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                <title>Allahabad High Court order - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Allahabad High Court order RSS Feed</description>
                
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                <title>हाईकोर्ट की सख्ती बरकरार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क में अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। माननीय न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकलपीठ ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया माना कि 22 अप्रैल 2026 को पारित आदेश की अवहेलना का मामला बनता है। हालांकि, न्यायालय ने इस स्तर पर नोटिस जारी किए बिना संबंधित अधिकारियों को एक माह का अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया है कि पूर्व आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आदेश के अनुपालन की सूचना याची को भी उपलब्ध कराने को कहा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184391/high-courts-strictness-remains-intact"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1002152235.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क में अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। माननीय न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकलपीठ ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया माना कि 22 अप्रैल 2026 को पारित आदेश की अवहेलना का मामला बनता है। हालांकि, न्यायालय ने इस स्तर पर नोटिस जारी किए बिना संबंधित अधिकारियों को एक माह का अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया है कि पूर्व आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आदेश के अनुपालन की सूचना याची को भी उपलब्ध कराने को कहा गया है। यदि आदेश का पालन नहीं किया जाता है, तो याची को पुनः न्यायालय आकर अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जनहित याचिका में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि नगर निगम एवं कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) के अभिलेखों में ब्लॉक-8 पार्क/खेल मैदान के रूप में दर्ज सार्वजनिक भूमि का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने जिला मजिस्ट्रेट, नगर आयुक्त एवं केडीए उपाध्यक्ष को निर्देश दिया था कि पार्क को अतिक्रमणमुक्त कर उसका मूल स्वरूप बहाल किया जाए तथा भविष्य में उसका उपयोग केवल पार्क एवं खेल मैदान के रूप में ही सुनिश्चित किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अवमानना याचिका में कहा गया है कि 29 अप्रैल 2026 को न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध करा दी गई थी, लेकिन तीन माह से अधिक समय बीतने के बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके विपरीत पार्क का मूल स्वरूप बहाल करने के बजाय विवादित निर्माणों को यथावत बनाए रखा गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम ने कथित विकास कार्यों के नाम पर पार्क में पहले से मौजूद अवैध निर्माणों की अनदेखी करते हुए तथा अवैध कब्जेदारों से मिलीभगत कर नगर निगम के पार्क के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से पर नियमों के विपरीत इंटरलॉकिंग बिछा दी। इससे पार्क का हरित क्षेत्र और मूल स्वरूप गंभीर रूप से प्रभावित हुआ तथा वर्षों पुराना हरा-भरा सार्वजनिक पार्क कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया। आरोप है कि यह कार्य न केवल सार्वजनिक पार्क के उद्देश्य के विपरीत है, बल्कि माननीय हाईकोर्ट के आदेश की भावना के भी प्रतिकूल है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याची प्रकाश वीर आर्य ने गंभीर आरोप लगाया कि माननीय हाईकोर्ट की आंखों में धूल झोंकने के उद्देश्य से 22 अप्रैल 2026 के आदेश के बाद नगर निगम ने रातोंरात पार्क के भीतर लगे तथाकथित विकास कार्यों के मूल शिलापट्ट को, जिस पर "ब्लॉक-8 पार्क" अंकित था, हटाकर उसकी जगह "बालाजी पार्क" नाम का नया शिलापट्ट स्थापित कर दिया। उनका कहना है कि यह परिवर्तन न्यायालय के समक्ष वास्तविक स्थिति को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया। उन्होंने बताया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत नगर निगम के उद्यान अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई आधिकारिक सूचना में भी संबंधित स्थल का नाम "ब्लॉक-8 पार्क" ही दर्ज है। ऐसे में अभिलेखों के विपरीत नया शिलापट्ट लगाए जाने से नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ब्लॉक-8 निवासी जे.पी. दुबे, एडवोकेट ने कहा कि यह मामला केवल एक पार्क का नहीं, बल्कि माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की गरिमा, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा तथा कानून के शासन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अभिलेखों के विपरीत शिलापट्ट बदला गया तथा अवैध निर्माणों को संरक्षण देते हुए पार्क के अधिकांश हिस्से को कंक्रीट में बदल दिया गया, तो पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी बीच केस्को की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। केस्को की जांच आख्या में उल्लेख किया गया है कि विवादित परिसर को क्षेत्रीय पार्षद द्वारा दिए गए एनओसी एवं अन्य प्रपत्रों के आधार पर नया विद्युत संयोजन स्वीकृत किया गया। केस्को यह स्पष्ट नहीं कर सका कि किस कानून, नियम या शासनादेश के तहत किसी नगर निगम पार्षद को सार्वजनिक पार्क की भूमि पर बने निर्माण के लिए एनओसी जारी करने का अधिकार प्राप्त है। क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि सार्वजनिक पार्क के रूप में दर्ज भूमि और हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद सक्षम प्राधिकारी से सत्यापन किए बिना विद्युत संयोजन प्रदान करना नियमों के विपरीत है। अब पूरे शहर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि एक माह की अवधि में संबंधित अधिकारी हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हैं या नहीं। यदि निर्धारित अवधि में आदेश का अनुपालन नहीं हुआ, तो मामला पुनः हाईकोर्ट पहुंचेगा और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 21:52:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गैर-जमानती वारंट पर IO को सस्पेंड करना भारी पड़ा: हाईकोर्ट ने बस्ती एसपी  को दी अवमानना की चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया। बता दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मामला उस समय सामने आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर विचार कर वारंट जारी किया था।</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175194/suspending-io-on-non-bailable-warrant-proved-costly-high-court-warns"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया। बता दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मामला उस समय सामने आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर विचार कर वारंट जारी किया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामला रत्नेश कुमार उर्फ राजू शुक्ला की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि जैसे ही जांच अधिकारी ने आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट के लिए आवेदन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे तुरंत निलंबित कर दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने पहले ही एसपी से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा था कि किन परिस्थितियों में यह कार्रवाई की गई और अब जांच कौन कर रहा है। हालांकि 2 अप्रैल को दाखिल हलफनामा अदालत को संतोषजनक नहीं लगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल अतिरिक्त हलफनामे में कहा गया कि जांच अधिकारी को इस आधार पर निलंबित किया गया कि उसने पर्याप्त साक्ष्य जुटाए बिना गैर-जमानती वारंट हासिल किया। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि गैर-जमानती वारंट जारी करना अदालत का विशेषाधिकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पुलिस अधीक्षक की राय का विषय।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">वारंट जारी करना अदालत का विवेकाधिकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पुलिस अधीक्षक की राय पर निर्भर प्रक्रिया।” कोर्ट ने एसपी को एक सप्ताह के भीतर नया व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए पूछा कि जब वारंट अदालत ने अपने विवेक से जारी किया तो जांच अधिकारी पर बिना साक्ष्य वारंट लेने का आरोप कैसे लगाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो एसपी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को निर्धारित की गई।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 20:00:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सेक्स के बाद ब्लैकमेल: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस को हनीट्रैप गैंग पर नकेल कसने का आदेश दिया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को उन गैंग के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जिन पर आरोप है कि वे पुरुषों को हनीट्रैप में फंसाकर उनसे पैसे ऐंठने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं [फौजिया और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य]।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की एक डिवीज़न बेंच ने कहा कि ऐसे मामले समाज में बहुत ही खतरनाक हालात को उजागर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "यह बहुत ही गंभीर मामला है," और उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति द्वारा हनीट्रैप का आरोप</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175050/blackmail-after-sex-allahabad-high-court-orders-police-to-crack"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1990383-allahabad-hc.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को उन गैंग के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जिन पर आरोप है कि वे पुरुषों को हनीट्रैप में फंसाकर उनसे पैसे ऐंठने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं [फौजिया और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य]।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की एक डिवीज़न बेंच ने कहा कि ऐसे मामले समाज में बहुत ही खतरनाक हालात को उजागर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "यह बहुत ही गंभीर मामला है," और उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति द्वारा हनीट्रैप का आरोप लगाए जाने के बाद, कुछ पुलिसकर्मियों सहित पांच लोगों के खिलाफ दर्ज जबरन वसूली के मामले को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मेरठ ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस द्वारा गहन जांच की ज़रूरत है। कोर्ट ने आगे कहा कि ज़िलों के पुलिस प्रमुखों को सतर्क किया जाना चाहिए ताकि वे अपने इलाकों में सक्रिय ऐसे गैंग के बारे में जागरूक रहें।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "उन्हें ज़ोन के सभी ज़िला पुलिस प्रमुखों को सख्त निगरानी रखने के लिए सतर्क करना चाहिए; अगर इस तरह का कोई गैंग सक्रिय है, या कोई अन्य गैंग भी सक्रिय है, जो महिलाओं का इस्तेमाल करके हनीट्रैप में फंसाकर या किसी अन्य तरीके से निर्दोष लोगों को ब्लैकमेल कर रहा है, और वही नतीजे दे रहा है। अगर इस तरह के अपराधों को जारी रहने दिया गया, तो एक सभ्य दुनिया में रहना मुश्किल हो जाएगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">बिजनौर पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामले में, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि बिजनौर के एक होटल में एक महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद, आरोपियों ने उसे ब्लैकमेल किया। पुलिस के मामले के अनुसार, महिला ने कुछ वीडियो क्लिप रिकॉर्ड कर लिए थे।उसने बताया कि आरोपियों ने मामला रफा-दफा करने के लिए 8 से 10 लाख रुपये की मांग की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, शिकायतकर्ता ने इस मामले की सूचना पुलिस को दी, जिसके बाद एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।इसके बाद आरोपियों ने FIR रद्द करवाने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। लेकिन, कोर्ट ने इस मामले को गंभीर बताते हुए याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं के वकील ने याचिका वापस ले ली।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "इस याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज किया जाता है, लेकिन उन निर्देशों के साथ, जो हमने ऊपर दिए हैं।"कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की जानकारी डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस, मेरठ ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ Police और उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को दी जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
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                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 20:56:49 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>औचक निरीक्षण कर थानों के सीसीटीवी कैमरों की खबर लेंगे हर जिले के सीजेएम- इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे के थानों के सीसीटीवी कैमरों की निगरानी का जिम्मा हर जिले के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) को सौंपा है। ये अब जिला जज को जानकारी देकर थानों का निरीक्षण करेंगे। यह जानेंगे कि थाने में लगे कैमरे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार काम कर रहे या नहीं। निरीक्षण के दौरान जानकारी देने में हीलाहवाली पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने ललितपुर निवासी महिला की अवैध हिरासत से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए दिया है। मामला ललितपुर के मुख्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172391/cjm-of-every-district-will-take-information-of-cctv-cameras"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे के थानों के सीसीटीवी कैमरों की निगरानी का जिम्मा हर जिले के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) को सौंपा है। ये अब जिला जज को जानकारी देकर थानों का निरीक्षण करेंगे। यह जानेंगे कि थाने में लगे कैमरे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार काम कर रहे या नहीं। निरीक्षण के दौरान जानकारी देने में हीलाहवाली पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने ललितपुर निवासी महिला की अवैध हिरासत से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए दिया है। मामला ललितपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेशों की बार-बार अनदेखी से जुड़ा है। धोखाधड़ी मामले में याची की अवैध हिरासत और सूरज डूबने के बाद उसकी बहन की गिरफ्तारी के आरोपों पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने थाने के सीसीटीवी फुटेज तलब किए थे। पुलिस अधिकारियों ने स्टोरेज फुल होने का बहाना बनाकर फुटेज नहीं दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर हाईकोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी और जांच अधिकारी को अवमानना का दोषी करार दिया। सजा के तौर पर दोनों को कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने तक अदालत कक्ष में ही हिरासत में रखा गया। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट का पद और कद डीएम, एसपी ही नहीं, किसी भी राजनीतिक प्रमुख से ऊपर है। उनके आदेश की अवहेलना न केवल अदालत की अवमानना है, बल्कि कानून के राज को सीधी चुनौती है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">जिले के न्यायिक अधिकारी की अदालत आम आदमी के लिए न्याय का पहला दरवाजा है, न्यायपालिका की रीढ़ है। उसकी तुलना प्रशासनिक अधिकारियों से नहीं की जा सकती, जो केवल नीतियों को लागू करते हैं। लिहाजा, कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ित को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। कहा, यह राशि दोषी पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूली जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 20:57:12 +0530</pubDate>
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