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                <title>Supreme Court India - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Supreme Court India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>हमारी भाषाएँ मर रही हैं, हम अंग्रेज़ी में उनका श्राद्ध कर रहे हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट का हालिया प्रश्न</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">—</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या अंग्रेज़ी को भारत की स्वदेशी भाषा माना जा सकता है</span>?—<span lang="hi" xml:lang="hi">सिर्फ न्यायालय का सवाल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की भाषाई चेतना पर दस्तक है। यह बहस अंग्रेज़ी के पक्ष-विपक्ष की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस मानसिकता की है जिसने आज़ादी के आठ दशक बाद भी भाषा को आत्मसम्मान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैसियत का पैमाना बना रखा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आई अंग्रेज़ी आज विश्वविद्यालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक और कॉरपोरेट जगत की प्रमुख भाषा है। करोड़ों भारतीय इसे शिक्षा और रोज़गार का माध्यम बना चुके हैं</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183429/our-languages-are-dying-we-are-paying-tribute-to-them"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट का हालिया प्रश्न</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या अंग्रेज़ी को भारत की स्वदेशी भाषा माना जा सकता है</span>?—<span lang="hi" xml:lang="hi">सिर्फ न्यायालय का सवाल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की भाषाई चेतना पर दस्तक है। यह बहस अंग्रेज़ी के पक्ष-विपक्ष की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस मानसिकता की है जिसने आज़ादी के आठ दशक बाद भी भाषा को आत्मसम्मान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैसियत का पैमाना बना रखा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आई अंग्रेज़ी आज विश्वविद्यालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायालयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक और कॉरपोरेट जगत की प्रमुख भाषा है। करोड़ों भारतीय इसे शिक्षा और रोज़गार का माध्यम बना चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए इसे पूरी तरह विदेशी कहना यथार्थ से मुंह मोड़ना होगा। पर क्या लंबे उपयोग से कोई भाषा स्वदेशी हो जाती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वदेशी का आधार इतिहास होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति या सुविधा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने भाषा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय आत्मविश्वास का प्रश्न उठाया है। वही आत्मविश्वास जिसने कभी संस्कृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंगाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मराठी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़िया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्नड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलुगु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मलयालम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असमिया और सैकड़ों बोलियों के बल पर विश्व को ज्ञान दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज अपने ही देश में स्वयं को सिद्ध करने के लिए विदेशी भाषा का सहारा खोजता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रश्न का सबसे बड़ा कटघरा हमारी न्याय व्यवस्था है। संविधान के अनुच्छेद </span>348 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अधिकांश उच्च न्यायालयों की कार्यवाही व निर्णय आज भी अंग्रेज़ी में होते हैं। विडंबना यह है कि न्याय उसी नागरिक के लिए लिखा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसकी भाषा नहीं समझता। स्वयं न्यायालय भी मान चुका है कि फैसलों और आदेशों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय तभी सार्थक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह जनता की भाषा में पहुंचे। फिर भी अदालतों में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व निर्विवाद है। लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यदि जनता की भाषा से दूर रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो न्याय और नागरिक के बीच दूरी बनी रहेगी। क्या केवल वर्षों के प्रयोग से अंग्रेज़ी स्वदेशी हो जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या न्याय व्यवस्था को भारतीय भाषाओं से जोड़ना ही लोकतांत्रिक सुधार होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय तक समान पहुंच का है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का सबसे कठोर सत्य यह है कि अंग्रेज़ी भारत में केवल भाषा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्गीय शक्ति का प्रतीक बन चुकी है। यही भाषा कुछ के लिए अवसरों का द्वार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लाखों के लिए अदृश्य दीवार। महंगे विद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईआईटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईआईएम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुराष्ट्रीय कंपनियां और वैश्विक संस्थाएं इसे योग्यता की पहली शर्त मानती हैं। वहीं गांव का प्रतिभाशाली विद्यार्थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दलित-बहुजन युवा और मातृभाषा में शिक्षित लाखों छात्र क्षमता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा की बाधा से पीछे छूट जाते हैं। तीन-भाषा नीति पर वर्षों से जारी बहस और दक्षिण भारत का प्रतिरोध इसी भाषाई वर्चस्व की आशंका का संकेत है। यदि अंग्रेज़ी को स्वदेशी मान लेने से यह असमानता और गहरी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या हम नई गुलामी को ही वैधता नहीं दे रहे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी सत्ता तलवार से चलती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भाषा के प्रमाणपत्र से चलती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास इस बहस का सबसे ईमानदार साक्षी है। </span>1835 <span lang="hi" xml:lang="hi">में लॉर्ड मैकॉले ने स्पष्ट लिखा था कि उसका उद्देश्य ऐसे भारतीय तैयार करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रक्त और रंग से भारतीय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुचि और बुद्धि से अंग्रेज़ हों। यह केवल शिक्षा नीति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक उपनिवेश की योजना थी। स्वतंत्र भारत ने राजनीतिक आज़ादी तो पा ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भाषाई स्वाधीनता का संघर्ष अधूरा रह गया। समय के साथ अंग्रेज़ी का स्वरूप भी बदला है। आज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हिंग्लिश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तम्लिश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंग्लिश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी मिश्रित भाषाएं बताती हैं कि भारत हर भाषा को अपना रंग दे सकता है। अंग्रेज़ी भी अब भारतीय अनुभवों से समृद्ध है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह बदलाव हमारी </span>22 <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों की कीमत पर हो रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि नई पीढ़ी मातृभाषा से पहले अंग्रेज़ी में सोचने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल भाषा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक स्मृति के क्षरण का संकेत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया का अनुभव भारत को स्पष्ट संकेत देता है। जापान ने जापानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मनी ने जर्मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस ने फ़्रांसीसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन ने मंदारिन और इज़राइल ने पुनर्जीवित हिब्रू के बल पर ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान और राष्ट्रीय पहचान को सशक्त बनाया। इन देशों ने अंग्रेज़ी सीखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका उपयोग किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसे अपनी पहचान पर हावी नहीं होने दिया। भारत का मार्ग टकराव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलन का होना चाहिए। नई शिक्षा नीति मातृभाषा आधारित शिक्षा पर बल देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजीनियरिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधि की पढ़ाई और बहुभाषी डिजिटल ज्ञान-संसाधन बताते हैं कि ज्ञान अब अंग्रेज़ी की कैद में नहीं है। फिर अंग्रेज़ी को स्वदेशी घोषित करने की जल्दबाज़ी क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">असली चुनौती अंग्रेज़ी को हटाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय भाषाओं को उस स्तर तक पहुंचाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ किसी विद्यार्थी का भविष्य उसकी भाषा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा तय करे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं सुप्रीम कोर्ट का प्रश्न सबसे अधिक दूरदर्शी बन जाता है। यह हिंदी बनाम अंग्रेज़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर बनाम दक्षिण या किसी भाषा की श्रेष्ठता का विवाद नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस भारत की खोज है जहाँ हर बच्चा मातृभाषा में सोच सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्रीय भाषा से समाज से जुड़े और अंग्रेज़ी के माध्यम से दुनिया से संवाद करे। यही बहुभाषिक भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि अंग्रेज़ी को स्वदेशी कहकर भारतीय भाषाओं की उपेक्षा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोकगीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोककथाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकविज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्रीय साहित्य और हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृतियां हाशिए पर चली जाएंगी। लेकिन यदि अंग्रेज़ी वैश्विक अवसरों की भाषा और भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय जीवन की आत्मा बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे प्रतिद्वंद्वी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्पर सहयोगी होंगी। भाषा का भविष्य प्रतिस्पर्धा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह-अस्तित्व सुरक्षित करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे बड़ा भ्रम यही है कि स्वदेशी का अर्थ केवल उत्पत्ति से है। भारत का इतिहास बताता है कि उसने अनेक संस्कृतियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारों और भाषाओं को अपनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अपनी आत्मा कभी नहीं खोई। इसलिए न अंग्रेज़ी का विरोध समाधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न महिमामंडन। असली प्रश्न यह है कि निर्णय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान और आने वाली पीढ़ी के सपनों की भाषा कौन होगी। यदि प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोध और तकनीकी शिक्षा भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अंग्रेज़ी कभी चुनौती नहीं बनेगी। लेकिन यदि भारतीय भाषाएं घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कविता और उत्सव तक सिमट गईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अंग्रेज़ी सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान व अवसर की भाषा बन गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही मानसिक असमानता लौटेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी नींव औपनिवेशिक शासन ने रखी थी। गुलामी केवल विदेशी शासन से नहीं आती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तब भी आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई समाज अपनी भाषा पर विश्वास खो देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कोई भाषाई निर्णय नहीं दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत के सामने एक मूल प्रश्न रख दिया—क्या भाषा केवल सुविधा का माध्यम होगी या राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेज़ी वैश्विक अवसरों का द्वार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन भारत की सभ्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना और सांस्कृतिक चेतना भारतीय भाषाओं में ही जीवित हैं। इसलिए न अंग्रेज़ी का विरोध समाधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न उसे स्वदेशी मानकर भारतीय भाषाओं का विकल्प बनाना। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ न्याय जनता की भाषा में मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा मातृभाषा में विकसित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक हर भारतीय भाषा को समान अवसर दे और अंग्रेज़ी दुनिया से संवाद का सेतु बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभुत्व का नहीं। अंततः यह बहस अंग्रेज़ी की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के भाषाई आत्मविश्वास की है। जो राष्ट्र अपनी भाषाओं को सम्मान देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही अपने ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति और भविष्य को भी सुरक्षित रखता है। भारत की वास्तविक भाषाई स्वतंत्रता अंग्रेज़ी को स्वदेशी सिद्ध करने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय जीवन का स्वाभाविक आधार बनाने में है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 21:50:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल चुनाव: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वोट काउंटिंग के दौरान राज्य का नॉमिनी मौजूद रहेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>भारत के इलेक्शन कमीशन (चुनाव आयोग) ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के लिए वोट काउंटिंग सुपरवाइज़र की नियुक्ति से जुड़े सर्कुलर का पालन करेगा।भारत के इलेक्शन कमीशन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि 4 मई को वोट काउंटिंग राज्य सरकार के नॉमिनी की मौजूदगी में होगी। चुनाव आयोग के वकील नायडू ने कहा, "हम कह रहे हैं कि राज्य सरकार का नॉमिनी वहां होगा। इन सबसे पहले भी इसका पालन किया जाएगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">बार एंड बेंच के अनुसार जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जॉयमाल्या</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177974/west-bengal-election-commission-told-supreme-court-that-the-states"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/ah2nk1so_supreme-court_625x300_26_january_25.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>भारत के इलेक्शन कमीशन (चुनाव आयोग) ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के लिए वोट काउंटिंग सुपरवाइज़र की नियुक्ति से जुड़े सर्कुलर का पालन करेगा।भारत के इलेक्शन कमीशन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि 4 मई को वोट काउंटिंग राज्य सरकार के नॉमिनी की मौजूदगी में होगी। चुनाव आयोग के वकील नायडू ने कहा, "हम कह रहे हैं कि राज्य सरकार का नॉमिनी वहां होगा। इन सबसे पहले भी इसका पालन किया जाएगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">बार एंड बेंच के अनुसार जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जॉयमाल्या बागची की बेंच पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के लिए वोट काउंटिंग सुपरवाइज़र के तौर पर सिर्फ़ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को तैनात करने के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर के फैसले के खिलाफ ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने नायडू की यह बात रिकॉर्ड की। कि ECI उसके सर्कुलर का पूरी तरह पालन करेगा। इसलिए, उसने कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ TMC की अपील पर कोई भी आदेश देने से मना कर दिया।कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "SLP में आगे किसी आदेश की ज़रूरत नहीं है। हम मिस्टर नायडू की बात रिकॉर्ड करते हैं कि ECI के सर्कुलर का पूरी तरह से पालन किया जाए।मामले की आज अर्जेंट सुनवाई हुई क्योंकि वोटों की गिनती 4 मई को होनी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसने गुरुवार को याचिका खारिज कर दी थी।हाई कोर्ट ने कहा कि काउंटिंग सुपरवाइज़र और काउंटिंग असिस्टेंट को राज्य सरकार या केंद्र सरकार से नियुक्त करना इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया (ECI) का अधिकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट ने कहा, "इस कोर्ट को राज्य सरकार के कर्मचारी के बजाय केंद्र सरकार/केंद्रीय PSU कर्मचारी से काउंटिंग सुपरवाइज़र और काउंटिंग असिस्टेंट नियुक्त करने में कोई गैर-कानूनी बात नहीं लगती।"इसने आगे कहा कि अगर TMC को लगता है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी BJP उम्मीदवारों का पक्ष ले रहे हैं, तो वह बाद में नतीजों को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दायर कर सकती है।इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 22:41:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा की  अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला रखा सुरक्षित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुयान सरमा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि असम के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई पासपोर्ट हैं और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं। इन आरोपों के बाद रिनिकी भुइयां शर्मा ने खेड़ा और अन्य के खिलाफ गुवाहाटी क्राइम ब्रांच थाने में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177745/supreme-court-reserves-verdict-on-pawan-khedas-anticipatory-bail-plea"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/pawan-khera-2.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुयान सरमा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि असम के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई पासपोर्ट हैं और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं। इन आरोपों के बाद रिनिकी भुइयां शर्मा ने खेड़ा और अन्य के खिलाफ गुवाहाटी क्राइम ब्रांच थाने में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोप ट्रायल का विषय हैं और गिरफ्तारी की कोई आवश्यकता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि जिन धाराओं में मामला दर्ज है, उनमें से कई जमानती हैं और बाकी में भी गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, इसलिए अग्रिम जमानत से इनकार करना उचित नहीं होगा। सिंहवी ने यह भी तर्क दिया कि यदि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत नहीं दी जाती, तो इस कानूनी प्रावधान का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं, असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि खेड़ा ने मुख्यमंत्री की पत्नी के पासपोर्ट से जुड़े फर्जी और छेड़छाड़ किए गए दस्तावेज पेश किए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि खेड़ा जांच से बच रहे हैं और लगातार वीडियो जारी कर गलत तथ्यों को प्रचारित कर रहे हैं। मेहता ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप निराधार और गलत हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पवन खेड़ा ने 24 अप्रैल को गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत देने से इनकार करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इससे पहले तेलंगाना हाई कोर्ट ने उन्हें सात दिनों की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी, लेकिन असम पुलिस की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इस राहत पर अंतरिम रोक लगा दी और खेड़ा को गुवाहाटी हाईकोर्ट का रुख करने को कहा था। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं, जो तय करेगा कि पवन खेड़ा को गिरफ्तारी से राहत मिलेगी या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:12:05 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>अरविंद केजरीवाल ने किया जस्टिस स्वर्णकांता के कोर्ट का बहिष्कार, कहा- न्याय की उम्मीद नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर बताया कि उनके कोर्ट के समक्ष वो खुद या वकील के जरिए पेश नहीं होंगे। मेरी जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है, इसलिए मैंने गांधीजी के सत्याग्रह पर चलने का फैसला लिया है।आप नेता ने कहा, “मैंने यह फैसला अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है।” साथ ही उन्होंने कानूनी विकल्प भी खुला रखा। पत्र में उन्होंने जोड़ा, “मैं जस्टिस स्वर्णकांता के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित रखता हूं।”</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटनाक्रम उन दिनों बाद आया है जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177435/arvind-kejriwal-boycotted-justice-swarnakantas-court-and-said-there"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/justice-swarana-kanta-arvind-kejriwal-2026-04-daca29956d6964f435922dd3db6b6bc3-1200x900.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर बताया कि उनके कोर्ट के समक्ष वो खुद या वकील के जरिए पेश नहीं होंगे। मेरी जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है, इसलिए मैंने गांधीजी के सत्याग्रह पर चलने का फैसला लिया है।आप नेता ने कहा, “मैंने यह फैसला अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है।” साथ ही उन्होंने कानूनी विकल्प भी खुला रखा। पत्र में उन्होंने जोड़ा, “मैं जस्टिस स्वर्णकांता के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित रखता हूं।”</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटनाक्रम उन दिनों बाद आया है जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद को मामले से हटाने (रिक्यूज) से इनकार कर दिया। केजरीवाल ने पूर्व में पक्षपात और हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए रिक्यूजल की मांग की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत पर जोर दिया और निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को अस्वीकार किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केजरीवाल का पत्र और संदेशपत्र में केजरीवाल ने जोर देकर कहा कि वे जज के न्याय देने की क्षमता पर भरोसा खो चुके हैं। उन्होंने गांधीजी के अहिंसक विरोध के रास्ते को अपनाने का फैसला लिया है। इस कदम ने दिल्ली एक्साइज पॉलिसी घोटाले से जुड़े मामले में उनकी कानूनी लड़ाई को नया मोड़ दे दिया है।इससे पहले हुई सुनवाई पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिल्ली आबकारी नीति मामले से रिक्यूज करने यानी खुद को अलग करने से इनकार कर दिया था। उनके रिक्यूजल को लेकर दायर की गई याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस शर्मा ने कहा, 'मैं इस केस से रिक्यूज़ नहीं करूंगी। मैं इस केस की सुनवाई करूंगी।' इसके साथ ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा अन्य आरोपियों की याचिका खारिज कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फरवरी 2026 में ट्रायल कोर्ट ने शराब नीति मामले में केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कविता और अन्य 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने सीबीआई की जांच की भी कड़ी आलोचना की थी। सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की है। इस अपील की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा कर रही हैं। केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक और अन्य ने भी रिक्यूजल की याचिका दायर की थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:38:29 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कांग्रेस नेता पवन खेड़ा पहुंचे सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मानहानि और जालसाजी के एक मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  यह मामला असम पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज किया है। पवन खेड़ा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खेड़ा ने रविवार को एक स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की है, और इस मामले को डायरी नंबर 25523/2026 के तौर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177433/congress-leader-pawan-kheda-reached-supreme-court-and-challenged-assam"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/8figkh4o_pawan-khera-pti_625x300_27_april_23.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मानहानि और जालसाजी के एक मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  यह मामला असम पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज किया है। पवन खेड़ा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खेड़ा ने रविवार को एक स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की है, और इस मामले को डायरी नंबर 25523/2026 के तौर पर रजिस्टर किया गया है। शाम करीब 6.26 बजे दायर की गई यह याचिका फिलहाल 'पेंडिंग' के तौर पर लिस्टेड है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह याचिका गौहाटी हाईकोर्ट की ओर से खेड़ा को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार करने के दो दिन बाद आई है। जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया की सिंगल-जज बेंच ने फैसला सुनाया था कि कांग्रेस नेता 'गिरफ्तारी से पहले जमानत का विशेषाधिकार पाने के हकदार नहीं हैं।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौहाटी हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि इस मामले को सिर्फ मानहानि का मामला नहीं कहा जा सकता। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 339 के तहत पहली नजर में मामला बनने के सबूत मौजूद हैं।असम पुलिस ने उनके खिलाफ मानहानि और जालसाजी का मामला दर्ज किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत कुमार सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा ने दर्ज कराया है। उन्होंने खेड़ा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। खेड़ा ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई विदेशी पासपोर्ट और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177433/congress-leader-pawan-kheda-reached-supreme-court-and-challenged-assam</link>
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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:35:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मामलों के लंबित रहने के लिए केवल न्यायाधीशों को दोष न दें: न्यायमूर्ति अमानुल्लाह</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175923/dont-blame-judges-alone-for-pendency-of-cases-justice-amanullah"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supreme-court-judge.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को भी आत्ममंथन करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि लंबी-लंबी बहसें करना और बार-बार तारीख लेना जैसी आदतें मामलों के निपटारे में देरी का कारण बनती हैं, इसलिए इन पर विचार कर सुधार करना जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता’ विषय पर आईसीए के पांचवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि न्यायाधीश पहले से ही प्रतिदिन बहुत बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘निचली अदालत के स्तर पर, किसी भी न्यायाधीश के पास प्रतिदिन 400-500 से कम मामलों की सूची नहीं होती है। उच्च न्यायालयों में यह संख्या और भी अधिक है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हालांकि न्यायाधीशों को तय घंटों के लिए अदालत में बैठना और उनके सामने सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई करना अनिवार्य है, लेकिन वे वकीलों द्वारा की गई बहस के समय को हमेशा कम नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि हालांकि न्यायाधीश कभी-कभी वकीलों को अपनी दलीलों को दोहराने से रोक सकते हैं, लेकिन वे उन्हें अपना मामला पूरी तरह से प्रस्तुत करने की अनुमति देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:42:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>'न्याय नहीं, देरी व दबाव के लिए हो रहे कई मुकदमे', मुकदमों की बढ़ती संख्या पर सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते मुकदमों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों में दाखिल हो रहे कई मामले न्याय पाने की वास्तविक इच्छा से कम और कार्यवाही में देरी करने, विरोधियों को परेशान करने तथा न्यायिक समय बर्बाद करने के उद्देश्य से अधिक प्रेरित दिखाई देते हैं।</p><p style="text-align:justify;">अदालत ने साफ किया कि न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल वास्तविक और गंभीर विवादों का समाधान करना है, न कि बार-बार या बेतुके दावों को बढ़ावा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174775/many-cases-are-happening-for-delay-and-pressure-not-justice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supream-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते मुकदमों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों में दाखिल हो रहे कई मामले न्याय पाने की वास्तविक इच्छा से कम और कार्यवाही में देरी करने, विरोधियों को परेशान करने तथा न्यायिक समय बर्बाद करने के उद्देश्य से अधिक प्रेरित दिखाई देते हैं।</p><p style="text-align:justify;">अदालत ने साफ किया कि न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल वास्तविक और गंभीर विवादों का समाधान करना है, न कि बार-बार या बेतुके दावों को बढ़ावा देना।</p><p style="text-align:justify;">यदि कोई पक्ष जानबूझकर निरर्थक या परेशान करने वाले मुकदमे दायर करता है, तो अदालत ऐसे मामलों को खारिज करने के साथ-साथ जुर्माना भी लगा सकती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी एक विवाद को अलग-अलग तरीकों से बार-बार उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। एक बार जब कोई मामला सक्षम अदालत में पूरी तरह सुना और तय हो जाता है, तो उसी मुद्दे को दोबारा उठाना न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ है। इससे न केवल अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है, बल्कि अन्य मामलों में न्याय मिलने में भी देरी होती है।</p><p style="text-align:justify;">देश भर में लगभग 5.5 करोड़ केस लंबित हैं, जिनमें ज्यादातर निचली अदालतों में हैं। सर्वोच्च न्यायालय में 10 वर्ष से ज्यादा समय से 698 से अधिक जनहित याचिकाएं लंबित हैं। वहीं कुल 3500 जनहित याचिकाएं आजतक सुनवाई का इंतजार कर रहीं हैं। जिन्हें पिछले 42 वर्षों में भी नहीं निपटाया जा सका।</p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट  ने यह टिप्पणी एक सिविल अपील को खारिज करते हुए की । मामला हैदराबाद के हिमायत नगर स्थित एक संपत्ति विवाद से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, हालांकि उसके कुछ तर्कों से असहमति भी जताई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:40:52 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सार्वजनिक न्याय की नई दिशा, सुप्रीम कोर्ट के तीन ऐतिहासिक फैसले और बदलता भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की संरचना, अधिकारों की परिभाषा और राज्य की जिम्मेदारियों को नई दिशा देते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए तीन महत्वपूर्ण निर्णय धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे पर स्पष्टता, सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के साथ समानता सुनिश्चित करना, और झूठी एफआईआर के मामलों में सख्त रुख—इसी श्रेणी में आते हैं। ये फैसले न केवल संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174157/new-direction-of-public-justice-three-historic-decisions-of-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की संरचना, अधिकारों की परिभाषा और राज्य की जिम्मेदारियों को नई दिशा देते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए तीन महत्वपूर्ण निर्णय धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे पर स्पष्टता, सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के साथ समानता सुनिश्चित करना, और झूठी एफआईआर के मामलों में सख्त रुख—इसी श्रेणी में आते हैं। ये फैसले न केवल संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि न्यायपालिका सामाजिक न्याय, समान अवसर और कानून के दुरुपयोग पर एक संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहला और सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला निर्णय धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जाति के दर्जे से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 की उस मूल भावना को दोहराता है, जिसमें अनुसूचित जातियों की पहचान ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और छुआछूत की प्रथाओं से जुड़ी हुई है, जो मुख्यतः हिंदू सामाजिक ढांचे में विद्यमान रही हैं। न्यायालय का यह कहना कि धर्म परिवर्तन के साथ ही एससी का दर्जा और उससे जुड़े सभी वैधानिक लाभ तत्काल समाप्त हो जाते हैं, एक कठोर लेकिन स्पष्ट संदेश है कि आरक्षण और विशेष अधिकारों का आधार सामाजिक उत्पीड़न की ऐतिहासिक वास्तविकता है, न कि केवल जातीय पहचान।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह निर्णय उन बहसों को भी नई दिशा देता है, जो लंबे समय से धर्मांतरण और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को लेकर चल रही थीं। कुछ पक्षों का तर्क रहा है कि भले ही व्यक्ति धर्म बदल ले, लेकिन सामाजिक भेदभाव का प्रभाव समाप्त नहीं होता, जबकि दूसरी ओर यह भी कहा जाता रहा है कि आरक्षण का उद्देश्य विशेष रूप से उन समुदायों को राहत देना है जो एक विशिष्ट सामाजिक संरचना में उत्पीड़ित रहे हैं। न्यायालय ने इस जटिल बहस में संवैधानिक प्रावधानों को प्राथमिकता देते हुए स्पष्टता प्रदान की है। इससे नीति निर्माताओं और समाज दोनों के लिए यह समझना आसान होगा कि सामाजिक न्याय की योजनाएं किन आधारों पर लागू होती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय भारतीय सैन्य बलों में महिला अधिकारियों के अधिकारों से संबंधित है। न्यायालय ने यह माना कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत कार्यरत महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने में जो मापदंड अपनाए गए, वे असमान और भेदभावपूर्ण थे। अदालत ने न केवल इस असमानता पर आपत्ति जताई, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को प्रमोशन से वंचित किया गया है, उन्हें 20 वर्षों की सेवा के आधार पर पूर्ण पेंशन दी जाए। यह फैसला केवल आर्थिक राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को चुनौती देता है जिसमें सेना जैसे संस्थानों में पुरुष वर्चस्व को स्वाभाविक माना जाता रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस निर्णय का व्यापक सामाजिक प्रभाव भी है। यह संदेश देता है कि देश की सुरक्षा और सेवा के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को सीमित नहीं किया जा सकता। समान अवसर और निष्पक्ष मूल्यांकन प्रणाली किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की पहचान होती है, और न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया है कि यह सिद्धांत सैन्य संस्थानों में भी लागू हो। इससे आने वाली पीढ़ियों की महिला अधिकारियों के लिए मार्ग अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत होगा।तीसरा निर्णय झूठी एफआईआर और सबूत गढ़ने के मामलों में न्यायालय के सख्त रुख को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी करते हुए यह संकेत दिया है कि कानून के दुरुपयोग को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वर्तमान व्यवस्था में झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया सीमित होने के कारण कई बार निर्दोष लोग लंबे समय तक कानूनी उलझनों में फंस जाते हैं। न्यायालय का यह कदम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है कि कानून का उपयोग न्याय के लिए हो, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध या उत्पीड़न के लिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह फैसला न्याय व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। एक ओर जहां पीड़ितों को न्याय दिलाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों के कारण सजा या मानसिक उत्पीड़न का सामना न करना पड़े। न्यायालय का यह हस्तक्षेप इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तीनों निर्णयों को यदि एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल कानून की व्याख्या नहीं कर रहा, बल्कि वह समाज में न्याय, समानता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों को मजबूत कर रहा है। धर्म परिवर्तन पर स्पष्टता, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और कानून के दुरुपयोग पर नियंत्रण ये तीनों पहलू एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन फैसलों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ये समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। क्या हम वास्तव में समानता के सिद्धांत को अपने व्यवहार में उतार पा रहे हैं? क्या हमारे संस्थान निष्पक्ष और पारदर्शी हैं? और क्या हम कानून का उपयोग जिम्मेदारी के साथ कर रहे हैं? ये प्रश्न केवल न्यायालय के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, यह कहा जा सकता है कि ये निर्णय भारत के संवैधानिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये न केवल वर्तमान परिस्थितियों का समाधान प्रस्तुत करते हैं, बल्कि भविष्य के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शन भी देते हैं। न्यायपालिका का यह सक्रिय और संतुलित दृष्टिकोण यह भरोसा दिलाता है कि देश में कानून का शासन केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक जीवंत और प्रभावी व्यवस्था है, जो हर नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 18:53:25 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट मामले में क्लासिफाइड फाइलों पर सीबीआई  को सुप्रीम कोर्ट का निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को एक महीने के अंदर यह तय करने का निर्देश दिया कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) में कथित गड़बड़ियों को 2007 में छपी एक किताब में उजागर करने के लिए ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) के तहत ट्रायल का सामना कर रहे एक रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर को “सेंसिटिव” डॉक्यूमेंट्स दिए जाएं या नहीं।</p><p style="text-align:justify;">शुक्रवार को एक सुनवाई में, टॉप कोर्ट ने कहा कि अगर ये डॉक्यूमेंट्स ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत उन पर मुकदमा चलाने का आधार हैं, तो गोपनीयता उन्हें ये डॉक्यूमेंट्स देने से मना करने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172566/supreme-court-directs-cbi-on-classified-files-in-official-secrets"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को एक महीने के अंदर यह तय करने का निर्देश दिया कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) में कथित गड़बड़ियों को 2007 में छपी एक किताब में उजागर करने के लिए ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) के तहत ट्रायल का सामना कर रहे एक रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर को “सेंसिटिव” डॉक्यूमेंट्स दिए जाएं या नहीं।</p><p style="text-align:justify;">शुक्रवार को एक सुनवाई में, टॉप कोर्ट ने कहा कि अगर ये डॉक्यूमेंट्स ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत उन पर मुकदमा चलाने का आधार हैं, तो गोपनीयता उन्हें ये डॉक्यूमेंट्स देने से मना करने का आधार नहीं हो सकती। जस्टिस जेके माहेश्वरी और अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने कहा: “अगर आप (सीबीआई) उनके खिलाफ डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि वे गोपनीय हैं। आप इस कोर्ट से आदेश लिए बिना ही कोई रास्ता निकाल सकते हैं।”</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट मेजर जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह की फाइल की गई पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने 2007 में अपने रिटायरमेंट के तुरंत बाद पब्लिश हुई अपनी किताब “इंडियाज़ एक्सटर्नल इंटेलिजेंस - सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ )” में रॉ के अंदर की गड़बड़ियों का पर्दाफाश किया था।</p><p style="text-align:justify;">सिंह के वकील सुरूर मंदर ने बताया कि ये डॉक्यूमेंट्स उनके डिफेंस के लिए बहुत ज़रूरी हैं। “मेरे क्लाइंट को 12 डॉक्यूमेंट्स और चार गवाहों के बयान चाहिए।” उन्होंने बताया कि ट्रायल कोर्ट ने उनके फेवर में फैसला सुनाया था और कुछ कंडीशंस के तहत हर डॉक्यूमेंट की एक कॉपी देने का निर्देश दिया था। लेकिन मंदर ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने उस फैसले को यह कहते हुए पलट दिया कि कॉन्फिडेंशियलिटी के तहत सिर्फ डॉक्यूमेंट्स की जांच की इजाज़त है।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने सीबीआई  से पूछा, “आप उन्हें डॉक्यूमेंट्स क्यों नहीं दे रहे हैं?” सीबीआई  की तरफ से कोर्ट में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) दविंदर पाल सिंह रिप्रेजेंट कर रहे थे।</p><p style="text-align:justify;"><br /></p><p style="text-align:justify;">ASG ने कहा, “इन डॉक्यूमेंट्स से सेंसिटिविटी जुड़ी हुई है। उन्हें सिर्फ यह जानने में इंटरेस्ट है कि वे कौन से डॉक्यूमेंट्स हैं। हाई कोर्ट ने जांच की इजाज़त दी है, जिससे उनका मकसद पूरा होता है।”</p><p style="text-align:justify;">सीबीआई  ने आरोप लगाया कि सिंह ने नवंबर 2002 से जून 2004 तक कैबिनेट सेक्रेटेरिएट (R&amp;AW) में जॉइंट सेक्रेटरी के तौर पर काम किया और अपने ऑफिशियल काम के दौरान, रॉ  से जुड़ी क्लासिफाइड जानकारी तक उनकी पहुँच थी। सीबीआई  के मुताबिक, किताब में ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन करते हुए कई “क्लासिफाइड सीक्रेट जानकारी” छापी गई, जिसमें कई अधिकारियों के नाम और उनके डेज़िग्नेशन, काम, स्टेशन कोड और दूसरी टेक्निकल डिटेल्स शामिल थीं।</p><p style="text-align:justify;"><strong>इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को होगी</strong></p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने सीबीआई  से कहा, “हमारा मकसद यह पक्का करना है कि कुछ डॉक्यूमेंट्स से फंसा हुआ कोई व्यक्ति उसी मटीरियल से वंचित न रहे।”सीबीआई ने इंस्ट्रक्शन्स लेने के लिए चार हफ़्ते बाद मामले की सुनवाई करने की रिक्वेस्ट की। मंदर ने ट्रायल पर रोक लगाने की रिक्वेस्ट की, जिसे बेंच ने ज़रूरी नहीं समझा क्योंकि इन प्रोसीडिंग्स में सीबीआई  का रिप्रेजेंटेशन था।सीबीआई  ने सितंबर 2007 में सिंह के खिलाफ देश की सिक्योरिटी को नुकसान पहुंचाने वाली सीक्रेट जानकारी का खुलासा करने का आरोप लगाते हुए केस रजिस्टर किया था। अप्रैल 2008 में, सेंटर ने OSA के तहत चार्जशीट फाइल करने की मंज़ूरी दे दी।</p><p style="text-align:justify;">2009 में, ट्रायल कोर्ट ने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के सेक्शन 3 और 5 के तहत चार्जशीट पर संज्ञान लिया, जो “जासूसी” और “गलत कम्युनिकेशन” के अलावा इंडियन पीनल कोड के तहत पब्लिक सर्वेंट द्वारा क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के दूसरे अपराधों से संबंधित थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:31:52 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>रीडर्स से चलने वाला मीडिया ही स्वतंत्र रह सकता है, सरकारी मदद से चलने वाला कॉर्पोरेट मीडिया नहीं: जस्टिस नागरत्ना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "रीडर्स</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172133/only-media-run-by-readers-can-remain-independent-not-corporate"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/justice-bv-nagarathna-.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार को कहा कि रीडर्स से चलने वाला प्रेस इंडिपेंडेंट रहने के लिए सबसे अच्छी जगह है, उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट ओनरशिप स्ट्रक्चर अक्सर मीडिया ऑर्गनाइज़ेशन को आर्थिक मदद के ज़रिए सरकारी असर के प्रति कमज़ोर बना देते हैं। नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 सेरेमनी में मुख्य भाषण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर देकर कहा कि इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म तभी ज़िंदा रह सकता है जब उसे रीडर्स और सिविल सोसाइटी का सीधा सपोर्ट मिले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, "रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर जगह पर होता है।" उन्होंने इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग को एक पब्लिक गुड बताया, जिसे सब्सक्रिप्शन के ज़रिए सपोर्ट किया जाना चाहिए। सिविल सोसाइटी को यह समझना चाहिए कि इंडिपेंडेंट रिपोर्टिंग एक पब्लिक गुड है, जिसके लिए पैसे देने चाहिए। दूसरी ओर, अच्छी जर्नलिज़्म सिर्फ़ गुडविल पर नहीं चलती। जब कोई सब्सक्रिप्शन लेता है, तो वे असल में कह रहे होते हैं कि इस तरह की रिपोर्टिंग को सपोर्ट किया जाना चाहिए। अपने रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और पॉलिटिकल प्रेशर से बचने के लिए बेहतर स्थिति में होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने चेतावनी दी कि कॉर्पोरेट के मालिकाना हक वाला मीडिया फॉर्मली इंडिपेंडेंट रह सकता है, लेकिन फिर भी आर्थिक हकीकत और पॉलिटिकल लिंकेज से बंधा हो सकता है। उन्होंने कहा, "प्रेस स्टेट से आज़ाद हो सकता है। फिर भी कॉर्पोरेट पावर पर डिपेंडेंट हो सकता है, जो बदले में स्टेट के सपोर्ट पर डिपेंडेंट हो सकता है।" जस्टिस नागरत्ना ने चिंता जताई कि डायरेक्ट सेंसरशिप न होने पर भी एडिटोरियल इंडिपेंडेंस पर ओनरशिप के हितों और फाइनेंशियल डिपेंडेंसी का असर पड़ सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि प्रेस की आज़ादी के लिए सबसे गंभीर खतरे संविधान के आर्टिकल 19(2) के तहत सीधे प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि आर्टिकल 19(6) के तहत सही ठहराए गए आर्थिक और रेगुलेटरी प्रेशर से पैदा होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि ओनरशिप के नियम, लाइसेंसिंग कानून, टैक्सेशन पॉलिसी, एडवरटाइजिंग सिस्टम और एंटीट्रस्ट रेगुलेशन फॉर्मल कॉन्स्टिट्यूशनल कंप्लायंस बनाए रखते हुए इनडायरेक्टली एडिटोरियल चॉइस को शेप दे सकते हैं। उन्होंने कहा, "कानून प्रेस को चुप नहीं करा सकता, लेकिन यह उन कंडीशन को शेप दे सकता है, जिनके तहत स्पीच बनाई जाती है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रेस की आज़ादी के लिए सबसे गंभीर खतरे आर्टिकल 19(2) के तहत सीधे सेंसरशिप से नहीं, बल्कि आर्टिकल 19(6) के तहत सही ठहराए गए रेगुलेशन से पैदा होने की संभावना है। ओनरशिप के नियम, लाइसेंसिंग कानून, एडवरटाइजिंग पॉलिसी, टैक्सेशन और तेज़ी से बढ़ते एंटीट्रस्ट कानून सभी को आर्थिक रेगुलेशन के तौर पर बचाया जा सकता है, भले ही उनका एडिटोरियल इंडिपेंडेंस पर गहरा असर हो। यह राज्य को आर्टिकल 19(1)(a) का औपचारिक पालन करते हुए इनडायरेक्टली प्रेस को प्रभावित करने की इजाज़त देता है। इस तरह आज़ादी कानून में हो सकती है, लेकिन असल में कमज़ोर हो सकती है। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:52:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की ‘मनी पावर’ पर रोक लगाने की याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172131/supreme-court-seeks-response-from-election-commission-on-petition-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/सुप्रीम-कोर्ट-ने-राजनीतिक-दलों-की-‘मनी-पावर’-पर-रोक-लगाने-की-याचिका-पर-चुनाव-आयोग-से-जवाब-मांगा.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह नोटिस जारी किया. पीठ ने कहा कि यह मामला जटिल संवैधानिक सवाल उठाता है और छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि राजनीतिक दलों द्वारा ‘मनी पावर’ का बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना पर आघात करता है.सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अन्य देशों में चुनावी खर्च की सीमाओं का उल्लेख करते हुए ऐसे नियामक उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए.उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में भी खर्च पर सीमाएं हैं, लेकिन उम्मीदवारों के मित्रों का क्या?’ उन्होंने आगे संभावित संवैधानिक चिंताओं को भी उठाया, यह सवाल करते हुए कि क्या खर्च पर रोक लगाने से संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भौतिक सहयोग के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके जवाब में भूषण ने चुनावी बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही अनियंत्रित राजनीतिक फंडिंग के लोकतंत्र पर पड़ने वाले विकृत प्रभाव को स्वीकार कर चुकी है.राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा तय करने की मांग वाली इसी तरह की एक याचिका, जिसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने दायर किया था, जनवरी 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली गई थी, ताकि नई याचिका दाखिल की जा सके.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को सर्वसम्मति से रद्द किए जाने के बाद वर्तमान याचिका का महत्व और बढ़ गया है.15 फरवरी, 2024 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉन्ड योजना को ‘असंवैधानिक’ करार दिया था. शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि यह योजना राजनीतिक दलों को मिलने वाली फंडिंग का खुलासा करने में विफल रहने के कारण संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करती है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम, आयकर अधिनियम और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में चुनावी बॉन्ड से संबंधित प्रावधानों को भी अमान्य कर दिया था. इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड के खरीदारों और प्राप्तकर्ताओं की जानकारी भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया था.</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:47:04 +0530</pubDate>
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