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                <title>Middle East Conflict - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Middle East Conflict RSS Feed</description>
                
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                <title>युद्ध के मुहाने से लौटी दुनिया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया कभी-कभी ऐसे मोड़ों पर आ खड़ी होती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक निर्णय पूरी सभ्यता के भविष्य को बदल सकता है। हाल के घटनाक्रम में यही स्थिति तब बनी जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया। वातावरण इतना तनावपूर्ण था कि किसी भी क्षण युद्ध का विस्तार एक बड़े विनाश में बदल सकता था। अमेरिका की सेना और उसके रक्षा तंत्र पूरी तरह तैयार थे और संकेत का इंतजार कर रहे थे कि कब हमला शुरू किया जाए। दूसरी ओर ईरान भी अपनी रक्षा और जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार बैठा था। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175592/the-world-returned-from-the-edge-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया कभी-कभी ऐसे मोड़ों पर आ खड़ी होती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ एक निर्णय पूरी सभ्यता के भविष्य को बदल सकता है। हाल के घटनाक्रम में यही स्थिति तब बनी जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया। वातावरण इतना तनावपूर्ण था कि किसी भी क्षण युद्ध का विस्तार एक बड़े विनाश में बदल सकता था। अमेरिका की सेना और उसके रक्षा तंत्र पूरी तरह तैयार थे और संकेत का इंतजार कर रहे थे कि कब हमला शुरू किया जाए। दूसरी ओर ईरान भी अपनी रक्षा और जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार बैठा था। यह केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रह गया था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे क्षेत्र और विश्व व्यवस्था के लिए एक गंभीर संकट बन चुका था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने ईरान को कड़ा संदेश देते हुए बड़े पैमाने पर हमले की चेतावनी दे दी थी। यदि यह हमला होता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो ईरान के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँच सकता था। इसके परिणामस्वरूप ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आती</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो पूरे मध्यपूर्व को युद्ध की आग में झोंक सकती थी। इस पूरे घटनाक्रम में आम लोगों की स्थिति सबसे अधिक भयावह थी। ईरान के भीतर लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की तलाश में निकलने लगे थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि खाड़ी क्षेत्र के देश भी संभावित हमलों से बचने की तैयारी कर रहे थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेजी से चल रहे थे। कई देशों ने इस संकट को टालने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इन प्रयासों का उद्देश्य था कि किसी तरह दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी रहे और युद्ध टल सके। ईरान की ओर से एक प्रस्ताव सामने आया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें कई शर्तें रखी गई थीं। शुरू में इस प्रस्ताव को स्वीकार्य नहीं माना गया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बातचीत की प्रक्रिया जारी रही। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि दोनों पक्ष युद्ध से बचना चाहते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भले ही सार्वजनिक रूप से वे कठोर रुख अपनाए हुए हों।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहद अनिश्चित और उलझी हुई थी। अमेरिका के भीतर भी यह स्पष्ट नहीं था कि अंतिम निर्णय क्या होगा। स्वयं उसके नेतृत्व के करीबी लोगों को भी यह अंदाजा नहीं था कि अगला कदम क्या होगा। एक ओर कठोर बयान दिए जा रहे थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर बातचीत के रास्ते खुले रखे जा रहे थे। यह द्वंद्व इस बात को दर्शाता है कि आधुनिक राजनीति में शक्ति और कूटनीति दोनों साथ-साथ चलते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के भीतर भी निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल थी। वहाँ की सत्ता संरचना में अंतिम निर्णय शीर्ष नेतृत्व के हाथ में होता है। इस कारण अंतिम सहमति मिलने में समय लगा। लेकिन जब अंततः समझौते की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत मिला</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो बातचीत ने तेजी पकड़ ली। बताया जाता है कि यह निर्णय आसान नहीं था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसमें सैन्य नेतृत्व और अन्य शक्तिशाली संस्थाओं को भी सहमत करना पड़ा। इसके बावजूद यह कदम उठाया गया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस बात का संकेत है कि युद्ध की कीमत दोनों पक्ष समझ रहे थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः जो समझौता सामने आया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह स्थायी शांति नहीं बल्कि अस्थायी विराम था। दोनों पक्षों ने कुछ समय के लिए संघर्ष रोकने पर सहमति जताई। इस समझौते के तहत समुद्री मार्ग को फिर से खोलने और आगे की बातचीत जारी रखने का रास्ता बनाया गया। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इस मार्ग से विश्व का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति पर निर्भर करता है। यदि यह बंद रहता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालाँकि यह समझौता होने के बाद भी स्थिति पूरी तरह शांत नहीं हुई। कई जगहों पर संघर्ष जारी रहने की खबरें सामने आईं और इस बात को लेकर भी मतभेद रहे कि समझौते की शर्तें क्या हैं और उनका पालन कैसे किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक अस्थायी राहत है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न कि स्थायी समाधान। दोनों पक्षों के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन पर अभी भी गहरे मतभेद हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे परमाणु कार्यक्रम</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंध और क्षेत्रीय प्रभाव।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे घटनाक्रम से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कूटनीति से भी लड़े जाते हैं। कई बार पर्दे के पीछे होने वाली बातचीत ही युद्ध को टाल देती है। इस मामले में भी अंतिम क्षणों में हुई बातचीत ने एक बड़े विनाश को रोक दिया। यदि यह बातचीत विफल हो जाती</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो परिणाम बेहद भयावह हो सकते थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस संकट में कई देशों ने सक्रिय भूमिका निभाई। यह दर्शाता है कि आज की दुनिया में कोई भी बड़ा संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव वैश्विक होता है और उसे सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक होता है। इसी सहयोग ने इस बार भी युद्ध को टालने में मदद की।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह शांति स्थायी होगी। इतिहास बताता है कि अस्थायी समझौते अक्सर स्थायी समाधान में बदलने में सफल नहीं होते। जब तक मूल कारणों का समाधान नहीं होता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक संघर्ष की संभावना बनी रहती है। इस मामले में भी कई ऐसे मुद्दे हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका समाधान अभी बाकी है। यदि इन पर सहमति नहीं बनती</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो भविष्य में फिर से तनाव बढ़ सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंत में यह कहा जा सकता है कि यह घटना केवल एक राजनीतिक या सैन्य घटनाक्रम नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह मानवता के लिए एक चेतावनी भी है। यह दिखाती है कि दुनिया कितनी तेजी से विनाश के करीब पहुँच सकती है और किस तरह अंतिम क्षणों में लिया गया एक निर्णय सब कुछ बदल सकता है। यह भी स्पष्ट होता है कि शांति केवल शक्ति से नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवाद और समझ से संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी गंभीर क्यों न हों</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि बातचीत के रास्ते खुले रहें तो विनाश को टाला जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष अपने मतभेदों को समझदारी से सुलझाने की इच्छा रखें। यही इस घटना का सबसे बड़ा संदेश है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 18:48:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>मोदी और नेतन्याहू क्या राजनीतिक रूप से नाकाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong>ईरान-अमेरिका सीज़फायर का असर इसराइल और भारत में नज़र आ रहा है। भारत और इसराइल के विपक्षी दलों ने अपने-अपने देशों के प्रधानमंत्रियों नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को नेस्तानाबूद करने की धमकी दी थी लेकिन वो समझौते की टेबल पर आ गए। नेतन्याहू ने अमेरिका को इस युद्ध में जबरन ढकेला और जब ट्रंप ने सीज़फायर डील की घोषणा की तो नेतन्याहू की उसमें कोई भूमिका नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पीएम मोदी ईरान पर युद्ध थोपे जाने से तीन दिन पहले इसराइल गए थे। यह भी इसराइल का गेम था। वो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175578/are-modi-and-netanyahu-politically-unsuccessful"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/ap26057435017593.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong>ईरान-अमेरिका सीज़फायर का असर इसराइल और भारत में नज़र आ रहा है। भारत और इसराइल के विपक्षी दलों ने अपने-अपने देशों के प्रधानमंत्रियों नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को नेस्तानाबूद करने की धमकी दी थी लेकिन वो समझौते की टेबल पर आ गए। नेतन्याहू ने अमेरिका को इस युद्ध में जबरन ढकेला और जब ट्रंप ने सीज़फायर डील की घोषणा की तो नेतन्याहू की उसमें कोई भूमिका नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पीएम मोदी ईरान पर युद्ध थोपे जाने से तीन दिन पहले इसराइल गए थे। यह भी इसराइल का गेम था। वो दुनिया को दिखाना चाहता था कि ईरान का सदियों पुराना दोस्त भारत आज उसके साथ खड़ा है। यानी ईरान पर युद्ध थोपे जाने की मोदी की मौन सहमति थी। मोदी ने आज तक ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या की निन्दा नहीं की। युद्ध के बीच में जब पाकिस्तान की भूमिका की बात कही जा रही थी तो भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर पाकिस्तान को दलाल देश बता रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस के संचार प्रभारी और सांसद जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा- पूरी दुनिया पश्चिम एशिया में एक तरफ यूएस और इसराइल और दूसरी तरफ ईरान के बीच चल रहे इस संघर्ष में लागू हुए दो सप्ताह के संघर्षविराम का सावधानीपूर्वक स्वागत करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह संघर्ष 28 फरवरी को ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था। यह घटनाएं प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं। इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया। पीएम मोदी ने ग़ज़ा में इसराइल द्वारा किए जा रहे नरसंहार और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में उसकी आक्रामक विस्तारवादी नीतियों पर कुछ नहीं कहा।</p>
<p style="text-align:justify;">जयराम रमेश ने कहा- युद्धविराम कराने में पाकिस्तान की भूमिका, पीएम मोदी की अत्यधिक व्यक्तिनिष्ठ कूटनीति के सार और शैली-दोनों-के लिए एक गंभीर झटका है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को जारी समर्थन के कारण पाकिस्तान को अलग-थलग करने और दुनिया को यह विश्वास दिलाने की नीति कि वह एक विफल राष्ट्र है, स्पष्ट रूप से सफल नहीं हुई है। जैसा कि डॉ. मनमोहन सिंह ने मुंबई आतंकी हमलों के बाद कर दिखाया था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह तथ्य कि एक दिवालिया अर्थव्यवस्था (पाकिस्तान की), जो पूरी तरह बाहरी डोनर्स की मदद पर निर्भर है, और कई मायनों में एक टूटे हुए देश ने ऐसी भूमिका निभा ली, पीएम मोदी की कूटनीतिक रणनीति और नैरेटिव प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने या उनकी टीम ने यह भी कभी नहीं बताया कि ऑपरेशन सिंदूर को 10 मई 2025 को अचानक और तत्काल क्यों रोक दिया गया। जिसकी पहली घोषणा अमेरिका के विदेश मंत्री ने की थी और जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति तब से लगभग सौ बार श्रेय ले चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा- हर जगह एक स्पष्ट राहत की भावना है। विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था। लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज हो चुके हैं। उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है। उनकी कायरता न केवल इसराइल की आक्रामकता पर, बल्कि व्हाइट हाउस में बैठे उनके करीबी मित्र द्वारा इस्तेमाल की जा रही पूरी तरह अस्वीकार्य और शर्मनाक भाषा पर भी उनकी चुप्पी से पता चलती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 22:10:26 +0530</pubDate>
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                <title>डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति और परमाणु युद्ध के खतरे</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर समय-समय पर वैश्विक बहस जरूर उठती रही है, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के युद्ध में अपनी प्रारंभिक पराजय और इजरायल द्वारा अमेरिका को इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की अफवाह से थोड़े मानसिक रूप से विचलित हो गए हैं उन्होंने कुछ अपने महत्वपूर्ण विभागों के  के प्रमुखों को भी पद से हटा दिया है जो अमेरिका प्रशासन में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। उनके द्वारा  प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गये वक्तव्य उनकी निराशा तथा हताशा को इंगित कर रहा है। ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध को लेकर परमाणु</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175274/donald-trumps-mental-condition-and-the-dangers-of-nuclear-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/getty_6842799de6-1749186973.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर समय-समय पर वैश्विक बहस जरूर उठती रही है, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के युद्ध में अपनी प्रारंभिक पराजय और इजरायल द्वारा अमेरिका को इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की अफवाह से थोड़े मानसिक रूप से विचलित हो गए हैं उन्होंने कुछ अपने महत्वपूर्ण विभागों के  के प्रमुखों को भी पद से हटा दिया है जो अमेरिका प्रशासन में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। उनके द्वारा  प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गये वक्तव्य उनकी निराशा तथा हताशा को इंगित कर रहा है। ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध को लेकर परमाणु बम गिराने जैसे कठोर कदम भी उठा सकते हैं यह उन्होंने हालिया बयान में कहा भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन किसी भी निर्वाचित नेता के मानसिक संतुलन पर ठोस चिकित्सीय प्रमाण के बिना निष्कर्ष निकालना न केवल अनुचित है बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं को और भी जटिल बना देना है, इसलिए आवश्यक है कि हम भावनात्मक धारणाओं के बजाय तथ्यों और रणनीतिक यथार्थ के आधार पर इस पूरे परिदृश्य को समझें, विशेषकर जब बात अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच संभावित युद्ध और परमाणु टकराव की हो।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सही है कि पश्चिम एशिया लंबे समय से अस्थिरता का केंद्र रहा है और यहां की किसी भी सैन्य कार्रवाई का प्रभाव वैश्विक शांति पर पड़ता है, लेकिन यह दावा कि ईरान के पास निश्चित रूप से 440 किलो यूरेनियम है जिससे 11 परमाणु बम तुरंत बनाए जा सकते हैं, इस प्रकार के आंकड़े आमतौर पर खुफिया और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमान होते हैं, जिनकी पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकती, हालांकि यह भी सच है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है और इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी लगातार उसकी निगरानी करती रही है,  सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया जाना  कि ईरान ने अमेरिकी एफ-15 विमानों को मार गिराया, इस तरह की घटनाओं की पुष्टि विश्वसनीय वैश्विक रक्षा स्रोतों से होना आवश्यक होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि युद्ध के समय सूचना तंत्र का युद्ध भी उतना ही सक्रिय होता है जितना वास्तविक युद्ध, वास्तविकता यह है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का टकराव नहीं बल्कि तकनीकी, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का मिश्रण होता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति विश्व में सबसे ताकतवर और सक्षम मानी जाती है, वहीं ईरान ने भी असममित युद्ध  की रणनीति अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है, जिसमें मिसाइल तकनीक, ड्रोन युद्ध और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों का उपयोग शामिल है, ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो यह किसी एक पक्ष की त्वरित जीत के बजाय लंबे गतिरोध में बदल सकता है, जहां तक डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का सवाल है, यह सर्वविदित है कि उनकी राजनीतिक शैली आक्रामक और अप्रत्याशित रही है, वे कई बार अपने वक्तव्यों में बदलाव करते रहे हैं, जिसे उनके समर्थक रणनीतिक लचीलापन कहते हैं जबकि आलोचक इसे अस्थिरता का संकेत मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय संबंधों में केवल एक व्यक्ति की मानसिक स्थिति से निर्णय नहीं लिए जाते, बल्कि उसके पीछे पूरी संस्थागत संरचना, सलाहकार तंत्र और रक्षा नीति का ढांचा काम करता है, अमेरिका जैसे देश में राष्ट्रपति के पास परमाणु हथियारों का नियंत्रण अवश्य होता है, लेकिन उसके उपयोग के लिए कई स्तरों की सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया भी मौजूद होती है, इसलिए यह आशंका कि कोई नेता अचानक मानसिक असंतुलन में परमाणु युद्ध छेड़ देगा, व्यावहारिक रूप से अत्यंत जटिल और नियंत्रित प्रक्रिया से गुजरती है, फिर भी यह खतरा पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इतिहास गवाह है कि गलत आकलन और अहंकारपूर्ण निर्णय बड़े युद्धों का कारण बने हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट ने मानवता को परमाणु विनाश की भयावहता दिखाई थी। लेकिन उस समय और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है क्योंकि आज के परमाणु हथियार कहीं अधिक शक्तिशाली और विनाशकारी हैं। आधुनिक परमाणु युद्ध केवल दो शहरों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह पूरे ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर सकता है, जिससे न्यूक्लियर विंटर जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जिसमें सूरज की रोशनी तक पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाएगी और वैश्विक खाद्य संकट पैदा हो जाएगा, इस संदर्भ में “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़” जैसे सामरिक मार्ग का महत्व भी अत्यधिक बढ़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह विश्व के तेल आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है, यदि इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है, तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और विकासशील देशों पर इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ेगा, वर्तमान परिदृश्य में यह कहना अधिक उचित होगा कि अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच तनाव एक बहुस्तरीय शक्ति संघर्ष का परिणाम है। जिसमें सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय राजनीति भी शामिल है, इस संघर्ष को केवल “जीत” या “हार” के नजरिए से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इसका हर परिणाम वैश्विक अस्थिरता को बढ़ाता है, जहां तक ट्रंप की भूमिका का सवाल है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो पारंपरिक कूटनीति से हटकर निर्णय लेते हैं, वे कई बार जोखिमपूर्ण बयानबाजी करते हैं जिससे तनाव बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही वे अचानक बातचीत की दिशा भी पकड़ सकते हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह “मानसिक रूप से असंतुलित” कहना एक राजनीतिक आकलन हो सकता है, न कि वस्तुनिष्ठ सत्य, असली चिंता इस पूरे परिदृश्य में यह है कि यदि किसी भी पक्ष ने गलत आकलन कर लिया या प्रतिक्रिया में अति कर दी तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है, और तब परमाणु हथियारों का उपयोग भले ही अंतिम विकल्प के रूप में हो, उसका परिणाम पूरी मानवता के लिए विनाशकारी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए आज की आवश्यकता यह है कि वैश्विक शक्तियां संयम बरतें, संवाद को प्राथमिकता दें और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर दें, क्योंकि युद्ध चाहे किसी भी कारण से हो, उसका अंत केवल विनाश और मानव पीड़ा में ही होता है, और परमाणु युद्ध की स्थिति में यह पीड़ा अकल्पनीय स्तर तक पहुंच सकती है, इसलिए इस विषय को भावनात्मक उत्तेजना के बजाय गंभीर, संतुलित और तथ्यपरक दृष्टिकोण से समझना ही सबसे उचित मार्ग है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 18:26:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डोनाल्ड ट्रंप अपनी नीतियों से ही घिरे, अमेरिकी संसद और इजरायल ट्रंप के नियंत्रण से बाहर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ईरान को लेकर बढ़ते युद्धपरक माहौल मे डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक नीतियाँ स्वयं अमेरिका के भीतर गहरे राजनीतिक और सामाजिक विरोध को जन्म दे रही हैं। जहा अमेरिकी संसद के अनेक सांसद इस आशंका को लेकर मुखर हैं कि एक और बड़े युद्ध में उलझना न केवल आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा बल्कि अमेरिका को दीर्घकालिक सैन्य दलदल में धकेल सकता है, वहीं अमेरिकी जनता के इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों से सीख लेते हुए नए संघर्ष के प्रति उत्साहित नहीं है बल्कि सशंकित और विरोधी रुख में दिखाई दे रही है अमेरिका की लगभग 90 लाख जनता इसके विरोध में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174664/donald-trump-surrounded-by-his-own-policies-us-parliament-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/american-president-donald-trump-bbc-apologises-.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान को लेकर बढ़ते युद्धपरक माहौल मे डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक नीतियाँ स्वयं अमेरिका के भीतर गहरे राजनीतिक और सामाजिक विरोध को जन्म दे रही हैं। जहा अमेरिकी संसद के अनेक सांसद इस आशंका को लेकर मुखर हैं कि एक और बड़े युद्ध में उलझना न केवल आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा बल्कि अमेरिका को दीर्घकालिक सैन्य दलदल में धकेल सकता है, वहीं अमेरिकी जनता के इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों से सीख लेते हुए नए संघर्ष के प्रति उत्साहित नहीं है बल्कि सशंकित और विरोधी रुख में दिखाई दे रही है अमेरिका की लगभग 90 लाख जनता इसके विरोध में अलग-अलग शहरों में ट्रंप की नीतियों का खुलकर विरोध कर रही है। परिणाम स्वरूप ट्रंप का आत्मविश्वास अब धीरे-धीरे डगमगाने लगा है और ट्रंप अपने बौद्धिक तथा युद्ध की नीतियों को लागू करने में घबराने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">घरेलू स्तर पर बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच युद्ध की संभावनाएँ ट्रंप प्रशासन को अपेक्षाकृत अलग-थलग करती नजर आ रही हैं।दूसरी ओर मध्य पूर्व में इजरायल डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के नियंत्रण से बाहर हो गया है इजरायल की स्थिति भी बहुस्तरीय दबावों से घिरी हुई है जहाँ बेंजामिन नेतनाहू की सरकार को एक तरफ सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती है तो दूसरी तरफ लगातार सैन्य अभियानों के कारण सैनिकों की थकान, रिजर्व बलों पर बढ़ती निर्भरता और युद्ध की लंबी अवधि से उपजा मानसिक तनाव एक गंभीर चिंता बन चुका है। कई विश्लेषण यह संकेत देते हैं कि निरंतर युद्ध जैसी परिस्थितियों ने इजराइली सैनिकों की मनोबल और कार्यक्षमता दोनों को प्रभावित किया है जिससे भविष्य के अभियानों की गति और प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं ईरान अपनी रणनीति के तहत प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए क्षेत्रीय सहयोगियों, प्रॉक्सी समूहों और सामरिक दबाव के माध्यम से संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। ईरान को अब हुति समूह का प्रत्यक्ष लाभ मिलना भी शुरू हो गया यह समूह लगातार इसराइल पर अलग-अलग तरीके से हमले करने लगा है। जिससे संघर्ष एक बहु-स्तरीय और अप्रत्यक्ष युद्ध का रूप लेता जा रहा है। यह स्थिति खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य वैश्विक संस्थाएँ शांति की अपील तो कर रही हैं लेकिन उनका प्रभाव सीमित होता जा रहा है जिससे कूटनीतिक प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका का आंतरिक विरोध, इजराइल की सैन्य थकान, ईरान की रणनीतिक सक्रियता और वैश्विक शक्तियों की संतुलनकारी भूमिका मिलकर एक ऐसे जटिल भू-राजनीतिक संकट को जन्म दे रही हैं जहाँ किसी भी छोटी घटना से व्यापक युद्ध भड़कने की आशंका बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह टकराव नियंत्रित नहीं हुआ तो यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित न रहकर वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक पुनर्संतुलन का कारण बन सकता है और यदि युद्ध परमाणु युद्ध में बदल जाता है तो वैश्विक स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी उसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया में मानवता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। आगामी युद्ध यदि परमाणु युद्ध में परिणत होता है तो यह युद्ध पिछले दो विश्व युद्ध और परमाणु युद्ध से ज्यादा भयानक होगा इसमें पूरे विश्व को नई मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है एवं पूरे विश्व में हाहाकार होने की संभावना बलवती हो गई है ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:21:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'मित्र देशों के जहाज गुजर सकेंगे', भारत सहित  5 देश के लिए ईरान ने खोला होर्मुज का दरवाजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong></span>पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच ईरान ने ऐलान किया है कि वह भारत समेत पांच मित्र देशों से संबंधित जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, जिससे उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि अन्य देशों के लिए पहुंच सीमित रहेगी। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बावजूद भारत के साथ-साथ रूस, चीन, पाकिस्तान और इराक के जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से सुरक्षित मार्ग प्रदान किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ईरानी सरकारी टेलीविजन को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174313/ships-of-friendly-countries-will-be-able-to-pass-through"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(3)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong></span>पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच ईरान ने ऐलान किया है कि वह भारत समेत पांच मित्र देशों से संबंधित जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, जिससे उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि अन्य देशों के लिए पहुंच सीमित रहेगी। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बावजूद भारत के साथ-साथ रूस, चीन, पाकिस्तान और इराक के जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से सुरक्षित मार्ग प्रदान किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ईरानी सरकारी टेलीविजन को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद नहीं किया गया है और कुछ ऐसे देशों को प्रतिबंधों से छूट दी गई हैm जिनके साथ ईरान के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी के अनुसार, अराघची ने कहा, "शत्रु को जलडमरूमध्य से गुजरने देने का कोई कारण नहीं है। हमने कुछ ऐसे देशों को गुजरने की अनुमति दी है, जिन्हें हम मित्र मानते हैं। हमने चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान को आने-जाने की अनुमति दी है।"</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही, उन्होंने संकेत दिया कि जिन देशों को शत्रु माना जाता है या जो मौजूदा संघर्ष में शामिल हैं, उनसे जुड़े जहाजों को जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल और कुछ खाड़ी देशों के जहाज, जो वर्तमान संकट में भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अराघची ने महत्वपूर्ण जलमार्ग पर ईरान के नियंत्रण पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि देश ने दशकों बाद इस क्षेत्र में अपना अधिकार प्रदर्शित किया है।उन्होंने कहा कि जब ईरान ने शुरू में होर्मुज जलडमरूमध्य की आंशिक नाकाबंदी की घोषणा की थी ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 21:00:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेगुनाह बचपन को झुलसा रहा है युद्ध का बारूद </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया भर में हर संघर्ष में सबसे बड़ी मार बचपन पर पड़ रही है चाहे इजरायल हमास गाजा का संघर्ष रहा हो चाहे सीरिया लेबनान ईरान में हुए टकराव सबसे बड़ी कीमत बच्चों को चुकानी पड़ रही है। एशिया में बढ़ते युद्ध का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है.मौजूदा टकराव में कई सौ बच्चे मिसाइल हमलों से मौत की नींद सो चुके हैं जबकि लाखों बच्चे बेघर हो गए हैं वहीं लाखों बच्चों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है उनकी स्कूली शिक्षा में रुकावट आ गयी है और वह दहशत के साए में असुरक्षित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173677/the-gunpowder-of-war-is-scorching-innocent-childhood"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया भर में हर संघर्ष में सबसे बड़ी मार बचपन पर पड़ रही है चाहे इजरायल हमास गाजा का संघर्ष रहा हो चाहे सीरिया लेबनान ईरान में हुए टकराव सबसे बड़ी कीमत बच्चों को चुकानी पड़ रही है। एशिया में बढ़ते युद्ध का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है.मौजूदा टकराव में कई सौ बच्चे मिसाइल हमलों से मौत की नींद सो चुके हैं जबकि लाखों बच्चे बेघर हो गए हैं वहीं लाखों बच्चों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है उनकी स्कूली शिक्षा में रुकावट आ गयी है और वह दहशत के साए में असुरक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह सब इक्कीसवीं सदी की कथित शिक्षित विकासशील दुनिया में हो रहा है यह बता रहा है कि दुनिया का इंसान विज्ञान विकास और प्रगति के कितने भी दावे करे लेकिन वह सब बेमानी है जब कथित लोकतांत्रिक और ताकतवर देश दुनिया में हठधर्मी अराजकता फैलाए मनमाने टैरिफ वसूली करे तब दुनिया की अंतराष्ट्रीय संगठन और संस्थाएं सिर्फ बगले झांकने का काम कर रहीं हैं तब तमाम मानवतावादी विचार और मानवाधिकारों की बाते भोथरी और खोखली बेमानी बन कर रह जाती है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी ने चेतावनी दी है कि लगातार बढ़ती हिंसा से लाखों बच्चों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है. इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति ने भी शांति की बात करते हुए युद्ध खत्म करने के लिए कुछ शर्तें सामने रखी हैं अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमलों की शुरुआत की थी। इस दौरान एक अमेरिकी मिसाइल मीनाब के शजारेह तैयबा स्कूल पर जाकर गिरी थी। इस हमले में 168 बच्चे और 14 शिक्षक मारे गए थे। मरने वालों में ज्यादातर छात्राएं थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस हमले की पूरी दुनिया में खूब निंदा की गई थी। अमेरिका भी मामले की जांच कर रहा है।दुनिया भर में चर्चा चल रही है कि क्या ये युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है? आपको बता दें कि यूनिसेफ ने कहा है कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष से पूरे पश्चिम एशिया में बच्चों की स्थिति बहुत गंभीर हो गई है. एजेंसी के अनुसार 28 फरवरी से अब तक हिंसा में एक हजार एक सौ से ज्यादा बच्चे घायल हुए हैं या उनकी मौत हो गई है. इनमें से लगभग दो सौ बच्चों की मौत ईरान में हुई है. वहीं इक्यानबे बच्चों की मौत लेबनान में हुई है. इसके अलावा चार बच्चों की मौत इजरायल में और एक बच्चे की मौत कुवैत में हुई है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट्स के अनुसार यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि अगर हिंसा इसी तरह बढ़ती रही तो मरने और घायल होने वाले बच्चों की संख्या और बढ़ सकती है. संस्था ने यह भी बताया कि इस संकट के कारण लाखों बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बाधा के कारण पूरे क्षेत्र में लाखों बच्चे स्कूल से वंचित हो गए हैं, जबकि सैकड़ों हजारों बच्चे लगातार बमबारी के कारण विस्थापित हो गए हैं। अस्पतालों, स्कूलों और पानी और स्वच्छता प्रणालियों सहित नागरिक बुनियादी ढांचे, जिन पर बच्चे का जीवन निर्भर हैं, दोनों पक्षों द्वारा हमले किए गए हैं, उन्हें नुकसान पहुंचाया गया है या नष्ट कर दिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों की हत्या और उन्हें अपंग करना, या उन जरूरी सेवाओं पर हमला कर बर्बाद करना, जिन पर बच्चे निर्भर हैं, किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।लगातार बमबारी के कारण लाखों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं और सैकड़ों हजार बच्चे बेघर हो गए हैं.इजराइल लगातार लेबनान पर भी हमले कर रहा है। इस वजह से करीब 8 लाख लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं।  इनमें 2 लाख से ज्यादा बच्चे हैं।  यूनिसेफ ने कहा कि बच्चों की हत्या या उन्हें घायल करना किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता. संस्था ने यह भी कहा कि बच्चों के लिए जरूरी सेवाओं को नष्ट करना या बाधित करना भी गलत है. यूनिसेफ के अनुसार पूरे क्षेत्र में लगभग बीस करोड़ बच्चे हैं और वे उम्मीद कर रहे हैं कि दुनिया जल्द कदम उठाएगी.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि हिंसक टकराव की वजह से पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है और उपचार के लिए सेवाएँ सीमित होती जा रही हैं. लेबनान में हिज़बुल्लाह लड़ाकों और इसराइली सैन्य बलों में लड़ाई के बीच 11 हज़ार से अधिक गर्भवती महिलाएँ प्रभावित हैं और प्रवासी कामगारों के लिए भी जोखिम बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार लेबनान में 11,600 महिलाओं पर इस टकराव का असर हुआ है, जिनमें से 4 हज़ार अगले तीन महीनों के दौरान बच्चों को जन्म देंगी.  ईरान पर इसराइली व अमेरिकी हवाई हमलों और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में भड़के भीषण टकराव ने लेबनान, कुवैत, बहरीन, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ओमान समेत इस क्षेत्र में स्थित अनेक देशों को अपनी चपेट में ले लिया है. ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने स्कूल पर हमले का जिक्र करते हुए लिखा है, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में कथित तौर पर हमले के तुरंत बाद का दृश्य दिख रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जली हुई दीवारों से उठता धुआं दिख रहा है और सड़क पर मलबा बिखरा पड़ा है। सैकड़ों लोग घटनास्थल पर जमा है। अखबार लिखता है कि वो बम विस्फोट की रिपोर्ट, मृतकों की संख्या और वीडियो के स्रोत की तुरंत स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका लेकिन फैक्ट चेक संगठन फैक्टनेमेह ने स्कूल परिसर की अन्य तस्वीरों के साथ वीडियो का मिलान किया और निष्कर्ष निकाला कि वीडियो प्रामाणिक है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी फुटेज की पुष्टि की है और बताया है कि यह स्कूल का ही है। गार्डियन ने लिखा है कि यह स्कूल इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की बैरक में स्थित लग रहा है। दूसरी ओर कतर के न्यूज आउटलेट अल जजीरा की अरबी सेवा के मुताबिक अमेरिका ने मीनाब की स्कूली छात्राओं की जानबूझकर हत्या की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उधर अल जजीरा ने लिखा कि सोशल मीडिया पर इस तबाही की तस्वीरें फैलते ही इसराइल और अमेरिका के अधिकारियों ने इस हमले से खुद को अलग बताने की कोशिश की। अल जजीरा ने लिखा, कुछ इसराइल समर्थित वेबसाइटों और सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दावा किया कि यह जगह इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के बेस का हिस्सा थी। लेकिन अल जजीरा की डिजिटल इन्वेस्टिगेशन यूनिट ने एक दशक से अधिक समय के सैटेलाइट चित्रों, हाल के वीडियो, समाचार रिपोर्टों और ईरानी सरकारी बयानों के विश्लेषण से बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है। जांच के निष्कर्ष बताते हैं कि कम से कम पिछले दस वर्षों से यह स्कूल पास के सैन्य ठिकाने से स्पष्ट रूप से अलग था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जांच यह भी संकेत देती है कि हमले के पैटर्न से उस खुफिया जानकारी की सटीकता पर गंभीर सवाल उठते हैं जिसके आधार पर बमबारी की गई। शांति और मानवाधिकारों की तमाम अवधारणाओं और अंतरराष्ट्रीय कानून व मान्यताओं को दरकिनार कर स्कूली बच्चों और अस्पतालों में इलाज करा रहे रोगियों पर मिसाइल हमले इस खूनी मानसिकता की दरिंदगी भरी गाथा को उजागर कर रहे हैं। अपने स्वार्थ और सनक के चलते कई देशों के सत्ताधारी इंसानियत बेगुनाहों और मजलूमों को दिन रात रौंद कर क्रूरता और वहशीपन का नया इतिहास लिख रहे हैं जिसे आने वाली सदियों तक पीढ़ियां भुगतान करने के लिए मजबूर होगीं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 16:29:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लेबनान में हड्डियों तक को गला देने वाले केमिकल के इस्तेमाल का दावा, इस्राइल पर लगा गंभीर आरोप।</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </strong></p>
<p>मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस्राइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि इस्राइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के एक गांव पर व्हाइट फॉस्फोरस वाले गोले दागे, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादित और खतरनाक हथियार माने जाते हैं।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, संगठन ने सात तस्वीरों को जियोलोकेट और सत्यापित कर यह निष्कर्ष निकाला कि इस्राइल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर गांव के रिहायशी इलाकों में तोपखाने के जरिए व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया। यह हमला उस समय हुआ जब इस्राइली सेना ने कुछ घंटे पहले ही गांव के निवासियों और दक्षिणी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173204/the-claim-of-using-chemicals-that-melt-bones-in-lebanon"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/lebnana.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </strong></p>
<p>मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस्राइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि इस्राइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के एक गांव पर व्हाइट फॉस्फोरस वाले गोले दागे, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादित और खतरनाक हथियार माने जाते हैं।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, संगठन ने सात तस्वीरों को जियोलोकेट और सत्यापित कर यह निष्कर्ष निकाला कि इस्राइल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर गांव के रिहायशी इलाकों में तोपखाने के जरिए व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया। यह हमला उस समय हुआ जब इस्राइली सेना ने कुछ घंटे पहले ही गांव के निवासियों और दक्षिणी लेबनान के कई अन्य गांवों को इलाका खाली करने की चेतावनी दी थी। ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि वह स्वतंत्र रूप से यह पुष्टि नहीं कर पाया कि उस समय गांव में कोई नागरिक मौजूद था या इस हमले में किसी को नुकसान पहुंचा।</p>
<p>मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक, घनी आबादी वाले क्षेत्रों में व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जाता है। यह रासायनिक पदार्थ अत्यधिक गर्म होकर जलता है, जिससे इमारतों में आग लग सकती है और यह मानव शरीर को हड्डियों तक जला सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मामूली जलन के बाद भी पीड़ितों को संक्रमण, अंगों के फेल होने या सांस संबंधी गंभीर समस्याओं का खतरा बना रहता है।</p>
<p>ह्यूमन राइट्स वॉच के लेबनान शोधकर्ता रामजी काइस ने कहा कि रिहायशी इलाकों के ऊपर इस्राइली सेना द्वारा व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल बेहद चिंताजनक है और इससे नागरिकों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p>इस मामले पर इस्राइली सेना की ओर से तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। हालांकि, इससे पहले सेना यह कहती रही है कि वह व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल स्मोक स्क्रीन बनाने के लिए करती है, न कि नागरिकों को निशाना बनाने के लिए।</p>
<p>मानवाधिकार संगठनों ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इस्राइल और हिजबुल्ला के बीच पिछले युद्ध के दौरान भी दक्षिणी लेबनान में कई बार व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, जबकि उस समय भी वहां नागरिक मौजूद थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 21:51:35 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>विश्व युद्ध की आहट और मानवता के सामने खड़ा विनाश का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां शक्ति प्रदर्शन और प्रतिशोध की राजनीति मानवता के भविष्य पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहा बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। जिस तरह से एक के बाद एक मिसाइल हमले ड्रोन हमले और बमबारी हो रही है उससे यह आशंका गहराने लगी है कि कहीं यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप न ले ले। युद्ध का इतिहास हमेशा यही बताता है कि इसकी आग में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172607/the-sound-of-world-war-and-the-crisis-of-destruction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/644bb59398ef7.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां शक्ति प्रदर्शन और प्रतिशोध की राजनीति मानवता के भविष्य पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहा बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गया है। जिस तरह से एक के बाद एक मिसाइल हमले ड्रोन हमले और बमबारी हो रही है उससे यह आशंका गहराने लगी है कि कहीं यह संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप न ले ले। युद्ध का इतिहास हमेशा यही बताता है कि इसकी आग में केवल सैनिक ही नहीं बल्कि आम नागरिक भी झुलसते हैं और सभ्यता को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल के दिनों में समुद्र और आसमान दोनों ही युद्ध के मैदान बन गए हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। युद्धपोतों पर हमले तेल टैंकरों को निशाना बनाना और बड़े शहरों पर बमबारी यह संकेत देते हैं कि स्थिति लगातार खतरनाक होती जा रही है। इन हमलों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है और हजारों लोग घायल हो चुके हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि इन संघर्षों में मरने वाले अधिकांश लोग वे होते हैं जिनका युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं होता। वे केवल आम नागरिक होते हैं जो शांति से अपना जीवन जीना चाहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध केवल मानव जीवन को ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है। जब बड़े देश युद्ध में उलझते हैं तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। व्यापार रुक जाता है तेल और ऊर्जा की कीमतें बढ़ जाती हैं और वैश्विक बाजार अस्थिर हो जाते हैं। वर्तमान संघर्ष में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। फारस की खाड़ी और मध्य पूर्व का क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा स्रोतों में से एक है। यदि यहां युद्ध लंबा चलता है तो तेल की आपूर्ति प्रभावित होगी और इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। यदि युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ती हैं या आपूर्ति बाधित होती है तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ेंगी जिससे परिवहन महंगा होगा और इसका प्रभाव आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाएगी और विकास की गति प्रभावित हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा मध्य पूर्व के देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। ये लोग वहां से अपने परिवारों के लिए पैसा भेजते हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि युद्ध की स्थिति गंभीर हो जाती है तो इन भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। कई बार ऐसे हालात में लोगों को अपने काम छोड़कर वापस लौटना पड़ता है जिससे उनके परिवारों पर आर्थिक संकट आ सकता है। इसलिए भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए शांति की दिशा में योगदान दे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध का एक और गंभीर प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। जब तेल टैंकरों पर हमले होते हैं या समुद्र में तेल का रिसाव होता है तो समुद्री जीवन को भारी नुकसान पहुंचता है। समुद्र में रहने वाले जीवों की बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गहरा आघात पहुंचता है। इसके अलावा बमबारी और मिसाइल हमलों से शहरों का बुनियादी ढांचा नष्ट हो जाता है। अस्पताल स्कूल सड़कें और घर तबाह हो जाते हैं। इन सबको दोबारा बनाने में वर्षों लग जाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। पहले और दूसरे विश्व युद्ध ने पूरी मानवता को विनाश का भयावह अनुभव कराया था। करोड़ों लोग मारे गए और कई देशों की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई। उसके बाद ही दुनिया ने शांति और सहयोग के महत्व को समझा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का गठन किया गया ताकि ऐसे संघर्षों को रोका जा सके। लेकिन आज भी जब बड़े देश शक्ति प्रदर्शन में लगे रहते हैं तो ऐसा लगता है कि इतिहास से सबक पूरी तरह नहीं लिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के कई देश इस समय शांति की अपील कर रहे हैं। भारत भी लगातार यह कहता रहा है कि किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से ही संभव है। यदि सभी देश संयम और धैर्य का परिचय दें तो टकराव को कम किया जा सकता है। कूटनीतिक वार्ता के माध्यम से विवादों को सुलझाना ही सभ्य और जिम्मेदार समाज की पहचान है।</div>
<div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी जिम्मेदारी को समझें। शक्ति का उपयोग विनाश के लिए नहीं बल्कि शांति और स्थिरता के लिए होना चाहिए। यदि युद्ध की आग और फैलती है तो इसका परिणाम केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। ऐसे में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह संघर्ष तीसरे विश्व युद्ध की दिशा में कदम न बन जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मानवता का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब देश आपसी मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने का रास्ता अपनाएं। युद्ध केवल विनाश को जन्म देता है जबकि शांति विकास और समृद्धि का मार्ग खोलती है। इसलिए समय की मांग है कि सभी देश संयम बरतें और युद्ध के बजाय शांति और सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाएं। यही मानवता के हित में होगा और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और बेहतर दुनिया की नींव रखेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Mar 2026 18:59:59 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका ने हिंद महासागर में पनडुब्बी से ईरान के युद्धपोत पर हमला किया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ईरान के इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर लगातार तेज होते हमलों के बीच अमेरिका ने हिंद महासागर में श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी युद्धपोत को पनडुब्बी से हमला कर डुबो दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस घटना के बाद श्रीलंकाई नौसेना ने बचाव अभियान चलाया, जिसमें श्रीलंका के दक्षिणी तट पर डूब रहे ईरान के नौसैनिक जहाज से 32 लोगों को बचा लिया गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इसके साथ ही श्रीलंकाई नौसेना को समुद्र में डूबे ईरानी युद्धपोत से 87 लोगों के शव भी बरामद हुए। बताया जा रहा है कि ईरानी जहाज भारत द्वारा आयोजित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172570/america-attacked-irans-warship-with-a-submarine-in-the-indian"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/94uo77c8_torpedo-attack-on-iraninn-warship-by-us-navy-in-indian-ocean-_625x300_04_march_26.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान के इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर लगातार तेज होते हमलों के बीच अमेरिका ने हिंद महासागर में श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी युद्धपोत को पनडुब्बी से हमला कर डुबो दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस घटना के बाद श्रीलंकाई नौसेना ने बचाव अभियान चलाया, जिसमें श्रीलंका के दक्षिणी तट पर डूब रहे ईरान के नौसैनिक जहाज से 32 लोगों को बचा लिया गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इसके साथ ही श्रीलंकाई नौसेना को समुद्र में डूबे ईरानी युद्धपोत से 87 लोगों के शव भी बरामद हुए। बताया जा रहा है कि ईरानी जहाज भारत द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू से वापस लौट रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस घटना को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दावा किया है कि अमेरिकी पनडुब्बी से दागे गए एक टॉरपीडो ने हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया है। हेगसेथ ने पेंटागन में बुधवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि मंगलवार रात ईरानी युद्धपोत पर किया गया यह हमला द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद किसी दुश्मन पर इस प्रकार का पहला हमला था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी सेना ने बुधवार को ईरानी युद्धपोत पर हमले का वीडियो भी जारी किया। वीडियो में पनडुब्बी से दूर समुद्र में एक युद्धपोत पर निशाना लगाते और फिर उसपर टॉरपीडो से हमला करते हुए देखा जा सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने दावा किया कि एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया गया, जिसे लगा कि वह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस ने भारत के पड़ोस में अमेरिका की इस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि भारत के अतिथि– IRIS डेना, एक ईरानी नौसैनिक जहाज– को भारत के सामरिक आंगन में अमेरिका द्वारा टॉरपीडो से उड़ा दिया गया, जबकि वह भारत द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू से घर लौट रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">बचाव अभियान का नेतृत्व कर रहे श्रीलंका का दावा है कि इसमें कम से कम 80 नाविक मारे गए हैं, जबकि लगभग सौ अन्य गंभीर रूप से घायल हैं या अभी भी लापता हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:37:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>US–Israel–Iran War: ग्राउंड ऑपरेशन से इनकार नहीं, रक्षा सचिव बोले– लंबी लड़ाई के लिए तैयार अमेरिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी रक्षा सचिव <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Pete Hegseth</span></span> ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि फिलहाल ईरान की जमीन पर कोई अमेरिकी सैनिक तैनात नहीं है, लेकिन भविष्य के विकल्प खुले हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की घोषणा</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">रक्षा सचिव ने बताया कि राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> के निर्देश पर “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया गया है। उनके मुताबिक यह अब तक के सबसे सटीक और जटिल हवाई अभियानों में से एक है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी हितों की रक्षा करना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172293/us%E2%80%93israel%E2%80%93iran-war-ground-operation-not-ruled-out-defense-secretary-said"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/iran-attack-sharjah-1772429613.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी रक्षा सचिव <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Pete Hegseth</span></span> ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि फिलहाल ईरान की जमीन पर कोई अमेरिकी सैनिक तैनात नहीं है, लेकिन भविष्य के विकल्प खुले हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की घोषणा</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">रक्षा सचिव ने बताया कि राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> के निर्देश पर “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया गया है। उनके मुताबिक यह अब तक के सबसे सटीक और जटिल हवाई अभियानों में से एक है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी हितों की रक्षा करना और ईरान की दशकों पुरानी शत्रुता का जवाब देना है।हेगसेथ ने कहा कि सैन्य रणनीति पहले से सार्वजनिक करना समझदारी नहीं होती। “दुश्मन को यह नहीं पता होना चाहिए कि अमेरिका कब और क्या कदम उठाएगा,” उन्होंने कहा।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>ग्राउंड ऑपरेशन पर क्या बोले?</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका भविष्य में ईरान में जमीनी सेना भेज सकता है, तो उन्होंने साफ किया कि जरूरत पड़ने पर ऐसा कदम उठाया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने दोहराया कि अमेरिका बिना सोचे-समझे कोई कार्रवाई नहीं करेगा।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>ईरानी जवाबी हमले और अमेरिकी सैनिकों की मौत</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और इजराइल की संयुक्त कार्रवाई के बाद ईरान और उसके सहयोगी समूहों ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजराइल पर मिसाइल हमले किए। इन हमलों में चार अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि संघर्ष और लंबा खिंच सकता है।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>47 साल की दुश्मनी का जिक्र</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">हेगसेथ ने कहा कि तेहरान का शासन पिछले 47 वर्षों से अमेरिका के खिलाफ “अप्रत्यक्ष युद्ध” करता रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Islamic Revolutionary Guard Corps</span></span> और उसकी कुद्स फोर्स ने विभिन्न हमलों को समर्थन दिया।उन्होंने यह भी कहा कि “हमने यह युद्ध शुरू नहीं किया, लेकिन हम इसे खत्म करेंगे।” उनके अनुसार, यह सरकार बदलने की औपचारिक लड़ाई नहीं है, बल्कि अमेरिकी नागरिकों और हितों की सुरक्षा का सवाल है।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>‘हम जीतने के लिए लड़ते हैं’</strong></h6>
<p style="text-align:justify;">रक्षा सचिव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका “जीतने के लिए लड़ता है” और लंबे समय तक अनिश्चित संघर्ष में उलझने का इरादा नहीं रखता। उन्होंने कहा कि यदि कहीं भी अमेरिकियों को निशाना बनाया गया, तो अमेरिका बिना हिचकिचाहट जवाब देगा।मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह संघर्ष सीमित हवाई कार्रवाई तक रहेगा या जमीनी अभियान का रूप ले सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>WORLD NEWS</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 22:05:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या अमेरिका-ईजराइल युद्ध नीति महाभारत कालीन कौरव-पांडव युद्ध से प्रेरित है?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">​​पश्चिम एशिया में गहराता वर्तमान सैन्य गतिरोध और लैटिन अमेरिका से लेकर ईरान तक सत्ता परिवर्तन की हालिया रणनीतियां अनायास ही महाभारत के उस प्रसंग की याद दिलाती हैं, जहाँ युद्ध केवल शौर्य से नहीं बल्कि शत्रु के नेतृत्व को पंगु बनाने की सूक्ष्म कूटनीति से लड़ा जाता था। आधुनिक सैन्य शब्दावली में जिसे 'लीडरशिप डिकैपिटेशन' कहा जाता है, उसका बीज हमें कुरुक्षेत्र के मैदान में मिलता है, जब दुर्योधन ने युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को एक झटके में समाप्त करने की योजना बनाई थी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वो बात अलग है कि श्रीकृष्ण होते हुए यह योजना विफल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172188/is-america-israel-war-policy-inspired-by-the-kaurava-pandava-war-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/24745.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​​पश्चिम एशिया में गहराता वर्तमान सैन्य गतिरोध और लैटिन अमेरिका से लेकर ईरान तक सत्ता परिवर्तन की हालिया रणनीतियां अनायास ही महाभारत के उस प्रसंग की याद दिलाती हैं, जहाँ युद्ध केवल शौर्य से नहीं बल्कि शत्रु के नेतृत्व को पंगु बनाने की सूक्ष्म कूटनीति से लड़ा जाता था। आधुनिक सैन्य शब्दावली में जिसे 'लीडरशिप डिकैपिटेशन' कहा जाता है, उसका बीज हमें कुरुक्षेत्र के मैदान में मिलता है, जब दुर्योधन ने युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को एक झटके में समाप्त करने की योजना बनाई थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वो बात अलग है कि श्रीकृष्ण होते हुए यह योजना विफल हुई ,पर अभिमन्यु के रूप में बहुत बड़े योद्धा को खोना पड़ा। आज अमेरिका और इजरायल की रणनीतियों में भी प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के बजाय शीर्ष नेतृत्व को लक्ष्य बनाने, सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित करने या राजनीतिक अलगाव पैदा करने के तत्व प्रधान दिखाई देते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी राष्ट्र के शीर्ष प्रतीक को हटाया गया, युद्ध का परिणाम निर्णायक रूप से बदल गया। वर्ष 2003 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की गिरफ्तारी और 1989 में पनामा के राष्ट्रपति मैनुअल नोरीएगा को बंदी बनाया जाना इसके पुराने उदाहरण हैं, किंतु वर्ष 2026 की घटनाओं ने इस परिपाटी को और अधिक आक्रामक बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​हाल ही में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाना और उसके पश्चात 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से ईरान पर भीषण मिसाइल हमला कर सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को मौत के घाट उतारना, इसी 'नेतृत्व विनाश' की नीति का चरमोत्कर्ष है। इन घटनाओं ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि अब 'अभय' माने जाने वाले नेतृत्व के सुरक्षित घेरे भी आधुनिक तकनीक और खुफिया ऑपरेशन्स के सामने बेबस हैं। सामरिक होड़ के बीच संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय कानून एक नैतिक सीमा रेखा जरूर खींचते हैं, पर शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए ये नियम अब गौण प्रतीत होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी सदस्य राष्ट्र की संप्रभुता के उल्लंघन को वर्जित करता है और सैन्य कार्रवाई को केवल अनुच्छेद 51 के तहत 'आत्मरक्षा' की स्थिति में ही वैध मानता है। इसके इतर किसी राष्ट्राध्यक्ष को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में महाशक्तियाँ अक्सर 'आतंकवाद-निरोध' या 'रासायनिक या जैविक हथियारों की उपस्थिति','परमाणु अप्रसार' जैसे तर्कों का सहारा लेकर इन नियमों की व्याख्या अपने हितों के अनुरूप करती रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​भविष्य की आशंकाएं अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के युग में भी 'नेतृत्व विनाश' की यह नीति सुरक्षित है? अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और मादुरो की गिरफ्तारी से अमेरिका और इजरायल ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आधुनिक युद्ध अब किसी भी मर्यादा को लांघ सकते हैं। चीन और रूस जैसी महाशक्तियां भविष्य में इस पर क्या रुख अपनाती हैं, यह देखना शेष है, लेकिन छोटे राष्ट्रों को अब यह चिंता सताने लगी है कि कब कोई शक्तिशाली देश उन्हें अपने अधीन बना ले या उनके नेतृत्व को मिटा दे। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना बनाना प्रतिबंधित है, पर इक्कीसवीं सदी के युद्धों ने साबित कर दिया है कि शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए न तो इन नियमों का कोई बंधन है और न ही उन्हें यूएन की निंदा की चिंता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाभारत हमें अंततः यही सिखाता है कि चतुर रणनीतियों और नियमों के उल्लंघन से युद्ध तो जीता जा सकता है, किंतु प्रतिशोध और सत्ता-लालसा पर आधारित जीत कभी स्थायी शांति नहीं लाती। आज विश्व समुदाय के सामने चुनौती कुरुक्षेत्र की इस पुनरावृत्ति को रोकने और अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन को पुनर्जीवित करने की है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 18:20:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शांति की बातें, युद्ध की तैयारी: सभ्यता का दोहरा चेहरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आसमान अभी भी धुंध और धुएँ से भरा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हमारी आँखें टीवी स्क्रीन पर चमकते लाल ब्लॉकों में फँस गईं। एक पल पहले तक यह सिर्फ़ खबरें थीं—और अगले ही पल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी ज़िन्दगी बन गई। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया। </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी पुष्टि ईरानी राज्य मीडिया ने </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च को की। इस खबर ने दुनिया को झकझोर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमारे भीतर का झटका और भी गहरा था। यह कोई दूर की लड़ाई</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172185/talks-of-peace-preparation-for-war-the-double-face-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आसमान अभी भी धुंध और धुएँ से भरा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हमारी आँखें टीवी स्क्रीन पर चमकते लाल ब्लॉकों में फँस गईं। एक पल पहले तक यह सिर्फ़ खबरें थीं—और अगले ही पल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी ज़िन्दगी बन गई। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया। </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी पुष्टि ईरानी राज्य मीडिया ने </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च को की। इस खबर ने दुनिया को झकझोर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमारे भीतर का झटका और भी गहरा था। यह कोई दूर की लड़ाई नहीं थी—यह हमारी किताबों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी दीवारों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी सांसों में उतर गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल की किताबें अब कागज़ नहीं रह गई थीं। वे बम के टुकड़ों में बदल गई थीं। हर पन्ना खून से सना था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर अध्याय मौत की कहानी कहता था। बच्चे अब पढ़ेंगे कि छिपना और बचना ही उनका पाठ बन गया। हमारी पीढ़ी ने उन्हें विरासत दी है—एक ऐसी विरासत जिसमें ज्ञान और भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों सिखाए जाते हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने शांति की बातें कीं। “डिप्लोमेसी चलेगी</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा। लेकिन </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फ़रवरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को ऑपरेशन शुरू हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी आँखें फिर अंधेरी हो गईं। टीवी बंद हुआ। सोशल मीडिया को स्क्रॉल करते हुए सोचा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी दुनिया से दूर है।” लेकिन यह सच नहीं था। ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमले हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इज़राइल पर मिसाइलें गिरीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिज़्बुल्लाह सक्रिय हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और गल्फ़ में तेल सुविधाओं और जहाजों पर हमले हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आग और विस्फोट की खबरें आईं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और हम</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम खून से सनी किताबें तैयार कर रहे हैं। किताबें जो नई पीढ़ी को पढ़ाएंगी कि उनका भविष्य किस तरह जलता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उनकी आवाज़ कहाँ गुम हो गई। यह हमारी सच्चाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी चुप्पी—सबसे बड़ा अपराध।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह युद्ध नया नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमने इसे अपनी विरासत बना लिया है। </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब इज़राइल ने ईरान पर हमला किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने इसे सिर्फ़ “सीमित संघर्ष” कहकर नजरअंदाज किया। जब ट्रंप ने घोषणा की कि “ईरान को न्यूक्लियर हथियार नहीं मिलेंगे</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने उसकी चेतावनी को हँसी में उड़ा दिया। लेकिन अब</span>, 2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ख़ामेनेई की मौत के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेहरान में नागरिक क्षेत्र प्रभावित हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पतालों और स्कूलों पर असर की खबरें</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सामने आ रही हैं। हमारी पीढ़ी ने चुन लिया है – बच्चों को खून भरी किताबें थमाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथियार बेचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और तेल के लिए आंखें मूंद लेना। और वही बच्चे अब पढ़ेंगे – हर अध्याय में मौत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर पन्ने पर खून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिन किताबों में जीवन का कोई पाठ नहीं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक बच्चा अपनी माँ से पूछेगा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">माँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह किताब क्यों लाल है</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">और जवाब नहीं मिलेगा। क्योंकि यह लाल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह खून से सनी थी। हमारी पीढ़ी ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">हम लड़ रहे हैं ताकि तुम सुरक्षित रहो</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन लड़ाई किससे थी – खुद से</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने घृणा बोई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफ़रत उगाई। “प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक” की छाया में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार का बोझ बच्चों पर पड़ा। युद्ध की छाया में रेडिएशन का खतरा मंडरा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर और बीमारियाँ पीढ़ियों को प्रभावित कर सकती हैं। हमने उन्हें क्या विरासत दी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी किताबें जिनमें हर जन्म मौत की सज़ा पढ़ाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिनमें जीवन का कोई पाठ नहीं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सिर्फ़ मिडिल ईस्ट की समस्या नहीं है। वर्ल्ड वॉर थ्री की आहट अब हर दिशा में गूँज रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर ख़बर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर रेडियो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर स्क्रीन पर इसकी गूंज सुनाई देती है। पोल्स चीख रहे हैं – अमेरिका में </span>46%, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटेन में </span>43%, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस में उच्च प्रतिशत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि जर्मनी में कम लोग अगले पाँच साल में ग्लोबल वॉर को संभावित मानते हैं। लेकिन हम सुन नहीं रहे। हम अपनी आँखें बंद करके नई पीढ़ी के लिए खून से सनी किताबें तैयार कर रहे हैं। बच्चे पढ़ेंगे – ऐसी किताबें जो न्यूक्लियर विंटर की कहानियाँ कहेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ सूरज छिपा रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ फसलें उगना भूल जाएँगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और भूख ही मृत्यु का दूसरा नाम बन जाएगी। यह हमारी विरासत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसके साए में बढ़ती हर पीढ़ी अपनी पहली और आखिरी पाठशाला में मौत और विनाश ही देखेगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने जलवायु परिवर्तन को अनदेखा किया। हमने युद्ध को सामान्य मान लिया। अब इसकी कीमत चुकाने वाली नई पीढ़ी होगी। उनकी पहली किताब विस्फोट की होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी आखिरी राख की। उनका डीएनए बदल चुका होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका बचपन डर और सायरन की चीखों में बीतेगा। उनके खेल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि खतरे की घंटियों की गूँज उनके कानों में गूँजेगी। हमारी पीढ़ी का सबसे बड़ा अपराध यही है – युद्ध को अपनी विरासत बनाना। हमने किताबें लिखीं – खून से। लेकिन अब वही किताबें उनकी पहली और आखिरी पढ़ाई बन चुकी हैं। नई पीढ़ी पढ़ेगी और समझेगी कि हमने क्या किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह समझ उन्हें हमारे फैसलों की कीमत बतलाएगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जागने का वक्त है – इससे पहले कि खून से सनी किताबें बच्चों की पहली और आखिरी पढ़ाई बन जाएँ। जागो। बदलो। लड़ो। क्योंकि अगर हमने अभी नहीं बदला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नई पीढ़ी सिर्फ़ खून के पन्ने पलटेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हर सवाल के जवाब के लिए हमारी चुप्पी ही रह जाएगी। बच्चे पूछेंगे</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने हमें क्यों मारा</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारे पास कोई उत्तर नहीं होगा। अब मौका है – युद्ध नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शांति की विरासत देने का। हमारी जिम्मेदारी अब तक़दीर बदलने की है। नई पीढ़ी के लिए खून नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा छोड़ो। यही हमारी अंतिम लड़ाई है – आखिरी मौका सुधार का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आखिरी मौका यह दिखाने का कि हम अभी भी अपने कर्मों के प्रभारी हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी विरासत है। हमने बच्चों को किताबें सौंप दी हैं – खून से सनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँसुओं से भरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और पीढ़ियों तक उठती चोटों की गूँज समेटे। यह हमारी चुप्पी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी उदासीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी लालच का सजीव प्रमाण है। अब समय है कि हम बदलें। हमें नई पीढ़ी को देने वाली किताबों से खून हटाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें केवल शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांति और आशा की विरासत देनी होगी। यही हमारी अंतिम मौका है – अगर हमने अब कदम नहीं उठाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कल का सूरज कभी नई पीढ़ी के लिए पूरी तरह चमकेगा ही नहीं। यह हमारी जिम्मेदारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी चेतावनी भी – बदलाव अब अनिवार्य है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 18:11:59 +0530</pubDate>
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