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                <title>United Arab Emirates - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>United Arab Emirates RSS Feed</description>
                
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                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>दिवालिया हुआ पाकिस्तान ! अरब देश क्यों हुए परेशान?</title>
                                    <description><![CDATA[हंगामे ने खाड़ी में पाकिस्तान के सहयोगियों, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब के बीच चिंता की लकीरें पैदा कर दी हैं। दोनों देशों ने पहले पाकिस्तान के लिए वित्तीय सहायता का वादा किया था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/130029/pakistan-became-bankrupt-why-arab-countries-were-upset"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-06/download-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>INTERNATIONAL NEWS:</strong></p>
<p><strong>दिसंबर 2022</strong> में इस्लामाबाद की बाहरी देनदारियां 126 बिलियन डॉलर से अधिक थीं। उच्च ब्याज दरों और मजबूत ग्रीनबैक के माहौल के बीच, ये डॉलर-मूल्यवान ऋण सेवा के लिए अधिक महंगे हो गए हैं। विशेष रूप से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के रूप में - स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने दिसंबर में घोषणा की कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार चार साल के निचले स्तर 6.7 बिलियन डॉलर तक गिर गया है। इस बात की चिंता बढ़ रही है कि इस्लामाबाद अपने ऋणों पर चूक करेगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) डिफॉल्ट से बचने के लिए बेलआउट पैकेज को लेकर पाकिस्तान के साथ बातचीत कर रहा है। 2019 में पाकिस्तान ने आईएमएफ के साथ 6 बिलियन डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके एक साल बाद 1 बिलियन डॉलर के समझौते पर सहमति बनी। हालांकि, आईएमएफ ने 1.1 बिलियन डॉलर का पहला भुगतान तब तक जारी करने से इनकार कर दिया है जब तक कि संगठन को यह गारंटी नहीं मिल जाती है कि पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी -विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और चीन  इस्लामाबाद को आर्थिक रूप से भी समर्थन देने के लिए तैयार हैं।</p>
<p><br />पाकिस्तान बीते साल भर से राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक बदहाली जैसी डबल चुनौतियों से जूझ रहा है। भ्रष्टाचार के आरोप में खान की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तानी राजनीति में अस्थिरता भी चरम पर पहुंच गई। जिससे देश भर के प्रमुख शहरों में हिंसा भड़क गई। हंगामे ने खाड़ी में पाकिस्तान के सहयोगियों, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब के बीच चिंता की लकीरें पैदा कर दी हैं। दोनों देशों ने पहले पाकिस्तान के लिए वित्तीय सहायता का वादा किया था। आंशिक रूप से पाकिस्तान में राजनीतिक अराजकता को बढ़ावा देना देश की गंभीर आर्थिक स्थिति है। मुद्रास्फीति हाल ही में 35.4% के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई है। पिछले एक साल में ही पाकिस्तानी रुपये की कीमत अमेरिकी डॉलर के मुकाबले आधी हो गई है। सरकार के लिए शायद सबसे गंभीर बात यह है कि पाकिस्तान बाहरी कर्ज संकट का सामना कर रहा है।</p>
<p><br />कराची में एक ब्रोकरेज हाउस, टॉपलाइन सिक्योरिटीज के सीईओ मोहम्मद सोहेल ने अल-मॉनीटर को बताया कि इस तरह की मांग प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है, लेकिन इस बात पर संदेह है कि क्या यूएई और अन्य सहयोगी बढ़ते राजनीतिक संकट को देखते हुए आगे धन की पेशकश करने के लिए तैयार होंगे। चीन, यूएई और सऊदी अरब पहले ही आईएमएफ को प्रतिबद्धता प्रदान कर चुके हैं। हालांकि, करीब 2 अरब डॉलर की प्रतिबद्धताएं अभी भी लंबित हैं। वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता के बीच अगर यूएई और सऊदी अरब पाकिस्तान का साथ देता है, तो यह जोखिमों से भरा होगा। दोनों देशों के पाकिस्तान के साथ मजबूत व्यावसायिक रिश्ते हैं। लगभग 20 करोड़ से अधिक आबादी वाला पाकिस्तान सऊदी अरब और यूएई दोनों देशों के लिए एक बड़ा बाजार है। साल 2023 में पाकिस्तान के साथ यूएई का ट्रेड लगभग 10.6 बिलियन डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है। 2022 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच भी द्विपक्षीय व्यापार लगभग 4.6 बिलियन डॉलर का रहा। इसके अलावा पाकिस्तान के आर्थिक संकट से पाकिस्तान-गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल ट्रेड डील की व्यावहारिकता पर भी सवाल उठ सकते हैं। पाकिस्तान और गल्फ देशों के बीच होने वाली इस डील को लेकर फिलहाल बातचीत जारी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jun 2023 15:59:45 +0530</pubDate>
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