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                <title>International Relations - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>International Relations RSS Feed</description>
                
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                <title>होर्मुज : सुरक्षा पहले, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार ने हाल ही में जहाज मालिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिप मैनेजरों और भर्ती एजेंसियों को सलाह दी है कि अगली सूचना तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों की नई तैनाती न की जाए। यह कदम खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक जहाजों पर हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की उस नीति का संकेत है जिसमें विदेशों में काम कर रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि इस निर्णय</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183610/hormuz-security-first-but-challenges-are-no-less"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार ने हाल ही में जहाज मालिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिप मैनेजरों और भर्ती एजेंसियों को सलाह दी है कि अगली सूचना तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों की नई तैनाती न की जाए। यह कदम खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक जहाजों पर हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की उस नीति का संकेत है जिसमें विदेशों में काम कर रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि इस निर्णय के दूरगामी आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी हो सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों महत्वपूर्ण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं। भारत भी अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा भाग खाड़ी देशों से आयात करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इस मार्ग की सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण होर्मुज क्षेत्र में कई व्यापारिक जहाज हमलों का शिकार हुए हैं। कुछ घटनाओं में भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए और एक भारतीय सीफेरर की मौत के बाद भारत सरकार ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसके बाद समुद्री प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से भारतीय नाविकों की नई तैनाती रोकने की सलाह जारी की।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रतिबंध स्थायी नहीं बल्कि परिस्थितियों के सामान्य होने तक एहतियाती कदम माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत दुनिया में सबसे अधिक समुद्री कर्मी उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। लाखों भारतीय विभिन्न विदेशी जहाजों पर कार्यरत हैं। ऐसे में होर्मुज मार्ग पर तैनाती रुकने से अनेक नाविकों की नई नियुक्तियां प्रभावित हो सकती हैं। जहाजरानी कंपनियों को वैकल्पिक क्रू की व्यवस्था करनी पड़ेगी। कुछ भारतीय नाविकों की आय प्रभावित हो सकती है। समुद्री रोजगार बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या प्रभाव</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल यह आदेश केवल भारतीय नाविकों की तैनाती से जुड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल आयात पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यदि होर्मुज मार्ग पूरी तरह बाधित होता है तो भारत सहित पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है। इससे महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ेगा। भारत पिछले कुछ वर्षों से तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे कदम भविष्य के संकटों से निपटने में मदद कर सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या यह फैसला उचित है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवीय दृष्टि से देखें तो यह निर्णय उचित प्रतीत होता है। किसी भी आर्थिक लाभ से अधिक महत्वपूर्ण नागरिकों का जीवन है। जब किसी क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति हो और व्यापारिक जहाज लगातार निशाने पर हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सरकार का पहला दायित्व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि लंबे समय तक प्रतिबंध रहने पर भारतीय समुद्री उद्योग और नाविकों के रोजगार पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए सरकार को सुरक्षा के साथ-साथ प्रभावित नाविकों के हितों का भी ध्यान रखना होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आगे की राह- भारत को केवल अस्थायी प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं— समुद्री सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। संकटग्रस्त क्षेत्रों में भारतीय नाविकों के लिए बेहतर सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करना। प्रभावित नाविकों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराने में सहायता देना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा आयात के स्रोतों में और विविधता लाना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्री जोखिमों की निगरानी के लिए आधुनिक तंत्र विकसित करना। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भारतीय नाविकों की तैनाती रोकने का निर्णय सुरक्षा की दृष्टि से एक सतर्क और जिम्मेदार कदम है। यह बताता है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। हालांकि इसके आर्थिक और रोजगार संबंधी प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि क्षेत्रीय तनाव जल्द कम होता है तो यह प्रतिबंध अस्थायी साबित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि स्थिति लंबी खिंचती है तो भारत को समुद्री व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा और नाविकों के रोजगार के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 20:56:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ये कैसा युद्धविराम?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्धविराम का उद्देश्य किसी भी संघर्ष को समाप्त कर शांति की दिशा में आगे बढ़ना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब युद्धविराम के कुछ ही समय बाद गोलियां और मिसाइलें फिर चलने लगें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा युद्धविराम था। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। मध्य-पूर्व पहले से ही अस्थिरता का केंद्र रहा है और अब दोनों देशों के बीच फिर से शुरू हुई सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर नए संकट के बादल खड़े कर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183370/what-kind-of-ceasefire-is-this"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्धविराम का उद्देश्य किसी भी संघर्ष को समाप्त कर शांति की दिशा में आगे बढ़ना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब युद्धविराम के कुछ ही समय बाद गोलियां और मिसाइलें फिर चलने लगें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा युद्धविराम था। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। मध्य-पूर्व पहले से ही अस्थिरता का केंद्र रहा है और अब दोनों देशों के बीच फिर से शुरू हुई सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर नए संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। हालिया घटनाक्रम में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर युद्धविराम तोड़ने का आरोप लगाया है और सैन्य अभियान दोबारा शुरू होने की पुष्टि भी की है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सका। परमाणु कार्यक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंधों में राहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होरमुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे। समझौते में कई बिंदु ऐसे थे जिनकी व्याख्या दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से कर रहे थे। यही कारण रहा कि कुछ ही सप्ताह में तनाव दोबारा बढ़ गया। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया तथा उसकी सैन्य गतिविधियां लगातार जारी रहीं। दोनों देशों के इन आरोपों ने विश्वास की बची-खुची नींव भी कमजोर कर दी। होरमुज़ जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र- दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल होरमुज़ जलडमरूमध्य इस विवाद का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित करता है। हालिया घटनाओं के बाद इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता देखने को मिली। पूरी दुनिया पर असर- अमेरिका और ईरान का संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे मध्य-पूर्व पर पड़ता है। खाड़ी देशों की सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था सभी इस तनाव से प्रभावित होती हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल आयात पर निर्भर देशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर भारत जैसे देशों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। युद्धविराम के बाद अपेक्षा थी कि दोनों देश बातचीत के जरिए स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन बढ़ते अविश्वास और लगातार सैन्य कार्रवाई ने वार्ता की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत फिर शुरू करने की अपील की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि फिलहाल स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देश केवल सैन्य जवाब देने की नीति अपनाते रहे तो संघर्ष और व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर यदि मध्यस्थ देशों के प्रयास सफल होते हैं तो फिर से बातचीत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि स्थायी शांति का रास्ता अभी भी काफी कठिन है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुई सैन्य कार्रवाई यह दिखाती है कि केवल युद्धविराम की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। जब तक मूल विवादों का समाधान नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक किसी भी समझौते की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। आज आवश्यकता केवल हथियारों को रोकने की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विश्वास बहाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी कूटनीति और दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान की है। अन्यथा हर युद्धविराम कुछ समय बाद एक नए युद्ध की प्रस्तावना बनता रहेगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 20:12:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सेशेल्स यात्रा से मजबूत हुआ भारत का समुद्री सामरिक सहयोग और वैश्विक विश्वास का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा केवल एक औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका मजबूत कूटनीति और वैश्विक विश्वास का प्रभावशाली उदाहरण है । इस यात्रा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने पड़ोसी और मित्र देशों के साथ विश्वास सम्मान और साझेदारी के आधार पर संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है ।सेशेल्स जैसे छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीपीय देश के साथ भारत के संबंध केवल रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं हैं बल्कि दोनों  के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक और मानवीय जुड़ाव भी उतना</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182370/seychelles-visit-strengthens-indias-maritime-strategic-cooperation-and-new-chapter"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas27.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा केवल एक औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका मजबूत कूटनीति और वैश्विक विश्वास का प्रभावशाली उदाहरण है । इस यात्रा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने पड़ोसी और मित्र देशों के साथ विश्वास सम्मान और साझेदारी के आधार पर संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है ।सेशेल्स जैसे छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीपीय देश के साथ भारत के संबंध केवल रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं हैं बल्कि दोनों  के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक और मानवीय जुड़ाव भी उतना ही गहरा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स पहुंचने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया जो किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के प्रति सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक शुरू हुई जिसमें समुद्री सुरक्षा रक्षा सहयोग तटीय निगरानी क्षमता बढ़ाने और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता बनाए रखने जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम स्थापित करने की दिशा में कई समझौतों पर भी विचार किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता रहा है सेशेल्स इस दृष्टि से भारत का एक महत्वपूर्ण समुद्री साझेदार है क्योंकि यह देश उन समुद्री मार्गों के निकट स्थित है जिनसे दुनिया का बड़ा व्यापार संचालित होता है ऐसे में समुद्री डकैती अवैध मछली पकड़ने मानव तस्करी और अन्य समुद्री अपराधों पर नियंत्रण के लिए भारत और सेशेल्स का सहयोग पूरे क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर भारत में निर्मित फास्ट पेट्रोल वेसल लेस्पवार सेशेल्स को सौंपा जिससे वहां की कोस्ट गार्ड की क्षमता और अधिक मजबूत होगी यह केवल एक रक्षा सहयोग नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की तकनीकी क्षमता और मित्र देशों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है ।भारत पहले भी सेशेल्स को समुद्री निगरानी विमान और अन्य सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करा चुका है। जिससे दोनों देशों के बीच विश्वास लगातार मजबूत हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस यात्रा की एक और ऐतिहासिक उपलब्धि यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं के प्रति विश्व समुदाय के सम्मान को भी दर्शाती है। किसी दूसरे देश की संसद को संबोधित करना दोनों देशों के बीच गहरे राजनीतिक विश्वास और परस्पर सम्मान का प्रमाण माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत और सेशेल्स के बीच संबंधों का इतिहास लगभग ढाई सौ वर्षों से भी अधिक पुराना है। जब वर्ष सत्रह सौ सत्तर में यहां पहली स्थायी बस्ती बसाई गई, तब वहां पहुंचने वाले पहले लोगों में पांच भारतीय भी शामिल थे। बाद के वर्षों में बिहार तमिलनाडु और गुजरात से बड़ी संख्या में भारतीय यहां जाकर बसे और उन्होंने व्यापार कृषि निर्माण तथा सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी सेशेल्स की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल का है। जिसने दोनों देशों के संबंधों को पीढ़ी दर पीढ़ी मजबूत बनाए रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स के पूर्व राष्ट्रपति वेवेल रामकलावन के पूर्वज भी भारत के बिहार राज्य से जुड़े रहे हैं। यह तथ्य दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है। भारतीय मूल के लोग वहां केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्होंने शिक्षा स्वास्थ्य व्यापार और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने सेशेल्स के नेशनल बोटैनिकल गार्डन का भी दौरा किया जहां उन्होंने राष्ट्रपति के साथ पौधारोपण किया और प्रसिद्ध एल्डाब्रा विशालकाय कछुओं को पत्तियां खिलाईं। यह प्रतीकात्मक कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण जैव विविधता और प्रकृति के प्रति साझा जिम्मेदारी का संदेश देता है ।सेशेल्स अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता दुर्लभ समुद्री जीवों और विश्व प्रसिद्ध एल्डाब्रा विशालकाय कछुओं के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स का भौगोलिक क्षेत्रफल भले ही बहुत छोटा हो लेकिन इसका समुद्री आर्थिक क्षेत्र अत्यंत विशाल है ।यही कारण है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां इस क्षेत्र को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानती हैं। भारत हमेशा इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग और साझेदारी की नीति पर विश्वास करता आया है यही सोच भारत को अन्य देशों से अलग पहचान दिलाती है।</div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि इस वर्ष भारत और सेशेल्स के राजनयिक संबंधों के पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह केवल एक वर्षगांठ नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास मित्रता और साझा विकास की सफल यात्रा का उत्सव है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह यात्रा आने वाले समय में दोनों देशों के संबंधों को और अधिक मजबूत बनाएगी तथा हिंद महासागर क्षेत्र में शांति सुरक्षा और समृद्धि के साझा लक्ष्य को नई गति प्रदान करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब पूरी दुनिया बदलते वैश्विक समीकरणों और नई चुनौतियों का सामना कर रही है तब भारत की विदेश नीति विश्व बंधुत्व आपसी सम्मान और समान विकास के सिद्धांतों पर आगे बढ़ रही है। भारत छोटे और विकासशील देशों को बराबरी का सम्मान देता है और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सहयोग प्रदान करता है। यही कारण है कि भारत की विश्वसनीयता लगातार बढ़ रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स यात्रा ने यह भी सिद्ध कर दिया कि भारत केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि वह पूरे हिंद महासागर क्षेत्र को सुरक्षित शांतिपूर्ण और समृद्ध बनाने के लिए अपने मित्र देशों के साथ मिलकर कार्य कर रहा है आने वाले समय में यह साझेदारी समुद्री सुरक्षा व्यापार पर्यटन पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में नई उपलब्धियां हासिल करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत और सेशेल्स की यह मित्रता केवल सरकारों के बीच संबंध नहीं बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच विश्वास अपनत्व और साझा भविष्य की मजबूत नींव है। यही कारण है कि यह यात्रा आने वाले वर्षों में भारत की सफल कूटनीति और वैश्विक नेतृत्व के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद की जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>        *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182370/seychelles-visit-strengthens-indias-maritime-strategic-cooperation-and-new-chapter</link>
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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 17:59:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान पीस डील पर हस्ताक्षर, यूएस झुका- पैसे भी देगा, होर्मुज़ खुलेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते</span></p></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181546/america-iran-peace-deal-signed-us-bowed-%E2%80%93-will-also-give"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas12.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div dir="ltr">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते के सफल होने से न केवल तेल की वैश्विक कीमतें स्थिर होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराने तनाव को कूटनीतिक रास्ते से सुलझाने का एक नया रास्ता खुलेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समझौते को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का नाम दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन से मुलाकात के दौरान इस समझौते की हार्ड कॉपी पर भी हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर करने के बाद ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह साइन हो चुका है। मैंने अभी-अभी इस पर हस्ताक्षर किए हैं।" दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियन और अन्य अधिकारियों ने भी इसे डिजिटल रूप से साइन किया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने भी इस पर बयान जारी कर कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू होगा। पहले कदम के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान तुरंत हॉर्मुज जलडमरूमध्य </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को खोल देगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्हाइट हाउस और ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए समझौते के मुख्य प्वाइंट इस प्रकार हैं:</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल युद्धविराम: अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान और उनके सहयोगी सभी मोर्चों (लेबनान सहित) पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य अभियानों को समाप्त करने की घोषणा करते हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग की धमकी या हमला नहीं करेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का सम्मान: दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों की समयसीमा: दोनों पक्ष अधिकतम </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते (</span>Final Deal) <span lang="hi" xml:lang="hi">पर बातचीत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का अंत: समझौते पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा और </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर इसे पूरी तरह खत्म कर देगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सेना की वापसी: अंतिम समझौते के </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर अमेरिका ईरान के नजदीकी इलाकों से अपनी सेनाएं हटा लेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हॉर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना: ईरान शुरुआती </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान के समुद्र तक वाणिज्यिक जहाजों (</span>Commercial Vessels) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सुरक्षित और मुफ्त आवागमन की व्यवस्था करेगा। </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर नौसैनिक और तकनीकी बाधाओं (जैसे बारूदी सुरंगें हटाना) को दूर किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य का प्रशासन: ईरान इस रणनीतिक जलमार्ग के भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को परिभाषित करने के लिए ओमान और अन्य तटीय देशों के साथ बातचीत करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज: अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम </span>300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर (</span>USD $300 Billion) <span lang="hi" xml:lang="hi">की योजना विकसित करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंधों की समाप्ति: एक तय समय सारणी के तहत अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के खिलाफ सभी एकतरफा (प्राइमरी और सेकेंडरी) प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (</span>UNSC) <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रस्तावों के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करने का वचन देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परमाणु हथियारों पर रोक: ईरान ने दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित या हासिल नहीं करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम संवर्धन का निपटारा: ईरान के समृद्ध यूरेनियम के भंडार का निपटारा अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (</span>IAEA) <span lang="hi" xml:lang="hi">की देखरेख में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऑन-साइट डाउन-ब्लेंडिंग</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम की क्षमता कम करना) के जरिए किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यथास्थिति (</span>Status Quo) <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाए रखना: अंतिम समझौता होने तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्तर पर ही रोके रखेगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल निर्यात को छूट और फंड की बहाली: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए तत्काल छूट (</span>Waivers) <span lang="hi" xml:lang="hi">जारी करेगा। साथ ही विदेशों में फ्रीज (जब्त) की गई ईरान की संपत्तियों को वापस इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निगरानी तंत्र की स्थापना: समझौते के सफल कार्यान्वयन और भविष्य के अनुपालन की निगरानी के लिए एक कार्यकारी तंत्र स्थापित किया जाएगा। इस अंतिम समझौते को </span>UNSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के एक बाध्यकारी प्रस्ताव द्वारा अनुमोदित किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने पुष्टि की कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस समझौते पर अंग्रेजी और फारसी (</span>Farsi) <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों भाषाओं में हस्ताक्षर किए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अनुवाद को लेकर भविष्य में कोई मतभेद या कोई और व्याख्या न हो। ईरान ने अपनी केंद्रीय बैंक के साथ मिलकर जब्त संपत्तियों को वापस पाने के तकनीकी तौर-तरीकों को भी अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:07:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या पुतिन ने एक वाक्य में बदलती दुनिया का सच कह दिया?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास के कठिन दौर ही रिश्तों की असली परीक्षा लेते हैं। ऐसे समय में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के सबसे भरोसेमंद साझेदारों में से एक” बताना महज़ कूटनीतिक वाक्य नहीं है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सेंट पीटर्सबर्ग में दिया गया उनका बयान ऐसे समय आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया नए राजनीतिक खाँचों में बँटती दिख रही है। प्रतिबंधों से घिरा रूस अपने विश्वसनीय मित्रों को पहचान रहा है और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से अलग सम्मान पा रहा है। पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180810/did-putin-tell-the-truth-of-the-changing-world-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/_113223674_gettyimages-1223723529.jpg.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास के कठिन दौर ही रिश्तों की असली परीक्षा लेते हैं। ऐसे समय में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के सबसे भरोसेमंद साझेदारों में से एक” बताना महज़ कूटनीतिक वाक्य नहीं है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सेंट पीटर्सबर्ग में दिया गया उनका बयान ऐसे समय आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया नए राजनीतिक खाँचों में बँटती दिख रही है। प्रतिबंधों से घिरा रूस अपने विश्वसनीय मित्रों को पहचान रहा है और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से अलग सम्मान पा रहा है। पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए भारत पर पश्चिमी दबाव को “निष्फल और प्रतिकूल” बताया। यह केवल मित्रता की प्रशंसा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते महत्व की स्वीकारोक्ति है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शब्द अक्सर परिस्थितियों का आईना होते हैं। पुतिन की भारत-प्रशंसा को भी इसी संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस पश्चिमी प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे समय में भारत उन विरले देशों में रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार रूस से संबंध बनाए रखे। न उसने किसी दबाव के आगे झुकना स्वीकार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न अपनी विदेश नीति का मार्ग बदला। पुतिन भलीभांति समझते हैं कि भारत जैसा मित्र केवल आर्थिक सहयोगी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कूटनीतिक संबल भी है। इसलिए उनका यह बयान प्रशंसा से अधिक उस विश्वास की अभिव्यक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर रूस भविष्य की अपनी रणनीति का एक महत्वपूर्ण आधार देखता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुतिन के बयान का एक संभावित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संकेत चीन की ओर भी है। रूस और चीन भले ही अटूट साझेदारी का दावा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके संबंधों में रणनीतिक सतर्कता बनी रहती है। चीन की बढ़ती आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी और सैन्य शक्ति ने एशिया का शक्ति-संतुलन बदल दिया है। मॉस्को समझता है कि बीजिंग पर अत्यधिक निर्भरता उसकी स्वतंत्र भूमिका को सीमित कर सकती है। ऐसे में भारत के साथ मजबूत संबंध उसे संतुलन देते हैं। यही कारण है कि पुतिन ने ब्रह्मोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा सहयोग और उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकी साझेदारी का विशेष उल्लेख किया। इसे मुख्य रूप से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चीन के विरुद्ध संदेश न मानकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एशिया में शक्ति-संतुलन साधने की रूस की दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी पहचान उसकी स्वतंत्रता है। यही कारण है कि रूस के राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्लादिमीर पुतिन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने भारत पर पड़ रहे अमेरिकी दबाव के बीच उसकी नीति की सराहना की। अमेरिका लंबे समय से रूस से जुड़े ऊर्जा और रक्षा संबंधों को लेकर भारत को अपने अधिक निकट लाने का प्रयास करता रहा है। इसके बावजूद नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि उसके निर्णय राष्ट्रीय हितों से संचालित होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी बाहरी दबाव से नहीं। पुतिन ने इसी आत्मविश्वास की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत जैसे उभरते राष्ट्र पर दबाव डालना उलटा पड़ सकता है। उनका संदेश केवल वाशिंगटन के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी दुनिया के लिए था कि भारत अब अपनी राह स्वयं तय करने वाली शक्ति है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक शक्ति उसका संतुलित और स्वतंत्र दृष्टिकोण है। भारत एक ओर रूस से ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा उपकरण और सामरिक सहयोग प्राप्त कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर अमेरिका के साथ तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश और सुरक्षा साझेदारी भी मजबूत कर रहा है। चीन से प्रतिस्पर्धा के बावजूद व्यापारिक संबंध भी बने हुए हैं। यही संतुलन भारत को वैश्विक राजनीति में अलग पहचान देता है। पुतिन ने मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों और तेज विकास दर की सराहना करते हुए संकेत दिया कि भारत अब किसी शक्ति-गुट का अनुसरण करने वाला देश नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विश्व राजनीति का एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति केंद्र बन चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत-रूस संबंध अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी नई मजबूती हासिल कर रहे हैं। वित्तीय वर्ष </span>2024-25 <span lang="hi" xml:lang="hi">में दोनों देशों का व्यापार लगभग </span>68.7 <span lang="hi" xml:lang="hi">अरब डॉलर तक पहुंच गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें रूसी तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस और कोयले की प्रमुख भूमिका रही। पुतिन द्वारा </span>100 <span lang="hi" xml:lang="hi">अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य का उल्लेख इस बात का संकेत है कि रूस भारत को केवल मित्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक साझेदार मानता है। ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमाणु सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा उत्पादन और उन्नत प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार विस्तार पा रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच दोनों देश एक-दूसरे की क्षमताओं को अपने विकास का महत्वपूर्ण आधार मान रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रता जितनी गहरी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी चुनौतियां भी उतनी ही वास्तविक होती हैं। भारत-रूस संबंधों के सामने भी व्यापार असंतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुगतान व्यवस्था की बाधाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा खरीद में भारत की नई प्राथमिकताएं और रूस-चीन की बढ़ती निकटता जैसे प्रश्न मौजूद हैं। इसलिए पुतिन ने भारत-चीन सीमा पर तनाव कम करने के प्रयासों का स्वागत किया। यह केवल एक टिप्पणी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि रूस का यह संदेश था कि वह एशिया में स्थिरता और संतुलन का पक्षधर है। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह यह भरोसा भी दिलाना चाहता है कि चीन से उसके संबंध भारत के हितों की कीमत पर नहीं हैं। भारत के लिए यह आश्वासन महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसकी विदेश नीति का आधार केवल राष्ट्रीय हित हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व राजनीति में कुछ वक्तव्य तत्कालीन घटनाओं से आगे जाकर भविष्य की दिशा भी बताते हैं। पुतिन का भारत को “भरोसेमंद साझेदार” कहना ऐसा ही संकेत है। यह केवल भारत-रूस संबंधों की निकटता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आकार ले रही नई वैश्विक व्यवस्था की झलक है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एकध्रुवीय प्रभुत्व का दौर पीछे छूट रहा है और नई शक्तियां उभर रही हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिक्स का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक दक्षिण का बढ़ता प्रभाव और भारत की भूमिका इसी परिवर्तन के संकेत हैं। रूस का यह सार्वजनिक विश्वास एक स्पष्ट संदेश देता है—भारत अब किसी समीकरण का हिस्सा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयं एक निर्णायक समीकरण है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए पुतिन का यह बयान केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:20:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गरीब मरीज पूछ रहा है— क्या मेरा जीवन इतना सस्ता है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180672/the-poor-patient-is-asking-%E2%80%93-is-my-life-so"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/360_f_334557287_wuhbarg68kugnheiwrgwanrxqtrl8wwv.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सरकारी गति का</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर दिन गंभीर होती जाती है। ऐसे में </span>120 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन बाद जांच की तारीख मिलना एक चिंताजनक प्रश्न खड़ा करता है—इसका बोझ आखिर कौन उठाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका परिवार या उसका जीवन</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स भोपाल की लंबी वेटिंग लिस्ट अब केवल एक अस्पताल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की समस्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी चुनौती का प्रतीक बन गई है। कम खर्च में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के लिए सस्ता इलाज भी तब बेमानी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जरूरी जांच ही महीनों बाद उपलब्ध हो। पेट के असहनीय दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर की आशंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क रोग या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज यदि केवल व्यवस्थागत कमी के कारण चार माह प्रतीक्षा करने को विवश हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह स्वास्थ्य सेवा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनहीनता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बीमारी किसी वेटिंग लिस्ट का इंतजार नहीं करती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह लगातार बढ़ती जाती है और कई बार उपचार की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उसी वर्ग पर पड़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर राजनीति सबसे अधिक होती है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति निजी अस्पताल में कुछ घंटों या दिनों में जांच करा लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटा व्यापारी और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह विकल्प अक्सर पहुंच से बाहर होता है। ऐसे में उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं—कर्ज लेकर निजी जांच कराए या दर्द और आशंका के बीच सरकारी अस्पताल की लंबी प्रतीक्षा सहे। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक असमानता का भी दर्पण है। स्वास्थ्य सुविधाएं आय से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकता से तय होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु मौजूदा व्यवस्था में पैसे वालों को समय मिलता है और अभावग्रस्तों को इंतजार।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी वेटिंग लिस्ट वर्षों से बढ़ती मांग और अपर्याप्त संसाधन विस्तार की कीमत है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मरीजों का बोझ बढ़ता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की संख्या लगभग वहीं ठहरी रही। कई सुपर-स्पेशियलिटी विभाग सीमित मानव संसाधनों पर निर्भर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि रेडियो डायग्नोसिस जैसे अहम विभाग पर्याप्त स्टाफ के अभाव में अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे। परिणाम सामने है—संसाधन मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सेवाएं नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समय पर जांच नहीं। प्रश्न यह है कि जब बढ़ती जरूरतें वर्षों से दिखाई दे रही थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी तैयारी क्यों नहीं की गई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर किस स्तर की चूक ने देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों को भी प्रतीक्षा के संकट में धकेल दिया</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीति का केंद्र तात्कालिक लोकप्रियता बन जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अस्पतालों की जरूरतें अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं। यही कारण है कि मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं पर अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों की भर्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई मशीनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए संसाधनों का अभाव बताया जाता है। विडंबना यह है कि वोट के लिए खजाना खुल जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन बचाने के लिए बजट सीमित पड़ जाता है। वास्तविक जनकल्याण मुफ्त सुविधाएं बांटने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में है जहां किसी मरीज को जांच के लिए महीनों प्रतीक्षा न करनी पड़े। स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर निवेश ही देश की तस्वीर बदल सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जरूरत आश्वासनों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्रवाई की है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में अतिरिक्त सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें लगाई जाएं तथा रेडियो डायग्नोसिस विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीशियनों और कर्मचारियों की भर्ती हो। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए </span>24 <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे शिफ्ट आधारित संचालन लागू किया जाए। आयुष्मान भारत के दायरे में सभी आवश्यक जांचें लाई जाएं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से सुविधाओं का विस्तार हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना मरीजों पर अतिरिक्त बोझ डाले। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अपॉइंटमेंट प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की स्थिति को चेतावनी मानते हुए देशभर के सरकारी अस्पतालों में संसाधन और मानवबल बढ़ाना अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि मरीजों को इलाज मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंतजार नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ केवल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे संस्थानों के भरोसे नहीं उठाया जा सकता। जब जिला अस्पतालों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बड़े संस्थानों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग-निवारण और प्रारंभिक जांच व्यवस्था को मजबूत करना उतना ही जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना उपचार सुविधाओं का विस्तार। मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाने पर भी समान ध्यान देना होगा। आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवनों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सक्षम मानव संसाधन और जवाबदेह प्रशासन से मजबूत बनती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य कोई दया या उपकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि किसी मरीज को अपनी बीमारी की सच्चाई जानने के लिए महीनों प्रतीक्षा करनी पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था की नाकामी है। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की चार माह लंबी जांच प्रतीक्षा सूची इसी विफलता का प्रतीक है। यह मौन संकट हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है। सरकारों को याद रखना होगा कि अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग आंकड़े नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान हैं। यदि स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनकल्याण के दावे अर्थहीन रह जाएंगे। आखिर सवाल यही है—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या एक गरीब मरीज के लिए महीनों का इंतजार सामान्य हो गया है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जांच में हर देरी कई बार जीवन की संभावनाएं भी कम कर देती है। ऐसी व्यवस्था पर गर्व नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां बीमारी की रफ्तार उपचार से तेज हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180672/the-poor-patient-is-asking-%E2%80%93-is-my-life-so</link>
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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:44:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>बदलते परिवेश में भी भारत और रूस की मित्रता रहेगी कायम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180668/friendship-between-india-and-russia-will-continue-even-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1200-675-25531568-thumbnail-16x9-modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह बयान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक ध्रुव या गुट तक सीमित नहीं रखा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के समय में जब पश्चिमी देश लगातार विकासशील देशों पर अपने एजेंडे थोपने का प्रयास कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पुतिन का यह कहना कि भारत पर रूस के साथ सहयोग कम करने के लिए डाला जा रहा पश्चिमी दबाव पूरी तरह से व्यर्थ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी वैश्विक स्वीकार्यता है। यह बयान केवल दो नेताओं या दो देशों की सरकारों के बीच का कूटनीतिक संवाद नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक बदलते हुए विश्व के शक्ति संतुलन का बहुत ही सजीव चित्रण है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस और भारत के कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद कई दशकों के विश्वास और आपसी सहयोग पर टिकी है। वर्ष </span>1971<span lang="hi" xml:lang="hi"> की शांति और मैत्री संधि से लेकर आज </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक के सफर में दोनों देशों ने कई वैश्विक उतार चढ़ाव देखे हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को समर्थन की आवश्यकता पड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर भारत का साथ दिया है। कश्मीर का मुद्दा हो या फिर आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस हमेशा एक सच्चे मित्र की भांति भारत के साथ खड़ा रहा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही कारण है कि आज की सदी में भी यह रिश्ता मात्र कूटनीतिक समझौतों का मोहताज नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह दोनों देशों की जनता के बीच पनपे एक अटूट भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक है। पुतिन की बातों में इसी ऐतिहासिक विश्वास की झलक मिलती है। उन्हें इस बात का भलीभांति भान है कि भारत किसी भी बाहरी देश के दबाव में आकर अपने पुराने और सच्चे मित्र के साथ संबंधों में कोई भी कटौती नहीं करेगा। भारत की जनता और भारत के नीति निर्माता दोनों ही इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि संकट के समय में किसने उनका साथ दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2022<span lang="hi" xml:lang="hi"> में शुरू हुए यूक्रेन संकट के बाद से ही पश्चिमी देशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए हैं। इन पश्चिमी देशों ने भारत पर भी यह भारी दबाव बनाया कि वह रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंध सीमित करे और वहां से कच्चे तेल की खरीद को रोक दे। लेकिन भारत ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि उसकी नीतियां उसके अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पश्चिमी देशों के फरमानों से। भारत ने न केवल रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उसे कई गुना बढ़ा भी दिया। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार ने </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि दोनों देशों द्वारा तय किए गए </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लक्ष्य से बहुत पहले ही हासिल कर लिया गया। आज रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत हिस्सा रूस से आयात कर रहा है। यह आंकड़ा इस बात को साबित करता है कि पश्चिमी देशों की धमकियां भारत के इरादों को डिगा नहीं पाईं और भारत ने अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर पुतिन द्वारा भारत के तीव्र विकास की जो विशेष रूप से प्रशंसा की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी विकास दर लगातार </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत के आस पास बनी हुई है। देश में हो रहे भारी बुनियादी ढांचे के निर्माण और तकनीकी विकास ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस यह भलीभांति समझता है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका एक प्रमुख विकास इंजन की तरह होने वाली है। ऐसे में रूस के लिए भारत सिर्फ एक पारंपरिक हथियार खरीदार नहीं रह गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष और विनिर्माण क्षेत्र में एक विशाल बाजार और सहयोगी बन गया है। दोनों देश अपनी मुद्राओं यानी रुपये और रूबल में व्यापार करने की दिशा में भी लगातार काम कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पश्चिमी मुद्राओं के एकाधिकार को चुनौती दी जा सके और दोनों देशों के व्यापारियों को विदेशी मुद्रा के उतार चढ़ाव से बचाया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत और रूस का सहयोग केवल आयात और निर्यात के पुराने मॉडल तक सीमित नहीं है। आज यह दोनों देश ब्रह्मोस मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों का संयुक्त रूप से निर्माण कर रहे हैं जो कि पूरी दुनिया में अपनी तरह की सबसे बेहतरीन मिसाइल मानी जाती है। इसके अलावा एस </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> वायु रक्षा प्रणाली की आपूर्ति भी दोनों देशों के बीच हुए एक ऐतिहासिक सौदे का हिस्सा है</span>, </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे पूरा करने के लिए भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित खतरे की भी बिल्कुल परवाह नहीं की। भारत में मेक इन इंडिया पहल के तहत कलाश्निकोव राइफल से लेकर अन्य कई रूसी रक्षा उपकरणों के निर्माण को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भारत की अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता लगातार मजबूत हो रही है। पुतिन का यह अटूट भरोसा इन्हीं ठोस धरातल पर टिके वास्तविक प्रोजेक्ट्स के कारण और भी मजबूत होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां तक अमेरिका और भारत के बढ़ते संबंधों का प्रश्न है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुतिन की बेबाक टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में रूस की परिपक्वता को दर्शाती है। आज भारत क्वाड जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठनों का सक्रिय सदस्य है जिसमें अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। पश्चिमी कूटनीतिक विश्लेषकों का अक्सर यह मानना रहा है कि भारत की अमेरिका से यह बढ़ती नजदीकी रूस को खटकती है और इससे दोनों के रिश्ते खराब हो सकते हैं। परंतु रूसी राष्ट्रपति ने अपने इस स्पष्ट बयान से इस सारे भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस यह गहराई से जानता है कि भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों की रक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका के साथ खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत रूस के खिलाफ किसी भी पश्चिमी एजेंडे का हिस्सा बन जाएगा। इसके विपरीत भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंचों पर भी रूस के साथ मजबूती से कदमताल कर रहा है। वर्ष </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ब्रिक्स का जो ऐतिहासिक विस्तार हुआ उसके बाद आज </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में यह संगठन एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा और मजबूत पैरोकार बन चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भारत और रूस की धुरी सबसे अहम भूमिका निभा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुतिन का भारत को लेकर यह बयान महज एक सामान्य राजनीतिक वक्तव्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक तेजी से उभरती हुई विश्व शक्ति के रूप में भारत के प्रति गहरे सम्मान का सीधा प्रकटीकरण है। पश्चिमी देशों को यह बहुत ही स्पष्ट संदेश है कि दुनिया अब उनके इशारों या उनकी नीतियों पर नहीं चलती। भारत अपने सभी निर्णयों में पूर्णतः स्वतंत्र है और वह अपने रणनीतिक मित्रों का चुनाव केवल अपनी शर्तों और अपने लाभ के आधार पर करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> रूस और भारत की यह प्रगाढ़ साझेदारी आने वाले समय में न केवल एशिया बल्कि संपूर्ण वैश्विक शक्ति संतुलन को बनाए रखने में एक मील का पत्थर साबित होगी। यह दोनों देश मिलकर जिस न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें आपसी सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का आदर और एक दूसरे के विकास में बिना शर्त योगदान ही सबसे प्रमुख स्तंभ होंगे। व्लादिमीर पुतिन के शब्दों ने दोनों देशों के बीच की इसी अत्यंत मजबूत नींव को एक बार फिर से दुनिया के सामने पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ रख दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भविष्य में दोनों देशों के संबंध और भी अधिक ऊंचाइयों को छुएंगे।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:30:50 +0530</pubDate>
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                <title>पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बनता - अब्राहम समझौता</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180143/new-approach-to-understanding-womens-hormonal-health"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/abraham-accords.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति हेतु एक बार फिर सभी मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ मित्रता कर अब्राहम समझौता करने की बात छेड़कर पाकिस्तान की हुकूमत और सेना प्रमुख की नींद उड़ा दी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी कूटनीति के हिसाब से ईरान समझौते से ज्यादा मध्य पूर्व के देशों के बीच अब्राहम समझौता जरूरी है। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान समझौते पर जल्दबाज़ी न दिखाकर अब्राहम समझौते पर मुस्लिम देशों की राजनीति गरमा दी है। बकौल अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्राहम समझौता पश्चिम एशिया के सभी देशों की आर्थिक उन्नति का समझौता है। इसलिए भविष्य में मुस्लिम देशों को अपने व्यापारिक हितों के लिए आंतरिक मतभेदों को भूलकर अब्राहम समझौते पर सहमत होना पड़ेगा और जो राष्ट्र इस समझौते से इतर जाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें स्वाभाविक रूप से अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन और रूस जैसे महाशक्तिशाली देशों की नाराज़गी भी सहनी पड़ सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के अब्राहम समझौते पर कई मुस्लिम देशों ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में कदम बढ़ा भी दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणाम भी सार्थक निकल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पाकिस्तानी हुक्मरानों को अब्राहम समझौते पर सहमति देकर इजराइल के साथ संबंध बेहतर करने की बात से ही पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल मच गया है। पाकिस्तान ने इजराइल को कभी एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसकी वजह पाकिस्तान का फिलिस्तीनी प्रेम रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि दुनिया के करीब सौ से ज्यादा देश इजराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो टूक कहा है कि ईरान-अमेरिका के बीच शांति मध्यस्थता करवाने वाले देश पहले अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर कर इजराइल से संबंध बेहतर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पाकिस्तान में सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेना और कट्टरपंथी आतंकी ताकतों के बीच घमासान मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अब्राहम समझौते वाली बात ने पाकिस्तान को एक बार फिर  गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए अब अब्राहम समझौता  गले की हड्डी बनता जा रहा है। यदि वे इसे स्वीकार करते हैं तो निश्चित ही पाकिस्तान में सत्ता और सेना के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को कट्टरपंथी ताकतों का तीखा विरोध झेलना पड़ेगा और यदि पाकिस्तान अब्राहम समझौते से इंकार कर देता है तो फिर अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से उसका हुक्का-पानी बंद होना तय माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा अब्राहम समझौते को स्वीकार करने से इंकार करने के बाद पाकिस्तान के शांति का मसीहा बनने का दावे का झूठ भी उजागर हो चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अंतरराष्ट्रीय मंच पर आलोचना हो रही है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य पूर्व के देशों को अमेरिकी दबदबे को कम करने और अपनी आर्थिक उन्नति के लिए आपसी दुश्मनी को भुलाकर साझा व्यापार कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने हेतु अब्राहम समझौते को अपनाना ही होगा। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश मनभेद रखकर इस समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे या तो गृहयुद्ध में स्वयं खत्म हो जाएंगे या फिर अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के दबाव में कमजोर पड़ जाएंगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के नए शांति प्रस्ताव पर कई मुस्लिम देश मंथन कर रहे हैं और इसे मानवीय शांति का सबसे बड़ा समझौता कह रहे हैं। उम्मीद है कि अमेरिकी संबंधों और कूटनीति के चलते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाले दिनों में </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब , कतर, तुर्की और ईरान </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी अब्राहम समझौते को स्वीकारते नजर आएं तो हैरानी नहीं होगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अतः वर्षों से युद्ध की त्रासदी भुगत रहे मध्य पूर्व के देशों के लोगों के लिए अब्राहम समझौता मानवीय शांति का सबसे बड़ा उपहार साबित हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:43:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तबाही का इंतजाम- बारूद के ढेर पर खड़ी है दुनिया </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">क्या दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी हो गई है? क्या तमाम विज्ञान की तरक्की तबाही का सामान जुटाने के लिए है? अब तो दुनिया के ताकतवर देशों ने कथित सामरिक संतुलन की आड़ में परमाणु   हथियारों समेत इतना जखीरा जुटा लिया है कि दुनिया का तीन बार खात्मा करने के लिए पर्याप्त है। यह समूची मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आखिर इंसान तरक्की के नाम पर हथियार और विनाश की दौड़ क्यों लगा रहा है? क्या दुनिया का भविष्य परमाणु हथियारों के साए में गिरवीं रखा जा रहा है? फिर सभ्यता संस्कृति मानवीयता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177889/arrangement-of-destruction-the-world-is-standing-on-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa01631.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्या दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी हो गई है? क्या तमाम विज्ञान की तरक्की तबाही का सामान जुटाने के लिए है? अब तो दुनिया के ताकतवर देशों ने कथित सामरिक संतुलन की आड़ में परमाणु   हथियारों समेत इतना जखीरा जुटा लिया है कि दुनिया का तीन बार खात्मा करने के लिए पर्याप्त है। यह समूची मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आखिर इंसान तरक्की के नाम पर हथियार और विनाश की दौड़ क्यों लगा रहा है? क्या दुनिया का भविष्य परमाणु हथियारों के साए में गिरवीं रखा जा रहा है? फिर सभ्यता संस्कृति मानवीयता इंसानियत शांति और सहयोग की बात महज बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर महज बेमानी से अधिक कुछ नही है? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के कारण परमाणु युद्ध का खतरा शीत युद्ध के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में  इजरायल-ईरान तनाव , और चीन-अमेरिका के बीच सामंती होड़ ने दुनिया को एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है।रूस द्वारा अपनी रणनीतिक परमाणु ताकतों को उच्च सतर्कता पर रखना और पश्चिमी देशों को परमाणु धमकी देना इस खतरे का मुख्य कारण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उधर इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष जैसे 2026 में डिमोना परमाणु केंद्र के पास मिसाइल हमला ने सीधे परमाणु टकराव की आशंकाओं को जन्म दिया है।  स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, एक खतरनाक नई परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो गई है, क्योंकि पारंपरिक शस्त्र नियंत्रण संधियां कमजोर हो रही हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष और उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम भी परमाणु तनाव को बढ़ाते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों के फैलाव और आधुनिकीकरण में खतरनाक हद तक बढ़ौतरी हो रही है तथा इसके लिए विभिन्न देशों द्वारा नई रणनीति बनाई जा रही है। अमरीका और रूस के बीच 50 वर्ष पूर्व न्यूक्लियर हथियारों के परिसीमन और उन्हें समाप्त करने सम्बन्धी की गई संधि, जिसे 'न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी' (न्यू स्टार्ट) कहा जाता है, 2021 में 5 वर्ष के लिए बढ़ाने के बाद अब 5 फरवरी को समाप्त हो चुकी है तथा इसे आगे बढ़ाने की दिशा में कोई बात नहीं की जा रही।</div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, यह संधि किए जाने के बाद काफी न्यूक्लियर हथियार समाप्त कर दिए गए थे,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु अब नए हालात में अमरीका और रूस भी और न्यूक्लियर बम बनाना चाहते हैं, सऊदी अरब और तुर्की भी इसके लिए इच्छुक हैं तथा यूरोप में भी अब यह अहसास बढ़ रहा है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए और न्यूक्लियर हथियार बनाने चाहिएं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि अमरीका अपनी लम्बी दूरी की मिसाइल परीक्षण प्रणाली पर अरबों डॉलर रकम खर्च कर चुका है परंतु इसके बावजूद उसे टिकाऊ सुरक्षा प्राप्त नहीं हो सकी और अभी तक अमरीका हथियारों के निर्माण और फिर उन्हें समाप्त करने पर करदाताओं के 10 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है। यह इतनी रकम है कि इससे गूगल, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट का ज्यादातर हिस्सा खरीदा जा सकता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें इस समय स्थिति यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प के अंतर्गत अमरीका कोई संधि नहीं करना चाहता और यह बात तो रूस के अनुकूल ही है कि वह न्यूक्लियर हथियार बनाए। परंतु इसमें हानि किसकी है? इसमें हानि सारी दुनिया की है कि इतना धन खर्च करके न्यूक्लियर हथियार बनाने के बाद जिस स्थान पर उनका परीक्षण किया जाएगा, उस स्थान और उसके आसपास के लोगों का भारी नुकसान होगा।दरअसल पिछली बार रूस ने जहां न्यूक्लियर हथियारों का परीक्षण किया था, उसके आसपास रहने वाले लोगों को वैसी ही समस्याओं से जूझना पड़ा था, जैसी समस्याओं और बीमारियों का सामना चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र में लीकेज के समय लोगों को करना पड़ा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि कोई देश ऐसा करने के लिए भड़क उठे तो यही समस्याएं पैदा होंगी। कोल्ड वॉर के बाद अब पहली बार देश अपने हथियारों का जखीरा और इस्तेमाल के लिए तैयार वॉरहेड  बढ़ा रहे हैं। 2026 की शुरुआत तक 9 न्यूक्लियर हथियार वाले देशों के पास लगभग 12,187 वॉरहेड थे और इनकी बढ़ती संख्या को हाई अलर्ट पर रखा गया है।एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कुल परमाणु हथियारों  का जखीरा लगभग 12,100 से 12,300 के बीच है।इन हथियारों का वितरण और वर्तमान स्थिति इस प्रकार है दुनिया के लगभग 90% परमाणु हथियार केवल दो देशों - रूस लगभग 5,500 और अमेरिका लगभग 5,000 के पास हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अन्य देश: चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान, भारत, इज़राइल और उत्तर कोरिया के पास शेष 10% हथियार हैं। चीन तेजी से अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा है, जिसके 2030 तक 1,000 से अधिक होने का अनुमान है। 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास लगभग 180 और पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान है। वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की कुल संख्या में कमी आ रही है क्योंकि रूस-अमेरिका पुराने हथियार नष्ट कर रहे हैं, लेकिन परिचालन में तैनात हथियारों की संख्या बढ़ रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यूक्लियर हथियारों से सम्पन्न लगभग सभी 9 देश अपने वर्तमान मौजूदा हथियारों को अपग्रेड करने के साथ-साथ इनमें नए एवं अधिक उन्नत संस्करण वाले हथियारों की वृद्धि कर रहे हैं। हालांकि इसराईल के पास भी काफी न्यूक्लियर हथियार हैं परंतु इनकी घोषणा न करने के कारण इसराईल को इनमें नहीं गिना जाता।इस समय अमरीका व रूस के पास ही दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत न्यूक्लियर हथियार हैं। चीन भी अपने हथियारों का भंडार काफी बढ़ाने के अलावा अपने एडवांस्ड डिलीवरी सिस्टम की टैस्टिंग भी कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन हालात में ग्लोबल न्यूक्लियर रूलबुक कमजोर हो रही है और उक्त संधि चुनौतियों का सामना कर रही है। सैन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडल ईस्ट तनाव सहित बढ़ते झगड़ों के कारण न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल का खतरा पिछले एक दशक के दौरान इस समय अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है और इस होड़ के फैलने का खतरा चिंताजनक मोड़ पर है। इसका कारण यह है कि दुनिया के वर्तमान हालात में अधिक देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश कर सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमता) के परिणामस्वरूप भी तकनीकी खतरे बढ़ गए हैं और नए हथियारों के हाइपरसोनिक डिलीवरी सिस्टम के इंटीग्रेशन से सैन्य मामलों पर फैसले लेने के लिए उपलब्ध समय कम हो रहा है, जिससे अचानक या तेजी से न्यूक्लियर हमले का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इस संधि का नवीकरण न किए जाने की स्थिति में दुनिया को न्यूक्लियर हथियारों से होने वाली एक और तबाही के लिए तैयार रहना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 17:15:40 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>युद्ध नहीं, संवाद ही समाधान: अमेरिका–ईरान तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176587/america-iran-tension-is-solved-by-dialogue-not-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c8979c10-0dca-11f1-b7e1-afb6d0884c18.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और दोनों पक्षों के बयान सामने आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे गंभीर प्रयास जारी हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और यहां तक कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक, इस तनाव का असर गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर जब बात परमाणु कार्यक्रम और एनरिच्ड यूरेनियम की आती है, तो यह केवल रणनीतिक ताकत का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान के पास मौजूद ज्यादा एनरिच्ड यूरेनियम को हासिल करेगा। यह बयान केवल एक कूटनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई का संकेत भी माना जा रहा है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि यदि तय समय सीमा तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो मौजूदा संघर्ष विराम समाप्त हो सकता है और हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, ईरान का रुख भी कम सख्त नहीं है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानता है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी इसे शक की नजर से देखते हैं। यही अविश्वास इस पूरे विवाद की जड़ है, जिसने वर्षों से समाधान को मुश्किल बना रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस तनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का खतरा सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करता है। हाल ही में इस क्षेत्र में अस्थिरता के कारण कई जहाजों ने अपने रास्ते बदल दिए या यात्रा टाल दी, जिससे बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प और महत्वपूर्ण दोनों है। पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में दोनों पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच देने की कोशिश की है। इस्लामाबाद में संभावित वार्ता इसी प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, मध्यस्थता आसान नहीं होती, खासकर तब जब दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास हो और उनके हित एक-दूसरे के विपरीत हों। फिर भी, कूटनीति का यही उद्देश्य होता है कि संवाद के माध्यम से ऐसे समाधान खोजे जाएं जो सभी के लिए स्वीकार्य हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि जब-जब बातचीत के रास्ते बंद हुए हैं, तब-तब संघर्ष ने जन्म लिया है और उसका खामियाजा केवल संबंधित देशों ने ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने भुगता है। युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। यह केवल विनाश, अस्थिरता और मानवीय संकट को जन्म देता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता अत्यधिक है, किसी भी बड़े संघर्ष का प्रभाव दूरगामी और गंभीर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद का एक और पहलू यह है कि यह केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि हर कदम पर संदेह और आशंका बनी रहती है। ऐसे में किसी भी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होता। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि धैर्य, समझ और पारदर्शिता की भी जरूरत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के अन्य बड़े देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वे चाहते हैं कि यह विवाद शांतिपूर्ण तरीके से सुलझे, क्योंकि किसी भी तरह का युद्ध वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, एक नया संघर्ष स्थिति को और जटिल बना सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर इस बार की वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता लाने में भी मदद करेगा। इससे वैश्विक बाजारों में भरोसा बढ़ेगा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं कम होंगी। लेकिन अगर यह वार्ता विफल होती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। तनाव बढ़ सकता है, सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है और क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की आग में झुलस सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में सबसे जरूरी है संयम और समझदारी। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके फैसलों का असर केवल उनके देशों तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता को प्रभावित करता है। इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है। कूटनीति, संवाद और सहयोग ही ऐसे रास्ते हैं जो स्थायी शांति की ओर ले जा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे यह तय करना है कि वह संघर्ष का रास्ता चुनेगी या सहयोग का। अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश इस अवसर का उपयोग करेंगे और ऐसा समाधान निकालेंगे जो न केवल उनके लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए हितकारी हो। युद्ध किसी भी हालत में समाधान नहीं है, और इतिहास ने बार-बार इस सच्चाई को साबित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:06:08 +0530</pubDate>
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                <title>युद्ध विराम के लिए भारत होगा संभावित विकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। विशेषकर तब जब दुनिया लगातार संघर्षों की आग में झुलस रही है, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अब  अमेरिका-इजरायल-ईरान महायुद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक शांति स्थापित करने वाली संस्थाएं अपेक्षित प्रभाव खोती जा रही हैं। कभी विश्व राजनीति का केंद्र माने जाने वाला यह संयुक्त राष्ट्र संघ अब कई बार केवल औपचारिक बयानबाजी तक सीमित दिखाई देता है, युद्धविराम के प्रयास या तो बहुत देर से होते हैं।</p><p style="text-align:justify;"> या फिर प्रभावहीन सिद्ध होते हैं, यही कारण है कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173811/india-will-be-a-possible-option-for-ceasefire"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/india-name-change-to-bharat.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। विशेषकर तब जब दुनिया लगातार संघर्षों की आग में झुलस रही है, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अब  अमेरिका-इजरायल-ईरान महायुद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक शांति स्थापित करने वाली संस्थाएं अपेक्षित प्रभाव खोती जा रही हैं। कभी विश्व राजनीति का केंद्र माने जाने वाला यह संयुक्त राष्ट्र संघ अब कई बार केवल औपचारिक बयानबाजी तक सीमित दिखाई देता है, युद्धविराम के प्रयास या तो बहुत देर से होते हैं।</p><p style="text-align:justify;"> या फिर प्रभावहीन सिद्ध होते हैं, यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना और कार्यप्रणाली आज के समय के अनुरूप है भी या नहीं, क्योंकि स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार ने कई बार निर्णय प्रक्रिया को जकड़ कर रख दिया है। परिणामस्वरूप शक्तिशाली देशों के हितों के आगे सामूहिक शांति प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं, इस संदर्भ में यह धारणा भी बलवती हुई है कि संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव इस संस्था पर अत्यधिक है उसे अमेरिका का पिछलग्गु कहा जाता है जिससे निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">ऐसे जटिल वैश्विक समीकरणों के बीच भारत एक संतुलित और विश्वसनीय शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया है। भारत की विदेश नीति का मूल आधार “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सिद्धांत रहे हैं, यही कारण है कि भारत ने कभी भी किसी एक ध्रुव का समर्थन करने के बजाय संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है। चाहे संबंध अमेरिका से हों या रूस से, चाहे इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी हो या ईरान के साथ ऊर्जा और सांस्कृतिक रिश्ते, भारत ने हर दिशा में संतुलन बनाए रखा है, यही संतुलन आज उसे वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका के लिए उपयुक्त व बेहतर विकल्प बनाता है। </p><p style="text-align:justify;">वर्तमान परिस्थिति में जब पश्चिमी देश एक तरफ खड़े दिखाई देते हैं और कई इस्लामी देश दूसरी तरफ, तब भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में सामने आता है जिसके पास सभी पक्षों से संवाद करने की क्षमता और विश्वास दोनों हैं, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब तथा अन्य अरब देशों के साथ भारत के मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, वहीं फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों के साथ भी भारत की साझेदारी मजबूत है, इसके अतिरिक्त अफ्रीकी देशों के साथ भारत का ऐतिहासिक सहयोग और विकासात्मक भागीदारी उसे एक व्यापक वैश्विक प्रतिनिधि बनाती है, </p><p style="text-align:justify;">यही कारण है कि आज जब संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ रहे हैं तब भारत को एक संभावित विकल्प या कम से कम एक प्रभावी पूरक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि किसी एक देश के लिए पूरी दुनिया में शांति स्थापित करना आसान नहीं है, भारत की अपनी सीमाएं हैं, उसकी प्राथमिकताएं हैं और उसकी आंतरिक चुनौतियां भी हैं, फिर भी भारत ने समय-समय पर शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई है, चाहे वह शांति सैनिकों की तैनाती हो या मानवीय सहायता, भारत हमेशा अग्रणी रहा है, वर्तमान संकट में भारत यदि सक्रिय कूटनीतिक पहल करता है, तो वह संवाद के नए रास्ते खोल सकता है।</p><p style="text-align:justify;">बैक-चैनल वार्ता, बहुपक्षीय बैठकें और क्षेत्रीय शांति सम्मेलन जैसे उपाय भारत के माध्यम से संभव हो सकते हैं, इसके साथ ही भारत का जी-20 जैसे मंचों पर नेतृत्व अनुभव भी उसे वैश्विक सहमति बनाने में मदद करता है, लेकिन यह अपेक्षा करना कि भारत पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र संघ का विकल्प बन जाएगा, शायद व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की संरचना, वैधता और वैश्विक स्वीकृति अभी भी अद्वितीय है, आवश्यकता इस बात की है कि भारत जैसे उभरते शक्तिशाली राष्ट्र इस संस्था में सुधार की दिशा में नेतृत्व करें, सुरक्षा परिषद का विस्तार, वीटो प्रणाली में बदलाव और विकासशील देशों की अधिक भागीदारी जैसे कदम इस संस्था को पुनः प्रासंगिक बना सकते हैं, अंततः यह कहा जा सकता है कि आज की दुनिया एक नए संतुलन की तलाश में है, जहां पुरानी संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं और नई शक्तियां उभर रही हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">इस संक्रमण काल में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह न केवल एक मध्यस्थ बन सकता है बल्कि एक नैतिक मार्गदर्शक भी बन सकता है, यदि भारत अपनी कूटनीतिक सूझबूझ, संतुलित नीति और वैश्विक विश्वास को सही दिशा में उपयोग करता है तो वह न केवल वर्तमान युद्ध को रोकने में योगदान दे सकता है बल्कि भविष्य के लिए एक अधिक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था की नींव भी रख सकता है, यही समय है जब भारत को अपनी “विश्वगुरु” की अवधारणा को व्यवहारिक रूप में सिद्ध करना होगा और दुनिया को यह दिखाना होगा कि शक्ति केवल सैन्य बल में नहीं बल्कि संवाद, संयम और समन्वय में भी निहित होती है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:26:07 +0530</pubDate>
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