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                <title>Middle East Crisis - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Middle East Crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>युद्ध नहीं, संवाद ही समाधान: अमेरिका–ईरान तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176587/america-iran-tension-is-solved-by-dialogue-not-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c8979c10-0dca-11f1-b7e1-afb6d0884c18.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और दोनों पक्षों के बयान सामने आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे गंभीर प्रयास जारी हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और यहां तक कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक, इस तनाव का असर गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर जब बात परमाणु कार्यक्रम और एनरिच्ड यूरेनियम की आती है, तो यह केवल रणनीतिक ताकत का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान के पास मौजूद ज्यादा एनरिच्ड यूरेनियम को हासिल करेगा। यह बयान केवल एक कूटनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई का संकेत भी माना जा रहा है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि यदि तय समय सीमा तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो मौजूदा संघर्ष विराम समाप्त हो सकता है और हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, ईरान का रुख भी कम सख्त नहीं है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानता है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी इसे शक की नजर से देखते हैं। यही अविश्वास इस पूरे विवाद की जड़ है, जिसने वर्षों से समाधान को मुश्किल बना रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस तनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का खतरा सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करता है। हाल ही में इस क्षेत्र में अस्थिरता के कारण कई जहाजों ने अपने रास्ते बदल दिए या यात्रा टाल दी, जिससे बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प और महत्वपूर्ण दोनों है। पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में दोनों पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच देने की कोशिश की है। इस्लामाबाद में संभावित वार्ता इसी प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, मध्यस्थता आसान नहीं होती, खासकर तब जब दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास हो और उनके हित एक-दूसरे के विपरीत हों। फिर भी, कूटनीति का यही उद्देश्य होता है कि संवाद के माध्यम से ऐसे समाधान खोजे जाएं जो सभी के लिए स्वीकार्य हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि जब-जब बातचीत के रास्ते बंद हुए हैं, तब-तब संघर्ष ने जन्म लिया है और उसका खामियाजा केवल संबंधित देशों ने ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने भुगता है। युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। यह केवल विनाश, अस्थिरता और मानवीय संकट को जन्म देता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता अत्यधिक है, किसी भी बड़े संघर्ष का प्रभाव दूरगामी और गंभीर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद का एक और पहलू यह है कि यह केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि हर कदम पर संदेह और आशंका बनी रहती है। ऐसे में किसी भी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होता। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि धैर्य, समझ और पारदर्शिता की भी जरूरत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के अन्य बड़े देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वे चाहते हैं कि यह विवाद शांतिपूर्ण तरीके से सुलझे, क्योंकि किसी भी तरह का युद्ध वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, एक नया संघर्ष स्थिति को और जटिल बना सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर इस बार की वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता लाने में भी मदद करेगा। इससे वैश्विक बाजारों में भरोसा बढ़ेगा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं कम होंगी। लेकिन अगर यह वार्ता विफल होती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। तनाव बढ़ सकता है, सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है और क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की आग में झुलस सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में सबसे जरूरी है संयम और समझदारी। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके फैसलों का असर केवल उनके देशों तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता को प्रभावित करता है। इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है। कूटनीति, संवाद और सहयोग ही ऐसे रास्ते हैं जो स्थायी शांति की ओर ले जा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे यह तय करना है कि वह संघर्ष का रास्ता चुनेगी या सहयोग का। अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश इस अवसर का उपयोग करेंगे और ऐसा समाधान निकालेंगे जो न केवल उनके लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए हितकारी हो। युद्ध किसी भी हालत में समाधान नहीं है, और इतिहास ने बार-बार इस सच्चाई को साबित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:06:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>धोखा और नाकामी का मसौदा रही इस्लामाबाद वार्ता </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">करीब डेड़ महीने से से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175979/islamabad-talks-remained-a-draft-of-deception-and-failure"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/on3hke0s_america-iran_625x300_12_april_26.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">करीब डेड़ महीने से से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान जाने तक कई बुरी खबरों को झेलकर भी अपनी शर्तों पर टिका हुआ है, उसे अमेरिका भला एक वार्ता के विफल होने से क्या हिला पाएगा। असल में तो इस्लामाबाद वार्ता की असफलता अमेरिका के लिए बुरी खबर है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य की चाबी अब भी ईरान के हाथ में ही है और इससे भी बढ़कर उसके पास सिर न झुकाने का जो जज्बा है, वो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप  के पास नहीं है। ट्रंप नेतन्याहू की मर्जी से युद्ध छेड़ते हैं और समझौता भी नहीं कर पाते, क्योंकि नेतन्याहू ऐसा नहीं चाहते।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें बीते दिनों न्यूयार्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि बेंजामिन नेतन्याहू 11 फरवरी को अमेरिका में थे, जहां उन्होंने ट्रंप के सामने एक पूरी रणनीति बताई थी कि ईरान पर हमला करना चाहिए, क्योंकि वह अभी कमजोर है। इससे ईरान में सत्ता बदली जा सकती है और उसके संसाधनों पर कब्जा भी किया जा सकता है। नेतन्याहू ऐसे ही प्रस्ताव पहले बराक ओबामा, जो बाइडेन और जार्ज बुश को भी दे चुके थे, लेकिन इन तीनों राष्ट्रपतियों ने अपने कार्यकाल में ऐसा कोई फैसला नहीं लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह खुलासा पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने हाल ही में किया है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप नेतन्याहू की बात मानने को मजबूर हो गए। क्या इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स के खुलासे हैं, इस सवाल का जवाब अभी मिलना बाकी है। बहरहाल, यह वार्ता बेनतीजा रही, क्योंकि एक तरफ इजरायल लेबनान पर अपने हमले नहीं रोक रहा था, जबकि ईरान की 10 शर्तों में यह एक अहम शर्त थी कि लेबनान पर हमले रुकने चाहिए। दूसरी तरफ अमेरिका ने भी अपने रुख में इंच भर का बदलाव नहीं दिखाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान वार्ता बिना नतीजे के खत्म हो गई. लेकिन बातचीत के नाम पर असली फायदा डोनाल्ड ट्रंप ने उठाया है. अमेरिका ने होर्मुज में माइंस हटाने वाले जहाज भेज दिए हैं. वहीं पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब में जेट भेजे हैं. इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या बातचीत के नाम पर ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई गई. कहीं बातचीत में उलझाकर उसे फिर से धोखा तो नहीं दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्योंकि बातचीत के बीच ही अमेरिका ने माइंस हटाने के लिए अपने दो सैन्य जहाजों को होर्मुज के पार ईरान के पास भेज दिया है. करीब 21 घंटे तक चली मैराथन बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को खाली हाथ लौटना पड़ा. वेंस ने साफ कहा कि अमेरिका ने अपनी ‘रेड लाइन’ बता दी थी, लेकिन ईरान ने उन्हें मानने से इनकार कर दिया. दूसरी तरफ ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा शर्तें थोप दीं और बातचीत को संतुलित नहीं रखा.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां यह भी गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच 5 अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध की भरपाई, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना और ईरान के खिलाफ तथा पूरे क्षेत्र में चल रहे युद्ध को पूरी तरह खत्म करने जैसे विषय शामिल रहे। लेकिन इन मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई। अमेरिका न ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हुआ, न उसने होर्मुज पर अपना रुख साफ किया। दरअसल पिछले दस दिनों में ही ट्रम्प दो बिल्कुल अलग-अलग बातें कह चुके हैं। पहले उन्होंने कहा था कि होर्मज में अमेरिका की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, अमेरिका को वहां से गुजरने वाले तेल की जरूरत नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर कुछ ही दिनों बाद उन्होंने कहा कि यह अमेरिका की मांगों का सबसे जरूरी हिस्सा है, और अगर इसे खुला नहीं रखा गया तो कोई बातचीत नहीं हो सकती। वैसे यह तय है कि होर्मुज बनारसमध्य पर अमेरिका अपना कब्जा चाहता है, क्योंकि ईरान ते इस पर न केवल नाकेबंदी की है, बल्कि अब शुल्क चिनेको एरुआत भी कर दी है और ट्रंप इससे बुरी तरह गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरानी संसद से मंजूरी मिलने के बाद अब नामिरिखोलूश्यनरी गाईस कॉर्पस को होर्मुज से गुजरने पाहा से शुल्क वसूलने का अधिकार मिल गया है। एक बेरल तेल पर एक डॉलर ईरान वसूलेगा, साथ ही क्रिप्टो करेंसी में भुगतान की व्यवस्था भी होगी, ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का कोई असर न पड़े। ईरान की इस रणनीति से उसे आर्थिक मजबूती मिलेगी, अमेरिका को इस बात का अहसास हो चुका है। इसलिए अब उसने फिर से अपने पत्ते फेंटने शुरु किए हैं, ताकि युद्ध को जायज ठहरा सके। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इस युद्ध ने एक तरफ ईरान और खाड़ी देशों समेत पूरी दुनिया में घोर तबाही मचाई है, वहीं एक नयी वैश्विक व्यवस्था भी तैयार की है, जिसमें ईरान निस्संदेह एक आदर्श की तरह उभरा है। ईरान ने संदेश दे दिया है कि महाशक्ति की अवधारणा और उसके हौव्वे को आत्मबल से कैसे तोड़ा जा सकता है। अब अन्य देशों को भी यह प्रेरणा मिली है कि वे अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने से इंकार करने की हिम्मत दिखाएं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने फाइटर जेट तैनात कर दिए. यह तैनाती दोनों देशों के रक्षा समझौते के तहत की गई, लेकिन इसे ईरान के लिए एक सख्त संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है. यह अमेरिका की दोहरी रणनीति थी ताकि एक तरफ बातचीत के जरिए समाधान का दिखावा किया जाए, दूसरी तरफ सैन्य दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाई घटनाक्रम की तुलना 28 फरवरी की उस घटना से भी की जा रही है, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था. यह हमला ऐसे समय में किया गया था जब दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी. जब किसी को हमले की उम्मीद नहीं थी तब ईरान पर अटैक हुआ, जिसमें सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए. इस बात का खतरा पहले से था कि कहीं अमेरिका बातचीत के बीच धोखा न दे दे वही हुआ अब ईरान को और मजबूती से खड़े होने की जरूरत होगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 19:25:36 +0530</pubDate>
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                <title>शांति वार्ता तार-तार, राष्ट्र प्रमुखों की जिद्द और आसन्न परमाणु युद्ध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका,इजरायल और।ईरान के बीच शांति वार्ता के विफल होने पर वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ कूटनीति की भाषा कमजोर और शक्ति-प्रदर्शन की भाषा प्रबल होती जा रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव विशेष रूप से अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच, विश्व को एक संभावित महायुद्ध यहाँ तक कि परमाणु युद्ध की आशंका की ओर धकेल रहा है। इस संपूर्ण घटनाक्रम में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ और उनके निर्णय भी चर्चा के केंद्र में हैं, जिन्हें लेकर विश्व स्तर पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। उनके द्वारा लिए जा रहे निर्णय</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175971/peace-talks-down-to-the-wire-stubbornness-of-heads-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका,इजरायल और।ईरान के बीच शांति वार्ता के विफल होने पर वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ कूटनीति की भाषा कमजोर और शक्ति-प्रदर्शन की भाषा प्रबल होती जा रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव विशेष रूप से अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच, विश्व को एक संभावित महायुद्ध यहाँ तक कि परमाणु युद्ध की आशंका की ओर धकेल रहा है। इस संपूर्ण घटनाक्रम में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ और उनके निर्णय भी चर्चा के केंद्र में हैं, जिन्हें लेकर विश्व स्तर पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। उनके द्वारा लिए जा रहे निर्णय पर अमेरिका के नागरिक उनके संसद सदस्य और वैश्विक देश के नेताओं द्वारा भी अविश्वास प्रकट किया जा रहा है उनकी मानसिक स्थिति पर भी अब सवालिया निशान लगने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो शांति वार्ताओं का उद्देश्य सदैव संघर्ष को समाप्त कर स्थिरता स्थापित करना होता है, किंतु हालिया प्रयासों में यह उद्देश्य बिखरता हुआ प्रतीत हो रहा है। जब मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान जैसे कमजोर,आतंकवादी और अपरिपक्व  मानसिकता वाले देश को आगे किया गया, तब ही कई कूटनीतिक विश्लेषकों ने इसकी निष्पक्षता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। किसी भी शांति प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मध्यस्थ देश निष्पक्ष, विश्वसनीय और सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो। यदि मध्यस्थ ही अपने रणनीतिक हितों में उलझा हो, तो वार्ता का मार्ग स्वतः ही संदिग्ध हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और इज़रायल का दृष्टिकोण ईरान की परमाणु क्षमताओं को सीमित करने पर केंद्रित रहा है, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के अधिकारों का सदैव पक्षकार  रहा है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांति और ऊर्जा के उद्देश्य से है, परंतु पश्चिमी देशों को इसमें संभावित सैन्य उपयोग की आशंका दिखाई देती है। यही अविश्वास शांति वार्ता को बार-बार विफल करता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका द्वारा ईरान के प्रस्तावों को अस्वीकार करना इस बात का संकेत है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद की खाई गहरी होती जा रही है। इज़रायल, जो पहले से ही ईरान को कई वर्षों से अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है, और उसके लिए यह लड़ाई अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी है और वह किसी भी प्रकार के समझौते को लेकर अत्यंत सावधान और अतिरिक्त सतर्क है। ऐसे में जब तीनों शक्तियाँ अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक अड़े हुए और अडिग हों, तो शांति का मार्ग और भी ना मुमकिन सा होता दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह तनाव आगे बढ़कर जैसा की युद्ध विश्लेषक आशंका जाता रहे हैं परमाणु संघर्ष में परिवर्तित होता है, तो इसके परिणाम न केवल अत्यंत भयानक तथा विनाशक होने की संभावना होगी बल्कि युद्ध क्षेत्र भी सीमित नहीं रहेंगे, पूरी दुनिया इसकी जद और बड़े प्रभाव में आ जाएगी। सबसे पहले असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तेल उत्पादक क्षेत्र होने के कारण पश्चिम एशिया में युद्ध छिड़ने से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा, जिससे महंगाई वैश्विक स्तर पर बेकाबू हो जाएगी। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, जहाँ पहले से ही आम जनता महंगाई के दबाव से जूझ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">महंगाई का सीधा असर आम जीवन पर पड़ता है।खाद्य पदार्थ, ईंधन, परिवहन, दवाइयाँ सभी की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। इससे निम्न और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होगा ह। रोजगार के अवसर कम हो जाते हैं, और आर्थिक असमानता बढ़ जाती है।स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी परमाणु युद्ध के दुष्परिणाम अत्यंत भयावह होंगे। परमाणु विस्फोट से निकलने वाला विकिरण  न केवल तत्काल जनहानि करता है, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाली बीमारियों को जन्म देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कैंसर, जन्मजात विकृतियाँ, मानसिक रोग ये सब ऐसे प्रभाव हैं जो दशकों तक मानवता को झेलने पड़ते हैं। पर्यावरण पर इसका असर भी विनाशकारी होता है,जल, वायु और मिट्टी सभी प्रदूषित हो जाते हैं, जिससे कृषि उत्पादन ठप हो सकता है और खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त, एक परमाणु युद्ध “न्यूक्लियर विंटर” जैसी स्थिति भी पैदा कर सकता है, जिसमें धूल और धुएँ के कारण सूर्य का प्रकाश धरती तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वैश्विक तापमान में भारी गिरावट आ सकती है। इसका परिणाम व्यापक अकाल और पारिस्थितिक असंतुलन के रूप में सामने आएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान स्थिति में सबसे अधिक आवश्यकता संयम, संवाद और विवेकपूर्ण नेतृत्व की है। विश्व शक्तियों को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है। कूटनीति की मेज पर बैठकर मतभेदों को सुलझाना ही एकमात्र स्थायी मार्ग है। अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज मानवता एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहाँ एक ओर शांति, सहयोग और विकास का मार्ग है, तो दूसरी ओर विनाश, अराजकता और अंधकार का। निर्णय विश्व नेताओं के हाथ में है, परंतु परिणाम पूरी मानवता को भुगतना होगा। इसलिए यह आवश्यक है कि शांति को प्राथमिकता दी जाए और विश्व को एक और महायुद्ध की विभीषिका से बचाया जाए।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 19:07:08 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ट्रंप का ऐलान- यूएस जल्द ही युद्ध से हट जाएगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका बहुत जल्द ईरान के खिलाफ चल रहे अपने सैन्य अभियान को खत्म कर सकता है। शायद दो से तीन हफ्तों के भीतर। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले एक महीने से चल रहा यह युद्ध पूरे मिडिल ईस्ट को हिला चुका है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि वॉल स्ट्रीट जनरल ने मंगलवार को ही यह खबर दे दी थी कि ट्रंप को उनके नज़दीकी सलाहकारों ने ईरान युद्ध से जल्द से जल्द बाहर निकलने की सलाह दी है। ट्रंप आज बुधवार</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174769/trumps-announcement-us-will-soon-withdraw-from-the-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/69cc4d63f2aff-donald-trump-announces-iran-war-end-314030551-16x9.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका बहुत जल्द ईरान के खिलाफ चल रहे अपने सैन्य अभियान को खत्म कर सकता है। शायद दो से तीन हफ्तों के भीतर। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले एक महीने से चल रहा यह युद्ध पूरे मिडिल ईस्ट को हिला चुका है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि वॉल स्ट्रीट जनरल ने मंगलवार को ही यह खबर दे दी थी कि ट्रंप को उनके नज़दीकी सलाहकारों ने ईरान युद्ध से जल्द से जल्द बाहर निकलने की सलाह दी है। ट्रंप आज बुधवार 1 अप्रैल को राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं, जिसमें वो सारी बातें साफ करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">व्हाइट हाउस में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, “हम बहुत जल्द वहां से निकल जाएंगे।” उन्होंने आगे जोड़ा कि यह वापसी “दो हफ्तों में, शायद दो या तीन हफ्तों में” हो सकती है। यह अब तक का उनका सबसे स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका इस सैन्य अभियान को समेटने की तैयारी कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप ने यह भी साफ कर दिया कि इस युद्ध को खत्म करने के लिए ईरान के साथ किसी कूटनीतिक समझौते की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, “ईरान को कोई डील करने की जरूरत नहीं है… उन्हें मेरे साथ कोई समझौता करने की आवश्यकता नहीं है।<strong>”</strong></p>
<p style="text-align:justify;">ईरान युद्ध में बुरी तरह फँसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब सहायता नहीं मिलने पर ब्रिटेन जैसे अपने सहयोगी देशों पर बौखला गए हैं। उनको धमकाते हुए उन्होंने चेताया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से तेल की कमी झेल रहे देशों के पास सिर्फ दो रास्ते हैं- या तो अमेरिका से तेल खरीदें, या खुद जाकर होर्मुज से तेल ले आएं।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने सीधे अपने सहयोगी देशों से साफ़-साफ़ कह दिया है कि अमेरिका हमेशा उनकी मदद नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि जो देश ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी अभियान में शामिल नहीं हुए, उन्हें अब खुद लड़ना सीखना होगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा,</p>
<p style="text-align:justify;">होर्मुज बंद होने से यूनाइटेड किंगडम जैसे जिन देशों को जेट फ्यूल नहीं मिल पा रहा है और जिसने ईरान के खिलाफ कार्रवाई में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है, उनको मेरी सलाह है- नंबर 1 – अमेरिका से खरीदो, हमारे पास बहुत है। नंबर 2 – थोड़ी हिम्मत जुटाओ, होर्मुज जाओ और बस ले लो।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आगे लिखा, 'तुम्हें अब खुद के लिए लड़ना सीखना होगा। अमेरिका अब तुम्हारी मदद नहीं करेगा, जैसा तुम हमारी मदद को नहीं आए थे। ईरान को क़रीब-क़रीब तबाह कर दिया गया है। मुश्किल काम हो गया। अब जाओ और अपना तेल खुद ले आओ!'</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सीमित सैन्य कार्रवाई की। इसके जवाब में ईरान ने दुनिया के सबसे अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज को ब्लॉक कर दिया। यह जलमार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन करता है। इस ब्लॉकेड से वैश्विक तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और 75 डॉलर प्रति बैरल से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं। कई देशों में जेट फ्यूल और पेट्रोल की कमी हो गई है। कहा जा रहा है कि अमेरिका पर भी इसका असर पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच ट्रंप ने पहले सहयोगी देशों से अपील की थी कि वे युद्धपोत भेजकर होर्मुज को सुरक्षित करें। लेकिन ब्रिटेन समेत बड़े मित्र देशों ने साफ़ इनकार कर दिया या ज़्यादा मदद नहीं की। अब ट्रंप नाराज़ हैं और कह रहे हैं कि अमेरिका अकेला सब नहीं संभालेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच ईरान की संसद की एक अहम समिति ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल यानी टैक्स लगाने का प्रस्ताव पास कर दिया है। यह टोल ईरान की अपनी मुद्रा रियाल में लिया जाएगा। योजना में अमेरिका और इसराइल से जुड़े जहाजों पर सख्त पाबंदी लगाई गई है। जो देश ईरान पर एकतरफा प्रतिबंध लगाते हैं, उनके जहाजों को भी रोकने की बात कही गई है। ईरान कह रहा है कि वह होर्मुज पर अपना संप्रभु अधिकार लागू कर रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:27:05 +0530</pubDate>
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                <title>तीन देशों का महायुद्ध और भारत के शांति प्रयासों की भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">युद्ध कभी भी किसी भी परिस्थिति में वैश्विक विकास के लिए एक बड़ा अवरोध ऐतिहासिक रूप से साबित हुआ है। युद्ध किसी भी बात का विकल्प नहीं है। युद्ध,हिंसा और संघर्ष प्राचीन काल से मानवीय सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हुए हैं। इतिहास गवाह है कि कई देशों को युद्ध और हिंसा ने ही भूगोल से अदृश्य कर दिया है। तीन देशों इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ा महायुद्ध आज केवल सीमाओं और सामरिक वर्चस्व का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह समूची मानव सभ्यता के संतुलन को डगमगाने वाला एक भयावह वैश्विक संकट बन चुका</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174143/the-great-war-of-the-three-nations-and-the-role"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">युद्ध कभी भी किसी भी परिस्थिति में वैश्विक विकास के लिए एक बड़ा अवरोध ऐतिहासिक रूप से साबित हुआ है। युद्ध किसी भी बात का विकल्प नहीं है। युद्ध,हिंसा और संघर्ष प्राचीन काल से मानवीय सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हुए हैं। इतिहास गवाह है कि कई देशों को युद्ध और हिंसा ने ही भूगोल से अदृश्य कर दिया है। तीन देशों इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ा महायुद्ध आज केवल सीमाओं और सामरिक वर्चस्व का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह समूची मानव सभ्यता के संतुलन को डगमगाने वाला एक भयावह वैश्विक संकट बन चुका है, इस युद्ध की जड़ें वर्षों से चले आ रहे वैचारिक मतभेदों, क्षेत्रीय प्रभुत्व की आकांक्षाओं और सामरिक गठबंधनों में छिपी रही हैं,</p><p style="text-align:justify;"> जो अब खुलकर एक भीषण सैन्य टकराव का रूप ले चुकी हैं, इज़रायल की आक्रामक सैन्य रणनीतियाँ, ईरान की जवाबी कार्रवाई और अमेरिका की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदारी ने इस संघर्ष को वैश्विक स्तर पर विस्तारित कर दिया है, इस महायुद्ध का सबसे अधिक दुष्प्रभाव मध्य पूर्व के देशों—इराक, सीरिया, लेबनान और यमन—पर पड़ रहा है जहाँ पहले से ही अस्थिरता और संघर्ष की स्थिति थी और अब यह युद्ध उनके लिए मानवीय संकट का रूप ले चुका है, इसके अतिरिक्त सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश भी सुरक्षा और आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं, जबकि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश महँगाई और आपूर्ति संकट से गहराई से प्रभावित हो रहे हैं, </p><p style="text-align:justify;">वैश्विक अर्थव्यवस्था इस संघर्ष के कारण गंभीर संकट में फँस गई है, कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल ने परिवहन, उद्योग और दैनिक जीवन को महँगा बना दिया है, खाद्यान्न संकट ने गरीब देशों में भूख और कुपोषण का खतरा बढ़ा दिया है, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, निवेशकों का विश्वास डगमगा रहा है और विश्व आर्थिक मंदी की आशंका गहराती जा रही है, जनजीवन पर इसका प्रभाव अत्यंत पीड़ादायक है,</p><p style="text-align:justify;"> युद्धग्रस्त क्षेत्रों में लोग अपने घरों से विस्थापित होकर शरणार्थी बनने को मजबूर हैं, लाखों बच्चों की शिक्षा बाधित हो चुकी है, अस्पतालों में संसाधनों की कमी ने जीवन को संकट में डाल दिया है, वहीं अन्य देशों में बेरोजगारी, महँगाई और मानसिक असुरक्षा का वातावरण गहराता जा रहा है, इस भीषण परिस्थिति में भारत ने शांति और संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं, भारत ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को अपनाते हुए संवाद और कूटनीति का मार्ग प्रशस्त किया है, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने लगातार युद्धविराम, शांतिपूर्ण समाधान और वार्ता की आवश्यकता पर बल दिया है, मानवीय सहायता के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुँचाने के प्रयास भी किए गए हैं और यह संदेश दिया गया है कि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता, </p><p style="text-align:justify;">भारत की यह संतुलित और दूरदर्शी नीति वैश्विक शांति के लिए एक सकारात्मक पहल के रूप में देखी जा रही है, आज जब पूरा विश्व इस महायुद्ध के दुष्परिणामों से जूझ रहा है तब यह आवश्यक हो जाता है कि सभी राष्ट्र अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर मानवता के व्यापक हित को प्राथमिकता दें और इज़रायल, ईरान तथा अमेरिका जैसे राष्ट्र संवाद, संयम और सहयोग का मार्ग अपनाएँ, क्योंकि अंततः युद्ध केवल विनाश, पीड़ा और असंतुलन की कहानी लिखता है, जबकि शांति ही वह मार्ग है जो विश्व को स्थिरता, समृद्धि और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 17:19:18 +0530</pubDate>
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                <title>बेगुनाह मासूम स्कूली बच्चियों के खून का कौन जिम्मेदार? </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में एक स्कूल में 165 बच्चियां क्लास पढ़ाई के लिए मौजूद थी लेकिन उन्हे इस बात का गुमान नही रहा होगा कि प्रभुत्व की सनक में दुनिया के कथित ताकतवर देश की अंधी मिसाइल उनके जीवन का खात्मा कर देंगी। स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अब पेंटागन की शुरुआती जांच रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि 28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में स्थित शजराह तैय्यबेह स्कूल पर हुआ हमला दरअसल अमेरिकी सेना की एक गंभीर गलती का नतीजा था. जांच के मुताबिक अमेरिकी सेना उस इलाके में एक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में एक स्कूल में 165 बच्चियां क्लास पढ़ाई के लिए मौजूद थी लेकिन उन्हे इस बात का गुमान नही रहा होगा कि प्रभुत्व की सनक में दुनिया के कथित ताकतवर देश की अंधी मिसाइल उनके जीवन का खात्मा कर देंगी। स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अब पेंटागन की शुरुआती जांच रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि 28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में स्थित शजराह तैय्यबेह स्कूल पर हुआ हमला दरअसल अमेरिकी सेना की एक गंभीर गलती का नतीजा था. जांच के मुताबिक अमेरिकी सेना उस इलाके में एक ईरानी नौसैनिक ठिकाने को निशाना बना रही थी. लेकिन टार्गेट तय करते समय पुराने और गलत टार्गेटिंग डेटा का इस्तेमाल किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी वजह से दागी गई टॉमहॉक क्रूज मिसाइल अपने असली लक्ष्य से भटक गई और सीधे स्कूल की इमारत से जा टकराई.माना जाता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एआइ ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में काम को काफी आसान बना कर अच्छा अनुभव दिया है। मैडिकल, लीगल और एजुकेशन जैसे सैक्टर्स में डाटा संग्रहण और त्वरित गणना की सुविधा से कई अच्छे कार्य हो रहे हैं   लेकिन इसी बीच ईरान युद्ध के दौरान अमरीका द्वारा किए गए ए. आई. के इस्तेमाल और इस निशाने में हुई चूक के कारण हुई स्कूली बच्चियों की मौत ने दुनिया में दहशत की इबारत लिख ममदी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शुरुआती जांच में माना गया है कि यह हमला जानबूझकर नहीं किया गया था, बल्कि खुफिया जानकारी और टार्गेटिंग सिस्टम में हुई चूक के कारण यह हादसा हुआ. इस घटना के बाद अमेरिकी सैन्य तंत्र के अंदर भी टार्गेटिंग प्रक्रिया और डेटा की सटीकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं. वहीं इस हमले को लेकर जो  खुलासा सामने आ रहा है उसमे गंभीर चूक का अनुमान है पुरानी इंटेलिजेंस की वजह से शायद अमेरिका ने ईरान के एक एलिमेंट्री स्कूल पर जानलेवा मिसाइल हमला किया, जिसमें लड़ाई के शुरुआती घंटों में 165 से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर बच्चे थे. स्कूल पर बमबारी और उसमें बच्चों की मौत युद्ध का मुख्य मुद्दा बन गई है. अगर यह कन्फर्म हो जाता है कि यह यूएस के हाथों हुआ था, तो यह पिछले दो दशकों में अमेरिकी मिलिट्री ऑपरेशन की वजह से हुई सबसे ज्यादा आम लोगों की मौत की घटनाओं में से एक होगी.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल अग्रणी ए.आई. कंपनी एंथ्रोपिक ने इस साल जनवरी ही में पेंटागन के उस अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया, जिसके तहत अमरीकी सेना को 'सभी वैध उद्देश्यों' के लिए उसकी तकनीक तक 'असीमित पहुंच' मिल जाती। अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए, एंथ्रोपिक के सी.ई.ओ. डारियो अमोदेई ने 2 स्पष्ट शर्तें रखीं-अमरीकियों की बड़े पैमाने पर जासूसी नहीं की जाएगी और मानवीय निगरानी के बिना पूरी तरह से स्वायत्त हथियारों का इस्तेमाल युद्ध में नहीं किया जाएगा!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस निर्णय से एंथ्रोपिक को भारी नुकसान हुआ, परन्तु प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने तुरंत पेंटागन के साथ मानव नियंत्रण के बिना पूर्ण ए.आई. नियंत्रण के लिए समझौता कर लिया। इस समझौते के बाद अमरीका और इसराईल ने ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू कर दिया। युद्ध के पहले ही दिन 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके 10 टॉप कमांडरों की हत्या उनके परिसर में कर दी गई, जिसे दोनों देशों ने ए.आई. पर्शियन हमले की एक बड़ी जीत माना।लेकिन उसी दिन, 28 फरवरी को, एक और घातक हमला मीनाब में स्थित शजराह तैयबा गर्ल्स स्कूल पर भी किया गया। 2 मिसाइलों ने 45 सैकेंड में स्कूल को नष्ट कर दिया था। मीनाब में जो हुआ, वह ए.आई. के अंधाधुंध उपयोग का सबसे भयावह उदाहरण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">'शजराह तैयबा' गर्ल्स प्राइमरी स्कूल, जिसमें 165 से अधिक मासूम बच्चियां मौत से लड़ती, चीखती-चिल्लाती रहीं, तकनीकी भाषा में इसे ' सटीक हमला' कहा गया। जबकि ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि लड़कियों के स्कूल पर ईरान ने टोमहॉक मिसाइल से हमला किया था, जबकि सभी जानते हैं कि ईरान के पास यह मिसाइल नहीं है, यहां तक कि इसराईल के पास भी नहीं है, इसलिए उनके द्वारा सोशल मीडिया पर फैलाए गए झूठ से सच को छिपाने का काम किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू में हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया, बाद में कहा कि उन्हें पक्का नहीं पता कि कौन दोषी है, और फिर कहा कि वह पेंटागन की जांच के नतीजों को मान लेंगे. यह हाल ही में यह मामला और ज्यादा पेचीदा हो गयी जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहली बार रिपोर्ट किया कि शुरुआती जांच में पाया गया कि यूएस जिम्मेदार है.  शुरुआती नतीजों के बाद पेंटागन से तुरंत और जानकारी मांगी गई. व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि जांच अभी भी चल रही है.   </div>
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<div style="text-align:justify;">28 फरवरी को शजारेह तैयबेह एलिमेंट्री स्कूल पर हुआ हमला, जो ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास के बेस के पास है. हमले के लिए अमेरिका की जिम्मेदारी की ओर इशारा करते हुए सबूत बढ़ रहे हैं. ऐसे कई संकेत हैं जिससे पता चलता है कि स्कूल पर हमला टाला जा सकता था. ये हमले 28 फरवरी की सुबह हुए थे. तब स्कूल की बिल्डिंग छोटे बच्चों से भरी हुई थी.  न्यूज रिपोर्ट से पता चलता है कि स्क और उसी दिन हमले वाले दूसरे टारगेट, हवा से दिखने वाली ऐसी खासियतें थीं जिनसे हमले से पहले उन्हें सिविलियन साइट के तौर पर पहचाना जा सकता था. इस हमले के वीडियो में एक्सपर्ट्स ने अमेरिका में बनी टॉमहॉक क्रूज मिसाइल को मिलिट्री कंपाउंड में टकराते हुए देखा जा सकता है. जबकि उस इलाके से पहले से ही धुआं उठ रहा था जहां स्कूल था. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पब्लिक में मौजूद सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि स्कूल बिल्डिंग लगभग 2017 तक मिलिट्री कंपाउंड का हिस्सा थी, जब दोनों को अलग करने के लिए एक नई दीवार बनाई गई। प्रॉपर्टी पर एक वॉचटावर भी हटा दिया गया था. उसी समय की तस्वीरों से पता चलता है कि बिल्डिंग के चारों ओर की दीवारों पर चमकीले रंगों, खासकर नीले और गुलाबी रंग के म्यूरल बनाए गए थे. ये इतने चमकीले थे कि वे स्पेस से भी दिखाई देते हैं. स्कूल को ऑनलाइन मैप पर साफ तौर पर लेबल किया गया था और इसकी एक आसानी से मिलने वाली वेबसाइट है जिसमें स्टूडेंट्स, टीचर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स के बारे में जानकारी भरी हुई है. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध को कंट्रोल करने वाला इंटरनेशनल कानून उन स्ट्रक्चर्स, गाड़ियों और लोगों पर हमले करने से रोकता है जो मिलिट्री के निशाने और लड़ाके नहीं हैं. आम लोगों के घर, स्कूल, मेडिकल और सामाजिक जगहें आम तौर पर मिलिट्री हमलों के लिए बंद रहती हैं.बताया जा रहा है कि यह सारा मामला एआइ की चूक से हुआ है दरअसल 10 साल पहले इस क्षेत्र पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आई.आर.जी.सी.) ईरानी सशस्त्र बलों का एक सैन्य परिसर था।लेकिन डाटाबेस अपडेट न होने के कारण ए.आई. को यह मालूम नहीं पड़ा कि अब उसी स्थान पर बाईं ओर एक अस्पताल और दाईं तरफ एक अलग प्रवेश द्वार वाला स्कूल मौजूद है।</div>
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<div style="text-align:justify;">ए.आई. एल्गोरिद्म यह भी समझने में नाकाम रहा कि 7 से 12 साल की बच्चियां 'दुश्मन' नहीं होतीं। एक मशीन के लिए वे केवल 'कोलेटरल डैमेज' थीं। यह घटना साबित करती है कि जब हम युद्ध का पूर्ण नियंत्रण ए. आई. को देते हैं, तो हम युद्ध के मैदान से 'दया' और 'विवेक' को पूरी तरह से खत्म कर देते हैं।ए.आई. आधारित व्यापक निगरानी हमारी मौलिक स्वतंत्रताओं के लिए गंभीर और नए प्रकार के खतरे पैदा कर सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">किंग्स कॉलेज लंदन की रिसर्च ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि उन्नत ए. आई. मॉडल्स युद्ध की स्थिति में 95 प्रतिशत बार परमाणु विकल्प या अत्यधिक आक्रामकता को चुनते हैं। मशीनों के लिए 'जीत' ही एकमात्र लक्ष्य है, चाहे उसकी कीमत पूरी दुनिया का विनाश ही क्यों न हो। अगर हम आज ए.आई. को रक्षा क्षेत्र और समाज में खुली छूट देते हैं, तो हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जहां युद्ध का फैसला जनरल नहीं, बल्कि एक कोडिंग प्रोग्राम करेगा। लोगों की सुरक्षा ए.आई. डाटा का विश्लेषण करेगा! लेकिन 'ट्रिगर' पर उंगली और समाज का नियंत्रण हमेशा एक इंसान का ही होना चाहिए। क्या विश्व में लोकतंत्र का झंडाबरदार अमेरिका 165 बेगुनाह बच्चियों के नृशंसता पूर्ण हत्या का गुनाह कबूल करेगा? क्या इन मासूमों की हत्या का कोई अनुतोष हो सकता है? क्या यह नपुंसकता किसी देश को ताकतवर करार दे सकती है?</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 19:52:47 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>युद्ध की विभीषिका से त्रासदीपूर्ण मानवीय जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">दुनिया में किसी भी देश के लिए चाहे वह सत्य के लिए लड़ रहा हो या असत्य के लिए लड़ रहा हो, युद्ध की विभीषिकाएँ कभी भी किसी भी देश के मानवीय जीवन के लिए वरदान साबित नहीं हुई हैं। धर्म और अधर्म के नाम पर दुनिया को महाभारत काल में रक्तरंजित कर लाखों शूरवीरों को लीलने वाला कौरव-पांडवों का दिल दहला देने वाला दारुण युद्ध दुनिया के देशों के सामने सबसे बड़ा उदाहरण है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आज एक बार फिर दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है। आज दुनिया का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173413/tragedy-of-human-life-due-to-the-horrors-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया में किसी भी देश के लिए चाहे वह सत्य के लिए लड़ रहा हो या असत्य के लिए लड़ रहा हो, युद्ध की विभीषिकाएँ कभी भी किसी भी देश के मानवीय जीवन के लिए वरदान साबित नहीं हुई हैं। धर्म और अधर्म के नाम पर दुनिया को महाभारत काल में रक्तरंजित कर लाखों शूरवीरों को लीलने वाला कौरव-पांडवों का दिल दहला देने वाला दारुण युद्ध दुनिया के देशों के सामने सबसे बड़ा उदाहरण है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आज एक बार फिर दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है। आज दुनिया का हर देश एक-दूसरे की संप्रभुता पर कब्जा कर अपना दबदबा कायम करना चाहता है। ऐसे में विश्व में चारों ओर युद्ध की स्थिति निर्मित हो चुकी है। दुनिया में रूस-यूक्रेन युद्ध वर्षों से बिना नतीजे के अब तक जारी है और हाल ही में डेढ़ सप्ताह से ईरान-इजराइल और अमेरिकी युद्ध छिड़ जाने से एक बार फिर तीसरे महायुद्ध के बादल मंडराने लग गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">युद्ध की विभीषिका से मध्य पूर्व के देशों की हालत बेहद खराब हो रही है। ईरान में कट्टरपंथी शासन का खात्मा आज का हर आधुनिक सोच का नागरिक चाहता है, लेकिन कट्टरपंथी ताकतों की जड़ें इतनी गहरी जमी हुई हैं कि उसे उखाड़ फेंकने में शूरवीरों और मासूम लोगों की जिंदगी दांव पर लग जाती है। मध्यपूर्व के खाड़ी देशों में तेल के असीम भंडार हैं। दुनिया के देशों की सर्वाधिक तेल आपूर्ति भी खाड़ी देशों से ही होती है। अमेरिका की शुरू से ही तेल भंडारों पर अपना कब्जा जमाए रखने की नीति रही है, इसलिए वह कई खाड़ी देशों में अपने धनबल और बाहुबल के आसरे तेल पर कब्जा किए हुए है । ईरान एक प्रमुख तेल उत्पादक देश होने के साथ समुद्री मार्ग से सटा हुआ है। वर्तमान में इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान के कट्टरपंथी शासन का अंत करने हेतु युद्ध का बिगुल फूंके हुए हैं, जिससे दुनिया भर के देशों में कच्चे तेल और गैस की कमी आना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">    बेशक भारत एक बहुत बड़ा देश है और ईरान युद्ध का भारत पर भी गैस और तेल को लेकर प्रभाव पड़ना सहज है। भारत सरकार द्वारा गैस और तेल की पर्याप्त व्यवस्था के बाद भी देशभर में गैस की किल्लत से जूझते लोग इस बात का प्रतीक हैं कि दूसरे देशों के युद्ध का असर कैसे दुनिया के अन्य देशों के जीवन को प्रभावित करता है। युद्ध की विभीषिका नैतिक पतन, अमानवीयता और अंधी सत्ता-लालसा से उत्पन्न घोर त्रासदीपूर्ण स्थिति होती है, जिसका भय वर्षों बाद भी लोगों के जेहन से जाता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">युद्ध न सिर्फ दो देशों या दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच लड़ा जाता है, बल्कि युद्ध में दोनों देशों के लोगों और उनकी संपत्ति का भी विनाश होता है। दो देशों के युद्ध की परिणति से कई देशों के आर्थिक-व्यापारिक रिश्तों के साथ मानवीय जनजीवन भी बुरी तरह से प्रभावित होता है। युद्ध तो कुछ दिनों या महीनों में समाप्त होकर रह जाएगा, लेकिन उसकी विभीषिका पूरी एक पीढ़ी के जहन में जीवनभर भयावह खौफ की तरह छाई रह जाती है। युद्ध की विभीषिकाओं से उभरने और सामान्य जीवन जीने में लोगों को पूरी एक जिंदगी लग जाती है। अतः युद्ध किसी भी समस्या का अंतिम हल नहीं है, इसलिए युद्ध को टालना ही आज दुनिया के देशों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।</p>
<p style="text-align:justify;" align="center"><strong>अरविंद रावल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 19:45:31 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिका-इस्राइल का साथ दिया तो माना जाएगा युद्ध की कार्रवाई, ईरान ने यूरोप को दी कड़ी चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ईरान ने यूरोपीय देशों को सीधी चेतावनी दी है। तेहरान ने साफ कहा है कि अगर यूरोप ने अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियान में किसी भी रूप में भाग लिया, तो इसे ईरान के खिलाफ युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में हमले और जवाबी कार्रवाई लगातार बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माइल बकाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ‘डिफेंसिव एक्शन’ के नाम पर भी अगर कोई देश अमेरिका-इस्राइल अभियान में शामिल होता है, तो उसे आक्रामकता माना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172564/if-america-supports-israel-it-will-be-considered-an-act"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/download1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ईरान ने यूरोपीय देशों को सीधी चेतावनी दी है। तेहरान ने साफ कहा है कि अगर यूरोप ने अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियान में किसी भी रूप में भाग लिया, तो इसे ईरान के खिलाफ युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में हमले और जवाबी कार्रवाई लगातार बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माइल बकाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ‘डिफेंसिव एक्शन’ के नाम पर भी अगर कोई देश अमेरिका-इस्राइल अभियान में शामिल होता है, तो उसे आक्रामकता माना जाएगा। उन्होंने कहा कि ईरान अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह प्रतिक्रिया जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को खत्म करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। ईरान ने इसे सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने की तैयारी बताया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने स्पष्ट किया है कि वे सीधे युद्ध में शामिल नहीं हैं। हालांकि उन्होंने यह संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकती है। यूरोपीय संघ ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटेन ने अमेरिकी बलों को अपने बेस इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। वहीं फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा है कि यदि सहयोगी देश मदद मांगते हैं, तो फ्रांस उनकी रक्षा करेगा। उन्होंने कहा कि फ्रांस अपने नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देगा।</p>
<p style="text-align:justify;">फ्रांस ने बताया कि प्रभावित देशों में लगभग चार लाख फ्रांसीसी नागरिक मौजूद हैं। हालात बिगड़ने पर उन्हें वाणिज्यिक और सैन्य उड़ानों के जरिए निकाला जा सकता है। इसी बीच क्षेत्र में हमलों का सिलसिला जारी है और रियाद में अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमले से तनाव और बढ़ गया है। ईरान का कहना है कि वह किसी भी बाहरी दखल को स्वीकार नहीं करेगा। यूरोप की संभावित भूमिका को लेकर आने वाले दिनों में हालात और स्पष्ट हो सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:28:51 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ईरान पर हमले तेज होंगे, ‘बड़ी लहर आनी बाकी’ – ट्रंप की नई चेतावनी; इस्फहान न्यूक्लियर साइट पर धमाके</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> अमेरिका के राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> ने कहा है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई अभी और तेज हो सकती है और “बड़ी लहर आनी बाकी है।” एक इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सेना चार से पांच सप्ताह तक अभियान जारी रख सकती है। इसी बीच ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु ठिकाने पर नए धमाकों की खबरें सामने आई हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘तीव्रता बनाए रखना मुश्किल नहीं’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के लिए लड़ाई की तीव्रता बनाए रखना कठिन नहीं होगा। उनका दावा है कि लक्ष्य ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172291/attacks-on-iran-will-intensify-big-wave-yet-to-come"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/4a8d6460-fcf6-11f0-9c55-8bade468c676.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> अमेरिका के राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> ने कहा है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई अभी और तेज हो सकती है और “बड़ी लहर आनी बाकी है।” एक इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सेना चार से पांच सप्ताह तक अभियान जारी रख सकती है। इसी बीच ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु ठिकाने पर नए धमाकों की खबरें सामने आई हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘तीव्रता बनाए रखना मुश्किल नहीं’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के लिए लड़ाई की तीव्रता बनाए रखना कठिन नहीं होगा। उनका दावा है कि लक्ष्य ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह निष्क्रिय करना है। हालांकि, उन्होंने सैन्य रणनीति के विस्तृत विवरण साझा नहीं किए।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>शासन परिवर्तन पर विरोधाभासी संकेत</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर ट्रंप के बयान अलग-अलग संकेत देते नजर आए। एक ओर उन्होंने उम्मीद जताई कि ईरान के विशेष सैन्य बल, जिनमें <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Islamic Revolutionary Guard Corps</span></span> के अधिकारी शामिल हैं, अंततः जनता के सामने हथियार डाल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, उन्होंने वेनेजुएला का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अपनाया गया मॉडल “आदर्श परिदृश्य” था। उन्होंने <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Nicolás Maduro</span></span> का जिक्र करते हुए दावा किया कि उस समय उन्होंने विशेष बलों को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। हालांकि, ईरान में सर्वोच्च नेतृत्व को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि उनके पास “तीन अच्छे विकल्प” हैं, लेकिन फिलहाल उनका खुलासा नहीं करेंगे।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘फैसला ईरानी जनता पर’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने यह भी कहा कि मौजूदा सरकार को हटाने का फैसला अंततः ईरानी जनता पर निर्भर करेगा। उनके मुताबिक, “वे वर्षों से बदलाव की बात कर रहे हैं, अब उन्हें अवसर मिलेगा।” यह बयान उनके पहले दिए गए वेनेजुएला मॉडल के संकेत से अलग माना जा रहा है।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>सार्वजनिक मंच से दूरी, सोशल मीडिया पर घोषणाएं</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई से जुड़ी जानकारी मुख्य रूप से इंटरनेट मीडिया के जरिए साझा की है। तड़के जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने बड़े सैन्य हमले की घोषणा की। इसके बाद भी उनकी टिप्पणियां वीडियो संदेशों और चुनिंदा पत्रकारों से बातचीत तक सीमित रहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट्स के मुताबिक, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Ali Khamenei</span></span> को लेकर आई खबरों पर भी उन्होंने कोई औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। बताया गया कि वह पाम बीच स्थित अपने निजी क्लब <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Mar-a-Lago</span></span> में मौजूद थे और वहीं सीमित दायरे में जानकारी साझा की।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>रणनीति और पारदर्शिता पर सवाल</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">हमले से पहले भी ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से विस्तृत रणनीतिक तर्क पेश नहीं किए थे। अब लगातार सोशल मीडिया के माध्यम से की जा रही घोषणाओं के चलते उनकी रणनीति और पारदर्शिता को लेकर विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में आगे बढ़ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 21:49:45 +0530</pubDate>
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