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                <title>Strait of Hormuz Crisis - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Strait of Hormuz Crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>शांति वार्ता विफल, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़े विस्फोट की आशंका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया की तपती रेत पर एक बार फिर बारूद की गंध तेज हो गई है, और इस बार केंद्र में है अमेरिका,ईरान,इजरायल का जटिल त्रिकोण, जिसमें पाकिस्तान एक ऐसे संदेशवाहक की भूमिका में फँसता दिख रहा है जो न पूरी तरह किसी का हो पाया और न ही अपने घर की हालत संभाल पाया। हार्मुज़ जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र माना जाता है, इस संभावित टकराव का सबसे खतरनाक मोर्चा बन चुका है। यहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर ज़रा-सी चिंगारी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में विस्फोट कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका लंबे समय से ईरान के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177039/peace-talks-fail-fear-of-big-explosion-on-global-economy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260420_2128022.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया की तपती रेत पर एक बार फिर बारूद की गंध तेज हो गई है, और इस बार केंद्र में है अमेरिका,ईरान,इजरायल का जटिल त्रिकोण, जिसमें पाकिस्तान एक ऐसे संदेशवाहक की भूमिका में फँसता दिख रहा है जो न पूरी तरह किसी का हो पाया और न ही अपने घर की हालत संभाल पाया। हार्मुज़ जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र माना जाता है, इस संभावित टकराव का सबसे खतरनाक मोर्चा बन चुका है। यहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर ज़रा-सी चिंगारी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में विस्फोट कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है, जबकि इजरायल इसे अपने अस्तित्व के लिए सीधा खतरा मानता है और समय-समय पर ईरानी ठिकानों पर हमले करता रहा है। हाल के महीनों में घटनाओं की श्रृंखला ने तनाव को और अधिक तीखा कर दिया है। लाल सागर में जहाजों पर हमले, सीरिया और इराक में मिलिशिया गतिविधियाँ, और गाज़ा संघर्ष के बाद बढ़ा हुआ क्षेत्रीय असंतुलन,इन सबने हालात को विस्फोटक बना दिया है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने खुद को एक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की, लेकिन यह कूटनीतिक दांव उसके लिए भारी पड़ता दिख रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक रूप से पहले से जूझ रहे देश ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की मेहमाननवाज़ी के लिए महंगे होटलों और सुरक्षा इंतजामों पर भारी खर्च किया, जिसका बोझ आखिरकार उसकी आम जनता पर टैक्स और महंगाई के रूप में पड़ा, और यही कारण है कि देश के भीतर असंतोष की लहर तेज हो गई है। पाकिस्तान की यह स्थिति घर का न घाट जैसी हो गई है। एक ओर वह अमेरिका को खुश रखने की कोशिश करता है, दूसरी ओर ईरान जैसे पड़ोसी को नाराज़ भी नहीं करना चाहता, और इसी संतुलन की कोशिश में उसकी आंतरिक आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर और जर्जर हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति ने हालिया बयानों में स्पष्ट संकेत दिया है कि अमेरिका क्षेत्र में अपने हितों और सहयोगियों की सुरक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने को तैयार है, और यदि ईरान ने उकसावे वाली गतिविधियाँ बंद नहीं कीं तो कठोर जवाब दिया जाएगा। यह बयान सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाई की संभावना को खारिज नहीं करता बल्कि उसे एक रणनीतिक विकल्प के रूप में खुला रखता है। दूसरी ओर ईरान का रुख भी उतना ही सख्त है तेहरान का कहना है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">यदि उसके हितों पर हमला हुआ तो जवाब निर्णायक और व्यापक होगा। ईरानी नेतृत्व बार-बार यह दोहरा रहा है कि हार्मुज़ जलडमरूमध्य उसकी रणनीतिक पकड़ में है और जरूरत पड़ने पर वह वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित कर सकता है, जो दुनिया के लिए एक भयावह संकेत है। इस पूरे समीकरण में इजरायल की भूमिका भी बेहद आक्रामक बनी हुई है वह ईरान के परमाणु ठिकानों और उसके सहयोगी नेटवर्क को खत्म करने के लिए लगातार सैन्य विकल्पों पर विचार करता रहा है, और कई बार गुप्त अभियानों के जरिए ईरान को नुकसान पहुंचा चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन तीनों शक्तियों के बीच बढ़ती अविश्वास की खाई किसी भी छोटे घटनाक्रम को बड़े युद्ध में बदल सकती है, और हार्मुज़ जलडमरूमध्य इसका सबसे संवेदनशील बिंदु है, जहां एक मिसाइल, एक ड्रोन या एक गलतफहमी भी वैश्विक संकट का कारण बन सकती है। पाकिस्तान की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे दयनीय दिखाई देती है। एक ओर वह खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रासंगिक बनाए रखने के लिए इस तरह की मध्यस्थता करता है, लेकिन दूसरी ओर उसकी आर्थिक हकीकत उसे इस भूमिका के लिए तैयार नहीं होने देती विदेशी कर्ज, महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझते देश के लिए यह कूटनीतिक साहस कहीं न कहीं आत्मघाती साबित हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आम पाकिस्तानी नागरिक के लिए यह स्थिति और भी पीड़ादायक है, क्योंकि वह न तो इन वैश्विक रणनीतियों का हिस्सा है और न ही उसके पास इनका कोई लाभ है, लेकिन कीमत वही चुका रहा है,महंगे ईंधन, बढ़ते टैक्स और घटती जीवन-स्तर के रूप में। यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव वास्तव में युद्ध में बदलता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा; भारत सहित पूरी दुनिया पर इसके आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ेंगे, खासकर ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार मार्गों पर। इसलिए यह समय केवल शक्ति प्रदर्शन का नहीं, बल्कि संयम और संवाद का है, लेकिन मौजूदा हालात में जिस तरह से बयानबाज़ी और सैन्य गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, उससे शांति की संभावना कमजोर और टकराव की आशंका अधिक मजबूत दिखाई देती है।                            </p>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान के लिए यह एक कड़ा और बड़ा सबक हो सकता है कि वैश्विक राजनीति में बिना मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक आधार के बड़ी भूमिकाएँ निभाने की कोशिश अंततः देश के भीतर ही असंतोष और संकट को जन्म देती है। यही कारण है कि आज वह एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से आगे का हर कदम जोखिम भरा है, जबकि दुनिया की निगाहें हार्मुज़ जलडमरूमध्य पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में शांति का मार्ग बनेगा या युद्ध का द्वार, यह कहना फिलहाल मुश्किल है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन परिस्थितियों में यदि शांति स्थापित नहीं होती है तो यह वैश्विक शांति के लिए ऐतिहासिक रूप से बड़ा खतरा बन सकता है। वर्तमान में आधुनिक परमाणु युद्ध बहुत उन्नत टेक्नोलॉजी वाला होता है तो पूरी दुनिया में मरने वालों की संख्या बहुत भयावह होने वाली है और आर्थिक रूप से आगे आने वाले 20 वर्षों में ना पूरा होने वाला नुकसान साबित होगा और आने वाला युद्ध आधुनिक वैज्ञानिक टेक्नोलॉजी का बहुत बड़ा अभिशाप साबित हो सकता है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 18:07:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बहुत आपत्तिजनक हैं ट्रंप के असंयमित असभ्य बयान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175393/trumps-uncontrolled-rude-statements-are-very-objectionable"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c0eb6ec0-68a6-11f0-83d0-5d68283eb47c.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद से लगभग बंद है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. ट्रंप ने होर्मुज को लेकर ईरान को कई बार धमकी दी है और इस समुद्री मार्ग को खोलने का अल्टीमेटम दे चुके हैं. उन्होंने होर्मुज को खोलने में अमेरिका की मदद नहीं करने के लिए यूरोपीय व नाटो सहयोगियों पर भी नाराजगी जताई है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने यहां तक चेतावनी दी कि अमेरिका नाटो से बाहर निकल सकता है. अपने इस पोस्ट में ट्रंप ने ईरान के लिए ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया, जिसकी किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से उम्मीद नहीं की जाती. हालांकि हम जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप पर कभी कोई मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस समय उनकी भाषा में जो गिरावट स्पष्ट स्पष्ट परिलक्षित है, कम से कम उसका विश्व समुदाय को विरोध करना चाहिए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल ईरान पर अमेरिका और इजरायल को जंग छेड़े छह सप्ताह हो चुके हैं, जिसमें कई बार जीत का दावा करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जीत के लक्षण नहीं दिखा पाए। बल्कि बार-बार युद्धविराम की अवधि को बदलते हैं और साथ ही उनकी धमकियां भी बदल रही हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के ऐलान से शुरु हुआ यह युद्ध अब नागरिकों को निशाने पर लेने की धमकियों पर उतर आया है। रविवार को ईस्टर के मौके पर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टूथ पर ट्रंप ने ईरान को धमकी दी कि 48 घंटों में होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खोलो वर्ना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने लिखा कि मंगलवार को ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक हमले हो सकते हैं, और इसे संघर्ष का निर्णायक क्षण बताया। लेकिन यह सब इसी तरह की शालीन भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। और यह पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपशब्द कहे हों। इससे पहले उन्हें पत्रकारों से चर्चा के दौरान या भाषण देते हुए भी अपशब्द बोलते देखा गया है। यह किसी लिहाज से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और वैश्विक नेताओं को खुलकर इसकी भर्त्सना करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी से इसकी शुरुआत हो तो कितना अच्छा रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी सीनेट के सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी के ​वरिष्ठ नेता चक शूमर ने ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के बयान को 'एक असंतुलित व्यक्ति की बकवास बताया'. उन्होंने कहा कि ट्रंप का यह रवैया अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर कर रहा है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के हालिया बयान को युद्ध अपराध की धमकी देने जैसा बताया. ट्रंप की पूर्व सहयोगी मार्जरी टेलर ग्रीन ने भी उनके बयान की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रपति 'पागलपन' की स्थिति में हैं. उन्होंने अमेरिकी प्रशासन के लोगों से दखल देने की अपील की. टेलर ग्रीन ने कहा कि यह युद्ध बिना उकसावे के शुरू किया गया और इससे निर्दोष लोगों की जान जा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैसे संयुक्त राष्ट्र में  ईरानी ई मिशन ने ट्रंप की की नवीनतम टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में' नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करने' की धमकी दे रहे हैं। मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, 'यदि संयुक्त राष्ट्र की अंतरात्मा जीवित होती, तो वह युद्ध भड़काने तो वह युद्ध भड़काने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की खुली और बेशर्म धमकी पर चुप नहीं रहती। ट्रंप इस क्षेत्र को एक अंतहीन युद्ध में घसीटना चाहते हैं।' इसमें कहा गया, 'यह नागरिकों को आतंकित करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावा है और युद्ध अपराध करने के इरादे का स्पष्ट प्रमाण है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें आगे कहा गया- 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सभी राज्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे युद्ध अपराधों के ऐसे जघन्य कृत्यों को रोकें। उन्हें अभी कार्रवाई करनी चाहिए। कल बहुत देर हो जाएगी।' वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष गलिबाफ ने कहा कि ट्रंप के 'लापरवाह कदमों से अमेरिका के हर परिवार को एक जीती-जागती नरक में धकेला जा रहा है, हमारा पूरा क्षेत्र जल उठेगा क्योंकि आप नेतन्याहू के आदेशों का पालन करने पर अड़े हैं।' गुलिबाफ के इस बयान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं, उसमें यही लगता है कि पटकथा कोई और लिख रहा है, केवल संवाद अदायगी ट्रंप की है। क्योंकि अपशब्द वाले बयान के बाद ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के एक पत्रकार से कहा, मुझे लगता है कि सोमवार को समझौता होने की अच्छी संभावना है, वे (ईरान) अभी बातचीत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तो ट्रंप को लगता है कि ईरान अब भी उनसे बात कर समझौता करेगा, जबकि ईरान की सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूनिट खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता ने कहा, 'अगर आम लोगों पर हमले दोहराए गए, तो हमारे अगले हमले और जवाबी कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और बड़े पैमाने पर होंगे।' ध्यान देने वाली बात यह है कि ईरान केवल धमका नहीं रहा है, अपनी बात पर अमल भी कर रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों समेत इजरायल पर ईरान के हमलों को कोई रोक नहीं पा रहा है, वहीं अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हुए हमले और एक अमेरिकी पायलट के लापता होने की घटना ने भी जाहिर कर दिया है कि अमेरिका उतना भी ताकतवर देश नहीं है, जितना बड़ा उसका हौव्वा खड़ा किया गया है। ईरान की पहाड़ियों में लापता पायलट को बचाने का दावा ट्रंप ने किया है, हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने बचाव के लिए आए सैन्य दस्ते पर भी हमला किया है। अब किसका दावा सही है और किसका गलत, यह तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो नजर आ ही रहा है कि इस युद्ध में अमेरिका को वैसी ही चोट पड़ रही है, जो पहले इराक, अफगानिस्तान, क्यूबा और वियतनाम में पड़ चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि 2019 में ट्रंप ने खुद एक पोस्ट में प. एशिया में अमेरिका की सैन्य दखलंदाजी और युद्ध को गलत ठहराया था, क्योंकि उसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और सैनिकों का नुकसान हुआ। लेकिन अब संभवतः एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के दबाव में ट्रंप ने पूरी दुनिया को युद्ध की बर्बादी में झोंक दिया है। अपनी गलती मानने की जगह रोजाना बेतुके, निर्लज्ज बयानों से उसे सही भी ठहरा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में परमाणु हथियार और सत्ता बदलने के नाम पर शुरु किया गया युद्ध मीनाब की मासूम बच्चियों का कातिल बना और उसके बाद ईरान की अधोसंरचना पर हमले ही किए जा रहे हैं, कम से कम 30 विश्वविद्यालयों और कई अस्पतालों, दवा कारखानों को बारुद से ढेर कर दिया गया है। यह सीधे-सीधे मानवता के खिलाफ अपराध है, जिसे रोकने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर आवाज उठानी चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:20:36 +0530</pubDate>
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                <title>होर्मुज संकट के बीच वैश्विक तनाव और संवाद की आवश्यकता,होरमुज संकट का समाधान बातचीत से ही सम्भव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, इस समय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले तेल और गैस की आपूर्ति पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक बाजार, महंगाई और आम जनजीवन पर पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174987/global-tension-amid-hormuz-crisis-and-need-for-dialogue-solution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, इस समय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले तेल और गैस की आपूर्ति पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक बाजार, महंगाई और आम जनजीवन पर पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक में साठ से अधिक देशों ने भाग लिया, जिसमें इस संकट को सुलझाने के उपायों पर विचार किया गया। इस बैठक में भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरे संकट का समाधान केवल बातचीत और शांति के माध्यम से ही संभव है। भारत का यह रुख उसकी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जिसमें वह हमेशा संवाद, संयम और संतुलन को प्राथमिकता देता रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत द्वारा यह भी बताया गया कि इस संघर्ष में अब तक केवल भारतीय नागरिकों की मृत्यु हुई है, जो विदेशी जहाजों पर काम कर रहे थे। यह तथ्य इस संकट की गंभीरता को और बढ़ा देता है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि युद्ध का प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह निर्दोष लोगों की जान भी लेता है। भारत का यह बयान एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चेतावनी भी है कि यदि समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस संघर्ष को अपनी रणनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं। अमेरिकी नेतृत्व द्वारा दिए गए बयान इस बात का संकेत देते हैं कि वे इस युद्ध को अपनी शक्ति और प्रभुत्व स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। हालांकि उन्होंने बातचीत की बात भी की है, लेकिन उनके वक्तव्यों में कठोरता और चेतावनी का स्वर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इस प्रकार के विरोधाभासी संकेत स्थिति को और जटिल बना देते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की ओर से भी कड़ा रुख अपनाया गया है। उसने स्पष्ट किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य उसके नियंत्रण में है और यह तभी खुलेगा जब उसकी शर्तों को स्वीकार किया जाएगा। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर तनाव को बढ़ाने वाली है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो तेल की आपूर्ति में भारी कमी आ सकती है, जिससे विश्वभर में ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है। इस संघर्ष का एक और गंभीर पहलू मानवीय संकट है। विभिन्न देशों में हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग घायल या विस्थापित हुए हैं। अस्पतालों, स्कूलों और अन्य बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचा है। यह स्थिति दर्शाती है कि युद्ध केवल सैनिकों के बीच नहीं होता, बल्कि इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस स्थिति पर चिंता व्यक्त की है और युद्धविराम की अपील की है। उनका मानना है कि यदि यह संघर्ष जारी रहा तो इसके परिणामस्वरूप वैश्विक आर्थिक मंदी, खाद्य संकट और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से विकासशील देशों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर होगा, क्योंकि वे पहले से ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।भारत का रुख इस पूरे परिदृश्य में संतुलित और दूरदर्शी दिखाई देता है। उसने न तो किसी पक्ष का समर्थन किया है और न ही किसी के खिलाफ आक्रामक बयान दिए हैं। इसके बजाय उसने शांति और संवाद का मार्ग अपनाने की अपील की है। यह नीति न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी आवश्यक है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, इस प्रकार के संकट से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ता है। इसलिए भारत का यह प्रयास कि स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाए, पूरी तरह से व्यावहारिक और आवश्यक है।वर्तमान परिस्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि युद्धों ने केवल विनाश और पीड़ा ही दी है। इसके विपरीत, संवाद और सहयोग के माध्यम से ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। इसलिए सभी देशों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ बैठकर समाधान खोजने की आवश्यकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि होर्मुज संकट केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती का सामना केवल शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि समझदारी, संयम और संवाद से किया जा सकता है। यदि विश्व समुदाय समय रहते सही कदम उठाता है, तो इस संकट को टाला जा सकता है और एक स्थिर तथा शांतिपूर्ण भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 18:54:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>तेल, तनाव और विकास दर: ‘युद्ध-भय’ का भारतीय परिदृश्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का ‘युद्ध-भय’ सिंड्रोम अब किसी मनोवैज्ञानिक शब्दकोश की परिभाषा भर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी के भारत की आर्थिक नब्ज बन चुका है। जैसे ही पश्चिम एशिया में बारूद सुलगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुंबई के दलाल स्ट्रीट पर घबराहट छा जाती है। मार्च </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष ने इस आशंका को चरम तक पहुँचा दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब ब्रेंट क्रूड </span>82 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर के ऊपर निकल गया और होर्मुज स्ट्रेट पर जहाज़ों की लंबी कतारें दिखने लगीं। वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्टों के मुताबिक </span>4.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हाल तक नियंत्रित महंगाई और तेज़</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172479/indian-scenario-of-oil-stress-and-growth-rate-%E2%80%98war-fear%E2%80%99"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का ‘युद्ध-भय’ सिंड्रोम अब किसी मनोवैज्ञानिक शब्दकोश की परिभाषा भर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी के भारत की आर्थिक नब्ज बन चुका है। जैसे ही पश्चिम एशिया में बारूद सुलगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुंबई के दलाल स्ट्रीट पर घबराहट छा जाती है। मार्च </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष ने इस आशंका को चरम तक पहुँचा दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब ब्रेंट क्रूड </span>82 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर के ऊपर निकल गया और होर्मुज स्ट्रेट पर जहाज़ों की लंबी कतारें दिखने लगीं। वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्टों के मुताबिक </span>4.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हाल तक नियंत्रित महंगाई और तेज़ वृद्धि का उदाहरण मानी जा रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचानक बाहरी झटकों से डगमगाने लगी। यह महज आर्थिक उतार-चढ़ाव नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सामूहिक मानस का संकट है—निवेशक जोखिम समेटते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपया दबाव झेलता है और आम उपभोक्ता को पेट्रोल पंप पर मिलता बिल आने वाले कल की चिंता जता देता है। वैश्वीकरण की चमक के पीछे छिपी यह असुरक्षा हर बार सामने आ जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ‘युद्ध-भय’ की जड़ें नई नहीं हैं। </span>1991 <span lang="hi" xml:lang="hi">का खाड़ी संकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब इराक ने कुवैत पर चढ़ाई की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को लगभग खाली कर गया और आर्थिक उदारीकरण का द्वार मजबूरी में खुला। </span>1973 <span lang="hi" xml:lang="hi">के योम किप्पुर युद्ध ने तेल को हथियार बना दिया था और तब भी भारत ने आयात-निर्भरता की भारी कीमत चुकाई। </span>2022 <span lang="hi" xml:lang="hi">में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान कच्चा तेल </span>120 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर तक जा पहुँचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई </span>7 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से ऊपर निकली और मौद्रिक सख्ती बढ़ानी पड़ी। हर बार पैटर्न एक-सा रहा—कहीं दूर युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यहाँ विकास दर पर प्रहार। इतिहास लगातार चेताता रहा कि ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक और आपूर्ति शृंखलाओं में अत्यधिक बाहरी निर्भरता हमें असुरक्षित करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी संकट टलते ही हम सामान्यता के भ्रम में लौट आते हैं। यही चूक ‘युद्ध-भय’ को स्थायी मनःस्थिति में बदल देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">का पश्चिम एशियाई संघर्ष इसी पैटर्न का समकालीन रूप है। भारत के लगभग </span>17 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत निर्यात उसी क्षेत्र की ओर जाते हैं और एक करोड़ से अधिक प्रवासी वहाँ से रेमिटेंस भेजते हैं। यदि तनाव लंबा चला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तेल </span>100 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर के पार निकल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे चालू खाते का घाटा फैलेगा और विकास की गति पर दबाव बढ़ेगा। लॉजिस्टिक्स लागत में उछाल और बीमा प्रीमियम में वृद्धि व्यापारिक मार्जिन को निगल जाती है। वित्तीय बाजारों में जोखिम-प्रतिकूलता बढ़ती है और पूंजी उभरते बाजारों से सुरक्षित ठिकानों की ओर सिमटती है। इस पूरी प्रक्रिया में भारत की ‘स्वीट स्पॉट’ अर्थव्यवस्था—जहाँ महंगाई काबू में और विकास संतुलित था—अचानक असंतुलन की तरफ झुक जाती है। युद्ध भले सीमाओं से दूर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ऊर्जा मार्गों और पूंजी प्रवाह के जरिये वह हमारे बजट और जेब पर दस्तक दे देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा क्षेत्र इस सिंड्रोम की सबसे नाजुक नस है। भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग </span>88 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज मार्ग से गुजरता है। रणनीतिक भंडार सीमित समय तक ही सहारा दे सकते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबा व्यवधान उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवहन और कृषि की लागत बढ़ा देगा। ईंधन महँगा होता है तो ट्रकों का भाड़ा बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारखानों की लागत चढ़ती है और अंततः किराने की दुकानों पर दाम बढ़ जाते हैं। यही क्रम ‘ऊर्जा झटके’ को ‘मुद्रास्फीति तूफान’ में बदल देता है। विकसित भारत </span>2047 <span lang="hi" xml:lang="hi">का स्वप्न सस्ती और स्थिर ऊर्जा पर आधारित है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हर वैश्विक टकराव पर हमारी ऊर्जा सुरक्षा हिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह सपना बार-बार कसौटी पर होगा। विविधीकरण—चाहे नवीकरणीय ऊर्जा हो या नए आपूर्तिकर्ता—अब विकल्प नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिवार्यता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई और रुपया इस भय के सबसे स्पष्ट संकेतक हैं। तेल में हर </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉलर की बढ़ोतरी चालू खाते के घाटे को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देती है और आयात बिल को फुला देती है। रुपया दबाव झेलता है तो विदेशी ऋण महँगा हो जाता है और कंपनियों की बैलेंस शीट प्रभावित होती है। केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों के माध्यम से संतुलन साधना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कर्ज महँगा और निवेश धीमा पड़ सकता है। अंततः इसका भार आम नागरिक उठाता है—ईंधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। ‘युद्ध-भय’ इसलिए भी गहरा है क्योंकि यह अदृश्य कर की तरह काम करता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी घरेलू नीति-चूक के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक संघर्ष हमारी क्रय शक्ति को कम कर देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूंजी बाजार इस मनोविज्ञान को सबसे तेजी से प्रतिबिंबित करते हैं। अनिश्चितता बढ़ते ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेश सिमटता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी सूचकांक गिरते हैं और नई परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाना कठिन हो जाता है। भारत का बाजार आकार भले पाँच ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुँच गया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर तेल-आधारित झटके इसे वैश्विक साथियों से पीछे धकेल सकते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी जोखिम आकलन के नए मानकों पर कसा जाता है। जब वैश्विक फंड प्रबंधक भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम बढ़ाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उभरती अर्थव्यवस्थाएँ पहले झटका खाती हैं। एक युद्ध की खबर हजारों अंकों की गिरावट में बदल जाती है और विकास कथा पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। यही वह क्षण है जब ‘युद्ध-भय’ आर्थिक वास्तविकता का रूप ले लेता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर हर संकट अपने भीतर समाधान का बीज भी छिपाए रहता है। यह परिदृश्य केवल असहायता का चित्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि तैयारी और परिवर्तन की पुकार है। सरकारें ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीतिक भंडार के विस्तार और नवीकरणीय निवेश के माध्यम से जोखिम सीमित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। कूटनीतिक संतुलन भी अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि सभी पक्षों के साथ ऊर्जा और व्यापारिक रिश्ते सुरक्षित रह सकें। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से दूरी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लचीले वैश्विक एकीकरण की समझदारी भरी नीति है। यदि हम इतिहास से सबक लेकर आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घरेलू विनिर्माण को प्रतिस्पर्धी बनाएं और वित्तीय अनुशासन बनाए रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ‘युद्ध-भय’ स्थायी नियति नहीं रहेगा।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्यथा हर वैश्विक टकराव हमारी अर्थव्यवस्था की नसों पर दबाव बनाता रहेगा। यह सिंड्रोम चेतावनी भी है और अवसर भी—चुनाव हमारा है कि हम भय में सिमटें या उसे नीतिगत सुधार की शक्ति में रूपांतरित कर दें।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 19:01:24 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ईरान के गर्ल्स स्कूल पर हमला मानवता के विरुद्ध अपराध और वैश्विक अंतरात्मा की पुकार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दक्षिणी ईरान के एक गर्ल्स स्कूल पर हुआ हवाई हमला पूरी दुनिया को झकझोर देने वाला है। मासूम बच्चियों की मौत ने युद्ध की भयावहता को एक बार फिर दुनिया के सामने रख दिया है। इस घटना की गूंज केवल ईरान या मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानवता की अंतरात्मा को झकझोरने वाली त्रासदी बन चुकी है। जब युद्ध की आग में निर्दोष बच्चों की जान जाती है तो वह केवल एक देश की नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता की हार होती है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोकर तुर्क  ने स्पष्ट शब्दों में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172475/attack-on-irans-girls-school-a-crime-against-humanity-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/582026-03-03t104726z1691264504rc2ywja30818rtrmadp3_1772535799.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दक्षिणी ईरान के एक गर्ल्स स्कूल पर हुआ हवाई हमला पूरी दुनिया को झकझोर देने वाला है। मासूम बच्चियों की मौत ने युद्ध की भयावहता को एक बार फिर दुनिया के सामने रख दिया है। इस घटना की गूंज केवल ईरान या मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानवता की अंतरात्मा को झकझोरने वाली त्रासदी बन चुकी है। जब युद्ध की आग में निर्दोष बच्चों की जान जाती है तो वह केवल एक देश की नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता की हार होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोकर तुर्क  ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस मामले की जल्द निष्पक्ष और पूरी जांच होनी चाहिए। जिनेवा में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शामनाशादी ने भी कहा कि जिस पक्ष ने हमला किया है उसी की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे और सच्चाई दुनिया के सामने लाए। उनका यह बयान अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के सिद्धांतों की याद दिलाता है जिनका पालन हर परिस्थिति में अनिवार्य है चाहे हालात कितने भी तनावपूर्ण क्यों न हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि हमले में 150 छात्राओं की मौत हुई है और मिनाब शहर में उनके अंतिम संस्कार के लिए सामूहिक कब्रें खोदी गईं। यह दृश्य केवल ईरान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए पीड़ा का कारण है। नन्हीं बच्चियों के ताबूतों के सामने खड़े परिजन और रोते बिलखते परिवार इस बात का प्रमाण हैं कि युद्ध का सबसे बड़ा खामियाजा हमेशा आम नागरिक और मासूम बच्चे ही भुगतते हैं। सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों ने इस त्रासदी को और भी वास्तविक और भयावह बना दिया है। हर तस्वीर युद्ध की निर्ममता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की कहानी कहती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अमेरिकी सेना जानबूझकर किसी स्कूल को निशाना नहीं बनाती। वहीं इजराइल की ओर से भी कहा गया है कि इस घटना की जांच की जा रही है। इन बयानों के बीच सच्चाई क्या है यह एक निष्पक्ष और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा। युद्ध के दौरान अक्सर सूचनाएं और दावे एक दूसरे से टकराते हैं लेकिन सच्चाई तक पहुंचना ही न्याय की पहली शर्त है।</div>
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<div style="text-align:justify;">यह हमला ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इस अभियान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया गया है। दोनों पक्षों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला जारी है। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है और क्षेत्रीय तनाव चरम पर है। ऐसे माहौल में एक स्कूल पर हमला केवल सैन्य रणनीति का सवाल नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन का गंभीर आरोप बन जाता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">युद्ध के नियम स्पष्ट हैं कि स्कूल अस्पताल और नागरिक ठिकाने संरक्षित क्षेत्र माने जाते हैं। यदि किसी भी कारण से इन पर हमला होता है तो उसकी गहन जांच आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह भावनाओं से परे जाकर तथ्यों की पुष्टि करे और दोषियों को जवाबदेह ठहराए। यदि इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी साध ली जाती है तो यह भविष्य में और भी भयावह हमलों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">दुनिया के विभिन्न देशों से इस घटना पर शोक और आक्रोश व्यक्त किया गया है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे निंदनीय बताया है और तत्काल युद्धविराम की मांग की है। बच्चों की मौत किसी भी राजनीतिक या सामरिक तर्क से उचित नहीं ठहराई जा सकती। चाहे कोई भी विचारधारा हो या कोई भी रणनीतिक लक्ष्य हो निर्दोषों की हत्या उसे नैतिक वैधता नहीं दे सकती।</div>
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<div style="text-align:justify;">इस त्रासदी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक हथियारों और तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद हम मानवीय मूल्यों की रक्षा कर पा रहे हैं। यदि नहीं तो यह प्रगति अधूरी है। सभ्यता का वास्तविक पैमाना युद्ध में भी मानवता को जीवित रखना है। जब स्कूलों पर बम गिरते हैं तो यह केवल इमारतों का नहीं बल्कि भविष्य का विध्वंस होता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">ईरान और इजराइल अमेरिका के बीच जारी संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी चिंता में डाल दिया है। तेल की कीमतों में उछाल और क्षेत्रीय असुरक्षा ने दुनिया को यह एहसास कराया है कि यह युद्ध सीमित नहीं रहेगा। लेकिन इन भू राजनीतिक चिंताओं से परे एक सच्चाई यह है कि युद्ध की कीमत सबसे पहले और सबसे अधिक आम नागरिक चुकाते हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">स्कूल पर हमला केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि मानवता की परीक्षा है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर एकजुट होकर निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करता है तो यह भविष्य के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा। अन्यथा यह घटना इतिहास के उन काले अध्यायों में दर्ज हो जाएगी जहां निर्दोषों का खून न्याय की प्रतीक्षा करता रह गया।</div>
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<div style="text-align:justify;">आज पूरी दुनिया उन बच्चियों के लिए आंसू बहा रही है जिनके सपने अधूरे रह गए। वे डॉक्टर बनना चाहती थीं शिक्षक बनना चाहती थीं या शायद केवल अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जीना चाहती थीं। उनकी हंसी और खिलखिलाहट अब केवल यादों में रह गई है। यह क्षति अपूरणीय है।</div>
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<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता है संयम संवाद और शांति की दिशा में ठोस पहल की। युद्ध से कभी स्थायी समाधान नहीं निकलता। हिंसा का हर दौर नई हिंसा को जन्म देता है। यदि इस त्रासदी से भी दुनिया सबक नहीं लेती तो भविष्य और भी भयावह हो सकता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">इसलिए यह आवश्यक है कि इस हमले की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए। मानवता की रक्षा केवल शब्दों से नहीं बल्कि ठोस कदमों से होगी। नन्हीं बच्चियों की याद में यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी कि दुनिया एक ऐसी व्यवस्था बनाने का संकल्प ले जहां स्कूल कभी युद्ध का निशाना न बनें और बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे।</div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 18:48:28 +0530</pubDate>
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