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                <title>Coalition Politics India - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Coalition Politics India RSS Feed</description>
                
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                <title>दक्षिण से पूर्व तक बदलता राजनीतिक भूगोल</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के 2026 के विधानसभा चुनावों के ताजा परिणामो ने  देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाने के संकेत दे दिए हैं। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में जो तस्वीर उभर रही,वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देती दिख रही है। इन चुनावों में न केवल सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं बनी, बल्कि नए चेहरों और नए गठबंधनों ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में इस बार का चुनाव सबसे ज्यादा दिलचस्प बन गया है। यहां द्रविड़ राजनीति का दशकों पुराना ढांचा पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। एम.के. स्टालिन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178094/changing-political-geography-from-south-to-east"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के 2026 के विधानसभा चुनावों के ताजा परिणामो ने  देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाने के संकेत दे दिए हैं। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में जो तस्वीर उभर रही,वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देती दिख रही है। इन चुनावों में न केवल सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं बनी, बल्कि नए चेहरों और नए गठबंधनों ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में इस बार का चुनाव सबसे ज्यादा दिलचस्प बन गया है। यहां द्रविड़ राजनीति का दशकों पुराना ढांचा पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम डीएमके जहां सत्ता बचाने की कोशिश में थी, वहीं अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। शुरुआती दौर में टीवीके का सबसे आगे होना और पार्टी पूर्ण बहुमत को हासिल कर चुकी यह दिखाता है कि जनता अब पारंपरिक दलों के विकल्प तलाश रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 117-118 है।अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम और डीएमके दोनों ही स्पष्ट बहुमत से दूर दिखे। ऐसे में विजय का “किंगमेकर” के रूप में उभरना स्वाभाविक है। उनकी लोकप्रियता, खासकर युवाओं में, और साफ-सुथरी छवि उन्हें एक निर्णायक भूमिका में ला खड़ा करती है। इस पूरे घटनाक्रम में नरेंद्र मोदी के साथ विजय की पुरानी तस्वीर ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह तस्वीर भले ही पुरानी हो, लेकिन इसके समय पर सामने आने से यह अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी और टीवीके के बीच चुनाव बाद गठबंधन संभव है। यदि ऐसा होता है और एएएडी भी इसमें शामिल होती है, तो तमिलनाडु में पहली बार एक नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है, जो द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक ढांचे को तोड़ देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर केरल में जो तस्वीर सामने आ रही है, वह पूरी तरह अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। यहां पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। शुरुआती रुझानों में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा स्पष्ट बढ़त के साथ सत्ता में वापसी करता नजर आया।कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ अगर बहुमत हासिल करता है, तो यह केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा, क्योंकि राज्य में आमतौर पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड तो रहा है, लेकिन इस बार मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खुद पिनाराई विजयन अपनी सीट पर पीछे चलने से  उयह केवल एक सीट की हार नहीं, बल्कि उनके शासन मॉडल पर सवाल के रूप में भी देखा जा रहा है। उनके कार्यकाल में कल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर जोर दिया गया, लेकिन लगता है कि विपक्ष ने सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में सफलता पाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भारतीय जनता पार्टी का खाता खुलना भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है। भले ही सीटें कम हों, लेकिन यह पार्टी के लिए दक्षिण भारत में धीरे-धीरे बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत देता है। राजीव चंद्रशेखर जैसे नेताओं का आगे रहना यह दर्शाता है कि भाजपा अब केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं रहना चाहती। अगर पश्चिम बंगाल की बात करें, तो यहां तस्वीर और भी नाटकीय है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को इस बार कड़ी चुनौती मिल गई है। शुरुआती रुझानों में भाजपा भारी बढ़त बनाती दिखाई दी।॥यह रुझान नतीजों में बदलता है, तो यह राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़त को केवल चुनावी जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का संकेत भी है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा और ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा और लगता है कि मतदाताओं ने इस पर प्रतिक्रिया दी है।हालांकि ममता बनर्जी अब भी अपनी सीट पर बढ़त बनाए हुए हैं और उन्होंने अंतिम परिणाम तक इंतजार करने की बात कही है, लेकिन राज्य के समग्र रुझान उनके लिए चिंता का विषय जरूर हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तीनों राज्यों के रुझानों को एक साथ देखें तो एक बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश उभरकर सामने आता है। पहला, क्षेत्रीय दलों की पकड़ कमजोर हो रही है या उन्हें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरा, नए चेहरे और नए दल तेजी से उभर रहे हैं, जैसे तमिलनाडु में विजय की टीवीकेतीसरा, भाजपा का विस्तार अब उन राज्यों तक पहुंच रहा है जहां वह पहले कमजोर मानी जाती थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों में “मोदी फैक्टर” की भी चर्चा हो रही है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि का असर कई राज्यों में देखने को मिल रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल और संभावित रूप से तमिलनाडु में यह असर निर्णायक साबित हो सकता है।लेकिन यह भी सच है कि हर राज्य की अपनी अलग राजनीतिक संस्कृति और मुद्दे होते हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ पहचान, केरल में वैचारिक राजनीति और बंगाल में क्षेत्रीय अस्मिता हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में किसी एक राष्ट्रीय ट्रेंड को पूरे देश पर लागू करना जल्दबाजी होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी, 2026 के ये चुनाव यह जरूर संकेत दे रहे हैं कि भारतीय राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। पुराने समीकरण टूट रहे हैं, नए गठबंधन बन रहे हैं और मतदाता पहले से ज्यादा जागरूक और निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। तमिलनाडु में अगर टीवीके “किंगमेकर” बनती है, केरल में यूडीएफ सत्ता में लौटता है और पश्चिम बंगाल में भाजपा ऐतिहासिक जीत दर्ज करती है, तो यह केवल राज्यों के स्तर पर बदलाव नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बदल सकता है। आने वाले दिनों में अंतिम नतीजे इन रुझानों को कितनी मजबूती देते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि 2026 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र को एक नई ऊर्जा, नई बहस और नए विकल्प दिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 17:10:36 +0530</pubDate>
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                <title>तमिलनाडु की सियासत में बूथ की जंग: वोटर रिमाइंडर से बदला चुनावी मैदान</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनावी जंग अब बड़े-बड़े मंचों और नारों से निकलकर सीधे बूथ स्तर तक पहुंच चुकी है। इस बार मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि रणनीतियों, संगठन क्षमता और मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कला के बीच भी है। सत्तारूढ़ एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने चुनावी लड़ाई को अंतिम चरण में एक नए आयाम पर ला दिया है, जिसे “वोटर रिमाइंडर कैंपेन” के रूप में देखा जा रहा है। यह अभियान केवल मतदाताओं को मतदान की याद दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176711/booth-war-in-tamil-nadu-politics-changed-electoral-ground-due"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनावी जंग अब बड़े-बड़े मंचों और नारों से निकलकर सीधे बूथ स्तर तक पहुंच चुकी है। इस बार मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि रणनीतियों, संगठन क्षमता और मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कला के बीच भी है। सत्तारूढ़ एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने चुनावी लड़ाई को अंतिम चरण में एक नए आयाम पर ला दिया है, जिसे “वोटर रिमाइंडर कैंपेन” के रूप में देखा जा रहा है। यह अभियान केवल मतदाताओं को मतदान की याद दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संवाद का हिस्सा बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से एक चक्र चलता आया है, जिसमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बारी-बारी से सत्ता में आती रही हैं। इस बार की सबसे बड़ी चुनौती इसी चक्र को तोड़ने की है। एम. के. स्टालिन के सामने यह केवल सत्ता में बने रहने का सवाल नहीं, बल्कि एक स्थायी राजनीतिक आधार तैयार करने की परीक्षा भी है। यही कारण है कि उनकी पार्टी ने प्रचार के पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर मतदाताओं के दरवाजे तक पहुंचने की रणनीति अपनाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">“वोटर रिमाइंडर कैंपेन” दरअसल एक सूक्ष्म और लक्षित अभियान है, जिसके तहत पार्टी कार्यकर्ता घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं। इस अभियान में विशेष रूप से महिलाओं, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु के चुनावों में महिलाओं की भागीदारी और उनका झुकाव अक्सर निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके साथ ही शहरी, तटीय और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में पार्टी की पकड़ को मजबूत करने का प्रयास भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, विपक्ष में खड़ी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम अपनी पारंपरिक ताकत, यानी मजबूत बूथ संगठन और ग्रामीण नेटवर्क पर भरोसा कर रही है। एडापड्डी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी पश्चिमी तमिलनाडु के जिलों—कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड और सेलम—में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यहां पार्टी का आधार मुख्य रूप से गौंडर समुदाय पर टिका हुआ है, जो लंबे समय से उसकी रीढ़ माना जाता रहा है। हालांकि, बदलते सामाजिक समीकरण और गठबंधन राजनीति ने इस बार इस समर्थन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के लिए दोधारी तलवार साबित हो रहा है। जहां एक ओर यह गठबंधन कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक मजबूती देता है, वहीं दूसरी ओर दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता को प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि कई ऐसे क्षेत्र, जो पहले पार्टी के मजबूत गढ़ माने जाते थे, अब वहां स्थिति उतनी सहज नहीं दिख रही।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस चुनाव में मुद्दों की बात करें तो केवल स्थानीय समस्याएं ही नहीं, बल्कि बड़े राष्ट्रीय और भावनात्मक विषय भी प्रमुखता से उभरे हैं। डिलिमिटेशन यानी परिसीमन का मुद्दा, जिसे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने तमिलनाडु के अधिकारों से जोड़ दिया है, चुनावी बहस के केंद्र में है। पार्टी इसे “राज्य बनाम केंद्र” के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिससे क्षेत्रीय अस्मिता को बल मिलता है। इसके अलावा महिला कल्याण योजनाएं, नकद सहायता और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े वादे भी मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं के बीच भी इस बार चुनावी चर्चा काफी सक्रिय है। रोजगार, शिक्षा और विशेष रूप से NEET परीक्षा जैसे मुद्दे लगातार उठ रहे हैं। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने इन मुद्दों को राज्य की स्वायत्तता और केंद्र के हस्तक्षेप से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति को धार दी है। सोशल मीडिया पर भी पार्टी की सक्रियता इस बात का संकेत देती है कि वह युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही, तमिल सिनेमा और राजनीति का पारंपरिक संबंध भी इस चुनाव में नजर आ रहा है। अभिनेता विजय की राजनीतिक सक्रियता और उनके नए प्रयासों ने युवा मतदाताओं में एक अलग तरह की उत्सुकता पैदा की है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इसका सीधा लाभ किसे मिलेगा, लेकिन यह निश्चित है कि इससे चुनावी माहौल में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन इस बार उनका प्रभाव अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा है। इसके बजाय “अस्मिता”, “अधिकार” और “कल्याण” जैसे व्यापक मुद्दे अधिक प्रमुखता से उभरकर सामने आए हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि राज्य की राजनीति धीरे-धीरे एक नए चरण में प्रवेश कर रही है, जहां मतदाता केवल पारंपरिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और प्रदर्शन के आधार पर भी निर्णय ले रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव के इस अंतिम चरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लड़ाई अब पूरी तरह से बूथ स्तर पर सिमट गई है। कौन पार्टी अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल होती है, कौन अपने मतदाताओं को अंतिम समय तक जोड़े रख पाती है—यही जीत और हार का निर्धारण करेगा। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का “वोटर रिमाइंडर कैंपेन” और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का मजबूत बूथ नेटवर्क—इन दोनों के बीच की टक्कर इस चुनाव की असली कहानी बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, तमिलनाडु का यह चुनाव केवल एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह उस दिशा का संकेत भी है, जिसमें क्षेत्रीय राजनीति आगे बढ़ रही है। क्या एम. के. स्टालिन इस बार सत्ता में वापसी कर इतिहास रच पाएंगे, या फिर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम अपने संगठन के बल पर वापसी करेगी—यह तो परिणाम ही बताएंगे। लेकिन इतना तय है कि इस बार की जंग ने तमिलनाडु की राजनीति को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां हर वोट, हर बूथ और हर मतदाता निर्णायक बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 18:43:18 +0530</pubDate>
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                <title>राज्यसभा चुनाव 2026: बदलते समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">साल 2026 का राज्यसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए केवल नियमित संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन के पुनर्निर्धारण का वर्ष साबित हो सकता है। राज्यसभा की कुल 245 सीटों में से लगभग 72 से 75 सीटें वर्षभर में विभिन्न चरणों में रिक्त हो रही हैं। मार्च में 37 सीटों पर चुनाव प्रस्तावित हैं, जबकि शेष सीटों पर अप्रैल, जून, जुलाई और नवंबर में चुनाव होंगे। इन चुनावों का सीधा असर केंद्र की विधायी रणनीति और विपक्ष की प्रभावशीलता पर पड़ेगा, क्योंकि उच्च सदन में बहुमत का समीकरण कई महत्वपूर्ण विधेयकों की दिशा तय करता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">फरवरी 2026 तक उपलब्ध</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172477/rajya-sabha-elections-2026-changing-equations-numbers-game-and-political"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">साल 2026 का राज्यसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए केवल नियमित संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन के पुनर्निर्धारण का वर्ष साबित हो सकता है। राज्यसभा की कुल 245 सीटों में से लगभग 72 से 75 सीटें वर्षभर में विभिन्न चरणों में रिक्त हो रही हैं। मार्च में 37 सीटों पर चुनाव प्रस्तावित हैं, जबकि शेष सीटों पर अप्रैल, जून, जुलाई और नवंबर में चुनाव होंगे। इन चुनावों का सीधा असर केंद्र की विधायी रणनीति और विपक्ष की प्रभावशीलता पर पड़ेगा, क्योंकि उच्च सदन में बहुमत का समीकरण कई महत्वपूर्ण विधेयकों की दिशा तय करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फरवरी 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सदन में भाजपा के पास 103 सीटें, कांग्रेस के पास 27, तृणमूल कांग्रेस के 12, आम आदमी पार्टी के 10, द्रमुक के 10, बीजद के 7, वाईएसआरसीपी के 5 और अन्नाद्रमुक के 7 सदस्य हैं। सात सदस्य नामित श्रेणी में हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की कुल ताकत लगभग 121 के आसपास मानी जा रही है, जबकि विपक्षी इंडिया ब्लॉक करीब 80 सीटों के साथ मौजूद है। मौजूदा विधानसभा संरचनाओं को देखते हुए अनुमान है कि एनडीए को 7 से 9 सीटों का शुद्ध लाभ मिल सकता है, जिससे उसकी संख्या 140 के पार जा सकती है। इसके विपरीत, विपक्षी गठबंधन को लगभग पांच सीटों का नुकसान संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मार्च में जिन 37 सीटों पर चुनाव होंगे, वे महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना से संबंधित हैं। इन राज्यों की विधानसभा संरचना ही परिणामों का आधार बनेगी। राज्यसभा के चुनाव प्रत्यक्ष जनमत से नहीं, बल्कि निर्वाचित विधायकों के वोट से होते हैं। प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या और विधायकों की कुल संख्या के आधार पर ‘कोटा’ तय किया जाता है। सूत्र है—कुल विधायक संख्या को (सीटें + 1) से भाग देकर उसमें एक जोड़ दिया जाता है। यही न्यूनतम मत संख्या है, जो किसी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता के आधार पर जीत के लिए चाहिए।</div>
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<div style="text-align:justify;">बिहार का उदाहरण इस गणित को स्पष्ट करता है। वहां विधानसभा में 243 सदस्य हैं और इस चरण में पांच सीटों पर चुनाव होना है। सूत्र के अनुसार 243 को 6 से भाग देने पर 40.5 आता है, उसमें एक जोड़ने पर कोटा 41.5 बनता है, जिसे व्यावहारिक रूप से 42 माना जाता है। एनडीए के पास 202 विधायक हैं। इस आधार पर वह चार सीटें सहजता से जीत सकता है, क्योंकि 202 को 42 से भाग देने पर चार पूर्ण कोटे बनते हैं। इसके बाद उसके पास 38 वोट शेष रहते हैं। पांचवीं सीट के लिए उसे कम से कम तीन अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए। यही वह बिंदु है, जहां सियासी रणनीति और क्रॉस वोटिंग की संभावनाएं अहम हो जाती हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">बिहार में एनडीए के घटक दलों में भाजपा के 89 और जदयू के 85 विधायक हैं। इसके अतिरिक्त लोजपा (रामविलास), हम और अन्य सहयोगियों को मिलाकर संख्या 202 तक पहुंचती है। दूसरी ओर महागठबंधन में राजद के 25, कांग्रेस के 6 और वामदलों के तीन विधायक हैं। इनके अलावा पांच विधायक एआईएमआईएम और एक विधायक बसपा का है, जो किसी खेमे में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हैं। महागठबंधन की कुल संख्या 35 है, जो एक सीट के लिए भी पर्याप्त नहीं। यदि विपक्ष एआईएमआईएम और बसपा का समर्थन जुटा ले, तब भी उसे कोटा पूरा करने के लिए अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता रहेगी। इसीलिए बिहार में पांचवीं सीट का मुकाबला केवल गणित नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास और रणनीतिक तालमेल का प्रश्न बन गया है।</div>
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<div style="text-align:justify;">एनडीए की रणनीति स्पष्ट है कि वह चार सुनिश्चित सीटों के बाद पांचवीं पर भी दांव लगाए। इसके लिए बसपा के विधायक, महागठबंधन से जुड़े कुछ असंतुष्ट चेहरों या निर्दलीय समर्थन पर नजर है। वहीं विपक्ष भी यह समझता है कि यदि वह एकजुट होकर एक ही उम्मीदवार उतारे और अतिरिक्त समर्थन सुनिश्चित करे तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। किंतु यदि विपक्षी खेमे से एक से अधिक प्रत्याशी मैदान में आते हैं, तो प्रथम वरीयता के वोटों के बंटवारे से एनडीए को लाभ मिल सकता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्तर पर भी यही गणित कई राज्यों में दोहराया जा रहा है। महाराष्ट्र में हालिया विधानसभा परिणामों ने एनडीए को बढ़त दी है, जिससे वहां अतिरिक्त सीट मिलने की संभावना है। ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी क्षेत्रीय दलों की बदली ताकत का असर दिख सकता है। गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा में भाजपा की स्थिति मजबूत होने से विपक्ष की सीटें घट सकती हैं। कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में सीमित नुकसान की आशंका भी जताई जा रही है, परंतु कुल मिलाकर संतुलन एनडीए के पक्ष में झुकता दिखाई देता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">इन चुनावों का एक मानवीय और प्रतीकात्मक पहलू भी है। कई वरिष्ठ नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। कुछ के लिए पुनर्निर्वाचन कठिन प्रतीत हो रहा है, क्योंकि उनकी पार्टियों की विधानसभा शक्ति घटी है। राज्यसभा अक्सर उन नेताओं के लिए मंच रही है जो प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ते, किंतु राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहते हैं। यदि विधानसभा गणित अनुकूल न रहा, तो कई अनुभवी चेहरों की वापसी असंभव हो सकती है। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं, बल्कि संसदीय विमर्श की दिशा का भी संकेत होगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">सत्य आकलन यह दर्शाता है कि राज्यसभा का चुनाव पूर्णतः अंकगणितीय प्रक्रिया है, किंतु राजनीति इसे जीवंत बना देती है। जहां संख्या स्पष्ट है, वहां परिणाम लगभग तय होते हैं; जहां अंतर कम है, वहां रणनीति निर्णायक हो जाती है। 2026 का परिदृश्य बताता है कि एनडीए अपनी बढ़त को और मजबूत करने की स्थिति में है, जबकि विपक्ष को समन्वित रणनीति और आंतरिक एकता पर अधिक ध्यान देना होगा। विशेषकर बिहार जैसे राज्यों में पांचवीं सीट का संघर्ष यह सिद्ध करेगा कि भारतीय संसदीय राजनीति में एक-एक विधायक का महत्व कितना अधिक है।</div>
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<div style="text-align:justify;">अंततः, राज्यसभा के ये चुनाव केंद्र सरकार की विधायी क्षमता, विपक्ष की प्रतिरोध शक्ति और क्षेत्रीय दलों की सौदेबाजी क्षमता—तीनों को प्रभावित करेंगे। यदि अनुमान सही साबित होते हैं और एनडीए 145 के आसपास पहुंचता है, तो उच्च सदन में उसकी स्थिति पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ होगी। इसके विपरीत, विपक्ष को अपनी राजनीतिक रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ेगा। इस प्रकार 2026 का राज्यसभा चुनाव केवल सीटों का फेरबदल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के अगले अध्याय की प्रस्तावना है।</div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 18:55:03 +0530</pubDate>
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