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                <title>Maritime Security Challenge - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Maritime Security Challenge RSS Feed</description>
                
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                <title>मध्यपूर्व की जंग और विश्व व्यवस्था पर मंडराता संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में छिड़ी इजराइल अमेरिका और ईरान के बीच की भीषण सैन्य टकराहट ने वैश्विक राजनीति को अस्थिर कर दिया है। इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर की गई एयरस्ट्राइक तथा उसके जवाब में ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक दिया है। खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाए जाने से यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा बल्कि बहुस्तरीय क्षेत्रीय युद्ध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। यदि यह टकराव लंबा खिंचता है तो इसके दूरगामी प्रभाव पूरी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172014/middle-east-war-and-the-crisis-looming-on-the-world"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/मध्यपूर्व-की-जंग-और-विश्व-व्यवस्था-पर-मंडराता-संकट.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में छिड़ी इजराइल अमेरिका और ईरान के बीच की भीषण सैन्य टकराहट ने वैश्विक राजनीति को अस्थिर कर दिया है। इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर की गई एयरस्ट्राइक तथा उसके जवाब में ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक दिया है। खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाए जाने से यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा बल्कि बहुस्तरीय क्षेत्रीय युद्ध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। यदि यह टकराव लंबा खिंचता है तो इसके दूरगामी प्रभाव पूरी दुनिया को प्रभावित करेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आगे की स्थिति बेहद संवेदनशील है। ईरान यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बनाता है तो ऊर्जा आपूर्ति की वैश्विक धमनियां प्रभावित होंगी। यह मार्ग विश्व के बड़े हिस्से के कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति का मुख्य रास्ता है। यदि इस मार्ग पर सैन्य गतिविधि बढ़ती है या आवागमन बाधित होता है तो ऊर्जा संकट गहरा सकता है। इससे न केवल तेल की कीमतों में उछाल आएगा बल्कि परिवहन लागत और उत्पादन लागत भी बढ़ेगी। ऊर्जा पर निर्भर उद्योगों में महंगाई का दबाव बढ़ेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">व्यापार पर इसका असर बहुआयामी होगा। खाड़ी क्षेत्र एशिया यूरोप और अफ्रीका के बीच एक प्रमुख व्यापारिक सेतु है। दुबई दोहा रियाद जैसे शहर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और लॉजिस्टिक्स के बड़े केंद्र हैं। यदि हवाई क्षेत्र बंद होते हैं और समुद्री मार्ग असुरक्षित होते हैं तो कंटेनर शिपिंग और एयर कार्गो पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जहाजों को लंबा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ेगा जिससे समय और लागत दोनों बढ़ेंगे। वैश्विक सप्लाई चेन जो पहले ही महामारी और अन्य भू राजनीतिक संकटों से जूझ चुकी है वह फिर से बाधित हो सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स ऑटोमोबाइल फार्मास्यूटिकल्स और खाद्य तेल जैसे क्षेत्रों में कीमतें बढ़ने की आशंका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत जैसे देशों के लिए स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक हो सकती है क्योंकि ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। यदि तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो चालू खाता घाटा और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ेगा। सरकारों को ईंधन सब्सिडी या करों में राहत देने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं जिससे राजकोषीय संतुलन प्रभावित होगा। साथ ही खाड़ी देशों में कार्यरत प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा और उनकी आय पर भी असर पड़ सकता है जिससे रेमिटेंस में कमी आ सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉलर की कीमत पर भी इस युद्ध का गहरा प्रभाव पड़ सकता है। परंपरागत रूप से वैश्विक संकट के समय निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर भागते हैं और अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित मुद्रा माना जाता है। इसलिए शुरुआती चरण में डॉलर की मांग बढ़ सकती है जिससे अन्य मुद्राओं के मुकाबले उसकी कीमत मजबूत हो सकती है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं दबाव में आ सकती हैं और उनके केंद्रीय बैंकों को विनिमय दर स्थिर रखने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। हालांकि यदि युद्ध लंबा चलता है और अमेरिका सीधे बड़े पैमाने पर सैन्य संलिप्तता बढ़ाता है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी राजकोषीय दबाव बढ़ेगा। रक्षा व्यय में वृद्धि और वैश्विक व्यापार में गिरावट का असर अमेरिकी विकास दर पर पड़ सकता है जिससे दीर्घकाल में डॉलर की मजबूती सीमित हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोना और अन्य सुरक्षित निवेश साधनों में तेजी देखने को मिल सकती है। निवेशक जोखिम से बचने के लिए शेयर बाजार से पूंजी निकालकर सुरक्षित परिसंपत्तियों में निवेश कर सकते हैं। इससे शेयर बाजारों में गिरावट और अस्थिरता बढ़ेगी। तेल उत्पादक देशों की आय बढ़ सकती है यदि कीमतें ऊंची रहती हैं लेकिन आयातक देशों के लिए यह महंगाई और आर्थिक दबाव का कारण बनेगा। वैश्विक केंद्रीय बैंक ब्याज दरों की नीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो सकते हैं क्योंकि एक ओर महंगाई का खतरा होगा और दूसरी ओर विकास दर में गिरावट का जोखिम।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक स्तर पर भी इस संघर्ष के दूरगामी परिणाम होंगे। यदि रूस और चीन जैसे देश अप्रत्यक्ष रूप से ईरान का समर्थन करते हैं और पश्चिमी देश इजराइल के साथ खड़े रहते हैं तो वैश्विक ध्रुवीकरण और गहरा सकता है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका कसौटी पर होगी। कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं यदि समय रहते मजबूत नहीं की गईं तो यह युद्ध क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक भू राजनीतिक संघर्ष में बदल सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या पक्ष वार्ता की मेज पर लौटते हैं या सैन्य कार्रवाई को और तेज करते हैं। यदि मिसाइल हमले और जवाबी हमले जारी रहते हैं तो तेल मार्गों और व्यापारिक नेटवर्क पर खतरा बना रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही मंदी की आशंका से जूझ रही है ऐसे में यह युद्ध उसे और कमजोर कर सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह जरूरी है कि वह तत्काल तनाव कम करने और स्थायी शांति की दिशा में ठोस प्रयास करे क्योंकि इस संघर्ष का दायरा जितना बढ़ेगा उसका प्रभाव उतना ही गहरा और व्यापक होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 18:16:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>खामेनेई के बाद की ईरान की रणनीति और भारत पर उसका असर</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><span style="font-size:12pt;font-family:Mangal, serif;color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></p>
<p style="text-align:justify;">  </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु और उसके बाद मोजतबा खामेनेई का सत्ता के केंद्र में आना ईरान के इतिहास का वह मोड़ है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहाँ से वापसी का रास्ता केवल संघर्ष और रणनीतिक आक्रामकता से होकर गुजरता है। ईरान की आगामी रणनीति अब केवल अस्तित्व बचाने की नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि अपने खोये हुए गौरव और नेतृत्व के अपमान का बदला लेने की है। अहमद वाहिदी जैसे कट्टरपंथी सैन्य रणनीतिकार के हाथों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की कमान होने का सीधा अर्थ है कि ईरान अब "रणनीतिक धैर्य" की नीति को त्यागकर "प्रत्यक्ष प्रतिशोध" के युग में प्रवेश</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172010/irans-strategy-after-khamenei-and-its-impact-on-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1c7rr4sk_ayatollah-ali-khamenei-afp_625x300_01_march_26.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><span style="font-size:12pt;font-family:Mangal, serif;color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु और उसके बाद मोजतबा खामेनेई का सत्ता के केंद्र में आना ईरान के इतिहास का वह मोड़ है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहाँ से वापसी का रास्ता केवल संघर्ष और रणनीतिक आक्रामकता से होकर गुजरता है। ईरान की आगामी रणनीति अब केवल अस्तित्व बचाने की नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि अपने खोये हुए गौरव और नेतृत्व के अपमान का बदला लेने की है। अहमद वाहिदी जैसे कट्टरपंथी सैन्य रणनीतिकार के हाथों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की कमान होने का सीधा अर्थ है कि ईरान अब "रणनीतिक धैर्य" की नीति को त्यागकर "प्रत्यक्ष प्रतिशोध" के युग में प्रवेश कर चुका है। मोजतबा खामेनेई के लिए चुनौती दोहरी है: उन्हें न केवल अपने पिता की विरासत को सुरक्षित रखना है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि देश के भीतर पनप रहे असंतोष और बाहर से हो रहे सैन्य प्रहारों के बीच एक संतुलन बनाना है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ईरान की अगली चालों में सबसे महत्वपूर्ण उसका परमाणु कार्यक्रम होगा। अंतरराष्ट्रीय दबाव और हमलों के बावजूद</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ईरान अब परमाणु हथियार की क्षमता को एक "अंतिम सुरक्षा कवच" के रूप में देख रहा है। 2025-26 के इस कालखंड में ईरान का 90 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन करना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि एक भू-राजनीतिक ब्लैकमेल का हथियार है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो पश्चिम को सीधे टकराव से रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। क्षेत्रीय स्तर पर</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ईरान अपने "एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस" यानी हिजबुल्लाह</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हूती और हमास को नई ऊर्जा और आधुनिक हथियारों से लैस करेगा ताकि इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर लगातार दबाव बना रहे। होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी ईरान का वह ब्रह्मास्त्र है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसे वह वैश्विक अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस भीषण उथल-पुथल के बीच भारत की स्थिति अत्यंत नाजुक और चुनौतीपूर्ण हो गई है। भारत के लिए ईरान केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुँचने का प्रवेश द्वार है। ईरान में इस तरह का नेतृत्व परिवर्तन और युद्ध की स्थिति भारत की </span><span>'</span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी</span><span>' </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यानी रणनीतिक स्वायत्तता की कड़ी परीक्षा है। भारत ने हमेशा से एक संतुलनकारी शक्ति की भूमिका निभाई है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहाँ उसने एक तरफ इजरायल के साथ गहरे रक्षा संबंध बनाए रखे हैं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक निवेशों के जरिए अपनी कनेक्टिविटी को सुरक्षित किया है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खामेनेई के बाद यदि ईरान पूरी तरह से चीन और रूस के पाले में चला जाता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जैसा कि वर्तमान संकेतों से लग रहा है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो भारत के लिए अपनी स्वायत्तता बनाए रखना कठिन होगा। अमेरिका और इजरायल के साथ भारत की बढ़ती निकटता के बीच ईरान का नया कट्टरपंथी नेतृत्व नई दिल्ली को संदेह की दृष्टि से देख सकता है। यदि ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगते हैं या वह पूर्ण युद्ध में उलझता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो चाबहार बंदरगाह और </span><span>'</span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर</span><span>'<span>  </span></span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जैसे प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में जा सकते हैं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो भारत के लिए मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने का सबसे छोटा और सस्ता रास्ता हैं। भारत की विदेश नीति के लिए यह वह समय है जब उसे "गुटनिरपेक्षता 2.0" के सिद्धांतों पर चलते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी एक पक्ष का मोहरा न बने।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ईरान का संकट भारत के लिए एक आर्थिक सुनामी की तरह हो सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। यद्यपि भारत ने हाल के वर्षों में रूस और खाड़ी देशों से तेल आयात बढ़ाकर अपनी निर्भरता को विविधीकृत किया है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन मध्य पूर्व में किसी भी प्रकार की सैन्य अस्थिरता सीधे तौर पर वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi"> यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिससे भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और घरेलू स्तर पर महंगाई अनियंत्रित हो जाएगी। इसके अलावा</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इराक और सऊदी अरब जैसे देशों से आने वाला तेल भी इसी अशांत क्षेत्र से होकर गुजरता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिससे भारत की आपूर्ति श्रृंखला टूटने का खतरा है। ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि इसकी कीमत की स्थिरता पर भी निर्भर करती है। ईरान की अस्थिरता भारत के निवेश और भविष्य की गैस पाइपलाइन परियोजनाओं को भी अनिश्चितता की ओर धकेलती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सामाजिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखें तो ईरान और पश्चिम के बीच बढ़ता तनाव भारत के भीतर के जनसांख्यिकीय संतुलन और प्रवासी सुरक्षा को भी प्रभावित करता है। पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिनकी सुरक्षा और वहां से आने वाला प्रेषण (</span><span>Remittance) </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यदि युद्ध फैलता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो इन भारतीयों की सुरक्षित वापसी एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती होगी। साथ ही</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ईरान की कट्टरपंथी रणनीति का प्रभाव क्षेत्र के अन्य कट्टरपंथी समूहों पर भी पड़ सकता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिससे भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए नए खतरे पैदा हो सकते हैं। भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करना होगा</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">विशेषकर अरब सागर में जहाँ हूती विद्रोही व्यापारिक जहाजों को निशाना बना रहे हैं। भारतीय नौसेना को अब केवल अपनी सीमाओं की नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए एक सक्रिय सुरक्षा प्रदाता की भूमिका निभानी होगी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खामेनेई के बाद का ईरान एक ऐसा ज्वालामुखी है जिसके फटने का असर वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक महसूस किया जाएगा। मोजतबा खामेनेई और अहमद वाहिदी की जोड़ी ईरान को एक सैन्यीकृत धार्मिक शासन की ओर ले जा रही है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जो कूटनीति से अधिक शक्ति प्रदर्शन में विश्वास रखता है। भारत के लिए आगामी समय बहुत ही संभलकर चलने का है। उसे अपनी </span><span>'</span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">रणनीतिक स्वायत्तता</span><span>' </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को ढाल बनाकर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भले ही इसके लिए उसे कठिन कूटनीतिक फैसले लेने पड़ें।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi"> भारत को चाहिए कि वह ईरान के नए नेतृत्व के साथ अनौपचारिक माध्यमों से संवाद बनाए रखे और साथ ही अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को और अधिक मजबूत करे। ईरान का यह संकट वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्धारण का संकेत है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और भारत को इस बदलती व्यवस्था में एक दर्शक के बजाय एक निर्णायक भूमिका निभानी होगी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ताकि उसकी ऊर्जा सुरक्षा और संप्रभुता पर कोई आंच न आए। ईरान की अगली चालें केवल उसके भविष्य को ही नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी नई दिशा देंगी।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 18:07:14 +0530</pubDate>
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