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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>एनआईए के डीएसपी तंजील हत्याकांड में फांसी की सजा पाए रेयान को हाईकोर्ट ने बरी किया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong><span style="font-family:mangal, serif;">ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के डीएसपी तंजील अहमद और उनकी पत्नी फरजाना की हत्या के मामले में निचली अदालत से फांसी की सजा पाए आरोपी रेयान को बरी कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा वर्ष 2022 में सुनाई गई फांसी की सजा को गंभीर त्रुटि मानते हुए रद्द कर दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला संदेह से भरा है। रेयान के साथ ही फांसी की सजा पाए दूसरे आरोपी मुनीर की मौत हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दो अप्रैल 2016 को सहसपुर निवासी एनआईए के डीएसपी मोहम्मद तंजील अहमद और उनकी पत्नी फरजाना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175445/high-court-acquits-ryan-who-was-awarded-death-sentence-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court-2025-12-0fa75254d9e47ff5abb8ab01ddfb6605.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong><span style="font-family:mangal, serif;">ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के डीएसपी तंजील अहमद और उनकी पत्नी फरजाना की हत्या के मामले में निचली अदालत से फांसी की सजा पाए आरोपी रेयान को बरी कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा वर्ष 2022 में सुनाई गई फांसी की सजा को गंभीर त्रुटि मानते हुए रद्द कर दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला संदेह से भरा है। रेयान के साथ ही फांसी की सजा पाए दूसरे आरोपी मुनीर की मौत हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दो अप्रैल 2016 को सहसपुर निवासी एनआईए के डीएसपी मोहम्मद तंजील अहमद और उनकी पत्नी फरजाना की बिजनौर स्योहारा क्षेत्र में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना उस वक्त हुई, जब वे एक शादी समारोह से देर रात लौट रहे थे। बाइक सवार हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग की, जिसमें डीएसपी तंजील अहमद की मौके पर व उनकी पत्नी फरजाना की उपचार के दौरान अगले दिन मौत हो गई थी। इस मामले में तंजील अहमद के भाई मोहम्मद रागिब ने स्योहारा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।</p>
<p style="text-align:justify;"> जांच के बाद निचली अदालत ने आरोपी सहसपुर के निवासी मुनीर और रेयान को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि अन्य आरोपियों तंजीम, जैनी व रिजवान को बरी कर दिया गया था। फैसले के खिलाफ मुनीर और रेयान के परिजनों ने हाईकोर्ट में अपील की थी। अपील लंबित रहने के दौरान 19 नवंबर 2022 को वाराणसी के सर सुंदरलाल अस्पताल में मुनीर की संक्रमण के कारण मौत हो गई, जिसके चलते उसकी अपील समाप्त हो गई। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए पाया कि गवाहों के बयान अस्पष्ट और संदिग्ध हैं, जिससे अभियोजन का पूरा मामला कमजोर पड़ता है। न्यायमूर्ति ने अपने 31 मार्च 2026 के फैसले में कहा कि निचली अदालत ने मृत्युदंड देने में गंभीर त्रुटि की है। इसी आधार पर रेयान को सभी आरोपों से बरी करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया गया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। रेयान के पिता सादात हुसैन ने फैसले पर संतोष जताते हुए कहा कि आखिरकार उनके बेटे के साथ इंसाफ हुआ है। उन्होंने इसे धैर्य और विश्वास की जीत बताया।</p>
<p style="text-align:justify;">2016 में हुए चर्चित तंजील अहमद हत्याकांड ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। हमलावरों की बेरहमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एनआईए के डिप्टी एसपी को 24 गोलियां मारी थीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 20:21:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बंगाल एसआईआर: जाँच के बाद डॉक्टर से पुलिसकर्मी तक के नाम गायब</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174642/names-of-doctors-to-policemen-missing-after-bengal-sir-investigation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1754143774943_bihar_sir_draft_voter_list.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को मौक़ा मिल रहा है? यदि अब तक ट्रिब्यूनल ही नहीं बना है तो क्या लाखों लोग मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाएँगे?</p>
<p style="text-align:justify;">ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि राज्य में अंडर एडजुडिकेशन रहे मतदाताओं के बड़े पैमाने पर नाम कटने के मामले सामने आए हैं। राज्य में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के अधीन थे। 705 न्यायिक अधिकारियों की टीम ने अब तक 37 लाख मामलों का फ़ैसला कर लिया है। दो सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने यह साफ़ नहीं किया है कि अब तक कितने नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तक पूरे राज्य में 15 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। राज्य में सबसे ज़्यादा मुर्शिदाबाद में 11 लाख और मालदा में 8.28 लाख मामले जांच के अधीन थे।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 19 ट्रिब्यूनल बनने थे, जो 23 जिलों को कवर करेंगे, लेकिन अभी तक पूरी तरह सेटअप नहीं हुए। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि समय बहुत कम बचा है। नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक है, ऐसे में लाखों सच्चे वोटर चुनाव से बाहर हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कई गांवों में लोग चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, जब तक इन मामलों की सुनवाई न हो। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाने के लिए है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग दावा कर रहे हैं कि दस्तावेज देने के बावजूद उनका नाम बिना वजह काटा गया। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले काफी गर्माया हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:11:05 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174640/there-is-no-legal-obligation-on-the-daughter-in-law-to-maintain"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कोई नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न लगे, किसी कानूनी आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।"विधायिका ने अपनी समझदारी से, सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया। दूसरे शब्दों में, विधायिका की यह मंशा नहीं है कि उक्त प्रावधान के तहत बहू पर उसके सास-ससुर के भरण-पोषण का दायित्व डाला जाए।"</p><p style="text-align:justify;">इसके साथ ही पीठ ने एक बुजुर्ग दंपति द्वारा अपनी बहू के खिलाफ दायर की गई एक आपराधिक पुनरीक्षण खारिज की। याचिकाकर्ताओं ने आगरा के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट द्वारा अगस्त, 2025 में पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण की मांग करने वाले उनके आवेदन खारिज कर दिया गया था।</p><p style="text-align:justify;">माता-पिता ने यह दलील दी कि वे वृद्ध, अनपढ़, निर्धन हैं और अपने दिवंगत बेटे के जीवित रहते पूरी तरह से उसी पर निर्भर हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि उनकी बहू, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है, उसकी अपनी पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे दिवंगत बेटे के सभी सेवा और रिटायरमेंट लाभ भी प्राप्त हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि अपनी वृद्ध सास-ससुर के भरण-पोषण के बहू के नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि बहू को पुलिस में नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवंगत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित दलीलें भरण-पोषण की इन संक्षिप्त कार्यवाहियों में विचार के दायरे में नहीं आती हैं। अतः, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता, विकृति या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:07:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसी एक का ही धर्म सच्चा है, ये कहना ग़लत है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ से जुड़े एक पादरी की याचिका पर आईपीसी की धारा 295A से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में याचिका को खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पादरी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का यह दावा करना गलत है कि उसका ही धर्म सच्चा है क्योंकि ऐसा करना अन्य धर्मों का अपमान करने जैसा है.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य IPC की धारा 295-A के तहत आते है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और गलत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174510/it-is-wrong-to-say-that-only-one-religion-is"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ से जुड़े एक पादरी की याचिका पर आईपीसी की धारा 295A से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में याचिका को खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पादरी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का यह दावा करना गलत है कि उसका ही धर्म सच्चा है क्योंकि ऐसा करना अन्य धर्मों का अपमान करने जैसा है.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य IPC की धारा 295-A के तहत आते है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और गलत इरादे से किए गए कामों पर रोक लगाता है.कोर्ट ने आवेदक पादरी की बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल अर्जी को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह आदेश आवेदक को कानून के हिसाब से मौजूद उपाय का फायदा उठाने से नहीं रोकेगा. यह आदेश जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा उर्फ़ फ़ादर विनीत विंसेंट परेश की याचिका को खारिज करते हुए दिया है.</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार आवेदक पादरी ने अपने खिलाफ चार सितंबर 2023 को मऊ के मुहम्मदाबाद थाने में दर्ज आईपीसी की धारा 295A के तहत एफआईआर के बाद मऊ कोर्ट द्वारा 19 फरवरी 2024 की चार्जशीट और 18 मई 2024 के संज्ञान आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. आवेदक पादरी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से याचिका के माध्यम से अपने खिलाफ दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश और मऊ कोर्ट में चल रही संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी.</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आवेदक पादरी के वकील ने यह तर्क दिया कि आवेदक को इस मामले में पक्ष संख्या दो द्वारा केवल परेशान करने के उद्देश्य से झूठा फंसाया गया है. क्योंकि आवेदक ने समाज के वंचित वर्ग का अवैध रूप से धर्म परिवर्तन कराने या अन्य धर्मों के विरुद्ध बोलने जैसा कोई भी कथित अपराध कभी नहीं किया है.</p>
<p style="text-align:justify;">आवेदक के वकील ने यह भी तर्क दिया कि जांच के दौरान संबंधित जांच अधिकारी ने पहले ही यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि आवेदक द्वारा कोई भी अवैध धर्म परिवर्तन कभी नहीं किया गया है. जहां तक अन्य धर्मों की आलोचना करने के आरोप का संबंध है आवेदक के वकील ने यह पेश किया कि FIR के विवरण को पढ़ने पर आवेदक के विरुद्ध IPC की धारा 295-A के तहत कोई मामला नहीं बनता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आवेदक के वकील ने आगे दलील दी कि आवेदक को कथित अपराध से जोड़ने के लिए उसके विरुद्ध शायद ही कोई साक्ष्य मौजूद है. आवेदक के वकील ने कहा कि निष्पक्ष जांच किए बिना संबंधित जांच अधिकारी ने आवेदक के विरुद्ध आरोप पत्र (chargesheet) प्रस्तुत कर दिया जिस पर संबंधित कोर्ट ने बिना अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग किए आरोप पत्र के आधार पर अपराध का संज्ञान ले लिया जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है. और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align:justify;"> वहीं राज्य सरकार ने आवेदक पादरी की याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि आवेदक की ओर से जो दलीलें उठाई जा रही है वे तथ्यों के विवादित प्रश्नों से संबंधित है और उनमें साक्ष्यों के मूल्यांकन की आवश्यकता होगी. यह पेश किया गया है कि संज्ञान लेते समय केवल प्रथम दृष्ट्या मामला ही देखा जाना होता है और संबंधित न्यायालय से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह कोई 'मिनी ट्रायल' करे.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि इस मामले में केवल एक ही प्रश्न उठता है वह यह कि क्या FIR के विवरण के माध्यम से आवेदक पर लगाया गया कृत्य, IPC की धारा 295-A में वर्णित अपराध के दायरे में आता है अथवा नहीं.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 295A जो जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है जिनका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना होता है. धारा 295A में अगर कोई ऐसा करने का प्रयास करता है तो उसे किसी भी प्रकार के कारावास से दंडित किया जाएगा जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है या फिर जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों हो सकते है.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 22:10:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>'शादीशुदा पुरुष का बालिग के साथ लिव-इन में रहना जुर्म नहीं', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर लगाई रोक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बड़ा और साफ फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई शादीशुदा आदमी किसी बालिग महिला के साथ उसकी मर्जी से लिव-इन में रहता है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट का कहना है कि नैतिकता क्या कहती है और कानून क्या कहता है, ये दोनों बातें अलग हैं. अगर कोई कानून नहीं टूटा है, तो सिर्फ सामाजिक सोच के आधार पर किसी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. कोर्ट ने अगले आदेश तक  याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए पुलिस को उन्हें</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174507/it-is-not-a-crime-for-a-married-man-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बड़ा और साफ फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई शादीशुदा आदमी किसी बालिग महिला के साथ उसकी मर्जी से लिव-इन में रहता है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट का कहना है कि नैतिकता क्या कहती है और कानून क्या कहता है, ये दोनों बातें अलग हैं. अगर कोई कानून नहीं टूटा है, तो सिर्फ सामाजिक सोच के आधार पर किसी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. कोर्ट ने अगले आदेश तक  याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए पुलिस को उन्हें सुरक्षा देने का आदेश दिया है.</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिविजन बेंच ने याचिकाकर्ता अनामिका और नेत्रपाल की क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया गया है कि उन्हें गिरफ्तार न किया जाए.</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही, कोर्ट ने महिला (अनामिका) के घरवालों को भी कड़ी चेतावनी दी है. परिवार का कोई भी सदस्य इस जोड़े को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएगा. वे न तो उनके घर में घुसेंगे और न ही फोन, मैसेज या किसी तीसरे बंदे के जरिए उनसे संपर्क करने की कोशिश करेंगे.</p>
<p style="text-align:justify;">सुरक्षा के मामले में कोर्ट ने शाहजहांपुर के पुलिस कप्तान (SP) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया है. कोर्ट ने कहा कि जोड़े की हिफाजत करना पुलिस का फर्ज है. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में 'शक्ति वाहिनी' वाले केस में पहले ही साफ नियम बनाए हुए हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया  है कि वो इस आदेश की सूचना पुलिस अधीक्षक, शाहजहांपुर और थाना प्रभारी पुलिस थाना जैतीपुर को दोनों को ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, शाहजहांपुर के माध्यम से अगले 24 घंटों के अंदर भेज दें. अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 22:05:34 +0530</pubDate>
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                <title>हाईकोर्ट ने कहा- परिसर खाली होते ही खत्म हो जाते हैं किरायेदार के सभी अधिकार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परिसर को खाली करने के साथ ही किरायेदार के सभी विधिक अधिकार खत्म हो जाते हैं। उसे बेदखली का नोटिस दिए जाने की जरूरत नहीं होती। किरायेदार के हक तभी तक कायम रहते हैं, जब तक वह किराया देते हुए बेदखली के आदेश का सामना करता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याची ने दालमंडी में चल रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को चुनौती दी थी। दावा किया गया कि याची कुंडिगढ़ टोला दालमंडी स्थित मकान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172680/high-court-said-%E2%80%93-all-the-rights-of-the-tenant"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परिसर को खाली करने के साथ ही किरायेदार के सभी विधिक अधिकार खत्म हो जाते हैं। उसे बेदखली का नोटिस दिए जाने की जरूरत नहीं होती। किरायेदार के हक तभी तक कायम रहते हैं, जब तक वह किराया देते हुए बेदखली के आदेश का सामना करता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याची ने दालमंडी में चल रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को चुनौती दी थी। दावा किया गया कि याची कुंडिगढ़ टोला दालमंडी स्थित मकान में किरायेदार था। राज्य सरकार को भूमि अधिग्रहण करने से पहले उसे धारा 21 के तहत नोटिस देना चाहिए था। वह संपत्ति से जुड़ा हितबद्ध पक्षकार है। उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं, राज्य सरकार की अधिवक्ता श्रुति मालवीय ने कहा कि याची किरायेदार है और उसके पास संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है।याची ने जानबूझकर आंशिक रूप से ध्वस्त की गई संपत्ति की तस्वीरें प्रस्तुत कीं, ताकि अंतरिम राहत प्राप्त की जा सके। वास्तव में संपत्ति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। तस्वीरों में कोई तिथि या समय नहीं है, इसलिए उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने वाराणसी शहर के दालमंडी क्षेत्र में सड़क को चौड़ा करने के लिए 30 जुलाई 2025 को आदेश जारी किया था। इसमें जमीन को स्वामियों की सहमति से खरीदने का प्रावधान था। शहनवाज खान घर के मालिक थे, उन्होंने राज्यपाल के पक्ष में बिक्री पत्र निष्पादित किया और कब्जा सौंप दिया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 22:20:27 +0530</pubDate>
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