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                <title>International Politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>पश्चिम एशिया का संघर्ष और युद्धविराम की शर्तें</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174234/the-conflict-in-west-asia-and-the-terms-of-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260325_174829.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात प्रमुख रूप से सामने आती है। यह मांग नई नहीं है। लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा मानते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में ईरान के कार्यक्रम को सीमित करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है। पहली नजर में यह मांग तर्कसंगत लग सकती है, क्योंकि परमाणु हथियारों का प्रसार किसी भी क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, ईरान का तर्क है कि उसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। यदि अन्य देशों के पास मिसाइल और रक्षा प्रणाली है, तो केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाना क्या न्यायसंगत कहा जा सकता है?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से इस विवाद का मूल प्रश्न उठता है—क्या वैश्विक नियम सभी देशों पर समान रूप से लागू होते हैं या शक्तिशाली देशों के हितों के अनुसार तय किए जाते हैं? ईरान की नजर में अमेरिकी प्रस्ताव एकतरफा है, जिसमें उसे अपनी सामरिक ताकत छोड़ने के लिए कहा जा रहा है, जबकि बदले में केवल प्रतिबंधों में राहत और कुछ आर्थिक सहयोग का वादा किया जा रहा है। यह सौदा ईरान के लिए असंतुलित प्रतीत होता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी तरफ, ईरान की शर्तें भी कम कठोर नहीं हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की मांग इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। यदि इस पर किसी एक देश का प्रभुत्व मान लिया जाए, तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ईरान की यह मांग कई देशों के लिए स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की मांग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। किसी भी युद्ध में नागरिकों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान होता है, और अंतरराष्ट्रीय कानून भी यह मानता है कि आक्रामक पक्ष को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन यहां समस्या यह है कि दोनों पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को आक्रामक बताते हैं। ऐसे में मुआवजे का निर्धारण एक जटिल और विवादास्पद प्रक्रिया बन जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की यह शर्त कि भविष्य में उस पर फिर से युद्ध न थोपा जाए, सैद्धांतिक रूप से उचित लगती है। हर देश अपनी सुरक्षा और स्थिरता चाहता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी गारंटी देना लगभग असंभव होता है। इतिहास गवाह है कि समझौतों और संधियों के बावजूद युद्ध होते रहे हैं। इसलिए यह मांग व्यावहारिक कम और आदर्शवादी अधिक प्रतीत होती है।इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—विश्व राजनीति का शक्ति संतुलन। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने और अपने सहयोगियों के हितों की रक्षा करे। वहीं ईरान जैसे देश के लिए अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि दोनों पक्षों की शर्तें अपने-अपने दृष्टिकोण से सही लगती हैं, लेकिन एक-दूसरे के लिए अस्वीकार्य बन जाती हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो दोनों पक्षों की शर्तों में कुछ उचित तत्व हैं और कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण भी। अमेरिका की यह मांग कि ईरान अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे, एकतरफा दबाव की तरह दिखती है। वहीं ईरान की यह जिद कि उसे होर्मुज पर पूर्ण अधिकार दिया जाए, वैश्विक संतुलन के लिए खतरा बन सकती है। इसी तरह मुआवजे और भविष्य में युद्ध न होने की गारंटी जैसी शर्तें नैतिक रूप से सही होते हुए भी व्यावहारिक कठिनाइयों से भरी हैं।</div><div style="text-align:justify;">वास्तविक समाधान इन चरम स्थितियों के बीच कहीं छिपा हुआ है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> किसी भी स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष कुछ समझौते करें। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे पारदर्शी और सीमित करने पर सहमत हो सकता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी उसे सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की ठोस गारंटी दे सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए बहुपक्षीय नियंत्रण या अंतरराष्ट्रीय निगरानी एक बेहतर विकल्प हो सकता है, जिससे किसी एक देश का प्रभुत्व स्थापित न हो।</div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि युद्धविराम की वर्तमान शर्तें न पूरी तरह सही हैं और न पूरी तरह गलत। वे दोनों पक्षों की रणनीतिक सोच और राष्ट्रीय हितों का प्रतिबिंब हैं। लेकिन यदि इन शर्तों पर जिद बनी रही, तो शांति की संभावना कमजोर होती जाएगी। इतिहास यही सिखाता है कि युद्ध का अंत केवल शक्ति से नहीं, बल्कि समझदारी और संतुलित समझौतों से होता है। पश्चिम एशिया में स्थायी शांति तभी संभव है जब दोनों पक्ष अपने अधिकतम लाभ के बजाय साझा हितों को प्राथमिकता दें।</div><div style="text-align:justify;">*कांतिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 19:01:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>विश्व युद्ध की आहट और मानवता के सामने खड़ा विनाश का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां शक्ति प्रदर्शन और प्रतिशोध की राजनीति मानवता के भविष्य पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहा बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। जिस तरह से एक के बाद एक मिसाइल हमले ड्रोन हमले और बमबारी हो रही है उससे यह आशंका गहराने लगी है कि कहीं यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप न ले ले। युद्ध का इतिहास हमेशा यही बताता है कि इसकी आग में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172607/the-sound-of-world-war-and-the-crisis-of-destruction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/644bb59398ef7.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां शक्ति प्रदर्शन और प्रतिशोध की राजनीति मानवता के भविष्य पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहा बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। जिस तरह से एक के बाद एक मिसाइल हमले ड्रोन हमले और बमबारी हो रही है उससे यह आशंका गहराने लगी है कि कहीं यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप न ले ले। युद्ध का इतिहास हमेशा यही बताता है कि इसकी आग में केवल सैनिक ही नहीं बल्कि आम नागरिक भी झुलसते हैं और सभ्यता को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल के दिनों में समुद्र और आसमान दोनों ही युद्ध के मैदान बन गए हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। युद्धपोतों पर हमले तेल टैंकरों को निशाना बनाना और बड़े शहरों पर बमबारी यह संकेत देते हैं कि स्थिति लगातार खतरनाक होती जा रही है। इन हमलों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है और हजारों लोग घायल हो चुके हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि इन संघर्षों में मरने वाले अधिकांश लोग वे होते हैं जिनका युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं होता। वे केवल आम नागरिक होते हैं जो शांति से अपना जीवन जीना चाहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध केवल मानव जीवन को ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है। जब बड़े देश युद्ध में उलझते हैं तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। व्यापार रुक जाता है तेल और ऊर्जा की कीमतें बढ़ जाती हैं और वैश्विक बाजार अस्थिर हो जाते हैं। वर्तमान संघर्ष में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। फारस की खाड़ी और मध्य पूर्व का क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा स्रोतों में से एक है। यदि यहां युद्ध लंबा चलता है तो तेल की आपूर्ति प्रभावित होगी और इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। यदि युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ती हैं या आपूर्ति बाधित होती है तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ेंगी जिससे परिवहन महंगा होगा और इसका प्रभाव आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाएगी और विकास की गति प्रभावित हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा मध्य पूर्व के देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। ये लोग वहां से अपने परिवारों के लिए पैसा भेजते हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि युद्ध की स्थिति गंभीर हो जाती है तो इन भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। कई बार ऐसे हालात में लोगों को अपने काम छोड़कर वापस लौटना पड़ता है जिससे उनके परिवारों पर आर्थिक संकट आ सकता है। इसलिए भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए शांति की दिशा में योगदान दे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध का एक और गंभीर प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। जब तेल टैंकरों पर हमले होते हैं या समुद्र में तेल का रिसाव होता है तो समुद्री जीवन को भारी नुकसान पहुंचता है। समुद्र में रहने वाले जीवों की बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गहरा आघात पहुंचता है। इसके अलावा बमबारी और मिसाइल हमलों से शहरों का बुनियादी ढांचा नष्ट हो जाता है। अस्पताल स्कूल सड़कें और घर तबाह हो जाते हैं। इन सबको दोबारा बनाने में वर्षों लग जाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। पहले और दूसरे विश्व युद्ध ने पूरी मानवता को विनाश का भयावह अनुभव कराया था। करोड़ों लोग मारे गए और कई देशों की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई। उसके बाद ही दुनिया ने शांति और सहयोग के महत्व को समझा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का गठन किया गया ताकि ऐसे संघर्षों को रोका जा सके। लेकिन आज भी जब बड़े देश शक्ति प्रदर्शन में लगे रहते हैं तो ऐसा लगता है कि इतिहास से सबक पूरी तरह नहीं लिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के कई देश इस समय शांति की अपील कर रहे हैं। भारत भी लगातार यह कहता रहा है कि किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से ही संभव है। यदि सभी देश संयम और धैर्य का परिचय दें तो टकराव को कम किया जा सकता है। कूटनीतिक वार्ता के माध्यम से विवादों को सुलझाना ही सभ्य और जिम्मेदार समाज की पहचान है।</div>
<div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी जिम्मेदारी को समझें। शक्ति का उपयोग विनाश के लिए नहीं बल्कि शांति और स्थिरता के लिए होना चाहिए। यदि युद्ध की आग और फैलती है तो इसका परिणाम केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। ऐसे में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह संघर्ष तीसरे विश्व युद्ध की दिशा में कदम न बन जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मानवता का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब देश आपसी मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने का रास्ता अपनाएं। युद्ध केवल विनाश को जन्म देता है जबकि शांति विकास और समृद्धि का मार्ग खोलती है। इसलिए समय की मांग है कि सभी देश संयम बरतें और युद्ध के बजाय शांति और सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाएं। यही मानवता के हित में होगा और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और बेहतर दुनिया की नींव रखेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 18:59:59 +0530</pubDate>
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                <title>खामनेई की मौत पर छाती पीटने वाले, निर्दोष भारतीयों की मौत पर मौन क्यों थे?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अयातुल्ला अली खामनेई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की मृत्यु के बाद भारत सहित अनेक देशों में उनके समर्थकों द्वारा छाती पीट-पीटकर मातम मनाया जा रहा है और</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजराइल</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की आलोचना की जा रही है। किंतु प्रश्न यह है कि युद्ध हो या आतंकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके घाव सदैव गहरे और त्रासद होते हैं। उनकी टीस लंबे समय तक जनमानस को व्यथित करती रहती है । ईरान के सुप्रीम लीडर के रूप में लगभग </span>36 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों तक सत्ता में रहे खामनेई के शासनकाल में कितने निर्दोष लोगों ने दमन और कठोर नीतियों का सामना</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172344/why-those-who-beat-their-chest-on-khameneis-death-were"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/खामनेई-की-मौत-पर-छाती-पीटने-वाले,-निर्दोष-भारतीयों-की-मौत-पर-मौन-क्यों-थे.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अयातुल्ला अली खामनेई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की मृत्यु के बाद भारत सहित अनेक देशों में उनके समर्थकों द्वारा छाती पीट-पीटकर मातम मनाया जा रहा है और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजराइल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की आलोचना की जा रही है। किंतु प्रश्न यह है कि युद्ध हो या आतंकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके घाव सदैव गहरे और त्रासद होते हैं। उनकी टीस लंबे समय तक जनमानस को व्यथित करती रहती है । ईरान के सुप्रीम लीडर के रूप में लगभग </span>36 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों तक सत्ता में रहे खामनेई के शासनकाल में कितने निर्दोष लोगों ने दमन और कठोर नीतियों का सामना किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह किसी से छिपा नहीं है। क्या मातम मनाने वाले उनके समर्थकों को यह स्मरण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जब किसी देश के नागरिक स्वयं अपने सर्वोच्च नेता की मृत्यु पर सड़कों पर उतरकर जश्न मनाते दिखाई दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह शासन और जनता के बीच गहरे असंतोष का संकेत देता है। ऐसे में भारत में शोक प्रकट करने वाले लोग आखिर किस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरानी सुप्रीम खामनेई पर आरोप रहे कि उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगाए । हिजाब को अनिवार्य करना और इस्लामी नियमों की कठोर व्याख्या के आधार पर सामाजिक जीवन को नियंत्रित करना उनकी नीतियों का हिस्सा रहा । आधुनिक युग में जब ईरान की महिलाओं और युवाओं ने स्वतंत्रता तथा समान अधिकारों की मांग उठाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से दबाया गया। अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन कार्रवाइयों की आलोचना की है । यह भी विचारणीय है कि जब भारत में आतंकी हमलों में निर्दोष नागरिक मारे गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब क्या इन शोक प्रकट करने वालों ने उतनी ही तीव्रता से संवेदना व्यक्त की </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम सचमुच मानवीय मूल्यों के पक्षधर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारी संवेदनाएं चयनात्मक नहीं होनी चाहिए । हिंसा चाहे कहीं भी हो ईरान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में या भारत में उसकी समान रूप से निंदा होनी चाहिए ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते । कभी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के संबंध सामान्य थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु वैचारिक टकराव और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें कट्टर विरोधी बना दिया। मध्य-पूर्व के कई देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहरीन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुवैत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भी इस तनावपूर्ण वातावरण से प्रभावित रहे हैं । निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी युद्ध की विभीषिका अत्यंत भयावह होती है। हुक्मरानों के अहंकार की कीमत अंततः आम नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों और सैनिकों को ही चुकानी पड़ती है। अतः किसी भी शासक की मृत्यु पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देने से पूर्व उसके शासनकाल का समग्र और निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है । यदि हम वास्तव में मानवता के पक्षधर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें हर निर्दोष की पीड़ा पर समान रूप से संवेदनशील होना चाहिए चाहे वह किसी भी देश या धर्म का क्यों न हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:28:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>मिडिल ईस्ट में भड़की भीषण जंग: ईरान-इजराइल टकराव से हिलती दुनिया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां क्षेत्रीय संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है। ईरान और इजराइल के बीच शुरू हुई सीधी सैन्य टकराहट अब सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका प्रभाव खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका तक फैल चुका है। बगदाद, तेहरान, दुबई, बेरूत और मनामा जैसे शहरों में हमले और जवाबी हमले इस बात का संकेत हैं कि यह संघर्ष अब केवल दो देशों का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास तेल टैंकरों पर हमले और शिपिंग कंपनियों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172193/fierce-war-erupts-in-middle-east-world-shaken-by-iran-israel"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां क्षेत्रीय संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है। ईरान और इजराइल के बीच शुरू हुई सीधी सैन्य टकराहट अब सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका प्रभाव खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका तक फैल चुका है। बगदाद, तेहरान, दुबई, बेरूत और मनामा जैसे शहरों में हमले और जवाबी हमले इस बात का संकेत हैं कि यह संघर्ष अब केवल दो देशों का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास तेल टैंकरों पर हमले और शिपिंग कंपनियों द्वारा मार्ग रोकने के फैसले ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर कर दिया है। यह जलमार्ग दुनिया की तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा वहन करता है। जैसे ही यहां खतरा बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें उछल गईं। ऊर्जा संकट की आशंका ने एशिया और यूरोप के शेयर बाजारों को झटका दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ी है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंदी का खतरा फिर मंडराने लगा है। कोविड-19 महामारी के बाद जो आर्थिक सुधार धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा था, वह इस युद्ध की आग में फिर से कमजोर पड़ सकता है।हवाई यातायात पर इसका असर अभूतपूर्व है। हजारों उड़ानें रद्द हो चुकी हैं और मिडिल ईस्ट के प्रमुख एयरपोर्ट अस्थायी रूप से बंद हैं। दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय ट्रांजिट हब का बंद होना वैश्विक कनेक्टिविटी के लिए बड़ा झटका है। लाखों यात्री अलग-अलग देशों में फंसे हुए हैं। एयरलाइंस कंपनियों के शेयर गिर रहे हैं और बीमा कंपनियों का जोखिम बढ़ गया है। यदि संघर्ष लंबा चला तो अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और व्यापार दोनों को गहरा नुकसान होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस युद्ध का राजनीतिक असर भी व्यापक है। खाड़ी देशों ने संयुक्त बयान जारी कर हमलों की निंदा की है, वहीं पश्चिमी शक्तियां अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सतर्क हैं। क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने से तनाव और बढ़ गया है। लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह की भागीदारी ने संघर्ष को बहु-पक्षीय बना दिया है। यदि यह टकराव सीरिया, इराक या यमन के मोर्चों तक फैलता है तो यह व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसके परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने पड़ेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे चिंताजनक पहलू मानवीय संकट है। रिहायशी इलाकों पर हमलों, स्कूलों और सार्वजनिक ढांचों को नुकसान पहुंचने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर दिया है। हजारों लोग विस्थापित हो रहे हैं। यदि हालात नहीं सुधरे तो शरणार्थियों की नई लहर यूरोप और पड़ोसी देशों की ओर बढ़ सकती है। इससे सामाजिक और राजनीतिक तनाव और गहरा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत के संदर्भ में यह संकट कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते का घाटा गहराएगा और महंगाई पर दबाव बढ़ेगा। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर सीधे आम जनता और उद्योगों पर पड़ेगा। परिवहन महंगा होगा और वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय प्रवासी समुदाय भी बड़ी चिंता का विषय है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि संघर्ष तेज होता है और सुरक्षा स्थिति बिगड़ती है, तो उनकी सुरक्षा, रोजगार और स्वदेश वापसी जैसे प्रश्न सामने आएंगे। भारत सरकार को संभावित निकासी अभियान की तैयारी रखनी होगी, जैसा पहले यमन और कुवैत संकट के दौरान किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">व्यापारिक दृष्टि से भी असर स्पष्ट है। खाड़ी क्षेत्र भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। समुद्री मार्गों में व्यवधान से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी। निर्यात-आयात में देरी और लागत बढ़ने की संभावना है। भारतीय शेयर बाजार भी वैश्विक रुझानों से अछूते नहीं रहेंगे। विदेशी निवेशकों का रुख सतर्क हो सकता है, जिससे पूंजी प्रवाह प्रभावित होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कूटनीतिक स्तर पर भारत के लिए संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण होगा। भारत के इजराइल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में सहयोग रहा है। ऐसे में खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करना भारत की दीर्घकालिक रणनीति के अनुरूप नहीं होगा। भारत को शांति, संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता की वकालत करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस युद्ध का वैश्विक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि महाशक्तियां सीधे टकराव में उतरती हैं तो यह नई ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों की भूमिका की परीक्षा होगी। अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा जैसे सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास बताता है कि मिडिल ईस्ट में भड़की आग अक्सर सीमाओं में नहीं बंधती। ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और मानवीय आयामों से जुड़ा यह क्षेत्र वैश्विक संतुलन का महत्वपूर्ण केंद्र है। ईरान-इजराइल संघर्ष यदि जल्द नहीं थमा, तो इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था, राजनीति और सामाजिक स्थिरता पर दूरगामी होगा। भारत जैसे उभरते राष्ट्र के लिए यह समय सतर्क कूटनीति, आर्थिक प्रबंधन और मानवीय संवेदनशीलता का है। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास युद्ध की इस लपट को रोक पाएंगे या यह संघर्ष वैश्विक संकट का नया अध्याय लिखेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 18:30:37 +0530</pubDate>
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