<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/52113/masane-holi" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>मसाने की होली - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/52113/rss</link>
                <description>मसाने की होली RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>कहीं श्मशान की राख कहीं फूलों से खेली जाती है होली!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रहलाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यपु का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172340/holi-is-played-with-ashes-of-crematorium-and-flowers-at"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/कहीं-श्मशान-की-राख-कहीं-फूलों-से-खेली-जाती-है-होली!.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रहलाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रहलाद विष्णु जी का परम भक्त था। ये बात हिरण्यकश्यपु को पसंद नहीं थी। इस वजह से वह प्रहलाद को मारना चाहता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असुर राज हिरण्यकश्यपु ने बहुत कोशिश की, लेकिन प्रहलाद को मार नहीं सका। तब असुरराज की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन भगवान विष्णु जी की कृपा से होलिका जल गई और प्रहलाद बच गया। तभी से सत्य और धर्म की जीत के रूप में होली दहन का पर्व मनाया जाता है।।युगों पहले जिस तरह भक्त प्रहलाद के सकुशल बच जाने पर लोगों ने रंग गुलाल लगा कर खुशी मनाई थी आज भी उसी तरह खुशी मनाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गालियों से होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">होली के गीतों में वैसे भी गालियां पिरोई होती हैं. शब्दों का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया गया होता है कि लोग उसे सुन कर मस्ती करते हैं और उन्हें भीतर तक गुदगुदी होती है. वाराणसी, मिथिलांचल, कुमाऊं, राजस्थान, हरियाणा में होली पर गाली की अनोखी परंररा है। होली एक ऐसा त्योहार है, जो रंगों की मस्ती के साथ-साथ गालियों और गुदगुदाते गीतों के लिए भी खूब जाना जाता है. इसीलिए इस त्योहार को सबसे अनूठा कहते हैं. साल भर लोगों को इसका इंतजार रहता है. लोग गालियों और गीतों के जरिए अपनी भड़ास निकालते हैं. जैसा प्रदेश, वैसे गीत और वैसी ही वहां की गालियां. बहुरंगी होली की ये छटा दुनिया भर में निराली है। काशी की परंपराएं इसलिए अनूठी हैं क्योंकि यहां होली पर गालियों का भी अपना एक अलग संस्कार देखने को मिलता है. दूसरे शहरों में गाली देने पर मार हो जाए, लेकिन यहां होली पर गालियां मनभावन लगती हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>तलवारबाजी से होली</strong> </div>
<div style="text-align:justify;">पंजाब में सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा शुरू की गई यह होलीवीर रस से भरी होती है। इसमें निहंग सिख पारंपरिक पोशाक पहनकर तलवारबाजी और घुड़सवारी (गतका) का प्रदर्शन करते हैं। पश्चिमी बंगाल व ओडिशा में यहाँ होली को डोल जात्रा के रूप में मनाया जाता हैजिसमें राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूलों (डोल) पर रखकर जुलूस निकाला जाता है और रंगों से पूजा की जाती है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लठ्ठमार होली</strong> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा से करीब 50 किमी दूर बरसाना की होली बहुत खास होती है। बरसाना में कई दिनों तक लट्ठमार होली खेली जाती है। फाल्गुन पूर्णिमा से पहले ही लोग यहां होली खेलना शुरू कर देते हैं। पास के नंदगांव के पुरुष बरसाना आते हैं और बरसाना के पुरुष नंदगांव जाते हैं। इन गांवों की महिलाएं पुरुषों को लट्ठ मारती हैं और पुरुष ढाल से बचने की कोशिश करते हैं। ये होली देखने देश-विदेश से लाखों लोग यहां आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>फूलों से होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">मान्यता है कि मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ होली खेली थी। इसी वजह से इन जगहों पर होली की अच्छी खासी धूम होती है। मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण के भक्त बड़ी संख्या में होली खेलने पहुंचते हैं। यहां के मंदिरों में फूलों से होली खेली जाती है।बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली अवर्णनीय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लड्डूमार होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">बरसाना के राधा रानी मंदिर में लड्डू मार होली खेली जाती हैजहाँ एक-दूसरे पर लड्डू फेंके जाते हैं और उन्हें प्रसाद के रूप में खाया जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मसाने की होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">वाराणसी(काशी) के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली होली विश्व प्रसिद्ध है। यहां शमशान की राख से होली खेली जाती है। मान्यता है कि शिव जी ने यहां अपने गणों के साथ चिता की राख से होली खेली थी। इसी मान्यता की वजह से आज भी शिव भक्त यहां मसाने की होली खेलते है। देश दुनिया में यह एकमात्र ऐसी होली है जिसमें चिता भस्म को रंग गुलाल की तरह इस्तेमाल करते हुए होली खेलते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>अंगारों में होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">एक ऐसी भी होली है जहां जलती होली की लपटों के बीच पंडा नंगे पांव निकल जाता है लेकिन खरोंच तक नहीं आती है। मथुरा से करीब 50 किमी दूर एक गांव है फालैन। इसे प्रहलाद का गांव भी कहते हैं। फालैन गांव की होली की खास बात ये है कि यहां जलती हुई होली के बीच में से एक पंडा चलकर गुजरता है। होली ऊंची-ऊंची लपटों से निकलने के बाद भी पंडे का बाल तक नहीं जलता है। ये चमत्कार देखने के लिए देश-दुनिया से काफी लोग यहां पहुंचते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गीतों की होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">उत्तराखंड में होली संगीत और गायन के साथ मनाई जाती हैजिसे 'बैठकी होली' कहा जाता हैजहाँ शास्त्रीय और पारंपरिक गीतों का गायन होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हल्दी से होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">केरल के कोंकणी और कुडुंबी समुदाय के लोग इस दिन रंगों के बजाय हल्दी (मंजल) मिले पानी का उपयोग करते हैंजो शुद्धिकरण का प्रतीक है</div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र और गोवा में यहाँ होली को रंग पंचमी या शिग्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है जो बसंत पंचमी से शुरू होता है </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हम्पी होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">कर्नाटक के हम्पी की होली भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। ये जगह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है। इस जगह का संबंध त्रेतायुग की वानर सेना से है। मान्यता है कि सुग्रीव अपनी वानर सेना के साथ इसी क्षेत्र में रहते थे। यहां होली पर बड़ा आयोजन होता है। हजारों लोग यहां होली खेलने आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>शाही होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान की होली उदयपुर और पुष्कर में आज भी शाही तौर तरीकों से होली खेली जाती है। इस मौके पर राजपुताना आन बान शान देखने को मिलती है।कई दूसरे एशियाई देशों में भी होली के प्रतिरूप रंगों का पर्व मनाया जाता है लेकिन भारतीय होली यकीनन आज भी अनूठी मस्ती से भरी है यह समाज को एक सूत्र में पिरो कर उमंग व उत्साह का संचार करती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/172340/holi-is-played-with-ashes-of-crematorium-and-flowers-at</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/172340/holi-is-played-with-ashes-of-crematorium-and-flowers-at</guid>
                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:13:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-03/%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%AB%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80%21.jpg"                         length="175044"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        