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                <title>वैश्विक कूटनीति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>वैश्विक कूटनीति RSS Feed</description>
                
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                <title>गरीब मरीज पूछ रहा है— क्या मेरा जीवन इतना सस्ता है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180672/the-poor-patient-is-asking-%E2%80%93-is-my-life-so"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/360_f_334557287_wuhbarg68kugnheiwrgwanrxqtrl8wwv.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सरकारी गति का</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर दिन गंभीर होती जाती है। ऐसे में </span>120 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन बाद जांच की तारीख मिलना एक चिंताजनक प्रश्न खड़ा करता है—इसका बोझ आखिर कौन उठाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका परिवार या उसका जीवन</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स भोपाल की लंबी वेटिंग लिस्ट अब केवल एक अस्पताल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की समस्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी चुनौती का प्रतीक बन गई है। कम खर्च में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के लिए सस्ता इलाज भी तब बेमानी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जरूरी जांच ही महीनों बाद उपलब्ध हो। पेट के असहनीय दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर की आशंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क रोग या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज यदि केवल व्यवस्थागत कमी के कारण चार माह प्रतीक्षा करने को विवश हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह स्वास्थ्य सेवा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनहीनता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बीमारी किसी वेटिंग लिस्ट का इंतजार नहीं करती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह लगातार बढ़ती जाती है और कई बार उपचार की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उसी वर्ग पर पड़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर राजनीति सबसे अधिक होती है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति निजी अस्पताल में कुछ घंटों या दिनों में जांच करा लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटा व्यापारी और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह विकल्प अक्सर पहुंच से बाहर होता है। ऐसे में उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं—कर्ज लेकर निजी जांच कराए या दर्द और आशंका के बीच सरकारी अस्पताल की लंबी प्रतीक्षा सहे। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक असमानता का भी दर्पण है। स्वास्थ्य सुविधाएं आय से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकता से तय होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु मौजूदा व्यवस्था में पैसे वालों को समय मिलता है और अभावग्रस्तों को इंतजार।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी वेटिंग लिस्ट वर्षों से बढ़ती मांग और अपर्याप्त संसाधन विस्तार की कीमत है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मरीजों का बोझ बढ़ता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की संख्या लगभग वहीं ठहरी रही। कई सुपर-स्पेशियलिटी विभाग सीमित मानव संसाधनों पर निर्भर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि रेडियो डायग्नोसिस जैसे अहम विभाग पर्याप्त स्टाफ के अभाव में अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे। परिणाम सामने है—संसाधन मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सेवाएं नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समय पर जांच नहीं। प्रश्न यह है कि जब बढ़ती जरूरतें वर्षों से दिखाई दे रही थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी तैयारी क्यों नहीं की गई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर किस स्तर की चूक ने देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों को भी प्रतीक्षा के संकट में धकेल दिया</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीति का केंद्र तात्कालिक लोकप्रियता बन जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अस्पतालों की जरूरतें अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं। यही कारण है कि मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं पर अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों की भर्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई मशीनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए संसाधनों का अभाव बताया जाता है। विडंबना यह है कि वोट के लिए खजाना खुल जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन बचाने के लिए बजट सीमित पड़ जाता है। वास्तविक जनकल्याण मुफ्त सुविधाएं बांटने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में है जहां किसी मरीज को जांच के लिए महीनों प्रतीक्षा न करनी पड़े। स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर निवेश ही देश की तस्वीर बदल सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जरूरत आश्वासनों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्रवाई की है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में अतिरिक्त सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें लगाई जाएं तथा रेडियो डायग्नोसिस विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीशियनों और कर्मचारियों की भर्ती हो। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए </span>24 <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे शिफ्ट आधारित संचालन लागू किया जाए। आयुष्मान भारत के दायरे में सभी आवश्यक जांचें लाई जाएं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से सुविधाओं का विस्तार हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना मरीजों पर अतिरिक्त बोझ डाले। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अपॉइंटमेंट प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की स्थिति को चेतावनी मानते हुए देशभर के सरकारी अस्पतालों में संसाधन और मानवबल बढ़ाना अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि मरीजों को इलाज मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंतजार नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ केवल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे संस्थानों के भरोसे नहीं उठाया जा सकता। जब जिला अस्पतालों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बड़े संस्थानों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग-निवारण और प्रारंभिक जांच व्यवस्था को मजबूत करना उतना ही जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना उपचार सुविधाओं का विस्तार। मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाने पर भी समान ध्यान देना होगा। आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवनों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सक्षम मानव संसाधन और जवाबदेह प्रशासन से मजबूत बनती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य कोई दया या उपकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि किसी मरीज को अपनी बीमारी की सच्चाई जानने के लिए महीनों प्रतीक्षा करनी पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था की नाकामी है। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की चार माह लंबी जांच प्रतीक्षा सूची इसी विफलता का प्रतीक है। यह मौन संकट हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है। सरकारों को याद रखना होगा कि अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग आंकड़े नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान हैं। यदि स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनकल्याण के दावे अर्थहीन रह जाएंगे। आखिर सवाल यही है—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या एक गरीब मरीज के लिए महीनों का इंतजार सामान्य हो गया है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जांच में हर देरी कई बार जीवन की संभावनाएं भी कम कर देती है। ऐसी व्यवस्था पर गर्व नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां बीमारी की रफ्तार उपचार से तेज हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:44:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जब मोहल्ले का कर्जदार पंच बन जाए</title>
                                    <description><![CDATA[<p dir="ltr" style="text-align:justify;">आजकल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की फिजाओं में एक अजीब सी 'खुशबू' तैर  रही है। कूटनीति के बाजार में एक नया 'स्टार्टअप' खुला है, जिसका नाम है—"शांति मेडिएशन सेंटर"। जी हां, वही  जो कल तक वर्ल्ड बैंक की दहलीज पर 'कटोरा-डेमोक्रेसी' का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था, आज विश्व शांति का 'ठेकेदार' बनकर उभरा है। उसे दो देशों के बीच सुलह करवाने की ऐसी ललक जागी है, जैसे मोहल्ले का वो शख्स, जिस पर खुद राशन वाले का उधार बाकी हो, लेकिन वो अंबानी और अडानी के बीच जायदाद का बंटवारा करवाने की जिद्द ठाने बैठा हो।</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;">​ इस 'मध्यस्थता के गुरुर'</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176723/when-the-debtor-of-the-locality-becomes-the-arbitrator"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">आजकल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की फिजाओं में एक अजीब सी 'खुशबू' तैर  रही है। कूटनीति के बाजार में एक नया 'स्टार्टअप' खुला है, जिसका नाम है—"शांति मेडिएशन सेंटर"। जी हां, वही  जो कल तक वर्ल्ड बैंक की दहलीज पर 'कटोरा-डेमोक्रेसी' का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था, आज विश्व शांति का 'ठेकेदार' बनकर उभरा है। उसे दो देशों के बीच सुलह करवाने की ऐसी ललक जागी है, जैसे मोहल्ले का वो शख्स, जिस पर खुद राशन वाले का उधार बाकी हो, लेकिन वो अंबानी और अडानी के बीच जायदाद का बंटवारा करवाने की जिद्द ठाने बैठा हो।</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;">​ इस 'मध्यस्थता के गुरुर' को देखकर समझ नहीं आता कि यह कूटनीति है या 'अस्तित्व बचाने की छटपटाहट'। घर में आटे के लिए कतारें लगी हैं, लेकिन दुनिया के मंच पर 'शांति दूत' का गाउन पहनकर ऐसे घूम रहे हैं जैसे सारा विश्व इनके 'होरमोज़ जलडमरूमध्य' वाले ज्ञान का प्यासा हो। असल में, जब जेब खाली हो और साख 'ग्रे-लिस्ट' वाली, तो आदमी अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करता है ताकि कोई उसे गलती से 'महत्वपूर्ण' समझ ले। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी बाइक में पेट्रोल डलवाने के पैसे नहीं रखते, लेकिन फॉर्मूला-1 रेस के आयोजक बनने का दावा कर रहे हैं।</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;">​इधर सरहद के इस पार, हमारे अपने विपक्षी दिग्गजों की नींद उड़ी हुई है। उन्हें इस बात का गम नहीं कि पाकिस्तान के पास खाने को नहीं है, बल्कि उन्हें इस बात की 'टेंशन' है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के फोन रिसीव कैसे कर लिए! ​विपक्ष के गलियारों में सन्नाटा कम और 'हाहाकार' ज्यादा है। जयराम बाबू और राहुल जी को लगता है कि पाकिस्तान का 'ब्रोकर' बनना मोदी जी की विदेश नीति का 'फ्लॉप शो' है। विपक्षी तर्क बड़े निराले हैं : ​"देखिए!</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;"> हमने तो पाकिस्तान को आइसोलेट किया था, लेकिन मोदी जी के रहते वो तो पंचायती कर रहा है! यह तो हमारी कूटनीतिक हार है!" वाह! यानी अगर पड़ोस का गुंडा जेल से छूटकर मोहल्ले की लड़ाई सुलझाने का नाटक करे, तो दोष पुलिस का है कि उसने गुंडे को सुधारने के बजाय उसे 'एक्टर' बनने का मौका क्यों दिया? विपक्ष की व्याकुलता ऐसी है कि मानो वे चाहते हों कि जो भी पाकिस्तान बोले, पहले साउथ ब्लॉक से 'अनापत्ति प्रमाणपत्र'  लेकर बोले।</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;">​वहीं मोदी जी की विदेश नीति का अपना ही टशन है। उधर पाकिस्तान मध्यस्थता की फाइलें दबाए इस्लामाबाद में चाय की प्यालियां खड़का रहा है, और इधर भारत 'ऑपरेशन सिंदूर' और 'पहलगाम' के बाद वाले तेवरों के साथ अपनी चाल चल रहा है। भारत का स्टैंड साफ है - "हम दलाल नहीं, खिलाड़ी हैं।"</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;">​विपक्ष इसे 'हगलोमेसी' का अंत कह रहा है, तो सरकार इसे 'रणनीतिक धैर्य' बता रही है। जयशंकर साहब की कड़क अंग्रेजी और तीखे कटाक्षों ने पाकिस्तान की मध्यस्थता को 'पुरानी शराब, नई बोतल' करार दे दिया है। विपक्ष को डर है कि कहीं 'विश्वगुरु' का तमगा सरककर इस्लामाबाद न चला जाए, जबकि हकीकत यह है कि इस्लामाबाद तो खुद इस खोज में है कि कहीं से कुछ बिलियन डॉलर का 'जुगाड़' हो जाए, चाहे वह शांति की दलाली से आए या किसी नए कर्ज से।</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;">​कुल मिलाकर, पाकिस्तान की यह मध्यस्थता वैसी ही है जैसे किसी फटे हुए गुब्बारे में जबरदस्ती हवा भरना। बाहर से गोल दिख रहा है, पर हवा कभी भी निकल सकती है। और रही बात हमारे विपक्ष की, तो उनकी हालत उस छात्र जैसी है जिसे इस बात का दुख नहीं कि वह खुद फेल हो गया, बल्कि इस बात की चिड़ है कि पड़ोस वाला 'नकलची' लड़का मॉनिटर कैसे बन गया। ​दुनिया देख रही है—एक तरफ 'शक्ति' का मौन है, दूसरी तरफ 'मजबूरी' का शोर। और बीच में खड़ा पाकिस्तान सोच रहा है, "शांति तो करवा दी, अब क्या कोई बिल का भुगतान करेगा?"</p><p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>डॉ स्नेहलता श्रीवास्तव</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 19:06:11 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी और नेतन्याहू क्या राजनीतिक रूप से नाकाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong>ईरान-अमेरिका सीज़फायर का असर इसराइल और भारत में नज़र आ रहा है। भारत और इसराइल के विपक्षी दलों ने अपने-अपने देशों के प्रधानमंत्रियों नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को नेस्तानाबूद करने की धमकी दी थी लेकिन वो समझौते की टेबल पर आ गए। नेतन्याहू ने अमेरिका को इस युद्ध में जबरन ढकेला और जब ट्रंप ने सीज़फायर डील की घोषणा की तो नेतन्याहू की उसमें कोई भूमिका नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पीएम मोदी ईरान पर युद्ध थोपे जाने से तीन दिन पहले इसराइल गए थे। यह भी इसराइल का गेम था। वो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175578/are-modi-and-netanyahu-politically-unsuccessful"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/ap26057435017593.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong>ईरान-अमेरिका सीज़फायर का असर इसराइल और भारत में नज़र आ रहा है। भारत और इसराइल के विपक्षी दलों ने अपने-अपने देशों के प्रधानमंत्रियों नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को नेस्तानाबूद करने की धमकी दी थी लेकिन वो समझौते की टेबल पर आ गए। नेतन्याहू ने अमेरिका को इस युद्ध में जबरन ढकेला और जब ट्रंप ने सीज़फायर डील की घोषणा की तो नेतन्याहू की उसमें कोई भूमिका नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पीएम मोदी ईरान पर युद्ध थोपे जाने से तीन दिन पहले इसराइल गए थे। यह भी इसराइल का गेम था। वो दुनिया को दिखाना चाहता था कि ईरान का सदियों पुराना दोस्त भारत आज उसके साथ खड़ा है। यानी ईरान पर युद्ध थोपे जाने की मोदी की मौन सहमति थी। मोदी ने आज तक ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या की निन्दा नहीं की। युद्ध के बीच में जब पाकिस्तान की भूमिका की बात कही जा रही थी तो भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर पाकिस्तान को दलाल देश बता रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस के संचार प्रभारी और सांसद जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा- पूरी दुनिया पश्चिम एशिया में एक तरफ यूएस और इसराइल और दूसरी तरफ ईरान के बीच चल रहे इस संघर्ष में लागू हुए दो सप्ताह के संघर्षविराम का सावधानीपूर्वक स्वागत करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह संघर्ष 28 फरवरी को ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था। यह घटनाएं प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं। इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया। पीएम मोदी ने ग़ज़ा में इसराइल द्वारा किए जा रहे नरसंहार और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में उसकी आक्रामक विस्तारवादी नीतियों पर कुछ नहीं कहा।</p>
<p style="text-align:justify;">जयराम रमेश ने कहा- युद्धविराम कराने में पाकिस्तान की भूमिका, पीएम मोदी की अत्यधिक व्यक्तिनिष्ठ कूटनीति के सार और शैली-दोनों-के लिए एक गंभीर झटका है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को जारी समर्थन के कारण पाकिस्तान को अलग-थलग करने और दुनिया को यह विश्वास दिलाने की नीति कि वह एक विफल राष्ट्र है, स्पष्ट रूप से सफल नहीं हुई है। जैसा कि डॉ. मनमोहन सिंह ने मुंबई आतंकी हमलों के बाद कर दिखाया था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह तथ्य कि एक दिवालिया अर्थव्यवस्था (पाकिस्तान की), जो पूरी तरह बाहरी डोनर्स की मदद पर निर्भर है, और कई मायनों में एक टूटे हुए देश ने ऐसी भूमिका निभा ली, पीएम मोदी की कूटनीतिक रणनीति और नैरेटिव प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने या उनकी टीम ने यह भी कभी नहीं बताया कि ऑपरेशन सिंदूर को 10 मई 2025 को अचानक और तत्काल क्यों रोक दिया गया। जिसकी पहली घोषणा अमेरिका के विदेश मंत्री ने की थी और जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति तब से लगभग सौ बार श्रेय ले चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा- हर जगह एक स्पष्ट राहत की भावना है। विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था। लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज हो चुके हैं। उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है। उनकी कायरता न केवल इसराइल की आक्रामकता पर, बल्कि व्हाइट हाउस में बैठे उनके करीबी मित्र द्वारा इस्तेमाल की जा रही पूरी तरह अस्वीकार्य और शर्मनाक भाषा पर भी उनकी चुप्पी से पता चलती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 22:10:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>बहुत आपत्तिजनक हैं ट्रंप के असंयमित असभ्य बयान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175393/trumps-uncontrolled-rude-statements-are-very-objectionable"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c0eb6ec0-68a6-11f0-83d0-5d68283eb47c.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद से लगभग बंद है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. ट्रंप ने होर्मुज को लेकर ईरान को कई बार धमकी दी है और इस समुद्री मार्ग को खोलने का अल्टीमेटम दे चुके हैं. उन्होंने होर्मुज को खोलने में अमेरिका की मदद नहीं करने के लिए यूरोपीय व नाटो सहयोगियों पर भी नाराजगी जताई है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने यहां तक चेतावनी दी कि अमेरिका नाटो से बाहर निकल सकता है. अपने इस पोस्ट में ट्रंप ने ईरान के लिए ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया, जिसकी किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से उम्मीद नहीं की जाती. हालांकि हम जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप पर कभी कोई मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस समय उनकी भाषा में जो गिरावट स्पष्ट स्पष्ट परिलक्षित है, कम से कम उसका विश्व समुदाय को विरोध करना चाहिए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल ईरान पर अमेरिका और इजरायल को जंग छेड़े छह सप्ताह हो चुके हैं, जिसमें कई बार जीत का दावा करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जीत के लक्षण नहीं दिखा पाए। बल्कि बार-बार युद्धविराम की अवधि को बदलते हैं और साथ ही उनकी धमकियां भी बदल रही हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के ऐलान से शुरु हुआ यह युद्ध अब नागरिकों को निशाने पर लेने की धमकियों पर उतर आया है। रविवार को ईस्टर के मौके पर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टूथ पर ट्रंप ने ईरान को धमकी दी कि 48 घंटों में होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खोलो वर्ना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने लिखा कि मंगलवार को ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक हमले हो सकते हैं, और इसे संघर्ष का निर्णायक क्षण बताया। लेकिन यह सब इसी तरह की शालीन भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। और यह पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपशब्द कहे हों। इससे पहले उन्हें पत्रकारों से चर्चा के दौरान या भाषण देते हुए भी अपशब्द बोलते देखा गया है। यह किसी लिहाज से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और वैश्विक नेताओं को खुलकर इसकी भर्त्सना करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी से इसकी शुरुआत हो तो कितना अच्छा रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी सीनेट के सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी के ​वरिष्ठ नेता चक शूमर ने ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के बयान को 'एक असंतुलित व्यक्ति की बकवास बताया'. उन्होंने कहा कि ट्रंप का यह रवैया अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर कर रहा है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के हालिया बयान को युद्ध अपराध की धमकी देने जैसा बताया. ट्रंप की पूर्व सहयोगी मार्जरी टेलर ग्रीन ने भी उनके बयान की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रपति 'पागलपन' की स्थिति में हैं. उन्होंने अमेरिकी प्रशासन के लोगों से दखल देने की अपील की. टेलर ग्रीन ने कहा कि यह युद्ध बिना उकसावे के शुरू किया गया और इससे निर्दोष लोगों की जान जा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैसे संयुक्त राष्ट्र में  ईरानी ई मिशन ने ट्रंप की की नवीनतम टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में' नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करने' की धमकी दे रहे हैं। मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, 'यदि संयुक्त राष्ट्र की अंतरात्मा जीवित होती, तो वह युद्ध भड़काने तो वह युद्ध भड़काने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की खुली और बेशर्म धमकी पर चुप नहीं रहती। ट्रंप इस क्षेत्र को एक अंतहीन युद्ध में घसीटना चाहते हैं।' इसमें कहा गया, 'यह नागरिकों को आतंकित करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावा है और युद्ध अपराध करने के इरादे का स्पष्ट प्रमाण है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें आगे कहा गया- 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सभी राज्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे युद्ध अपराधों के ऐसे जघन्य कृत्यों को रोकें। उन्हें अभी कार्रवाई करनी चाहिए। कल बहुत देर हो जाएगी।' वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष गलिबाफ ने कहा कि ट्रंप के 'लापरवाह कदमों से अमेरिका के हर परिवार को एक जीती-जागती नरक में धकेला जा रहा है, हमारा पूरा क्षेत्र जल उठेगा क्योंकि आप नेतन्याहू के आदेशों का पालन करने पर अड़े हैं।' गुलिबाफ के इस बयान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं, उसमें यही लगता है कि पटकथा कोई और लिख रहा है, केवल संवाद अदायगी ट्रंप की है। क्योंकि अपशब्द वाले बयान के बाद ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के एक पत्रकार से कहा, मुझे लगता है कि सोमवार को समझौता होने की अच्छी संभावना है, वे (ईरान) अभी बातचीत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तो ट्रंप को लगता है कि ईरान अब भी उनसे बात कर समझौता करेगा, जबकि ईरान की सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूनिट खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता ने कहा, 'अगर आम लोगों पर हमले दोहराए गए, तो हमारे अगले हमले और जवाबी कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और बड़े पैमाने पर होंगे।' ध्यान देने वाली बात यह है कि ईरान केवल धमका नहीं रहा है, अपनी बात पर अमल भी कर रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों समेत इजरायल पर ईरान के हमलों को कोई रोक नहीं पा रहा है, वहीं अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हुए हमले और एक अमेरिकी पायलट के लापता होने की घटना ने भी जाहिर कर दिया है कि अमेरिका उतना भी ताकतवर देश नहीं है, जितना बड़ा उसका हौव्वा खड़ा किया गया है। ईरान की पहाड़ियों में लापता पायलट को बचाने का दावा ट्रंप ने किया है, हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने बचाव के लिए आए सैन्य दस्ते पर भी हमला किया है। अब किसका दावा सही है और किसका गलत, यह तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो नजर आ ही रहा है कि इस युद्ध में अमेरिका को वैसी ही चोट पड़ रही है, जो पहले इराक, अफगानिस्तान, क्यूबा और वियतनाम में पड़ चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि 2019 में ट्रंप ने खुद एक पोस्ट में प. एशिया में अमेरिका की सैन्य दखलंदाजी और युद्ध को गलत ठहराया था, क्योंकि उसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और सैनिकों का नुकसान हुआ। लेकिन अब संभवतः एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के दबाव में ट्रंप ने पूरी दुनिया को युद्ध की बर्बादी में झोंक दिया है। अपनी गलती मानने की जगह रोजाना बेतुके, निर्लज्ज बयानों से उसे सही भी ठहरा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में परमाणु हथियार और सत्ता बदलने के नाम पर शुरु किया गया युद्ध मीनाब की मासूम बच्चियों का कातिल बना और उसके बाद ईरान की अधोसंरचना पर हमले ही किए जा रहे हैं, कम से कम 30 विश्वविद्यालयों और कई अस्पतालों, दवा कारखानों को बारुद से ढेर कर दिया गया है। यह सीधे-सीधे मानवता के खिलाफ अपराध है, जिसे रोकने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर आवाज उठानी चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:20:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>पश्चिम एशिया का संघर्ष और युद्धविराम की शर्तें</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174234/the-conflict-in-west-asia-and-the-terms-of-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260325_174829.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात प्रमुख रूप से सामने आती है। यह मांग नई नहीं है। लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा मानते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में ईरान के कार्यक्रम को सीमित करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है। पहली नजर में यह मांग तर्कसंगत लग सकती है, क्योंकि परमाणु हथियारों का प्रसार किसी भी क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, ईरान का तर्क है कि उसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। यदि अन्य देशों के पास मिसाइल और रक्षा प्रणाली है, तो केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाना क्या न्यायसंगत कहा जा सकता है?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से इस विवाद का मूल प्रश्न उठता है—क्या वैश्विक नियम सभी देशों पर समान रूप से लागू होते हैं या शक्तिशाली देशों के हितों के अनुसार तय किए जाते हैं? ईरान की नजर में अमेरिकी प्रस्ताव एकतरफा है, जिसमें उसे अपनी सामरिक ताकत छोड़ने के लिए कहा जा रहा है, जबकि बदले में केवल प्रतिबंधों में राहत और कुछ आर्थिक सहयोग का वादा किया जा रहा है। यह सौदा ईरान के लिए असंतुलित प्रतीत होता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी तरफ, ईरान की शर्तें भी कम कठोर नहीं हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की मांग इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। यदि इस पर किसी एक देश का प्रभुत्व मान लिया जाए, तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ईरान की यह मांग कई देशों के लिए स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की मांग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। किसी भी युद्ध में नागरिकों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान होता है, और अंतरराष्ट्रीय कानून भी यह मानता है कि आक्रामक पक्ष को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन यहां समस्या यह है कि दोनों पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को आक्रामक बताते हैं। ऐसे में मुआवजे का निर्धारण एक जटिल और विवादास्पद प्रक्रिया बन जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की यह शर्त कि भविष्य में उस पर फिर से युद्ध न थोपा जाए, सैद्धांतिक रूप से उचित लगती है। हर देश अपनी सुरक्षा और स्थिरता चाहता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी गारंटी देना लगभग असंभव होता है। इतिहास गवाह है कि समझौतों और संधियों के बावजूद युद्ध होते रहे हैं। इसलिए यह मांग व्यावहारिक कम और आदर्शवादी अधिक प्रतीत होती है।इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—विश्व राजनीति का शक्ति संतुलन। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने और अपने सहयोगियों के हितों की रक्षा करे। वहीं ईरान जैसे देश के लिए अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि दोनों पक्षों की शर्तें अपने-अपने दृष्टिकोण से सही लगती हैं, लेकिन एक-दूसरे के लिए अस्वीकार्य बन जाती हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो दोनों पक्षों की शर्तों में कुछ उचित तत्व हैं और कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण भी। अमेरिका की यह मांग कि ईरान अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे, एकतरफा दबाव की तरह दिखती है। वहीं ईरान की यह जिद कि उसे होर्मुज पर पूर्ण अधिकार दिया जाए, वैश्विक संतुलन के लिए खतरा बन सकती है। इसी तरह मुआवजे और भविष्य में युद्ध न होने की गारंटी जैसी शर्तें नैतिक रूप से सही होते हुए भी व्यावहारिक कठिनाइयों से भरी हैं।</div><div style="text-align:justify;">वास्तविक समाधान इन चरम स्थितियों के बीच कहीं छिपा हुआ है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> किसी भी स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष कुछ समझौते करें। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे पारदर्शी और सीमित करने पर सहमत हो सकता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी उसे सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की ठोस गारंटी दे सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए बहुपक्षीय नियंत्रण या अंतरराष्ट्रीय निगरानी एक बेहतर विकल्प हो सकता है, जिससे किसी एक देश का प्रभुत्व स्थापित न हो।</div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि युद्धविराम की वर्तमान शर्तें न पूरी तरह सही हैं और न पूरी तरह गलत। वे दोनों पक्षों की रणनीतिक सोच और राष्ट्रीय हितों का प्रतिबिंब हैं। लेकिन यदि इन शर्तों पर जिद बनी रही, तो शांति की संभावना कमजोर होती जाएगी। इतिहास यही सिखाता है कि युद्ध का अंत केवल शक्ति से नहीं, बल्कि समझदारी और संतुलित समझौतों से होता है। पश्चिम एशिया में स्थायी शांति तभी संभव है जब दोनों पक्ष अपने अधिकतम लाभ के बजाय साझा हितों को प्राथमिकता दें।</div><div style="text-align:justify;">*कांतिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 19:01:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>क्या अमेरिका-ईजराइल युद्ध नीति महाभारत कालीन कौरव-पांडव युद्ध से प्रेरित है?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">​​पश्चिम एशिया में गहराता वर्तमान सैन्य गतिरोध और लैटिन अमेरिका से लेकर ईरान तक सत्ता परिवर्तन की हालिया रणनीतियां अनायास ही महाभारत के उस प्रसंग की याद दिलाती हैं, जहाँ युद्ध केवल शौर्य से नहीं बल्कि शत्रु के नेतृत्व को पंगु बनाने की सूक्ष्म कूटनीति से लड़ा जाता था। आधुनिक सैन्य शब्दावली में जिसे 'लीडरशिप डिकैपिटेशन' कहा जाता है, उसका बीज हमें कुरुक्षेत्र के मैदान में मिलता है, जब दुर्योधन ने युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को एक झटके में समाप्त करने की योजना बनाई थी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वो बात अलग है कि श्रीकृष्ण होते हुए यह योजना विफल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172188/is-america-israel-war-policy-inspired-by-the-kaurava-pandava-war-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/24745.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​​पश्चिम एशिया में गहराता वर्तमान सैन्य गतिरोध और लैटिन अमेरिका से लेकर ईरान तक सत्ता परिवर्तन की हालिया रणनीतियां अनायास ही महाभारत के उस प्रसंग की याद दिलाती हैं, जहाँ युद्ध केवल शौर्य से नहीं बल्कि शत्रु के नेतृत्व को पंगु बनाने की सूक्ष्म कूटनीति से लड़ा जाता था। आधुनिक सैन्य शब्दावली में जिसे 'लीडरशिप डिकैपिटेशन' कहा जाता है, उसका बीज हमें कुरुक्षेत्र के मैदान में मिलता है, जब दुर्योधन ने युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को एक झटके में समाप्त करने की योजना बनाई थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वो बात अलग है कि श्रीकृष्ण होते हुए यह योजना विफल हुई ,पर अभिमन्यु के रूप में बहुत बड़े योद्धा को खोना पड़ा। आज अमेरिका और इजरायल की रणनीतियों में भी प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के बजाय शीर्ष नेतृत्व को लक्ष्य बनाने, सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित करने या राजनीतिक अलगाव पैदा करने के तत्व प्रधान दिखाई देते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी राष्ट्र के शीर्ष प्रतीक को हटाया गया, युद्ध का परिणाम निर्णायक रूप से बदल गया। वर्ष 2003 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की गिरफ्तारी और 1989 में पनामा के राष्ट्रपति मैनुअल नोरीएगा को बंदी बनाया जाना इसके पुराने उदाहरण हैं, किंतु वर्ष 2026 की घटनाओं ने इस परिपाटी को और अधिक आक्रामक बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​हाल ही में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाना और उसके पश्चात 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से ईरान पर भीषण मिसाइल हमला कर सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को मौत के घाट उतारना, इसी 'नेतृत्व विनाश' की नीति का चरमोत्कर्ष है। इन घटनाओं ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि अब 'अभय' माने जाने वाले नेतृत्व के सुरक्षित घेरे भी आधुनिक तकनीक और खुफिया ऑपरेशन्स के सामने बेबस हैं। सामरिक होड़ के बीच संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय कानून एक नैतिक सीमा रेखा जरूर खींचते हैं, पर शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए ये नियम अब गौण प्रतीत होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी सदस्य राष्ट्र की संप्रभुता के उल्लंघन को वर्जित करता है और सैन्य कार्रवाई को केवल अनुच्छेद 51 के तहत 'आत्मरक्षा' की स्थिति में ही वैध मानता है। इसके इतर किसी राष्ट्राध्यक्ष को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में महाशक्तियाँ अक्सर 'आतंकवाद-निरोध' या 'रासायनिक या जैविक हथियारों की उपस्थिति','परमाणु अप्रसार' जैसे तर्कों का सहारा लेकर इन नियमों की व्याख्या अपने हितों के अनुरूप करती रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​भविष्य की आशंकाएं अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के युग में भी 'नेतृत्व विनाश' की यह नीति सुरक्षित है? अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और मादुरो की गिरफ्तारी से अमेरिका और इजरायल ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आधुनिक युद्ध अब किसी भी मर्यादा को लांघ सकते हैं। चीन और रूस जैसी महाशक्तियां भविष्य में इस पर क्या रुख अपनाती हैं, यह देखना शेष है, लेकिन छोटे राष्ट्रों को अब यह चिंता सताने लगी है कि कब कोई शक्तिशाली देश उन्हें अपने अधीन बना ले या उनके नेतृत्व को मिटा दे। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना बनाना प्रतिबंधित है, पर इक्कीसवीं सदी के युद्धों ने साबित कर दिया है कि शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए न तो इन नियमों का कोई बंधन है और न ही उन्हें यूएन की निंदा की चिंता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाभारत हमें अंततः यही सिखाता है कि चतुर रणनीतियों और नियमों के उल्लंघन से युद्ध तो जीता जा सकता है, किंतु प्रतिशोध और सत्ता-लालसा पर आधारित जीत कभी स्थायी शांति नहीं लाती। आज विश्व समुदाय के सामने चुनौती कुरुक्षेत्र की इस पुनरावृत्ति को रोकने और अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन को पुनर्जीवित करने की है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 18:20:16 +0530</pubDate>
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