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                <title>International Relations - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>गरीब मरीज पूछ रहा है— क्या मेरा जीवन इतना सस्ता है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180672/the-poor-patient-is-asking-%E2%80%93-is-my-life-so"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/360_f_334557287_wuhbarg68kugnheiwrgwanrxqtrl8wwv.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सरकारी गति का</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर दिन गंभीर होती जाती है। ऐसे में </span>120 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन बाद जांच की तारीख मिलना एक चिंताजनक प्रश्न खड़ा करता है—इसका बोझ आखिर कौन उठाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका परिवार या उसका जीवन</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स भोपाल की लंबी वेटिंग लिस्ट अब केवल एक अस्पताल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की समस्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी चुनौती का प्रतीक बन गई है। कम खर्च में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के लिए सस्ता इलाज भी तब बेमानी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जरूरी जांच ही महीनों बाद उपलब्ध हो। पेट के असहनीय दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर की आशंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क रोग या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज यदि केवल व्यवस्थागत कमी के कारण चार माह प्रतीक्षा करने को विवश हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह स्वास्थ्य सेवा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनहीनता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बीमारी किसी वेटिंग लिस्ट का इंतजार नहीं करती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह लगातार बढ़ती जाती है और कई बार उपचार की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उसी वर्ग पर पड़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर राजनीति सबसे अधिक होती है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति निजी अस्पताल में कुछ घंटों या दिनों में जांच करा लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटा व्यापारी और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह विकल्प अक्सर पहुंच से बाहर होता है। ऐसे में उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं—कर्ज लेकर निजी जांच कराए या दर्द और आशंका के बीच सरकारी अस्पताल की लंबी प्रतीक्षा सहे। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक असमानता का भी दर्पण है। स्वास्थ्य सुविधाएं आय से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकता से तय होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु मौजूदा व्यवस्था में पैसे वालों को समय मिलता है और अभावग्रस्तों को इंतजार।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी वेटिंग लिस्ट वर्षों से बढ़ती मांग और अपर्याप्त संसाधन विस्तार की कीमत है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मरीजों का बोझ बढ़ता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की संख्या लगभग वहीं ठहरी रही। कई सुपर-स्पेशियलिटी विभाग सीमित मानव संसाधनों पर निर्भर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि रेडियो डायग्नोसिस जैसे अहम विभाग पर्याप्त स्टाफ के अभाव में अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे। परिणाम सामने है—संसाधन मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सेवाएं नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समय पर जांच नहीं। प्रश्न यह है कि जब बढ़ती जरूरतें वर्षों से दिखाई दे रही थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी तैयारी क्यों नहीं की गई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर किस स्तर की चूक ने देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों को भी प्रतीक्षा के संकट में धकेल दिया</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीति का केंद्र तात्कालिक लोकप्रियता बन जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अस्पतालों की जरूरतें अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं। यही कारण है कि मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं पर अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों की भर्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई मशीनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए संसाधनों का अभाव बताया जाता है। विडंबना यह है कि वोट के लिए खजाना खुल जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन बचाने के लिए बजट सीमित पड़ जाता है। वास्तविक जनकल्याण मुफ्त सुविधाएं बांटने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में है जहां किसी मरीज को जांच के लिए महीनों प्रतीक्षा न करनी पड़े। स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर निवेश ही देश की तस्वीर बदल सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जरूरत आश्वासनों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्रवाई की है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में अतिरिक्त सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें लगाई जाएं तथा रेडियो डायग्नोसिस विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीशियनों और कर्मचारियों की भर्ती हो। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए </span>24 <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे शिफ्ट आधारित संचालन लागू किया जाए। आयुष्मान भारत के दायरे में सभी आवश्यक जांचें लाई जाएं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से सुविधाओं का विस्तार हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना मरीजों पर अतिरिक्त बोझ डाले। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अपॉइंटमेंट प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की स्थिति को चेतावनी मानते हुए देशभर के सरकारी अस्पतालों में संसाधन और मानवबल बढ़ाना अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि मरीजों को इलाज मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंतजार नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ केवल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे संस्थानों के भरोसे नहीं उठाया जा सकता। जब जिला अस्पतालों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बड़े संस्थानों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग-निवारण और प्रारंभिक जांच व्यवस्था को मजबूत करना उतना ही जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना उपचार सुविधाओं का विस्तार। मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाने पर भी समान ध्यान देना होगा। आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवनों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सक्षम मानव संसाधन और जवाबदेह प्रशासन से मजबूत बनती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य कोई दया या उपकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि किसी मरीज को अपनी बीमारी की सच्चाई जानने के लिए महीनों प्रतीक्षा करनी पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था की नाकामी है। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की चार माह लंबी जांच प्रतीक्षा सूची इसी विफलता का प्रतीक है। यह मौन संकट हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है। सरकारों को याद रखना होगा कि अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग आंकड़े नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान हैं। यदि स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनकल्याण के दावे अर्थहीन रह जाएंगे। आखिर सवाल यही है—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या एक गरीब मरीज के लिए महीनों का इंतजार सामान्य हो गया है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जांच में हर देरी कई बार जीवन की संभावनाएं भी कम कर देती है। ऐसी व्यवस्था पर गर्व नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां बीमारी की रफ्तार उपचार से तेज हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:44:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बदलते परिवेश में भी भारत और रूस की मित्रता रहेगी कायम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180668/friendship-between-india-and-russia-will-continue-even-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1200-675-25531568-thumbnail-16x9-modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह बयान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक ध्रुव या गुट तक सीमित नहीं रखा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के समय में जब पश्चिमी देश लगातार विकासशील देशों पर अपने एजेंडे थोपने का प्रयास कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पुतिन का यह कहना कि भारत पर रूस के साथ सहयोग कम करने के लिए डाला जा रहा पश्चिमी दबाव पूरी तरह से व्यर्थ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी वैश्विक स्वीकार्यता है। यह बयान केवल दो नेताओं या दो देशों की सरकारों के बीच का कूटनीतिक संवाद नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक बदलते हुए विश्व के शक्ति संतुलन का बहुत ही सजीव चित्रण है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस और भारत के कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद कई दशकों के विश्वास और आपसी सहयोग पर टिकी है। वर्ष </span>1971<span lang="hi" xml:lang="hi"> की शांति और मैत्री संधि से लेकर आज </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक के सफर में दोनों देशों ने कई वैश्विक उतार चढ़ाव देखे हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को समर्थन की आवश्यकता पड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर भारत का साथ दिया है। कश्मीर का मुद्दा हो या फिर आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस हमेशा एक सच्चे मित्र की भांति भारत के साथ खड़ा रहा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही कारण है कि आज की सदी में भी यह रिश्ता मात्र कूटनीतिक समझौतों का मोहताज नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह दोनों देशों की जनता के बीच पनपे एक अटूट भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक है। पुतिन की बातों में इसी ऐतिहासिक विश्वास की झलक मिलती है। उन्हें इस बात का भलीभांति भान है कि भारत किसी भी बाहरी देश के दबाव में आकर अपने पुराने और सच्चे मित्र के साथ संबंधों में कोई भी कटौती नहीं करेगा। भारत की जनता और भारत के नीति निर्माता दोनों ही इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि संकट के समय में किसने उनका साथ दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2022<span lang="hi" xml:lang="hi"> में शुरू हुए यूक्रेन संकट के बाद से ही पश्चिमी देशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए हैं। इन पश्चिमी देशों ने भारत पर भी यह भारी दबाव बनाया कि वह रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंध सीमित करे और वहां से कच्चे तेल की खरीद को रोक दे। लेकिन भारत ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि उसकी नीतियां उसके अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पश्चिमी देशों के फरमानों से। भारत ने न केवल रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उसे कई गुना बढ़ा भी दिया। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार ने </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि दोनों देशों द्वारा तय किए गए </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लक्ष्य से बहुत पहले ही हासिल कर लिया गया। आज रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत हिस्सा रूस से आयात कर रहा है। यह आंकड़ा इस बात को साबित करता है कि पश्चिमी देशों की धमकियां भारत के इरादों को डिगा नहीं पाईं और भारत ने अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर पुतिन द्वारा भारत के तीव्र विकास की जो विशेष रूप से प्रशंसा की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी विकास दर लगातार </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत के आस पास बनी हुई है। देश में हो रहे भारी बुनियादी ढांचे के निर्माण और तकनीकी विकास ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस यह भलीभांति समझता है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका एक प्रमुख विकास इंजन की तरह होने वाली है। ऐसे में रूस के लिए भारत सिर्फ एक पारंपरिक हथियार खरीदार नहीं रह गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष और विनिर्माण क्षेत्र में एक विशाल बाजार और सहयोगी बन गया है। दोनों देश अपनी मुद्राओं यानी रुपये और रूबल में व्यापार करने की दिशा में भी लगातार काम कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पश्चिमी मुद्राओं के एकाधिकार को चुनौती दी जा सके और दोनों देशों के व्यापारियों को विदेशी मुद्रा के उतार चढ़ाव से बचाया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत और रूस का सहयोग केवल आयात और निर्यात के पुराने मॉडल तक सीमित नहीं है। आज यह दोनों देश ब्रह्मोस मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों का संयुक्त रूप से निर्माण कर रहे हैं जो कि पूरी दुनिया में अपनी तरह की सबसे बेहतरीन मिसाइल मानी जाती है। इसके अलावा एस </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> वायु रक्षा प्रणाली की आपूर्ति भी दोनों देशों के बीच हुए एक ऐतिहासिक सौदे का हिस्सा है</span>, </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे पूरा करने के लिए भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित खतरे की भी बिल्कुल परवाह नहीं की। भारत में मेक इन इंडिया पहल के तहत कलाश्निकोव राइफल से लेकर अन्य कई रूसी रक्षा उपकरणों के निर्माण को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भारत की अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता लगातार मजबूत हो रही है। पुतिन का यह अटूट भरोसा इन्हीं ठोस धरातल पर टिके वास्तविक प्रोजेक्ट्स के कारण और भी मजबूत होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां तक अमेरिका और भारत के बढ़ते संबंधों का प्रश्न है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुतिन की बेबाक टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में रूस की परिपक्वता को दर्शाती है। आज भारत क्वाड जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठनों का सक्रिय सदस्य है जिसमें अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। पश्चिमी कूटनीतिक विश्लेषकों का अक्सर यह मानना रहा है कि भारत की अमेरिका से यह बढ़ती नजदीकी रूस को खटकती है और इससे दोनों के रिश्ते खराब हो सकते हैं। परंतु रूसी राष्ट्रपति ने अपने इस स्पष्ट बयान से इस सारे भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस यह गहराई से जानता है कि भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों की रक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका के साथ खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत रूस के खिलाफ किसी भी पश्चिमी एजेंडे का हिस्सा बन जाएगा। इसके विपरीत भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंचों पर भी रूस के साथ मजबूती से कदमताल कर रहा है। वर्ष </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ब्रिक्स का जो ऐतिहासिक विस्तार हुआ उसके बाद आज </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में यह संगठन एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा और मजबूत पैरोकार बन चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भारत और रूस की धुरी सबसे अहम भूमिका निभा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुतिन का भारत को लेकर यह बयान महज एक सामान्य राजनीतिक वक्तव्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक तेजी से उभरती हुई विश्व शक्ति के रूप में भारत के प्रति गहरे सम्मान का सीधा प्रकटीकरण है। पश्चिमी देशों को यह बहुत ही स्पष्ट संदेश है कि दुनिया अब उनके इशारों या उनकी नीतियों पर नहीं चलती। भारत अपने सभी निर्णयों में पूर्णतः स्वतंत्र है और वह अपने रणनीतिक मित्रों का चुनाव केवल अपनी शर्तों और अपने लाभ के आधार पर करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> रूस और भारत की यह प्रगाढ़ साझेदारी आने वाले समय में न केवल एशिया बल्कि संपूर्ण वैश्विक शक्ति संतुलन को बनाए रखने में एक मील का पत्थर साबित होगी। यह दोनों देश मिलकर जिस न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें आपसी सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का आदर और एक दूसरे के विकास में बिना शर्त योगदान ही सबसे प्रमुख स्तंभ होंगे। व्लादिमीर पुतिन के शब्दों ने दोनों देशों के बीच की इसी अत्यंत मजबूत नींव को एक बार फिर से दुनिया के सामने पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ रख दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भविष्य में दोनों देशों के संबंध और भी अधिक ऊंचाइयों को छुएंगे।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:30:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बनता - अब्राहम समझौता</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180143/new-approach-to-understanding-womens-hormonal-health"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/abraham-accords.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति हेतु एक बार फिर सभी मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ मित्रता कर अब्राहम समझौता करने की बात छेड़कर पाकिस्तान की हुकूमत और सेना प्रमुख की नींद उड़ा दी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी कूटनीति के हिसाब से ईरान समझौते से ज्यादा मध्य पूर्व के देशों के बीच अब्राहम समझौता जरूरी है। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान समझौते पर जल्दबाज़ी न दिखाकर अब्राहम समझौते पर मुस्लिम देशों की राजनीति गरमा दी है। बकौल अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्राहम समझौता पश्चिम एशिया के सभी देशों की आर्थिक उन्नति का समझौता है। इसलिए भविष्य में मुस्लिम देशों को अपने व्यापारिक हितों के लिए आंतरिक मतभेदों को भूलकर अब्राहम समझौते पर सहमत होना पड़ेगा और जो राष्ट्र इस समझौते से इतर जाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें स्वाभाविक रूप से अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन और रूस जैसे महाशक्तिशाली देशों की नाराज़गी भी सहनी पड़ सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के अब्राहम समझौते पर कई मुस्लिम देशों ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में कदम बढ़ा भी दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणाम भी सार्थक निकल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पाकिस्तानी हुक्मरानों को अब्राहम समझौते पर सहमति देकर इजराइल के साथ संबंध बेहतर करने की बात से ही पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल मच गया है। पाकिस्तान ने इजराइल को कभी एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसकी वजह पाकिस्तान का फिलिस्तीनी प्रेम रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि दुनिया के करीब सौ से ज्यादा देश इजराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो टूक कहा है कि ईरान-अमेरिका के बीच शांति मध्यस्थता करवाने वाले देश पहले अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर कर इजराइल से संबंध बेहतर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पाकिस्तान में सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेना और कट्टरपंथी आतंकी ताकतों के बीच घमासान मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अब्राहम समझौते वाली बात ने पाकिस्तान को एक बार फिर  गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए अब अब्राहम समझौता  गले की हड्डी बनता जा रहा है। यदि वे इसे स्वीकार करते हैं तो निश्चित ही पाकिस्तान में सत्ता और सेना के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को कट्टरपंथी ताकतों का तीखा विरोध झेलना पड़ेगा और यदि पाकिस्तान अब्राहम समझौते से इंकार कर देता है तो फिर अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से उसका हुक्का-पानी बंद होना तय माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा अब्राहम समझौते को स्वीकार करने से इंकार करने के बाद पाकिस्तान के शांति का मसीहा बनने का दावे का झूठ भी उजागर हो चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अंतरराष्ट्रीय मंच पर आलोचना हो रही है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य पूर्व के देशों को अमेरिकी दबदबे को कम करने और अपनी आर्थिक उन्नति के लिए आपसी दुश्मनी को भुलाकर साझा व्यापार कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने हेतु अब्राहम समझौते को अपनाना ही होगा। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश मनभेद रखकर इस समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे या तो गृहयुद्ध में स्वयं खत्म हो जाएंगे या फिर अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के दबाव में कमजोर पड़ जाएंगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के नए शांति प्रस्ताव पर कई मुस्लिम देश मंथन कर रहे हैं और इसे मानवीय शांति का सबसे बड़ा समझौता कह रहे हैं। उम्मीद है कि अमेरिकी संबंधों और कूटनीति के चलते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाले दिनों में </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब , कतर, तुर्की और ईरान </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी अब्राहम समझौते को स्वीकारते नजर आएं तो हैरानी नहीं होगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अतः वर्षों से युद्ध की त्रासदी भुगत रहे मध्य पूर्व के देशों के लोगों के लिए अब्राहम समझौता मानवीय शांति का सबसे बड़ा उपहार साबित हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:43:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तबाही का इंतजाम- बारूद के ढेर पर खड़ी है दुनिया </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">क्या दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी हो गई है? क्या तमाम विज्ञान की तरक्की तबाही का सामान जुटाने के लिए है? अब तो दुनिया के ताकतवर देशों ने कथित सामरिक संतुलन की आड़ में परमाणु   हथियारों समेत इतना जखीरा जुटा लिया है कि दुनिया का तीन बार खात्मा करने के लिए पर्याप्त है। यह समूची मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आखिर इंसान तरक्की के नाम पर हथियार और विनाश की दौड़ क्यों लगा रहा है? क्या दुनिया का भविष्य परमाणु हथियारों के साए में गिरवीं रखा जा रहा है? फिर सभ्यता संस्कृति मानवीयता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177889/arrangement-of-destruction-the-world-is-standing-on-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa01631.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्या दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी हो गई है? क्या तमाम विज्ञान की तरक्की तबाही का सामान जुटाने के लिए है? अब तो दुनिया के ताकतवर देशों ने कथित सामरिक संतुलन की आड़ में परमाणु   हथियारों समेत इतना जखीरा जुटा लिया है कि दुनिया का तीन बार खात्मा करने के लिए पर्याप्त है। यह समूची मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आखिर इंसान तरक्की के नाम पर हथियार और विनाश की दौड़ क्यों लगा रहा है? क्या दुनिया का भविष्य परमाणु हथियारों के साए में गिरवीं रखा जा रहा है? फिर सभ्यता संस्कृति मानवीयता इंसानियत शांति और सहयोग की बात महज बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर महज बेमानी से अधिक कुछ नही है? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के कारण परमाणु युद्ध का खतरा शीत युद्ध के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में  इजरायल-ईरान तनाव , और चीन-अमेरिका के बीच सामंती होड़ ने दुनिया को एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है।रूस द्वारा अपनी रणनीतिक परमाणु ताकतों को उच्च सतर्कता पर रखना और पश्चिमी देशों को परमाणु धमकी देना इस खतरे का मुख्य कारण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उधर इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष जैसे 2026 में डिमोना परमाणु केंद्र के पास मिसाइल हमला ने सीधे परमाणु टकराव की आशंकाओं को जन्म दिया है।  स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, एक खतरनाक नई परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो गई है, क्योंकि पारंपरिक शस्त्र नियंत्रण संधियां कमजोर हो रही हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष और उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम भी परमाणु तनाव को बढ़ाते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों के फैलाव और आधुनिकीकरण में खतरनाक हद तक बढ़ौतरी हो रही है तथा इसके लिए विभिन्न देशों द्वारा नई रणनीति बनाई जा रही है। अमरीका और रूस के बीच 50 वर्ष पूर्व न्यूक्लियर हथियारों के परिसीमन और उन्हें समाप्त करने सम्बन्धी की गई संधि, जिसे 'न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी' (न्यू स्टार्ट) कहा जाता है, 2021 में 5 वर्ष के लिए बढ़ाने के बाद अब 5 फरवरी को समाप्त हो चुकी है तथा इसे आगे बढ़ाने की दिशा में कोई बात नहीं की जा रही।</div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, यह संधि किए जाने के बाद काफी न्यूक्लियर हथियार समाप्त कर दिए गए थे,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु अब नए हालात में अमरीका और रूस भी और न्यूक्लियर बम बनाना चाहते हैं, सऊदी अरब और तुर्की भी इसके लिए इच्छुक हैं तथा यूरोप में भी अब यह अहसास बढ़ रहा है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए और न्यूक्लियर हथियार बनाने चाहिएं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि अमरीका अपनी लम्बी दूरी की मिसाइल परीक्षण प्रणाली पर अरबों डॉलर रकम खर्च कर चुका है परंतु इसके बावजूद उसे टिकाऊ सुरक्षा प्राप्त नहीं हो सकी और अभी तक अमरीका हथियारों के निर्माण और फिर उन्हें समाप्त करने पर करदाताओं के 10 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है। यह इतनी रकम है कि इससे गूगल, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट का ज्यादातर हिस्सा खरीदा जा सकता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें इस समय स्थिति यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प के अंतर्गत अमरीका कोई संधि नहीं करना चाहता और यह बात तो रूस के अनुकूल ही है कि वह न्यूक्लियर हथियार बनाए। परंतु इसमें हानि किसकी है? इसमें हानि सारी दुनिया की है कि इतना धन खर्च करके न्यूक्लियर हथियार बनाने के बाद जिस स्थान पर उनका परीक्षण किया जाएगा, उस स्थान और उसके आसपास के लोगों का भारी नुकसान होगा।दरअसल पिछली बार रूस ने जहां न्यूक्लियर हथियारों का परीक्षण किया था, उसके आसपास रहने वाले लोगों को वैसी ही समस्याओं से जूझना पड़ा था, जैसी समस्याओं और बीमारियों का सामना चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र में लीकेज के समय लोगों को करना पड़ा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि कोई देश ऐसा करने के लिए भड़क उठे तो यही समस्याएं पैदा होंगी। कोल्ड वॉर के बाद अब पहली बार देश अपने हथियारों का जखीरा और इस्तेमाल के लिए तैयार वॉरहेड  बढ़ा रहे हैं। 2026 की शुरुआत तक 9 न्यूक्लियर हथियार वाले देशों के पास लगभग 12,187 वॉरहेड थे और इनकी बढ़ती संख्या को हाई अलर्ट पर रखा गया है।एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कुल परमाणु हथियारों  का जखीरा लगभग 12,100 से 12,300 के बीच है।इन हथियारों का वितरण और वर्तमान स्थिति इस प्रकार है दुनिया के लगभग 90% परमाणु हथियार केवल दो देशों - रूस लगभग 5,500 और अमेरिका लगभग 5,000 के पास हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अन्य देश: चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान, भारत, इज़राइल और उत्तर कोरिया के पास शेष 10% हथियार हैं। चीन तेजी से अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा है, जिसके 2030 तक 1,000 से अधिक होने का अनुमान है। 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास लगभग 180 और पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान है। वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की कुल संख्या में कमी आ रही है क्योंकि रूस-अमेरिका पुराने हथियार नष्ट कर रहे हैं, लेकिन परिचालन में तैनात हथियारों की संख्या बढ़ रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यूक्लियर हथियारों से सम्पन्न लगभग सभी 9 देश अपने वर्तमान मौजूदा हथियारों को अपग्रेड करने के साथ-साथ इनमें नए एवं अधिक उन्नत संस्करण वाले हथियारों की वृद्धि कर रहे हैं। हालांकि इसराईल के पास भी काफी न्यूक्लियर हथियार हैं परंतु इनकी घोषणा न करने के कारण इसराईल को इनमें नहीं गिना जाता।इस समय अमरीका व रूस के पास ही दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत न्यूक्लियर हथियार हैं। चीन भी अपने हथियारों का भंडार काफी बढ़ाने के अलावा अपने एडवांस्ड डिलीवरी सिस्टम की टैस्टिंग भी कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन हालात में ग्लोबल न्यूक्लियर रूलबुक कमजोर हो रही है और उक्त संधि चुनौतियों का सामना कर रही है। सैन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडल ईस्ट तनाव सहित बढ़ते झगड़ों के कारण न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल का खतरा पिछले एक दशक के दौरान इस समय अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है और इस होड़ के फैलने का खतरा चिंताजनक मोड़ पर है। इसका कारण यह है कि दुनिया के वर्तमान हालात में अधिक देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश कर सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमता) के परिणामस्वरूप भी तकनीकी खतरे बढ़ गए हैं और नए हथियारों के हाइपरसोनिक डिलीवरी सिस्टम के इंटीग्रेशन से सैन्य मामलों पर फैसले लेने के लिए उपलब्ध समय कम हो रहा है, जिससे अचानक या तेजी से न्यूक्लियर हमले का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इस संधि का नवीकरण न किए जाने की स्थिति में दुनिया को न्यूक्लियर हथियारों से होने वाली एक और तबाही के लिए तैयार रहना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 17:15:40 +0530</pubDate>
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                <title>युद्ध नहीं, संवाद ही समाधान: अमेरिका–ईरान तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176587/america-iran-tension-is-solved-by-dialogue-not-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c8979c10-0dca-11f1-b7e1-afb6d0884c18.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और दोनों पक्षों के बयान सामने आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे गंभीर प्रयास जारी हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और यहां तक कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक, इस तनाव का असर गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर जब बात परमाणु कार्यक्रम और एनरिच्ड यूरेनियम की आती है, तो यह केवल रणनीतिक ताकत का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान के पास मौजूद ज्यादा एनरिच्ड यूरेनियम को हासिल करेगा। यह बयान केवल एक कूटनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई का संकेत भी माना जा रहा है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि यदि तय समय सीमा तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो मौजूदा संघर्ष विराम समाप्त हो सकता है और हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, ईरान का रुख भी कम सख्त नहीं है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानता है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी इसे शक की नजर से देखते हैं। यही अविश्वास इस पूरे विवाद की जड़ है, जिसने वर्षों से समाधान को मुश्किल बना रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस तनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का खतरा सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करता है। हाल ही में इस क्षेत्र में अस्थिरता के कारण कई जहाजों ने अपने रास्ते बदल दिए या यात्रा टाल दी, जिससे बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प और महत्वपूर्ण दोनों है। पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में दोनों पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच देने की कोशिश की है। इस्लामाबाद में संभावित वार्ता इसी प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, मध्यस्थता आसान नहीं होती, खासकर तब जब दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास हो और उनके हित एक-दूसरे के विपरीत हों। फिर भी, कूटनीति का यही उद्देश्य होता है कि संवाद के माध्यम से ऐसे समाधान खोजे जाएं जो सभी के लिए स्वीकार्य हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि जब-जब बातचीत के रास्ते बंद हुए हैं, तब-तब संघर्ष ने जन्म लिया है और उसका खामियाजा केवल संबंधित देशों ने ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने भुगता है। युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। यह केवल विनाश, अस्थिरता और मानवीय संकट को जन्म देता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता अत्यधिक है, किसी भी बड़े संघर्ष का प्रभाव दूरगामी और गंभीर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद का एक और पहलू यह है कि यह केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि हर कदम पर संदेह और आशंका बनी रहती है। ऐसे में किसी भी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होता। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि धैर्य, समझ और पारदर्शिता की भी जरूरत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के अन्य बड़े देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वे चाहते हैं कि यह विवाद शांतिपूर्ण तरीके से सुलझे, क्योंकि किसी भी तरह का युद्ध वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, एक नया संघर्ष स्थिति को और जटिल बना सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर इस बार की वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता लाने में भी मदद करेगा। इससे वैश्विक बाजारों में भरोसा बढ़ेगा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं कम होंगी। लेकिन अगर यह वार्ता विफल होती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। तनाव बढ़ सकता है, सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है और क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की आग में झुलस सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में सबसे जरूरी है संयम और समझदारी। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके फैसलों का असर केवल उनके देशों तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता को प्रभावित करता है। इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है। कूटनीति, संवाद और सहयोग ही ऐसे रास्ते हैं जो स्थायी शांति की ओर ले जा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे यह तय करना है कि वह संघर्ष का रास्ता चुनेगी या सहयोग का। अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश इस अवसर का उपयोग करेंगे और ऐसा समाधान निकालेंगे जो न केवल उनके लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए हितकारी हो। युद्ध किसी भी हालत में समाधान नहीं है, और इतिहास ने बार-बार इस सच्चाई को साबित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:06:08 +0530</pubDate>
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                <title>युद्ध विराम के लिए भारत होगा संभावित विकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। विशेषकर तब जब दुनिया लगातार संघर्षों की आग में झुलस रही है, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अब  अमेरिका-इजरायल-ईरान महायुद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक शांति स्थापित करने वाली संस्थाएं अपेक्षित प्रभाव खोती जा रही हैं। कभी विश्व राजनीति का केंद्र माने जाने वाला यह संयुक्त राष्ट्र संघ अब कई बार केवल औपचारिक बयानबाजी तक सीमित दिखाई देता है, युद्धविराम के प्रयास या तो बहुत देर से होते हैं।</p><p style="text-align:justify;"> या फिर प्रभावहीन सिद्ध होते हैं, यही कारण है कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173811/india-will-be-a-possible-option-for-ceasefire"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/india-name-change-to-bharat.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। विशेषकर तब जब दुनिया लगातार संघर्षों की आग में झुलस रही है, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अब  अमेरिका-इजरायल-ईरान महायुद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक शांति स्थापित करने वाली संस्थाएं अपेक्षित प्रभाव खोती जा रही हैं। कभी विश्व राजनीति का केंद्र माने जाने वाला यह संयुक्त राष्ट्र संघ अब कई बार केवल औपचारिक बयानबाजी तक सीमित दिखाई देता है, युद्धविराम के प्रयास या तो बहुत देर से होते हैं।</p><p style="text-align:justify;"> या फिर प्रभावहीन सिद्ध होते हैं, यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना और कार्यप्रणाली आज के समय के अनुरूप है भी या नहीं, क्योंकि स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार ने कई बार निर्णय प्रक्रिया को जकड़ कर रख दिया है। परिणामस्वरूप शक्तिशाली देशों के हितों के आगे सामूहिक शांति प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं, इस संदर्भ में यह धारणा भी बलवती हुई है कि संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव इस संस्था पर अत्यधिक है उसे अमेरिका का पिछलग्गु कहा जाता है जिससे निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">ऐसे जटिल वैश्विक समीकरणों के बीच भारत एक संतुलित और विश्वसनीय शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया है। भारत की विदेश नीति का मूल आधार “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सिद्धांत रहे हैं, यही कारण है कि भारत ने कभी भी किसी एक ध्रुव का समर्थन करने के बजाय संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है। चाहे संबंध अमेरिका से हों या रूस से, चाहे इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी हो या ईरान के साथ ऊर्जा और सांस्कृतिक रिश्ते, भारत ने हर दिशा में संतुलन बनाए रखा है, यही संतुलन आज उसे वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका के लिए उपयुक्त व बेहतर विकल्प बनाता है। </p><p style="text-align:justify;">वर्तमान परिस्थिति में जब पश्चिमी देश एक तरफ खड़े दिखाई देते हैं और कई इस्लामी देश दूसरी तरफ, तब भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में सामने आता है जिसके पास सभी पक्षों से संवाद करने की क्षमता और विश्वास दोनों हैं, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब तथा अन्य अरब देशों के साथ भारत के मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, वहीं फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों के साथ भी भारत की साझेदारी मजबूत है, इसके अतिरिक्त अफ्रीकी देशों के साथ भारत का ऐतिहासिक सहयोग और विकासात्मक भागीदारी उसे एक व्यापक वैश्विक प्रतिनिधि बनाती है, </p><p style="text-align:justify;">यही कारण है कि आज जब संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ रहे हैं तब भारत को एक संभावित विकल्प या कम से कम एक प्रभावी पूरक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि किसी एक देश के लिए पूरी दुनिया में शांति स्थापित करना आसान नहीं है, भारत की अपनी सीमाएं हैं, उसकी प्राथमिकताएं हैं और उसकी आंतरिक चुनौतियां भी हैं, फिर भी भारत ने समय-समय पर शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई है, चाहे वह शांति सैनिकों की तैनाती हो या मानवीय सहायता, भारत हमेशा अग्रणी रहा है, वर्तमान संकट में भारत यदि सक्रिय कूटनीतिक पहल करता है, तो वह संवाद के नए रास्ते खोल सकता है।</p><p style="text-align:justify;">बैक-चैनल वार्ता, बहुपक्षीय बैठकें और क्षेत्रीय शांति सम्मेलन जैसे उपाय भारत के माध्यम से संभव हो सकते हैं, इसके साथ ही भारत का जी-20 जैसे मंचों पर नेतृत्व अनुभव भी उसे वैश्विक सहमति बनाने में मदद करता है, लेकिन यह अपेक्षा करना कि भारत पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र संघ का विकल्प बन जाएगा, शायद व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की संरचना, वैधता और वैश्विक स्वीकृति अभी भी अद्वितीय है, आवश्यकता इस बात की है कि भारत जैसे उभरते शक्तिशाली राष्ट्र इस संस्था में सुधार की दिशा में नेतृत्व करें, सुरक्षा परिषद का विस्तार, वीटो प्रणाली में बदलाव और विकासशील देशों की अधिक भागीदारी जैसे कदम इस संस्था को पुनः प्रासंगिक बना सकते हैं, अंततः यह कहा जा सकता है कि आज की दुनिया एक नए संतुलन की तलाश में है, जहां पुरानी संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं और नई शक्तियां उभर रही हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">इस संक्रमण काल में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, वह न केवल एक मध्यस्थ बन सकता है बल्कि एक नैतिक मार्गदर्शक भी बन सकता है, यदि भारत अपनी कूटनीतिक सूझबूझ, संतुलित नीति और वैश्विक विश्वास को सही दिशा में उपयोग करता है तो वह न केवल वर्तमान युद्ध को रोकने में योगदान दे सकता है बल्कि भविष्य के लिए एक अधिक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था की नींव भी रख सकता है, यही समय है जब भारत को अपनी “विश्वगुरु” की अवधारणा को व्यवहारिक रूप में सिद्ध करना होगा और दुनिया को यह दिखाना होगा कि शक्ति केवल सैन्य बल में नहीं बल्कि संवाद, संयम और समन्वय में भी निहित होती है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:26:07 +0530</pubDate>
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                <title>होर्मुज संकट और वैश्विक टकराव की नई दिशा क्या अमेरिका फंस गया है ईरान के जाल में</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस संघर्ष के पहले</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173425/hormuz-crisis-and-new-direction-of-global-conflict-is-america"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संघर्ष के पहले चरण में अमेरिका ने यह मान लिया था कि शुरुआती हमलों के बाद ईरान जल्दी झुक जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान ने लगातार जवाबी हमले किए और वह भी कई देशों तक फैलाकर। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ईरान केवल बचाव नहीं कर रहा बल्कि सक्रिय रणनीति के तहत क्षेत्रीय दबाव बना रहा है। अमेरिकी ठिकानों पर हमले और संचार तंत्र को नुकसान पहुंचाना इस बात का संकेत है कि ईरान तकनीकी और सैन्य स्तर पर तैयार था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार ईरान के पास अभी भी पर्याप्त संवर्धित यूरेनियम मौजूद है जिससे यह संकेत मिलता है कि वह दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका के शुरुआती हमले निर्णायक नहीं रहे।इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम केंद्र होर्मुज स्ट्रेट बन गया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की रीढ़ माना जाता है। यहां से रोजाना करोड़ों बैरल तेल और गैस गुजरती है। जब ईरान ने इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित किया तो वैश्विक बाजार में तुरंत असर दिखाई दिया। तेल की कीमतों में तेजी आई और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही वह कारण है कि ट्रम्प को अब अकेले लड़ना मुश्किल लग रहा है और उन्होंने नाटो के साथ साथ चीन और जापान जैसे देशों से मदद की अपील की है। यह कदम इस बात का संकेत है कि अमेरिका इस संकट को केवल अपनी सैन्य ताकत से हल नहीं कर पा रहा है।चीन और जापान से मदद मांगना एक रणनीतिक मजबूरी भी है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी अर्थव्यवस्था इस मार्ग पर निर्भर है। जापान भी ऊर्जा के लिए इस रास्ते पर निर्भर करता है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि ये देश भी इस मिशन में शामिल हों ताकि एक वैश्विक दबाव बनाया जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इन देशों की प्रतिक्रिया बहुत सतर्क रही है। कोई भी देश सीधे सैन्य हस्तक्षेप के लिए तैयार नहीं दिख रहा। इसका मुख्य कारण जोखिम है। होर्मुज स्ट्रेट बेहद संकरा मार्ग है और यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का मतलब सीधा खतरा है। ईरान ने यहां समुद्री माइन्स बिछाने की रणनीति अपनाई है जो किसी भी जहाज के लिए जानलेवा हो सकती है।समुद्री माइन्स को हटाना आसान काम नहीं है। आधुनिक माइन्स को पहचानना मुश्किल होता है और उन्हें निष्क्रिय करना जोखिम भरा होता है। इसके अलावा ईरान के पास मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी है जिससे वह किसी भी ऑपरेशन को बाधित कर सकता है। इस कारण कोई भी देश अपनी नौसेना को सीधे खतरे में डालने से बच रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक और बड़ी चुनौती है कई देशों की सेनाओं का एक साथ संचालन। अलग अलग देशों की तकनीक कम्युनिकेशन और रणनीति अलग होती है। ऐसे में संयुक्त ऑपरेशन करना बेहद जटिल हो जाता है। यही वजह है कि अब तक कोई ठोस सैन्य गठबंधन सामने नहीं आया है।इस संकट का एक और पहलू है इसका वैश्विक असर। दुनिया की लगभग बीस प्रतिशत तेल सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ेगी और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से पूरा करता है। अगर सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर पेट्रोल डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा। इससे आम लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा और आर्थिक दबाव बढ़ेगा।भारत ने इस पूरे मामले में संतुलित रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं ताकि भारतीय जहाज सुरक्षित रह सकें और सप्लाई बनी रहे। भारत न तो सीधे इस संघर्ष में शामिल होना चाहता है और न ही अपने हितों को नुकसान होने देना चाहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते बल्कि आर्थिक और रणनीतिक नियंत्रण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करके अमेरिका को एक ऐसी स्थिति में ला दिया है जहां उसे वैश्विक समर्थन की जरूरत पड़ रही है।अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह बिना युद्ध को और बढ़ाए इस मार्ग को कैसे सुरक्षित बनाए। अगर संघर्ष और बढ़ता है तो इसमें और देश शामिल हो सकते हैं जिससे स्थिति और जटिल हो जाएगी।अंत में यह कहा जा सकता है कि यह संघर्ष अभी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचा है। न तो अमेरिका पूरी तरह जीत पाया है और न ही ईरान पीछे हटने को तैयार है। होर्मुज स्ट्रेट इस टकराव का केंद्र बना हुआ है और जब तक इसका समाधान नहीं निकलता तब तक वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बनी रहेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:10:10 +0530</pubDate>
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                <title>युद्ध की विभीषिका से त्रासदीपूर्ण मानवीय जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">दुनिया में किसी भी देश के लिए चाहे वह सत्य के लिए लड़ रहा हो या असत्य के लिए लड़ रहा हो, युद्ध की विभीषिकाएँ कभी भी किसी भी देश के मानवीय जीवन के लिए वरदान साबित नहीं हुई हैं। धर्म और अधर्म के नाम पर दुनिया को महाभारत काल में रक्तरंजित कर लाखों शूरवीरों को लीलने वाला कौरव-पांडवों का दिल दहला देने वाला दारुण युद्ध दुनिया के देशों के सामने सबसे बड़ा उदाहरण है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आज एक बार फिर दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है। आज दुनिया का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173413/tragedy-of-human-life-due-to-the-horrors-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया में किसी भी देश के लिए चाहे वह सत्य के लिए लड़ रहा हो या असत्य के लिए लड़ रहा हो, युद्ध की विभीषिकाएँ कभी भी किसी भी देश के मानवीय जीवन के लिए वरदान साबित नहीं हुई हैं। धर्म और अधर्म के नाम पर दुनिया को महाभारत काल में रक्तरंजित कर लाखों शूरवीरों को लीलने वाला कौरव-पांडवों का दिल दहला देने वाला दारुण युद्ध दुनिया के देशों के सामने सबसे बड़ा उदाहरण है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आज एक बार फिर दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है। आज दुनिया का हर देश एक-दूसरे की संप्रभुता पर कब्जा कर अपना दबदबा कायम करना चाहता है। ऐसे में विश्व में चारों ओर युद्ध की स्थिति निर्मित हो चुकी है। दुनिया में रूस-यूक्रेन युद्ध वर्षों से बिना नतीजे के अब तक जारी है और हाल ही में डेढ़ सप्ताह से ईरान-इजराइल और अमेरिकी युद्ध छिड़ जाने से एक बार फिर तीसरे महायुद्ध के बादल मंडराने लग गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">युद्ध की विभीषिका से मध्य पूर्व के देशों की हालत बेहद खराब हो रही है। ईरान में कट्टरपंथी शासन का खात्मा आज का हर आधुनिक सोच का नागरिक चाहता है, लेकिन कट्टरपंथी ताकतों की जड़ें इतनी गहरी जमी हुई हैं कि उसे उखाड़ फेंकने में शूरवीरों और मासूम लोगों की जिंदगी दांव पर लग जाती है। मध्यपूर्व के खाड़ी देशों में तेल के असीम भंडार हैं। दुनिया के देशों की सर्वाधिक तेल आपूर्ति भी खाड़ी देशों से ही होती है। अमेरिका की शुरू से ही तेल भंडारों पर अपना कब्जा जमाए रखने की नीति रही है, इसलिए वह कई खाड़ी देशों में अपने धनबल और बाहुबल के आसरे तेल पर कब्जा किए हुए है । ईरान एक प्रमुख तेल उत्पादक देश होने के साथ समुद्री मार्ग से सटा हुआ है। वर्तमान में इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान के कट्टरपंथी शासन का अंत करने हेतु युद्ध का बिगुल फूंके हुए हैं, जिससे दुनिया भर के देशों में कच्चे तेल और गैस की कमी आना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">    बेशक भारत एक बहुत बड़ा देश है और ईरान युद्ध का भारत पर भी गैस और तेल को लेकर प्रभाव पड़ना सहज है। भारत सरकार द्वारा गैस और तेल की पर्याप्त व्यवस्था के बाद भी देशभर में गैस की किल्लत से जूझते लोग इस बात का प्रतीक हैं कि दूसरे देशों के युद्ध का असर कैसे दुनिया के अन्य देशों के जीवन को प्रभावित करता है। युद्ध की विभीषिका नैतिक पतन, अमानवीयता और अंधी सत्ता-लालसा से उत्पन्न घोर त्रासदीपूर्ण स्थिति होती है, जिसका भय वर्षों बाद भी लोगों के जेहन से जाता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">युद्ध न सिर्फ दो देशों या दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच लड़ा जाता है, बल्कि युद्ध में दोनों देशों के लोगों और उनकी संपत्ति का भी विनाश होता है। दो देशों के युद्ध की परिणति से कई देशों के आर्थिक-व्यापारिक रिश्तों के साथ मानवीय जनजीवन भी बुरी तरह से प्रभावित होता है। युद्ध तो कुछ दिनों या महीनों में समाप्त होकर रह जाएगा, लेकिन उसकी विभीषिका पूरी एक पीढ़ी के जहन में जीवनभर भयावह खौफ की तरह छाई रह जाती है। युद्ध की विभीषिकाओं से उभरने और सामान्य जीवन जीने में लोगों को पूरी एक जिंदगी लग जाती है। अतः युद्ध किसी भी समस्या का अंतिम हल नहीं है, इसलिए युद्ध को टालना ही आज दुनिया के देशों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।</p>
<p style="text-align:justify;" align="center"><strong>अरविंद रावल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 19:45:31 +0530</pubDate>
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                <title>भारत कनाडा संबंधों का नया स्वर्णिम अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत और कनाडा के रिश्तों में हालिया उच्चस्तरीय वार्ता के बाद एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच हुई बैठक ने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का काम किया है। इस मुलाकात में ऊर्जा, रक्षा, व्यापार, कृषि और वैश्विक शांति जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई और कई अहम समझौतों पर सहमति बनी। विशेष रूप से सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति को लेकर हुआ समझौता इस वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172347/new-golden-chapter-of-india-canada-relations"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/भारत-कनाडा-संबंधों-का-नया-स्वर्णिम-अध्याय.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत और कनाडा के रिश्तों में हालिया उच्चस्तरीय वार्ता के बाद एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच हुई बैठक ने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का काम किया है। इस मुलाकात में ऊर्जा, रक्षा, व्यापार, कृषि और वैश्विक शांति जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई और कई अहम समझौतों पर सहमति बनी। विशेष रूप से सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति को लेकर हुआ समझौता इस वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मुलाकात दोनों नेताओं के बीच औपचारिक द्विपक्षीय बैठक के रूप में महत्वपूर्ण रही। पिछले वर्षों में भारत और कनाडा के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिले थे, किंतु इस बैठक ने यह संकेत दिया कि दोनों देश परिपक्व कूटनीतिक दृष्टिकोण के साथ भविष्य की ओर बढ़ना चाहते हैं। बातचीत में पारस्परिक विश्वास, आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती देने पर बल दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यूरेनियम आपूर्ति समझौता इस यात्रा का केंद्रीय बिंदु रहा। करीब 2.6 अरब डॉलर यानी लगभग 23,784 करोड़ रुपए के इस करार के तहत कनाडा अगले दस वर्षों तक भारत को यूरेनियम की आपूर्ति करेगा। कनाडा विश्व के प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देशों में से एक है और भारत की बढ़ती परमाणु ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में यह कदम निर्णायक साबित हो सकता है। भारत पहले से ही 2013 में लागू हुए न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट के तहत कनाडा से यूरेनियम प्राप्त करता रहा है, किंतु इस नई दीर्घकालिक व्यवस्था से स्थिरता और भरोसे की नई नींव पड़ी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग केवल कच्चे यूरेनियम की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगा। दोनों देशों ने छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों और उन्नत रिएक्टर तकनीकों के विकास में भी सहयोग की बात कही है। इससे भारत को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में तकनीकी लाभ मिलेगा और ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य साकार हो सकेगा। जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन में कमी की वैश्विक प्रतिबद्धताओं के बीच यह सहयोग भारत की दीर्घकालिक रणनीति के अनुरूप है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में भी साझेदारी को नई गति देने का निर्णय लिया गया है। समुद्री क्षेत्र जागरूकता, रक्षा उद्योगों में सहयोग और सैन्य आदान-प्रदान जैसे पहलुओं पर सहमति जताई गई। बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में यह सहयोग दोनों देशों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। आतंकवाद, उग्रवाद और कट्टरता को मानवता के सामने गंभीर चुनौती बताते हुए दोनों नेताओं ने इनसे निपटने के लिए घनिष्ठ सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक दृष्टि से भी यह बैठक अहम रही। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य तय किया है। जनवरी से अक्टूबर 2025 के दौरान दोनों देशों के बीच लगभग 8 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जो भविष्य में और तेजी से बढ़ सकता है। भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और कनाडा प्राकृतिक संसाधनों, प्रौद्योगिकी और निवेश क्षमता के लिए जाना जाता है। ऐसे में दोनों की पूरक अर्थव्यवस्थाएं व्यापक अवसर पैदा कर सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर भी बातचीत शुरू करने की घोषणा की गई है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो व्यापार और निवेश के नए द्वार खुलेंगे। भारतीय उद्योगों को कनाडाई बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी और कनाडाई कंपनियों को भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार में अवसर प्राप्त होंगे। कृषि, कृषि प्रौद्योगिकी और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में मूल्यवर्धन पर सहयोग से किसानों और कृषि उद्योग को लाभ हो सकता है। भारत में दालों की मांग को देखते हुए कनाडा के पल्स प्रोटीन क्षेत्र में सहयोग विशेष महत्व रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वक्तव्य में क्रिकेट के टी20 प्रारूप का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे टी20 में त्वरित निर्णय और मजबूत साझेदारी से मैच जीते जाते हैं, वैसे ही भारत और कनाडा मिलकर भविष्य का निर्माण करेंगे। यह टिप्पणी केवल सांकेतिक नहीं थी, बल्कि इस बात का संकेत थी कि दोनों देश तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों में सक्रिय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैश्विक मुद्दों पर भी दोनों देशों की समान सोच सामने आई। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए भारत ने स्पष्ट किया कि वह विश्व में शांति और स्थिरता चाहता है तथा हर समस्या का समाधान संवाद के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। यह रुख भारत की पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जो संतुलन और कूटनीतिक समाधान पर जोर देती है।द्विपक्षीय संबंधों की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद भारत के लिए वैश्विक परमाणु व्यापार के रास्ते खुले थे। उसी क्रम में 2013 का भारत-कनाडा परमाणु सहयोग समझौता लागू हुआ। हालिया करार उसी प्रक्रिया की अगली कड़ी है, जिसने दोनों देशों के संबंधों को और गहराई दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कुल मिलाकर यह बैठक केवल एक आर्थिक समझौते तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने राजनीतिक विश्वास, रणनीतिक साझेदारी और दीर्घकालिक सहयोग की नई दिशा तय की है। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, व्यापार विस्तार और वैश्विक शांति के मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत और कनाडा भविष्य में बहुआयामी संबंधों को और सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह साझेदारी दोनों देशों के लिए अवसरों और स्थिरता का नया मार्ग प्रशस्त कर सकती </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:31:34 +0530</pubDate>
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