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                <title>court strict observation - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>court strict observation RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मृत व्यक्ति के खिलाफ अपील दाखिल करने पर फटकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार की अपील खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही का मामला सामने आने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने उस अपील को खारिज किया, जो सरकार ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दाखिल की थी, जिसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है और उसके कानूनी वारिसों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही बरती गई और केवल यह कहकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता कि अपील दाखिल करने की अनुमति देर से मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “राज्य की ओर से मृत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175325/allahabad-high-court-reprimanded-for-filing-appeal-against-dead-person"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1200-675-23912190-thumbnail-16x9-image18.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही का मामला सामने आने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने उस अपील को खारिज किया, जो सरकार ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दाखिल की थी, जिसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है और उसके कानूनी वारिसों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही बरती गई और केवल यह कहकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता कि अपील दाखिल करने की अनुमति देर से मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “राज्य की ओर से मृत प्रतिवादी के खिलाफ अपील दाखिल की गई और तीन साल से अधिक समय तक उसके कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया, जबकि इसकी जानकारी थी। इसके लिए कोई उचित कारण नहीं है, क्योंकि वारिसों को शामिल करने के लिए किसी उच्च अधिकारी की अनुमति आवश्यक नहीं होती।”</p>
<p style="text-align:justify;">मामला भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 54 के तहत दायर अपील से जुड़ा है, जिसमें राज्य सरकार ने मुआवजा कम करने की मांग की थी। यह अपील 1516 दिनों की देरी से दाखिल की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का तर्क था कि वर्ष 2018 में पारित आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति 2022 में मिली, जिसके बाद अपील दाखिल की गई। साथ ही यह भी कहा गया कि 2025 में वाद समाप्ति के आवेदन आने के बाद ही उन्हें प्रतिवादी की मृत्यु की जानकारी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी के वारिसों की ओर से बताया गया कि उन्होंने पहले ही कार्यान्वयन कार्यवाही में हलफनामा देकर मृत्यु की जानकारी दी थी और वहां वारिसों को प्रतिस्थापित भी किया जा चुका था। इसके बावजूद राज्य ने हाईकोर्ट में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का तर्क था कि वर्ष 2018 में पारित आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति 2022 में मिली, जिसके बाद अपील दाखिल की गई। साथ ही यह भी कहा गया कि 2025 में वाद समाप्ति के आवेदन आने के बाद ही उन्हें प्रतिवादी की मृत्यु की जानकारी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी के वारिसों की ओर से बताया गया कि उन्होंने पहले ही कार्यान्वयन कार्यवाही में हलफनामा देकर मृत्यु की जानकारी दी थी और वहां वारिसों को प्रतिस्थापित भी किया जा चुका था। इसके बावजूद राज्य ने हाईकोर्ट में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य को प्रतिवादी की मृत्यु की जानकारी होने के बावजूद उसने आवश्यक कदम नहीं उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसे में अपील मृत व्यक्ति के खिलाफ दायर होने के कारण कानूनी रूप से शून्य (नॉन-एस्ट) है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने स्पष्ट किया, “यदि अपील दाखिल होने के बाद मृत्यु होती तो प्रतिस्थापन का आवेदन किया जा सकता था। हालांकि, यहां अपील ही मृत व्यक्ति के खिलाफ दायर की गई, जो कानूनन मान्य नहीं है।” इसी आधार पर अदालत ने देरी माफी आवेदन, प्रतिस्थापन आवेदन और अपील सभी खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 20:17:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>औचक निरीक्षण कर थानों के सीसीटीवी कैमरों की खबर लेंगे हर जिले के सीजेएम- इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे के थानों के सीसीटीवी कैमरों की निगरानी का जिम्मा हर जिले के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) को सौंपा है। ये अब जिला जज को जानकारी देकर थानों का निरीक्षण करेंगे। यह जानेंगे कि थाने में लगे कैमरे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार काम कर रहे या नहीं। निरीक्षण के दौरान जानकारी देने में हीलाहवाली पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने ललितपुर निवासी महिला की अवैध हिरासत से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए दिया है। मामला ललितपुर के मुख्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172391/cjm-of-every-district-will-take-information-of-cctv-cameras"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे के थानों के सीसीटीवी कैमरों की निगरानी का जिम्मा हर जिले के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) को सौंपा है। ये अब जिला जज को जानकारी देकर थानों का निरीक्षण करेंगे। यह जानेंगे कि थाने में लगे कैमरे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार काम कर रहे या नहीं। निरीक्षण के दौरान जानकारी देने में हीलाहवाली पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने ललितपुर निवासी महिला की अवैध हिरासत से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए दिया है। मामला ललितपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेशों की बार-बार अनदेखी से जुड़ा है। धोखाधड़ी मामले में याची की अवैध हिरासत और सूरज डूबने के बाद उसकी बहन की गिरफ्तारी के आरोपों पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने थाने के सीसीटीवी फुटेज तलब किए थे। पुलिस अधिकारियों ने स्टोरेज फुल होने का बहाना बनाकर फुटेज नहीं दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर हाईकोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी और जांच अधिकारी को अवमानना का दोषी करार दिया। सजा के तौर पर दोनों को कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने तक अदालत कक्ष में ही हिरासत में रखा गया। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट का पद और कद डीएम, एसपी ही नहीं, किसी भी राजनीतिक प्रमुख से ऊपर है। उनके आदेश की अवहेलना न केवल अदालत की अवमानना है, बल्कि कानून के राज को सीधी चुनौती है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">जिले के न्यायिक अधिकारी की अदालत आम आदमी के लिए न्याय का पहला दरवाजा है, न्यायपालिका की रीढ़ है। उसकी तुलना प्रशासनिक अधिकारियों से नहीं की जा सकती, जो केवल नीतियों को लागू करते हैं। लिहाजा, कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ित को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। कहा, यह राशि दोषी पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूली जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 20:57:12 +0530</pubDate>
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