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                <title>भारतीय समाज - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>देश की भावी पीढ़ी को नशे से बचाना है तो - सरकार और समाज साथ आएँ</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया में कोई भी व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह किसी भी जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहब या धर्म का हो अथवा कितना भी दुर्दांत और कुख्यात अपराधी क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी यह नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे नशीले पदार्थों का सेवन करें या अपराध की दुनिया में कदम रखें। हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तम शिक्षा और सुरक्षित भविष्य देने का सपना देखते हैं। विडंबना यह है कि मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त लोग भी अपने बच्चों को नशे से कोसों दूर रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दूसरों के बच्चों को नशे की गिरफ्त में धकेल कर अपने परिवार</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183687/if-we-want-to-save-the-future-generation-of-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/nasha.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया में कोई भी व्यक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह किसी भी जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहब या धर्म का हो अथवा कितना भी दुर्दांत और कुख्यात अपराधी क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी यह नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे नशीले पदार्थों का सेवन करें या अपराध की दुनिया में कदम रखें। हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तम शिक्षा और सुरक्षित भविष्य देने का सपना देखते हैं। विडंबना यह है कि मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त लोग भी अपने बच्चों को नशे से कोसों दूर रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दूसरों के बच्चों को नशे की गिरफ्त में धकेल कर अपने परिवार का भविष्य संवारने का प्रयास करते हैं। यह सामाजिक और नैतिक पतन का सबसे भयावह स्वरूप है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि कोई भी युद्ध हो या सामाजिक अभियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनभागीदारी के बिना उसकी सफलता अधूरी रहती है। सरकारें चाहे कितने ही प्रयास कर लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि समाज स्वयं जिम्मेदारी नहीं निभाता तो ऐसे अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। यही स्थिति देश में नशा मुक्ति अभियान की भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र और राज्य सरकारें वर्षों से युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए जागरूकता अभियान चला रही हैं। समय समय पर कानूनों को सख्त किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई होती है और जनजागरण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद भारत में मादक पदार्थों का अवैध कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। यह हमारे सुरक्षा तंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी तीनों के लिए गंभीर चुनौती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि नशे की समस्या अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही। यह छोटे शहरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बों और दूरदराज के ग्रामीण अंचलों तक अपने पैर पसार चुकी है। नशे का यह मकड़जाल देश की युवा पीढ़ी को तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अत्यंत चिंताजनक है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो इसके दूरगामी दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारें हर वर्ष अपनी क्षमता के अनुसार नशा मुक्ति के लिए अभियान चलाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सामाजिक भागीदारी और राजनीतिक एकजुटता के अभाव में इन प्रयासों का अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाता। नशे का कारोबार किसी भी देश के लिए आतंकवाद से कम खतरनाक नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आतंकवाद सीमित समय और क्षेत्र में नुकसान पहुंचाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि नशा धीरे धीरे पूरी पीढ़ी को भीतर से खोखला कर देता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वास्तव में भारत को नशामुक्त बनाना है तो केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ सभी धर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक संगठनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैक्षणिक संस्थानों और जागरूक नागरिकों को भी आगे आना होगा। प्रत्येक समाज को अपने बीच छिपे उन लोगों की पहचान करनी होगी जो मादक पदार्थों के अवैध कारोबार में संलिप्त हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी छिपे नशा बेचते हैं या ऐसे अपराधियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। जब तक समाज स्वयं ऐसे तत्वों को बेनकाब कर उनका सामाजिक बहिष्कार नहीं करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक कोई भी सरकार इस अवैध कारोबार को स्थायी रूप से समाप्त नहीं कर सकती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता केवल सरकारी कार्रवाई की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक जागरण की है। अभिभावकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक नेताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक संस्थाओं और युवाओं को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ नशे के प्रति घृणा और स्वस्थ जीवन के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो। यही वह सामूहिक शक्ति है जो नशे के नेटवर्क को कमजोर कर सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की भावी पीढ़ी को नशे से बचाना केवल सरकार का दायित्व नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे समाज का नैतिक कर्तव्य है। यदि सरकार और समाज कंधे से कंधा मिलाकर इस अभियान को जन आंदोलन का स्वरूप दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य दे सकेंगे और एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्त तथा नशा मुक्त भारत का निर्माण कर पाएँगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 22:52:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारत में कभी शाश्वत नहीं रही अस्पृश्यता</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान भारत में अस्पृश्यता को लेकर कई प्रकार के विमर्श चल रहे हैं। एक विमर्श यह है कि भारत में उच्च वर्ग के लोगों ने निम्न वर्ग के साथ भेद - भाव किया। उन्हें पानी पीने, शिक्षा प्राप्त करने एवं समान व्यवहार के लिए वंचित किया गया। यह विमर्श सर्वथा झूठ और मन गठन्त कहानी और कुंठा से भरा हुआ है। सच तो यह है कि इस प्रकार की उच्च जाति व निम्न जाति का विषय भारत के लोगों द्वारा नहीं अपितु भारत में लम्बे समय तक हुए बाह्य आक्रमणों मुगलों व अंग्रेजों की देन है। जो कभी स्थाई नहीं</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176707/untouchability-was-never-eternal-in-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/2ee40841-4d6e-496d-82df-6845b6d5f3f2_202302072115301682_h@@ight_820_w@@idth_1280.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान भारत में अस्पृश्यता को लेकर कई प्रकार के विमर्श चल रहे हैं। एक विमर्श यह है कि भारत में उच्च वर्ग के लोगों ने निम्न वर्ग के साथ भेद - भाव किया। उन्हें पानी पीने, शिक्षा प्राप्त करने एवं समान व्यवहार के लिए वंचित किया गया। यह विमर्श सर्वथा झूठ और मन गठन्त कहानी और कुंठा से भरा हुआ है। सच तो यह है कि इस प्रकार की उच्च जाति व निम्न जाति का विषय भारत के लोगों द्वारा नहीं अपितु भारत में लम्बे समय तक हुए बाह्य आक्रमणों मुगलों व अंग्रेजों की देन है। जो कभी स्थाई नहीं रही। प्राचीन भारत में कभी जाति वैमनस्यता, घृणा, ऊंच नीच का भाव जनमानस में नहीं था। इसके उदाहरण हम आज भी अपने घरों में देखते है।</p><p style="text-align:justify;"> जैसे जब हमारे घरों में वैदिक परंपरा से विवाह होता है तब उस विवाह को संपन्न कराने के लिए सर्व समाज जाति बिरादरी के लोगों का कार्य होता है उनके भाग के बिना विवाह के सारे कार्यक्रम सम्पन्न होना संभव ही नहीं। इसमें किसी भी प्रकार का कोई भेद भाव नहीं है। वहीं यदि सतयुग की बात करते हैं तो राजा हरिश्चंद्र आते हैं जो डोम के यहां नौकरी करते हैं कोई भेद भाव नहीं है। राजा बलि और भगवान वामन देव का उदाहरण कोई भेद नहीं है। इसी प्रकार त्रेता युग में भगवान श्रीराम के जीवन से स्पष्ट होता है कि समाज कितना एक रस था। </p><p style="text-align:justify;">भीलनी के झूठे बेर खाने का प्रसंग, वनवासियों के साथ संगठन कर लंका विजय का प्रसंग, निषादराज को गले लगाना "तुम मोहि प्रिय भरतहीं सम भाई" इत्यादि अनेकों उदाहरण समाज को एक साथ बिना किसी भेद के दर्शाते हैं। द्वापर में जब हम बात करते हैं तब भी समाज में कोई जातीय वैमनस्य अस्पृश्यता नहीं है भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएं सारे भेदों से परे हैं। पांडवों का अज्ञातवास के समय अनेकों ऐसी घटनाएं मिलती है जहां कोई भेद भाव नहीं है। भीम और हिडम्बा का विवाह, राजा शांतनु का विवाह, विदुर के यहां भगवान का भोजन इत्यादि। </p><p style="text-align:justify;">महाभारत में बहुत सारे सहज समरसता के विषय मिल जाएंगे जो समाज में एकाकार को दर्शाते हैं अब हम कलियुग की बात करते हैं यहां भी कोई जातीय वैमनस्य नहीं है। मध्यकाल में भारत में हुए आक्रमणों से हिन्दू समाज में कुछ विकृतियां आई लेकिन कभी शाश्वत नहीं रही उन्हें दूर करने के लिए भारत में अनेकों संत, महात्माओं, मनीषियों, महापुरुषों ने समय समय पर समाज को दिशा प्रदान कर अभियान चलाया है। चाहे वह स्वामी दयानंद सरस्वती जी, गोस्वामी तुलसीदास जी, राजा राममोहन राय, सन्त रविदास, गुरुनानक देव जी, मीराबाई, सन्त नामदेव जी, शिवा जी महाराज, महाराणा प्रताप, डॉ केशव बलीराम हेडगेवार, सावित्री बाई फुले, लोकमाता अहिल्याबाई होकलर आदि सैकड़ों नाम है जो भारत में बाहर से आई कुरीतियों को लेकर समाज में लम्बा संघर्ष किया। </p><p style="text-align:justify;">आज डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के विषय को लेकर राजनैतिक लोग समाज में घृणा फैलान का कार्य करते हैं। डॉ अम्बेडकर ने कभी भी समाज को विभाजित करने की बात नहीं की उन्होंने भी संपूर्ण हिन्दू समाज को साथ रहने की वकालत की है। डॉ अम्बेडकर के जीवन में जब कभी ऐसी घटनाएं अस्पृश्यता की आईं भी तो हमारे ही लोगों ने उनका विरोध किया और डॉ अम्बेडकर को आगे बढ़ाया। डॉ अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देने वाले ब्राह्मण बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़<strong> </strong>थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर को 'अंबेडकर' सरनेम उनके ब्राह्मण शिक्षक कृष्णाजी केशव अंबेडकर ने दिया था। </p><p style="text-align:justify;">स्कूल के रिकॉर्ड में उनका मूल उपनाम 'अंबावाडेकर' (गांव के नाम पर) से बदलकर शिक्षक ने अपना उपनाम 'अंबेडकर' रख दिया था। इसलिए भारत में जातीय घृणा का सिद्धांत कभी नहीं रहा है। मेरा सभी से आग्रह है कि भारत को जानो, भारत को मानो और भारत के बनो। किसी भी पूर्वाग्रह से बाहर निकलिए स्वच्छ मन मस्तिष्क से भारत के ग्रंथों का अध्ययन करें। भारतीय वांग्मय में भी कहीं पर घृणा, उन्मूलन का संदर्भ नहीं है बस शास्त्रों का अध्ययन उनकी व्याख्या मनमाने ढंग से करने से बचें परम्परा से प्राप्त ज्ञान के आचार्यों से मिलकर अध्ययन करें सबकुछ समझ में आयेगे। डॉ अम्बेडकर का मत भी है कि सबके साथ समान व्यवहार, समान शिक्षा, समान सम्मान। खूब पढ़ो, परिश्रम करो, सफलता प्रदान करो आरक्षण की वैशाखी से बाहर निकले।<br /></p><p style="text-align:justify;"><strong>बाल भास्कर मिश्र</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 18:35:20 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>आत्मीय इंद्रधनुषी रंगों से ओत-प्रोत हर्षौल्लास का वैश्विक महापर्व होली</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">होली और होलिकात्सव यह एक ऐसा अद्भुत त्यौहार है जिसे देश मे अनेक धर्म संप्रदाय होने के बावजूद  इसे बहुत ही उत्साह और भाईचारे के साथ मनाया जाने वाला महापर्व माना गया है। इसे समरसता का एक बड़ा प्रतीक भी माना गया है, एकमात्र होली ही ऐसा सनातनी त्यौहार है जो भारत देश की धर्मनिरपेक्षता का जीता जागता  अभूतपूर्व उदाहरण है। भाईचारे की इस त्यौहार में रंगों की आत्मीयता से मिलन की मिठास दुगनी हो जाती है। वर्ग विभेद वाले इस त्यौहार में हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सब एकता पूर्वक इस पर्व को संपूर्ण गर्व के साथ से मनाते हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172190/holi-a-global-festival-of-joy-filled-with-soulful-rainbow"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1541469.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">होली और होलिकात्सव यह एक ऐसा अद्भुत त्यौहार है जिसे देश मे अनेक धर्म संप्रदाय होने के बावजूद  इसे बहुत ही उत्साह और भाईचारे के साथ मनाया जाने वाला महापर्व माना गया है। इसे समरसता का एक बड़ा प्रतीक भी माना गया है, एकमात्र होली ही ऐसा सनातनी त्यौहार है जो भारत देश की धर्मनिरपेक्षता का जीता जागता  अभूतपूर्व उदाहरण है। भाईचारे की इस त्यौहार में रंगों की आत्मीयता से मिलन की मिठास दुगनी हो जाती है। वर्ग विभेद वाले इस त्यौहार में हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सब एकता पूर्वक इस पर्व को संपूर्ण गर्व के साथ से मनाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा है कि भारत स्वयं में एक लघु विश्व है।</p>
<p style="text-align:justify;">निसंदेह इ भारत पर अध्ययन करने वाले सभी चिंतकों तथा विद्वानों ने एकमत से यह माना है कि भारत विविधताओं व बहुलताओं के मामले में विश्व का अनूठा एवं दिलचस्प देश है। अनेक प्रकार की भाषाएं, रीति रिवाज, खान-पान, रहन-सहन, लोकगीत,नृत्य, धर्म, संप्रदाय, सामाजिक संरचनाएं और संस्थाएं इस देश को बेहद बहुलतावादी और वैविध्यपूर्ण राष्ट्र बनाती है। इस विशाल, बहु भाषाई, बहु सांस्कृतिक देश की अपनी विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, दार्शनिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, जनसांख्यिकी और भाषाई विभिन्नताएं, विषमताऐ और विशेषताएं विद्वमान है। जो इस देश की विविधता में एकता की खूबी को प्रदर्शित करती है। भारत की सामाजिक संरचना स्वयं में काफी जटिल है। देश में समाज बहुत सारे वर्गों उप वर्गों में बटा हुआ है, इसी तरह यहां समाज में ग्रामीण, उपनगरीय, नगरीय, महा नगरीय, जनजातीय, पहाड़ी कैसे वर्गों में विभाजित हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में सामाजिक वर्ग भेद के साथ अंदरुनी अंतर्द्वंद भी बहुत ज्यादा है,जैसे कि एकल परिवार और संयुक्त परिवार जातिवादी जाति विहीन समाज ग्रामीण नगरीय द्वंद विवाह सन्यास का द्वंद जो अनेक रूपों में भारतीय समाज में जनमानस के रूप में दिखाई देता है और यह द्वंद स्वतंत्रता के पश्चात से दिखाई देने लगा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जहां ग्राम स्वराज को आर्थिक विकास की धुरी मानते हुए सर्वोदय पंचायती राज स्वरोजगार एवं परस्पर सहयोग को बढ़ावा देना चाहते थे,दूसरी तरफ पंडित जवाहरलाल नेहरू का झुकाव औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्र को तीव्र औद्योगिकरण , कल कारखानों को मजबूत करने की ओर था। इसीलिए भारतीय समाज में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नई व्यवस्था के माध्यम से इसका समुचित समाधान निकाला गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के राजनीतिक द्वंद भी बहुतायत में रहे हैं। आजादी से पहले कांग्रेस के गरम पंथ हुआ नरम पंथ का द्वंद चलता रहा है और पूर्ण स्वराज की मांग का उहापोह तथा आजादी के बाद संविधान निर्माण के समय संविधान की संघात्मक तथा एकात्मक रचना का विवाद या समाजवाद पूंजीवाद का द्वंद इसी तरह भारत दोनों में उलझता रहा है, और उसके बाद समाधान निकाल कर उससे बाहर भी आया है। भारत धार्मिक ,दार्शनिक व आध्यात्मिक दृष्टि से एक बेहद समृद्ध राष्ट्र रहा है। विश्व के चार प्रमुख धर्मों हिंदू, सिख, बौद्ध ,जैन की जन्मस्थली भारत ही रही है। इसी तरह भारत वेद पुराणों, उपनिषदों ,ब्राह्मणों, समितियों और आरण्यकों के प्राचीन साहित्य से लबालब भी रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा इस्लाम ,ईसाई ,पारसी जैसे धर्मों को देश में स्वयं सम्मानित कर अपनी मुख्यधारा में समाहित भी किया है। भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश नीति के मामले में गुटनिरपेक्षता की नीति को अपना कर किसी भी गुट में न रहते हुए स्वतंत्र विकास की नीति को अपनाया था। जो कालांतर में भारत की विदेश नीति का आधार स्तंभ रहा है। भारत में बहुआयामी विविधता भी रही है। स्वतंत्रता संग्राम में राजनेताओं ने जहां एक स्वर में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का पक्ष लिया था वहीं दूसरी तरफ देश के कुछ हिस्सों में हिंदी विरोधी आंदोलन तक हुए हैं। भारत में संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा देते हुए कुल 22 भारतीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर भाषाई सौहार्द्र और समन्वय का बखूबी परिचय भी दिया है। और भारत में भारतीय संस्कृति के बहुलतावादी चरित्र को बनाए रखने की भविष्य में भी निरंतर आवश्यकता बनी रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय समाज की विविधता पूर्ण सांस्कृतिक,साहित्यिक, दार्शनिक व्यवस्था के बीच विद्वानों ने चिंतन मनन कर इसके बीच का समाधान भी निकाला है एक का सबसे बड़ा उदाहरण भारत में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को महत्व देते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था का अंगीकार करना है। भारत की विजेताओं के विभिन्न नेताओं ने भारत देश के अंदरूनी मामले को लेकर देश की अर्थव्यवस्था सामाजिक व्यवस्था तथा राजनीतिक व्यवस्था को काफी मजबूत तथा पुख्ता भी किया है। भारत की विविधता में एकता के सिद्धांत पर चलते हुए भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था सामाजिक व्यवस्था राजनीतिक व्यवस्था तथा विदेशी नीति पर एक मजबूत आधार स्तंभ रखकर अपनी विश्व में एक अलग छवि तथा स्थान बनाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में अनेक विविधताओं विषमताओं को विशेषता बनाकर समाधान अपने बीच ही खोज कर विश्व को एक कीर्तिमान बनाकर दिखाया है। आज भारत मैं इतनी बड़ी जनसंख्या और विभिन्न जातीय धर्म संस्कृति भाषाएं होने के बावजूद एकजुटता की नई मिसाल दिखाकर विश्व के किसी भी देश को टक्कर देने की स्थिति में है। भारत आज विकासशील देशों में अग्रणी देश माना जाता है। भारत की यही विविधता,विषमता ,साइंस, टेक्नोलॉजी,मेडिकल साइंस तथा सामरिक क्षेत्र में अद्भुत एकजुटता किसी भी देश के आक्रमण का सामना करने के लिए सीना तान कर खड़ा होने की शक्ति सामर्थ और ताकत भी प्रदान करता है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने जितनी प्रगति और वैश्विक स्तर पर विदेशी देशों का विश्वास अर्जित किया है वह निसंदेह भारत की प्रजातांत्रिक लोकतांत्रिक परंपरा के कारण ही है। भारत की विविधता में एकता भारत की एक बड़ी शक्ति है जिसे हमें निरंतर बनाए रखना होगा तब जाकर हम किसी भी देश के सामने सिर उठाकर खड़े हो सकते हैं।<br />संजीव ठाकुर</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 18:24:26 +0530</pubDate>
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