अब समाज में फैल गया है और जिसका इशारा माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजेंद्र बिहारी लाल बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. एंड ऑर्स. : 2025 SCC OnLine SC 2265 के केस में भी किया है।”</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 21:06:23 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>जस्टिस शेखर यादव कल होंगे रिटायर, महाभियोग प्रस्ताव होगा खत्म</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल) को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से लंबित है। उनके रिटायर होने पर अब महाभियोग का प्रस्ताव निरर्थक (बेकार) हो जाएगा। जस्टिस यादव ने 12 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 26 मार्च 2021 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।<br /><br /><strong>आपत्तिजनक शब्दों की खूब आलोचना हुई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के विधिक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में "समान नागरिक संहिता की संवैधानिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176202/justice-shekhar-yadav-will-retire-tomorrow-impeachment-motion-will-end"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001715990.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल) को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से लंबित है। उनके रिटायर होने पर अब महाभियोग का प्रस्ताव निरर्थक (बेकार) हो जाएगा। जस्टिस यादव ने 12 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 26 मार्च 2021 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।<br /><br /><strong>आपत्तिजनक शब्दों की खूब आलोचना हुई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के विधिक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में "समान नागरिक संहिता की संवैधानिक आवश्यकता" विषय पर व्याख्यान देते हुए जस्टिस यादव ने कहा था कि देश बहुसंख्यक समाज की इच्छाओं के अनुसार चलेगा। इस दौरान उन्होंने एक आपत्तिजनक शब्द का भी प्रयोग किया, जिसकी व्यापक आलोचना हुई। इस भाषण पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यादव से स्पष्टीकरण मांगा था। यही नहीं उनसे कहा गया था कि आप खेद प्रकट कर दीजिए, परंतु उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया था और कहा था कि उन्होंने ऐसा कुछ भी गलत नहीं बोला है।<br /><br /><strong>13 दिसंबर को महाभियोग प्रस्ताव</strong><br />इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा के महासचिव को सौंपा गया, जिस पर 55 सांसदों के हस्ताक्षर थे, जो आवश्यक 50 सांसदों की संख्या से अधिक है। हालांकि यह महाभियोग प्रस्ताव अभी भी राज्यसभा में लंबित है, लेकिन इससे पहले ही जस्टिस यादव सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके रिटायरमेंट के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में फुल कोर्ट रेफरेंस आयोजित गया है। फुल कोर्ट रेफरेंस बुधवार को चीफ जस्टिस की कोर्ट में अपराह्न 3.45 पर रखा गया है।  इसमें हाईकोर्ट के सभी जजों के अलावा बार एसोसिएशन के अधिवक्ता सदस्य तथा हाईकोर्ट रजिस्ट्री के अधिकारी शामिल होंगे। हाईकोर्ट की तरफ से सभी को शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 21:02:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मतदाता सूची पर बड़ा फैसला: गुजरात हाईकोर्ट ने कहा— राज्य निर्वाचन आयोग नाम जोड़ने-हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं रखता</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक महिला ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी नामावली में नाम शामिल करने की मांग की थी। बता दें, महिला का नाम पहले प्रारंभिक सूची में शामिल नहीं किया गया, जबकि बाद में उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175916/big-decision-on-voter-list-gujarat-high-court-said-%E2%80%93"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/gujarat-high-court-1764609941926.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक महिला ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी नामावली में नाम शामिल करने की मांग की थी। बता दें, महिला का नाम पहले प्रारंभिक सूची में शामिल नहीं किया गया, जबकि बाद में उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओदेदरा की खंडपीठ ने कहा, “राज्य निर्वाचन आयोग का यह तर्क कि याचिकाकर्ता का नाम प्रारंभिक सूची प्रकाशित होने के बाद जोड़ा गया, इसलिए उसे शामिल नहीं किया जा सकता यह तर्क असंगत और निरर्थक है। आयोग का कार्य केवल विधानसभा की मतदाता सूची को अपनाना है, न कि उसमें स्वतंत्र रूप से बदलाव करना।”</p><p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार महिला का नाम पहले संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में नहीं था, जो नगर निगम की मतदाता सूची का आधार होती है। उसने 23 मार्च, 2026 को अपना नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया, जिसे 1 अप्रैल, 2026 को स्वीकार कर लिया गया।</p><p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से इसका अर्थ यह है कि महिला का नाम विधानसभा की मतदाता सूची में मान्य माना जाएगा। चूंकि नगर निगम की सूची उसी पर आधारित होती है, इसलिए उसे मतदान और चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार मिल जाता है।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला का आवेदन नामांकन की अंतिम तिथि से पहले स्वीकार कर लिया गया, इसलिए उसे चुनाव में भाग लेने से वंचित नहीं किया जा सकता।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने अपना पक्ष मजबूत तरीके से साबित किया है और उसका नाम साबरमती वार्ड संख्या 4 की मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उसे चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार भी मिलेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:31:17 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बंगाल एसआईआर: जाँच के बाद डॉक्टर से पुलिसकर्मी तक के नाम गायब</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174642/names-of-doctors-to-policemen-missing-after-bengal-sir-investigation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1754143774943_bihar_sir_draft_voter_list.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को मौक़ा मिल रहा है? यदि अब तक ट्रिब्यूनल ही नहीं बना है तो क्या लाखों लोग मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाएँगे?</p>
<p style="text-align:justify;">ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि राज्य में अंडर एडजुडिकेशन रहे मतदाताओं के बड़े पैमाने पर नाम कटने के मामले सामने आए हैं। राज्य में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के अधीन थे। 705 न्यायिक अधिकारियों की टीम ने अब तक 37 लाख मामलों का फ़ैसला कर लिया है। दो सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने यह साफ़ नहीं किया है कि अब तक कितने नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तक पूरे राज्य में 15 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। राज्य में सबसे ज़्यादा मुर्शिदाबाद में 11 लाख और मालदा में 8.28 लाख मामले जांच के अधीन थे।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 19 ट्रिब्यूनल बनने थे, जो 23 जिलों को कवर करेंगे, लेकिन अभी तक पूरी तरह सेटअप नहीं हुए। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि समय बहुत कम बचा है। नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक है, ऐसे में लाखों सच्चे वोटर चुनाव से बाहर हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कई गांवों में लोग चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, जब तक इन मामलों की सुनवाई न हो। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाने के लिए है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग दावा कर रहे हैं कि दस्तावेज देने के बावजूद उनका नाम बिना वजह काटा गया। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले काफी गर्माया हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:11:05 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174640/there-is-no-legal-obligation-on-the-daughter-in-law-to-maintain"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कोई नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न लगे, किसी कानूनी आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।"विधायिका ने अपनी समझदारी से, सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया। दूसरे शब्दों में, विधायिका की यह मंशा नहीं है कि उक्त प्रावधान के तहत बहू पर उसके सास-ससुर के भरण-पोषण का दायित्व डाला जाए।"</p><p style="text-align:justify;">इसके साथ ही पीठ ने एक बुजुर्ग दंपति द्वारा अपनी बहू के खिलाफ दायर की गई एक आपराधिक पुनरीक्षण खारिज की। याचिकाकर्ताओं ने आगरा के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट द्वारा अगस्त, 2025 में पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण की मांग करने वाले उनके आवेदन खारिज कर दिया गया था।</p><p style="text-align:justify;">माता-पिता ने यह दलील दी कि वे वृद्ध, अनपढ़, निर्धन हैं और अपने दिवंगत बेटे के जीवित रहते पूरी तरह से उसी पर निर्भर हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि उनकी बहू, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है, उसकी अपनी पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे दिवंगत बेटे के सभी सेवा और रिटायरमेंट लाभ भी प्राप्त हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि अपनी वृद्ध सास-ससुर के भरण-पोषण के बहू के नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि बहू को पुलिस में नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवंगत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित दलीलें भरण-पोषण की इन संक्षिप्त कार्यवाहियों में विचार के दायरे में नहीं आती हैं। अतः, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता, विकृति या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:07:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुजरात में छह जजों को समय से पहले रिटायर होने का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>राज्य सरकार ने छह जजों को "जनहित में" न्यायपालिका से "समय से पहले रिटायर" होने का निर्देश दिया है, जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की इस संबंध में की गई सिफ़ारिशों के बाद जारी किया गया।इनमें से पाँच ज़िला जज हैं, जबकि एक सीनियर सिविल जज हैं। गुजरात सरकार के विधि विभाग ने 16 मार्च को इस संबंध में अधिसूचनाएँ जारी कीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन पाँच ज़िला जजों को समय से पहले रिटायर होने के लिए कहा गया है, वे हैं: प्रथमेश श्रीवास्तव, प्रधान ज़िला जज, मोरबी; प्रशांत जोशी, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, मोरबी;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173879/order-for-premature-retirement-of-six-judges-in-gujarat"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/judges.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>राज्य सरकार ने छह जजों को "जनहित में" न्यायपालिका से "समय से पहले रिटायर" होने का निर्देश दिया है, जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की इस संबंध में की गई सिफ़ारिशों के बाद जारी किया गया।इनमें से पाँच ज़िला जज हैं, जबकि एक सीनियर सिविल जज हैं। गुजरात सरकार के विधि विभाग ने 16 मार्च को इस संबंध में अधिसूचनाएँ जारी कीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन पाँच ज़िला जजों को समय से पहले रिटायर होने के लिए कहा गया है, वे हैं: प्रथमेश श्रीवास्तव, प्रधान ज़िला जज, मोरबी; प्रशांत जोशी, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, मोरबी; मोहम्मद इलियास मंडली, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, पोरबंदर; अली हुसैन शेख, तीसरे अतिरिक्त ज़िला जज, राजकोट (धोराजी); और किरीट कुमार दर्जी, अतिरिक्त ज़िला जज, अरावली (मोडासा)।</p>
<p style="text-align:justify;">छठे न्यायिक अधिकारी की पहचान जयेश कुमार पारिख के रूप में हुई है, जो प्रधान सीनियर सिविल जज और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, ध्रांगध्रा (सुरेंद्रनगर ज़िला) हैं।सूत्रों ने बताया कि इन छह जजों को समय से पहले रिटायर करने का आदेश गुजरात सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2002 के प्रावधानों के तहत जारी किया गया है, जिसे गुजरात राज्य न्यायिक सेवा नियम, 2005 के नियम 21 के साथ पढ़ा जाता है;  सदस्य को उप-नियम (1) के तहत जनहित में रिटायर किया जाना चाहिए, इस पर कम से कम तीन बार विचार किया जाएगा; यानी, जब वह 50 वर्ष, 55 वर्ष और 58 वर्ष की आयु पूरी करने वाला हो।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>अन्य राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:47:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>यूपी गैंगस्टर एक्ट के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173877/up-gangster-act-has-serious-consequences-hence-strict-adherence-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं; खासकर तब जब किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता दांव पर हो।  जब कोई विशेष कार्य किया जाना हो, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए जैसा कि निर्धारित है—यहां कानून द्वारा निर्धारित—अन्यथा उसे बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो; एक ऐसी स्वतंत्रता जो सभी के लिए अनमोल है और जिसका उल्लंघन केवल कानून के अनुसार ही किया जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें उसने FIR को खारिज करने से इनकार किया था। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि गैंग चार्ट को तैयार करने और उसे आगे भेजने की प्रक्रिया में हुई स्पष्ट प्रक्रियागत अनियमितताओं ने FIR की पूरी बुनियाद को ही कमजोर (दोषपूर्ण) बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "गैंग चार्ट के लिए यह अनिवार्य है कि उसमें नोडल अधिकारी और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की सिफारिशें शामिल हों, जिन्हें पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमोदित किया गया हो। ये सिफारिशें लिखित रूप में होनी चाहिए और अनुमोदन पर हस्ताक्षर होने चाहिए। इस मामले में न तो अनिवार्य सिफारिशें उपलब्ध हैं और न ही किसी के हस्ताक्षर मौजूद हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला बहराइच में 1986 के अधिनियम की धारा 3(1) के तहत दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इस FIR में आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता (आरोपी) एक ऐसे गिरोह का हिस्सा था, जो जमीन पर अवैध कब्जा, रंगदारी वसूली और जालसाजी जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त था। अभियोजन पक्ष ने कानून के कड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए पूरी तरह से इस "गैंग चार्ट" पर ही भरोसा किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:44:41 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कॉलेजियम सही जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है: जस्टिस दीपांकर दत्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अतीत में उन जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है जिन्होंने साहस और ईमानदारी दिखाई; उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।"</p>
<p>जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई कल्पना' (Reimagining Judicial Governance) विषय पर आयोजित 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेजियम के सदस्यों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथी जजों की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173874/justice-dipankar-dutta-says-collegium-has-failed-to-protect-true"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अतीत में उन जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है जिन्होंने साहस और ईमानदारी दिखाई; उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।"</p>
<p>जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई कल्पना' (Reimagining Judicial Governance) विषय पर आयोजित 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेजियम के सदस्यों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथी जजों की रक्षा करनी चाहिए। </p>
<p>जस्टिस दत्ता सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का ज़िक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन (पदोन्नति) के रूप में चुकानी पड़े या इससे सत्ता में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं।</p>
<p>हाल ही में केरल हाई कोर्ट में आयोजित 'दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर स्मारक व्याख्यान' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था: "भले ही जजों को पता हो कि अलोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें अपने प्रमोशन, कार्यकाल में विस्तार (एक्सटेंशन) के रूप में चुकानी पड़ सकती है, लेकिन यह बात उनके फैसलों के आड़े नहीं आनी चाहिए।</p>
<p>आखिरकार, हर जज का अपना दृढ़ विश्वास, साहस और स्वतंत्रता ही सबसे ज़्यादा मायने रखती है।   काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत के आधार पर किया जाना चाहिए।  जुड़ाव, सामाजिक निकटता, लॉबिंग, अनौपचारिक सिफारिशें, या सत्ता में बैठे लोगों के साथ कथित नज़दीकी—चाहे वह न्यायिक हो, राजनीतिक हो या किसी और तरह की—को पूरी तरह से बाहर रखा जाना चाहिए।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:40:35 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>हाईकोर्ट ने कहा- परिसर खाली होते ही खत्म हो जाते हैं किरायेदार के सभी अधिकार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परिसर को खाली करने के साथ ही किरायेदार के सभी विधिक अधिकार खत्म हो जाते हैं। उसे बेदखली का नोटिस दिए जाने की जरूरत नहीं होती। किरायेदार के हक तभी तक कायम रहते हैं, जब तक वह किराया देते हुए बेदखली के आदेश का सामना करता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याची ने दालमंडी में चल रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को चुनौती दी थी। दावा किया गया कि याची कुंडिगढ़ टोला दालमंडी स्थित मकान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172680/high-court-said-%E2%80%93-all-the-rights-of-the-tenant"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परिसर को खाली करने के साथ ही किरायेदार के सभी विधिक अधिकार खत्म हो जाते हैं। उसे बेदखली का नोटिस दिए जाने की जरूरत नहीं होती। किरायेदार के हक तभी तक कायम रहते हैं, जब तक वह किराया देते हुए बेदखली के आदेश का सामना करता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याची ने दालमंडी में चल रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को चुनौती दी थी। दावा किया गया कि याची कुंडिगढ़ टोला दालमंडी स्थित मकान में किरायेदार था। राज्य सरकार को भूमि अधिग्रहण करने से पहले उसे धारा 21 के तहत नोटिस देना चाहिए था। वह संपत्ति से जुड़ा हितबद्ध पक्षकार है। उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं, राज्य सरकार की अधिवक्ता श्रुति मालवीय ने कहा कि याची किरायेदार है और उसके पास संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है।याची ने जानबूझकर आंशिक रूप से ध्वस्त की गई संपत्ति की तस्वीरें प्रस्तुत कीं, ताकि अंतरिम राहत प्राप्त की जा सके। वास्तव में संपत्ति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। तस्वीरों में कोई तिथि या समय नहीं है, इसलिए उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने वाराणसी शहर के दालमंडी क्षेत्र में सड़क को चौड़ा करने के लिए 30 जुलाई 2025 को आदेश जारी किया था। इसमें जमीन को स्वामियों की सहमति से खरीदने का प्रावधान था। शहनवाज खान घर के मालिक थे, उन्होंने राज्यपाल के पक्ष में बिक्री पत्र निष्पादित किया और कब्जा सौंप दिया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/172680/high-court-said-%E2%80%93-all-the-rights-of-the-tenant</link>
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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 22:20:27 +0530</pubDate>
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