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                <title>Indian Judiciary - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता मानकर सुप्रीम कोर्ट ने रचा सामाजिक न्याय का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181065/supreme-court-created-a-new-chapter-of-social-justice-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला भी है। सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे को लेकर सर्वोच्च अदालत ने जो मानक निर्धारित किया है वह महिलाओं के सम्मान और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता दोनों का प्रतीक है।</div>
<div>अदृश्य श्रम को मिली प्रतिष्ठा</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि गृहिणियों के काम का मूल्य कम से कम 30 हजार रुपए प्रतिमाह माना जाना चाहिए और इसी आधार पर मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि गृहिणियां केवल परिवार का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति हैं। यह टिप्पणी अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार इतने स्पष्ट और प्रभावशाली शब्दों में गृहिणियों की भूमिका को राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया है।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल किसी भी समाज की प्रगति का आधार मजबूत परिवार होता है और मजबूत परिवार का आधार अक्सर एक समर्पित महिला होती है। वह बिना किसी वेतन और अवकाश के चौबीसों घंटे कार्य करती है। उसकी मेहनत का कोई हिसाब नहीं रखा जाता और उसके योगदान को आर्थिक आंकड़ों में नहीं मापा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर महिलाओं के अदृश्य श्रम को वह सम्मान दिया है जिसकी मांग लंबे समय से की जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div>पुरानी सोच को बदलने वाला निर्णय है।अब तक सड़क दुर्घटना मामलों में गृहिणियों की आय का अनुमान अक्सर कुशल मजदूर की मजदूरी के आधार पर लगाया जाता था। यह व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक थी बल्कि महिलाओं के योगदान को कम करके आंकने वाली भी थी। अदालत ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि घरेलू कार्यों को सामान्य मजदूरी के पैमाने पर नहीं तौला जा सकता</div>
<div> </div>
<div>यह निर्णय इस बात की स्वीकारोक्ति है कि घर संभालना एक पूर्णकालिक और बहुआयामी जिम्मेदारी है। गृहिणी एक साथ प्रबंधक शिक्षक मार्गदर्शक परिचारिका और परिवार की भावनात्मक शक्ति के रूप में कार्य करती है। इसलिए उसके योगदान की तुलना किसी एक पेशे या मजदूरी से नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाकर न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत की है।</div>
<div> </div>
<div>महिला सम्मान की दिशा में बड़ा कदम कहा जा सकता है।</div>
<div>यह फैसला केवल मुआवजे की राशि बढ़ाने का मामला नहीं है बल्कि महिलाओं के सम्मान को कानूनी मान्यता देने का प्रयास भी है। भारतीय समाज में आज भी अनेक महिलाएं अपने कार्यों के लिए सामाजिक सराहना तो पाती हैं लेकिन आर्थिक पहचान नहीं मिलती। अदालत ने इस स्थिति को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</div>
<div> </div>
<div>जब देश की सर्वोच्च अदालत किसी गृहिणी को राष्ट्र निर्माता कहती है तब यह संदेश केवल न्यायालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज तक पहुंचता है। इससे महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है और यह स्वीकार किया जाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कार्यालयों और उद्योगों में नहीं बल्कि घरों के भीतर भी होता है।</div>
<div> </div>
<div>न्याय प्रणाली का  संवेदनशील उदाहरण है और इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता न्यायपालिका की संवेदनशीलता है। अदालत ने कहा कि मुआवजा तय करते समय केवल महिला की आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। उसकी उम्र शिक्षा कौशल पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक परिस्थितियां भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। यह दृष्टिकोण बताता है कि न्यायालय जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए निर्णय दे रहा है</div>
<div> </div>
<div>कई बार दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु के बाद परिवार केवल एक सदस्य को नहीं खोता बल्कि पूरे परिवार की व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। बच्चों का भविष्य बुजुर्गों की देखभाल और घर की स्थिरता पर गहरा असर पड़ता है। अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भावनात्मक और पारिवारिक क्षति को भी मुआवजे का हिस्सा माना है। यह न्याय की मानवीय और व्यावहारिक व्याख्या है।</div>
<div> </div>
<div>त्वरित न्याय के प्रति प्रतिबद्धता</div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुआवजे की गणना का नया आधार निर्धारित नहीं किया बल्कि न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों की निगरानी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश स्वयं करें और दावों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाए।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। दुर्घटना पीड़ित परिवार अक्सर वर्षों तक मुआवजे की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में अदालत का यह निर्देश न्याय को समयबद्ध और पीड़ित केंद्रित बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल सिद्धांतों की बात नहीं कर रहा बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना चाहता है</div>
<div>न्यायपालिका की प्रगतिशील सोच</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशील और दूरदर्शी सोच का परिचायक है। अदालत ने यह समझा कि बदलते समय में महिलाओं की भूमिका को पुराने मानकों से नहीं आंका जा सकता। आज महिलाओं का योगदान केवल आर्थिक कमाई तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूत बनाने में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
<div> </div>
<div>इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसकी वेतन पर्ची से नहीं तय किया जा सकता। समाज के लिए किए गए उसके योगदान को भी समान महत्व मिलना चाहिए। गृहिणियों के मामले में यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका अधिकांश श्रम घर की चारदीवारी के भीतर ही रह जाता है।</div>
<div>सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत शुरू हो चुका है।</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला भविष्य में व्यापक सामाजिक बदलाव का आधार बन सकता है। इससे महिलाओं के घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व पर नई चर्चा शुरू होगी। नीति निर्माण के स्तर पर भी घरेलू श्रम को लेकर गंभीर विचार हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे करोड़ों गृहिणियों को यह एहसास होगा कि उनके कार्यों को देश की सर्वोच्च अदालत ने सम्मान और मान्यता दी है</div>
<div> </div>
<div>समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि घर का काम स्वाभाविक जिम्मेदारी है और उसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू श्रम भी उतना ही मूल्यवान है जितना किसी अन्य पेशे में किया जाने वाला कार्य। यह विचार महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में सहायक होगा</div>
<div> </div>
<div>न्याय और सम्मान का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला है।सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने गृहिणियों के अदृश्य श्रम को पहचान दी है महिलाओं के सम्मान को नई ऊंचाई प्रदान की है और दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायपूर्ण राहत सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया है</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला बताता है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा देकर सर्वोच्च अदालत ने न्याय और संवेदनशीलता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। यह निर्णय आने वाले वर्षों में महिला सम्मान सामाजिक न्याय और मानवीय न्यायशास्त्र के एक आदर्श उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। भारत की न्याय प्रणाली ने इस फैसले के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा न्याय वही है जो समाज के सबसे अनदेखे और उपेक्षित योगदान को भी सम्मानपूर्वक पहचान दे सके।</div>
<div>     <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:01:28 +0530</pubDate>
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                <title>नया न्यायिक सवेरा – जब न्याय समय पर मिले, तो हर घाव भर जाता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों से न्यायालयों में गूंज रही “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर इसे एक निर्णायक और दूरगामी प्रहार माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय की सबसे बड़ी कसौटी केवल निर्णय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका समय पर मिलना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया की उस गंभीर खामी पर प्रहार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लाखों मुकदमेबाज वर्षों से प्रभावित होते रहे हैं। अनेक मामलों में बहस पूरी होने के बाद फैसले सुरक्षित रख लिए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें महीनों या वर्षों तक सुनाया नहीं जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप पक्षकार कानूनी अनिश्चितता में जीने को विवश हो जाते थे और उनका रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय तथा भविष्य अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में अटक जाता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक फैसलों का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सुनवाई नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर निर्णय भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आदेश की शक्ति उसके संवैधानिक आधार में निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर न्याय की अपेक्षा का भी संरक्षक है। जब किसी व्यक्ति का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य या स्वतंत्रता किसी फैसले पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब निर्णय में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए न्यायालय ने समयबद्ध न्याय को महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवैधानिक दायित्व माना है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत का यह कथन कि उन्होंने अपने लगभग पंद्रह वर्षों के हाईकोर्ट कार्यकाल में कभी किसी रिजर्व फैसले को तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी न्यायपालिका के लिए एक प्रेरक मानक प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने सबसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश आदर्श रूप से उसी दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अधिकतम अगले दिन जारी हो तथा इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचे। यह उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए बड़ी राहत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दोषसिद्धि के बिना लंबे समय से कारावास में हैं। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रक्रियागत देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। जमानत मंजूर होने के बाद उसका त्वरित लाभ मिलना ही वास्तविक न्याय है। इससे न केवल जेलों का बोझ घटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्यायपालिका में जनविश्वास भी और मजबूत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ऐतिहासिक निर्देश की सबसे बड़ी ताकत उसका जवाबदेह निगरानी तंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल समय-सीमा तय नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके पालन की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। तीन महीने के भीतर फैसला न आने पर मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा। साथ ही लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिल मामलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखकर न्यायालय ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाए रखा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल लंबित फैसलों के निस्तारण का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय व्यवस्था की कार्यसंस्कृति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और लगातार स्थगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी सुनवाई तथा निर्णयों में देरी ने आम नागरिक के मन में न्याय को एक थकाऊ और अंतहीन प्रक्रिया बना दिया था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि शीर्ष अदालत अब केवल अंतिम फैसले सुनाने तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र को अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। समयबद्ध निर्णयों की संस्कृति विकसित होने से न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मुकदमों के निस्तारण की गति को नई ऊर्जा मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सुधार की राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई हाईकोर्ट न्यायाधीशों की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ते मुकदमों के बोझ और जटिल मामलों की चुनौती से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में गहन अध्ययन के कारण निर्णय में अतिरिक्त समय भी स्वाभाविक है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा है। अतिरिक्त पीठों का गठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक केस मैनेजमेंट और प्रशासनिक दक्षता में सुधार इस बदलाव को गति दे सकते हैं। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार और गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी न्यायिक सुधार की असली कसौटी उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश मुकदमेबाजों को भरोसा देता है कि सुनवाई पूरी होने के बाद उनका मामला अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं रहेगा। किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत और समाज के कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध न्याय नई उम्मीद लेकर आएगा। समय पर मिला न्याय कानून की प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनविश्वास को मजबूत करता है। यदि इस निर्देश का प्रभावी पालन हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति अतीत बन सकती है और “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था की नई पहचान।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:40:55 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>एक ओर यूएपीए में जमानत,दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद का मामला बड़ी पीठ को भेजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ओर यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। दूसरी ओर एक दूसरे मामले में अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179982/on-one-hand-bail-in-uapa-on-the-other-hand"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ओर यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। दूसरी ओर एक दूसरे मामले में अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी। यह मामला संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद सामने आया था। सीजेआई सूर्यकांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह आदेश पारित किया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आतंकवाद और यूएपीए यानी गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामलों में जमानत देने के नियमों पर अहम फ़ैसला सुना दिया। कोर्ट ने दिल्ली दंगे मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले अपने पुराने फैसले पर सवाल उठाते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस मामले में शामिल दो अन्य आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने की अंतरिम जमानत भी दे दी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में फरवरी 2020 में </span>CAA <span lang="hi" xml:lang="hi">विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने कई लोगों पर आरोप लगाया कि उन्होंने दंगों की साज़िश रची थी। उमर खालिद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरजील इमाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तसलीम अहमद और खालिद सैफी समेत कई लोग यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट से कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत के नियमों पर दोबारा विचार होना चाहिए। उन्होंने हाल के एक फ़ैसले पर सवाल उठाया। इससे पहले न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने नार्को-टेरर मामले में स्येद इफ्तिखार अंदरबी को जमानत देते हुए कहा था कि यूएपीए मामलों में भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जमानत नियम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अपवाद</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">। उन्होंने उमर खालिद वाले पुराने फ़ैसले पर संदेह जताया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एसजी राजू ने कहा कि यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में सभी आरोपियों को एक जैसी छूट नहीं दी जा सकती है। हर मामले को अलग-अलग देखना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहरहाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि के ए नजीब वाले पुराने फैसले में दिए गए सिद्धांतों को लेकर अब भ्रम है। खासकर यूएपीए की धारा 43</span>D(<span lang="hi" xml:lang="hi">5) यानी जमानत के सख्त नियम और अनुच्छेद 21 यानी जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तय करना जरूरी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि एक बेंच दूसरे बराबर की बेंच के फ़ैसले को आसानी से नहीं बदल सकती। क़ानून में स्पष्टता होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए यह मुद्दा मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जा रहा है ताकि बड़ी बेंच बने और अंतिम फैसला दे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने के लिए अंतरिम जमानत मिल गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले इनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी जमानत नहीं मिली है। उनका मामला अब बड़ी बेंच तय करेगी।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच 2020 दिल्ली दंगे के दो आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान आतंकवाद और </span>UAPA <span lang="hi" xml:lang="hi">मामलों में जमानत को लेकर मतभेद के बीच केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेज दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अलग-अलग दो-जज की बेंचों के फैसले एक-दूसरे से उलट हैं। केंद्र सरकार ने सवाल उठाया कि क्या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बेल नियम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अपवाद है</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">वाला सिद्धांत आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में भी लागू होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर ट्रायल में देरी हो रही हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का उदाहरण दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और वकील रजत नायर ने कोर्ट में कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">अगर अजमल कसाब 7-8 साल जेल में रहने के बाद बेल मांगता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या उसे बेल दे देते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सैकड़ों गवाह हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबूत इकट्ठा करने में समय लगता है। इसी तरह अगर हाफिज सईद पाकिस्तान से आकर ट्रायल में 5 साल जेल में रह जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या सिर्फ देरी के आधार पर उसे बेल दे देंगे</span>?' <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का कहना है कि हर केस के तथ्यों को देखकर बेल देनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि सिर्फ जेल में कितना समय बीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस आधार पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फ़ैसला आने वाले समय में आतंकवाद और यूएपीए से जुड़े सभी जमानत मामलों पर असर डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जमानत क़ानून को और साफ़ करने के लिए बड़े फ़ैसले की तैयारी कर ली है। दो आरोपियों को राहत मिल गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उमर खालिद समेत बड़े सवाल अब बड़ी बेंच के सामने हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य मामले में  सीजेआई सूर्यकांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने  अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने आज जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी।पीठ ने यह भी कहा कि अगर अपीलकर्ता चल रहे मुक़दमे में सहयोग करने में नाकाम रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसे दी गई राहत का दुरुपयोग माना जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खास बात यह है कि कोर्ट ने पहले समय-समय पर आदेश जारी किए थे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि याचिकाकर्ता के खिलाफ गवाही देने वाले अहम/सुरक्षित गवाह बिना किसी डर के अपने बयान दर्ज करा सकें (याचिकाकर्ता की रिहाई से पहले)। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की सुनवाई के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने बताया कि हालांकि कुछ अहम/सुरक्षित गवाहों की जांच अभी बाकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके बयान सह-आरोपी की भूमिका से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि याचिकाकर्ता से।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखते हुए कि कुछ सह-आरोपियों को ज़मानत मिल चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि मुक़दमे के पूरा होने में समय लग सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हिरासत में पहले ही बिताई जा चुकी अवधि को ध्यान में रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने याचिकाकर्ता को ज़मानत दे दी। ज़मानत बांड संबंधित </span>NIA <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत की संतुष्टि के अनुसार जमा करने का निर्देश दिया गया। उक्त अदालत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता की संबंधित पुलिस थाने में उपस्थिति सुनिश्चित करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी मर्ज़ी के अनुसार शर्तें लगाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके वकील के अनुरोध पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने याचिकाकर्ता को </span>NIA <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत से वर्चुअली (सह-आरोपियों की तरह) पेश होने की अनुमति मांगने की भी छूट दी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अनुरोध पर अदालत द्वारा कानून के अनुसार विचार किया जाएगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बड़ी साज़िश का मास्टरमाइंड विभिन्न आतंकवादी संगठनों के बड़े नेता थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें लश्कर-ए-तैयबा (</span>LeT), <span lang="hi" xml:lang="hi">हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन (</span>HM), <span lang="hi" xml:lang="hi">अल-बद्र और पाकिस्तान में मौजूद अन्य संगठन शामिल थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चार्जशीट में आगे आरोप लगाया गया है कि यह साज़िश अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद रची गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ भारत के अन्य हिस्सों में भी आतंकवाद की घटनाओं को फिर से भड़काना था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य एजेंसी के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतंकवादी समूह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान में मौजूद अपने मददगारों और नेताओं के साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद अपने ओवर-ग्राउंड वर्करों (</span>OGWs) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सहयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसानी से प्रभावित होने वाले स्थानीय युवाओं को अपने प्रभाव में लेने और उन्हें कट्टरपंथी बनाने में शामिल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि उन्हें आतंकवाद की घटनाओं में शामिल होने के लिए भर्ती और प्रशिक्षित किया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">STF <span lang="hi" xml:lang="hi">ने बताया कि यह गैंग केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सचिवालय सुरक्षा बल और  ब राइफल्स की भर्ती परीक्षाओं में धांधली कर रहा था. आरोपियों ने ऑनलाइन परीक्षा सिस्टम को तकनीकी तरीके से प्रभावित कर उम्मीदवारों तक सही जवाब पहुंचाने की व्यवस्था बना रखी थी. बताया गया कि प्रत्येक उम्मीदवार से परीक्षा पास कराने के लिए करीब 4 लाख रुपये वसूले जाते थे.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सीधे </span>SSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के सर्वर को हैक नहीं किया था. इसके बजाय परीक्षा केंद्र पर प्रॉक्सी सर्वर इंस्टॉल किया गया था. स्क्रीन शेयरिंग एप्लिकेशन के जरिए प्रश्नपत्र बाहर बैठे सॉल्वरों तक पहुंचाया जाता था. वहां से सवाल हल कर उम्मीदवारों को सही जवाब भेजे जाते थे.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस ने बताया कि अरुण कुमार तकनीकी काम संभालता था और वही प्रॉक्सी सर्वर सिस्टम को ऑपरेट करता था. </span>STF <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है. एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इसी तरीके का इस्तेमाल अन्य भर्ती परीक्षाओं में भी किया गया था.</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 21:29:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'फॉर्च्युनर के लिए महिला की जान ले ली और  आरोपी पति को जमानत दे दी'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दहेज के लिए पत्नी की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध के आरोपी पति को जमानत देते वक्त हाईकोर्ट ने तथ्यों को पर गौर नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर जमानत दे दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में दहेज की वजह से शादीशुदा महिलाओं के साथ क्रूरता, हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178549/woman-killed-for-fortuner-and-accused-husband-granted-bail"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images245.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दहेज के लिए पत्नी की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध के आरोपी पति को जमानत देते वक्त हाईकोर्ट ने तथ्यों को पर गौर नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर जमानत दे दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में दहेज की वजह से शादीशुदा महिलाओं के साथ क्रूरता, हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि खासतौर पर ऐसे मामले उत्तर प्रदेश में देखे गए हैं. कोर्ट ने कहा कि 2023 के डेटा के अनुसार दुनियाभर में 6,156 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 2,122 उत्तर प्रदेश और 1,143 बिहार के हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, 'हमें यह देखकर अत्यंत दुख हुआ कि हाईकोर्ट ने दहेज हत्या जैसे संगीन अपराध में आरोपी को जमानत देते वक्त तथ्यों पर गौर नहीं किया. हमारा मानना है कि कोर्ट ने अभियुक्तों के पक्ष में अपने विवेक का प्रयोग करने में घोर त्रुटि की है.' कोर्ट ने कहा कि यह मामला महिलाओं के साथ दहेज को लेकर बढ़ती क्रूरता को दर्शाता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला साल 2024 का है, जब दहेज के लिए गाजियाबाद में एक महिला की हत्या कर दी गई थी. महिला की शादी फरवरी, 2019 में प्रिंस चौधरी नाम के शख्स से हुई थी. महिला के पिता ने एफआईआर में बताया कि उन्होंने शादी में 30 लाख रुपये खर्च किए, जिसमें एक आई20 कार और 10 लाख रुपये कैश शामिल हैं. कार एक एक्सीडेंट में डैमेज हो गई थी, जिसके बाद महिला का पति और ससुराल वाले एक फॉर्च्युनर कार और 10 लाख रुपये की डिमांड करने लगे.</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत के अनुसार जब ये मांग पूरी नहीं हुईं तो ससुरालवालों ने महिला का मारना शुरू कर दिया, उसको मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया. बाद में महिला के पिता ने 10 लाख रुपये की डिमांड पूरी कर दी. उन्होंने पति के रिश्तेदार के अकाउंट में 4 लाख रुपये ट्रांसफर किए और अलग-अलग मौकों पर 5 लाख रुपये कैश भी दिया. फिर भी ससुराल वाले महिला के साथ मारपीट करते रहे.</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत के अनुसार 11 जुलाई, 2024 को सुबह 7 बजे महिला ने रोते हुए पिता को फोन किया और बताया कि ससुराल में उसके साथ बहुत मारपीट हुई और उसको गला घोंटकर या फांसी लगाकर मारने की धमकी दी जा रही है. कुछ घंटे बाद महिला के घरवालों को एक रिश्तेदार ने फोन करके बताया कि उसको गला घोंटकर फांसी लगा दी गई है. जब महिला के पिता ससुराल पहुंचे तो वह वहां नहीं थी, उसको हॉस्पिटल ले जाया गया था, जहां पता चला कि वह मर चुकी है.</p>
<p style="text-align:justify;">हादसे के अगले ही दिन शिकायत दर्ज कर दी गई, जिसमें प्रिंस सहित 8 घरवालों को आरोपी बनाया गया. जांच के बाद प्रिंस और उसके माता पिता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और दहेज निषेध अधिनयम के तहत चार्जशीट दाखिल हुई.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:12:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाकर 38 करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> एक अहम घटनाक्रम में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को छोड़कर) से बढ़ाकर 38 (CJI को छोड़कर) करने के लिए एक बिल पेश करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। यह बिल 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन बिल, 2026', सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में ये संशोधन करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 33 (CJI को छोड़कर) की गई थी। यह प्रस्तावित कदम लंबित मामलों को देखते हुए उठाया जा रहा है। इस साल चार से ज़्यादा जजों के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178547/union-cabinet-approves-proposal-to-increase-the-number-of-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> एक अहम घटनाक्रम में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को छोड़कर) से बढ़ाकर 38 (CJI को छोड़कर) करने के लिए एक बिल पेश करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। यह बिल 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन बिल, 2026', सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में ये संशोधन करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 33 (CJI को छोड़कर) की गई थी। यह प्रस्तावित कदम लंबित मामलों को देखते हुए उठाया जा रहा है। इस साल चार से ज़्यादा जजों के रिटायर होने की संभावना को देखते हुए इस बिल को पेश करने से काम के बोझ में कुछ राहत मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:09:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धाकड़ अधिवक्ता रवि भूषण चौबे की बेटी रीतिका भी कठिन परिश्रम के साथ बनी सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के बक्सर ज़िले की प्रतिभाशाली बेटी रीतिका ने अपने अथक परिश्रम, अटूट विश्वास और परिवार के मजबूत सहयोग से आज एक नई पहचान स्थापित की है—एडवोकेट रीतिका के रूप में।उनके पिता रवि भूषण चौबे जो कि सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता होने के साथ-साथ Ravi Babita Support Foundation के संस्थापक हैं एवं निदेशक हैं, और माता श्रीमती बबीता कुमारी चौबे जो एक समाजसेवी एवं उसी संस्था की निदेशक है दोनों ने सदैव अपनी बेटी को न्याय के क्षेत्र में ऊँचाइयों तक पहुँचते देखने का सपना संजोया इस सफर में उनके भाई शिवांग जो B.A. LL.B के छात्र एवं सामाजिक कार्यकर्ता</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176921/ritika-daughter-of-powerful-advocate-ravi-bhushan-choubey-also-became"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260422-wa0010.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div style="text-align:justify;">बिहार के बक्सर ज़िले की प्रतिभाशाली बेटी रीतिका ने अपने अथक परिश्रम, अटूट विश्वास और परिवार के मजबूत सहयोग से आज एक नई पहचान स्थापित की है—एडवोकेट रीतिका के रूप में।उनके पिता रवि भूषण चौबे जो कि सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता होने के साथ-साथ Ravi Babita Support Foundation के संस्थापक हैं एवं निदेशक हैं, और माता श्रीमती बबीता कुमारी चौबे जो एक समाजसेवी एवं उसी संस्था की निदेशक है दोनों ने सदैव अपनी बेटी को न्याय के क्षेत्र में ऊँचाइयों तक पहुँचते देखने का सपना संजोया इस सफर में उनके भाई शिवांग जो B.A. LL.B के छात्र एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और छोटे भाई शौर्य कात्यायन का भरपूर सहयोग रहा परिवार के इस अटूट विश्वास और समर्थन ने रीतिका के सपनों को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई दिनांक 20 अप्रैल 2026 को, Bar Council of Delhi में नामांकन के पश्चात सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित चैंबर नंबर 108 D-ब्लॉक में एक गौरवपूर्ण क्षण साकार हुआ, जब वरिष्ठ अधिवक्ता भी,पी यादव ने रीतिका को एडवोकेट बैंड पहनाकर न्याय के पथ पर अग्रसर होने का आशीर्वाद प्रदान किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं दूसरी तरफ इस शुभ अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित अधिवक्ता मनोज कुमार चौबे , दीपक कुमार चौबे तथा अन्य कई सम्मानित अधिवक्ताओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए रीतिका को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं इस दौरान, चैंबर से लेकर सुप्रीम कोर्ट के Advocates’ Sitting Room और Lounge तक बार-बार शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ जो इस उपलब्धि की गरिमा और उत्साह को और भी बढ़ा रहा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज रीतिका न केवल अपने गृह जनपद बक्सर बिहार का, बल्कि बलजीत नगर नई दिल्ली और सबौली, सोनीपत हरियाणा का नाम भी गर्व से रोशन कर रही हैं। यह उपलब्धि हर उस बेटी के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को सच करने का साहस रखती है अंत में एडवोकेट रीतिका एवं उनके पिता रवि भूषण चौबे ने वरिष्ठ अधिवक्ता बी. पी. यादव अधिवक्ता मनोज कुमार चौधरी तथा सभी सम्मानित अधिवक्ता साथियों  और शुभचिंतकों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया। रवि भूषण चौबे एडवोकेट का सम्पूर्ण समाज के माता-पिता व बेटीयां को संदेश जब परिवार का साथ और खुद पर विश्वास हो तो हर बेटीयों का हौसला अफजाई हो सकता है।</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:52:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सार्वजनिक न्याय की नई दिशा, सुप्रीम कोर्ट के तीन ऐतिहासिक फैसले और बदलता भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की संरचना, अधिकारों की परिभाषा और राज्य की जिम्मेदारियों को नई दिशा देते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए तीन महत्वपूर्ण निर्णय धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे पर स्पष्टता, सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के साथ समानता सुनिश्चित करना, और झूठी एफआईआर के मामलों में सख्त रुख—इसी श्रेणी में आते हैं। ये फैसले न केवल संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174157/new-direction-of-public-justice-three-historic-decisions-of-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की संरचना, अधिकारों की परिभाषा और राज्य की जिम्मेदारियों को नई दिशा देते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए तीन महत्वपूर्ण निर्णय धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे पर स्पष्टता, सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के साथ समानता सुनिश्चित करना, और झूठी एफआईआर के मामलों में सख्त रुख—इसी श्रेणी में आते हैं। ये फैसले न केवल संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय, समान अवसर और कानून के दुरुपयोग पर एक संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहला और सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला निर्णय धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जाति के दर्जे से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 की उस मूल भावना को दोहराता है, जिसमें अनुसूचित जातियों की पहचान ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और छुआछूत की प्रथाओं से जुड़ी हुई है, जो मुख्यतः हिंदू सामाजिक ढांचे में विद्यमान रही हैं। न्यायालय का यह कहना कि धर्म परिवर्तन के साथ ही एससी का दर्जा और उससे जुड़े सभी वैधानिक लाभ तत्काल समाप्त हो जाते हैं, एक कठोर लेकिन स्पष्ट संदेश है कि आरक्षण और विशेष अधिकारों का आधार सामाजिक उत्पीड़न की ऐतिहासिक वास्तविकता है, न कि केवल जातीय पहचान।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह निर्णय उन बहसों को भी नई दिशा देता है, जो लंबे समय से धर्मांतरण और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को लेकर चल रही थीं। कुछ पक्षों का तर्क रहा है कि भले ही व्यक्ति धर्म बदल ले, लेकिन सामाजिक भेदभाव का प्रभाव समाप्त नहीं होता, जबकि दूसरी ओर यह भी कहा जाता रहा है कि आरक्षण का उद्देश्य विशेष रूप से उन समुदायों को राहत देना है जो एक विशिष्ट सामाजिक संरचना में उत्पीड़ित रहे हैं। न्यायालय ने इस जटिल बहस में संवैधानिक प्रावधानों को प्राथमिकता देते हुए स्पष्टता प्रदान की है। इससे नीति निर्माताओं और समाज दोनों के लिए यह समझना आसान होगा कि सामाजिक न्याय की योजनाएं किन आधारों पर लागू होती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय भारतीय सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के अधिकारों से संबंधित है। न्यायालय ने यह माना कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत कार्यरत महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने में जो मापदंड अपनाए गए, वे असमान और भेदभावपूर्ण थे। अदालत ने न केवल इस असमानता पर आपत्ति जताई, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को प्रमोशन से वंचित किया गया है, उन्हें 20 वर्षों की सेवा के आधार पर पूर्ण पेंशन दी जाए। यह फैसला केवल आर्थिक राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को चुनौती देता है जिसमें सेना जैसे संस्थानों में पुरुष वर्चस्व को स्वाभाविक माना जाता रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस निर्णय का व्यापक सामाजिक प्रभाव भी है। यह संदेश देता है कि देश की सुरक्षा और सेवा के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को सीमित नहीं किया जा सकता। समान अवसर और निष्पक्ष मूल्यांकन प्रणाली किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की पहचान होती है, और न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया है कि यह सिद्धांत सैन्य संस्थानों में भी लागू हो। इससे आने वाली पीढ़ियों की महिला अधिकारियों के लिए मार्ग अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत होगा।तीसरा निर्णय झूठी एफआईआर और सबूत गढ़ने के मामलों में न्यायालय के सख्त रुख को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी करते हुए यह संकेत दिया है कि कानून के दुरुपयोग को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वर्तमान व्यवस्था में झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया सीमित होने के कारण कई बार निर्दोष लोग लंबे समय तक कानूनी उलझनों में फंस जाते हैं। न्यायालय का यह कदम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है कि कानून का उपयोग न्याय के लिए हो, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध या उत्पीड़न के लिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह फैसला न्याय व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। एक ओर जहां पीड़ितों को न्याय दिलाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों के कारण सजा या मानसिक उत्पीड़न का सामना न करना पड़े। न्यायालय का यह हस्तक्षेप इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तीनों निर्णयों को यदि एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल कानून की व्याख्या नहीं कर रहा, बल्कि वह समाज में न्याय, समानता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों को मजबूत कर रहा है। धर्म परिवर्तन पर स्पष्टता, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और कानून के दुरुपयोग पर नियंत्रण ये तीनों पहलू एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन फैसलों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ये समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। क्या हम वास्तव में समानता के सिद्धांत को अपने व्यवहार में उतार पा रहे हैं? क्या हमारे संस्थान निष्पक्ष और पारदर्शी हैं? और क्या हम कानून का उपयोग जिम्मेदारी के साथ कर रहे हैं? ये प्रश्न केवल न्यायालय के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, यह कहा जा सकता है कि ये निर्णय भारत के संवैधानिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये न केवल वर्तमान परिस्थितियों का समाधान प्रस्तुत करते हैं, बल्कि भविष्य के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शन भी देते हैं। न्यायपालिका का यह सक्रिय और संतुलित दृष्टिकोण यह भरोसा दिलाता है कि देश में कानून का शासन केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक जीवंत और प्रभावी व्यवस्था है, जो हर नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/174157/new-direction-of-public-justice-three-historic-decisions-of-supreme</link>
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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:53:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रीडर्स से चलने वाला मीडिया ही स्वतंत्र रह सकता है, सरकारी मदद से चलने वाला कॉर्पोरेट मीडिया नहीं: जस्टिस नागरत्ना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "रीडर्स</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172133/only-media-run-by-readers-can-remain-independent-not-corporate"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/justice-bv-nagarathna-.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर जगह पर होता है।" उन्होंने इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग को एक पब्लिक गुड बताया, जिसे सब्सक्रिप्शन के ज़रिए सपोर्ट किया जाना चाहिए। सिविल सोसाइटी को यह समझना चाहिए कि इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग एक पब्लिक गुड है, जिसके लिए पैसे देने चाहिए। दूसरी ओर, अच्छी जर्नलिज़्म सिर्फ़ गुडविल पर नहीं चलती। जब कोई सब्सक्रिप्शन लेता है, तो वे असल में कह रहे होते हैं कि इस तरह की रिपोर्टिंग को सपोर्ट किया जाना चाहिए। अपने रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर स्थिति में होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट के मालिकाना हक वाला मीडिया फॉर्मली इंडिपेंडेंट रह सकता है, लेकिन फिर भी आर्थिक हकीकत और पॉलिटिकल लिंकेज से बंधा हो सकता है। उन्होंने कहा, "प्रेस स्टेट से आज़ाद हो सकता है। फिर भी कॉर्पोरेट पावर पर डिपेंडेंट हो सकता है, जो बदले में स्टेट के सपोर्ट पर डिपेंडेंट हो सकता है।" जस्टिस नागरत्ना ने चिंता जताई कि डायरेक्ट सेंसरशिप न होने पर भी एडिटोरियल इंडिपेंडेंस पर ओनरशिप के हितों और फाइनेंशियल डिपेंडेंसी का असर पड़ सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्रेस की आज़ादी के लिए सबसे गंभीर खतरे संविधान के आर्टिकल 19(2) के तहत सीधे प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि आर्टिकल 19(6) के तहत सही ठहराए गए आर्थिक और रेगुलेटरी प्रेशर से पैदा होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि ओनरशिप के नियम, लाइसेंसिंग कानून, टैक्सेशन पॉलिसी, एडवरटाइजिंग सिस्टम और एंटीट्रस्ट रेगुलेशन फॉर्मल कॉन्स्टिट्यूशनल कंप्लायंस बनाए रखते हुए इनडायरेक्टली एडिटोरियल चॉइस को शेप दे सकते हैं। उन्होंने कहा, "कानून प्रेस को चुप नहीं करा सकता, लेकिन यह उन कंडीशन को शेप दे सकता है, जिनके तहत स्पीच बनाई जाती है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रेस की आज़ादी के लिए सबसे गंभीर खतरे आर्टिकल 19(2) के तहत सीधे सेंसरशिप से नहीं, बल्कि आर्टिकल 19(6) के तहत सही ठहराए गए रेगुलेशन से पैदा होने की संभावना है। ओनरशिप के नियम, लाइसेंसिंग कानून, एडवरटाइजिंग पॉलिसी, टैक्सेशन और तेज़ी से बढ़ते एंटीट्रस्ट कानून सभी को आर्थिक रेगुलेशन के तौर पर बचाया जा सकता है, भले ही उनका एडिटोरियल इंडिपेंडेंस पर गहरा असर हो। यह राज्य को आर्टिकल 19(1)(a) का औपचारिक पालन करते हुए इनडायरेक्टली प्रेस को प्रभावित करने की इजाज़त देता है। इस तरह आज़ादी कानून में हो सकती है, लेकिन असल में कमज़ोर हो सकती है। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:52:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की ‘मनी पावर’ पर रोक लगाने की याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172131/supreme-court-seeks-response-from-election-commission-on-petition-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/सुप्रीम-कोर्ट-ने-राजनीतिक-दलों-की-‘मनी-पावर’-पर-रोक-लगाने-की-याचिका-पर-चुनाव-आयोग-से-जवाब-मांगा.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना पर आघात करता है.सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अन्य देशों में चुनावी खर्च की सीमाओं का उल्लेख करते हुए ऐसे नियामक उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए.उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में भी खर्च पर सीमाएं हैं, लेकिन उम्मीदवारों के मित्रों का क्या?’ उन्होंने आगे संभावित संवैधानिक चिंताओं को भी उठाया, यह सवाल करते हुए कि क्या खर्च पर रोक लगाने से संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भौतिक सहयोग के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके जवाब में भूषण ने चुनावी बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही अनियंत्रित राजनीतिक फंडिंग के लोकतंत्र पर पड़ने वाले विकृत प्रभाव को स्वीकार कर चुकी है.राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा तय करने की मांग वाली इसी तरह की एक याचिका, जिसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने दायर किया था, जनवरी 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली गई थी, ताकि नई याचिका दाखिल की जा सके.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को सर्वसम्मति से रद्द किए जाने के बाद वर्तमान याचिका का महत्व और बढ़ गया है.15 फरवरी, 2024 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉन्ड योजना को ‘असंवैधानिक’ करार दिया था. शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि यह योजना राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग का खुलासा करने में विफल रहने के कारण संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करती है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम, आयकर अधिनियम और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में चुनावी बॉन्ड से संबंधित प्रावधानों को भी अमान्य कर दिया था. इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड के खरीदारों और प्राप्तकर्ताओं की जानकारी भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया था.</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:47:04 +0530</pubDate>
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