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                <title>अंतरराष्ट्रीय राजनीति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>अंतरराष्ट्रीय राजनीति RSS Feed</description>
                
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                <title>बहुत आपत्तिजनक हैं ट्रंप के असंयमित असभ्य बयान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175393/trumps-uncontrolled-rude-statements-are-very-objectionable"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c0eb6ec0-68a6-11f0-83d0-5d68283eb47c.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों काफी असंयमित भाषा बोल रहे हैं। अमेरिकी नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान को धमकाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. ट्रंप ने ईरान के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और पुलों पर हमले की चेतावनी दी. उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, 'ईरान में मंगलवार को पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा… होर्मुज स्ट्रेट खोलो, नहीं तो नर्क में जीओगे.'यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस सप्लाई रूट्स में से एक है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जो फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद से लगभग बंद है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. ट्रंप ने होर्मुज को लेकर ईरान को कई बार धमकी दी है और इस समुद्री मार्ग को खोलने का अल्टीमेटम दे चुके हैं. उन्होंने होर्मुज को खोलने में अमेरिका की मदद नहीं करने के लिए यूरोपीय व नाटो सहयोगियों पर भी नाराजगी जताई है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने यहां तक चेतावनी दी कि अमेरिका नाटो से बाहर निकल सकता है. अपने इस पोस्ट में ट्रंप ने ईरान के लिए ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया, जिसकी किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष से उम्मीद नहीं की जाती. हालांकि हम जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप पर कभी कोई मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस समय उनकी भाषा में जो गिरावट स्पष्ट स्पष्ट परिलक्षित है, कम से कम उसका विश्व समुदाय को विरोध करना चाहिए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल ईरान पर अमेरिका और इजरायल को जंग छेड़े छह सप्ताह हो चुके हैं, जिसमें कई बार जीत का दावा करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप जीत के लक्षण नहीं दिखा पाए। बल्कि बार-बार युद्धविराम की अवधि को बदलते हैं और साथ ही उनकी धमकियां भी बदल रही हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के ऐलान से शुरु हुआ यह युद्ध अब नागरिकों को निशाने पर लेने की धमकियों पर उतर आया है। रविवार को ईस्टर के मौके पर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टूथ पर ट्रंप ने ईरान को धमकी दी कि 48 घंटों में होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खोलो वर्ना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ट्रंप ने लिखा कि मंगलवार को ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक हमले हो सकते हैं, और इसे संघर्ष का निर्णायक क्षण बताया। लेकिन यह सब इसी तरह की शालीन भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। और यह पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपशब्द कहे हों। इससे पहले उन्हें पत्रकारों से चर्चा के दौरान या भाषण देते हुए भी अपशब्द बोलते देखा गया है। यह किसी लिहाज से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और वैश्विक नेताओं को खुलकर इसकी भर्त्सना करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी से इसकी शुरुआत हो तो कितना अच्छा रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी सीनेट के सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी के ​वरिष्ठ नेता चक शूमर ने ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के बयान को 'एक असंतुलित व्यक्ति की बकवास बताया'. उन्होंने कहा कि ट्रंप का यह रवैया अमेरिका के सहयोगियों को उससे दूर कर रहा है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के हालिया बयान को युद्ध अपराध की धमकी देने जैसा बताया. ट्रंप की पूर्व सहयोगी मार्जरी टेलर ग्रीन ने भी उनके बयान की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रपति 'पागलपन' की स्थिति में हैं. उन्होंने अमेरिकी प्रशासन के लोगों से दखल देने की अपील की. टेलर ग्रीन ने कहा कि यह युद्ध बिना उकसावे के शुरू किया गया और इससे निर्दोष लोगों की जान जा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैसे संयुक्त राष्ट्र में  ईरानी ई मिशन ने ट्रंप की की नवीनतम टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में' नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करने' की धमकी दे रहे हैं। मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, 'यदि संयुक्त राष्ट्र की अंतरात्मा जीवित होती, तो वह युद्ध भड़काने तो वह युद्ध भड़काने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की खुली और बेशर्म धमकी पर चुप नहीं रहती। ट्रंप इस क्षेत्र को एक अंतहीन युद्ध में घसीटना चाहते हैं।' इसमें कहा गया, 'यह नागरिकों को आतंकित करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावा है और युद्ध अपराध करने के इरादे का स्पष्ट प्रमाण है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसमें आगे कहा गया- 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सभी राज्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे युद्ध अपराधों के ऐसे जघन्य कृत्यों को रोकें। उन्हें अभी कार्रवाई करनी चाहिए। कल बहुत देर हो जाएगी।' वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष गलिबाफ ने कहा कि ट्रंप के 'लापरवाह कदमों से अमेरिका के हर परिवार को एक जीती-जागती नरक में धकेला जा रहा है, हमारा पूरा क्षेत्र जल उठेगा क्योंकि आप नेतन्याहू के आदेशों का पालन करने पर अड़े हैं।' गुलिबाफ के इस बयान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ट्रंप जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं, उसमें यही लगता है कि पटकथा कोई और लिख रहा है, केवल संवाद अदायगी ट्रंप की है। क्योंकि अपशब्द वाले बयान के बाद ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के एक पत्रकार से कहा, मुझे लगता है कि सोमवार को समझौता होने की अच्छी संभावना है, वे (ईरान) अभी बातचीत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तो ट्रंप को लगता है कि ईरान अब भी उनसे बात कर समझौता करेगा, जबकि ईरान की सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूनिट खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता ने कहा, 'अगर आम लोगों पर हमले दोहराए गए, तो हमारे अगले हमले और जवाबी कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और बड़े पैमाने पर होंगे।' ध्यान देने वाली बात यह है कि ईरान केवल धमका नहीं रहा है, अपनी बात पर अमल भी कर रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों समेत इजरायल पर ईरान के हमलों को कोई रोक नहीं पा रहा है, वहीं अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हुए हमले और एक अमेरिकी पायलट के लापता होने की घटना ने भी जाहिर कर दिया है कि अमेरिका उतना भी ताकतवर देश नहीं है, जितना बड़ा उसका हौव्वा खड़ा किया गया है। ईरान की पहाड़ियों में लापता पायलट को बचाने का दावा ट्रंप ने किया है, हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने बचाव के लिए आए सैन्य दस्ते पर भी हमला किया है। अब किसका दावा सही है और किसका गलत, यह तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो नजर आ ही रहा है कि इस युद्ध में अमेरिका को वैसी ही चोट पड़ रही है, जो पहले इराक, अफगानिस्तान, क्यूबा और वियतनाम में पड़ चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि 2019 में ट्रंप ने खुद एक पोस्ट में प. एशिया में अमेरिका की सैन्य दखलंदाजी और युद्ध को गलत ठहराया था, क्योंकि उसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और सैनिकों का नुकसान हुआ। लेकिन अब संभवतः एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के दबाव में ट्रंप ने पूरी दुनिया को युद्ध की बर्बादी में झोंक दिया है। अपनी गलती मानने की जगह रोजाना बेतुके, निर्लज्ज बयानों से उसे सही भी ठहरा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में परमाणु हथियार और सत्ता बदलने के नाम पर शुरु किया गया युद्ध मीनाब की मासूम बच्चियों का कातिल बना और उसके बाद ईरान की अधोसंरचना पर हमले ही किए जा रहे हैं, कम से कम 30 विश्वविद्यालयों और कई अस्पतालों, दवा कारखानों को बारुद से ढेर कर दिया गया है। यह सीधे-सीधे मानवता के खिलाफ अपराध है, जिसे रोकने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर आवाज उठानी चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:20:36 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति और परमाणु युद्ध के खतरे</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर समय-समय पर वैश्विक बहस जरूर उठती रही है, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के युद्ध में अपनी प्रारंभिक पराजय और इजरायल द्वारा अमेरिका को इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की अफवाह से थोड़े मानसिक रूप से विचलित हो गए हैं उन्होंने कुछ अपने महत्वपूर्ण विभागों के  के प्रमुखों को भी पद से हटा दिया है जो अमेरिका प्रशासन में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। उनके द्वारा  प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गये वक्तव्य उनकी निराशा तथा हताशा को इंगित कर रहा है। ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध को लेकर परमाणु</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175274/donald-trumps-mental-condition-and-the-dangers-of-nuclear-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/getty_6842799de6-1749186973.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर समय-समय पर वैश्विक बहस जरूर उठती रही है, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के युद्ध में अपनी प्रारंभिक पराजय और इजरायल द्वारा अमेरिका को इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की अफवाह से थोड़े मानसिक रूप से विचलित हो गए हैं उन्होंने कुछ अपने महत्वपूर्ण विभागों के  के प्रमुखों को भी पद से हटा दिया है जो अमेरिका प्रशासन में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। उनके द्वारा  प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गये वक्तव्य उनकी निराशा तथा हताशा को इंगित कर रहा है। ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध को लेकर परमाणु बम गिराने जैसे कठोर कदम भी उठा सकते हैं यह उन्होंने हालिया बयान में कहा भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन किसी भी निर्वाचित नेता के मानसिक संतुलन पर ठोस चिकित्सीय प्रमाण के बिना निष्कर्ष निकालना न केवल अनुचित है बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं को और भी जटिल बना देना है, इसलिए आवश्यक है कि हम भावनात्मक धारणाओं के बजाय तथ्यों और रणनीतिक यथार्थ के आधार पर इस पूरे परिदृश्य को समझें, विशेषकर जब बात अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच संभावित युद्ध और परमाणु टकराव की हो।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सही है कि पश्चिम एशिया लंबे समय से अस्थिरता का केंद्र रहा है और यहां की किसी भी सैन्य कार्रवाई का प्रभाव वैश्विक शांति पर पड़ता है, लेकिन यह दावा कि ईरान के पास निश्चित रूप से 440 किलो यूरेनियम है जिससे 11 परमाणु बम तुरंत बनाए जा सकते हैं, इस प्रकार के आंकड़े आमतौर पर खुफिया और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमान होते हैं, जिनकी पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकती, हालांकि यह भी सच है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है और इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी लगातार उसकी निगरानी करती रही है,  सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया जाना  कि ईरान ने अमेरिकी एफ-15 विमानों को मार गिराया, इस तरह की घटनाओं की पुष्टि विश्वसनीय वैश्विक रक्षा स्रोतों से होना आवश्यक होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि युद्ध के समय सूचना तंत्र का युद्ध भी उतना ही सक्रिय होता है जितना वास्तविक युद्ध, वास्तविकता यह है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का टकराव नहीं बल्कि तकनीकी, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का मिश्रण होता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति विश्व में सबसे ताकतवर और सक्षम मानी जाती है, वहीं ईरान ने भी असममित युद्ध  की रणनीति अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है, जिसमें मिसाइल तकनीक, ड्रोन युद्ध और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों का उपयोग शामिल है, ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो यह किसी एक पक्ष की त्वरित जीत के बजाय लंबे गतिरोध में बदल सकता है, जहां तक डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का सवाल है, यह सर्वविदित है कि उनकी राजनीतिक शैली आक्रामक और अप्रत्याशित रही है, वे कई बार अपने वक्तव्यों में बदलाव करते रहे हैं, जिसे उनके समर्थक रणनीतिक लचीलापन कहते हैं जबकि आलोचक इसे अस्थिरता का संकेत मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय संबंधों में केवल एक व्यक्ति की मानसिक स्थिति से निर्णय नहीं लिए जाते, बल्कि उसके पीछे पूरी संस्थागत संरचना, सलाहकार तंत्र और रक्षा नीति का ढांचा काम करता है, अमेरिका जैसे देश में राष्ट्रपति के पास परमाणु हथियारों का नियंत्रण अवश्य होता है, लेकिन उसके उपयोग के लिए कई स्तरों की सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया भी मौजूद होती है, इसलिए यह आशंका कि कोई नेता अचानक मानसिक असंतुलन में परमाणु युद्ध छेड़ देगा, व्यावहारिक रूप से अत्यंत जटिल और नियंत्रित प्रक्रिया से गुजरती है, फिर भी यह खतरा पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इतिहास गवाह है कि गलत आकलन और अहंकारपूर्ण निर्णय बड़े युद्धों का कारण बने हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट ने मानवता को परमाणु विनाश की भयावहता दिखाई थी। लेकिन उस समय और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है क्योंकि आज के परमाणु हथियार कहीं अधिक शक्तिशाली और विनाशकारी हैं। आधुनिक परमाणु युद्ध केवल दो शहरों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह पूरे ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर सकता है, जिससे न्यूक्लियर विंटर जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जिसमें सूरज की रोशनी तक पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाएगी और वैश्विक खाद्य संकट पैदा हो जाएगा, इस संदर्भ में “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़” जैसे सामरिक मार्ग का महत्व भी अत्यधिक बढ़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह विश्व के तेल आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है, यदि इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है, तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और विकासशील देशों पर इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ेगा, वर्तमान परिदृश्य में यह कहना अधिक उचित होगा कि अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच तनाव एक बहुस्तरीय शक्ति संघर्ष का परिणाम है। जिसमें सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय राजनीति भी शामिल है, इस संघर्ष को केवल “जीत” या “हार” के नजरिए से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इसका हर परिणाम वैश्विक अस्थिरता को बढ़ाता है, जहां तक ट्रंप की भूमिका का सवाल है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो पारंपरिक कूटनीति से हटकर निर्णय लेते हैं, वे कई बार जोखिमपूर्ण बयानबाजी करते हैं जिससे तनाव बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही वे अचानक बातचीत की दिशा भी पकड़ सकते हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह “मानसिक रूप से असंतुलित” कहना एक राजनीतिक आकलन हो सकता है, न कि वस्तुनिष्ठ सत्य, असली चिंता इस पूरे परिदृश्य में यह है कि यदि किसी भी पक्ष ने गलत आकलन कर लिया या प्रतिक्रिया में अति कर दी तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है, और तब परमाणु हथियारों का उपयोग भले ही अंतिम विकल्प के रूप में हो, उसका परिणाम पूरी मानवता के लिए विनाशकारी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए आज की आवश्यकता यह है कि वैश्विक शक्तियां संयम बरतें, संवाद को प्राथमिकता दें और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर दें, क्योंकि युद्ध चाहे किसी भी कारण से हो, उसका अंत केवल विनाश और मानव पीड़ा में ही होता है, और परमाणु युद्ध की स्थिति में यह पीड़ा अकल्पनीय स्तर तक पहुंच सकती है, इसलिए इस विषय को भावनात्मक उत्तेजना के बजाय गंभीर, संतुलित और तथ्यपरक दृष्टिकोण से समझना ही सबसे उचित मार्ग है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 18:26:26 +0530</pubDate>
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                <title>तीन देशों की सनक से पैदा वैश्विक आर्थिक,सामरिक संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जैसी की आशंका दिखाई दे रही है ईरान की भयभीत आम जनता एवं वर्तमान में बचे हुए ईरानी टॉप लीडर्स कि यह पुरजोर मांग है कि ईरान के पास जितना परमाणु ईंधन अमेरिका के आक्रमण से जमीन में धंसा हुआ बचा है, उससे कम से कम 10 बड़े परमाणु बम बनाए जा सकते हैं और इस परमाणु बम को बनाने के लिए ईरान प्रशासन पर पूरा दबाव डाला जा रहा है। यह हालत इसलिए पैदा हुए हैं की इस त्रिकोणीय युद्ध में ईरान को बहुत बड़ी संख्या में जनहानि और बड़ी मात्रा में आर्थिक क्षति पहुंची है, ईरानके हजारों लोग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174387/global-economic-and-strategic-crisis-created-by-the-craze-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जैसी की आशंका दिखाई दे रही है ईरान की भयभीत आम जनता एवं वर्तमान में बचे हुए ईरानी टॉप लीडर्स कि यह पुरजोर मांग है कि ईरान के पास जितना परमाणु ईंधन अमेरिका के आक्रमण से जमीन में धंसा हुआ बचा है, उससे कम से कम 10 बड़े परमाणु बम बनाए जा सकते हैं और इस परमाणु बम को बनाने के लिए ईरान प्रशासन पर पूरा दबाव डाला जा रहा है। यह हालत इसलिए पैदा हुए हैं की इस त्रिकोणीय युद्ध में ईरान को बहुत बड़ी संख्या में जनहानि और बड़ी मात्रा में आर्थिक क्षति पहुंची है, ईरानके हजारों लोग मारें गए और 25000 से ज्यादा बड़ी-बड़ी बिल्डिंग,स्कूल और हॉस्पिटल ध्वस्त हुए हैं, ईरान में शिया सुन्नी झगड़ा भी अपने चरम पर है। सुन्नी लोग अब शासन का तख्ता पलटने के प्रयास में लगे हुए हैं।</p><p style="text-align:justify;"> अमेरिका तथा इजरायल युद्ध से ईरान में हुए इस नुकसान को पूरा करने में ईरान को 15 से 20 साल लग सकते हैं। ईरान की सरकार और उनकी जनता के बीच जिस तरह से करो या मरो की स्थिति बनी है, जिसके परिणाम स्वरुप वहां की जनता और नेता यह चाहते हैं कि परमाणु बम बनाना तथा ईरान इजरायल और उसके सहयोगी देशों पर परमाणु हमला करना ही उनके अस्तित्व को बचाने के लिए अंतिम और सम्यक विकल्प हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर अमेरिका इजरायल और ईरान यदि परमाणु संघर्ष में बदल सकता है। </p><p style="text-align:justify;">इसके परिणाम में यह परमाणु युद्ध मानव इतिहास के उन भयावह क्षणों से भी अधिक विनाशकारी होगा, जिनकी शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका द्वारा किए गए परमाणु हमलों से हुई थी। हिरोशिमा पर परमाणु बम विस्फोट की घटना 6 अगस्त 1945 को हुई थी, जब अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था। इसके तीन दिन बाद, नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट 9 अगस्त 1945 को हुआ, जब अमेरिका ने ही नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया। यह घटनाएँ द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में अमेरिका और जापान के बीच हुए युद्ध का हिस्सा थीं।</p><p style="text-align:justify;"> गौर तलब है कि उसे समय के परमाणु बम सीमित शक्ति के थे और उनका प्रभाव मुख्यतः स्थानीय स्तर पर केंद्रित रहा था, जबकि आज के परमाणु हथियार अत्यधिक उन्नत, बहु-मेगाटन क्षमता वाले और दूरगामी प्रभाव वाले विकसित हो चुके हैं। आधुनिक परमाणु युद्ध केवल एक शहर या देश तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका प्रभाव विश्व के हर देश के स्तर पर फैलेगा, यदि ईरान परमाणु हथियार का उपयोग करता है या उस पर परमाणु हमला होता है तो सबसे पहले प्रत्यक्ष प्रभाव मध्य पूर्व क्षेत्र में दिखाई देगा, जिसमें इज़रायल की स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो सकती है वह पूरी तरह विनाशकारी स्थिति में पहुंच सकता है।</p><p style="text-align:justify;"> वहां जनसंख्या का बड़ा हिस्सा तुरंत प्रभावित होगा और बुनियादी ढांचा समाप्त हो सकता है। इसके साथ ही सऊदी अरब में रेडियोधर्मी कण  पहुंचने की आशंका होगी जिससे वहां के तेल भंडार, जल स्रोत और जनजीवन गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। इराक और सीरिया जैसे पड़ोसी देश जो पहले से अस्थिर हैं, यहां परमाणु विकिरण के कारण मानवीय संकट और भी गहरा जाएगा, तुर्की जो यूरोप और एशिया के बीच स्थित है, वह रेडियोधर्मी बादलों के प्रभाव से कृषि और स्वास्थ्य संकट का सामना कर सकता है। इसके आगे यह विकिरण वायुमंडलीय धाराओं के माध्यम से यूरोप के देशों जैसे ग्रीस, इटली और जर्मनी तक फैल सकता है, जहां कैंसर, श्वसन रोग और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ने की संभावना होगी। </p><p style="text-align:justify;">यदि संघर्ष बृहद रूप लेता  है और अमेरिका तथा रूस जैसे परमाणु शक्तिशाली देश इसमें शामिल होते हैं तो स्थिति और भयावह हो जाएगी क्योंकि तब यह सीमित युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक परमाणु टकराव का रूप ले सकता है। भारत और पाकिस्तान भी इसके अप्रत्यक्ष प्रभाव से अछूते नहीं रहेंगे, यहां पर मानसूनी चक्र में बदलाव, तापमान में गिरावट और कृषि उत्पादन में भारी कमी देखने को मिल सकती है जिसे “न्यूक्लियर विंटर” कहा जाता है। इस स्थिति में सूर्य का प्रकाश धूल और धुएं के कारण धरती तक नहीं पहुंच पाएगा जिससे वैश्विक खाद्य संकट उत्पन्न होगा, चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को भी आपूर्ति श्रृंखला टूटने, व्यापार बाधित होने और जनस्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ेगा।</p><p style="text-align:justify;"> अफ्रीका के देश जैसे मिस्र और नाइजीरिया खाद्य आयात पर निर्भर हैं, वहां अकाल और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वहीं दक्षिण अमेरिका के देश जैसे ब्राज़ील में भी जलवायु परिवर्तन और कृषि हानि देखने को मिल सकती है, इस पूरे परिदृश्य में एक बड़ा अंतर यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय केवल दो बम गिराए गए थे और उनका प्रभाव सीमित समय और स्थान में रहा, जबकि आज के परमाणु हथियारों की संख्या हजारों में है और उनकी मारक क्षमता कई गुना अधिक है, आधुनिक मिसाइल तकनीक जैसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल, कुछ ही मिनटों में एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक परमाणु हथियार पहुंचा सकती है, इसके अलावा आज की दुनिया अधिक परस्पर जुड़ी हुई है, वैश्विक अर्थव्यवस्था, संचार प्रणाली, इंटरनेट और आपूर्ति श्रृंखलाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं। </p><p style="text-align:justify;">इसलिए किसी एक क्षेत्र में परमाणु विस्फोट का प्रभाव पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी, तकनीकी ठहराव और सामाजिक अराजकता के रूप में दिखाई दे सकती है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से रेडियोधर्मी विकिरण केवल तत्काल मृत्यु ही नहीं बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाली बीमारियां जैसे कैंसर, जन्म दोष और मानसिक विकार पैदा करेगा, पर्यावरणीय दृष्टि से नदियां, महासागर और मिट्टी प्रदूषित हो जाएंगे जिससे जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। </p><p style="text-align:justify;">यदि हम तुलना करें तो हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए बमों ने लाखों लोगों की जान ली थी, लेकिन आज का परमाणु युद्ध अरबों लोगों के अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है। यह अनुमानित और विशेष रूप से संभावित अमेरिका-इज़रायल-ईरान परमाणु संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक विनाशक आपदा होगा, जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग हर देश प्रभावित होगा, और मानव सभ्यता को सदियों पीछे धकेल सकता है। इसलिए यह केवल सैन्य या राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि मानवता के अस्तित्व का प्रश्न है।जिसे कूटनीति, संयम और वैश्विक सहयोग के माध्यम से युद्ध विराम करके ही टाला जा सकता है।<br /><br />संजीव ठाकुर</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 18:39:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>पश्चिम एशिया का संघर्ष और युद्धविराम की शर्तें</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174234/the-conflict-in-west-asia-and-the-terms-of-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260325_174829.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक हितों का भी खेल होता है। 26 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को भेजा गया 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव और उसके जवाब में ईरान की पांच शर्तें इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती हैं। सवाल यह है कि क्या ये शर्तें न्यायसंगत हैं या केवल रणनीतिक दबाव बनाने का माध्यम?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाने की बात प्रमुख रूप से सामने आती है। यह मांग नई नहीं है। लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा मानते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में ईरान के कार्यक्रम को सीमित करने की बात भी इसी सोच का हिस्सा है। पहली नजर में यह मांग तर्कसंगत लग सकती है, क्योंकि परमाणु हथियारों का प्रसार किसी भी क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, ईरान का तर्क है कि उसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। यदि अन्य देशों के पास मिसाइल और रक्षा प्रणाली है, तो केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाना क्या न्यायसंगत कहा जा सकता है?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से इस विवाद का मूल प्रश्न उठता है—क्या वैश्विक नियम सभी देशों पर समान रूप से लागू होते हैं या शक्तिशाली देशों के हितों के अनुसार तय किए जाते हैं? ईरान की नजर में अमेरिकी प्रस्ताव एकतरफा है, जिसमें उसे अपनी सामरिक ताकत छोड़ने के लिए कहा जा रहा है, जबकि बदले में केवल प्रतिबंधों में राहत और कुछ आर्थिक सहयोग का वादा किया जा रहा है। यह सौदा ईरान के लिए असंतुलित प्रतीत होता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी तरफ, ईरान की शर्तें भी कम कठोर नहीं हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की मांग इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। यदि इस पर किसी एक देश का प्रभुत्व मान लिया जाए, तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ईरान की यह मांग कई देशों के लिए स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की मांग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। किसी भी युद्ध में नागरिकों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान होता है, और अंतरराष्ट्रीय कानून भी यह मानता है कि आक्रामक पक्ष को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन यहां समस्या यह है कि दोनों पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को आक्रामक बताते हैं। ऐसे में मुआवजे का निर्धारण एक जटिल और विवादास्पद प्रक्रिया बन जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की यह शर्त कि भविष्य में उस पर फिर से युद्ध न थोपा जाए, सैद्धांतिक रूप से उचित लगती है। हर देश अपनी सुरक्षा और स्थिरता चाहता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी गारंटी देना लगभग असंभव होता है। इतिहास गवाह है कि समझौतों और संधियों के बावजूद युद्ध होते रहे हैं। इसलिए यह मांग व्यावहारिक कम और आदर्शवादी अधिक प्रतीत होती है।इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—विश्व राजनीति का शक्ति संतुलन। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने और अपने सहयोगियों के हितों की रक्षा करे। वहीं ईरान जैसे देश के लिए अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि दोनों पक्षों की शर्तें अपने-अपने दृष्टिकोण से सही लगती हैं, लेकिन एक-दूसरे के लिए अस्वीकार्य बन जाती हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो दोनों पक्षों की शर्तों में कुछ उचित तत्व हैं और कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण भी। अमेरिका की यह मांग कि ईरान अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे, एकतरफा दबाव की तरह दिखती है। वहीं ईरान की यह जिद कि उसे होर्मुज पर पूर्ण अधिकार दिया जाए, वैश्विक संतुलन के लिए खतरा बन सकती है। इसी तरह मुआवजे और भविष्य में युद्ध न होने की गारंटी जैसी शर्तें नैतिक रूप से सही होते हुए भी व्यावहारिक कठिनाइयों से भरी हैं।</div><div style="text-align:justify;">वास्तविक समाधान इन चरम स्थितियों के बीच कहीं छिपा हुआ है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> किसी भी स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष कुछ समझौते करें। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे पारदर्शी और सीमित करने पर सहमत हो सकता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी उसे सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की ठोस गारंटी दे सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए बहुपक्षीय नियंत्रण या अंतरराष्ट्रीय निगरानी एक बेहतर विकल्प हो सकता है, जिससे किसी एक देश का प्रभुत्व स्थापित न हो।</div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि युद्धविराम की वर्तमान शर्तें न पूरी तरह सही हैं और न पूरी तरह गलत। वे दोनों पक्षों की रणनीतिक सोच और राष्ट्रीय हितों का प्रतिबिंब हैं। लेकिन यदि इन शर्तों पर जिद बनी रही, तो शांति की संभावना कमजोर होती जाएगी। इतिहास यही सिखाता है कि युद्ध का अंत केवल शक्ति से नहीं, बल्कि समझदारी और संतुलित समझौतों से होता है। पश्चिम एशिया में स्थायी शांति तभी संभव है जब दोनों पक्ष अपने अधिकतम लाभ के बजाय साझा हितों को प्राथमिकता दें।</div><div style="text-align:justify;">*कांतिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 19:01:47 +0530</pubDate>
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                <title>खुद की गलतियों से आतंकवाद का सबसे बड़ा गढ़ बना  पाकिस्तान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व भर में पाकिस्तान सबसे बड़ा आतंकवाद का गढ़ बन गया है। पाकिस्तान की खुद की कमर आज उस आतंकवाद ने तोड़ दी है जिसे कभी शह देकर उसने ही पाला पोसा था। इस बात की पुष्टि ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स कर रहा है, जिसमें पहली बार पाकिस्तान शीर्ष स्थान पर पहुंचा है। साल 2025 में आतंकवाद से जुड़ी मौतों के मामले में 6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) द्वारा जारी ग्लोबल टैररिज्म इंडैक्स 2026 के अनुसार, पिछले साल पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं में 1,139 मौतें दर्ज की गईं, जो</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174224/pakistan-became-the-biggest-stronghold-of-terrorism-due-to-its"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(2)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व भर में पाकिस्तान सबसे बड़ा आतंकवाद का गढ़ बन गया है। पाकिस्तान की खुद की कमर आज उस आतंकवाद ने तोड़ दी है जिसे कभी शह देकर उसने ही पाला पोसा था। इस बात की पुष्टि ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स कर रहा है, जिसमें पहली बार पाकिस्तान शीर्ष स्थान पर पहुंचा है। साल 2025 में आतंकवाद से जुड़ी मौतों के मामले में 6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) द्वारा जारी ग्लोबल टैररिज्म इंडैक्स 2026 के अनुसार, पिछले साल पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं में 1,139 मौतें दर्ज की गईं, जो वहां की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को दिखाती हैं। ग्लोबल टैररिज्म इंडैक्स 2026 में 163 देशों में आतंकवाद के असर का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान का अपने पड़ोसी देशों, खासकर अफगानिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध हैं। इसके अलावा प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की तरफ से बढ़ती हिंसा ने पाकिस्तान के लिए सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान में आतंकी हमलों में मौत की संख्या भी चौंकाने वाली है। रिपोर्ट से पता चलता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद से होने वाली मौतें अब 2013 के बाद से अपने सबसे ऊंचे स्तर पर हैं। 2025 में देश में आतंकवाद से 1,139 मौतें और 1,045 घटनाएं दर्ज की गई थी। इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस की रिपोर्ट में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है। कहा गया है कि टीटीपी ने पाकिस्तान के भीतर सबसे खतरनाक आतंकी समूह के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे खतरनाक आतंकी समूह है। आईईपी के आंकड़ों से पता चलता है कि 2009 के बाद से पाकिस्तान में कुल हमलों में टीटीपी के हमलों का हिस्सा 67 प्रतिशत से ज्यादा रहा है, और पाकिस्तान में होने वाले हमलों के लिए यह दूसरे सबसे सक्रिय समूह, बीएलए के मुकाबले पांच गुना ज्यादा जिम्मेदार है। खास बात यह है कि दुनिया के 4 सबसे खतरनाक समूहों में टीटीपी ही एकमात्र ऐसा संगठन था जिसकी गतिविधियों में पिछले साल बढ़ोतरी देखी गई। 2025 में टीटीपी की मारक क्षमता में भारी बढ़ोतरी हुई। आतंकवादी घटनाओं की संख्या 24 प्रतिशत बढ़कर 595 हमलों तक पहुंच गई। ये हमले मुख्य रूप से अफगानिस्तान की सीमा के पास खैबर पख्तूनख्वा इलाके में हुए, जिनमें 637 लोगों की मौत हुई-यह आंकड़ा 2011 के बाद से सबसे ज्यादा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट बताती है कि 6000 से 6500 टीटीपी लड़ाके अफगानिस्तान के अंदर से काम कर रहे हैं और वहीं से पाकिस्तान में हमले कर रहे हैं। करीब 85% हमले अफगान सीमा के 10 से 50 किलोमीटर के दायरे में होते हैं।पाकिस्तान के कबायली इलाकों को लंबे समय तक ऐसे समूहों का सुरक्षित ठिकाना माना जाता रहा है। यहां से तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, अल-कायदा और बाद में टीटीपी जैसे संगठन मजबूत हुए। 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद टीटीपी को और सुरक्षित ठिकाना मिल गया। पाकिस्तान ने अफगान सरकार से कार्रवाई की मांग की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।एक नकारात्मक सोच रखने वाला और कट्टरपंथी राह पर चलने वाला पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन व संरक्षण देने वाला पाकिस्तान आज खुद आतंकवाद का शिकार है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक रिपोर्ट के अनुसार हालांकि, कुल हमलों की संख्या में थोड़ी कमी आई, लेकिन 2025 लगातार छठा साल रहा जब आतंकवाद से मौतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा, देश में बंधक बनाने की घटनाओं में भी भारी उछाल देखा गया। 2024 में 101 के मुकाबले 2025 में 655 लोग बंधक बनाए गए। यह वृद्धि मुख्य रूप से जाफर एक्सप्रेस हमले के कारण हुई, जिसमें 442 लोगों को बंधक बनाया गया था।बता दें कि आतंरिक सुरक्षा की स्थिति खासकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सबसे ज्यादा खराब है, जहां 2025 में कुल आतंकी हमलों का 74 प्रतिशत और मौतों का 67 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान अब बुर्किना फ़ासो, नाइजीरिया, नाइजर और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के साथ उन पांच देशों में शामिल है, जहां दुनियाभर की लगभग 70 फीसदी आतंकी मौतें होती हैं। यह ताजा रैंकिंग 2025 में दूसरे स्थान पर रहने के बाद आई है, जो पाकिस्तान में लगातार बिगड़ती सुरक्षा स्थिति की पुष्टि करती है।2021 में जब काबुल में तालिबान ने सत्ता संभाली तो पाकिस्तान की एस्टेब्लिशमेंट मिठाइयां बांट रही थी. उन्हें लगा था कि उनका स्ट्रैटेजिक डेप्थ का सपना पूरा हो गया. लेकिन पासा पूरी तरह पलट गया. अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं और मौतों में 95% की भारी गिरावट आई. आज वहां की सड़कों पर होने वाले धमाके कम हुए हैं और तालिबान ने ऐसे समूहों पर नकेल कसी है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें जनरल आसिम मुनीर के कार्यकाल में पाकिस्तान आतंकवाद का नया एक्सपोर्ट-इंपोर्ट हब बन चुका है. पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी जिस तालिबान को अपना एसेट मानती थी, उसी से जुड़ा टीटीपी अब खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फौज का शिकार कर रही है. मुनीर साहब राजनीति और इमरान खान को दबाने में इतने व्यस्त रहे कि सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता उनके हाथ से निकल गई.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से अस्थिर पाकिस्तान आज भी उत्पन्न हुई स्थिति पर आत्मचिंतन करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान जब से अस्तित्व में आया तभी से भारत विरुद्ध नीति उसकी राजनीति का केंद्र बिन्दु रही है पाकिस्तान की नकारात्मक नीतियों का ही परिणाम है कि पहले बांग्लादेश अस्तित्व में आया और आज बलूचिस्तान अलग होने के लिए संघर्ष कर रहा है। भारत विरुद्ध आतंकियों का इस्तेमाल करने वाला पाकिस्तान आज आतंकवाद केंद्र भी है और आतंकवाद पीड़ित भी है। पाकिस्तान अगर सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिरता चाहता है तो उसे आतंकियों को समर्थन व संरक्षण देना बंद करना होगा और सकारात्मक सोच अपनाकर अपने भविष्य को संवारने के लिए कार्य करना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान के आंतरिक राजनीतिक हालात जगजाहिर हैं, शरीफ सरकार एक कठपुतली सरकार से अधिक कुछ नहीं।सेना प्रमुख मुनीर के हाथों में पाकिस्तान की बागडोर सिमट रही है अमेरिका मुनीर को तवज्जो देकर अपने हित साधने की जुगत कर रहा है। मुनीर जिहादियों का इस्तेमाल भारत विरुद्ध तो कर ही रहे हैं। पाकिस्तान के भीतर आतंकियों को आज भी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख मुनीर समर्थन दे रहे हैं। इसी कारण पाकिस्तान में आतंकवाद भी और उस कारण जान माल का नुकसान भी बढ़ रहा है। विश्व में आतंकवाद के कारण होने वाली सबसे अधिक मौतों के कारण शीर्ष पर पाकिस्तान के होने का मुख्य कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था के इतर पाकिस्तानी में लगातार सेना प्रमुख का हस्तक्षेप बना रहना है।पाकिस्तान की बुनियाद ही घृणा विद्वेष और सांप्रदायिक कट्टरता की जमीन पर रखी गई है यही उसके लिए भारी पड़ रही है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 18:23:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>खामनेई की मौत पर छाती पीटने वाले, निर्दोष भारतीयों की मौत पर मौन क्यों थे?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अयातुल्ला अली खामनेई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की मृत्यु के बाद भारत सहित अनेक देशों में उनके समर्थकों द्वारा छाती पीट-पीटकर मातम मनाया जा रहा है और</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजराइल</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की आलोचना की जा रही है। किंतु प्रश्न यह है कि युद्ध हो या आतंकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके घाव सदैव गहरे और त्रासद होते हैं। उनकी टीस लंबे समय तक जनमानस को व्यथित करती रहती है । ईरान के सुप्रीम लीडर के रूप में लगभग </span>36 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों तक सत्ता में रहे खामनेई के शासनकाल में कितने निर्दोष लोगों ने दमन और कठोर नीतियों का सामना</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172344/why-those-who-beat-their-chest-on-khameneis-death-were"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/खामनेई-की-मौत-पर-छाती-पीटने-वाले,-निर्दोष-भारतीयों-की-मौत-पर-मौन-क्यों-थे.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अयातुल्ला अली खामनेई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की मृत्यु के बाद भारत सहित अनेक देशों में उनके समर्थकों द्वारा छाती पीट-पीटकर मातम मनाया जा रहा है और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजराइल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की आलोचना की जा रही है। किंतु प्रश्न यह है कि युद्ध हो या आतंकवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके घाव सदैव गहरे और त्रासद होते हैं। उनकी टीस लंबे समय तक जनमानस को व्यथित करती रहती है । ईरान के सुप्रीम लीडर के रूप में लगभग </span>36 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों तक सत्ता में रहे खामनेई के शासनकाल में कितने निर्दोष लोगों ने दमन और कठोर नीतियों का सामना किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह किसी से छिपा नहीं है। क्या मातम मनाने वाले उनके समर्थकों को यह स्मरण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जब किसी देश के नागरिक स्वयं अपने सर्वोच्च नेता की मृत्यु पर सड़कों पर उतरकर जश्न मनाते दिखाई दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह शासन और जनता के बीच गहरे असंतोष का संकेत देता है। ऐसे में भारत में शोक प्रकट करने वाले लोग आखिर किस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरानी सुप्रीम खामनेई पर आरोप रहे कि उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगाए । हिजाब को अनिवार्य करना और इस्लामी नियमों की कठोर व्याख्या के आधार पर सामाजिक जीवन को नियंत्रित करना उनकी नीतियों का हिस्सा रहा । आधुनिक युग में जब ईरान की महिलाओं और युवाओं ने स्वतंत्रता तथा समान अधिकारों की मांग उठाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से दबाया गया। अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन कार्रवाइयों की आलोचना की है । यह भी विचारणीय है कि जब भारत में आतंकी हमलों में निर्दोष नागरिक मारे गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब क्या इन शोक प्रकट करने वालों ने उतनी ही तीव्रता से संवेदना व्यक्त की </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम सचमुच मानवीय मूल्यों के पक्षधर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारी संवेदनाएं चयनात्मक नहीं होनी चाहिए । हिंसा चाहे कहीं भी हो ईरान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में या भारत में उसकी समान रूप से निंदा होनी चाहिए ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते । कभी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के संबंध सामान्य थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु वैचारिक टकराव और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें कट्टर विरोधी बना दिया। मध्य-पूर्व के कई देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहरीन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुवैत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भी इस तनावपूर्ण वातावरण से प्रभावित रहे हैं । निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी युद्ध की विभीषिका अत्यंत भयावह होती है। हुक्मरानों के अहंकार की कीमत अंततः आम नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों और सैनिकों को ही चुकानी पड़ती है। अतः किसी भी शासक की मृत्यु पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देने से पूर्व उसके शासनकाल का समग्र और निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है । यदि हम वास्तव में मानवता के पक्षधर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें हर निर्दोष की पीड़ा पर समान रूप से संवेदनशील होना चाहिए चाहे वह किसी भी देश या धर्म का क्यों न हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:28:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>शांति की बातें, युद्ध की तैयारी: सभ्यता का दोहरा चेहरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आसमान अभी भी धुंध और धुएँ से भरा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हमारी आँखें टीवी स्क्रीन पर चमकते लाल ब्लॉकों में फँस गईं। एक पल पहले तक यह सिर्फ़ खबरें थीं—और अगले ही पल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी ज़िन्दगी बन गई। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया। </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी पुष्टि ईरानी राज्य मीडिया ने </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च को की। इस खबर ने दुनिया को झकझोर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमारे भीतर का झटका और भी गहरा था। यह कोई दूर की लड़ाई</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172185/talks-of-peace-preparation-for-war-the-double-face-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p align="right" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आसमान अभी भी धुंध और धुएँ से भरा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हमारी आँखें टीवी स्क्रीन पर चमकते लाल ब्लॉकों में फँस गईं। एक पल पहले तक यह सिर्फ़ खबरें थीं—और अगले ही पल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी ज़िन्दगी बन गई। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया। </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी पुष्टि ईरानी राज्य मीडिया ने </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च को की। इस खबर ने दुनिया को झकझोर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमारे भीतर का झटका और भी गहरा था। यह कोई दूर की लड़ाई नहीं थी—यह हमारी किताबों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी दीवारों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी सांसों में उतर गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल की किताबें अब कागज़ नहीं रह गई थीं। वे बम के टुकड़ों में बदल गई थीं। हर पन्ना खून से सना था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर अध्याय मौत की कहानी कहता था। बच्चे अब पढ़ेंगे कि छिपना और बचना ही उनका पाठ बन गया। हमारी पीढ़ी ने उन्हें विरासत दी है—एक ऐसी विरासत जिसमें ज्ञान और भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों सिखाए जाते हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने शांति की बातें कीं। “डिप्लोमेसी चलेगी</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा। लेकिन </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फ़रवरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को ऑपरेशन शुरू हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी आँखें फिर अंधेरी हो गईं। टीवी बंद हुआ। सोशल मीडिया को स्क्रॉल करते हुए सोचा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी दुनिया से दूर है।” लेकिन यह सच नहीं था। ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमले हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इज़राइल पर मिसाइलें गिरीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिज़्बुल्लाह सक्रिय हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और गल्फ़ में तेल सुविधाओं और जहाजों पर हमले हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आग और विस्फोट की खबरें आईं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और हम</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम खून से सनी किताबें तैयार कर रहे हैं। किताबें जो नई पीढ़ी को पढ़ाएंगी कि उनका भविष्य किस तरह जलता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उनकी आवाज़ कहाँ गुम हो गई। यह हमारी सच्चाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी चुप्पी—सबसे बड़ा अपराध।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह युद्ध नया नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हमने इसे अपनी विरासत बना लिया है। </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब इज़राइल ने ईरान पर हमला किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने इसे सिर्फ़ “सीमित संघर्ष” कहकर नजरअंदाज किया। जब ट्रंप ने घोषणा की कि “ईरान को न्यूक्लियर हथियार नहीं मिलेंगे</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने उसकी चेतावनी को हँसी में उड़ा दिया। लेकिन अब</span>, 2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ख़ामेनेई की मौत के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेहरान में नागरिक क्षेत्र प्रभावित हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पतालों और स्कूलों पर असर की खबरें</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सामने आ रही हैं। हमारी पीढ़ी ने चुन लिया है – बच्चों को खून भरी किताबें थमाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथियार बेचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और तेल के लिए आंखें मूंद लेना। और वही बच्चे अब पढ़ेंगे – हर अध्याय में मौत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर पन्ने पर खून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिन किताबों में जीवन का कोई पाठ नहीं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक बच्चा अपनी माँ से पूछेगा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">माँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह किताब क्यों लाल है</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">और जवाब नहीं मिलेगा। क्योंकि यह लाल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह खून से सनी थी। हमारी पीढ़ी ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">हम लड़ रहे हैं ताकि तुम सुरक्षित रहो</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन लड़ाई किससे थी – खुद से</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमने घृणा बोई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफ़रत उगाई। “प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक” की छाया में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार का बोझ बच्चों पर पड़ा। युद्ध की छाया में रेडिएशन का खतरा मंडरा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर और बीमारियाँ पीढ़ियों को प्रभावित कर सकती हैं। हमने उन्हें क्या विरासत दी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी किताबें जिनमें हर जन्म मौत की सज़ा पढ़ाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिनमें जीवन का कोई पाठ नहीं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सिर्फ़ मिडिल ईस्ट की समस्या नहीं है। वर्ल्ड वॉर थ्री की आहट अब हर दिशा में गूँज रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर ख़बर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर रेडियो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर स्क्रीन पर इसकी गूंज सुनाई देती है। पोल्स चीख रहे हैं – अमेरिका में </span>46%, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटेन में </span>43%, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस में उच्च प्रतिशत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि जर्मनी में कम लोग अगले पाँच साल में ग्लोबल वॉर को संभावित मानते हैं। लेकिन हम सुन नहीं रहे। हम अपनी आँखें बंद करके नई पीढ़ी के लिए खून से सनी किताबें तैयार कर रहे हैं। बच्चे पढ़ेंगे – ऐसी किताबें जो न्यूक्लियर विंटर की कहानियाँ कहेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ सूरज छिपा रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ फसलें उगना भूल जाएँगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और भूख ही मृत्यु का दूसरा नाम बन जाएगी। यह हमारी विरासत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसके साए में बढ़ती हर पीढ़ी अपनी पहली और आखिरी पाठशाला में मौत और विनाश ही देखेगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने जलवायु परिवर्तन को अनदेखा किया। हमने युद्ध को सामान्य मान लिया। अब इसकी कीमत चुकाने वाली नई पीढ़ी होगी। उनकी पहली किताब विस्फोट की होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी आखिरी राख की। उनका डीएनए बदल चुका होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका बचपन डर और सायरन की चीखों में बीतेगा। उनके खेल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि खतरे की घंटियों की गूँज उनके कानों में गूँजेगी। हमारी पीढ़ी का सबसे बड़ा अपराध यही है – युद्ध को अपनी विरासत बनाना। हमने किताबें लिखीं – खून से। लेकिन अब वही किताबें उनकी पहली और आखिरी पढ़ाई बन चुकी हैं। नई पीढ़ी पढ़ेगी और समझेगी कि हमने क्या किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह समझ उन्हें हमारे फैसलों की कीमत बतलाएगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जागने का वक्त है – इससे पहले कि खून से सनी किताबें बच्चों की पहली और आखिरी पढ़ाई बन जाएँ। जागो। बदलो। लड़ो। क्योंकि अगर हमने अभी नहीं बदला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नई पीढ़ी सिर्फ़ खून के पन्ने पलटेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हर सवाल के जवाब के लिए हमारी चुप्पी ही रह जाएगी। बच्चे पूछेंगे</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने हमें क्यों मारा</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारे पास कोई उत्तर नहीं होगा। अब मौका है – युद्ध नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शांति की विरासत देने का। हमारी जिम्मेदारी अब तक़दीर बदलने की है। नई पीढ़ी के लिए खून नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा छोड़ो। यही हमारी अंतिम लड़ाई है – आखिरी मौका सुधार का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आखिरी मौका यह दिखाने का कि हम अभी भी अपने कर्मों के प्रभारी हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमारी विरासत है। हमने बच्चों को किताबें सौंप दी हैं – खून से सनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँसुओं से भरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और पीढ़ियों तक उठती चोटों की गूँज समेटे। यह हमारी चुप्पी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी उदासीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी लालच का सजीव प्रमाण है। अब समय है कि हम बदलें। हमें नई पीढ़ी को देने वाली किताबों से खून हटाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें केवल शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांति और आशा की विरासत देनी होगी। यही हमारी अंतिम मौका है – अगर हमने अब कदम नहीं उठाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कल का सूरज कभी नई पीढ़ी के लिए पूरी तरह चमकेगा ही नहीं। यह हमारी जिम्मेदारी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हमारी चेतावनी भी – बदलाव अब अनिवार्य है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 18:11:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच भीषण जंग, जानें भारत ने इस पर क्या कहा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका की बढ़ती सैन्य टकराव की स्थिति ने पूरे क्षेत्र को युद्ध जैसे हालात में ला दिया है। दोनों पक्षों की ओर से जारी हमलों और पलटवार ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया है। इस बीच भारत ने स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>भारत ने जताई चिंता, संयम बरतने की अपील</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">भारत के विदेश मंत्रालय ने जारी बयान में कहा कि ईरान और खाड़ी क्षेत्र में हालिया घटनाक्रम चिंताजनक हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171980/fierce-war-between-iran-and-israel-america-know-what-india-said"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/amerika-uddh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका की बढ़ती सैन्य टकराव की स्थिति ने पूरे क्षेत्र को युद्ध जैसे हालात में ला दिया है। दोनों पक्षों की ओर से जारी हमलों और पलटवार ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया है। इस बीच भारत ने स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>भारत ने जताई चिंता, संयम बरतने की अपील</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">भारत के विदेश मंत्रालय ने जारी बयान में कहा कि ईरान और खाड़ी क्षेत्र में हालिया घटनाक्रम चिंताजनक हैं। मंत्रालय ने सभी पक्षों से तनाव बढ़ाने से बचने और आम नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने यह भी कहा कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। साथ ही सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किए जाने पर जोर दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्रालय के अनुसार, क्षेत्र में मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर लगातार नजर रखी जा रही है। भारतीय दूतावासों और मिशनों के माध्यम से नागरिकों से संपर्क बनाए रखा गया है और उन्हें सतर्क रहने, स्थानीय सुरक्षा निर्देशों का पालन करने तथा आपात स्थिति में मिशन से संपर्क करने की सलाह दी गई है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>लगातार हमलों से बिगड़े हालात</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट में हालात तब और बिगड़ गए जब इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े ठिकानों पर हमले किए गए। इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए इजराइल के साथ-साथ क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का सीधा प्रभाव भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है, जो ऊर्जा आपूर्ति के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>नेतन्याहू का कड़ा बयान</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर किए गए हमलों का बचाव करते हुए कहा कि इन कार्रवाइयों से ईरान के लोगों को अपना भविष्य तय करने का अवसर मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने ईरानी नेतृत्व पर आरोप लगाते हुए कहा कि वहां की सरकार लंबे समय से इजराइल और अमेरिका के खिलाफ शत्रुता रखती रही है। नेतन्याहू ने यह भी दावा किया कि ईरान परमाणु हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर रहा है, जिनका उद्देश्य इजराइल को नुकसान पहुंचाना है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार ने मिडिल ईस्ट में मौजूद भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p>अनावश्यक यात्रा से बचें</p>
</li>
<li>
<p>स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें</p>
</li>
<li>
<p>भारतीय दूतावास से संपर्क में रहें</p>
</li>
<li>
<p>आपात स्थिति में तुरंत सहायता लें</p>
</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>वैश्विक चिंता बढ़ी</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी चिंतित है। कई देशों ने संयम बरतने और संघर्ष को फैलने से रोकने की अपील की है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही कूटनीतिक प्रयास नहीं किए गए तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिससे पूरी दुनिया प्रभावित हो सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/171980/fierce-war-between-iran-and-israel-america-know-what-india-said</link>
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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 21:47:59 +0530</pubDate>
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