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                <title>Strait of Hormuz - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Strait of Hormuz RSS Feed</description>
                
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                <title>होर्मुज में थमी रफ्तार ने बढ़ाई दुनिया की धड़कन, तेल से लेकर महंगाई तक गहराता संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध का सबसे गंभीर असर अब युद्धक्षेत्र से बाहर दिखाई देने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। युद्ध से पहले जहां इस समुद्री रास्ते से प्रतिदिन सौ से अधिक जहाज गुजरते थे, वहीं अब इनकी संख्या घटकर कुछ जहाजों तक सीमित रह गई है। यातायात में करीब 95 प्रतिशत की गिरावट का मतलब केवल समुद्री व्यापार का संकट नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186886/stopped-speed-in-hormuz-increased-the-heartbeat-of-the-world"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1002213036-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध का सबसे गंभीर असर अब युद्धक्षेत्र से बाहर दिखाई देने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। युद्ध से पहले जहां इस समुद्री रास्ते से प्रतिदिन सौ से अधिक जहाज गुजरते थे, वहीं अब इनकी संख्या घटकर कुछ जहाजों तक सीमित रह गई है। यातायात में करीब 95 प्रतिशत की गिरावट का मतलब केवल समुद्री व्यापार का संकट नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा और रोजमर्रा की महंगाई से है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का असर कुछ देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, यूरोप और अफ्रीका से लेकर दुनिया के दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचता है। मौजूदा संकट में यही सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध से पहले खाड़ी के देशों से रोजाना करीब 1.7 करोड़ बैरल कच्चे तेल का निर्यात होता था। अगस्त 2026 तक यह मात्रा घटकर लगभग 90 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई है। यानी खाड़ी क्षेत्र से होने वाला तेल निर्यात करीब आधे स्तर पर पहुंच गया है। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्रतिदिन 50 से 70 लाख बैरल तक तेल की आपूर्ति किसी न किसी रूप में प्रभावित हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। युद्ध से पहले की तुलना में तेल करीब 20 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है। यदि होर्मुज में लंबे समय तक सामान्य आवाजाही बहाल नहीं होती है तो तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल के साथ-साथ विमान ईंधन, परिवहन और औद्योगिक उत्पादन की लागत पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होर्मुज का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इस रास्ते से केवल कच्चा तेल ही नहीं गुजरता। रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और विभिन्न प्रकार के माल की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही भी इस मार्ग पर निर्भर है। युद्ध से पहले दुनिया के रिफाइंड तेल उत्पादों का लगभग पांचवां हिस्सा और वैश्विक एलपीजी व्यापार का बड़ा हिस्सा इस समुद्री मार्ग से गुजरता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कंटेनर माल, कोयला, अनाज और लौह अयस्क जैसे थोक माल की आवाजाही भी इससे प्रभावित होती है। ऐसे में जहाजों की संख्या में भारी गिरावट का मतलब है कि आने वाले समय में ऊर्जा के साथ-साथ खाद्य पदार्थों, उर्वरकों, औद्योगिक कच्चे माल और तैयार सामान की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">खाड़ी के कई बंदरगाहों पर समुद्री गतिविधियां अचानक कम हुई हैं। कुवैत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां जहाजों की औसत दैनिक आवाजाही में करीब 85 प्रतिशत की कमी आई है। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, इराक और बहरीन के बंदरगाहों पर भी आवाजाही में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सऊदी अरब की स्थिति इन देशों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर है। इसका एक कारण उसकी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन और लाल सागर के बंदरगाह हैं, जो होर्मुज पर निर्भरता कम करने में मदद करते हैं। यही अंतर बताता है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक पाइपलाइन और समुद्री मार्ग कितने महत्वपूर्ण हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध का असर अब पेट्रोल पंपों तक पहुंच चुका है। 28 फरवरी के बाद दुनिया के करीब 145 देशों में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। म्यांमार और भूटान जैसे देशों में कीमतों में वृद्धि 55 प्रतिशत से भी अधिक रही है। इसका सबसे बड़ा कारण केवल कच्चे तेल की महंगाई नहीं है, बल्कि परिवहन लागत, बीमा खर्च और आपूर्ति मार्गों में बढ़ती अनिश्चितता भी है।</div>
<div style="text-align:justify;">तेल महंगा होने का असर अर्थव्यवस्था में कई स्तरों पर पड़ता है। परिवहन महंगा होता है तो सामान की ढुलाई की लागत बढ़ती है। इससे खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक की कीमतें प्रभावित होती हैं। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से महंगाई का दबाव और व्यापक हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत के लिए होर्मुज संकट विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश लंबे समय से पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में ऊर्जा और एलपीजी आयात करता रहा है। वर्ष 2025 में भारत ने करीब 2.18 करोड़ टन एलपीजी आयात की थी और इसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से आया था।संकट के बाद भारत ने अपनी आपूर्ति व्यवस्था में विविधता लाने की कोशिश तेज कर दी है। एलपीजी के मामले में अमेरिका की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा कच्चे तेल और गैस के लिए अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों की ओर भी रुख किया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने अमेरिका, नाइजीरिया, ओमान और अंगोला से एलएनजी आपूर्ति बढ़ाई है। कच्चे तेल के क्षेत्र में वेनेजुएला, ब्राजील और अंगोला जैसे देशों से आयात बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। मई से जुलाई के बीच भारत ने अमेरिका से करीब 21.9 लाख टन एलएनजी प्राप्त किया। यह बदलाव बताता है कि संकट ने भारत को ऊर्जा आयात के पारंपरिक स्रोतों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>होर्मुज के विकल्प की तलाश</strong></div>
<div style="text-align:justify;">मौजूदा परिस्थितियों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि होर्मुज लंबे समय तक बाधित रहा तो दुनिया उसकी भरपाई कैसे करेगी। सऊदी अरब जैसे देशों के पास वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह मौजूद हैं, लेकिन पूरी वैश्विक मांग को अचानक दूसरे रास्तों पर स्थानांतरित करना आसान नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की नई ऊर्जा कूटनीति भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि वहां तेल उत्पादन और निर्यात बढ़ता है तो वैश्विक बाजार में पश्चिमी गोलार्ध से अतिरिक्त आपूर्ति आ सकती है। इससे खाड़ी क्षेत्र और रूस पर दुनिया की निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि किसी एक नए स्रोत से होर्मुज की पूरी भरपाई करना आसान नहीं होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>खाड़ी देश भी भविष्य की अर्थव्यवस्था तैयार कर रहे</strong></div>
<div style="text-align:justify;">तेल पर लंबे समय तक निर्भर रहने के जोखिम को खाड़ी देश पहले से समझ रहे हैं। ऊर्जा संक्रमण और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देश तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सऊदी अरब उन्नत चिप निर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े डेटा सेंटर विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। संयुक्त अरब अमीरात में बड़े एआई परिसर की योजना बनाई जा रही है, जबकि कतर भी डेटा सेंटर और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहा है। इसका उद्देश्य साफ है—तेल के बाद की अर्थव्यवस्था के लिए अभी से नए आय के स्रोत तैयार करना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होर्मुज संकट का सबसे बड़ा खतरा इसकी अवधि को लेकर है। यदि समुद्री यातायात जल्दी सामान्य होता है तो बाजार धीरे-धीरे स्थिर हो सकते हैं। लेकिन यदि तनाव अगले कई महीनों तक बना रहा तो दुनिया को तेल और गैस की कीमतों, महंगाई, समुद्री बीमा, माल ढुलाई और औद्योगिक आपूर्ति में लंबे समय तक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह संकट एक बार फिर साबित करता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ऊर्जा आपूर्ति के कुछ महत्वपूर्ण मार्गों पर कितनी निर्भर है। होर्मुज केवल एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था की जीवनरेखा है। यहां पैदा हुआ संकट पेट्रोल पंप से लेकर कारखाने, बिजलीघर, रसोई और बाजार तक पहुंच सकता है। इसलिए आने वाले छह महीने केवल खाड़ी देशों के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 20:50:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिकी-ईरान समझौते का सबसे बड़ा अवरोध, इजरायल की हमलावर नीति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विगत दिनों अमेरिका ईरान के बीच एक लंबा समझौता हुआ, समझौते में यह स्पष्ट हो गया था कि स्टेट ऑफ हारमोंस को ईरान द्वारा खोल दिया जाएगा किंतु फिर इजरायल द्वारा लेबनान में इस समझौता के बाद लगातार हमले किए गए जिससे लेबनान में फिर तबाही मच गई है और इस हमले के परिणाम स्वरूप ईरान ने स्टेट आफ हारमोंस को फिर बंद कर दिया है और यह भी शर्त रख दी है जब तक इसराइल लेबनान पर हमले करते रहेगा तब तक स्टेट ऑफ हारमोंस भी बंद रहेगा। ईरान लंबे समय से लेबनान के हिज़्बुल्लाह को अपना प्रमुख रणनीतिक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181765/the-biggest-obstacle-to-the-us-iran-agreement"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विगत दिनों अमेरिका ईरान के बीच एक लंबा समझौता हुआ, समझौते में यह स्पष्ट हो गया था कि स्टेट ऑफ हारमोंस को ईरान द्वारा खोल दिया जाएगा किंतु फिर इजरायल द्वारा लेबनान में इस समझौता के बाद लगातार हमले किए गए जिससे लेबनान में फिर तबाही मच गई है और इस हमले के परिणाम स्वरूप ईरान ने स्टेट आफ हारमोंस को फिर बंद कर दिया है और यह भी शर्त रख दी है जब तक इसराइल लेबनान पर हमले करते रहेगा तब तक स्टेट ऑफ हारमोंस भी बंद रहेगा। ईरान लंबे समय से लेबनान के हिज़्बुल्लाह को अपना प्रमुख रणनीतिक सहयोगी मानता आया है। यह संबंध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव से भी जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि इज़राइल लेबनान में व्यापक सैन्य अभियान चलाता है, तो तेहरान इसे अपने प्रभाव क्षेत्र पर सीधी चुनौती के रूप में देख सकता है। ऐसी स्थिति में ईरान के लिए मौन रहना भी कठिन होगा और प्रत्यक्ष युद्ध में उतरना भी जोखिमपूर्ण। दूसरी ओर अमेरिका की स्थिति और भी जटिल है। वह इज़राइल की सुरक्षा का सबसे बड़ा समर्थक है, परंतु वह यह भी जानता है कि यदि संघर्ष ईरान तक फैलता है, तो पूरा मध्य-पूर्व एक ऐसे युद्ध में बदल सकता है जिसकी आर्थिक और राजनीतिक कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी। तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट, वैश्विक महँगाई और ऊर्जा असुरक्षा ये सभी संभावित परिणाम अमेरिका की रणनीतिक चिंताओं का हिस्सा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कूटनीति का सबसे कठिन क्षण वही होता है जब मित्र राष्ट्र युद्ध चाहते हों और राष्ट्रीय हित शांति की माँग कर रहे हों। अमेरिका आज इसी द्वंद्व से गुजरता दिखाई देता है। एक ओर वह इज़राइल का विश्वास खोना नहीं चाहता, दूसरी ओर ईरान के साथ संवाद के दरवाज़े भी पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता। यही संतुलन आने वाले समय की सबसे कठिन कूटनीतिक परीक्षा है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान भी आज वैसा नहीं है जैसा चार दशक पहले था। आर्थिक प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है। युवा पीढ़ी बेहतर जीवन, रोजगार और वैश्विक अवसरों की अपेक्षा रखती है। ऐसे में अमेरिका के साथ किसी संभावित समझौते का अर्थ केवल प्रतिबंधों में राहत नहीं, बल्कि आर्थिक पुनर्जीवन भी है। इसलिए तेहरान के लिए युद्ध और संवाद—दोनों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। इतिहास बताता है कि शांति और संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। शीत युद्ध के दौर में भी परमाणु प्रतिस्पर्धा के बीच हथियार नियंत्रण संधियाँ हुईं</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व राजनीति का इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि युद्ध कभी केवल रणभूमि में नहीं लड़े जाते, वे सभ्यताओं की चेतना, अर्थव्यवस्थाओं की धड़कनों और कूटनीति की मेज़ों पर भी अपने गहरे निशान छोड़ जाते हैं। जब किसी सीमा पर पहला गोला दागा जाता है, उसी क्षण अनेक समझौतों की नींव भी हिलने लगती है। आज मध्य-पूर्व पुनः उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से जमे अविश्वास को संवाद के माध्यम से कम करने की कोशिशें दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर इज़राइल और लेबनान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव पूरे क्षेत्र को व्यापक युद्ध की ओर धकेलता प्रतीत हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सवाल यह नहीं कि युद्ध होगा या नहीं वास्तविक प्रश्न यह है कि यदि युद्ध की आग और भड़कती है, तो क्या अमेरिका और ईरान के बीच बनती हुई कूटनीतिक संभावनाएँ उसी आग में भस्म हो जाएँगी? मध्य-पूर्व केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की धुरी है। विश्व की ऊर्जा आपूर्ति, सामरिक समुद्री मार्ग, धार्मिक आस्थाएँ और महाशक्तियों के रणनीतिक हित—सब यहाँ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसीलिए यहाँ की हर सैन्य घटना का प्रभाव वाशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग, ब्रुसेल्स और नई दिल्ली तक महसूस किया जाता है। कई बार युद्ध ने वार्ता को जन्म दिया और कई बार वार्ता युद्ध को रोकने में असफल रही।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए यह मान लेना कि इज़राइल–लेबनान संघर्ष शुरू होते ही अमेरिका–ईरान समझौता समाप्त हो जाएगा, राजनीतिक यथार्थ का अत्यधिक सरलीकरण होगा। यह भी उतना ही सत्य है कि यदि संघर्ष सीमित न रहकर क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लेता है, यदि हिज़्बुल्लाह, ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से इसमें उतरती हैं, तो अमेरिका–ईरान संबंधों में अविश्वास की खाई और गहरी हो सकती है। तब कूटनीति की भाषा बारूद के शोर में दब जाएगी।।</p>
<p style="text-align:justify;">आज का विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। चीन अपने आर्थिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है, रूस पश्चिमी दबावों का प्रतिरोध कर रहा है और यूरोप ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित है। ऐसे समय में मध्य-पूर्व का कोई भी बड़ा युद्ध केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करेगा। यही कारण है कि विश्व की लगभग सभी प्रमुख शक्तियाँ युद्ध के विस्तार को रोकने में रुचि रखती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे अधिक चिंता उस आम नागरिक की है जिसका न तो युद्ध से कोई लाभ है और न ही सत्ता की महत्वाकांक्षाओं से कोई संबंध। युद्ध की हर लपट सबसे पहले निर्दोष बच्चों, महिलाओं, बुज़ुर्गों और विस्थापित परिवारों को अपनी चपेट में लेती है। इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि निर्णय शासक लेते हैं और मूल्य समाज चुकाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत जैसे देशों के लिए भी यह संकट अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग पश्चिम एशिया से जुड़ा है। वहाँ रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा, व्यापारिक हित और समुद्री मार्गों की स्थिरता भारत की विदेश नीति के प्रमुख आयाम हैं। इसलिए भारत निरंतर संयम, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता आया है। यही नीति आज भी सबसे व्यावहारिक और दूरदर्शी प्रतीत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब यह माना जा सकता है कि इज़राइल का लेबनान पर आक्रमण अमेरिका–ईरान संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित अवश्य करेगा, परंतु किसी भी संभावित समझौते का भविष्य केवल युद्ध नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न राजनीतिक निर्णय तय करेंगे। यदि विवेक, संयम और कूटनीति को प्राथमिकता मिली, तो संवाद जीवित रहेगा। यदि प्रतिशोध, विस्तारवाद और शक्ति-प्रदर्शन हावी रहे, तो समझौतों की मेज़ें फिर वर्षों तक सूनी पड़ सकती हैं। मानव सभ्यता को यह स्वीकार करना होगा कि स्थायी शांति मिसाइलों के भंडार से नहीं, बल्कि विश्वास के निर्माण से आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हथियार भय पैदा कर सकते हैं, सम्मान नहीं; युद्ध सीमाएँ बदल सकते हैं, इतिहास नहीं; और कूटनीति ही वह सेतु है, जिस पर चलकर शत्रु भी भविष्य के साझेदार बन सकते हैं।आज मध्य-पूर्व केवल युद्ध के कगार पर नहीं खड़ा है, बल्कि मानवता की सामूहिक बुद्धिमत्ता की परीक्षा के सामने भी खड़ा है। आने वाले दिनों में लिए जाने वाले निर्णय यह तय करेंगे कि इतिहास आने वाली पीढ़ियों को बारूद की विरासत देगा या संवाद की संस्कृति।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 17:48:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान पीस डील पर हस्ताक्षर, यूएस झुका- पैसे भी देगा, होर्मुज़ खुलेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते</span></p></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181546/america-iran-peace-deal-signed-us-bowed-%E2%80%93-will-also-give"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas12.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div dir="ltr">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते के सफल होने से न केवल तेल की वैश्विक कीमतें स्थिर होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराने तनाव को कूटनीतिक रास्ते से सुलझाने का एक नया रास्ता खुलेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समझौते को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का नाम दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन से मुलाकात के दौरान इस समझौते की हार्ड कॉपी पर भी हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर करने के बाद ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह साइन हो चुका है। मैंने अभी-अभी इस पर हस्ताक्षर किए हैं।" दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियन और अन्य अधिकारियों ने भी इसे डिजिटल रूप से साइन किया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने भी इस पर बयान जारी कर कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू होगा। पहले कदम के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान तुरंत हॉर्मुज जलडमरूमध्य </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को खोल देगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्हाइट हाउस और ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए समझौते के मुख्य प्वाइंट इस प्रकार हैं:</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल युद्धविराम: अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान और उनके सहयोगी सभी मोर्चों (लेबनान सहित) पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य अभियानों को समाप्त करने की घोषणा करते हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग की धमकी या हमला नहीं करेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का सम्मान: दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों की समयसीमा: दोनों पक्ष अधिकतम </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते (</span>Final Deal) <span lang="hi" xml:lang="hi">पर बातचीत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का अंत: समझौते पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा और </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर इसे पूरी तरह खत्म कर देगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सेना की वापसी: अंतिम समझौते के </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर अमेरिका ईरान के नजदीकी इलाकों से अपनी सेनाएं हटा लेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हॉर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना: ईरान शुरुआती </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान के समुद्र तक वाणिज्यिक जहाजों (</span>Commercial Vessels) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सुरक्षित और मुफ्त आवागमन की व्यवस्था करेगा। </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर नौसैनिक और तकनीकी बाधाओं (जैसे बारूदी सुरंगें हटाना) को दूर किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य का प्रशासन: ईरान इस रणनीतिक जलमार्ग के भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को परिभाषित करने के लिए ओमान और अन्य तटीय देशों के साथ बातचीत करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज: अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम </span>300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर (</span>USD $300 Billion) <span lang="hi" xml:lang="hi">की योजना विकसित करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंधों की समाप्ति: एक तय समय सारणी के तहत अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के खिलाफ सभी एकतरफा (प्राइमरी और सेकेंडरी) प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (</span>UNSC) <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रस्तावों के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करने का वचन देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परमाणु हथियारों पर रोक: ईरान ने दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित या हासिल नहीं करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम संवर्धन का निपटारा: ईरान के समृद्ध यूरेनियम के भंडार का निपटारा अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (</span>IAEA) <span lang="hi" xml:lang="hi">की देखरेख में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऑन-साइट डाउन-ब्लेंडिंग</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम की क्षमता कम करना) के जरिए किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यथास्थिति (</span>Status Quo) <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाए रखना: अंतिम समझौता होने तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्तर पर ही रोके रखेगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल निर्यात को छूट और फंड की बहाली: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए तत्काल छूट (</span>Waivers) <span lang="hi" xml:lang="hi">जारी करेगा। साथ ही विदेशों में फ्रीज (जब्त) की गई ईरान की संपत्तियों को वापस इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निगरानी तंत्र की स्थापना: समझौते के सफल कार्यान्वयन और भविष्य के अनुपालन की निगरानी के लिए एक कार्यकारी तंत्र स्थापित किया जाएगा। इस अंतिम समझौते को </span>UNSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के एक बाध्यकारी प्रस्ताव द्वारा अनुमोदित किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने पुष्टि की कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस समझौते पर अंग्रेजी और फारसी (</span>Farsi) <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों भाषाओं में हस्ताक्षर किए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अनुवाद को लेकर भविष्य में कोई मतभेद या कोई और व्याख्या न हो। ईरान ने अपनी केंद्रीय बैंक के साथ मिलकर जब्त संपत्तियों को वापस पाने के तकनीकी तौर-तरीकों को भी अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:07:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार शीर्षक पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बरेली। </strong>महाराजा अग्रसेन महाविद्यालय में भूगोल विभाग द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार शीर्षक पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. आर. पी. सिंह पूर्व कुलपति, सदस्य उत्तर प्रदेष उच्च शिक्षा सेवा आयोग एवं पूर्व प्राचार्य बरेली काॅलेज बरेली, शैक्षिक  उन्नयन समिति के चेयरमैन अजय कुमार अग्रवाल, प्रबंध समिति के सदस्य अशोक कुमार गोयल, निदेषक डाॅ. प्रवीन कुमार अग्रवाल, अतिथि पवन कुलश्रेष्ठ, महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. सौरभ अग्रवाल, कला संकाय समन्वयक डाॅ. सीमा श्रीवास्तव, कार्यक्रम समन्वयक भूगोल विभाग के प्रवक्ता डाॅ. तरूण पाण्डेय, सह समन्वयक राकेश कुमार द्वारा दीप प्रज्जवलित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177302/one-day-seminar-organized-on-strait-of-hormuz-gateway-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260426-wa0006.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बरेली। </strong>महाराजा अग्रसेन महाविद्यालय में भूगोल विभाग द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश द्वार शीर्षक पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. आर. पी. सिंह पूर्व कुलपति, सदस्य उत्तर प्रदेष उच्च शिक्षा सेवा आयोग एवं पूर्व प्राचार्य बरेली काॅलेज बरेली, शैक्षिक  उन्नयन समिति के चेयरमैन अजय कुमार अग्रवाल, प्रबंध समिति के सदस्य अशोक कुमार गोयल, निदेषक डाॅ. प्रवीन कुमार अग्रवाल, अतिथि पवन कुलश्रेष्ठ, महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. सौरभ अग्रवाल, कला संकाय समन्वयक डाॅ. सीमा श्रीवास्तव, कार्यक्रम समन्वयक भूगोल विभाग के प्रवक्ता डाॅ. तरूण पाण्डेय, सह समन्वयक राकेश कुमार द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम की रूपरेखा डाॅ. तरूण पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत की गई। संगोष्ठी में छात्र-छात्राओं द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्यः ऊर्जा सुरक्षा का प्रवेश शीर्षक पर अपने विचार प्रस्तुत किये गये। आज की संगोष्ठी में मुख्य अतिथि ने भू-राजनीति एवं जलमार्गो के वर्चस्व पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भू-राजनीति में जल मार्गो का विशेष महत्व है क्योंकि यही जलमार्ग किसी देश की अर्थव्यवस्था का आधार बनते है। वर्तमान में ईरान एवं अमेरिका के मध्य चल रहे युद्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इस समय पर फारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ी के मध्य स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य एक ऐसा जल मार्ग है जहां से होकर विभिन्न देशो के लिए कच्चा तेल एवं गैस से लदे मालवाहक जहाज निकलते है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में चल रहे विवाद के कारण यहां से निकलने वाले मालवाहक जहाजो को कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। जो कि आयात-निर्यात में बाधा उत्पन्न कर रहें है। जिससे विभिन्न देशो की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ रहा है।  शैक्षिक उन्नयन समिति के चेयरमैन ने अपने अविभाषण में होर्मुज जलडमरूमध्य के अतिरिक्त विश्व के अन्य महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य पर प्रकाश डाला। निदेशक महोदय ने ईरान आयातित तेल एवं गैस के बढ़ते हुए मूल्यों पर चिंता व्यक्त की।इस कार्यक्रम के दौरान श्रेष्ठ प्रतिभागियों को पुरूस्कृत किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संगोष्ठी के अन्त में प्रबन्ध समिति ने मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान भूगोल विभाग के दोनों प्रवक्ताओं को भी उनके प्रयासों के लिए सम्मानित किया गया। महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. सौरभ अग्रवाल ने सभी का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठी से छात्र-छात्राओं के चहुंमुखी विकास में सार्थक सिद्ध होती है। मंच संचालन भूगोल विभाग के प्रवक्ता राकेश कुमार ने किया । संगोष्ठी को सफल बनाने में डाॅ. आरती बंसल, प्रीती यादव, डाॅ. बृजेश नंदिनी, गोविन्द सिंह, रामलखन, संगीता चैहान का विशेष योगदान रहा। संगोष्ठी में डाॅ. के.के.अग्रवाल, डाॅ. के.के. मेहरोत्रा, डाॅ. रेशु जौहरी, मंयक षर्मा, शोभित अग्रवाल, अजीत सिंह, डाॅ. सुमित अग्रवाल, डाॅ. निशा परवीन, डाॅ. पूजा अग्रवाल, डाॅ. राजपाल वर्मा, प्रथमेश कुमार, प्रफुल्ल पाठक सहित तमाम स्टाफ मौजूद रहा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 18:09:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ट्रंप का ऐलान- यूएस जल्द ही युद्ध से हट जाएगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका बहुत जल्द ईरान के खिलाफ चल रहे अपने सैन्य अभियान को खत्म कर सकता है। शायद दो से तीन हफ्तों के भीतर। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले एक महीने से चल रहा यह युद्ध पूरे मिडिल ईस्ट को हिला चुका है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि वॉल स्ट्रीट जनरल ने मंगलवार को ही यह खबर दे दी थी कि ट्रंप को उनके नज़दीकी सलाहकारों ने ईरान युद्ध से जल्द से जल्द बाहर निकलने की सलाह दी है। ट्रंप आज बुधवार</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174769/trumps-announcement-us-will-soon-withdraw-from-the-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/69cc4d63f2aff-donald-trump-announces-iran-war-end-314030551-16x9.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका बहुत जल्द ईरान के खिलाफ चल रहे अपने सैन्य अभियान को खत्म कर सकता है। शायद दो से तीन हफ्तों के भीतर। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले एक महीने से चल रहा यह युद्ध पूरे मिडिल ईस्ट को हिला चुका है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि वॉल स्ट्रीट जनरल ने मंगलवार को ही यह खबर दे दी थी कि ट्रंप को उनके नज़दीकी सलाहकारों ने ईरान युद्ध से जल्द से जल्द बाहर निकलने की सलाह दी है। ट्रंप आज बुधवार 1 अप्रैल को राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं, जिसमें वो सारी बातें साफ करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">व्हाइट हाउस में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, “हम बहुत जल्द वहां से निकल जाएंगे।” उन्होंने आगे जोड़ा कि यह वापसी “दो हफ्तों में, शायद दो या तीन हफ्तों में” हो सकती है। यह अब तक का उनका सबसे स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका इस सैन्य अभियान को समेटने की तैयारी कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप ने यह भी साफ कर दिया कि इस युद्ध को खत्म करने के लिए ईरान के साथ किसी कूटनीतिक समझौते की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, “ईरान को कोई डील करने की जरूरत नहीं है… उन्हें मेरे साथ कोई समझौता करने की आवश्यकता नहीं है।<strong>”</strong></p>
<p style="text-align:justify;">ईरान युद्ध में बुरी तरह फँसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब सहायता नहीं मिलने पर ब्रिटेन जैसे अपने सहयोगी देशों पर बौखला गए हैं। उनको धमकाते हुए उन्होंने चेताया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से तेल की कमी झेल रहे देशों के पास सिर्फ दो रास्ते हैं- या तो अमेरिका से तेल खरीदें, या खुद जाकर होर्मुज से तेल ले आएं।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने सीधे अपने सहयोगी देशों से साफ़-साफ़ कह दिया है कि अमेरिका हमेशा उनकी मदद नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि जो देश ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी अभियान में शामिल नहीं हुए, उन्हें अब खुद लड़ना सीखना होगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा,</p>
<p style="text-align:justify;">होर्मुज बंद होने से यूनाइटेड किंगडम जैसे जिन देशों को जेट फ्यूल नहीं मिल पा रहा है और जिसने ईरान के खिलाफ कार्रवाई में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है, उनको मेरी सलाह है- नंबर 1 – अमेरिका से खरीदो, हमारे पास बहुत है। नंबर 2 – थोड़ी हिम्मत जुटाओ, होर्मुज जाओ और बस ले लो।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आगे लिखा, 'तुम्हें अब खुद के लिए लड़ना सीखना होगा। अमेरिका अब तुम्हारी मदद नहीं करेगा, जैसा तुम हमारी मदद को नहीं आए थे। ईरान को क़रीब-क़रीब तबाह कर दिया गया है। मुश्किल काम हो गया। अब जाओ और अपना तेल खुद ले आओ!'</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सीमित सैन्य कार्रवाई की। इसके जवाब में ईरान ने दुनिया के सबसे अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज को ब्लॉक कर दिया। यह जलमार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन करता है। इस ब्लॉकेड से वैश्विक तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और 75 डॉलर प्रति बैरल से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं। कई देशों में जेट फ्यूल और पेट्रोल की कमी हो गई है। कहा जा रहा है कि अमेरिका पर भी इसका असर पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच ट्रंप ने पहले सहयोगी देशों से अपील की थी कि वे युद्धपोत भेजकर होर्मुज को सुरक्षित करें। लेकिन ब्रिटेन समेत बड़े मित्र देशों ने साफ़ इनकार कर दिया या ज़्यादा मदद नहीं की। अब ट्रंप नाराज़ हैं और कह रहे हैं कि अमेरिका अकेला सब नहीं संभालेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच ईरान की संसद की एक अहम समिति ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल यानी टैक्स लगाने का प्रस्ताव पास कर दिया है। यह टोल ईरान की अपनी मुद्रा रियाल में लिया जाएगा। योजना में अमेरिका और इसराइल से जुड़े जहाजों पर सख्त पाबंदी लगाई गई है। जो देश ईरान पर एकतरफा प्रतिबंध लगाते हैं, उनके जहाजों को भी रोकने की बात कही गई है। ईरान कह रहा है कि वह होर्मुज पर अपना संप्रभु अधिकार लागू कर रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:27:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>होर्मुज संकट और वैश्विक टकराव की नई दिशा क्या अमेरिका फंस गया है ईरान के जाल में</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस संघर्ष के पहले</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173425/hormuz-crisis-and-new-direction-of-global-conflict-is-america"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संघर्ष के पहले चरण में अमेरिका ने यह मान लिया था कि शुरुआती हमलों के बाद ईरान जल्दी झुक जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान ने लगातार जवाबी हमले किए और वह भी कई देशों तक फैलाकर। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ईरान केवल बचाव नहीं कर रहा बल्कि सक्रिय रणनीति के तहत क्षेत्रीय दबाव बना रहा है। अमेरिकी ठिकानों पर हमले और संचार तंत्र को नुकसान पहुंचाना इस बात का संकेत है कि ईरान तकनीकी और सैन्य स्तर पर तैयार था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार ईरान के पास अभी भी पर्याप्त संवर्धित यूरेनियम मौजूद है जिससे यह संकेत मिलता है कि वह दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका के शुरुआती हमले निर्णायक नहीं रहे।इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम केंद्र होर्मुज स्ट्रेट बन गया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की रीढ़ माना जाता है। यहां से रोजाना करोड़ों बैरल तेल और गैस गुजरती है। जब ईरान ने इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित किया तो वैश्विक बाजार में तुरंत असर दिखाई दिया। तेल की कीमतों में तेजी आई और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही वह कारण है कि ट्रम्प को अब अकेले लड़ना मुश्किल लग रहा है और उन्होंने नाटो के साथ साथ चीन और जापान जैसे देशों से मदद की अपील की है। यह कदम इस बात का संकेत है कि अमेरिका इस संकट को केवल अपनी सैन्य ताकत से हल नहीं कर पा रहा है।चीन और जापान से मदद मांगना एक रणनीतिक मजबूरी भी है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी अर्थव्यवस्था इस मार्ग पर निर्भर है। जापान भी ऊर्जा के लिए इस रास्ते पर निर्भर करता है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि ये देश भी इस मिशन में शामिल हों ताकि एक वैश्विक दबाव बनाया जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इन देशों की प्रतिक्रिया बहुत सतर्क रही है। कोई भी देश सीधे सैन्य हस्तक्षेप के लिए तैयार नहीं दिख रहा। इसका मुख्य कारण जोखिम है। होर्मुज स्ट्रेट बेहद संकरा मार्ग है और यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का मतलब सीधा खतरा है। ईरान ने यहां समुद्री माइन्स बिछाने की रणनीति अपनाई है जो किसी भी जहाज के लिए जानलेवा हो सकती है।समुद्री माइन्स को हटाना आसान काम नहीं है। आधुनिक माइन्स को पहचानना मुश्किल होता है और उन्हें निष्क्रिय करना जोखिम भरा होता है। इसके अलावा ईरान के पास मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी है जिससे वह किसी भी ऑपरेशन को बाधित कर सकता है। इस कारण कोई भी देश अपनी नौसेना को सीधे खतरे में डालने से बच रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और बड़ी चुनौती है कई देशों की सेनाओं का एक साथ संचालन। अलग अलग देशों की तकनीक कम्युनिकेशन और रणनीति अलग होती है। ऐसे में संयुक्त ऑपरेशन करना बेहद जटिल हो जाता है। यही वजह है कि अब तक कोई ठोस सैन्य गठबंधन सामने नहीं आया है।इस संकट का एक और पहलू है इसका वैश्विक असर। दुनिया की लगभग बीस प्रतिशत तेल सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ेगी और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से पूरा करता है। अगर सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर पेट्रोल डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा। इससे आम लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा और आर्थिक दबाव बढ़ेगा।भारत ने इस पूरे मामले में संतुलित रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं ताकि भारतीय जहाज सुरक्षित रह सकें और सप्लाई बनी रहे। भारत न तो सीधे इस संघर्ष में शामिल होना चाहता है और न ही अपने हितों को नुकसान होने देना चाहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते बल्कि आर्थिक और रणनीतिक नियंत्रण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करके अमेरिका को एक ऐसी स्थिति में ला दिया है जहां उसे वैश्विक समर्थन की जरूरत पड़ रही है।अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह बिना युद्ध को और बढ़ाए इस मार्ग को कैसे सुरक्षित बनाए। अगर संघर्ष और बढ़ता है तो इसमें और देश शामिल हो सकते हैं जिससे स्थिति और जटिल हो जाएगी।अंत में यह कहा जा सकता है कि यह संघर्ष अभी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचा है। न तो अमेरिका पूरी तरह जीत पाया है और न ही ईरान पीछे हटने को तैयार है। होर्मुज स्ट्रेट इस टकराव का केंद्र बना हुआ है और जब तक इसका समाधान नहीं निकलता तब तक वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बनी रहेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:10:10 +0530</pubDate>
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                <title>'खतरे में भारत की ऊर्जा सुरक्षा', राहुल गांधी बोले- अभी और खराब होंगे हालात</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा कि दुनिया इस समय बेहद अस्थिर दौर में प्रवेश कर चुकी है और आने वाले समय में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। भारत के कुल तेल आयात का 40% से अधिक हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते आता है, ऐसे में इस इलाके में बढ़ता तनाव देश के लिए चिंता का विषय है। एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति के मामले में स्थिति और भी ज्यादा गंभीर मानी जा रही है।स्थिति इसलिए भी संवेदनशील हो गई है क्योंकि संघर्ष</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172568/indias-energy-security-in-danger-rahul-gandhi-said-situation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images3.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा कि दुनिया इस समय बेहद अस्थिर दौर में प्रवेश कर चुकी है और आने वाले समय में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। भारत के कुल तेल आयात का 40% से अधिक हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते आता है, ऐसे में इस इलाके में बढ़ता तनाव देश के लिए चिंता का विषय है। एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति के मामले में स्थिति और भी ज्यादा गंभीर मानी जा रही है।स्थिति इसलिए भी संवेदनशील हो गई है क्योंकि संघर्ष अब भारत के आसपास के क्षेत्र तक पहुंच गया है। हाल ही में हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत के डूबने की खबर सामने आई है।</p>
<p>ऐसे समय में, जब हालात तेजी से बदल रहे हैं और क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहा है, देश को मजबूत और स्थिर नेतृत्व की जरूरत है। लेकिन आरोप लगाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी साधे हुए हैं।मौजूदा हालात में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर भी असर पड़ सकता है और सरकार को इस पर स्पष्ट रुख सामने रखना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:34:42 +0530</pubDate>
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