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                <title>Hormuz Strait - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Hormuz Strait RSS Feed</description>
                
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                <title>ये कैसा युद्धविराम?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्धविराम का उद्देश्य किसी भी संघर्ष को समाप्त कर शांति की दिशा में आगे बढ़ना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब युद्धविराम के कुछ ही समय बाद गोलियां और मिसाइलें फिर चलने लगें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा युद्धविराम था। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। मध्य-पूर्व पहले से ही अस्थिरता का केंद्र रहा है और अब दोनों देशों के बीच फिर से शुरू हुई सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर नए संकट के बादल खड़े कर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183370/what-kind-of-ceasefire-is-this"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्धविराम का उद्देश्य किसी भी संघर्ष को समाप्त कर शांति की दिशा में आगे बढ़ना होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब युद्धविराम के कुछ ही समय बाद गोलियां और मिसाइलें फिर चलने लगें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा युद्धविराम था। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। मध्य-पूर्व पहले से ही अस्थिरता का केंद्र रहा है और अब दोनों देशों के बीच फिर से शुरू हुई सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर नए संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। हालिया घटनाक्रम में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर युद्धविराम तोड़ने का आरोप लगाया है और सैन्य अभियान दोबारा शुरू होने की पुष्टि भी की है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सका। परमाणु कार्यक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंधों में राहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होरमुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे। समझौते में कई बिंदु ऐसे थे जिनकी व्याख्या दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से कर रहे थे। यही कारण रहा कि कुछ ही सप्ताह में तनाव दोबारा बढ़ गया। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया तथा उसकी सैन्य गतिविधियां लगातार जारी रहीं। दोनों देशों के इन आरोपों ने विश्वास की बची-खुची नींव भी कमजोर कर दी। होरमुज़ जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र- दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल होरमुज़ जलडमरूमध्य इस विवाद का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित करता है। हालिया घटनाओं के बाद इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता देखने को मिली। पूरी दुनिया पर असर- अमेरिका और ईरान का संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे मध्य-पूर्व पर पड़ता है। खाड़ी देशों की सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था सभी इस तनाव से प्रभावित होती हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल आयात पर निर्भर देशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर भारत जैसे देशों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। युद्धविराम के बाद अपेक्षा थी कि दोनों देश बातचीत के जरिए स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन बढ़ते अविश्वास और लगातार सैन्य कार्रवाई ने वार्ता की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत फिर शुरू करने की अपील की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि फिलहाल स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देश केवल सैन्य जवाब देने की नीति अपनाते रहे तो संघर्ष और व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर यदि मध्यस्थ देशों के प्रयास सफल होते हैं तो फिर से बातचीत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि स्थायी शांति का रास्ता अभी भी काफी कठिन है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुई सैन्य कार्रवाई यह दिखाती है कि केवल युद्धविराम की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। जब तक मूल विवादों का समाधान नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक किसी भी समझौते की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। आज आवश्यकता केवल हथियारों को रोकने की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विश्वास बहाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी कूटनीति और दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान की है। अन्यथा हर युद्धविराम कुछ समय बाद एक नए युद्ध की प्रस्तावना बनता रहेगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 20:12:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>होर्मुज पर ईरान की हुकूमत: दुनिया की नब्ज पर हाथ</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div class="m_7345850882644653164WordSection1">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज को खोल दिया गया है। युद्ध के बाद पहली बार यहां से </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi">  पोत पास हुए जिसमें </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi">  पोत भारत आ रहे हैं। इनमें कच्चा तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलपीजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक व अन्य सामान है। लेकिन ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज पर उसकी हुकूमत चलती रहेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे छोटा लेकिन सबसे खतरनाक गलियारा है। चौड़ाई सिर्फ </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  किलोमीटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसी से होकर हर दिन दुनिया के </span>20%<span lang="hi" xml:lang="hi">  तेल और </span>30% LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरती है। मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi">  में ईरान ने इस गलियारे को</span>700</p></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182049/irans-rule-on-hormuz-has-its-hand-on-the-pulse"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas21.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div class="m_7345850882644653164WordSection1">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज को खोल दिया गया है। युद्ध के बाद पहली बार यहां से </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi"> पोत पास हुए जिसमें </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> पोत भारत आ रहे हैं। इनमें कच्चा तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलपीजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक व अन्य सामान है। लेकिन ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज पर उसकी हुकूमत चलती रहेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे छोटा लेकिन सबसे खतरनाक गलियारा है। चौड़ाई सिर्फ </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> किलोमीटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसी से होकर हर दिन दुनिया के </span>20%<span lang="hi" xml:lang="hi"> तेल और </span>30% LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरती है। मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ईरान ने इस गलियारे को बंद कर दिया। </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> टैंकर फंस गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल </span>80<span lang="hi" xml:lang="hi"> डॉलर पार कर गया। ये सिर्फ युद्ध की घोषणा नहीं थी। ये ईरान का ये कहना था कि "दुनिया की ऊर्जा की नब्ज मेरे हाथ में है"। होर्मुज क्या है और ईरान इसे क्यों चाहता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब</span>, UAE, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुवैत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इराक का पूरा तेल इसी रास्ते से जाता है। ईरान का दक्षिणी तट इस जलडमरूमध्य के उत्तर में है। भूगोल ने ईरान को स्ट्रेटेजिक लीवरेज दिया है। फरवरी </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के जरिए - पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी बना दी। अब नियम ये है: होर्मुज से गुजरने वाले हर जहाज को </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> सवालों का घोषणा पत्र जमा करना होगा। माल क्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मालिक कौन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रू की नेशनलिटी क्या है। जो नहीं मानेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस पर मिसाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रोन हमला या कब्जे का खतरा है। मार्च </span>2026: <span lang="hi" xml:lang="hi">जब ईरान ने नल बंद कर दिया- </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> को ईरान ने आधिकारिक रूप से होर्मुज बंद करने का ऐलान कर दिया। बंद होते ही</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य तेल यातायात में </span>86%<span lang="hi" xml:lang="hi"> गिरावट आई</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक मार्च को </span>19.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलियन बैरल/दिन की जगह सिर्फ </span>2.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलियन बैरल गुजरे। </span>706<span lang="hi" xml:lang="hi"> गैर-ईरानी टैंकर कतार में फंस गए। ब्रेंट क्रूड </span>10%<span lang="hi" xml:lang="hi"> उछलकर </span>80<span lang="hi" xml:lang="hi"> डॉलर पर पहुंच गया। ईरान ने कहा कि ये बंद सिर्फ अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल और यूरोपीय जहाजों के लिए है। चीन के झंडे वाले जहाजों को छूट दी गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या ईरान कानूनी तौर पर ऐसा कर सकता है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका छोटा सा जवाब है नहीं। </span>UNCLOS <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि की धारा </span>37-44<span lang="hi" xml:lang="hi"> के तहत होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में सभी देशों को "ट्रांजिट पैसेज" का अधिकार है। न ईरान और न ओमान एकतरफा तरीके से इसे बंद कर सकते हैं। समुद्री कानून विशेषज्ञ रेड्जा जकारिया कहते हैं कि ईरान आत्मरक्षा का हवाला दे सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अगर वो नेविगेशन रोकता है तो ये </span>UNCLOS <span lang="hi" xml:lang="hi">का उल्लंघन होगा। लेकिन असलियत में ईरान सैन्य शक्ति और भौगोलिक स्थिति से यातायात को प्रभावित कर रहा है। ये कानूनी संप्रभुता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन "डिफैक्टो कंट्रोल" है। ईरान ने अब "टोल-पास" सिस्टम शुरू कर दिया है। जहाजों को </span>PGSA <span lang="hi" xml:lang="hi">से पास लेना होगा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि सुरक्षित गुजरने के लिए जहाजों से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख डॉलर तक मांगे जा रहे हैं। ईरान ने इनकार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अमेरिका ने जहाजों को चेतावनी दी है कि टोल न दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इससे </span>IRGC <span lang="hi" xml:lang="hi">को फंड मिलेगा। दुनिया पर असर-</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल और गैस: भारत अपनी जरूरत का </span>90%<span lang="hi" xml:lang="hi"> तेल आयात करता है। </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> में </span>160<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का तेल आयात हुआ था। होर्मुज बंद होने से भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। यूरोप: कतर ने </span>LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादन रोका तो यूरोपीय गैस कीमतें </span>40%<span lang="hi" xml:lang="hi"> बढ़ गईं। </span>LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">टैंकर का किराया </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख डॉलर/दिन से ऊपर चला गया। अफ्रीका- </span>UN <span lang="hi" xml:lang="hi">महासचिव गुटेरेश ने चेताया कि अफ्रीका के तेल और उर्वरक आयात का </span>13%<span lang="hi" xml:lang="hi"> होर्मुज से आता है। बंद रहा तो महंगाई और खाद्य संकट बढ़ेगा। लेबनान में सीजफायर के बाद ईरान ने </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन के लिए होर्मुज खोल दिया। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ये सिर्फ सीजफायर की अवधि के लिए है। भारत के लिए क्या मायने हैं- भारत के लिए होर्मुज "लाइफलाइन" है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प सीमित हैं: केप ऑफ गुड होप से रास्ता </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन लंबा और </span>20% <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगा पड़ता है। रणनीति: चाबहार पोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के साथ डिप्लोमेसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाना। लेकिन ये सब शॉर्ट टर्म सॉल्यूशन हैं। अगर होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल स्थायी हो गया तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा हर </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">महीने में दांव पर लगेगी। होर्मुज पर ईरान की हुकूमत कानून से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूगोल और मिसाइल से चलती है। वो जानता है कि दुनिया तेल के बिना </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन नहीं चल सकती। इसलिए वो कभी पूरी तरह बंद नहीं करेगा। वो सिर्फ "नल" को धीमा-तेज करेगा ताकि अमेरिका झुके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल महंगा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसकी बात मानी जाए। ये </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी की नाकेबंदी है। बंदूक की जगह टोल-पास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध की जगह </span>40 <span lang="hi" xml:lang="hi">सवालों का फॉर्म। और दांव पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था।</span></p>
</div>
</div>
</div>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 16:08:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>अमेरिकी हमलों के बावजूद अडिग ईरान : मिसाइल ताकत बरकरार, दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179243/irans-missile-power-intact-despite-us-attacks-not-ready-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक प्रभुत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है और अमेरिकी हमलों ने उसकी कमर तोड़ दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें ही अब इन दावों पर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार ईरान की मिसाइल क्षमता अब भी काफी हद तक सुरक्षित है और उसके अंडरग्राउंड नेटवर्क को अपेक्षित नुकसान नहीं पहुंचा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">खुफिया आकलनों के मुताबिक ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल जखीरे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बचाने में सफल रहा है। इतना ही नहीं, उसके 90 प्रतिशत भूमिगत मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च नेटवर्क अब भी सक्रिय स्थिति में हैं। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि ईरान ने वर्षों से जिस रणनीतिक तैयारी पर काम किया था, वह अमेरिकी हमलों के बावजूद पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थित मिसाइल ठिकानों तक ईरान ने दोबारा पहुंच बना ली है। यह वही क्षेत्र है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार गुजरता है। यदि यहां अस्थिरता बढ़ती है, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती यही है कि वह तकनीकी और सैन्य रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकत होने के बावजूद ईरान की “असममित युद्ध नीति” को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पा रहा। ईरान ने पारंपरिक युद्ध के बजाय ऐसे नेटवर्क तैयार किए हैं जो भूमिगत सुरंगों, मोबाइल लॉन्चरों और विकेंद्रीकृत मिसाइल ठिकानों पर आधारित हैं। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी ईरान की जवाबी क्षमता खत्म नहीं हुई। रिपोर्टों के अनुसार उसके लगभग 70 प्रतिशत मोबाइल लॉन्चर सुरक्षित हैं। इन लॉन्चरों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इन्हें किसी भी इलाके में ले जाकर अचानक हमला किया जा सकता है। इससे विरोधी देश लगातार अनिश्चितता और दबाव में रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की रणनीति केवल सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है। उसने पिछले दो दशकों में अपने रक्षा ढांचे को इस प्रकार विकसित किया है कि बाहरी हमलों की स्थिति में भी उसका कमांड और कंट्रोल सिस्टम सक्रिय बना रहे। अमेरिकी और इजरायली हमलों के खतरे को देखते हुए ईरान ने अपने मिसाइल नेटवर्क को पहाड़ों के भीतर और भूमिगत सुरंगों में स्थापित किया। यही वजह है कि अत्याधुनिक बमबारी के बावजूद अमेरिका उसकी पूरी सैन्य क्षमता को नष्ट नहीं कर पाया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना कि “ईरान के सामने केवल दो रास्ते हैं—समझौता या पूर्ण विनाश”, राजनीतिक रूप से भले ही आक्रामक संदेश हो, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं है। उसने समझौते के बदले युद्ध क्षतिपूर्ति, प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता की मान्यता जैसी शर्तें रखी हैं। यह दिखाता है कि ईरान खुद को कमजोर स्थिति में नहीं मानता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की इस निडरता के पीछे केवल सैन्य तैयारी ही नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक और राजनीतिक सोच भी जिम्मेदार है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान ने खुद को पश्चिमी दबाव के खिलाफ प्रतिरोध की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव के बावजूद उसने अपनी मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को लगातार विकसित किया। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बाद भी वहां की सत्ता व्यवस्था या सैन्य संरचना में कोई बड़ा टूटाव दिखाई नहीं देता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है। ट्रम्प का चीन दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका चाहता है कि शी जिनपिंग ईरान पर दबाव डाले। चीन और ईरान के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध मजबूत रहे हैं। चीन पश्चिम एशिया में स्थिरता चाहता है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। ऐसे में अमेरिका चीन को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि चीन खुलकर अमेरिकी रणनीति का समर्थन करेगा, इसकी संभावना कम दिखाई देती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान के मुद्दे ने वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित किया है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। दुनिया के लगभग एक तिहाई समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी क्षेत्र से गुजरता है। ईरान कई बार संकेत दे चुका है कि यदि उसके खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाया गया तो वह इस मार्ग को बाधित कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की नीति अपना रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य संरचना का बचा रहना अमेरिकी रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे देशों में बड़े सैन्य अभियान चलाए, लेकिन लंबे समय में वहां स्थिरता स्थापित नहीं कर पाया। ईरान का मामला उससे भी अधिक जटिल है, क्योंकि यहां मजबूत राष्ट्रवादी भावना, संगठित सैन्य ढांचा और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क मौजूद हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और इराक-सीरिया के कई सशस्त्र समूह ईरान के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। इसलिए ईरान पर हमला केवल एक देश के खिलाफ कार्रवाई नहीं बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित कर सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की मिसाइल क्षमता का बरकरार रहना यह भी दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध केवल हवाई हमलों से नहीं जीते जा सकते। तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद जमीनी तैयारी, नेटवर्क आधारित रक्षा और रणनीतिक धैर्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ईरान ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि कोई देश लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से अपनी रक्षा नीति तैयार करे तो वह महाशक्तियों के सामने भी टिक सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज की स्थिति में अमेरिका सैन्य दबाव के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान अपने अस्तित्व और संप्रभुता की लड़ाई के रूप में इसे प्रस्तुत कर रहा है। यही कारण है कि अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान के भीतर भय या आत्मसमर्पण का माहौल नहीं दिखाई देता। बल्कि उसकी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि वह लंबे संघर्ष के लिए तैयार है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में शांति फिलहाल दूर नजर आती है। यदि बातचीत का रास्ता नहीं निकला तो आने वाले समय में यह टकराव और व्यापक रूप ले सकता है। लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिका के लगातार हमलों और धमकियों के बावजूद ईरान की सैन्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह टूटी नहीं है। उसकी मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा सुरक्षित रहना इस बात का प्रमाण है कि यह संघर्ष केवल ताकत का नहीं, बल्कि रणनीति, धैर्य और राजनीतिक संकल्प का भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 21:11:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Petrol Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की नई कीमतें हुई जारी, जान लें आज के ताजा भाव  </title>
                                    <description><![CDATA[<p>Petrol Diesel Price: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते वैश्विक बाजारों में चिंता गहरा गई है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल 5.65 फीसदी की तेजी के साथ 70.86 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है।</p>
<p>कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने सुबह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172299/petrol-diesel-price-new-prices-of-petrol-and-diesel-released"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/petrol-diesel-price-(4).jpg" alt=""></a><br /><p>Petrol Diesel Price: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते वैश्विक बाजारों में चिंता गहरा गई है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल 5.65 फीसदी की तेजी के साथ 70.86 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है।</p>
<p>कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने सुबह 6 बजे पेट्रोल-डीजल के जो ताजा दाम जारी किए हैं, उनमें फिलहाल कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।</p>
<h3>आपके शहर में पेट्रोल-डीजल के दाम (₹ प्रति लीटर)</h3>
<div class="TyagGW_tableContainer">
<div class="group TyagGW_tableWrapper flex flex-col-reverse w-fit">
<table class="w-fit min-w-(--thread-content-width)">
<thead>
<tr>
<th>शहर</th>
<th>पेट्रोल</th>
<th>डीजल</th>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td>नई दिल्ली</td>
<td>94.72</td>
<td>87.62</td>
</tr>
<tr>
<td>चेन्नई</td>
<td>100.75</td>
<td>92.34</td>
</tr>
<tr>
<td>कोलकाता</td>
<td>103.94</td>
<td>90.76</td>
</tr>
<tr>
<td>हैदराबाद</td>
<td>107.46</td>
<td>95.70</td>
</tr>
<tr>
<td>बेंगलुरु</td>
<td>102.92</td>
<td>89.02</td>
</tr>
<tr>
<td>अहमदाबाद</td>
<td>94.49</td>
<td>90.17</td>
</tr>
<tr>
<td>जयपुर</td>
<td>104.72</td>
<td>90.21</td>
</tr>
<tr>
<td>लखनऊ</td>
<td>94.69</td>
<td>87.80</td>
</tr>
<tr>
<td>इंदौर</td>
<td>106.48</td>
<td>91.88</td>
</tr>
<tr>
<td>पुणे</td>
<td>104.04</td>
<td>90.57</td>
</tr>
<tr>
<td>पटना</td>
<td>105.58</td>
<td>93.80</td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
</div>
<h3>क्या और महंगा हो सकता है तेल?</h3>
<p>विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 110 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। ऐसे हालात में भारत में भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।</p>
<p>इस तनाव का एक बड़ा कारण <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Strait of Hormuz</span></span> है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अहम समुद्री मार्ग है। दुनिया भर में तेल और एलएनजी की बड़ी हिस्सेदारी इसी रास्ते से गुजरती है। इस मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट ग्लोबल एनर्जी मार्केट को प्रभावित कर सकती है।</p>
<p>गौरतलब है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल भारत के लिए चिंता का विषय है। हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अधिकारियों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य अल्पकाल के लिए भी प्रभावित होता है, तो आम उपभोक्ताओं पर तत्काल बड़ा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि भारत के पास लगभग 10 दिनों का पर्याप्त कच्चा तेल भंडार उपलब्ध है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 07:28:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
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