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                <title>Indian Judiciary - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian Judiciary RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>धाकड़ अधिवक्ता रवि भूषण चौबे की बेटी रीतिका भी कठिन परिश्रम के साथ बनी सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के बक्सर ज़िले की प्रतिभाशाली बेटी रीतिका ने अपने अथक परिश्रम, अटूट विश्वास और परिवार के मजबूत सहयोग से आज एक नई पहचान स्थापित की है—एडवोकेट रीतिका के रूप में।उनके पिता रवि भूषण चौबे जो कि सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता होने के साथ-साथ Ravi Babita Support Foundation के संस्थापक हैं एवं निदेशक हैं, और माता श्रीमती बबीता कुमारी चौबे जो एक समाजसेवी एवं उसी संस्था की निदेशक है दोनों ने सदैव अपनी बेटी को न्याय के क्षेत्र में ऊँचाइयों तक पहुँचते देखने का सपना संजोया इस सफर में उनके भाई शिवांग जो B.A. LL.B के छात्र एवं सामाजिक कार्यकर्ता</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176921/ritika-daughter-of-powerful-advocate-ravi-bhushan-choubey-also-became"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260422-wa0010.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के बक्सर ज़िले की प्रतिभाशाली बेटी रीतिका ने अपने अथक परिश्रम, अटूट विश्वास और परिवार के मजबूत सहयोग से आज एक नई पहचान स्थापित की है—एडवोकेट रीतिका के रूप में।उनके पिता रवि भूषण चौबे जो कि सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता होने के साथ-साथ Ravi Babita Support Foundation के संस्थापक हैं एवं निदेशक हैं, और माता श्रीमती बबीता कुमारी चौबे जो एक समाजसेवी एवं उसी संस्था की निदेशक है दोनों ने सदैव अपनी बेटी को न्याय के क्षेत्र में ऊँचाइयों तक पहुँचते देखने का सपना संजोया इस सफर में उनके भाई शिवांग जो B.A. LL.B के छात्र एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और छोटे भाई शौर्य कात्यायन का भरपूर सहयोग रहा परिवार के इस अटूट विश्वास और समर्थन ने रीतिका के सपनों को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई दिनांक 20 अप्रैल 2026 को, Bar Council of Delhi में नामांकन के पश्चात सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित चैंबर नंबर 108 D-ब्लॉक में एक गौरवपूर्ण क्षण साकार हुआ, जब वरिष्ठ अधिवक्ता भी,पी यादव ने रीतिका को एडवोकेट बैंड पहनाकर न्याय के पथ पर अग्रसर होने का आशीर्वाद प्रदान किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं दूसरी तरफ इस शुभ अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित अधिवक्ता मनोज कुमार चौबे , दीपक कुमार चौबे तथा अन्य कई सम्मानित अधिवक्ताओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए रीतिका को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं इस दौरान, चैंबर से लेकर सुप्रीम कोर्ट के Advocates’ Sitting Room और Lounge तक बार-बार शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ जो इस उपलब्धि की गरिमा और उत्साह को और भी बढ़ा रहा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज रीतिका न केवल अपने गृह जनपद बक्सर बिहार का, बल्कि बलजीत नगर नई दिल्ली और सबौली, सोनीपत हरियाणा का नाम भी गर्व से रोशन कर रही हैं। यह उपलब्धि हर उस बेटी के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को सच करने का साहस रखती है अंत में एडवोकेट रीतिका एवं उनके पिता रवि भूषण चौबे ने वरिष्ठ अधिवक्ता बी. पी. यादव अधिवक्ता मनोज कुमार चौधरी तथा सभी सम्मानित अधिवक्ता साथियों  और शुभचिंतकों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया। रवि भूषण चौबे एडवोकेट का सम्पूर्ण समाज के माता-पिता व बेटीयां को संदेश जब परिवार का साथ और खुद पर विश्वास हो तो हर बेटीयों का हौसला अफजाई हो सकता है।</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:52:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सार्वजनिक न्याय की नई दिशा, सुप्रीम कोर्ट के तीन ऐतिहासिक फैसले और बदलता भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की संरचना, अधिकारों की परिभाषा और राज्य की जिम्मेदारियों को नई दिशा देते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए तीन महत्वपूर्ण निर्णय धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे पर स्पष्टता, सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के साथ समानता सुनिश्चित करना, और झूठी एफआईआर के मामलों में सख्त रुख—इसी श्रेणी में आते हैं। ये फैसले न केवल संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174157/new-direction-of-public-justice-three-historic-decisions-of-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की संरचना, अधिकारों की परिभाषा और राज्य की जिम्मेदारियों को नई दिशा देते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए तीन महत्वपूर्ण निर्णय धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे पर स्पष्टता, सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के साथ समानता सुनिश्चित करना, और झूठी एफआईआर के मामलों में सख्त रुख—इसी श्रेणी में आते हैं। ये फैसले न केवल संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय, समान अवसर और कानून के दुरुपयोग पर एक संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहला और सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला निर्णय धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जाति के दर्जे से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 की उस मूल भावना को दोहराता है, जिसमें अनुसूचित जातियों की पहचान ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और छुआछूत की प्रथाओं से जुड़ी हुई है, जो मुख्यतः हिंदू सामाजिक ढांचे में विद्यमान रही हैं। न्यायालय का यह कहना कि धर्म परिवर्तन के साथ ही एससी का दर्जा और उससे जुड़े सभी वैधानिक लाभ तत्काल समाप्त हो जाते हैं, एक कठोर लेकिन स्पष्ट संदेश है कि आरक्षण और विशेष अधिकारों का आधार सामाजिक उत्पीड़न की ऐतिहासिक वास्तविकता है, न कि केवल जातीय पहचान।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह निर्णय उन बहसों को भी नई दिशा देता है, जो लंबे समय से धर्मांतरण और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को लेकर चल रही थीं। कुछ पक्षों का तर्क रहा है कि भले ही व्यक्ति धर्म बदल ले, लेकिन सामाजिक भेदभाव का प्रभाव समाप्त नहीं होता, जबकि दूसरी ओर यह भी कहा जाता रहा है कि आरक्षण का उद्देश्य विशेष रूप से उन समुदायों को राहत देना है जो एक विशिष्ट सामाजिक संरचना में उत्पीड़ित रहे हैं। न्यायालय ने इस जटिल बहस में संवैधानिक प्रावधानों को प्राथमिकता देते हुए स्पष्टता प्रदान की है। इससे नीति निर्माताओं और समाज दोनों के लिए यह समझना आसान होगा कि सामाजिक न्याय की योजनाएं किन आधारों पर लागू होती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय भारतीय सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के अधिकारों से संबंधित है। न्यायालय ने यह माना कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत कार्यरत महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने में जो मापदंड अपनाए गए, वे असमान और भेदभावपूर्ण थे। अदालत ने न केवल इस असमानता पर आपत्ति जताई, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को प्रमोशन से वंचित किया गया है, उन्हें 20 वर्षों की सेवा के आधार पर पूर्ण पेंशन दी जाए। यह फैसला केवल आर्थिक राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को चुनौती देता है जिसमें सेना जैसे संस्थानों में पुरुष वर्चस्व को स्वाभाविक माना जाता रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस निर्णय का व्यापक सामाजिक प्रभाव भी है। यह संदेश देता है कि देश की सुरक्षा और सेवा के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को सीमित नहीं किया जा सकता। समान अवसर और निष्पक्ष मूल्यांकन प्रणाली किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की पहचान होती है, और न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया है कि यह सिद्धांत सैन्य संस्थानों में भी लागू हो। इससे आने वाली पीढ़ियों की महिला अधिकारियों के लिए मार्ग अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत होगा।तीसरा निर्णय झूठी एफआईआर और सबूत गढ़ने के मामलों में न्यायालय के सख्त रुख को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी करते हुए यह संकेत दिया है कि कानून के दुरुपयोग को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वर्तमान व्यवस्था में झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया सीमित होने के कारण कई बार निर्दोष लोग लंबे समय तक कानूनी उलझनों में फंस जाते हैं। न्यायालय का यह कदम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है कि कानून का उपयोग न्याय के लिए हो, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध या उत्पीड़न के लिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह फैसला न्याय व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। एक ओर जहां पीड़ितों को न्याय दिलाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों के कारण सजा या मानसिक उत्पीड़न का सामना न करना पड़े। न्यायालय का यह हस्तक्षेप इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तीनों निर्णयों को यदि एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल कानून की व्याख्या नहीं कर रहा, बल्कि वह समाज में न्याय, समानता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों को मजबूत कर रहा है। धर्म परिवर्तन पर स्पष्टता, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और कानून के दुरुपयोग पर नियंत्रण ये तीनों पहलू एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन फैसलों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ये समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। क्या हम वास्तव में समानता के सिद्धांत को अपने व्यवहार में उतार पा रहे हैं? क्या हमारे संस्थान निष्पक्ष और पारदर्शी हैं? और क्या हम कानून का उपयोग जिम्मेदारी के साथ कर रहे हैं? ये प्रश्न केवल न्यायालय के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, यह कहा जा सकता है कि ये निर्णय भारत के संवैधानिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये न केवल वर्तमान परिस्थितियों का समाधान प्रस्तुत करते हैं, बल्कि भविष्य के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शन भी देते हैं। न्यायपालिका का यह सक्रिय और संतुलित दृष्टिकोण यह भरोसा दिलाता है कि देश में कानून का शासन केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक जीवंत और प्रभावी व्यवस्था है, जो हर नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:53:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रीडर्स से चलने वाला मीडिया ही स्वतंत्र रह सकता है, सरकारी मदद से चलने वाला कॉर्पोरेट मीडिया नहीं: जस्टिस नागरत्ना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "रीडर्स</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172133/only-media-run-by-readers-can-remain-independent-not-corporate"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/justice-bv-nagarathna-.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर जगह पर होता है।" उन्होंने इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग को एक पब्लिक गुड बताया, जिसे सब्सक्रिप्शन के ज़रिए सपोर्ट किया जाना चाहिए। सिविल सोसाइटी को यह समझना चाहिए कि इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग एक पब्लिक गुड है, जिसके लिए पैसे देने चाहिए। दूसरी ओर, अच्छी जर्नलिज़्म सिर्फ़ गुडविल पर नहीं चलती। जब कोई सब्सक्रिप्शन लेता है, तो वे असल में कह रहे होते हैं कि इस तरह की रिपोर्टिंग को सपोर्ट किया जाना चाहिए। अपने रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर स्थिति में होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट के मालिकाना हक वाला मीडिया फॉर्मली इंडिपेंडेंट रह सकता है, लेकिन फिर भी आर्थिक हकीकत और पॉलिटिकल लिंकेज से बंधा हो सकता है। उन्होंने कहा, "प्रेस स्टेट से आज़ाद हो सकता है। फिर भी कॉर्पोरेट पावर पर डिपेंडेंट हो सकता है, जो बदले में स्टेट के सपोर्ट पर डिपेंडेंट हो सकता है।" जस्टिस नागरत्ना ने चिंता जताई कि डायरेक्ट सेंसरशिप न होने पर भी एडिटोरियल इंडिपेंडेंस पर ओनरशिप के हितों और फाइनेंशियल डिपेंडेंसी का असर पड़ सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्रेस की आज़ादी के लिए सबसे गंभीर खतरे संविधान के आर्टिकल 19(2) के तहत सीधे प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि आर्टिकल 19(6) के तहत सही ठहराए गए आर्थिक और रेगुलेटरी प्रेशर से पैदा होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि ओनरशिप के नियम, लाइसेंसिंग कानून, टैक्सेशन पॉलिसी, एडवरटाइजिंग सिस्टम और एंटीट्रस्ट रेगुलेशन फॉर्मल कॉन्स्टिट्यूशनल कंप्लायंस बनाए रखते हुए इनडायरेक्टली एडिटोरियल चॉइस को शेप दे सकते हैं। उन्होंने कहा, "कानून प्रेस को चुप नहीं करा सकता, लेकिन यह उन कंडीशन को शेप दे सकता है, जिनके तहत स्पीच बनाई जाती है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रेस की आज़ादी के लिए सबसे गंभीर खतरे आर्टिकल 19(2) के तहत सीधे सेंसरशिप से नहीं, बल्कि आर्टिकल 19(6) के तहत सही ठहराए गए रेगुलेशन से पैदा होने की संभावना है। ओनरशिप के नियम, लाइसेंसिंग कानून, एडवरटाइजिंग पॉलिसी, टैक्सेशन और तेज़ी से बढ़ते एंटीट्रस्ट कानून सभी को आर्थिक रेगुलेशन के तौर पर बचाया जा सकता है, भले ही उनका एडिटोरियल इंडिपेंडेंस पर गहरा असर हो। यह राज्य को आर्टिकल 19(1)(a) का औपचारिक पालन करते हुए इनडायरेक्टली प्रेस को प्रभावित करने की इजाज़त देता है। इस तरह आज़ादी कानून में हो सकती है, लेकिन असल में कमज़ोर हो सकती है। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:52:15 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की ‘मनी पावर’ पर रोक लगाने की याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.</div>
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<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172131/supreme-court-seeks-response-from-election-commission-on-petition-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/सुप्रीम-कोर्ट-ने-राजनीतिक-दलों-की-‘मनी-पावर’-पर-रोक-लगाने-की-याचिका-पर-चुनाव-आयोग-से-जवाब-मांगा.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.</div>
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<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना पर आघात करता है.सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अन्य देशों में चुनावी खर्च की सीमाओं का उल्लेख करते हुए ऐसे नियामक उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए.उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में भी खर्च पर सीमाएं हैं, लेकिन उम्मीदवारों के मित्रों का क्या?’ उन्होंने आगे संभावित संवैधानिक चिंताओं को भी उठाया, यह सवाल करते हुए कि क्या खर्च पर रोक लगाने से संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भौतिक सहयोग के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके जवाब में भूषण ने चुनावी बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही अनियंत्रित राजनीतिक फंडिंग के लोकतंत्र पर पड़ने वाले विकृत प्रभाव को स्वीकार कर चुकी है.राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा तय करने की मांग वाली इसी तरह की एक याचिका, जिसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने दायर किया था, जनवरी 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली गई थी, ताकि नई याचिका दाखिल की जा सके.</div>
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<div style="text-align:justify;">15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को सर्वसम्मति से रद्द किए जाने के बाद वर्तमान याचिका का महत्व और बढ़ गया है.15 फरवरी, 2024 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉन्ड योजना को ‘असंवैधानिक’ करार दिया था. शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि यह योजना राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग का खुलासा करने में विफल रहने के कारण संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करती है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम, आयकर अधिनियम और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में चुनावी बॉन्ड से संबंधित प्रावधानों को भी अमान्य कर दिया था. इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड के खरीदारों और प्राप्तकर्ताओं की जानकारी भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया था.</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:47:04 +0530</pubDate>
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